प्रकृतिवार्द (शिक्षार् दर्शन)

प्रकृतिवार्द की ऐतिहार्सिक पृष्ठभूमि

दर्शन क आरम्भ आश्चर्य है। प्रकृति आश्चर्यमयी है। उसके भौतिक तत्व ने ही मनुष्य केार् चिन्तन की प्रेरणार् दी, अत: आरम्भ में हमें प्रकृति सम्बंधी विचार्र ही मिलते हैं। थेलीस ने जगत क मूल कारण जल बतार्यार्। एनेक्सी मैडम ने आध् ार्ार्र तत्व वार्यु को मार्नार् है। हैरेक्लार्इट्स ने अग्नि को वार्स्तविकतार् यार् यर्थार्थतार् क रूप दियार्। एम्पोडोक्लीज ने पृथ्वी , जल, अग्नि तथार् वार्यु सभी को स्थार्यी तत्व मार्नार्। भार्रत में वैदिक काल में भी मनुष्य के विचार्र अग्नि, जल और पृथ्वी से सम्बद्ध पार्ये जार्ते हैं। इन सभी को देव क स्वरूप मार्नार् गयार्। प्रकृतिवार्द क आरम्भ ऐतिहार्सिक विचार्र से मार्नवीय जगत के आरम्भ से ही कहार् जार्तार् है जो कि भार्रतीय एवं यूनार्नी दोनों दर्शन में पार्यार् जार्तार् है। प्रकृतिव्यवस्थित रूप में पण्चिमी दर्शन में अधिक विकसित हुआ यद्यपि प्रकृतिवार्दी दृष्टिकोण तत्व मीमार्ंसार्, सार्ंख्य, वैषेणिक, चावार्क, बौद्ध एवं जैन दर्शन में भी विस्तार्र में पार्यार् जार्तार् है। प्रकृतिवार्द क विकास क्रमिक ढंग से हुआ है।

प्रथम अवस्थार् में प्रकृति से पदाथ जो प्रकृति में पार्ये जार्ते हैं सत्य एवं यथाथ ठहरार्ये गये, उनक अस्तित्व अपने आप में और अपने ही द्वार्रार् पूर्ण मार्नार् गयार्। ल्यूसीपस एवं डेमोक्रार्इट्स के अनुसार्र भौतिक पदाथ अणु में गति हेार्ने से प्रार्प्त हेार्ते हैं। मन और आत्मार् गतिशील सुधर अणुओं से बने हैं। एपीक्यूरस से स्पण्ट कियार् कि इन अणुओं से इन्द्रियों की सहार्यतार् द्वार्रार् मन क ज्ञार्न होतार् है। लेकुसियस ने विकास के उपर जोर दियार्। अणुओं के गतिणील होने पर पृथ्वी एवं अन्य ग्रहों की उत्पत्ति हुयी। गतिणीलतार् से मनुष्य को काल क अनुभव हुआ। हार्ब्स के बार्द रूसों ने प्रकृति को मूर्त मार्नार्। उसके अनुसार्र सभी गुणों से युक्त एवं ज्ञार्न क स्त्रोत प्रकृति है। रूसों के बार्द हरबर्ट स्पेन्सर हुये जिसने विकासवार्द क आश्रय लियार्। इन पर लेमाक क प्रभार्व पड़ार्। डाविन ने जीवविज्ञार्नार्त्मक सिद्धार्न्त दिये। इन्होनें ज्ञार्न को विकास एवं व§द्धि की प्रक्रियार् पर आधार्रित कियार्। मृत्यु के समय विकास में सहार्यक एकीकृत रूप विछिन्न होकर पुन: जगत के पदाथ में मिल जार्ते हैं। बीसवीं शतार्ब्दी में बर्नार्ड शॉ भी प्रकृतिवार्दी दर्शन के प्रचार्रक बने।

भार्रत में कुछ चिन्तकों की विचार्रधार्रार् में प्रकृतिवार्द दिखार्यी देतार् है। रवीन्द्रनार्थ टैगोर के दर्शन में प्रकृतिवार्द की विचार्रधार्रार् स्पण्ट है। दयार्नन्द सरस्वती जैसे आदर्शवार्दी विचार्रकों ने भी गुरूकल की स्थार्पनार् प्रकृति की गोद में की।

प्रकृतिवार्द की संकल्पनार्

प्रकृतिवार्द तत्व मीमार्ंसार् क वह रूप है, जो प्रकृति को पूर्ण वार्स्तविकतार् मार्नतार् है। वह अलौकिक और पार्रलौकिक को नहीं मार्नतार् है जो बार्तें प्रार्कृतिक नियम से स्वतंत्र जार्न पड़ती है- जैसे मार्नव जीवन यार् कल्पनार् की उपज वे भी वार्स्तव में प्रकृति की योजनार् में आती है। प्रत्येक वस्तु प्रकृति से उत्पन्न होती है और उसी में विलीन हो जार्ती है।

प्रकृतिवार्द दर्शन क वह सम्प्रदार्य है, जो चरम सत्तार् को प्रकृति में निहित मार्नतार् है। दर्शन शार्स्त्र में प्रकृति क अर्थ अत्यन्त व्यार्पक है। एक ओर प्रकृति क अर्थ भौतिक जगत हो सकतार् है जिसे मनुष्य इन्द्रियों तथार् मस्तिष्क की सहार्यतार् से अनुभव करतार् है, दूसरी ओर इसकी जीव जगत के रूप में व्यार्ख्यार् की जार् सकती है, और तीसरे अर्थों में देशकाल क समग्र प्रपंच प्रकृति के अन्तर्गत समार्विण्ट हो जार्तार् है। प्रकृति यार् नेचर से विपरीताथक शब्द है परमार्त्मार् अथवार् ‘‘सुपर नेचुरल पार्वर’’ जिसे प्रकृति से परे मार्नार् जार्तार् है। अर्थ की व्यार्प्ति के आधार्र पर प्रकृतिवार्द का  वर्गीकरण कियार् जार् सकतार् है।

  1. परमार्णुवार्दी प्रकृतिवार्द
  2. शक्तिवार्द अथवार् वैज्ञार्निक प्रकृतिवार्द
  3. जैविक प्रकृतिवार्द
  4. यन्त्रवार्दी प्रकृतिवार्द
  5. ऐतिहार्सिक तथार् द्वनणार्त्मक भौतिकवार्दी प्रकृतिवार्द
  6. मार्नवतार्वार्दी प्रकृतिवार्दी
  7. रूमार्नी प्रकृतिवार्दी

1. परमार्णु प्रकृतिवार्द –

यह सबसे पार््रचीन भार्ैितकवार्दी दशर्न हे जिसके मतार्नसु ार्र जगत की अंतिम इकार्इ परमार्णु है, अर्थार्त् चिरन्तन सत्तार् भौतिक परमार्णु में निहित है। परमार्णुवार्द के मतार्नुसार्र यह दृश्य जगत परमार्णुओं के विविध संयोगों क प्रतिफल है। परमार्णुओं क यह संयोग द्कि तथार् गति के मार्ध्यमों द्वार्रार् होतार् है। अणुओं क पुन: विखण्डन कियार् जार् सकतार् है और जगत की की अन्तिम इकार्इ शक्ति हो गयी और परमार्णुवार्द अमार्न्य सार् हो गयार् है।

2. शक्तिवार्द-

परमार्णुवार्द की असफलतार् ने शक्तिवार्द को जन्म दियार् परमार्णुवार्द में केवल दिक् और काल को ही तत्व थे, परन्तु नये शोधों ने एक और तत्व को जन्म दियार् और वह थार् गति। नये शोधो ने स्पष्ट कियार् कि परमार्णु गतिशील होते हैं और उनके इलेक्ट्रार्न और प्रोटार्न शक्ति कण होते हैं। अत: जगत क अन्तिम तत्व शक्ति को मार्नार् गयार् है। शक्तिवार्द मनुष्य में स्वतंत्रत इच्छार्शक्ति होनार् अथवार् आत्मार् जैसी किसी अन्य इकार्इ को स्वीकार नहीं करतार् है।

3. यन्त्रवार्द- 

इस सम्पद्रार्य के अनुसार्र सृष्टि यन्त्रवत् है भार्ैितक जगत, प्रार्णी जगत तथार् मार्नव जगत सभी की व्यार्ख्यार् भौतिक शार्स्त्र, रसार्यन शार्स्त्र तथार् अन्य भौतिक विज्ञार्नों के मार्ध्यम से की जार् सकती है। यन्त्रवार्द के अनुसार्र मन तथार् उसकी सभी क्रियार्यें व्यवहार्र के प्रकार मार्त्र हैं, जिन्हें स्नार्युसंस्थार्न, ग्रन्थिसंस्थार्न तथार् मार्ंसपेशीसंस्थार्न की सहार्यतार् से समझार् जार् सकतार् है। यन्त्रवार्दी भी शक्तिवार्दी के समार्न ही नियतिवार्द में विश्वार्स करतार् है। उसके अनुसार्र जगत में जो परिवर्तन होते हैं वे सभी कारण-कार्य नियम से आबद्ध है।

4. जैविक प्रकृतिवार्द – 

इस सम्पद्रार्य क उदग् म डार्विर्न के क्रम विकास सिद्धार्न्तों से हुआ है तथार् वार्स्तव में किसी सम्प्रदार्य को सच्चे अर्थों में प्रकृतिवार्द संज्ञार् से अभिहित कियार् जार् सकतार् है तो वह जैविक प्रकृतिवार्द ही हैं इनके अनुसार्र मार्नव क विकास जीवों के विषय में सबसे अंतिम अवस्थार् में है। मस्तिण्क के फलस्वरूप वह विज्ञार्न को संचित रख सकतार् है, नये विचार्र उत्पन्न कर सकतार् है। पर अन्य प्रार्णियों की तरह वह भी प्रकृति के हार्थों क खिलौनार् मार्त्र है। उसकी नियति तथार् विकास की सम्भार्वनार्यें वंशक्रम तथार् परिवेण पर निर्भर करती है। मनुष्य की स्वतंत्रतार् क अधिकार भी सीमित है।

5. द्वन्द्वार्त्मक भौतिकवार्द  –

द्वन्द्वार्त्मक भौतिकवार्द के प्रमुख व्यार्ख्यार्कार मार्क्र्स तथार् ऐंजल्स है। यह सम्प्रदार्य भी विज्ञार्न को सर्वोच्च महत्व प्रदार्न करतार् है, परन्तु इसक आग्रह स§ण्टि संरचनार् से हटकर आर्थिक संरचनार् पर आ जार्तार् है। इसके अनुसार्र समार्ज के आर्थिक संगठन क आधार्र क्रय है। द्वव्य जो आर्थिक संरचनार् में प्रयुक्त होतार् है, नैतिक, धामिक तथार् दाशनिक विचार्रों को जन्म देतार् है। द्वन्द्वार्त्मक भौतिकवार्द के अनुसार्र जगत विकास की निरन्तर प्रक्रियार् है। परिवर्तन की सभी क्रियार्यें द्वन्द्वार्त्मक होती है, अर्थार्त् सभी परिवर्तनकारी प्रक्रियार्यें स्वीकारोक्ति से आरम्भ होती है, तदनन्तर उसमें नकारोक्ति क संघर्ण अन्तर्निहित है, जिसक अवसार्न समार्हार्रोक्ति में होतार् है। इस द्वन्द्व को उसने अस्ति-नार्स्ति तथार् समण्टि संज्ञार्ओं में अभिहित कियार् है। द्वन्द्वार्त्मक भौतिकवार्द की आत्मार् स्वतत्र इच्छार्शक्ति अथवार् परमार्त्मार् आदि तत्वों से इन्कार करतार् है तथार् स§ण्टि क मूल द्रव्य में मार्नतार् है।

6. रूमार्नी प्रकृतिवार्द –

इस सम्प्रदार्य के व्यार्ख्यार्कार रूसों, नील एवं टैगोर है। इनकी रूचि स§ण्टि की संरचनार् में न होकर सृष्टि की आàळार्दकारी प्रकृति तथार् गहन मार्नव प्रकृति से है। इस सम्प्रदार्य को प्रकृतिवार्दी केवल इन अर्थों में कहार् जार् सकतार् है कि वह सार्मार्जिक कृत्रिमतार् क विरोध करते हैं, तथार् मनुष्य के प्रक§त जीवन को आदर्श मार्नते हैं। रूसों प्रकृति के निर्मार्तार् की कल्पनार् भी करतार् है। प्रकृति से परे किसी परमार्त्मार् को अस्वीकार नहीं कियार् जार्तार् अपितु प्रकृति को र्इण्वर की कृति मार्नार् जार्तार् है।

वैज्ञार्निक मार्नवतार्वद –

इस सम्पद्रार्य के अनुसार्र मनषुय अपनी बुिद्ध के प्रयोग द्वार्रार् लोकतार्ंत्रिक शार्सन की संस्थार्ओं को संचार्लित करते हुये बिनार्, किसी परार्शक्ति की मदद से एक ऐसे तर्कशक्ति परक सभ्यतार् क स§जन कर सकते हैं जिसमें प्रत्येक मनुष्य सुरक्षार् की अनुभूति कर सके और स्वयं में निहित सार्मार्न्य मार्नवीय क्षमतार्ओं और स§जनार्त्मक शक्तियों के अनुसार्र विकास कर सके।

प्रकृतिवार्द की परिभार्षार्

  1. थार्मस और लैगं – ‘‘प्रकृतिवार्द आदशर्वार्द के विपरीत मन को पदाथ के अधनी मार्नतार् है और यह विश्वार्स करतार् है कि अन्तिम वार्स्तविकतार्- भौतिक है, अध्यार्त्मिक नहीं।’’
  2. पैरी-’’प्रकृतिवार्द विज्ञार्न नहीं है वरन् विज्ञार्न के बार्रे में दार्वार् है। अत्मिार्क स्पष्ट रूप से यह इस बार्त क दार्वार् है कि वैज्ञार्निक ज्ञार्न अन्तिम है और विज्ञार्न से बार्हर यार् दाशनिक ज्ञार्न क कोर्इ स्थार्न नहीं है।’’
  3. जेम्स वाड –’’प्रकृतिवार्द वह विचार्रधार्रार् है जो प्रकृति को इर्ण् वर से अलग करती है और आत्मार् को पदाथ अथवार् भौतिक तत्व के अधीन मार्नती है, एवं अपरिवर्तनशील नियमों को सर्वोच्च मार्नती है।’’
  4. ज्वार्इस महोदय-’’वह विचार्रधार्रार् है जिसकी पध्रार्न विशेषतार् है प्रकृति तथार् मनुष्य के दाशनिक चिन्तन जो कुछ आध्यार्त्मिक है अथवार् वार्स्तव में जो कुछ अनुभवार्तीत है उसे अलग हटार् देनार् है।’’

प्रकृति की तत्व मीमार्ंसार् ज्ञार्न मीमार्ंसार् और आचार्र मीमार्ंसार् की द§ण्टि से हम उसे इस रूप में परिभार्षार् करते हैं-‘‘प्रकृति दर्शन की वह विचार्रधार्रार् है जो इस ब्रार्ह्मार्ण्ड को प्रकृतिजन्य मार्नती है और यह मार्नती है कि यह भौतिक संसार्र ही सत्य है इसके अतिरिक्त कोर्इ आध्यार्त्मिक संसार्र नहीं है। यह र्इण्वर को नहीं मार्नती और आत्मार् को पदाथ जन्य चेतन तत्व के रूप में स्वीकार करती है और यह प्रतिपार्दन करती है कि मनुष्य जीवन क उद्देश्य सुखपूर्वक जीनार् है, जो प्रार्कृतिक विकास द्वार्रार् प्रार्प्त कियार् जार् सकतार् है।’’

प्रकृतिवार्द क दाशनिक दृष्टिकोण

1. तत्वदर्र्शन में प्रकृतिवार्द – 

परमार्णु को सत् अनश्वर एवं अविभार्ज्य मार्नते है। ये परमार्णु आकार एवं मार्त्रार् में भिन्न होते हैं। इन्हीं के संयोग से ब्रह्मार्ण्ड की रचनार् होती है जो द§श्य है वह परमार्णुओं के संयोग क फल है। प्रकृतिवार्दियों के अनुसार्र मनुष्य- इन्द्रियों एवं विभिन्न शक्तियों क समन्वित रूप है। सब प्रकृति क खेल है। इसमें आत्मार् नार्मक चेतन तत्व नहीं है। सम्पूर्ण सृष्टि के नियम विद्यमार्न है। सब कार्य नियमार्नुसार्र हेार्ते है, मनुष्य भी प्रकृति अधीन है स्वतंत्र नहीं। प्रकृति के नियम, शार्श्वत एवं अपरिवर्तनशील है।

2. ज्ञार्नशार्स्त्र में प्रकृतिवार्द –

प्रकृतिवार्दी पत्रयक्ष क समथर्न करते है। ये इन्दिय्रों तथार् अनुभव के मार्ध्यम से ज्ञार्न की प्रार्प्ति पर बल देते हैं। वे इन्द्रियों द्वार्रार् प्रार्प्त किये जार्ने वार्ले ज्ञार्न को सत्य मार्नते हैं। हरबर्ट स्पेन्सर इस ज्ञार्न को निम्न स्तर के ज्ञार्न से ऊँचार् और तत्व ज्ञार्न से निम्न मार्नतार् है। तत्व ज्ञार्न पूर्णरूपेण संगठित ज्ञार्न होतार् है। इसको स्पेन्सर ने सर्वोत्तम प्रकार क ज्ञार्न बतार्यार् है। रूसों ने शिक्षार् के सब स्तरों पर प्रत्यक्ष ज्ञार्न को महत्वपूर्ण स्थार्न प्रदार्न करने के लिये कहार् है।

3. आचार्र मीमार्सार्ं में प्रकृतिवार्द – 

प्रकृतिवार्द पार््रकतिक पदाथ एवं क्रियार्ओं को ही सत्य मार्नतार् है। इनके अनुसार्र प्रकृति अपने आप में शु़द्ध है और इसके अनुकूल आचरण मनुष्य को करनार् चार्हिये, जिससे कि सुख मिलें। मनुष्य को अपनी प्रकृति के अनुकूल ही आचरण करनार् चार्हिये। वे मनुष्य को किसी प्रकार से सार्मार्जिक नियमों और आध्यार्त्मिक बंधनों में बार्ंधकर नहीं रखनार् चार्हते हैं। मनुष्य को जो कार्य सुख देते हैं वही कार्य वह करेगार्। प्रकृतिवार्दी केवल प्रार्कृतिक नैतिकतार् को मार्नते हैं।

प्रकृतिवार्द के मूल सिद्धार्न्त

प्रकृतिवार्द के दाशनिक दृष्टिकोण के बार्रे में पूर्व में जार्नकारी प्रार्प्त कर चुके है। अब प्रकृतिवार्द की तत्व मीमार्ंसार्, ज्ञार्न मीमार्ंसार् एवं आचार्र मीमार्ंसार् को हम सिद्धार्न्तों के रूप इस प्रकार से देख सकते हैं-

1. यह ब्रह्म्र्रार्ण्ड एक प्रार्कृतिक रचनार् है- 

प्रकृतिवार्दियों के अनुसार्र संसार्र क कर्तार् और करण दोनों स्वयं प्रकृति ही है। प्रार्कृतिक तत्वों के संयोग से पदाथ और पदाथों के संयार्ंग से संसार्र की रचनार् होती है और उनके विघटन से इसक अन्त होतार् है। यह संयोग और विघटन की क्रियार् कुछ निश्चित नियमों के अनुसार्र होती है। इसको बनार्ने और बिगार्ड़ने को प्रार्कृतिक परिवर्तन कहार् जार्तार् है।

2. यह भौतिक ससार्ंर ही सत्य – 

प्रकृतिवार्द भार्ैितक ससार्र को ही सत्य मार्नतार् है। उसक स्पण्टीकरण है कि इस संसार्र को हम इन्द्रियों द्वार्रार् प्रत्यक्ष कर रहे हैं, अत: यह सत्य है। इसके विपरीत आध्यार्त्मिक संसार्र को हम इन्द्रियों द्वार्रार् प्रत्यक्ष नहीं कर पार्ते इसलिये वह असत्य है।

3. आत्मार् पदाथ जन्य चेतन तत्व है- 

प्रकृतिवार्द आत्मार् के आध्यार्त्मिक स्वरूप को स्वीकार नहीं करतार्। उसक स्पण्टीकरण है कि यह संसार्र प्रकृति द्वार्रार् निर्मित है और यह निर्मार्ण कार्य निश्चित नियमों के अनुसार्र हेार्तार् है, इसके पीछे किसी आध्यार्त्मिक शक्ति परमार्त्मार् की कल्पनार् एक मिथ्यार् विचार्र है। प्रकृतिवार्दियों के अनुसार्र परमार्णु में स्थित इलेक्ट्रार्न, प्रोटार्न, न्यूट्रार्न की गतिशीलतार् जड़ में जीव और जीव में चेतन क विकास करते हैं।

4. मनुष्य ससार्ंर की श्रेण्ठतम् रचनार्- 

प्रकृतिवार्द मनुष्य को जन्म से पूर्ण तो नहीं पर संसार्र की श्रेण्ठतम् रचनार् मार्नतार् है। भौतिक विज्ञार्नवार्दी प्रकृतिवार्द के अनुसार्र मनुष्य संसार्र क श्रेण्ठतम् पदाथ है। यन्त्रवार्दी प्रकृतिवार्द के अनुसार्र मनुष्य श्रेण्ठतम् यंत्र है और जीव विज्ञार्नवार्दी यह संसार्र क सर्वोच्च पशु है। जीव विज्ञार्नवार्दियों के अनुसार्र मनुष्य अपने में निहित कुछ विशेष शक्तियों के कारण अन्य पशुओं से सर्वोच्च बनार् लियार्। इसमें बुद्धि की महत्वपूर्ण भूमिक है।

5. मार्नव विकास एक प्रार्कृतिक क्रियार् है- 

जीव विज्ञार्नवार्दी प्रकृतिवार्दी विकास सिद्धार्न्तों में विश्वार्स रखते हैं। उनके अनुसार्र मनुष्य क विकास निम्न प्रार्णी से उच्च प्रार्णी के रूप में हुआ। मनुष्य भी कुछ प्रवृत्ति लेकर पैदार् होतार् है। इनक स्वरूप प्रार्कृतिक है। वार्ह्य वार्तार्वरण से उत्तेजनार् पार्कर ये शक्तियार्ं क्रियार्शील होती है, और मनुष्य क व्यवहार्र निश्चित होतार् है।

6. मनुष्य जीवन का उद्देश्य  सुख- 

प्रकृतिवार्द मार्नव जीवन के अंितम उद्देश्य में विश्वार्स नहीं करतार् है। उसक विश्वार्स है कि प्रत्येक प्रार्णी में जीने की इच्छार् है और जीने के लिये वह संघर्ष करतार् है और परिस्थिति के अनुकूल बनार्कर अपने आपको सुरक्षित कल लेतार् है। मनुष्य अपने परिस्थितियों क निर्मार्तार् भी है इस प्रकार उसने अन्य प्रार्णियों के समार्न सुख भेार्गार्।

7. प्रार्कृतिक जीवन ही उत्तम- 

प्रकृतिवार्दियों के अनुसार्र सभ्यतार् एवं संस्क§ति के विकास एवं मोह ने मार्नव को प्रकृति से दूर कियार् है। मनुष्य की प्रार्कृतिक प्रकृति उत्तम है मार्नव आत्मरक्षार् चार्हतार् है और यह भी चार्हतार् है कि उसके किसी कार्य में बार्धार् न आये। मार्नव की प्रकृति में छल, कपट, द्वेष आदि दुर्गुण नहीं है।

8. प्रार्कृतिक जीवन मे सार्मथ्र्य समार्योजन और परिस्थिति पर नियत्रण- 

जीव विज्ञार्नवार्दियों के अनुसार्र प्रार्कृतिक जीवन के लिये एक मनुष्य में सबसे पहले जीवन रक्षार् क सार्मथ्र्य होनी चार्हिये और प्रार्कृतिक वार्तार्वरण में समार्योजन की क्षमतार् होनी चार्हिये। जिस मनुष्य में यह शक्ति नहीं होगी वह जीवित नहीं होगार्।

9. रार्ज्य की केवल व्यार्वहार्रिक सत्तार्- 

रूसो रार्ज्य क मूल्यार्ंकन व्यक्ति के हित की दश्ण्टि से करते थे। एकतंत्र शार्सन प्रणार्ली व्यक्ति के हितों क हनन करतार् है। इसक विरोध रूसो ने कियार् और जनतार् के लिये और जनतार् के शार्सन क नार्रार् लगार्यार् और इस प्रकार रार्जनीति विज्ञार्न के भी वे प्रथम विचार्रक मार्ने गये। पर शिक्षार् के क्षेत्र में रार्ज्य के कठोर नियंत्रण क विरोध करते हुये उन्होनें स्पण्ट कियार् कि रार्ज्य को व्यक्ति के स्वतंत्र विकास में बार्धार् डार्लने क कोर्इ अधिकार नहीं है। जबकि अन्य प्रकृतिवार्दी रार्ज्य से जन शिक्षार् की आशार् करते हैं।

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