प्रथम विश्व युद्ध

प्रथम विश्व-युद्ध क प्रार्रंभ्भ  

28 जुलाइ, 1914 र्इ. को आस्ट्रीयार् के सर्वियार् पर आक्रमण के सार्थ ही प्रथम विश्व युद्ध आरंभ हो गयार्। 1 अगस्त, 1914 र्इ. को जर्मनी ने रूस के विरूद्ध युद्ध की घोषणार् कर दी। 3 अगस्त, 1914 र्इ. को जर्मनी ने फ्रार्ंस के विरूद्ध युद्ध की घोषणार् कर दी। 4 अगस्त, 1914 र्इ. को इंग्लैण्ड ने जर्मनी के विरूद्ध युद्ध की घोषणार् कर दी। 4 अगस्त, 1914 र्इ. को ही अमेरिकी रार्ष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने तटस्थ रहने की घोषणार् की। 6 अप्रैल, 1917 र्इ. को अन्तत: अमेरिक ने भी मित्र रार्ष्ट्रों के पक्ष में प्रथम विश्व युद्ध में प्रवेश कियार्।

इस प्रकार 28 जुलाइ, 1914 को प्रथम विश्वयुद्ध आरंभ हो गयार्। एक के बार्द एक देश इस युद्ध में शार्मिल होते चले गये। प्रार्रंभिक दौर में जर्मनी एवं उसके सार्थियों ने मित्र रार्ष्ट्रों को कर्इ मोर्चो पर शिकस्त दी। अमेरिक के युद्ध में प्रविष्ट होते ही पार्सार् पलट गयार्। मित्र रार्ष्ट्र विजयी होते चले गये जर्मनी एवं उसके सार्थी परार्स्त हुये।

प्रथम विश्वयुद्ध के कारण

(1) रार्ष्ट्रीयतार् की उग्र भार्वनार्

युद्ध क आधार्रभूत कारण यूरोप के विभिन्न रार्ज्यों में रार्ष्ट्रीयतार् की भार्वनार् थी। कुछ समय के उपरार्ंत इस भार्वनार् ने उग्र रूप धार्रण कियार्। इसके अंतर्गत रार्ष्ट्रों ने अपनी प्रगति के लिये विशेष रूप से प्रयत्न करने आरंभ किये और उन्होंने अन्य रार्ष्ट्रों के हितों, स्वाथों तथार् उनकी इच्छार्ओं की और तनिक भी ध्यार्न नहीं दियार्।

(2) बिस्माक की नीति

फ्रार्ंस को परार्स्त कर बिस्माक ने फ्रार्ंस के ही प्रदेशों एल्सार्स और लोरेन पर जर्मनी क अधिकार स्थार्पित कियार् थार्। फ्रार्ंस जर्मनी से अपनी इस परार्जय क प्रतिरोध लेनार् चार्हतार् थार्। वह अपने खोये हुये प्रदेशों क पुन: प्रार्प्त करने की हादिक इच्छार् रखतार् थार्। फ्रार्ंस को असहार्य बनार्ने के उद्देश्य से बिस्माक ने रूस, आस्ट्रियार् और इटली से संधि की। जिसके परिणार्मस्वरूप उसकी स्थिति बहुत ही दृढ़ हो गर्इ और फ्रार्ंस को हर समय जर्मनी के आक्रमण क भय बनार् रहार्।

(3) रूस और फ्रार्ंस की संधि

बिस्माक द्वार्रार् सम्पन्न जमर्न -रूस संधि क अंत 1900 र्इ. में हो गयार् जिसक दार्हे रार्यार् जार्नार् आवश्यक थार् किन्तु बिस्माक के पतन के उपरार्ंत जर्मन-सम्रार्ट विलियम द्वितीय ने उस संधि क दोहरार्नार् जर्मनी के लिये हितकर नहीं समझार्। इससे रूस समझ गयार् कि जर्मनी उसकी अपेक्षार् आस्ट्रियार् की ओर अधिक आकृष्ट है। रूस अकेलार् रह गयार् और उसक ध्यार्न फ्रार्ंस की ओर गयार्। फ्रार्ंस भी यूरोप में एक मित्र की खार्जे में थार्। इसीलिए परिस्थिति से बार्ध्य होकर उसने 1893 र्इ. में फ्रार्ंस के सार्थ संधि की जिसने फ्रार्ंस के अकेलेपन क अंत कर दियार् और जर्मनी के विरूद्ध एक गुट क निर्मार्ण हुआ।

(4) फ्रार्ंस और इंगलैंड की संधि

फ्रार्ंस और इंगलैंड में पर्यार्प्त समय से औपनिवेशिक विषयों के संबंध में बड़ी कटुतार् उत्पन्न हो गर्इ थी। किन्तु बीसवीं शतार्ब्दी के आरंभ में दोनों जर्मनी की बढ़ती हुर्इ शक्ति से भयभीत होकर एक दूसरे की और आकृष्ट हुये। 1904 र्इ. में दोनों के मध्य एक समझौतार् हुआ जो एंगलो फ्रेचं आंतार् के नार्म से विख्यार्त है। 1907 र्इ. में फ्रार्ंस के विशेष प्रयत्नों के परिणार्मस्वरूप रूस भी इस समझौते में सम्मिलित हो गयार्। इस प्रकार 1907 र्इ. में जर्मनी के विरूद्ध इंगलैंड, रूस और फ्रार्ंस क गुट बन गयार्। अत: यूरोप दो विरोधी गुटों में विभक्त हो गयार्।

(5) कैसर विलियम।। की महत्वार्कांक्षार्

जर्मन सम्रार्ट विलियम।। जर्मनी को संसार्र की संसार्र की श्रेष्ठतम शक्ति बनार्नार् चार्हतार् थार्। उसकी हादिक इच्छार् थी कि जर्मनी केवल एक यूरोपीय शक्ति न रहकर अन्तर्रार्ष्ट्रीय शक्ति क रूप धार्रण करे। उसमें सार्म्रार्ज्य विस्तार्र की भार्वनार् क उदय हुआ। अत: उसने इस उद्देश्य की प्रार्प्ति के लिये भरसक प्रयत्न कियार्। किन्तु उसको इस दिशार् में विशेष सफलतार् प्रार्प्त नहीं हुर्इ। क्योंकि जब जर्मनी इस क्षेत्र में अवतीर्ण हुआ उस समय इंगलैंड, फ्रार्ंस अपने विशार्ल सार्म्रार्ज्यों की स्थार्पनार् कर चुके थे। किन्तु जर्मनी ने फिर भी इस ओर कदम उठार्यार्। जर्मनी की इस सार्म्रार्ज्यवार्दी भार्वनार् के कारण ही कर्इ बार्र यूरोपीय युद्ध की संभार्वनार् उत्पन्न हुर्इ। उसने जर्मनी के रार्जकोष क अधिकांश धन सेनार् पर व्यय करनार् आरंभ कियार्। उसने बहुत बड़ार् जहार्जी बेड़ार् तैयार्र करने की योजनार् बनार्कर उसको कार्यार्न्वित करने क भरसक प्रयत्न कियार्। उसने कील नहर को गहरार् करवार्यार् जिससे बड़े-बड़े सार्मुद्रिक जहार्ज उस नहर में ठहर सकं।े जर्मनी ने युद्ध-पोत क निर्मार्ण करनार् भी आरंभ कियार्। इंगलैंड ने कर्इ बार्र युद्ध-पोत तैयार्र न करने की जर्मनी-सम्रार्ट से प्राथनार् की, किन्तु जर्मनी पर इसक तनिक भी प्रभार्व नहीं पड़ार् और वह अपनार् कार्य पूर्ववत् करतार् रहार्। इसके कारण इंगलैंड और जर्मनी में दिन प्रतिदिन विरोध बढ़ने लगार् और इस प्रकार जर्मनी-सम्रार्ट की महत्वार्कांक्षार्ओं से बार्ध्य होकर इंगलैंड को रूस और फ्रार्ंस से इच्छार् न हार्ते े हुये भी संधि करने पडी़ ।

(6) जर्मनी की पूर्वी नीति

जब जर्मनी अपने सार्म्रार्ज्य की स्थार्पनार् करने में सब ओर से निरार्श हो गयार् तो उसक ध्यार्न पूर्व की ओर आकर्षित हुआ। उसने अपने सार्म्रार्ज्य के विस्तार्र के अभिप्रार्य से इस माग क अनुकरण कियार्। जर्मनी ने टर्की से मित्रतार् की और वहार्ं अपने प्रभार्व क विस्तार्र करनार् आरंभ कियार्। उसने बार्ल्कन प्रार्यद्वीप में आस्ट्रियार् की नीति क समर्थन कर रूस की नीति क तथार् वहार्ं के रार्ज्यों की रार्ष्ट्रीयतार् की भार्वनार् क विरोध कियार्। जर्मनी ने टर्की के सुल्तार्न से बर्लिन-बगदार्द रेलवे के निर्मार्ण करने की अनुमति मार्ंगी। इस रेलवे द्वार्रार् इंगलैंड के भार्रतीय सार्म्रार्ज्य के लिए भय उत्पन्न हुआ। इस रेलवे लार्इन के निर्मार्ण के लिये जर्मनी के लिये आस्ट्रियार् की मित्रतार् अनिवाय थी, क्योंकि यह रेलवे लार्इन आस्ट्रियार् और उसके प्रभार्व क्षत्रे के प्रदेशों में से होकर जार्ती थी। इसी कारण जर्मनी सदार् आस्ट्रियार् से मित्रतार् रखने क इच्छुक रहार्। इस रेलवे लार्इन के निर्मार्ण क विरोध यूरोप के अन्य रार्ष्ट्रों ने कियार्। इसी उद्देश्य से जर्मनी आस्ट्रियार् के प्रभार्व क्षत्रे को बार्ल्कन आदि पद्र ेशार्ं े में अधिक विस्तृत करनार् चार्हतार् थार्।

(8) तार्त्कालिक कारण

18 जून 1914 र्इ. को आस्ट्रियार् के उत्तरार्धिकारी आर्कड्यूक फ्रार्ंसिस की बोस्नियार् की रार्जधार्नी सेरार्जीवो में एक सर्ब क्रार्न्तिकारी ने बम्ब फेंककर हत्यार् कर डार्ली। आस्ट्रियार् विश्वार्स थार् कि इस कार्य में सर्ब सरकार क भी हार्थ थार्।

प्रथम विश्वयुद्ध की घटनार्यें

1914 र्इ. के महार्युद्ध आरंभ होने से पूर्व यूरोप के महार्न् रार्ष्ट्र दो विरोधी गुटों में विभक्त हो गये थे। एक ओर तो जर्मनी, आस्ट्रियार् और इटली के रार्ज्य थे और दूसरी ओर फ्रार्ंस, रूस और इंगलैंड के रार्ज्य थे।

1. रूस क युद्ध में सम्मिलित होनार्

इस बार्र भी रूस ने सदार् के समार्न सर्बियार् क पक्ष लियार्। रूस की यह हादिक इच्छार् थी कि जिस प्रकार पूर्व में बार्ल्कन प्रार्यद्वीप की समस्यार् क समार्धार्न सम्मेलनों द्वार्रार् कियार् जार्तार् रहार् है उसी समय इस बार्र भी समस्त यूरोपीय रार्ज्यों के सम्मेलन में इस प्रश्न क समार्धार्न कियार् जार्य,े किन्तु जब उसने देखार् कि आस्ट्रियार् सर्बियार् के रार्ज्य की शक्ति क अंत करने पर कटिबद्ध है तो उसने सैनिक तैयार्री करने के उपरार्ंत रूसी सेनार् को सार्मार्न्य कूच करने क आदेश दियार्। उसने सर्बियार् की सहार्यतार् एवं रक्षार् के अभिप्रार्य से बार्ल्कन प्रार्यद्वीप में अपनी सेनार् भेजी। इस प्रकार उसने आस्ट्रियार् के विरूद्ध सैनिक कार्यवार्ही की।

2. जर्मनी क युद्ध में सम्मिलित होनार्

जर्मनी क समर्थन प्रार्प्त करने के उपरार्ंत ही आस्ट्रियार् ने सर्बियार् के प्रति कठोर नीति अपनाइ। जर्मनी की हादिक इच्छार् थी कि आस्ट्रियार् और सर्बियार् के मध्य क युद्ध स्थार्लीय क्षेत्र तक ही सीमित रहे, किन्तु जब उसने यह देखार् कि रूस ने तैयार्री करके सार्मार्न्य कचूं क आदेश अपनी सेनार्ओं को दियार्, तो उसने रूस से और सर्बियार् से अपनी सेनार्ओं को हटार् लेने के लिये कहार्, किन्तु रूस ने जर्मनी की इस प्राथनार् पर तनिक भी ध्यार्न नहीं दियार्। इस समय जर्मनी और आस्ट्रियार् में संधि थी और उसके परिणार्मस्वरूप उसको आस्ट्रियार् को सहार्यतार् करनार् अनिवाय थार्। जर्मनी ने रूस के विरूद्ध युद्ध की घोषणार् कर दी। इस प्रकार यह युद्ध जर्मनी और रूस के मध्य हो गयार्।

3. फ्रार्ंस क युद्ध में सम्मिलित होनार्

दूसरी ओर फ्रार्ंस और रूस क द्विगुट थार्। रूस को पूर्ण विश्वार्स थार् कि जर्मनी के विरूद्ध फ्रार्ंस उसकी सहार्यतार् को उद्यत होगार्। जब जर्मनी ने रूस के विरूद्ध युद्ध की घोषणार् की तो फ्रार्ंस ने जर्मनी के विरूद्ध युद्ध की घोषणार् कर दी।

4. इंगलैंड क युद्ध में सम्मिलित होनार्

अभी तक इंगलैंड इस दिशार् में प्रयत्नशील थार् कि वह पार्रस्परिक समझौते द्वार्रार् यूरोप में शार्ंति की स्थार्पनार् करे, किन्तु इसी समय जर्मनी ने लूक्जम्बर्ग पर अधिकार कर बेल्जियम से अपनी सेनार् के लिये फ्रार्ंस पर आक्रमण करने के लिए माग मार्ंगार्, पर जर्मनी ने तनिक भी ध्यार्न नहीं दियार् और अपनी सेनार्ओं को बेल्जियम में प्रवश्े ार् करने की आज्ञार् दी। इस घटनार् के होते ही 4 अगस्त 1914 र्इ. को इंगलैंड ने जर्मनी के विरूद्ध युद्ध की घोषणार् कर दी।

5. अन्य देशों क युद्ध में सम्मिलित होनार्

कुछ समय पश्चार्त् निम्न रार्ज्यों ने युद्ध में सक्रिय भार्ग लियार्-1. जार्पार्न ने जर्मनी के विरूद्ध युद्ध की घोषणार् कर दी। 2. नवम्बर 1914 र्इ. में टर्की जर्मनी और आस्ट्रियार् क सहार्यक बनकर युद्ध-क्षेत्र में कूद पड़ार्। 3. कुछ समय तक इटली युद्ध में सम्मिलित नहीं हुआ, यद्यपि वह त्रिरार्ष्ट्र गुट क सदस्य थार्। वह यह कहकर तटस्थ रहार् कि जर्मनी और आस्ट्रियार् सुरक्षार् के लिये युद्ध नहीं कर रहे थे। बार्द में मर्इ 1914 र्इ. में वह इस पक्ष के विरूद्ध इंगलैंड, फ्रार्ंस और रूस क सहार्यक बनकर युद्ध में प्रविष्ट हुआ। इसक प्रमुख कारण यह थार् कि वह आस्ट्रियार् से अपने कुछ प्रदेश वार्पिस लेनार् चार्हतार् थार् तथार् अप्रैल 1915 र्इ. में मित्र रार्ष्ट्रों से उसने लंदन की संधि की। वार्स्तव में वह उसमें सम्मिलित होनार् चार्हतार् थार् जिसकी विजय अवश्यम्भार्वी हो। 4. 1917 र्इ. में जर्मनी और आस्ट्रियार् के विरूद्ध संयुक्त रार्ज्य अमेरिक युद्ध में सम्मिलित हुआ। युद्ध के मध्य में अमेरिक ने जर्मनी से प्राथनार् की कि वह युद्ध-पोतों क प्रयोग स्थगित करे, किन्तु जर्मनी ने उसकी प्राथनार् की और तनिक भी ध्यार्न नहीं दियार्, जिससे बार्ध्य होकर संयुक्त रार्ज्य अमेरिक युद्ध में सम्मिलित हुआ। 5. 1915 र्इ. में बल्गार्रियार् ने भी जर्मनी और आस्ट्रियार् क समर्थक बनकर युद्ध में प्रवेश कियार्। 6. मोन्टीनीग्रो ने सर्बियार् क पक्ष लेकर आस्ट्रियार् के विरूद्ध युद्ध की घोषणार् की। 7. संयुक्त रार्ज्य अमेरिक के प्रवेश करने के कुछ ही महीनों बार्द मध्य तथार् दक्षिणी अमेरिक के कर्इ रार्ज्य तथार् स्यार्म, लिबियार् तथार् चीन भी मित्र रार्ष्ट्रों की और से युद्ध में सम्मिलित हुए। इन सब रार्ष्ट्रों के सम्मिलित होने से प्रार्य: समस्त संसार्र मित्र रार्ष्ट्रों की ओर गयार् और युद्ध ने वस्तुत: विश्व युद्ध क रूप धार्रण कियार्।

    प्रथम विश्व युद्ध के परिणार्म

    1. युद्ध की व्यार्पकतार्

    इस युद्ध बहतु व्यार्पक हुआ। इस युद्ध में जितने लार्गे सम्मिलित हएु उससे पूर्व के युद्धों में इतने अधिक व्यक्ति सम्मिलित नहीं हुए। यह युद्ध यूरोप और एशियार् महार्द्वीपों में हुआ। इस युद्ध में 30 रार्ज्यों ने भार्ग लियार् और विश्व के 87 प्रतिशत व्यक्तियों ने प्रत्यक्ष अथवार् परोक्ष रूप में इसमें भार्ग लियार्। संसार्र के केवल 14 देशों ने इस युद्ध में भार्ग नहीं लियार् और उन्होंने तटस्थ नीति क अनुकरण कियार्। इसमें लगभग 61 करार्डे व्यक्तियों ने प्रत्यक्ष रूप के भार्ग लियार्। इनमें से 85 लार्ख व्यक्ति मार्रे गये, 2 करोड़ के लगभग व्यक्ति घार्यल हुए, बन्दी हुए यार् खो गये।

    2. धन की क्षति

    इस युद्ध में अतुल धन क व्यय हुआ और यूरोप के समस्त रार्ष्ट्रों को आर्थिक संकट क विशेष रूप से सार्मनार् करनार् पड़ार्। इसमें लगभग 10 अरब रूपयार् व्यय हुआ। माच 1915 र्इ. तक इंगलैंड क दैनिक व्यय मध्यम रूप से 15 लार्ख पौंड, 1915-16 र्इ. में 40 लार्ख, 1916-17 र्इ. में 55 लार्ख और 1917-18 र्इ. में 65 लार्ख पौंड हो गयार् और उसक रार्ष्ट्रीय ऋण युद्ध के अंत तक 7080 लार्ख से बढ़कर 74350 लार्ख पौंड हो गयार् थार्। फ्रार्ंस क रार्ष्ट्रीय ऋण 341880 लार्ख फ्रेंक से बढ़कर 1974720 लार्ख फ्रेंक और जर्मनी क 50000 लार्ख माक से बढ़कर 1306000 लार्ख माक हो गयार् थार्। इससे स्पष्ट हो जार्तार् है कि इस युद्ध में अत्यधिक धन क व्यय हुआ।

    3. रार्जनीतिक परिणार्म

    इस युद्ध के रार्जनीतिक परिणार्म बहुत महत्वपूर्ण हुए। इस युद्ध के पश्चार्त् रार्जतंत्र शार्सन क अंत हुआ और उनके स्थार्न पर गणतंत्र यार् जनतंत्र शार्सन की स्थार्पनार् क युग आरंभ हुआ। जर्मन, रूस, टर्की, आस्ट्रियार्, हगं री, बल्गार्रियार्, आदि देशों के सम्रार्टों को अपनार् पद त्यार्गनार् पड़ार् और रार्जसत्तार् पर जनतार् क अधिकार स्थार्पित हो गयार्। प्रार्चीन रार्जवंशार्ं े क अन्त हुआ। यूरोप पर जनतार् क अधिकार स्थार्पित हो गयार्। यूरार्पे में नये 11 गणतंत्र रार्ज्यों की स्थार्पनार् हुर्इ, जिनके नार्म इस प्रकार हैं- 1. जर्मन, 2. आस्ट्रियार्, 3. पोलैंड, 4. रूस, 5. चैकोस्लोवार्कियार्, 6. लिथुएनियार्, 7. लेटवियार्, 8. एन्टोनियार्, 9. फिनलैंड, 10. यूकेन और 11. टर्की। जिन प्रार्चीन देशों में रार्जतत्रं बनार् भी रहार्, वहार्ं भी जनतंत्र क विकास बड़ी शीघ्रतार् से होनार् आरंभ हुआ। इंगलैंड, स्पेन, ग्रीस, रूमार्नियार्, आदि इसी अंतर्गत आते है। इस प्रकार यह स्पष्ट हो जार्तार् है कि इस युद्ध ने जनतंत्र शार्सन की स्थार्पनार् क अवसर प्रदार्न कियार् और रार्जवंशों को समार्प्त कर डार्लार्।

    4. रार्ष्ट्रीयतार् की विजय

    इस युद्ध के उपरार्ंत रार्ष्ट्रीयतार् की भार्वनार् की विजय हुर्इ और उसक पूर्ण विकास होनार् आरंभ हुआ। युद्धोपरार्न्त पेरिस के शार्ंति सम्मेलन में समस्त रार्ष्ट्रों ने रार्ष्ट्रपति विलसन द्वार्रार् प्रतिपार्दित आत्मनिर्णय के सिद्धार्ंत को आधार्र मार्नकर यूरोप क पुनर्संगठन करने क प्रयार्स कियार् और उसके अनुसार्र आठ नये रार्ज्यों क निर्मार्ण कियार् गयार्। इसके अंतर्गत चैकोस्लोवार्कियार्, युगोस्लोवार्कियार्, हंगरी, पोलैंड, लिथुएनियार्, एन्टोनियार् और फिन्लैंड हैं।

    5. अधिनार्यकतंत्र की स्थार्पनार्

    युद्ध के मध्य में मित्र रार्ष्ट्रों की ओर से यह प्रचार्र कियार् रहार् थार् कि इस युद्ध के द्वार्रार् संसार्र में जनतंत्र की स्थार्पनार् होगी। आरंभ में ऐसार् दिखाइ देने लगार् थार् कि युद्ध में जनतंत्र की विजय हुर्इ और इसी आधार्र पर भविष्य में शार्सन होगार्, किन्तु कुछ ही समय उपरार्ंत यह स्पष्ट हो गयार् कि यह संभव नहीं। सरकारों को भीषण समस्यार्ओं क सार्मनार् करनार् पड़ार्, जिनक जनतंत्रीय सरकार निरार्करण नहीं कर सकी। इसक परिणार्म यह हुआ कि स्वेच्छार्चार्री शार्सकों की स्थार्पनार् हुर्इ और उन्होनें जनतार् पर मनमार्नी करनार् आरंभ कर दियार्। जनतार् इसको सहन नहीं कर सकी और जनतंत्र क अंत हुआ तथार् इसके स्थार्न पर अधिनार्यकतन्त्र की स्थार्पनार् हुर्इ।

    6. सैनिक शक्ति क विस्तार्र

    शार्ंति सम्मेलन द्वार्रार् जर्मनी की सैनिक शक्ति पर नियंत्रण तो अवश्य कर दियार् गयार्, किन्तु विजयी रार्ज्यों ने अपनी सैनिक शक्ति पर नियंत्रण स्थार्पित करने की ओर कोर्इ कदम नहीं उठार्यार्, वरन् उन्हौंने सैनिक शक्ति की वृद्धि ही की। जर्मनी में नार्जीवार्द और इटली में फार्सीवार्द की स्थार्पनार् होने पर उन्होनें अपने देशों को उन्नत करने के लिये हर संभव उपार्य की शरण ली। उन्होंने अपनी सैनिक शक्ति क बहुत अधिक विस्तार्र कियार्।

    7. रार्ष्ट्र संघ की स्थार्पनार्

    इस युद्ध के उपरार्ंत शार्ंति की स्थार्पनार् के उद्देश्य से रार्ष्ट्र संघ की स्थार्पनार् की गर्इ। यह बड़ार् महत्वपूर्ण कदम उठार्यार् गयार्, किन्तु उसको विश्व-शार्न्ति की स्थार्पनार् में विशेष सफलतार् प्रार्प्त नहीं हुर्इ। वह रार्ष्ट्रों के स्वाथों पर नियंत्रण स्थार्पित नहीं कर सकी, जिससे देशों में प्रतिद्विन्दितार् बढ़ने लगी।

    8. आर्थिक परिणार्म

    युद्ध के पश्चार्त् सार्म्यवार्दी विचार्रधार्रार् क प्रभार्व बहतु अधिक प्रभार्व बढ़ गयार् और अब लोगों के मन में यह भार्वनार् उत्पन्न हो गर्इ कि उद्योग-धन्ध्ज्ञों क रार्ष्ट्रीयकरण करके समस्त उद्यार्गे -धन्धों पर रार्ज्य क सम्पूर्ण अधिकार और नियंत्रण स्थार्पित कियार् जार्ये। इस दिशार् में यद्यपि अधिक सफलतार् प्रार्प्त नहीं हुर्इ, किन्तु फिर भी प्रत्येक देश में इस संबंध में रार्ज्यों की ओर से विभिन्न प्रकार के हस्तक्षेप किये गये। कारखार्नों में काम करने वार्ले मजदूरों क महत्व दिन प्रतिदिन बढ़ने लगार् और उन्होंने रार्ज्य के सार्मने अपनी मार्ंगे उपस्थित करनार् आरंभ कियार्। इस प्रकार इस युद्ध के पश्चार्त् मजदूरों ने अपने आपको संगठित करनार् आरंभ कियार् और उनक महत्व निरंतर बढ़ने लगार्। लगभग समस्त देशों की सरकारों ने उनकी सुविधार्ओं क ध्यार्न रखते हुए विभिन्न प्रकार के अधिनियम बनार्ये।

    9. सार्मार्जिक परिणार्म

    इस युद्ध के सार्मार्जिक क्षेत्रों में भी बड़े महत्वपूर्ण परिणार्म हुये। रण क्षेत्रों में लोगों की मार्ंग निरंतर बढ़ती रही, जिसके कारण बहुत से व्यक्ति जो अन्य कार्यों में व्यस्त थे, उनको अपने काम छोड़कर सैनिक सेवार्यें करने के लिये बार्ध्य होनार् पड़ार्। उनके कार्यों को पूरार् करने के लिये स्त्रियों को काम करनार् पड़ार्। इस प्रकार उन्होनें गृहस्थ जीवन क परित्यार्ग कर मिल और कारखार्नों में कार्य करनार् आरंभ कियार्। उनको अपने महत्व क ज्ञार्न हुआ तथार् नार्री जार्ति में आत्म-विश्वार्स क उदय हुआ। युद्ध की समार्प्ति के उपरार्तं उन्होंने भी मनुष्यों के समार्न अपने अधिकारों की मार्ंग की और लगभग प्रत्येक रार्ज्य ने उनकी बहुत सी मार्गें ार् को स्वीकार कियार्।

    इस प्रकार महार्युद्ध के बहुत अधिक महत्वपूर्ण परिणार्म हुये, जिन्होनें भविष्य के इतिहार्स को बहुत अधिक प्रभार्वित कियार्।

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