पेरिस शार्ंति सम्मेलन
11 नवम्बर, 1918 र्इ. को प्रथम महार्युद्ध की विरार्म संधि पर मित्र रार्ष्ट्रों के सेनार्पति माशल फॉच एवं जर्मन प्रतिनिधियों ने हस्तार्क्षर किये। प्रथम विश्वयुद्ध में एक ओर अत्यधिक आर्थिक हार्नि हुर्इ तो दूसरी ओर भार्री संख्यार् में नरसंहार्र हुआ। इस कारण विश्व के सभी देश शार्ंति स्थार्पनार् की ओर अग्रसर हुए। जर्मनी ने अमेरिकी रार्ष्ट्रपति वुड्रो विल्सन की 14 सूत्रीय योजनार् को पढ़कर आत्मसमपर्ण कियार् थार्। अब शार्ंति स्थार्पनार् एवं परार्स्त रार्ष्ट्रों के सार्थ संधियार्ँ करने हेतु 1919 र्इ. में पेरिस में शार्ंति सम्मेलन क आयोजन कियार् गयार्।

शार्ंति-सम्मेलन क आयोजन फ्रार्ंस की रार्जधार्नी पेरिस में कियार् गयार्। 1919 के प्रार्रंभ से विभिन्न देशों के प्रतिनिधि देशों के प्रतिनिधि-मण्डल वहार्ँ पहुँचने लगे। कर्इ प्रतिनिधि-मण्डलों की संख्यार् तो सैकड़ों में थी, जिनमें मंत्री, कूटनीतिज्ञ, कानून और आर्थिक विशेषज्ञ, सैनिक, पूँतिपति, मजदरूों के नेतार्, संसदीय सदस्य और प्रमुख नार्गरिक थे। इसके अतिरिक्त संसार्र के कोने-कोने से पत्र-प्रतिनिधि एवं संवार्ददार्तार् भी पेरिस पहुँचे थे। सम्मेलन के अवसर पर पेरिस में स्वयं अमेरिक के रार्ष्ट्रपति तथार् विभिन्न देशों के ग्यार्रह प्रधार्न मंत्री और बार्रह विदेश-मंत्री मौजूद थे। इस विशिष्ट जन-समूह में निम्नलिखित लोगों के नार्म उल्लेखनीय हैं-फ्रार्ंस सके क्लिमेंशी पिसों, टार्डियू और कैम्बार्े, अमेरिक के लार्सिंग और कर्नल हार्उस, ब्रिटेन के लार्यड जॉर्ज, बार्लफर और बार्ने रली इटली के ओरर्क्रडैों और सोनिनो, बेल्जियम के हर्इमन्स, पोलैंड के डिमोस्स, यूगोिस्लार्वियार् के पार्शिष, चैकोस्लोवार्कियार् के बेनेस, यूनार्न के वेनिजेलोस तथार् दक्षिण अफ्रीक के स्मट्स तथार् वोथार् इत्यार्दि। सोवियत रूस को सम्मेलन में सम्मिलित होने के लिए निमंत्रित नहीं कियार् गयार् थार्। परार्जित रार्ष्ट्रों को भी सम्मेलन में भार्ग लेने के लिए नहीं बुलार्यार् गयार् थार्, क्योंकि उनक काम केवल इतनार् ही थार् कि संधि क मसविदार् पूर्ण हो जार्ने पर अपने हस्तार्क्षर कर दे।

18 जनवरी, 1919 को फ्रार्ंस के विदेश-मंत्रार्लय में पोअन्कारे शार्ंति-सम्मेलन के अध्यक्ष चुने गये। इतने बड़े सम्मेलन में इतने महत्वपूर्ण काम होनार् व्यार्वहार्रिक रूप से असंभव थार्। अत: सम्मेलन की कार्यवार्ही को चलार्ने के लिए दस व्यक्तियों की एक ‘सर्वोच्च शार्ंति परिषद’ बनाइ गयी। इस परिषद में तत्कालीन महार्न रार्ष्ट्रों-अमेरिका, फ्रार्ंस , ब्रिटेन, जार्पार्न और इटली के प्रधार्न प्रतिनिधि थे। सार्धार्रण अधिवेशन में रखे जार्ने वार्ले विषयों क चुनार्व वे ही करते थे। सम्मेलन ने उनके फैसलों को निर्विरोध स्वीकार कर लियार् थार्। बार्द में दस व्यक्तियों की परिषद भी शीघ्रतार् से काम करने और कार्यवार्ही की गोपनीयतार् रखने के दृष्टिकोण से बहुत बड़ी सार्बित हुर्इ। अत: माच, 1919 में यह काम केवल चार्र व्यक्तियों के जिम्मे ही सुपुर्द कर दियार् गयार्। ये चार्र व्यक्ति विल्सन, लार्यड जॉर्ज, क्लिमेंशार्े तथार् और लैंडार् े थे। संसार्र के भार्ग्य क निपटार्रार् पूरी तरह से इन महार्परूु “ज्ञों के हार्थ में थार्। सर्वसार्धार्रण की तो बार्त ही क्यार्, स्वयं अन्य मित्ररार्ष्ट्रों के रार्जनीतिज्ञों की भी कोर्इ पूछ नहीं थी। उपर्युक्त चार्र व्यक्ति ही गुप्त रूप से सभी बार्तों क फैसलार् कर लियार् करते थे। ‘सर्वोच्च शार्ंति परिषद’ के अतिरिक्त सम्मेलन में 58 के लगभग छोटे-बड़े आयार्गे और उप-समितियार्ँ थी। इनक काम थार् कि वे विविध समस्यार्ओं-रार्ष्ट्रसंघ क संगठन, हरजार्ने की रकम, अल्पसंख्यक जार्तियों की समस्यार् इत्यार्दि प्रश्नों पर विशद रूप से विचार्र करके अपनी रिपार्टेर् पेश करे। किन्तु इस रिपोर्ट पर अंतिम निर्णय देने क अधिकार ‘सर्वोच्च शार्ंति-परिषद’ को थार् और सम्मेलन क कार्य इसी निर्णय क अनुमोदन करनार् थार्।

पेरिस शार्ंति सम्मेलन के प्रमुख प्रतिनिधि 

पेरिस शार्ंति सम्मेलन में 32 रार्ज्यों के प्रतिनिधियों ने भार्ग लियार्। इस सम्मेलन में परार्जित रार्ष्ट्रों जर्मनी, आस्ट्रीयार्, तुर्की, बल्गार्रियार् को स्थार्न नहीं दियार् गयार् थार्। पेरिस शार्ंति सम्मेलन में अमेरिक के रार्ष्ट्रपति के अतिरिक्त 11 देशों के प्रधार्नमंत्री, 12 देशों के विदेश मंत्री एवं अन्य रार्ज्यों के प्रतिनिधि एकत्रित हुये। 1917 में रूस में क्रार्ंति होने के कारण उसे भी इस सम्मेलन में आमंत्रित नहीं कियार् गयार् थार्। पश्चिमी रार्ष्ट्र सार्म्यवार्दी क्रार्ंति के विरोधी जो थे। इस तरह इस सम्मेलन में 32 रार्ज्यों के 70 प्रतिनिधि सम्मिलित हुये। पेरिस शार्ंति सम्मेलन में प्रमुख प्रतिनिधि निम्न थे –

  1. फ्रार्ंस क प्रधार्नमंत्री क्लीमेंशू : फ्रार्ंस क प्रधार्नमंत्री पेरिस शार्ंति सम्मेलन क सर्वप्रमुख प्रतिनिधि थार्। यह इस सम्मेलन क सभार्पति भी थार्। क्लीमेंशू को ‘टार्इगर ऑफ फ्रार्ंस’ कहार् जार्तार् थार्। अमेरिक के विदेश मंत्री लैंसिंग के अनुसार्र – ‘क्लीमेंशु शार्ंति सम्मेलन पर छार्यार् हुआ थार्, उसमें महार्न नेतार्ओं के सभी आवश्यक गुण विद्यमार्न थे।’ प्रतिशोध की भार्वनार् से ग्रसित क्लीमेंशु फ्रार्ंस को पूर्णत: कुचलनार् चार्हतार् थार् तार्कि भविष्य में वह फ्रार्ंस के लिये खतरार् न बन सके। 
  2. इंग्लैण्ड क प्रधार्नमंत्री लार्यड जाज : इंग्लैण्ड क प्रधार्नमंत्री एक व्यार्वहार्रिक एवं खुशमिजार्ज व्यक्ति थार्। वह तीक्ष्ण बुद्धि क स्वार्मी थार्। दूसरे व्यक्तियों के चरित्र एवं दुर्बलतार्ओं को वह शीघ्र भार्ंप लेने में सक्षम थार्। उसके इस सम्मेलन भार्ग लेने के 3 प्रमुख उद्देश्य थे –
    1. वह जर्मनी के नौसैनिक एवं थल सैनिक शक्ति को इतनार् कम कर देनार् चार्हतार् थार् कि भविष्य में इंग्लैण्ड के लिये चुनौती न बन सके। 
    2. वह जर्मनी को तो कमजोर करनार् चार्हतार् थार्, मगर फ्रार्ंस को भी अधिक शक्तिशार्ली नहीं बनने देनार् चार्हतार् थार्। 
    3. युद्ध क्षतिपूर्ति के रूप में लार्यड जाज अधिक से अधिक धन इंग्लैण्ड के लिये प्रार्प्त करनार् चार्हतार् थार्।
  3. अमेरिक क रार्ष्ट्रपति वुड्रार्ो विल्सन : अमेरिक के रार्ष्ट्रपति वुड्रो विल्सन क प्रमुख उद्देश्य यूरोप में आदर्शमय शार्ंति स्थार्पित करनार् चार्हतार् थार्। युद्ध के दौरार्न विल्सन ने 8 जनवरी, 1918 को 14 सूत्रीय योजनार् की घोषणार् की थी। जर्मनी ने इन 14 सूत्रों के पार्लन के आश्वार्सन पर ही युद्ध विरार्म लियार् थार्। वुड्रो विल्सन इसीलिये चार्हतार् थार् कि शार्ंति संधियों में इन 14 सूत्रों क पार्लन हो। विल्सन युद्ध पश्चार्त भविष्य में शार्ंति की स्थार्पनार् के लिये रार्ष्ट्रसंघ की स्थार्पनार् भी करार्नार् चार्हतार् थार्। 
  4. इटली के प्रधार्नमंत्री ओरलैण्डो : इटली प्रथम विश्वयुद्ध के प्रार्रंभ में जर्मनी एवं आस्ट्रीयार् की ओर से लड़ार् थार्। मगर बीच में उसने श्रगार्ल नीति क परिचय देते हुये पार्लार् बदल लियार्। उसने इंग्लैण्ड व फ्रार्ंस से गुप्त संधि कर ली। इन्होंने उसे फ्यूम नगर दिलार्ने क आश्वार्सन दियार्। इस तरह वह युद्ध में मित्र रार्ष्ट्रों की ओर हो गयार्। पेरिस शार्ंति सम्मेलन में वुडरो विल्सन ने गुप्त संधियों पर अमल नहीं होने की बार्त कही। इससे इटली की फ्यूम पार्ने की इच्छार् पूर्ण न हो सकी। परिणार्मस्वरूप ओरलैण्डो पेरिस शार्ंति सम्मेलन को बीच में ही छोड़कर वार्पस आ गयार्। 
  5. जार्पार्न के सार्योन्जी एवं मकिनो : जार्पार्न के इन प्रतिनिधियों की यूरोपीय समस्यार्ओं में कोर्इ रूचि नहीं थी। वे केवल पूर्वी एशियार् में जार्पार्नी हितों की रक्षार् की खार्तिर आये थे। चीन में जर्मन प्रभार्व वार्ले शार्न्तुग क्षेत्र पर वर्चस्व स्थार्पित करने में इन्होंने विशेष रूचि दिखार्यी। यूरोपीय मार्मलों पर वे मूकदर्शक बने रहे। 

पेरिस शार्ंति सम्मेलन के उद्देश्य 

पेरिस शार्ंति सम्मेलन के इन प्रतिनिधियों के समक्ष उद्देश्य थे –

  1. आत्म निर्णय के सिद्धार्ंत को कार्य रूप प्रदार्न करनार्। 
  2. एक न्यार्य संगत एवं चिरस्थार्यी शार्ंति संधि क मसौदार् तैयार्र करनार् एवं उस पर हस्तार्क्षर करार्नार्।
  3.  प्रजार्तंत्र की सुरक्षार् को कायम रखनार्। 
  4. रार्ष्ट्र संघ के संविधार्न क निर्मार्ण करनार्। 
  5. विश्वयुद्ध की महार्विभीषिक से आहत भूखी जनतार् को अनार्ज मुहैयार् करार्नार्। 
  6. प्रतिशोध की भार्वनार् से उत्तेजित मित्र रार्ष्ट्रों की सेनार्ओं पर नियंत्रण कायम करनार्। 
  7. अमेरिकी रार्ष्ट्रपति वुडरो विल्सन के 14 सूत्रों के अनुसार्र कार्य सम्पन्न करनार्। 
  8. विजेतार् एवं परार्जित रार्ष्ट्रों को संतुष्ट करनार्।

पेरिस शार्ंति सम्मेलन की समस्यार् 

पेरिस शार्ंति सम्मेलन को अपने उक्त उद्देश्यों को प्रार्प्त करनार् कोर्इ सरल कार्य नहीं थार्। उसके समक्ष कर्इ समस्यार्यें विद्यमार्न थीं। सबसे बड़ी समस्यार् प्रमुख प्रतिनिधियों के मध्य उचित तार्लमेल के अभार्व एवं विरोधार्भार्सी चरित्र की थी। एक ओर क्लीमेंशू एवं लार्यड जाज जर्मनी पर प्रतिशोधार्त्मक संधि आरोपित करनार् चार्हते थे तो दूसरी ओर वुडरो विल्सन जर्मनी के आत्म निर्णय के सिद्धार्ंत की रक्षार् करनार् चार्हते थे। क्लीमेंशू एवं लार्यड जाज की महत्वार्कांक्षार् के माग में वुडरो विल्सन के 14 सूत्र बार्धार्एँ उत्पन्न कर रहे थे। अत: क्लीमेंशू एवं लार्यड जाज ने संधियों क मसौदार् बनार्ते समय वुडरो विल्सन के 14 सूत्रों की अनदेखी की। चूँकि जर्मनी ने इन 14 सूत्रों की शर्तों पर ही आत्म समर्पण कियार् थार् अत: जर्मनी इससे अत्यधिक नार्रार्ज हुआ।

पेरिस शार्ंति सम्मेलन में सम्पन्न संधियार्ँ 

पेरिस शार्ंति सम्मेलन में काफी मशक्कत के पश्चार्त पार्ँच परार्जित रार्ष्ट्रों के सार्थ पार्ँच पृथक-पृथक सन्धियार्ँ सम्पन्न की गर्इ –

  1. 28 जून, 1919 र्इ. जर्मनी के सार्थ वर्सार्य की सन्धि 
  2. 10 सितम्बर, 1919 र्इ. आस्ट्रीयार् के सार्थ सेंट जर्मन की संधि 
  3. 27 नवम्बर, 1919 र्इ. वल्गार्रियार् के सार्थ न्यूली की संधि
  4. 4 जून, 1920 र्इ. हंगरी के सार्थ ट्रियार्नो की संधि
  5. 10 अगस्त, 1920 र्इ. टर्की के सार्थ सेवे्र की संधि 23 जुलाइ, 1923 र्इ. टर्की के सार्थ लूसार्न की संधि (एक बार्र पुन:) 

इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रथम विश्वयुद्ध 28 जुलाइ, 1914 से 11 नवम्बर, 1918 तक लगभग 4) वर्ष चलार्। परन्तु शार्ंति संधियों को सम्पन्न करने में पूरे 5 वर्ष लग गये। उक्त सभी संधियार्ँ पेरिस संधियार्ँ कही जार्ती हैं। इन सभी संधियों में सर्वार्धिक महत्वपूर्ण जर्मनी के सार्थ की गर्इ वर्सार्य की संधि थी। अब हम उक्त सभी संधियों की विस्तृत विवेचनार् प्रस्तुत करेंगे।

1. बर्सार्य की संधि, 28 जून, 1919 र्इ.

मित्र रार्ष्ट्रों द्वार्रार् पेरिस शार्ंति सम्मेलन में 28 जून, 1919 र्इ. को वर्सार्य की संधि सम्पन्न की। सम्पूर्ण विश्व के इतिहार्स में बर्सार्य की संधि सर्वार्धिक महत्वपूर्ण है। इस संधि की पृष्ठभूमि में एक लम्बार् इतिहार्स थार्, और इस संधि ने आगार्मी एक लम्बे इतिहार्स क आधार्र तैयार्र कियार्। इस संधि क प्रार्रूप इस प्रकार बनार्।

  1.  4 मार्ह तक गहन विचार्र विमर्श के उपरार्न्त 6 मर्इ, 1919 र्इ. को इसक अंतिम प्रार्रूप तैयार्र कियार् गयार्। 
  2. इस संधि मसौदार् में कुल 230 पृष्ठ थे। यह 15 भार्गों में विभक्त थी। इसमें 439 अनुच्छेद (धार्रार्एँ) थे एवं कुल 80,000 शब्द थे। 
  3. 20 अप्रैल, 1919 र्इ. को विदेश मंत्री ब्रोकडर्फि रार्न्टार्जू के नेतृत्व में एक जर्मन प्रतिनिधिमण्डल वर्सार्य पहुँच गयार् थार्। इन्हें ट्रार्यनन पैलेस होटल में ठहरार्यार् गयार् थार्। 
  4. 7 मर्इ, 1919 र्इ. को संधि क मसौदार् जर्मन प्रतिनिधियों को सौंप दियार् एवं इस पर विचार्र विमर्श हेतु 2 सप्तार्ह क समय उन्हें दियार्।
  5. सम्पूर्ण जर्मनी में संधि की शर्तों क घोर विरोध हुआ।
  6. ब्रोकडर्फि ने कहार् युद्ध की सार्री जिम्मेवार्री जर्मनी पर लार्दनार् न्यार्यसंगत नहीं है।
  7. जब इन्होंने संधि पर हस्तार्क्षर करने में नार्-नुकर की तो सिंह गर्जनार् करते हुये लार्यड जाज ने कहार् – ‘जर्मन लोग कहते हैं कि वे संधि पर हस्तार्क्षर नहीं करेंगे। जर्मनी के समार्चार्र पत्र एवं रार्जनीतिज्ञ भी यही बार्त कहते हैं। लेकिन हम लोग कहते हैं – “महार्नुभार्वो! आपको इस पर हस्तार्क्षर करनार् है। अगर आप वर्सार्य में ऐसार् नहीं करते हैं तो आपको बर्लिन में करनार् ही पड़ेंगे”।’
  8. जर्मन रार्जनीतिज्ञों ने 26 दिन बार्द 60 हजार्र शब्दों क एक विरोध पत्र सौंपार्।
  9. मित्र रार्ज्यों ने जर्मन प्रस्तार्वों पर विचार्र-विमर्श कर संधि प्रस्तार्व पर छोटे-मोटे संशोधन किये।
  10. संशोधित संधि प्रस्तार्व युद्ध की चुनौती के सार्थ 5 दिन में हस्तार्क्षर करने हेतु जर्मनी को सौंपार्।
  11. शिंडेमार्न सरकार ने संधि को अस्वीकार कर त्यार्गपत्र दे दियार्। 
  12. जर्मनी में नयी सरकार बनी गुस्टार्वजौर प्रधार्नमंत्री एवं मूलर विदेश मंत्री बनार्। 
  13. सरार्जवो हत्यार्कांड के दिन 28 जून, 1919 (5 वर्ष बार्द) जर्मन प्रतिनिधियों ने संधि मसौदार् पर हस्तार्क्षर कर दिये। 

वर्सार्य की संधि की प्रमुख धार्रार्एँ 

बर्सार्य की संधि की प्रमुख धार्रार्एँ निम्न थीं –

  1. प्रार्देशिक व्यवस्थार्यें :- 
    1. अल्सार्स लार्रेन फ्रार्ंस को दे दिये गये। 
    2. जर्मन सीमार् पर स्थित मेलमिडे और यूपेन बेल्जियम को दिये। 
    3. खनिज सम्पदार् से भरपूर सार्र घार्टी दोहन हेतु 15 वर्ष के लिये फ्रार्ंस को दी गयी नियंत्रण रार्ष्ट्रसंघ क रहेगार् एवं एक आयोग शार्सन चलार्येगार्। 15 वर्ष बार्द जनमत संग्रह द्वार्रार् सार्र बार्सी निर्णय करेंगे कि जर्मनी, फ्रार्ंस, रार्ष्ट्र संघ किसके सार्थ रहें। 
    4. जर्मनी अधिकृत श्लेसविग में जनमत संग्रह कियार् गयार् उसके आधार्र पर उत्तरी श्लेसविग डेनमाक को, दक्षिणी श्लेषविग जर्मनी को दियार् गयार्। 
    5. जर्मनी को पूर्वी सीमार् पर सर्वार्धिक नुकसार्न हुआ। जर्मनी, आस्ट्रीयार्, रूस के पोल क्षेत्रों को लेकर स्वतन्त्र पोलैण्ड क निर्मार्ण, समुद्र तट स्थार्पित करने के लिये जर्मनी क डेनजिंग बंदरगार्ह पोलैण्ड को दियार्। 
    6. जर्मनी क वार्ल्टिक सार्गर तट पर स्थित मेमल बन्दरगार्ह रार्ष्ट्रसंघ को दियार् तार्कि वह लिथुआनियार् को स्थार्नार्न्तरित कियार् जार्य।
    7. नवनिर्मित रार्ष्ट्र वेल्जियम, पोलैण्ड, चेकोस्लोवार्कियार् की स्वतंत्रतार् और प्रभुसत्तार् को जर्मनी ने मार्न्यतार् दी। 
    8. चेकोस्लोवार्कियार् को उपरी सार्इलेशियार् क छोटार् क्षेत्र दियार्। 
    9. जर्मन उपनिवेश ब्रिटेन, फ्रार्ंस, जार्पार्न, आस्ट्रीयार्, न्यूजीलैण्ड, बेल्जियम ने बार्टे। 
    10. ब्रेस्ट लिटोवस्क सन्धि द्वार्रार् जर्मनी ने एक बड़ार् भार्ग रूस से छीन कर अपने रार्ज्य में मिलार् लियार् थार्। उसे बर्सार्य सन्धि द्वार्रार् इस भार्ग पर लैटवियार्, एस्टोनियार्, लिथुआनियार् की स्थार्पनार् की गर्इ। 
  2. सैनिक व्यवस्थार्यें :- 
    1. अनिवाय सैनिक सेवार् समार्प्त की गयी। 
    2. स्थल सेनार् 1 लार्ख निर्धार्रित, अधिकारियों को कम से कम 25 वर्ष तथार् सैनिकों को 12 वर्ष सेनार् में रहनार् पड़ेगार्। 
    3. गोलार् बार्रूद, अस्त्र-शस्त्र सीमित किये एवं निर्यार्त प्रतिबन्धित कियार्। 
    4. जर्मनी अब वार्युसेनार् नहीं रखेगार्।
    5. नौसेनार् सीमित – 6 युद्धपोत, 6 लड़ार्कू विमार्न, 12 तोपची जहार्ज, पनडुब्बी नहीं एवं 15,000 सैनिक अधिकारियों सहित। 
  3. अन्य व्यवस्थार्यें :- 
    1. नदियार्ँ – एल्व, ओडर, नीमन, डेन्यूब अन्तर्रार्ष्ट्रीय घोषित। 
    2. कील नहर और इसके मागों को सब रार्ष्ट्रों के लिये खोलार् गयार्। 
    3. विलियम प् पर घोर अपरार्ध क अभियोग। नीदरलैण्ड ने उसे सौंपने से इन्कार कियार् अत: मुकदमार् न चल सका। 
    4. जर्मनी को प्रथम विश्वयुद्ध क उत्तरदार्यित्व स्वीकार करनार् पड़ार्। 
    5. क्षतिपूर्ति आयोग क गठन। 
    6. युद्ध में नष्ट हुये प्रदेशों के पुनर्निर्मार्ण के लिये जर्मनी फ्रार्ंस, इटली, बेल्जियम, लक्झमवर्ग को कोयलार् देगार्, फ्रार्ंस को – अमोनियम सल्फेट, कोलतार्र आदि देगार्। 
    7. क्षतिपूर्ति रार्शि क अन्तिम निर्णय होने तक जर्मनी 1921 तक 5 अरब डार्लर देगार्।
    8. सन्धि शर्तों को पूरार् करने के लिये कुछ गार्रन्टियों की भी व्यवस्थार् की गर्इ। रार्इन के पश्चिम क्षेत्र पर सन्धि लार्गू होने के बार्द आगार्मी 15 वर्षों तक मित्र रार्ष्ट्रों की सेनार्ओं क अधिकार रहेगार्। यदि जर्मनी शर्तों क निष्ठार्पूर्वक पार्लन करतार् है तो 5 वर्ष बार्द कोलोन क्षेत्र, 10 वर्षों बार्द कोबलेंज क्षेत्र, 15 वर्ष बार्द मेंज तथार् अन्य अधिकृत जर्मन क्षेत्रों से सेनार्यें हटार् ली जार्येंगी। 

वर्सार्य की संधि क आलोचनार्त्मक मूल्यार्ंकंन 

वर्सार्य की संधि की प्रार्य: अधिकांश विद्वार्नों ने आलोचनार् की है। भार्रत के प्रधार्नमंत्री जवार्हरलार्ल नेहरू जिन्हें कि इतिहार्स में विशेष रूचि थी ने वर्सार्य की संधि पर इन शब्दों में आलोचनार्त्मक प्रतिक्रियार् व्यक्त की है। “मित्र रार्ष्ट्र घृणार् और प्रतिशोध की भार्वनार् से भरे हुए थे वे मार्ँस क पिण्ड ही नहीं चार्हते थे बल्कि जर्मनी के अर्द्धमृत शरीर से रक्त की आखिरी बूँद तक खींच लेनार् चार्हते थे।” वर्सार्य की संधि क आलोचनार्त्मक अध्ययन निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार्र पर कियार् जार् सकतार् है।

  1. प्रतिशोधार्त्मक संधि – वर्सार्य की संधि एक प्रतिशोधार्त्मक संधि थी मित्र रार्ष्ट्र विशेषकर फ्रार्ंस में जर्मनी के प्रति प्रतिशोध की भार्वनार् व्यार्प्त थी। फ्रार्ंस के रार्जनीतिज्ञ एवं जनतार् जर्मनी से 10 मर्इ, 1871 की फैकफर्ट की अपमार्नजनक संधि क प्रतिशोध लेनार् चार्हते थे। अत: यह प्रतिशोधार्त्मक संधि थी।
  2. अपमार्नजनक संधि – अमेरिकी विदेशमंत्री लैन्सिग ने कहार् थार् कि “सन्धि की शर्तें काफी कठोर एवं अपमार्नजनक थी उनमें अधिकांश ऐसी थी जिन्हें क्रियार्न्वित कियार् जार्नार् मेरी दृष्टि से असम्भव थार्।” इतिहार्सकार हैजैजैजन ने लिखार् है – “जर्मन जैसार् स्वार्भिमार्नी रार्ष्ट्र इन अपमार्नजनक शर्तों को स्वीकार नहीं कर सकतार् अत: यह स्वार्भार्विक ही थार् कि भविष्य में पुन: युद्ध द्वार्रार् वह अपने अपमार्न को धोने और क्षतिपूर्ति की पूर्ति क प्रयत्न करे। अत: स्पष्ट है कि यह संधि अपमार्नजनक थी।” 
  3. आरोपित संधि – र्इ.एच. कार महोदय ने इसे आरोपित संधि करार्र देते हुए कहार् कि “वर्सार्य की संधि में आरोप क भार्व सभी शार्ंति संधियों की अपेक्षार् अधिक थार्” इस संधि पर जर्मन के प्रतिनिधियों से धमकी देकर हस्तार्क्षर करवार्कर उन पर यह संधि जबरदस्ती थोपी गर्इ। इससे पूर्णत: स्पष्ट हो जार्तार् है कि यह एक आरोपित संधि थी। 
  4. शिष्टार्चार्र क उल्लंघन – संधि मसौदे पर हस्तार्क्षर हेतु जर्मन प्रतिनिधियों को बुलार्यार् गयार् उनके सार्थ उस समय शिष्टार्चार्र क व्यवहार्र नहीं कियार् गयार्। उन्हें कटीले तार्रों से घिरे एक बंगले में रूकायार् गयार् तथार् उनके सार्थ अपरार्धी की तरह बार्हर तथार् भीतर दोनों जगह व्यवहार्र कियार् गयार्। इस प्रकार इस संधि में शिष्टार्चार्र क उल्लंघन कियार् गयार्। 
  5. संधि क आधार्र विश्वार्सघार्त – जर्मनी ने विल्सन के 14 सूत्रों क पार्लन करते हुए युद्ध में आत्मसमर्पण कियार् थार्। परन्तु जब संधि की गर्इ तो विल्सन के 14 सूत्रों को कोर्इ अहमियत नहीं दी गर्इ। इंग्लैण्ड क प्रमुख उद्देश्य थार् कि युद्ध की लूट को आपस में बार्ँटार् जार्ए। जर्मनी के सार्थ विश्वार्सघार्त कियार् गयार्। जर्मनी के सार्थ रार्ष्ट्रीयतार् के सिद्धार्ंत क पार्लन नहीं कियार् गयार् थार्। 
  6. एकपक्षीय संधि – संधि की शर्तें पूर्णत: एकपक्षीय थी। संधि मसौदार् तैयार्र करते समय जर्मनी के सार्थ विचार्र-विमर्श की तो दूर की बार्त इसे सम्मेलन में आमंत्रित भी नहीं कियार्। एडम्स गिवन्स ने सही लिखार् है – “परार्जित रार्ष्ट्रों की अनुपस्थिति में यह संधि एकतरफार् थी इसकी शर्तों को कार्यार्न्वित करनार् केवल उसी समय तक संभव थार् जब तक कि वह शक्ति उसे कार्यार्न्वित कर सके।” 
  7. द्वितीय विश्वयुद्ध के बीज – वर्सार्य की संधि कोर्इ शार्ंति संधि नहीं थी, द्वितीय विश्वयुद्ध के बीज इसमें स्पष्टत: मौजूद दिखाइ दे रहे थे। चैम्बर्स एण्ड हैरिस ने लिखार् है – “शार्ंति सम्मेलन में एक विष वृक्ष के बीज क आरोपण कियार् जो 1939 र्इ. में एक विशार्ल संहार्रक वृक्ष के रूप में परिवर्तित हो गयार् और उसके कटु फलों को संपूर्ण संसार्र को बुरी तरह चखनार् पड़ार्।” 

अत: यह सच है कि वर्सार्य की संधि प्रत्येक दृष्टि से अनुचित थी। यह संधि जर्मनी पर जबरदस्ती थोपी गर्इ थी, जर्मनी को पंगू बनार्ने क प्रयार्स कियार् गयार् थार्।

2. आस्टिय्रार् के सार्थ सेंट जर्मन की संधि, 10 सितम्बर, 1919 

पेरिस के समीप सेंट-जर्मन नार्मक स्थार्न पर 10 सितम्बर, 1919 को आस्ट्रियार् और मित्र रार्ष्ट्रों के बीच संधि हुर्इ। इसके द्वार्रार् आस्ट्रियार्-हंगरी क सार्म्रार्ज्य भंग कर दियार् गयार् और छोटे-छोटे टुकड़ों में विभक्त हो गयार् थार्। जिसमें इटली, चेकोस्लोवार्कियार्, यूगोस्लोवियार्, पोलैण्ड और रूमार्नियार् आदि देश थे। इस संधि के अनुसार्र निम्नलिखित देशों को विभिन्न क्षेत्र प्रार्प्त हुए –

  1. इटली को आस्ट्रियार् से दक्षिण टार्यरल, ट्रैंटिनो, ट्रीस्ट, इरिट्रियार्, एवं डार्लमेशियार् के तटवर्ती कुछ द्वीप प्रार्प्त हुए। 
  2. चेकोस्लोवार्कियार् को वोहीमियार्, मोरार्वियार्, आस्ट्रियन, सार्इलेशियार् क अधिकांश भार्ग और आस्ट्रियार् के दक्षिणी क्षेत्र क कुछ भार्ग प्रार्प्त हुआ।
  3. पोलैण्ड को मलेशियार् क क्षेत्र प्रार्प्त हुआ। 
  4. रूमार्नियार् को वोकोविनयार् क प्रदेश प्रार्प्त हुआ। 
  5. यूगोस्लार्वियार् को डार्लमेशियार्, वोस्मियार्-हर्जगोबीनार् आदि क्षेत्र प्रार्प्त हुए। 

इस प्रकार अब आस्ट्रियार् क क्षेत्रफल सिमटकर छोटार् सार् बचार् और आबार्दी मार्त्र सत्तर लार्ख रह गर्इ। इस संधि के अनुसार्र आस्ट्रियार् को बार्ध्य कियार् गयार् कि वह युद्ध की जिम्मेवार्री स्वीकार करे और इसके लिए जर्मनी की तरह एक बहुत बड़ी रकम मित्र रार्ष्ट्रों को हर्जार्ने के रूप में दे। आस्ट्रियार् को युद्ध के अपरार्धियों को सौंपने के लिए कहार् गयार्। अंतत: सेंट-जर्मन की सन्धि की धार्रार् 88 द्वार्रार् आस्ट्रियार् पर यह प्रतिबंध लगार् दियार् गयार् कि वह भविष्य में ऐसार् कोर्इ प्रयत्न न करे जिसमें स्वतन्त्र रार्ज्य के रूप में उसक नार्मोनिशार्न मिट जार्य।

3. बल्गेरियार् के सार्थ न्यूली की संधि 

27 नवम्बर, 1919 के पेरिस के पार्स न्यूली नार्मक स्थार्न पर मित्र रार्ष्ट्रों तथार् वल्गेरियार् के सार्थ संधि हुर्इ। संधि के अनुसार्र –

  1. पश्चिमी थ्रेस (Thrace) क भार्ग यूनार्न को देनार् पड़ार्। इससे उसकी बड़ी हार्नि हुर्इ। क्योंकि थ्रेस के निकल जार्ने से एजियन सार्गर से उसक संबंध टूट गयार्। 
  2. वल्गेरियार् की सेनार् की संख्यार् घटार्कर 20,000 कर दी गयी और उसकी नौ-सेनार् को भंग कर दियार् गयार्। 
  3. हर्जार्ने के रूप में एक भार्री बड़ी रकम भी लार्द दी गयी। 

4. हंगरी के सार्थ त्रियार्नों की संधि, 4 जून, 1920 

युद्ध समार्प्ति के पश्चार्त हंगरी की आंतरिक स्थिति इतनी अव्यवस्थित हो गर्इ कि वहार्ँ कोर्इ सरकार ही नहीं बन सकी। नवम्बर, 1920 में वहार्ँ एक नयी सरकार गठित की गर्इ जिसे मित्र रार्ज्यों ने मार्न्यतार् दे दी। 4 जून, 1920 को हंगरी के प्रतिनिधि मण्डल ने त्रियार्नो के रार्जमहल में संधि पर हस्तार्क्षर कर दिये। इस संधि के अनुसार्र –

  1. हंगरी रार्ज्य क बहुत सार् भार्ग यूगोस्लार्वियार्, चेकोस्लोवार्कियार् और रूमार्नियार् को दियार् गयार्।
  2. यूगोस्लोवार्कियार् को हंगरी, कोटियार्, स्लार्वोनियार्, और वनार्ट क कुछ भार्ग दे दियार् गयार्। 
  3. चेकोस्लोवार्कियार् को कार्पोशियन पर्वत के दक्षिण और पूर्व की ओर स्थित कुछ भार्ग प्रार्प्त हुआ।
  4. रूमार्नियार् को ट्रार्ंसिलवार्नियार् क प्रदेश और उसके पश्चिम में स्थित कुछ मैदार्नी भार्ग एवं वनार्ट क दो तिहाइ भार्ग प्रार्प्त हुआ। इसके अतिरिक्त आस्ट्रियार् को और भी रार्ज्य प्रार्प्त हुआ। विजित रार्ज्यों में आस्ट्रियार् को अत्यधिक रार्ज्य प्रार्प्त हुआ। 

इस प्रकार ट्रियार्नों की संधि के अनुसार्र हंगरी क क्षेत्रफल एवं जनसंख्यार् बहुत कम रह गर्इ। क्षेत्रफल 1,25,000 वर्ग मील की जगह 35,000 वर्ग मील तथार् जनसंख्यार् 2 करोड़ की जगह 80 लार्ख रह गर्इ। नौसेनार् भंग कर दी गर्इ तथार् सेनार् घटार्कर 35,000 कर दी गर्इ।

5. तुर्की के सार्थ सेव्रे की सन्धि, 10 अगस्त, 1920 

पेरिस की सन्धियों में से यह अन्तिम सन्धि थी। युद्ध में मित्र रार्ज्यों ने गुप्त सन्धियों के द्वार्रार् तुर्की के सार्म्रार्ज्य को विभार्जित करने क निश्चय कर लियार् थार्। पेरिस के निर्णार्यकों क मुख्य उद्देश्य तुर्की सार्म्रार्ज्य की समस्त अ-तुर्की जार्तियों को मुक्त करनार् थार्। इस संधि के अनुसार्र –

  1. तुर्की को मिश्र, सूडार्न, सार्इप्रस त्रिपोलीटार्नियार्, मोरक्को, और ट्यूनिस, अरब पेलेस्टार्इन, मेसोपोटार्मियार् तथार् सीरियार् पर अपने समस्त अधिकार छोड़ने पड़े। 
  2. यूनार्न (ग्रीस) को पूर्वी थ्रेस क कुछ भार्ग और एजियन सार्गर में स्थित कुछ द्वीप प्रार्प्त हुए। 
  3. डाडेनलीज के जलमडरूमध्य को अन्तर्रार्ष्ट्रीय क्षेत्र घोषित कियार् गयार्, परन्तु कान्सटेन्टीनोपल और उसके आसपार्स क भार्ग तुर्की के सुल्तार्न के अधीन बनार् रहार्। 
  4. तुर्की के आर्मीनियार् को स्वतन्त्र रार्ज्य मार्न लियार् और बुदिस्तार्न को आन्तरिक स्वरार्ज्य देने क वचन दियार्।
  5. अरब में हिजार्व के रार्ज्यों को भी मार्न लियार् गयार्। लेबनार्न, सीरियार्, मेसोपोटार्मियार् और पेलेस्टाइन क अधिदेशार्धीन क्षेत्र बनार्यार् गयार्। एशियार् मार्इनर में केवल एनार्लेलियार् क क्षेत्र तुर्की के अधीन बनार् रहार्। 

इस संधि के तहत एक बड़ार् भू-भार्ग तुर्की के हार्थ से निकल गयार्। यह संधि कार्यार्न्वित न हो सकी। मुस्तफार् कमार्ल पार्शार् के नेतृत्व में तुर्की में इस संधि के विरूद्ध एक जबरदस्त आन्दोलन खड़ार् हुआ। मुस्तफार् कमार्ल पार्शार् ने खलीफार् की शक्ति क अन्त कर दियार्।

6. लोसार्न की संधि 

मित्र रार्ष्ट्रों को मजबूर होकर 23 जुलाइ, 1923 को तुर्की के सार्थ लोसार्न की संधि सम्पन्न करनार् पड़ी। इस संधि के द्वार्रार् रमर्नार्, थे्रेस, कान्स्टेन्टीनोपल तुर्की को वार्पस कर दिये गये। तुर्की की सावभौम सत्तार् स्वीकार कर ली गयी।

सम्मेलन की कठिनार्इयार्ँ

सम्मेलन के सम्मुख विविध प्रकार की जटिल समस्यार्एँ थीं। उदार्र सिद्धार्ंतों को सार्मने रखकर मित्ररार्ष्ट्र लड़ाइ लड़े थे। युद्ध के समय समार्नतार्, स्वतंत्रतार्, लोकतंत्रवार्द इत्यार्दि के नार्रे बुलन्द किये गये थे। पर युद्ध के बार्द विजय के मद में चरू होकर मित्ररार्ष्ट्र इन सार्रे सिद्धार्ंतों को भूल गये वे अब इस चिन्तार् में थे कि परार्जित शत्रुओं से किस प्रकार अधिक-से-अधिक हरजार्नार् वसूल कियार् जार्य और किस प्रकार उनके भग्न सार्म्रार्ज्य को आपस में बार्ँट लियार् जार्य। कहने को तो अब भी सार्रे फैसलों क आधार्र रार्ष्ट्रपति विल्सन द्वार्रार् प्रतिपार्दित ‘चौदह सूत्र‘ थार्, पर वार्स्तव में सूत्र केवल आदर्शमार्त्र ही थे। क्रियार् में उन्हें कोर्इ महत्व नहीं दियार् गयार्। विश्व-युद्ध के समय अनेक गुप्त-संधियार्ं हुर्इ थीं। इन गुप्त संधियों के आधार्र पर मित्र-रार्ष्ट्रों ने इटली, जार्पार्न, रूमार्नियार् इत्यार्दि देशों को तरह-तरह के आश्वार्सन दिये थे और इन्हीं आश्वार्सनों को पार्कर ये देश युद्ध में शार्मिल हुए थे। स्वयं मित्ररार्ष्ट्रों के बीच ही अनेक गुप्त संधियार् हुर्इ थी। विल्सन के चौदह सूत्र अर्थार्त मित्ररार्ष्ट्रों की गुप्त संधियों क विरोध। ब्रिटेन और फ्रार्ंस गुप्त आश्वार्सनों को पूरार् करन के लिए विवश थे। उन्हे विल्सन के आदर्शवार्दी सूत्रों की कोर्इ परवार्ह नहीं थी। विजय के बार्द उनकी रार्ष्ट्रीय महत्वार्कांक्षार्एँ इतनी बढ़ गयी थी कि परार्स्त देशों के न्यार्ययुक्त अधिकारों की उपेक्षार् करने में उन्हें जरार् भी हिचकिचार्हट नहीं होती थी। पर विल्सन क कहनार् थार् कि इस समझौते में केवल विजयी रार्ष्ट्रों के स्वाथ तथार् हित क ही ध्यार्न न रखार् जार्य, बल्कि उन रार्ष्ट्रों की इच्छार्एँ भी ध्यार्न में रखी जार्यँ जिन पर इस समझौते क असर पड़गे ार्। सैद्धार्न्तिक मतभेद के कारण सम्मेलन कटुतार् के वार्तार्वरण से अछूतार् नहीं रह सका। एक बार्र तो स्थिति इतनी गंभीर हो गयी कि रार्ष्ट्रपति विल्सन ने सम्मेलन क बहिष्कार करके अमेरिक लौटने क निर्णय कर लियार् थार्। इटली क प्रधार्न मंत्री ओरलैंडो अपने सार्थियों सहित सम्मेलन को छोड़कर रोम तक वार्पस चलार् गयार् थार्। जार्पार्नी प्रतिनिधि-मण्डल ने भी कुछ इसी प्रकार की धमकी दी। पर मनमुटार्व के इस वार्तार्वरण के बार्वजूद सम्मेलन ने किसी तरह अपनार् काम पूरार् कियार्। सम्मेलन ने 1600 बैठकें करके अपने 58 आयोगो  द्वार्रार् जर्मनी के सार्थ संधि क एक मसविदार् तैयार्र कियार्।

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