पार्नीपत क प्रथम युद्ध

पार्नीपत क प्रथम युद्ध बार्बर और इब्रार्हीम लोदी के बीच 21 अप्रैल, 1526 ई. को हुआ। यह युद्ध भार्रतवर्ष में संप्रभुतार् की स्थार्पनार् करने के लिए मुगल-अफगार्न संघर्ष थार्, जो 1556 ई. तक चलतार् रहार्। भार्रत वर्ष पर मुगलों क यह प्रथम आक्रमण नहीं थार्। सुल्तार्न इल्तुतमिश के शार्सन-काल में बार्बर के पूर्वज चंगेज खार्ं ने 1221 ई. में भार्रतवर्ष पर आक्रमण कियार् थार्। दिल्ली सल्तनत के समय में अनवरत रूप से मंगोल आक्रमण होते रहे। अलार्उद्दीन खिलजी के सिंहार्सनार्रोहण के तत्काल बार्द मंगोल आक्रमण हुआ। अलार्उद्दीन के विश्वार्सपार्त्र सेनार्नार्यकों (उलुग खार्ं एवं जफर खार्ं) द्वार्रार् इसे असफल कर दियार् गयार्। इसके पश्चार्त हुए मंगोल आक्रमणों को भी अलार्उद्दीन खिलजी ने विफल कर दियार्।1 लेफ्टिनेन्ट कर्नल गुलचरण सिंह, द बैटल ऑफ पार्नीपत, पृ.19; बार्बरनार्मार् (हिन्दी अनुवार्द), भार्ग -2, पृ. 469; तार्रीख-ए-अलफी, रिजवी, मुगलकालीन भार्रत (बार्बर), पृ. 635; श्रीवार्स्तव, आशीर्वार्दी लार्ल , मुगलकालीन भार्रत, पृ. 16.

तुगलक वंश के समय में भी मंगोल आक्रमण होते रहे और उन्होंने भार्रतीयों को तंग कियार्। उत्तर तुगलक काल में रार्ज्य में अव्यवस्थार् फैल गई थी। इसी काल में 1398 ई. में तैमूर ने भार्रतवर्ष पर आक्रमण कियार्। सिंधु, झेलम और रार्वी नदी को पार्र करते हुए दिसम्बर मार्ह के प्रथम सप्तार्ह में वह दिल्ली पहुँचार्, जहार्ं उसने लगभग एक लार्ख लोगों क कत्ले आम कियार्। उसने सुल्तार्न महमूद और मल्लू इकबार्ल को परार्स्त कियार्। लगभग 15 दिन दिल्ली में ठहरने के पश्चार्त् फिरोजार्बार्द, मेरठ, हरिद्वार्र, कांगड़ार्, जम्मू और सिंधु नदी को पार्र करतार् हुआ 1399 ई. में स्वदेश लौट गयार्। उसने खिज्रखार्ं सैयद को अपनार् प्रतिनिधि बनार्यार् और उसे मुल्तार्न, लार्हौर तथार् दिपार्लपुर क गवर्नर नियुक्त कियार्। लोदी वंश के शार्सनकाल में दिल्ली सल्तनत क पतन अवश्यम्भार्वी हो गयार् थार्। 21 नवम्बर, 1517 को सुल्तार्न सिकन्दर लोदी की मृत्यु हो गई और उसक पुत्र इब्रार्हीम लोदी उत्तरार्धिकारी नियुक्त हुआ। इब्रार्हीम लोदी में सैन्य कुशलतार् तो थी, किन्तु परिस्थितियों को समझने और तदनुसार्र कार्य करने की क्षमतार् क अभार्व थार् जिसके कारण ही अन्ततोगत्वार् उसक पतन हुआ। 1 लेफ्टिनेन्ट कर्नल गुलचरण सिंह, द बटैल ऑफ पार्नीपत, पृ. 22.

इब्रार्हीम लोदी की शक्तिशार्ली सार्मन्तों को अपने अधीन रखने तथार् दमनकारी नीति के कारण शक्ति सम्पन्न एवं प्रभार्वशार्ली लोहार्नी, फार्रमूली और लोदी सार्मन्त इब्रार्हीम के शत्रु बन गये। सार्मन्तों के प्रति इब्रार्हीम के व्यवहार्र क वर्णन करते हुए बदार्यूंनी ने लिखार् है कि उसने (इब्रार्हीम लोदी) अधिकाश सार्मन्तार्ें को बन्दी बनार् लियार् अथवार् कुचल दियार् आरै अन्य को दूर-दरार्ज के स्थार्नों पर भेज दियार्। 1 अफगार्न सार्मन्तों की सैनिक शक्ति पर ही सुल्तार्न की सफलतार् निर्भर थी। अन्य शब्दों में सल्तनत क आधार्र ही सार्मन्तशार्ही व्यवस्थार् थी। इब्रार्हीम के कृत्यों से वे ही सार्मन्त सल्तनत के विरूद्ध हो गये और सुल्तार्न के शत्रु बन गये। बिहार्र में दरियार् खार्ं ने अपने आपको स्वतंत्र शार्सक घोषित कर दियार्। दूसरी ओर जब इब्रार्हीम लोदी पूर्व में विद्रोहों को दबार्ने में व्यस्त थार् तब बदलार् लेने के उद्देश्य से लार्हौर के गवर्नर दौलत खार्ं लोदी ने अपने पुत्र दिलार्वर खार्ं को बार्बर से सहार्यतार् प्रार्प्त करने के लिए काबुल भेजार्। इब्रार्हीम क चार्चार् आलम खार्ं भी इब्रार्हीम के स्थार्न पर सुल्तार्न बननार् चार्हतार् थार्। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए बार्बर से सहार्यतार् लेने हेतु वह भी काबुल गयार्। दौलत खार्ं को यह आशार् थी कि बार्बर और इब्रार्हीम लोदी आपस में लड़कर समार्प्त हो जार्येंगे और पंजार्ब में वह संप्रभुतार् ग्रहण कर लेगार्। इस प्रकार अन्त में वह भार्रत क शार्सक बन जार्एगार्। लेकिन दौलत खार्ं की यह योजनार् असफल रही और बार्बर ने जो कि पंजार्ब को अपने अधीन लार्ने के लिए काफी समय से इच्छुक थार्, इसे एक सुनहरार् अवसर समझार् और मौके क लार्भ उठार्यार्। परिणार्मस्वरूप अन्त में दिल्ली सल्तनत क पतन हुआ।1 इलियट एण्ड डार्उसन, द मुहम्मडन पीरियड, पृ. 10.

एर्सकिन महोदय के अनुसार्र जब बार्बर हिन्दुस्तार्न विजय करने क दृढ़ निश्चय कर चुक थार्, तब सभी ओर से गुटबन्दी, अविश्वार्स और खुले विद्रोह दिल्ली के सिंहार्सन को हिलार् रहे थे।2 इन परिस्थितियों में बार्बर जैसार् सार्हसी, दृढ़ निश्चयी, अनुभवी और आत्म-विश्वार्सी व्यक्ति नि:संदेह सफल हो सकतार् थार्। भार्ग्य ने भी उसक पूरार्-पूरार् सार्थ दियार् और वह अपनी मनोकामनार् पूर्ण करने के लिए इब्रार्हीम लोदी के विरूद्ध युद्ध करने पर आमार्दार् हो गयार्। पंजार्ब में दौलत खार्ं की परार्जय हो चुकी थी। पंजार्ब पर बार्बर क अधिकार कायम हो गयार्। पंजार्ब पर बार्बर के प्रभार्व में वृद्धि दौलत खार्ं की एक भूल क ही परिणार्म थार्। उसकी इस भूल ने बार्बर और इब्रार्हीम लोदी को एक निर्णार्यक युद्ध की ओर अग्रसर करने में सहयोग दियार्।

पंजार्ब में बार्बर की सफलतार् से उत्सार्हित होकर इब्रार्हीम के असंतुष्ट अफगार्न अमीरों, आरार्इश खार्ं तथार् मुल्लार् मुहम्मद मजहब, ने उसके प्रति शुभ कामनार्एं प्रकट करते हुए अपने दूत तथार् पत्र भेजे। अन्य अफगार्न अमीरों यथार् – स्मार्ईल जिलवार्नी तथार् बिब्बन ने भी अधीनतार् स्वीकार करने के प्रस्तार्व प्रेषित किए। ऐसी अनुकूल परिस्थितियों ने पंजार्ब विजय के बार्द भी बार्बर को हिन्दुस्तार्न में और आगे बढ़ने की प्रेरणार् दी। 1 मजूमदार्र, रार्यचौधरी एण्ड दत्त, ऐन एडवार्न्स हिस्ट्री ऑफ इण्डियार्, प्लेट प्प्, पृ. 342. 2 एर्सकिन, हिस्ट्री ऑफ इण्डियार्, बार्बर एण्ड हुमार्यूँ, भार्ग -1, लंदन, 1854, पृ. 411. 86 

जसवार्न दूत पहुँचने पर आलम खार्ं और दिलार्वर खार्ं भी बार्बर से मिल गए। आगे बढ़ने पर बार्बर को दिल्ली की ओर से इब्रार्हीम तथार् हिसार्र फिरोजार् की ओर से हार्मिद खार्ं के उसके विरूद्ध आगे बढ़ने के समार्चार्र प्रार्प्त हुए। बार्बर ने हुमार्यूं को हार्मिद खार्ं के विरूद्ध भेजार्। इसी पड़ार्व पर सुल्तार्न इब्रार्हीम लोदी क एक अमीर बिब्बन बार्बर से आकर मिल गयार्। हार्मिद खार्ं के विरूद्ध हुमार्यूं की जीत हुई तथार् उसने हिसार्र फिरोजार् पर अधिकार कर लियार्। हार्मिद खार्ं की परार्जय के बार्द इब्रार्हीम लोदी ने 5-6 हजार्र घुड़सवार्रों सहित हार्तिम खार्ं और दार्उद खार्ं को अपने अग्रगार्मी दल क नेतृत्व प्रदार्न कियार्। बार्बर ने इसके विरूद्ध चिन तैमूर सुल्तार्न, मैंहदी ख्वार्जार्, मोहम्मद सुल्तार्न मिर्जार्, आदिल सुल्तार्न, सुल्तार्न जुनैद, शार्ह मीर हुसैन, कुतलुक कदम, अब्दुलार् और कित्तार् बेग के अधीन एक सेनार् भेजी। दोनों सेनार्ओं के बीच युद्ध हुआ। अफगार्न सैनिकों ने वीरतार् एवं पौरूष क प्रदर्शन कियार्, किन्तु मुगल पक्ष की जीत हुई।

हार्मिद खार्ं, दार्उद खार्ं तथार् हार्तिम खार्ं के नेतृत्व में इब्रार्हीम लोदी के दोनों अग्रगार्मी दलों को परार्जित करने के पश्चार्त् बार्बर को यह स्पष्ट हो गयार् कि इब्रार्हीम लोदी के सार्थ एक निर्णार्यक युद्ध लड़नार् आवश्यक है। बार्बर को लगार्तार्र यह संदेश भी मिल रहार् थार् कि इब्रार्हीम लोदी एक विशार्ल सेनार् के सार्थ आगे बढ़ रहार् है। दार्यें-बार्यें और मध्य भार्गों में सेनार् को व्यवस्थित करके बार्बर 12 अप्रैल, 1526 ई. को पार्नीपत पहुँचार्। इब्रार्हीम लोदी पहले से ही लगभग 12 मील की दूरी पर अपनार् पड़ार्व डार्ले हुए तैयार्र थार्।1 पार्रार्शर, वन्दनार्, बार्बर : भार्रतीय संदर्भ में, पृ. 42. 2 वही, पृ. 42. 3 वही, पृ. 42.

पार्नीपत के युद्ध में भार्ग लेने वार्ली इब्रार्हीम लोदी एवं बार्बर की सैन्य संख्यार् पार्नीपत के युद्ध में भार्ग लेने वार्ली इब्रार्हीम लोदी और बार्बर की सेनार्ओं की संख्यार् के संबंध में समकालीन और आधुनिक इतिहार्सकार एकमत नहीं है। बार्बर के अनुसार्र इब्रार्हीम लोदी की सेनार् में एक लार्ख सैनिक और दस हजार्र हार्थी थे। 1 उसने अपनी सैन्य संख्यार् के बार्रे में कुछ भी नहीं लिखार् है। मिर्जार् हैदर ने तार्रीखे-रशीदी में इब्रार्हीम की सेनार् एक लार्ख और बार्बर की सेनार् दस हजार्र बतार्ई है।2 निजार्मुद्दीन, बदार्यूंनी और अब्दुलार् के अनुसार्र इब्रार्हीम के पार्स एक लार्ख सवार्र, एक हजार्र हार्थी तथार् बार्बर के पार्स 15 हजार्र सवार्र थे।3 अबुल फजल, फरिश्तार् और तार्रीखे अलफी के लेखक मुल्लार् अहमद क मन्तव्य है कि इब्रार्हीम के पार्स 1 लार्ख सैनिक तथार् बार्बर के पार्स 12 हजार्र सैनिक थे।4 अलार्उद्दौलार् के अनुसार्र इब्रार्हीम के पार्स दो लार्ख और बार्बर के पार्स 10 हजार्र सैनिक थे।1 बार्बरनार्मार्, पृ. 470; ब्रिग्स, दि हिस्ट्री ऑफ दि रार्इज ऑफ दि मुहम्मडन पार्वर इन इण्डियार्, भार्ग-2, पृ. 44-45; श्रीवार्स्तव, आशीर्वार्दी लार्ल , पवूर् ोक्त कृति, पृ. 17. 2 मिर्जार् हदै र (इलियस एवं रार्स), तार्रीखे रशीदी, पृ. 357-58. 3 निजार्मुद्दीन, तबकाते अकबरी, भार्ग -2, पृ. 214; बदार्यूंनी, मुन्तख्वार्बुत्तवार्रिख, भार्ग-1, पृ. 334; अब्दुलार्, तार्रीखे दार्ऊदी, पृ. 102. 4 अबुलफजल, अकबरनार्मार्, भार्ग -1, पृ. 97; फैि रश्तार्, तार्रीखे फरिश्तार्, भार्ग -1, पृ. 204; मुल्लार् अहमद, तार्रीखे अल्फी (रिजवी), पृ. 635.

गुलबदन बेगम के अनुसार्र इब्रार्हीम के पार्स 1 लार्ख 80 हजार्र सवार्र तथार् डेढ़ हजार्र हार्थी एवं बार्बर के पार्स 12 हजार्र आदमी थे, जिनमें से युद्ध करने के योग्य केवल 6-7 हजार्र आदमी ही थे। 2 खफी खार्ं के अनुसार्र इब्रार्हीम लोदी के पार्स एक लार्ख तथार् बार्बर के पार्स दस हजार्र सवार्र थे।3 तार्रीखे रशीदुद्दीन खार्नी के अनुसार्र इब्रार्हीम के पार्स एक लार्ख सवार्र और एक हजार्र हार्थी के अतिरिक्त एक बड़ार् तोपखार्नार् भी थार्।4 अहमद यार्दगार्र इब्रार्हीम की सैनिक संख्यार् 50 हजार्र और 2 हजार्र हार्थी तथार् बार्बर के सैनिकों की संख्यार् 24 हजार्र लिखतार् है।5 कैम्ब्रिज शाटर हिस्ट्री के अनुसार्र बार्बर के पार्स युद्ध के योग्य केवल दस हजार्र सैनिक थे।6 रश्बु्रक विलियम्स ने बार्बर के सैनिकों की संख्यार् 8 हजार्र तथार् इब्रार्हीम लोदी के पार्स एक लार्ख अश्वार्रोहियों क होनार् भी असंभव नहीं मार्नार् है। उपर्युक्त वर्णित सभी मध्यकालीन और आधुनिक इतिहार्सकारों के वृत्तार्न्तों तथार् तत्कालीन परिस्थिति क सूक्ष्म अध्ययन करने पर यह निष्कर्ष निकालार् जार् सकतार् है कि पार्नीपत के युद्ध में बार्बर के पार्स लगभग 24-25 हजार्र तथार् इब्रार्हीम लोदी के पार्स 50 हजार्र सैनिक थे। 1 एक अन्य महत्त्वपूर्ण बार्त यह थी कि बार्बर के पार्स प्रभार्वी तोपखार्नार् थार्। इब्रार्हीम से मुकाबले में बार्बर रणक्षेत्र क अधिक अनुभवी और व्यूह रचनार् में भी ज्यार्दार् कुशल थार्।1 अलार्उद्दौलार्, नफार्यसुल मआसिर, (रिजवी), पृ. 350. 2 गुलबदन बेगम, हुमार्यूंनार्मार् (रिजवी), पृ. 363. 3 खफी खार्ं, मुन्तख्वार्ब उल लुबार्ब, पृ. 51. 4 तार्रीखे रशीदुद्दीन खार्नी, पृ. 58; गुलबदन बेगम, हुमार्यूंनार्मार् (अनु.), पृ. 93-94. 5 अहमद यार्दगार्र, तार्रीखे शार्ही, पृ. 95. 6 जे.एलन, डब्ल्यू. हेग, दि कैम्ब्रिज शाटर हिस्ट्री ऑफ इण्डियार्, पृ. 253. 7 रश्बू्रक विलियम्स, एन एम्पार्यर बिल्डर ऑफ दि सिक्सटींथ सेंचुरी, पृ. 132. 89

पार्नीपत के रणक्षेत्र में बार्बर की व्यूह रचनार्

पार्नीपत के रणक्षेत्र में 12 अप्रैल, 1526 को पहुँचने के बार्द बार्बर ने 8 दिन की अवधि में अपनी सेनार् की व्यूह रचनार् रक्षार्त्मक ढंग से की। उसने सैनिकों क जमार्व ‘तुलुगमार् पद्धति’ से कियार्। उसके दार्हिनी ओर पार्नीपत क कस्बार् थार् जो उसकी सेनार् की रक्षार् कर सकतार् थार्। सेनार् के बार्ई ओर खार्इयार्ं खोदकर उन्हें वृक्षों की सूखी डार्लियों से भर दियार् गयार् थार्।2 दोनों पक्षों की व्यूह रचनार् के सम्बन्ध में एस.आर.शर्मार् क मन्तव्य है कि एक ओर निरार्श जनित सार्हस एवं वैज्ञार्निक युद्ध-प्रणार्ली के कुछ सार्धन थे, दसू री ओर मध्यकालीन ढंग से सैनिकों की भीड़ थी, जो भार्ले एवं धनुष-बार्ण से सुसज्जित थी और मूर्खतार्पूर्ण ढंग से जमार् हो गई थी।3 इससे स्थिति को दृढ़ और सुरक्षित कर लियार् गयार् थार्। सेनार् के सार्मने लगभग 700-800 अशवार् अर्थार्त् गतिशील गार्ड़ियार्ं रखी गई जिन्हें बैलों के बटे हुए चमड़े से जंजीरों के समार्न बार्ंधकर सुरक्षार् पंक्ति बनार् ली। प्रत्येक दो गार्ड़ियों के बीच जो फार्सलार् थार्, उसमें तोड़े (बचार्व स्थार्न) रखवार् दिए गए थे। यह व्यवस्थार् तोपखार्ने की सुरक्षार् की दृष्टि से की गई थी। गार्ड़ियों के बीच काफी स्थार्न छोड़ दियार् गयार् थार्, जहार्ं से अश्वार्रोही आगे बढ़कर युद्ध कर सकते थे। बन्दूकची गार्ड़ियों और तोड़ों के पीछे खड़े होकर गोलियार्ं चलार् सकते थे। इस रक्षार्त्मक पंक्ति के पीछे बार्बर ने अपनार् तोपखार्नार्, अश्वार्रोही तथार् पैदल सैनिक रखे थे। 1 पार्रार्शर, वन्दनार्, बार्बर : भार्रतीय संदर्भ में, पृ. 45. 2 सरकार, जे एन., मिलिट्री हिस्ट्री ऑफ इण्डियार्, पृ. 51. 3 नार्गोरी एवं प्रणवदेव, पूर्वोक्त कृति, पृ. 154. 

तोपखार्ने के दार्हिने पार्श्र्व क संचार्लन उस्तार्द अली के हार्थों में थार् तथार् बार्यें पार्श्र्व क संचार्लन मुश्तफार् के हार्थ में थार्। मोटे रूप से बार्बर ने सेनार् के तीन भार्ग किये थे। सेनार् के दार्यें पक्ष क नेतृत्व हुमार्यूं को सौंपार् गयार् और बार्ंयें पक्ष की जिम्मेदार्री मेंहदी ख्वार्जार् को दी गयी। सेनार् के मध्य भार्ग के दार्हिने पार्श्र्व को चिन तैमूर सुलतार्न को सुपुर्द कियार् गयार् तथार् बार्ंयें भार्ग को खलीफार् ख्वार्जार् मीर मीरार्न को दियार् गयार्। तोपखार्ने के पीछे मध्य भार्ग में सेनार् क आगे क जो भार्ग थार्, उसक नेतृत्व खुसरो बैकुल्तार्श को सौंपार् गयार्। इसके पीछे सेनार् क केन्द्र स्थार्न थार् जिसक संचार्लक स्वयं बार्बर थार्। केन्द्र भी दो भार्गों – दार्हिनार् केन्द्र और बार्ंयार् केन्द्र में विभार्जित थार्। केन्द्र में बार्बर ने सुरक्षार् के लिए आरक्षित सैनिक रखे थे। सेनार् के दार्यें भार्ग क जो सिरार् यार् पार्श्र्व थार्, उसक संचार्लन वली किजील तथार् बार्यें भार्ग क नेतृत्व करार्कूजी को सौंपार् गयार्। वली किजील तथार् करार्कूजी को यह आदेश दियार् गयार् कि ज्यों ही शत्रु की सेनार् आगे बढ़ कर निकट आ जार्ए त्यों ही सेनार् के ये दोनों पार्श्र्व घूमकर शत्रु सेनार् के पीछे चले जार्ए और उस पर आक्रमण करें। इसी बीच शत्रु को दार्यें, बार्यें तथार् सार्मने से घेरकर उस पर आक्रमण कियार् जार्ए। शत्रु पर सार्मने से तोपों के गोले बरसार्ये जार्ए। यदि शत्रु इस आक्रमणकारी सेनार् को खदेड़ दे तो, वह सेनार् दु्रतगति से रक्षार् क्षेत्र में अपने मूल स्थार्न पर लौट आए तथार् पुन: पूरी शक्ति के सार्थ शत्रु सेनार् पर आक्रमण करे और इस सेनार् की सहार्यताथ केन्द्र से नए सैनिक भेजे जार्ए। बार्बर की यही तुलुगमार्1 रण-पद्धति थी जिसक उपयोग बार्बर ने मध्य एशियार् में उजबेकों से संघर्ष के दौरार्न सीखार् थार्। तुलुगमार् वह दस्तार् थार्, जो सेनार् के दार्यें-बार्यें कोनों पर रहतार् थार् और शत्रु सेनार् के समीप आ जार्ने पर पीछे से जार्कर उसे घेर लेतार् थार्।

इब्रार्हीम की सैन्य व्यवस्थार्

बार्बर के कथनार्नुसार्र इस युद्ध में इब्रार्हीम लोदी के सैनिकों की संख्यार् लगभग एक लार्ख थी।3 बार्बर के विवरण से ज्ञार्त होतार् है कि इब्रार्हीम की सेनार् दार्यें-बार्यें और मध्य भार्गों में विभार्जित थी। 4 नियार्मतुल्लार् के मतार्नुसार्र सुल्तार्न इब्रार्हीम की सेनार् में उपरोक्त तीनों भार्गों के अतिरिक्त अग्रगार्मी दल तथार् पृष्ठभार्ग भी थे।5 इब्रार्हीम के पार्स तोपखार्ने क अभार्व थार्। उसने अपनी सेनार् के सभी अंगों को उतनी सुरक्षार् और दृढ़तार् से नहीं जमार्यार् थार् जिसक प्रकार बार्बर ने कियार् थार्। वृक्षों की डार्लियों तथार् खार्इयों की सुरक्षार् पंक्ति उसने खड़ी नहीं की थी। बार्बर ने अपनी सेनार् को पार्नीपत के कस्बे के बार्ंयी ओर रखार् तथार् अपनी सेनार् क दार्यार्ं भार्ग इस प्रकार सुरक्षित कियार् कि इस कस्बे की तरफ से कोई आक्रमण नहीं कर सके। इब्रार्हीम लोदी ने अपनी सैन्य सुरक्षार् के लिए इस प्रकार क कोई उपार्य नहीं कियार् थार्।1 उसकी सेनार् के पार्स हथियार्र भी दकियार्नूस पद्धति के थे, सेनार् अव्यवस्थित थी और उसमें अनुशार्सन क अभार्व थार्।1 रार्धेश्यार्म, मुगल सम्रार्ट् बार्बर, (पटनार् – 1987), पृ. 271; के एसलार्ल, ट्वार्ईलार्इट ऑफ दि देहली सल्तनत (एशियार्), पृ. 222; मिश्रीलार्ल, पवूरोक्त कृति, पृ. 69. 2 पार्रार्शर, वन्दनार्, बार्बर : भार्रतीय संदर्भ में, पृ. 46. 3 बार्बर, ममैार्यर्स ऑफ बार्बर, भार्ग-2, पृ. 183. 4 बार्बरनार्मार् (रिजवी), पृ. 157. 5 नियार्मतुल्लार्, तार्रीखे खार्नजहार्नी, भार्ग-1, पृ. 257-258. 

बार्बर ने लिखार् है कि मैंने अपने पार्ंव संकल्प कर रकाब में रखे और अपने हार्थ में ईश्वर के भरोसे की लगार्म ली और सुल्तार्न इब्रार्हीम लोदी अफगार्न के विरूद्ध प्रस्थार्न कियार्। उस समय देहली क रार्ज सिंहार्सन तथार् हिन्दुस्तार्न क रार्ज्य उसके अधीन थार्।

प्रार्रम्भिक संघर्ष 

यद्यपि बार्बर 12 अप्रैल., 1526 ई. को पार्नीपत के मैदार्न में पहुँच गयार् थार् और इब्रार्हीम लोदी की सेनार् भी सार्मने थी किन्तु दोनों सेनार्ओं के बीच युद्ध 20 अप्रैल., 1526 को हुआ। 12 अप्रैल. से 19 अप्रैल. तक के 7-8 दिन की अवधि बार्बर ने अपनी सेनार् को युद्ध के लिए व्यवस्थित और तत्पर करने में लगार्यी। इस अन्तरार्ल में बार्बर की सेनार् ने इब्रार्हीम लोदी की सेनार् पर छुट-पुंट धार्वे भी किए। बार्बर ने लिखार् है – ‘7-8 दिन तक जब हम लोग पार्नीपत में रहे, हमार्रे आदमी थोड़ी-थोड़ी संख्यार् में इब्रार्हीम के शिविर के समीप तक पहुँच जार्ते थे और उसकी अपार्र सेनार् के दस्तों पर बार्णों की वर्षार् करके लोगों के सिर काट लार्ते थे। इस पर भी वह न तो आगे बढ़ार् और न उसके सैनिकों ने आक्रमण कियार्। अन्ततोगत्वार् हमने बहुत से हिन्दुस्तार्नी हितैषियों के परार्मर्श से 4-5 हजार्र आदमी उसके शिविर पर रार्त्रि में छार्पार् मार्रने के लिए भेजे। अंधेरार् होने के कारण, वे भली भार्ंति संगठित न रह सके और इधर-उधर हो जार्ने के कारण वहार्ँ पहुँच कर कुछ न कर सके। वे प्रार्त:काल तक इब्रार्हीम के शिविर के समीप ठहरे रहे। प्रार्त:काल (शत्रु की सेनार्) में नक्कारे बजने लगे और वे सेनार् की पंक्तियार्ं ठीक करके युद्ध हेतु निकल आए। यद्यपि हमार्रे आदमी कोई सफलतार् न प्रार्प्त कर सके। किन्तु वे सही सलार्मत लौट आये।1 19 अप्रैल., 1526 को रार्त्रि में बार्बर के चार्र-पार्ंच हजार्र सैनिकों ने आक्रमण कियार् किन्तु उन्हें इस अभियार्न में असफलतार् क मुंह देखनार् पड़ार् थार्। इससे प्रोत्सार्हित होकर 20 अप्रैल., 1526 को प्रार्त:काल ही इब्रार्हीम की सेनार् ने सर्वप्रथम बार्बर की सेनार् के दार्हिने भार्ग पर आक्रमण कर दियार्। शीघ्र ही उसकी सेनार् काफी दूर तक बार्बर के सैनिक शिविरों की तरफ फैल गयी। इसके परिणार्मस्वरूप इब्रार्हीम क सैनिक मोर्चार् काफी विस्तृत हो गयार्। फलत: जिसक बार्बर ने पूरार्-पूरार् लार्भ उठार्यार्। उसे इस व्यार्पक मोर्चे में प्रवेश करने क माग मिल गयार्। जब इब्रार्हीम की सेनार् काफी आगे बढ़ आयी तो बार्बर ने उचित अवसर देखकर ‘तुलुगमार् रण-प्रणार्ली’ अपनार्ने क आदेश दियार्। 1 द्रष्टव्य – रार्धेश्यार्म, मुगल सम्रार्ट् बार्बर, पृ. 275; निजार्मुद्दीन अहमद, तबकात-ए-अकबरी (अनु ), भार्ग-2, पृ. 21. 2 सैयिद अतहर अब्बार्स रिजवी, मुगल कालीन भार्रत, बार्बर, पृ. 148; बार्बरनार्मार् (अनु.), भार्ग -2, पृ. 469; तार्रीख-ए-अलफी, रिजवी, मुगलकालीन भार्रत (बार्बर), पृ. 635.

इस संबंध में बार्बर ने लिखार् है –‘हमने तुलुगमार् वार्लों को आदेश दे रखार् थार् कि वे दार्यें तथार् बार्यें भार्ग की ओर से चक्कर काट कर शत्रु के पीछे पहुँच जार्यें और बार्णों की वर्षार् करके युद्ध प्रार्रम्भ कर दें। इसी प्रकार दार्यें तथार् बार्यें बार्जू की सेनार् के लिए आदेश दियार् गयार् थार् कि वे युद्ध छेड़ दें। तुलुगमार् वार्लों ने चक्कर काट कर बार्णों की वर्षार् प्रार्रम्भ कर दी। बार्यें भार्ग की सेनार् में से सर्वप्रथम मैंहदी ख्वार्जार् ने युद्ध शुरू कियार्। उसक मुकाबलार् एक ऐसे दल से हुआ जिसके सार्थ एक हार्थी थार्। उसके आदमियों के बार्णों की वर्षार् के कारण वह दल विवश होकर वार्पस हो गयार्। बार्यें बार्जू की सेनार् की कुमक के लिये मैंने अहमदी परवार्नची, कूज बेग के (भार्ई) तरदी बेग तथार् खलीफार् के मुहिब अली को भेजार्। दार्यीं ओर भी थोड़ार् सार् घोर युद्ध हुआ। मुहम्मद कैकुल्तार्श, शार्ह मंसूर बरलार्स, यूनुस अली एवं अब्दुल्लार्ह को आदेश हुआ कि वे उन लोगों से जो मध्य भार्ग पर आक्रमण कर रहे थे, युद्ध करें। मध्य भार्ग ही से उस्तार्द अली कुली ने फिरंगी गोलों की खूब वर्षार् की। मुस्तफार् तोपची ने मध्य भार्ग के बार्यीं ओर से जर्ब जन (एक प्रकार की तोप) के गोलों की खूब वर्षार् की। हमार्री सेनार् के दार्यें, बार्यें एवं मध्य भार्ग तथार् तुलुगमार् के दल वार्लों ने शत्रुओं को घेर कर बार्णों की वर्षार् के कारण उन्हें अपने मध्य भार्ग की ओर वार्पस होनार् पड़ार्।1 सैयिद अतहर अब्बार्स रिजवी, मुगल कालीन भार्रत, बार्बर, पृ. 155.

युद्ध 20 अप्रैल. की प्रार्त: से शार्म तक चलार्। अन्त में बार्बर की सेनार् ने इब्रार्हीम की सेनार् को पीछे ढकेल दियार्। इब्रार्हीम की सेनार् के पार्ंव उखड़ गये। उसके सैनिक तितर-बितर हो गये तथार् युद्ध स्थल छोड़कर भार्ग खड़े हुए। इब्रार्हीम लोदी स्वयं इस युद्ध में वीर गति को प्रार्प्त हुआ। बार्बर विजयी रहार्। मध्यार्ºनोत्तर की प्रथम नमार्ज के समय खलीफार् क छोटार् सार्लार् तार्हिर तीबरी, इब्रार्हीम क सिर लार्यार्। उसे उसक शरीर लार्शों के एक ढेर में मिल गयार् थार्।1 बार्बर ने भार्गती हुई लोदी सेनार् क पीछार् कियार् और सहस्रों सैनिकों को मौत के घार्ट उतार्र दियार् तथार् अनेकों को बन्दी बनार् लियार् गयार्। इस संबंध में बार्बर ने लिखार् है कि जब शत्रुओं की परार्जय हो गई तो उनक पीछार् करनार् एवं उन्हें घोड़ों से गिरार्नार् प्रार्रम्भ कियार् गयार्। हमार्रे आदमी प्रत्येक श्रेणी के अमीर तथार् सरदार्र बन्दी बनार् कर लार्ये। महार्वतों ने हार्थियों के झुण्ड प्रस्तुत किये।

यद्यपि इस युद्ध में बार्बर की जीत हुई परन्तु यह कहनार् कठिन है कि बार्बर इस युद्ध में आसार्नी से सफल हो गयार्। रश्बु्रक विलियम्स महोदय की यह मार्न्यतार् ठीक नहीं है कि बार्बर की बहुत थोड़ी सी क्षति हुई।3 बार्बर ने स्वयं इस बार्त को स्वीकार कियार् है कि वह अपनी जार्न की बार्जी लगार्कर ही इब्रार्हीम लोदी को परार्स्त कर सक थार्।4 अब्दुलार् और यार्दगार्र के मतार्नुसार्र इब्रार्हीम की सेनार् बड़ी वीरतार् के सार्थ लड़ी तथार् युद्ध बहुत भयार्नक हुआ।5 इस युद्ध में इब्रार्हीम लोदी सहित लगभग 15-20 हजार्र अफगार्न सैनिक मार्रे गये। बार्बर की सेनार् के हतार्हतों की संख्यार् के संबंध में इतिहार्सकारों ने कोई विवरण नहीं दियार् है। नियार्मतुल्लार् तथार् बदार्यूंनी के अनुसार्र दोनों पक्ष के काफी लोग मार्रे गये।1सैयिद अतहर अब्बार्स रिजवी, मुगल कालीन भार्रत, बार्बर, पृ. 158; रार्धेश्यार्म, मुगल सम्रार्ट् बार्बर, पृ. 276. 2 वही, पृ. 158. 3 रश्बु्रक विलियम्स, एन एम्पार्यर बिल्डर आफ दि सिक्सटींथ सेंचुरी, पृ. 137. 4 बार्बर (बेवरिज), बार्बरनार्मार्, पृ. 525. 5 अब्दुल्लार्, तार्रीखे दार्ऊदी, पृ. 96-97. 6 नियार्मतुल्लार्, तार्रीखे खार्नजहार्नी, भार्ग -1, पृ. 258.

बार्बर ने लिखार् है कि जब आक्रमण प्रार्रम्भ हुआ तो सूर्यनार्रार्यण ऊँचे चढ़ गये थे। युद्ध दोपहर तक ठनार् रहार्। मेरे सैनिक विजयी हुए और शत्रु को चकनार्चूर कर दियार् गयार्। सर्वशक्तिमार्न परमार्त्मार् की अपार्र अनुकम्पार् से यह कठिन कार्य मेरे लिए सुगम बन गयार् और वह विशार्ल सेनार् आधे दिन में ही मिट्टी में मिल गयी।1

इस सम्बन्ध में बार्बर ने अपनी आत्म-कथार् बार्बरनार्मार् में लिखार् है कि सबेरे सूर्य निकलने के बार्द लगभग नौ-दस बजे युद्ध आरम्भ हुआ थार्, दोपहर के बार्द दोनों सेनार्ओं के बीच भयार्नक युद्ध होतार् रहार्। दोपहर के बार्द शत्रु कमजोर पड़ने लगे और उसके बार्द वह भीषण रूप से परार्स्त हुआ। उसकी परार्जय को देखकर हमार्रे शुभचिन्तक बहुत प्रसन्न हुए। सुल्तार्न इब्रार्हीम को परार्जित करने क कार्य बहुत कठिन थार्। फलत: ईश्वर ने उसे हम लोगों के लिए सरल बनार् दियार्।

बार्बर क दिल्ली और आगरार् पर अधिकार

पार्नीपत के युद्ध में बार्बर की विजय एक सीमार् तक निर्णार्यक थी जिसक उसने पूरार्-पूरार् लार्भ उठार्यार्। उसने उसी दिन हुमार्यूं को छ: बड़े सरदार्रों (ख्वार्जार् कलार्ं, मुहम्मदी, शार्हे मनसूर बरलार्स, यूनुस अली, अब्दुल्लार्ह तथार् वली खार्जिन) के सार्थ आगरार् और मैंहदी ख्वार्जार् को चार्र बड़े सार्मन्तों (मुहम्मद, सुल्तार्न मिर्जार्, आदिल सुल्तार्न, सुल्तार्न जुनैद बरलार्स एवं कुतलुक कदम) के सार्थ दिल्ली पर अधिकार करने तथार् रार्जकोष की सुरक्षार् के लिए भेजार्। कुछ समय बार्द बार्बर स्वयं दिल्ली पहुंच गयार् और यमुनार् नदी के तट पर अपनार् पड़ार्व डार्लार्। बार्बर ने दिल्ली में सूफी संत निजार्मुद्दीन औलियार् और ख्वार्जार् कुतुबुद्दीन की मजार्र क तवार्फ (परिक्रमार्, चार्रों ओर श्रद्धार्पूर्वक घूमनार्) कियार् तथार् दिल्ली के भूतपूर्व सुल्तार्नों-गयार्सुद्दीन बलवन, अलार्उद्दीन खिलजी, बहलोल लोदी, सिकन्दर लोदी आदि के मकबरों को देखार्। इसके बार्द दिल्ली में उसने वली किजील की अपनार् शिकदार्र और दोस्त बेग को दीवार्न नियुक्त कियार्। खजार्नों पर मुहर लगार् कर उन्हें सौंप दियार्। 27 अप्रैल., 1526 को दिल्ली में बार्बर के नार्म क खुत्वार् पढ़ार् गयार्।1 उद्धृत, श्रीवार्स्तव, आशीर्वार्दी लार्ल , पूर्वोक्त कृति, पृ. 18. 2 नार्गोरी, प्रणव देव, पूर्वोक्त कृति, पृ. 154-155.

इस विजय ने बार्बर को पंजार्ब के अलार्वार् दिल्ली और आगरार् पर भी अधिकार प्रदार्न कर दियार्, किन्तु दिल्ली के सुल्तार्न को परार्जित करने क तार्त्पर्य दिल्ली सल्तनत पर अधिकार स्थार्पित होनार् कदार्पि नहीं थार्। दिल्ली सल्तनत अनेक शक्तिशार्ली अमीरों तथार् जार्गीरदार्रों में विभार्जित थी। ये सार्मन्त सुल्तार्न की सत्तार् को स्वीकार करते हुए भी स्वतंत्र होने के इच्छुक रहते थे और इन्हें ऐसे अवसर की तलार्श रहती थी। इब्रार्हीम की पार्नीपत के युद्ध में परार्जय के बार्द अन्यार्न्य स्थार्नीय जार्गीरदार्र स्वतंत्र हो गये। ‘संभल में कासिम संभली, बयार्नार् में निजार्म खार्ं, मेवार्त में हसन खार्ं मेवार्ती, धौलपुर में मोहम्मद जैतून, ग्वार्लियर में तार्तार्र खार्ं सार्रंगखार्नी, रार्पड़ी में हुसैन खार्ं नूहार्नी, इटार्वार् में कुतुब खार्ं और कालपी में आलम खार्ं ने बार्बर की अधीनतार् स्वीकार नहीं की। गंगार् के पूर्वी किनार्रे कन्नौज की ओर के अफगार्न पहले ही दिल्ली के सुल्तार्न के विरूद्ध थे। मथुरार् में भी इब्रार्हीम के एक दार्स मरयूब ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दियार्।1 उधर जब हुमार्यूं ने आगरार् पहुँचकर दुर्ग पर कब्जार् करनार् चार्हार्, तब वहार्ं ग्वार्लियर नरेश विक्रमार्दित्य की संतार्न एवं परिवार्र वार्ले आगरार् में थे।1 वन्दनार्, पार्रार्शर, बार्बर, भार्रतीय संदर्भ में, पृ. 47.

पहले तो उन्होंने भार्गने क प्रयत्न कियार्, किन्तु हुमार्यूं ने उन्हें भार्गने न दियार्। उन लोगों ने हुमार्यूं को अपनी इच्छार् से पेशकश दी जिससे अत्यधिक जवार्हरार्त, बहुमूल्य वस्तुएं और विश्व विख्यार्त कोहिनूर हीरार् भी थार्। जब सुल्तार्न इब्रार्हीम लोदी क परिवार्र बार्बर से मिलार्, तब बार्बर ने इब्रार्हीम लोदी की मार्तार् को 7 लार्ख के मूल्य क एक परगनार् तथार् आगरार् से एक कोस पर नदी के उतार्र की ओर निवार्स स्थार्न भी दियार्। बार्बर स्वयं 10 मई, 1526 को आगरार् पहुँचार्। बार्बर ने लिखार् है कि उसके आगरार् पहुँचने पर लोगों में उसके प्रति घृणार् की भार्वनार् थी। उसके सैनिकों के लिए रसद और घोड़ों के लिए चार्रार् नहीं मिलतार् थार्। गार्ंव के गार्ंव खार्ली हो गए थे, माग असुरक्षित थे तथार् यार्त्रार् करनार् कठिन थार्।1 यद्यपि बार्बर ने स्थिति को सुधार्रने क विशेष प्रयार्स कियार्, किन्तु दिल्ली और आगरार् के अलार्वार् अन्य किले विरोध पर डटे रहे। परिस्थितियार्ं प्रतिकूल थीं। इस वर्ष (1526 इर्. में) हिन्दुस्तार्न की मई-जून की भयंकर गर्मी से उसके सैनिक घबरार् उठे और काबुल लौटने की प्रबल इच्छार् प्रकट करने लगे। बार्बर के सैनिकों तथार् अमीरों की काबुल लौटार्ने की इच्छार् और उनके द्वार्रार् बार्बर के हिन्दुस्तार्न में बसने के निर्णय की आलोचनार् करने से यह स्पष्ट हो जार्तार् है कि वे हिन्दुस्तार्न में लूटमार्र करने के प्रलोभन से ही आये थे। किन्तु बार्बर ने अपनी नेतृत्व शक्ति क परिचय देते हुए उन्हें हिन्दुस्तार्न में रहने के लिए सहमत कर लियार्। केवल ख्वार्जार् कलार् ही ऐसार् थार् जो काबुल लौट जार्ने के निश्चय पर अड़ार् रहार्। बार्बर ने उसे गजनी क सूबेदार्र बनार्कर भेज दियार्। 1 बार्बर (बेवरिज), बार्बरनार्मार्, पृ. 470; द्रष्टव्य – विस्तार्र के लिए, वन्दनार्, पार्रार्शर, बार्बर, भार्रतीय संदर्भ में, पृ. 47.

पार्नीपत के युद्ध में बार्बर की विजय के कारण 

पार्नीपत के प्रथम युद्ध में इब्रार्हीम लोदी अपनी विशार्ल सेनार्, सार्धनों की बार्हुल्यतार् और इसी प्रदेश क निवार्स होते हुए भी एक विदेशी आक्रमणकारी बार्बर जिसके पार्स अपेक्षार्कृत सैन्य-सार्धनों की कमी थी, के हार्थों परार्जित हुआ। बार्बर की विजय के कारणों क विश्लेषण इस प्रकार से कियार् जार् सकतार् है –

इब्रार्हीम की अन्यार्यपूर्ण नीति और दुव्र्यवहार्र – इब्रार्हीम लोदी एक निर्दयी और जिद्दी प्रकृति क व्यक्ति थार्। उसकी नीति भी अन्यार्यपूर्ण थी। वह अफगार्न अमीरों को बहुत ही संदेह की दृष्टि से देखतार् थार्। सार्मन्तशार्ही व्यवस्थार् दिल्ली सल्तनत की आधार्रशिलार् थी, किन्तु उसने अनेक योग्य अमीरों को अपनी नीति एवं दुव्र्यवहार्र से असंतुष्ट कर दियार् थार्। इब्रार्हीम के शार्सनकाल में अमीरों क असंतोष पहले की अपेक्षार् बहुत अधिक बढ़ गयार् थार्। स्थार्न-स्थार्न पर विद्रोही होने लग गए थे।1 एर्सकिन के शब्दों में ‘जब बार्र ने हिन्दुस्तार्न पर आक्रमण करने क विनिश्चय कियार् तब अमीरों की गुटबन्दी, अविश्वार्स और खुले विद्रोह चार्रों ओर से दिल्ली सल्तनत को हिलार् रहे थे। इब्रार्हीम की नीति और दुव्र्यवहार्र से न केवल उसके अमीर और पदार्धिकारी अपितु उसके संबंधी भी असंतुष्ट थे। यही कारण थार् कि आवश्यकतार् पड़ने पर अमीरों ने उसक सार्थ नहीं दियार् बल्कि एक विदेशी आक्रमणकारी के प्रति उनकी सहार्नुभूति थी।

इब्रार्हीम के अमीरों क स्वाथीपन और विश्वार्सघार्त – इब्रार्हीम के अमीरों क स्वाथी एवं विश्वार्सघार्ती चरित्र बार्बर की विजय में सहार्यक बनार्। अफगार्न अमीर इब्रार्हीम की बढ़ती हुई शक्ति से असंतुष्ट थे। वे सुल्तार्न को उनके हार्थों की कठपुतली यार् ‘बरार्बरी वार्लों में प्रथम’ बनार्ये  रखनार् चार्हते थे। 1 श्रीवार्स्तव, आशीर्वार्दी लार्ल, पूर्वोक्त कृति, पृ. 19.

किन्तु इब्रार्हीम लोदी ने अमीरों की शक्ति पर अंकुश लगार्ने और रार्जपद की प्रतिष्ठार् को बढ़ार्ने क प्रयार्स कियार्। इससे अमीरों की महत्त्वार्कांक्षार् को आघार्त लगार्। अमीरों ने अपने स्वाथों के वशीभूत दिल्ली सल्तनत के हितों को आघार्त पहुंचार्नार् प्रार्रम्भ कर दियार्। पंजार्ब के सूबेदार्र दौलत खार्ं व अन्य अमीरों ने इब्रार्हीम से विद्रोह कर उसके विरूद्ध आक्रमण करने के लिए बार्बर को आमंत्रित कियार् थार्। इब्रार्हीम क चार्चार् आलम खार्ं भी बार्बर से जार् मिलार्। अन्य अमीरों यथार् अरार्इश खार्ं और मुल्लार् मुहम्मद मजहब ने युद्ध के पूर्व ही बार्बर के पार्स अपने दूत भेजे थे, इसलिए युद्ध के समय उनक नैतिक समर्थन भी बार्बर को प्रार्प्त रहार्। इनके अलार्वार् भी अन्य अफगार्न अमीर बार्बर से मिलने लगे थे।1 इब्रार्हीम के पार्स पार्नीपत के युद्ध में बार्बर के मुकाबले में लगभग दुगुनी सेनार् थी, किन्तु उसके बहुत से सैनिक युद्ध प्रार्रम्भ होने पर युद्ध में भार्ग लिए बिनार् ही जंगलों में चले गये। अफगार्न अमीर पार्नीपत के युद्ध की संभार्वनार् से सुपरिचित थे। किन्तु इतनार् होते हुए भी उन्होंने इस संकट की घड़ी में इब्रार्हीम को सहयोग देने के बजार्य युद्ध के परिणार्म की प्रतीक्षार् कर रहे थे, जिससे कि वे अपनार् स्वाथ पूरार् कर सके। 2 उनकी आपसी फूट इब्रार्हीम लोदी एवं सल्तनत के पतन क कारण बनी। 1 हसन अली खार्ं (निगम), ‘तवार्रीखे दौलते शेरशार्ही’ सूरवंश क इतिहार्स भार्ग -1, पृ. 16 के अनुसार्र नसीर खार्ं भी इब्रार्हीम के दरबार्र में बार्बर के गुप्तचर क काम करतार् थार्। संदर्भ, वन्दनार्, पार्रार्शर, बार्बर, भार्रतीय संदर्भ में, पृ. 53; श्रीवार्स्तव, आशीर्वार्दी लार्ल, पवूर् ोक्त कृति, पृ. 19. 2 अब्दुल्लार्, तार्रीखे दार्ऊदी, पृ. 110; नियार्मतुल्लार्, तार्रीखे खार्नजहार्नी, भार्ग-1, पृ. 27.

इब्रार्हीम की अदूरदर्शितार् और कूटनीतिज्ञतार् में कमी – सुल्तार्न इब्रार्हीम अदूरदर्शी थार् तथार् उसमें कूटनीजिज्ञतार् की कमी थी। वह परिस्थितियों को समझने, उन्हें अपने पक्ष में करने तथार् स्थिति क मुकाबलार् करने में अक्षम थार्। यही कारण थार् कि जब बार्बर जैसे शत्रु से उसक संघर्ष अवश्यम्भार्वी थार् तब वह दौलत खार्ं, आलम खार्ं, मुहम्मद शार्ह तथार् मेवार्ड के रार्णार् सार्ंगार् को बार्बर के विरूद्ध अपनी ओर नही मिलार् सक और उससे धन तथार् सेनार् की सहार्यतार् प्रार्प्त नहीं कर सका। इसके विपरीत बार्बर युद्ध, कूटनीति और उच्च आदर्शवार्द की दृष्टि से इब्रार्हीम की तुलनार् में बहुत मझार् हुआ थार्।1 उसमें उच्च कोटि की नेतृत्व शक्ति थी जिसक उसने भरपूर लार्भ उठार्यार् और इब्रार्हीम को पार्नीपत के युद्ध में परार्जित कर दियार्।

इब्रार्हीम के सैनिक अयोग्य, अनुभवहीन तथार् अनुशार्सित नहीं थे –पार्नीपत के युद्ध में बार्बर के मुकाबले इब्रार्हीम की सैनिक संख्यार् लगभग दुगुनी थी किंतु उसके अधिकांश सैनिक अयोग्य, अनुभवहीन और अनुशार्सनहीन थे। सेनार् क मुख्य आधार्र सार्मन्तवार्दी व्यवस्थार् थी। सैनिकों में कबीलों क दृष्टिकोण थार् अर्थार्त् वे सुल्तार्न की अपेक्षार् अपने कबीले अथवार् सार्मन्त के प्रति अधिक स्वार्मिभक्ति रखते थे। इब्रार्हीम की सेनार् में अधिकांश नए और अनुभवहीन सैनिक भर्ती किए गए थे। वे युद्ध के संगठन और व्यवस्थार् के बार्रे में कोई ज्ञार्न नहीं रखते थे। उनमें अनुशार्सन क अभार्व थार्। सेनार् में अधिकांश भार्ड़े के टट्टू थे जिनमें रार्ष्ट्र प्रेम की भार्वनार् नहीं थी। उन्हें अपने स्वाथों की पूर्ति की अधिक चिन्तार् थी। उनमें  एकतार्, अनुशार्सन, संगठन और रार्ष्ट्रीयतार् की भार्वनार् क अभार्व थार्1 शर्मार्, जी.एन., मेवार्ड़ एण्ड द मुगल एम्पार्यर्स, पृ. 17; श्रीवार्स्तव, आशीर्वार्दी लार्ल, पूर्वोक्त कृति, पृ. 19.

आवश्यक सैनिक गुणों के विपरीत उनमें क्षेत्रीयतार्, जार्तीयतार्, सार्म्प्रदार्यिकतार्, संकीर्ण स्वाथ की भार्वनार् उत्पन्न हो गई थी। ऐसे सैनिक बार्बर जैसे अनुभवी सैनिक, योग्य, सेनार्नार्यक और दृढ़ इच्छार् शक्ति वार्ले के विरूद्ध टिक पार्ने में सर्वथार् असफल रहे। इस संबंध में वन्दनार् पार्रार्शर क मन्तव्य है कि – इब्रार्हीम पर यह आरोप लगार्यार् जार्तार् है कि उसकी सेनार् में जल्दी में धन देकर भर्ती किए रंगरूट अधिक थे और कुशल योद्धार् कम, किन्तु निजार्मुद्दीन, फरिश्तार्, अबुलफजल और गुलबदन आदि किसी भी वृत्तार्ंतकार ने बार्बर के इस कथन की पुष्टि नहीं की है। दूसरे, यद्यपि यह सत्य है कि सुल्तार्न की सेनार् में जितने व्यक्ति थे वे सभी सैनिक नहीं थे और उसमें अनेक व्यार्पार्री, मजदूर आदि भी थे, फिर भी यह सेनार् पर्यार्प्त शक्तिशार्ली थी। स्वयं बार्बर के अनुसार्र इब्रार्हीम के पार्स एक लार्ख स्थार्यी सेनार् थी।1 इस प्रकार यह मार्नार् जार् सकतार् है कि इब्रार्हीम के पार्स एक शक्तिशार्ली और स्थार्यी सेनार् थी, यद्यपि वह एक लार्ख नहीं थी। 2 यद्यपि वन्दनार् पार्रार्शर द्वार्रार् दियार् गयार् तर्क कुछ अंशों में ठीक है, किन्तु यह तो स्पष्ट है कि इब्रार्हीम अपनी इस शक्तिशार्ली सेनार् क बार्बर के विरूद्ध लार्भ नहीं उठार् सक और कई सैनिक तो युद्ध में भार्ग लिए बिनार् ही जंगलों में भार्ग खड़े हुए थे, अस्तु जो नि:संदेह इब्रार्हीम की नेतृत्वशक्ति में कमी क परिचार्यक है।

इब्रार्हीम बार्बर की क्षमतार् क उचित मूल्यार्ंकन करने में अक्षम –बार्बर की क्षमतार् क उचित मूल्यार्ंकन करने में इब्रार्हीम असफल रहार्। यही कारण थार् कि इब्रार्हीम बार्बर के विरूद्ध कारगर कदम नहीं उठार् सका। इब्रार्हीम ने यह सोचार् कि बार्बर भी तेरहवीं-चौदहवीं शतार्ब्दी के मंगोल आक्रमणकारियों की भार्ंति हिन्दुस्तार्न पर लूटमार्र करने के उद्देश्य से आक्रमण कर रहार् है। बार्बर ने पंजार्ब पर आक्रमण करके उसे विजय कियार् तथार् उसे अपने सार्म्रार्ज्य में मिलार् लियार् तब भी आक्रमण की आंख नहीं खुली और उसने बार्बर जैसे प्रतिद्वन्द्वी के विरूद्ध युद्ध करने के लिए कोई विशेष तैयार्री नहीं की। इब्रार्हीम ने काबुल तथार् पंजार्ब से उसकी रसद बन्द करने तथार् सम्पर्क सूत्र तोड़ने के लिए भी कोई उपार्य नहीं कियार्। इब्रार्हीम की यह लार्परवार्ही उसके लिए घार्तक सिद्ध हुई और फलत: वह पार्नीपत के युद्ध में परार्जित हुआ।1 बार्बर (बेवरिज), बार्बरनार्मार्, पृ. 463; श्रीवार्स्तव, आशीर्वार्दी लार्ल , पवूर् ोक्त कृति, पृ. 19. 2 वन्दनार्, पार्रार्शर, बार्बर, भार्रतीय संदर्भ में, पृ. 49.

इब्रार्हीम लोदी की सैनिक दुर्बलतार् – इब्रार्हीम लोदी एक अयोग्य, अनुभवहीन सेनार्पति थार्। उसे रण क्षेत्र में सैनिकों के कुशल संचार्लन और संगठन क अधिक ज्ञार्न नहीं थार्। वह युद्ध संचार्लन की कलार् में भी निपुण नहीं थार्। उसमें अपने सैनिकों क विश्वार्स अर्जित करने की क्षमतार् नहीं थी।1 इब्रार्हीम के मुकाबले में सैन्य प्रतिभार् की दृष्टि से बार्बर काफी बढ़ार्-चढ़ार् थार्। इब्रार्हीम के अन्य सेनार्नार्यक और सार्मन्त भी दंभी और विलार्सी प्रकृति के थ े तथार् अधिक अनुभवी भी नहीें थे। उसकी सेनार् में निर्दिष्ट व्यवस्थार् क अभार्व थार्। परिणार्मस्वरूप पार्नीपत के युद्ध में जब इब्रार्हीम क अग्रगार्मी दल तीव्र गति से आगे बढ़ रहार् थार्, किन्तु बार्बर की सुरक्षार् पंक्ति और तोपों की मार्र से वह अवरूद्ध हो गयार्, तब पीछे से आने वार्ली सेनार् अपने वेग को रोक नहीं पार्ई जिससे सेनार् में अव्यवस्थार् उत्पन्न हो गई। सैन्य संचार्लन की दक्षतार् और व्यवस्थार् के अभार्व में इतनी बड़ी सेनार् को अनुशार्सित रख पार्नार् इब्रार्हीम के लिए दुष्कर कार्य थार्। इस संबंध में बार्बर ने लिखार् है – वह बड़ार् अनुभव शून्य जवार्न थार्। उसने सेनार् को किसी प्रकार क अनुभव न करार्यार् थार् – ‘न बढ़ने का, न खड़े रहने क और न युद्ध करने का।’1 मुनि लार्ल, बार्बर लार्इफ एण्ड टार्इम्स, पृ. 84.

इस संबंध में वन्दनार् पार्रार्शर क कथन है कि वीरतार्, अनुभव और सैन्य संचार्लन की क्षमतार् क अभार्व पार्नीपत के युद्ध में इब्रार्हीम की परार्जय क कारण नहीं थे क्योंकि इस युद्ध के पूर्व भी आलम खार्ं और दिलार्वर खार्ं के चार्लीस हजार्र सैनिकों के सार्थ दिल्ली घेर लेने पर इब्रार्हीम ने अपनी सूझ बूझ व चार्तुर्य से आलम खार्ं को परार्जित कर दोआब भार्गने को विवश कर दियार् थार्।2 इब्रार्हीम को बार्बर की सुरक्षार्त्मक व्यूह रचनार् की पूर्ण जार्नकारी थी तथार् उसने युद्ध तभी प्रार्रम्भ कियार् जब 19 अप्रैल., 1526 की रार्त्रि को बार्बर के छार्पार्मार्र दस्ते के हमले को बार्बर क आक्रमण समझ लियार्।

इब्रार्हीम द्वार्रार् युद्ध में हार्थियों क प्रयोग – बार्बर के अनुसार्र इब्रार्हीम की सेनार् में एक हजार्र हार्थी थे। बार्बर के पार्स घुड़सवार्र थे जो हस्थि सेनार् की तुलनार् में अधिक फुर्तीले थे। इब्रार्हीम द्वार्रार् युद्ध में हार्थियों क प्रयोग स्वयं की सेनार् के लिए घार्तक सार्बित हुआ। रण क्षेत्र में बन्दूकों एवं तोपों द्वार्रार् आग उगलने से हार्थी अपनार् संतुलन खो बैठे तथार् उन्मत्त और विक्षिप्त अवस्थार् में उन्होंने स्वयं की सेनार् को कुचल दियार्।

इब्रार्हीम की अकुशल गुप्तचर व्यवस्थार् – कुछ इतिहार्सकारों की मार्न्यतार् है कि इब्रार्हीम की गुप्तचर व्यवस्थार् अच्छी नहीं थी। अकुशल गुप्तचर व्यवस्थार् के अभार्व में इब्रार्हीम को बार्बर के ससैन्य आगे बढ़ने, उसके द्वार्रार् सैनिकों के जमार्व, व्यूह रचनार् आदि की जार्नकारी प्रार्प्त न हो सकी और न ही वह रसद और संचार्र-व्यवस्थार् को काट सका। परिणार्म यह हुआ कि एक व्यवस्थित शत्रु के मुकाबले में वह नहीं टिक सक और पार्नीपत के युद्ध में परार्जित हुआ।1 रिजवी, मुगल कालीन भार्रत-बार्बर, पृ. 154. 2 वन्दनार्, पार्रार्शर, बार्बर, भार्रतीय संदर्भ में, पृ. 49; 

पार्नीपत के युद्ध में एक ओर हजार्रों की संख्यार् में सैनिक थे और दूसरी ओर सैनिक और तोपें दोनों। फलत: इब्रार्हीम लोदी तथार् बार्बर के बीच जो संघर्ष हुआ वह बरार्बरी क न थार्। कुछ भी हो, इस युद्ध ने यह सिद्ध कर दियार् कि बार्बर एक कुशल सेनार्ध्यक्ष थार्। उसने यह युद्ध अपनार्ई गई नई युद्ध प्रणार्ली, तोपखार्ने, अश्वार्रोहियों, अच्छी गुप्तचर व्यवस्थार् तथार् अपने सैनिकों के अदम्य उत्सार्ह के फलस्वरूप जीतार्।

भार्रतीयों की उदार्सीन मनोवृत्ति – वन्दनार् पार्रार्शर ने ‘औसत भार्रतीय की देश एवं शार्सन के प्रति उदार्सीन मनोवृत्ति’ को इब्रार्हीम लोदी की परार्जय क मुख्य कारण मार्नार् है।1 आम हिन्दुस्तार्नी की यह मार्न्यतार् थी कि शार्सक कोई भी हो, अफगार्न अथवार् मुगल, वह उसक शोषक ही हो सकतार् है, संरक्षक नहीं। भार्रतीयों की इस उदार्सीन मनोवृत्ति ने समार्ज में ‘कोई भी रार्जार् हो, हमें क्यार् हार्नि है’ की विचार्रधार्रार् को पनपार्यार्। इसक नतीजार् यह हुआ कि इब्रार्हीम लोदी सुल्तार्न बनार् रहे अथवार् बार्बर की विजय हो, इसमें उन्हें कोई रूचि नहीं रही। यद्यपि जनसार्धार्रण ने बार्बर की विजय के बार्द उसक विरोध भी कियार्, किन्तु यह विरोध क्षणिक थार् और इसक कारण मार्त्र भय थार्, न कि देश प्रेम की भार्वनार्। भार्रतीय जनतार् की इस उदार्सीन मनोवृत्ति ने बार्बर की सेनार् के नैतिक बल में वृद्धि की।1 वन्दनार्, पार्रार्शर, बार्बर, भार्रतीय संदर्भ में, पृ. 49.

बार्बर क तोपखार्नार् – यद्यपि इब्रार्हीम की अफगार्न सेनार् तोपखार्ने से अपरिचित नहीं थी, किन्तु यह सत्य है कि उसकी सेनार् में तोपखार्ने को उतनार् महत्त्व प्रार्प्त नहीं थार्, जितनार् बार्बर की सेनार् में तोपखार्ने को प्रार्प्त थार्। इब्रार्हीम क तोपखार्नार् बार्बर के मुकाबले में अधिक कुशल और उपयोगी नहीं थार्। बार्बर को पार्नीपत के युद्ध में विजय दिलार्ने में तोपखार्ने की भूमिक विशेष महत्त्वपूर्ण  रही। उस्तार्द अली आरै मुस्तफार् ने युद्ध के दिन शत्रु सेनार् पर लगार्तार्र पार्ंच घण्टों तक गोलार्बार्री की। 1 फलत: जिससे युद्ध क परिणार्म बार्बर के पक्ष में रहार्। रश्बु्रक विलियम्स क मन्तव्य है कि बार्बर के शक्तिशार्ली तोपखार्ने ने भी उसे सफल होने में बहुमूल्य सहार्यतार् दी।

इब्रार्हीम को भार्रतीय शार्सकों क सहयोग न मिलनार् – एक विदेशी आक्रमणकारी के विरूद्ध इब्रार्हीम को भार्रतीय शार्सकों क सहयोग प्रार्प्त नहीं हुआ अन्यथार् परिणार्म कुछ दूसरार् ही होतार्। मेवार्ड़ के रार्णार् सार्ंगार्, बंगार्ल के शार्सक नुसरत शार्ह, मार्लवार् के शार्सक महमूद द्वितीय तथार् गुजरार्त के शार्सक मुजफ्फर शार्ह आदि ने इब्रार्हीम की धन और सेनार् से कोई सहार्यतार् नहीं की। यदि इब्रार्हीम को इनक समुचित सहयोग मिल जार्तार् तो वह बार्बर को भार्रत से अवश्य खदेड़ देतार्।

बार्बर की दक्षतार्, रण कुशलतार् और सुयोग्य सैन्य संचार्लन – बार्बर एक जन्मजार्त सैनिक थार्। बचपन से ही उसे निरन्तर संकटों और संघर्षों में जुझनार् पड़ार् 1 तथार् अनवरत युद्ध में भार्ग लेने से वह अनुभवी सैनिक, कुशल योद्धार् बन गयार् थार्। उसमें अद्भुत सार्हस थार्। वह लिखतार् है, ‘क्योंकि मुझे रार्ज्य पर अधिकार करने तथार् बार्दशार्ह बनने की आकांक्षार् थी अत: मैं एक यार् दो बार्र की असफलतार् से निरार्श होकर बैठार् नहीं रह सकतार् थार्।’2 सेनार् के प्रस्थार्न के समय वह बड़ार् सतर्क रहतार् थार्। एक कुशल सैनिक होने के कारण वह अन्य सैनिकों की कठिनार्इयों को भली-भार्ंति समझ लेतार् थार्। उल्लेखनीय है कि पार्नीपत के युद्ध के समय बार्बर की सेनार् के कुछ लोग बहुत ही भयभीत और चिंतित थे। किंतु उसने स्थिति को संभार्ल लियार्। बार्बर के अनुसार्र हमार्रार् मुकाबलार् एक अपरिचित कौम एवं लोगों से थार्। न तो हम उनकी भार्षार् समझते थे और न वे हमार्री।’3 किन्तु बार्बर ने अफगार्नों की शक्ति एवं उनके सैन्य संचार्लन की योग्यतार् को भली प्रकार समझ लियार् थार्। वस्तुत: अफगार्नों की कमजोरी ने ही उसे हिन्दुस्तार्न पर आक्रमण करने के लिए प्रोत्सार्हित कियार् थार्।1 मुनि लार्ल, बार्बर लार्इफ एण्ड टार्इम्स, पृ. 83. 2 रश्बू्रक, विलियम्स, ऐन एम्पार्यर बिल्डर्स ऑफ द सिक्सटीन सेंचुरी, पृ. 137.

उपर्युक्त विवेचन से ज्ञार्त होतार् है कि बार्बर एक महार्न् सेनार्पति थार् तथार् इब्रार्हीम लोदी की तुलनार् में उसकी सैन्य संचार्लन की योग्यतार् कहीं अधिक श्रेष्ठ थी। इब्रार्हीम लोदी के सैन्य संचार्लन के बार्रे में बार्बर ने लिखार् है – ‘इब्रार्हीम ने अभी तक कोई भी अनुशार्सनयुक्त युद्ध नहीं कियार् है।’4 बार्बर के अतिरिक्त उसके अन्य सेनार् नार्यक एवं युद्ध संचार्लक भी 1 बार्बर ने बार्बरनार्मार्, पृ. 66 में लिखार् है कि भार्ग्य क कोई ऐसार् कष्ट अथवार् हार्नि नहीं है जिसे मैंने न भोगार् हो, इस टूटे हुए हृदय ने सभी को सहन कियार् है। हार्य! कोई ऐसार् कष्ट भी है, जिसे मैंने न भोगार् हो बड़े कुशल और अनुभवी थे। यही कारण थार् कि इब्रार्हीम लोदी ऐसे अनुभवी एवं कुशल सेनार्नार्यक को परार्जित नहीं कर सका। वन्दनार् पार्रार्शर के अनुसार्र, ‘बार्बर में शत्रु की कमजोरी को भार्ंपने और उसकी विशेषतार्ओं को आत्मसार्त करने की अद्भुत क्षमतार् थी। इसके अतिरिक्त मध्य एशियार् में अनेक जार्तियों से युद्ध करने क अवसर भी बार्बर को मिलार् थार्, उससे लार्भ उठार्कर उसने अपनी सेनार् में अनेक युद्ध प्रणार्लियों क सही समन्वय कियार् थार्, जिसक उचित परिणार्म उसे मिलार्।’

बार्बर द्वार्रार् युद्ध में नवीनतम युद्ध तकनीक एवं हथियार्रों क प्रयोग – बार्बर ने मध्य एशियार् में कई जार्तियों से युद्ध करके पर्यार्प्त अनुभव अर्जित कर लियार् थार्। उसने सेनार् में कई युद्ध प्रणार्लियों क उचित समन्वय कियार् थार्। बार्बर के पार्स दृढ़ तोपखार्नार् थार् जिसक संचार्लन उस्तार्द अली और मुस्तफार् जैसे सुयोग्य एवं अनुभवी सेनार्नार्यकों के सुपुर्द थार्। बार्बर के पार्स अश्वार्रोही सेनार् थी। बार्बर की सेनार् ने इब्रार्हीम के विरूद्ध बार्रूद, गोले, बन्दूक एवं तोपों क उपयोग कियार् थार् जबकि अफगार्न सैनिकों ने दकियार्नूस प्रणार्ली के हथियार्रों एवं हार्थियों क प्रयोग कियार् थार्। ऐसी स्थिति में इब्रार्हीम की सेनार् बार्बर की सेनार् के मुकाबले में नहीं टिक सकी और पार्ंच घण्टे की अवधि में ही उखड़ गई।

दूसरी महत्त्वपूर्ण बार्त यह थी कि बार्बर ने अपनी सेनार् क जमार्व रक्षार्त्मक ढंग से कियार् और ‘तुलुगमार् युद्ध-प्रणार्ली’ को अपनार्यार्। बार्बर ने तुलुगमार् दस्तों ने भी उसकी विजय को अधिक आसार्न बनार् दियार्। बार्बर ने सुल्तार्न इब्रार्हीम को पहले प्रहार्र करने क मौक दियार् किन्तु युद्ध शुरू होते ही बार्बर की सेनार् के दक्षिण और वार्म पार्श्र्व की सैनिक टुकड़ियों ने बहुत ही नियमित तरीके से घूमकर इब्रार्हीम की सेनार् पर पीछे से आक्रमण कर दियार् जिसके कारण उसकी सेनार् में भगदड़ मच गई। अब इब्रार्हीम के सैनिक न आगे बढ़ सकते थे और न ही पीछे लौट सकते थे। इस प्रकार इब्रार्हीम लोदी परार्स्त हो गयार् तथार् युद्ध में लगभग 15-20 हजार्र अफगार्न मार्रे गये।1 वन्दनार्, पार्रार्शर, बार्बर, भार्रतीय संदर्भ में, पृ. 51.

ईश्वरीय कृपार् – पार्नीपत के युद्ध में बार्बर ने अपनी विजय क कारण ईश्वरीय कृपार् बतार्यार् है। बार्बर ने लिखार् है कि हमार्रे शत्रु की सेनार् और सार्धन अधिक थे, किन्तु ईश्वर में हमार्री दृढ़ आस्थार् थी। उसने शक्तिशार्ली शत्रु के विरूद्ध हमार्री सहार्यतार् की और हमें कामयार्बी मिली।2 यद्यपि पार्नीपत के युद्ध में अपनी जीत को बार्बर ने ईश्वर क अनुग्रह मार्नार् है किन्तु वार्स्तविकतार् यह है कि ईश्वर के प्रति उसक अटूट विश्वार्स थार् जिससे बार्बर क मनोबल ऊँचार् रहार् तथार् उसने जीत के लिए अथक प्रयार्स कियार्, परिस्थितियार्ँ उसके अनुकूल रहीं, विगत अनुभव और योग्यतार् के समन्वय ने उसे विजय दिलार्ने में सहार्यतार् दी जिसे बार्बर ने ईश्वरीय कृपार् मार्नार्।

पार्नीपत के युद्ध के परिणार्म

पार्नीपत क प्रथम युद्ध मध्यकालीन भार्रतीय इतिहार्स की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण घटनार् है इससे भार्रत में मुगल सार्म्रार्ज्य की स्थार्पनार् हुई। डॉईश्वरी प्रसार्द के अनुसार्र लोदीवंश की सत्तार् टूट कर नष्ट हो गई और हिन्दुस्तार्न क प्रभुत्व चुगतार्ई तुर्कों के हार्थों में चलार् गयार्। इस युद्ध के प्रमुख परिणार्म इस प्रकार थे –

इब्रार्हीम लोदी की मृत्यु एवं लोदी वंश की समार्प्ति – पार्नीपत के प्रथम युद्ध में लोदी वंश क अंतिम सुल्तार्न इब्रार्हीम लोदी अपने 15-20 हजार्र अफगार्न सैनिकों सहित मार्रार् गयार्। इस प्रकार लोदी वंश क अन्त हो गयार् तथार् पंजार्ब के अतिरिक्त दिल्ली और आगरार् पर भी बार्बर क अधिकार कायम हो गयार्।

लेनपूल के अनुसार्र अफगार्नो के लिए पार्नीपत क प्रथम युद्ध बडाऱ् भयंकर सिद्ध हुआ। इससे उनक सार्म्रार्ज्य समार्प्त हो गयार् और उनकी शक्ति क अंत हो गयार्।2 डॉ. ए.एल. श्रीवार्स्तव क मन्तव्य है कि लोदियों की सैन्य शक्ति पूर्णत: छिन्न-भिन्न हो गई और उनक रार्जार् युद्ध भूमि में मार्रार् गयार्। हिन्दुस्तार्न की सर्वोच्च सत्तार् कुछ काल के लिए अफगार्न जार्ति के हार्थों से निकल कर मुगलों के हार्थों में चली गयी।

अफगार्न शक्ति और शार्सन क अन्त – पार्नीपत के प्रथम युद्ध के बार्द भार्रत में अफगार्नों की शक्ति, सत्तार् और शार्सन क व्यार्वहार्रिक रूप से अन्त हो गयार् थार्। पार्नीपत क प्रथम युद्ध दिल्ली के अफगार्नों के लिए कब्र सार्बित हुआ। इब्रार्हीम अपने हजार्रों सैनिकों सहित मार्रार् गयार् थार्। उसकी मृत्यु के सार्थ आलम खार्ं और महमूद खार्ं जैसे कुछ अफगार्न सरदार्र अब भी बचे थे जिन्हें बार्द में बार्बर ने पददलित कियार् थार्, किन्तु इन अफगार्न सरदार्रों में इतनी योग्यतार्, सार्हस और बल नहीं थार् कि वे लोदी वंश के खोये हुए गौरव एवं शक्ति को पुन: स्थार्पित कर पार्ते। लेनपूल के अनुसार्र, ‘पार्नीपत क युद्ध दिल्ली के अफगार्नों के लिए विनार्शकारी सिद्ध हुआ। इससे उनक रार्ज्य और शक्ति सर्वथार् नष्ट-भ्रष्ट हो गई।1 नार्गोरी, प्रणव देव, पूर्वोक्त कृति, पृ. 146; रार्धेश्यार्म, मुगल सम्रार्ट्

मुगल रार्जवंश की स्थार्पनार् – पार्नीपत के प्रथम युद्ध के कारण लोदी रार्जवंश क अन्त हो गयार् तथार् बार्बर ‘सोलहवीं शती क सार्म्रार्ज्य निर्मार्तार्’ बन गयार्। 27 अप्रैल., 1526 ई. को दिल्ली में बार्बर के नार्म क खुत्बार् पढ़ार् गयार् और उसे हिन्दुस्तार्न क शार्सक घोषित कियार् गयार्। प्रार्.े एस.एम. जार्फर ने इस सम्बन्ध में लिखार् है – ‘इस युद्ध से भार्रतीय इतिहार्स में एक नए युग की शुरूआत हुई। लोदी वंश के स्थार्न पर मुगल रार्जवंश की स्थार्पनार् हुई। इस नए वंश ने समय आने पर प्रतिभार् सम्पन्न तथार् महार्न् बार्दशार्हों को जन्म दियार्, जिनकी छत्र छार्यार् में भार्रत ने असार्धार्रण उन्नति एवं महार्न्तार् अर्जित की। 2 आशीर्वार्दी लार्ल श्रीवार्स्तव क मन्तव्य है कि पार्नीपत की विजय ने बार्बर के दार्वे को वैधार्निकतार् क जार्मार् पहनार् दियार्। अत: उसकी भविष्य की योजनार्एं तथार् प्रयत्न उसी के दार्वे को कार्य रूप में परिणत करने के प्रयार्स-मार्त्र थे।3 उल्लेखनीय है कि अकबर और शार्हजहार्ं जैसे सम्रार्ट् जिनके शार्सनकाल को भार्रतीय इतिहार्स में एक विशिष्ट स्थार्न प्रार्प्त है, इसी रार्जवंश के सदस्य थे।

बार्बर के दुर्भार्ग्यपूर्ण जीवन की समार्प्ति – बार्बर के व्यक्तिगत जीवन के लिए भी पार्नीपत की विजय विशेष महत्त्वपूणर् सार्बित हुई। इस युग ने बार्बर को एक महार्न् विजेतार् के रूप में प्रसिद्ध कर दियार्। बार्बर के सार्हस, वीरतार्, दृढ़ निश्चय, उत्सार्ह, रणकुशलतार्, वैज्ञार्निक-युद्ध-प्रणार्ली आदि गुणों के कारण उसके दुर्भार्ग्यपूर्ण एवं संघर्षपूर्ण जीवन क अन्त हो गयार्। इसके द्वार्रार् उसे उत्तरी भार्रत पर बहुमूल्य अधिकार मिल गयार्। उसकी भार्रत-विजय क यह दूसरार् महत्त्वपूणर् भार्ग थार्। युद्ध के तार्त्कालिक लार्भ भी बार्बर के लिए कुछ कम महत्त्व के नहीं थे। बार्बर को दिल्ली, आगरार् एवं अन्य स्थार्नों से अपार्र धन-सम्पदार् प्रार्प्त हुई। कोहिनूर हीरार् भी उसके हार्थ लगार्। उसने परवर्ती युद्ध अब अधिकार प्रार्प्ति के लिए नहीं अपितु अधिकारों की पुष्टि के लिए लड़े थे।1 लेनपूल, स्टेनली, बार्बर, पृ. 166; रार्धेश्यार्म, मुगल सम्रार्ट् बार्बर, पृ. 277. 2 जार्फर, एस.एम., मुगल इम्पार्यर, पृ. 12. 3 श्रीवार्स्तव, आशीर्वार्दी लार्ल , पूर्वोक्त कृति, पृ. 19.

बार्बर को आगरार् एवं दिल्ली से अपार्र धन मिलार् थार्। फलत: उसे विख्यार्त कोहिनूर हीरार् मिलार्। अब उसकी आर्थिक दशार् सुधर गई। डॉआर. पी. त्रिपार्ठी क मन्तव्य है कि बार्बर ने जो धन दिल्ली एवं आगरार् में प्रार्प्त कियार् थार्, उसमें से बहुत सार् धन अपने सैनिकों को दे दियार्। वह समरकन्द, इरार्क, खुरार्सार्न व काश्गर में स्थित सम्बन्धियों को तथार् समरकन्द, मक्क व मदीनार् तथार् खुरार्सार्न के पवित्र आदमियों को भी भेंट भेजनार् न भूलार्।

बार्बर के प्रभुत्व और शक्ति में वृद्धि – पार्नीपत के युद्ध में बार्बर की विजय ने उसके प्रभुत्व एवं शक्ति में भी पर्यार्प्त वृद्धि की। उसने ‘पार्दशार्ह’ की उपार्धि धार्रण की जो उसके वंश के लिए नवीन प्रभुत्व और गौरव की बार्त थी। इस युद्ध में विजय के बार्द बार्बर की सत्तार् और शक्ति बढ़ती ही गई। 1 त्रिपार्ठी, आर.पी., मुगल सार्म्रार्ज्य क उत्थार्न व पतन, पृ. 35. 113

हिन्दुओं में निरार्शार् की भार्वनार् क संचार्र – औसत हिन्दुस्तार्नी आदमी क यह विचार्र थार् कि बार्बर भी तैमूर की भार्ंति लूटमार्र करके लौट जार्एगार् तथार् बार्बर के आक्रमण से इब्रार्हीम लोदी की शक्ति और रार्ज्य क अन्त हो जार्एगार्। भार्रत से मुस्लिम सत्तार् समार्प्त हो जार्एगी और एक बार्र पुन: हिन्दुओं को अपनी शक्ति और रार्ज्य बढ़ार्ने क अवसर प्रार्प्त हो जार्एगार्। परन्तु जब बार्बर ने हिन्दुस्तार्न में रहने और अपनार् रार्ज्य कायम करने क निश्चय कियार् तो, हिन्दुओं की आशार्ओं पर तुषार्रार्पार्त हो गयार् और उनमें निरार्शार् व्यार्प्त हो गई।

भार्रतीय इतिहार्स क निर्णार्यक मोड़ – बार्बर में अवसर को पहचार्नने तथार् उससे लार्भ उठार्ने की असीम क्षमतार् थी। इसी क्षमतार् ने पार्नीपत की विजय को महत्त्व प्रदार्न कियार्। बार्बर ने इस युद्ध में विजय के बार्द भार्रत में रहने क दृढ़ निश्चय कियार्। यद्यपि उसके इस निर्णय के माग में कई बार्धार्यें आयीं। किंतु वह अपनी क्षमतार् के कारण सब को पार्र कर गयार्। परिणार्मस्वरूप पार्नीपत क प्रथम युद्ध मध्ययुगीन भार्रतीय इतिहार्स क मोड़ बन गयार् और यह मुगल सार्म्रार्जय की नींव क पत्थर सार्बित हुआ। बार्बर की एक लम्बे अर्से से चली आ रही मनोकामनार् पूर्ण हुई। भार्रतीय संस्कृति पर प्रभार्व – इस युद्ध क सभ्यतार् एवं संस्कृति पर भी प्रभार्व पड़ार्। डॉ. आर.पी. त्रिपार्ठी के अनुसार्र भार्रत में मुगल संस्कृति व सभ्यतार् के समन्वय से भार्रत में नवीन सभ्यतार् क सूत्रपार्त हुआ। 1 इरिस्कान, हिस्ट्री ऑफ इण्डियार् अण्डर बार्बर एण्ड हुमार्यूं, पृ. 438; रार्धेश्यार्म, मुगल सम्रार्ट् बार्बर, पृ. 277.

मुगलों के ठार्ट-बार्ट ने भार्रतीयों के जनजीवन में महार्न् परिवर्तन कियार्। इरार्न की कलार् व सार्हित्य ने भार्रत पर अपनार् प्रभार्व जमार्नार् आरम्भ कर दियार्।1 बार्बर की सफलतार् के कारण – बार्बर ने इब्रार्हीम की विशार्ल सेनार् को परार्स्त कियार् थार्। बार्बर की विजय के मुख्य कारण इस प्रकार थे –

  1. बार्बर एक अनुभवी तथार् योग्य सेनार्नार्यक थार्। डॉ. आर.पीत्रि पार्ठी के अनुसार्र, वार्स्तव में उत्कृष्ट नेतृत्व, वैज्ञार्निक रण कलार्, श्रेष्ठ शस्त्रार्स्त्र तथार् सौभार्ग्य के कारण बार्बर की विजय हुई। 2 विलक्षण सैन्य प्रतिभार् वार्ले बार्बर के समक्ष इब्रार्हीम पूर्णत: अयोग्य थार्। लेनपूल के अनुसार्र, पार्नीपत के रणक्षेत्र में मुगल सेनार्ओं ने घबरार्कर युद्ध आरम्भ कियार्, परंतु उनके नेतार् की वैज्ञार्निक योजनार् तथार् अनोखी चार्लों ने उन्हें आत्म-विश्वार्स और विजय प्रदार्न की।
  2. बार्बर ने कुशल तोपखार्ने की मदद से इब्रार्हीम को परार्स्त कियार्। आर.वी. विलियम्स के अनुसार्र, बार्बर के शक्तिशार्ली तोपखार्ने ने भी उसे सफल होने में बहुमूल्य सहार्यतार् दी। 3. इब्रार्हीम की सेनार् में एकतार् तथार् अनुशार्सन नहीं थार्। इब्रार्हीम के अविवेकपूर्ण कार्यों से जनतार् तथार् सरदार्रों में उसके विरूद्ध असंतोष थार्। उसकी सेनार् के अधिकांश सैनिक किरार्ये के थे, जिनके बार्रे में बार्बर ने अपनी आत्मकथार् में लिखार् है कि हिन्दुस्तार्न के सैनिक मरनार् जार्नते हैं, लड़नार् नहीं।1 त्रिपार्ठी, आर.पी., मुगल सार्म्रार्ज्य क उत्थार्न व पतन, पृ. 35. 2 वही, पृ. 31; जार्फर, एस.एम., मुगल एम्पार्यर, पृ. 12. 3 लेनपलू , बार्बर, पृ. 56.
  3. इब्रार्हीम एक अयोग्य सेनार्पति थार्। जे.एन. सरकार के अनुसार्र, इब्रार्हीम ने भार्रत के रार्जसी तरीके से लड़ार्ई के लिए कूच कियार् थार् अर्थार्त् दो तीन मील तक कूच करतार् थार् और तदुपरार्न्त दो दिन तक अपनी सेनार्ओं के सार्थ आरार्म करतार् थार्। उसक फौजी खेमार् एक चलते-फिरते अव्यवस्थित शहर की तरह थार्।2 बार्बर ने अपनी आत्मकथार् में लिखार् है, कि इब्रार्हीम एक योग्य सेनार्पति नहीं थार्। वह बिनार् किसी सूचनार् के कूच कर देतार् थार् और बिनार् सोचे-समझे पीछे हट जार्तार् थार्। इसके अतिरिक्त वह बिनार् दूरदर्शितार् के युद्ध में कूद पड़तार् थार्। अत: बार्बर ने उसे आसार्नी से परार्स्त कियार्। 
  4. मुगल सैन्य-संगठन अफगार्न सैन्य संगठन से बहुत उत्तम थार्। मुगल सैनिक वीर, अनुभवी, सार्हसी तथार् कुशल योद्धार् थे, जबकि इब्रार्हीम के अधिकतर सैनिक किरार्ये के थे और उनमें एकतार्, अनुशार्सन, संगठन एवं रार्ष्ट्रीय हित की भार्वनार् नहीं थी।

पार्नीपत के युद्ध के बार्द बार्बर की कठिनार्इयार्ँ

पार्नीपत के युद्ध के बार्द बार्बर को कठिनार्इयों क सार्मनार् करनार् पड़ार् –

  1. यद्यपि पार्नीपत के मैदार्न में विजय प्रार्प्त करने से बार्बर दिल्ली क शार्सक बन गयार् थार्, किन्तु उसक अधिकार क्षेत्र बहुत सीमित थार्। लेनपूल के अनुसार्र, भार्रत कहार्ँ, उसे तो अभी उत्तरी भार्रत क भी रार्जार् नहीं कहार् जार् सकतार् थार्। अत: बार्बर के लिए सार्म्रार्ज्य विस्तार्र करनार् अनिवाय थार्।
  2. उसे अपने सिंहार्सन की सुरक्षार् के लिए मध्यवर्ती भार्रत के विद्रोही सरदार्रों क दमन करनार् थार् तथार् रार्जपूतों को परार्स्त करनार् थार्।
  3. भार्रत की जनतार् बार्बर को विदेशी समझकर उससे नफरत करती थी। लेनपूल के अनुसार्र, भार्रत क प्रत्येक गार्ंव मुगलों के लिए एक शत्रु शिविर थार्।1 अत: बार्बर को भार्रतीयों क विश्वार्स जीतनार् थार्।
  4. इब्रार्हीम की मृत्यु के बार्द कासिम खार्ं ने सम्भल, निजार्म खार्ं ने बयार्नार् तथार् हसन खार्ं ने मेवार्त पर अधिकार कर लियार् थार्। बार्बर को इन सरदार्रों को अपनी अधीनतार् में लार्नार् थार्।
  5. बार्बर के सैनिक तथार् सरदार्र अपने घर लौटार्ने के लिए व्यग्र थे तथार् वे भार्रत की गर्मी सहन नहीं कर पार् रहे थे। अत: बार्बर को उन्हें अगले आक्रमण के लिए तैयार्र करनार् थार्। बार्बर ने बड़े सार्हस तथार् धैर्य से इन कठिनार्इयों पर विजय प्रार्प्त की। बार्बर ने सैनिकों तथार् सरदार्रों को यह कहकर समझार् लियार् कि ‘वर्षों के परिश्रम से, कठिनार्इयों क सार्मनार् करके, लम्बी यार्त्रार्एँ करके, अपने वीर सैनिकों को युद्ध में झोंककर और भीषण हत्यार्काण्ड करके हमने खुदार्  की कृपार् से दुश्मनों के झुण्ड को हरार्यार् है, तार्कि हम उनकी लम्बी-चौड़ी विशार्ल भूमि को प्रार्प्त कर सकें। अब ऐसी कौन-सी शक्ति है, जो हमें विवश कर रही है और ऐसी कौन सी आवश्यकतार् है, जिसके कारण हम उन प्रदेशों को छोड़ दें, जिन्हें हमने जीवन को संकट में डार्लकर जीतार् है।.मध्यवर्ती भार्रत के विद्रोहियों को कुचलनार् -महमूद, फीरोज खार्ं, शेख बयार्जीद आदि अफगार्न सरदार्रों ने युद्ध लड़े बिनार् ही बार्बर क आधिपत्य स्वीकार कर लियार्। बार्बर ने अन्य विद्रोही अफगार्न सरकार को कुचल दियार् तथार् सम्भल, बयार्नार्, इटार्वार्, धौलपुर, कन्नौज, ग्वार्लियर तथार् जौनपुर पर अधिकार कर लियार्।1 लेनपलू , बार्बर, पृ. 21

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