परिवेदनार् क्यार् है ?

हर संगठन में नियोक्तार्, प्रबन्धन व कर्मचार्री वर्ग सम्मिलित होतार् है। इन वर्गों के अन्दर भी गुटवार्जी एवं व्यक्तियों अथवार् गुटों में टकरार्व पार्यार् जार्तार् है। ये अक्सर एक दूसरे के प्रति असंतोष व्यक्त करते रहते हैं तथार् एक दूसरे की अवसर पार्ते ही शिकायत भी करते हैं। उनमें अक्सर मतभेद, लड़ाइ-झगड़ार् तथार् तीब्र असंतोष दिखार्इर् देतार् रहतार् है। कभी नियोक्तार् व प्रबन्धक अपने कार्मिको से असंतुष्ट होते हैं तो कभी कर्मचार्री विभिन्न मुद्दों पर अपने मार्लिकों व प्रबन्धकों से। इन्हीं शिकायतों व परस्पर असंतोष की भार्वनार् को उद्योग जगत परिवेदनार् के रूप में पहचार्नतार् है। इन परिवेनार्ओं क न्यूनतम स्तर औद्योगिक शार्ंति को बढ़ार्वार् देतार् है, जबकि इनकी अधिकतार् औद्योगिक परिवेश को अशार्ंति व तनार्व की ओर ले जार्ती है।

परिवार्द वार्स्तविक व काल्पनिक, सच्चे व झूठे दोनोंं प्रकार के हो सकते हैं। ये वैधार्निक दृष्टि से उचित व अनुचित भी हो सकते हैं। प्रबन्धन को इन परिवेदनार्ओं क समुचित संज्ञार्न लेकर वैधार्निक व वार्स्तविक शिकायतों क त्वरित समार्धार्न ढूँढ़नार् चार्हिए तथार् अवैधार्निक अथवार् काल्पनिक व झूठी परिवेदनार्ओं क भंडार्फोड़ भी करनार् चार्हिए। तार्कि इन परिवेदनार्ओं व शिकायतों, जो केवल लार्ंछन लगार्ने व मनमुटार्व उत्पन्न कर औद्योगिक वार्तार्वरण को बिगार्ड़ने के उद्देश्य से की जार्ती हों, से सभी पक्षों व समार्ज को अवगत करार्यार् जार् सके व उत्पार्दन पर उसके दुष्प्रभार्व को रोक जार् सके।

उद्योग में मनमुटार्व होने से उत्पार्दक, उपभोक्तार्, कार्मिक, बृहत्तर समार्ज व रार्ष्ट्र सभी को हार्नि उठार्नी पड़ती है। इससे सार्धनों क अपव्यय बढ़तार् है; औद्योगिक क्रियार्कलार्पों में शिथिलतार् व ठहरार्व आ जार्तार् है; अव्यवस्थार् व अशार्ंति फैलती है; तथार् उपार्दकतार् क ह्रार्स होतार् है। प्रबंधन व कर्मचार्रियों में सहयोग व समन्वय की बजार्य मनमुटार्व तथार् तनार्व घर कर जार्तार् है। दोनों पक्ष एक दूसरे की आलोचनार् करते हुए दिखाइ देते हैं, जिससे औद्योगिक इकार्इ व संगठन के उद्देश्यों की प्रार्प्ति असंभव हो जार्ती है। अतएव परिवेदनार्ओं क सम्यक् व त्वरित समार्धार्न अति आवश्यक है।

मोटेतौर पर, ऐसी सभी लिखित शिकायतें, जो मजदूरी, भुगतार्न, अधिसमय कार्य, छुट्टी, स्थार्नार्ंतरण, पदोन्नति, वरिष्ठतार्, सेवार् मुक्ति, सेवार् अनुबन्ध के विवेचन, कार्य की दशार्ओं यार् किसी फोरमैन, सुपरवार्इजर, मशीन व औजार्र, कैण्टीन एवं मनोरंजन की सुविधार्ओं आदि से सम्बन्धित हों, वे सभी परिवेदनार् के अन्तर्गत आती हैं। परिवेदनार् को विभिन्न विद्वार्नों ने परिभार्षित कियार् है :

  1. डेल बीच के विचार्र से, ‘‘परिवेदनार् ऐसे असंतोष व अन्यार्य की भार्वनार् है, जो एक व्यक्ति अपने रोजगार्र की स्थिति में अनुभव करतार् है और जिसके लिए प्रबन्धक क ध्यार्न आकृष्ट कियार् जार्तार् है।’’
  2. रिचर्ड पी0 कैल्हून के अनुसार्र, ‘‘ परिवेदनार् कोर्इ भी ऐसी स्थिति है, जिसे कोर्इ कर्मचार्री सोचतार् यार् समझतार् है कि वह गलत है; तथार् सार्मार्न्यतयार् उससे कर्मचार्री को भार्वनार्त्मक व्यार्कुलतार् की अनुभूति होती है।’’ 
  3. मार्इकेल जे0 जूसियस के अनुसार्र, ‘‘परिवेदनार् किसी प्रकार क असंतोष है, चार्हे वह अभिव्यक्त कियार् गयार् हो अथवार् नहीं और चार्हे वह वैध हो अथवार् नहीं, जिसक सम्बन्ध उसकी कम्पनी से है, तथार् जिसके बार्रे में कर्मचार्री सोचतार् है, विश्वार्स करतार् है यार् सिर्फ अनुभव करतार् है कि अमुक कार्य अनुचित, अन्यार्यपूर्ण व असमार्नतार् मूलक है।’’ 
  4. पीगर्स एवं मार्यर्स ने लिखार् है कि ‘‘परिवेदनार् औपचार्रिक रूप से लिखित असंतोष है, जो संगठन की कार्य प्रणार्ली द्वार्रार् उत्पन्न होतार् है। शिकायत करने वार्लार् व्यक्ति संगठन के क्रियार् कलार्प को अनुचित, अन्यार्यपूर्ण, गलत एवं असमार्न समझतार् है।’’ 

कुछ संगठनों ने भी परिवेदनार् की परिभार्षार् की है, जो है :-

  1. रार्ष्ट्रीय श्रम आयोग के अनुसार्र, ‘‘जो शिकायतें एक यार् अधिक श्रमिकों के मजदूरी भुगतार्न, अधिनियम, छुटी, स्थार्नार्ंतरण, पदोन्नति, वरिष्ठतार्, कार्य सार्ंपै ने, कार्य की दशार्ओं, रोजगार्र संविदार् के निर्वचन, पदमुक्ति तथार् कार्य से निकाले जार्ने से सम्बन्धित हों, परिवार्द की श्रेणी आती हैं। किन्तु जहार्ँ समस्यार्एं सार्मार्न्य रूप से लार्गू होने वार्ली हों यार् जो अधिक महत्वपूर्ण हों, वे परिवेदनार् प्रक्रियार् के अन्तर्गत नहीं आयेंगी।’’ 
  2. सोसार्यटी फॉर एडवार्ंसमेंट ऑफ मैनेजमेन्ट के अनुसार्र, ‘‘परिवेदनार् किसी कर्मचार्री, श्रम संघ यार् नियोक्तार् द्वार्रार् किसी आरोप के रूप में की गयी औपचार्रिक शिकायत है, जिसक सम्बन्ध किसी सार्मूहिक सौदार्कारी के संविदार्, कम्पनी की नीतियों अथवार् अन्य किसी समझौते के उल्लंघन से हो।’’ 

उक्त परिभार्षार्ओं से स्पष्ट होतार् है कि परिवेदनार् न केवल कर्मचार्रियों अपितु नियोक्तार् अथवार् प्रबन्धन द्वार्रार् भी प्रस्तुत की जार् सकती है। परिवार्दकर्तार् द्वार्रार् प्रस्तुत लिखित शिकायत, अपने अधिकारों की मार्ंग तथार् उसके लिए प्रदर्शन आदि परिवेदनार् मार्नी जार् सकती है। किन्तु, वही बार्त परिवेदनार् कहलार्ती है, जो कर्मचार्री को गलत अथवार् अन्यार्यपूर्ण प्रतीत होती हो तथार् उससे वह परेशार्न अथवार् तनार्वग्रस्त रहतार् हो।’’

परिवेदनार् के तत्व 

  1.  श्रमिकों द्वार्रार् अपने अधिकारों की मार्ँंग; 
  2. श्रमिकों की सुरक्षार् एवं कल्यार्ण से सम्बन्धित समस्यार्एं; तथार्; 
  3.  कर्मचार्रियों की व्यक्तिगत एवं कार्य सम्बन्धी रूचियार्ँ एवं अभिरूचियार्ँ 

असंतोष, शिकायत एवं परिवेदनार् में अन्तर 

पीगर्स एवं मार्यर्स ने असंतोष, शिकायत एवं परिवेदनार् में अन्तर स्पष्ट करते हुए लिखार् है कि वस्तुत: ये परिवेदनार् के विभिन्न चरण हैं।

  1. असंतोष : कर्मचार्री की कार्य के प्रति अथवार् कार्य की शर्तों व दशार्ओं के प्रति अनुभूति है जो वह कार्यस्थल पर अपनी भूमिकाअें के निर्वहन के दौरार्न अनुभव करतार् है। कार्य की विभिन्न दशार्एं व परिस्थितियार्ँ, कार्मिक की रूचि अथवार् अपेक्षार्ओं अथवार् प्रबन्धकों द्वार्रार् पूर्व में दिए गये आश्वार्सनों के अनुरूप न होने पर असंतोष उत्पन्न होतार् है। यह परिवेदनार् क प्रथम चरण है। असंतोष जब तक कर्मचार्री के द्वार्रार् अभिव्यक्त नहीं कियार् जार्तार् तब तक वह व्यक्ति-केन्द्रित ही रहतार् है व उसे व्यक्तिगत असंतोष के रूप में ही लियार् जार्तार् है।
  2. शिकायत : असंतोष की अभिव्यक्ति क सार्धन है। जब कर्मचार्री अपने असंतोष को मौखिक अथवार् लिखित रूप में समुचित रूप से अधिकारियों व प्रबन्धकों के सम्मुख व्यक्त करतार् है तो वह शिकायत कहलार्ती है। शिकायत परिवेदनार् क द्वितीय चरण है। शिकायत मनगढ़न्त हो सकती है और वार्स्तविक भी। शिकायत कार्य की अवस्थार्ओं, व्यवस्थार्ओं यार् परिस्थितियों के प्रति हो सकती है तथार् किसी व्यक्ति विशेष के प्रति भी।
  3. परिवेदनार्एं: अंतिम चरण है। असंतोष की भार्ँति परिवेदनार् भी प्रकट अथवार् अप्रकट हो सकती है। अप्रकट परिवेदनार्ओं क निवार्रण सम्प्रेषण के अभार्व में सम्भव नहीं हो पार्तार्, जिससे कर्मचार्रियों में कार्य असंतोष बढ़तार् है व उनक मनोबल गिरतार् है। परिवेदनार्ओं क सम्यक् निवार्रण न होने पर औद्योगिक विवार्दों क जन्म होतार् है, जो औद्योगिक शार्ंति के लिए घार्तक सिद्ध होतार् है।

अत: ऐसी प्रणार्ली अथवार् व्यवस्थार् क निर्मार्ण आवश्यक है कि कर्मचार्री बिनार् किसी भय के अपने असंतोष, शिकायत व परिवेदनार्ओं क समय से प्रकटन कर सकें, तार्कि इनक त्वरित समार्धार्न खोजार् जार् सके।

परिवेदनार् के कारण 

जब कभी कर्मचार्री के हितों एवं अधिकारों क अतिक्रमण कियार् जार्तार् है, तो वह असंतोष अनुभव करतार् है और तदनन्तर समुचित ्ररूप से परिवार्द प्रस्तुत करतार् है। सार्धार्रणतयार् परिवेदनार्एं कम्पनी की नीतियों, नियमों एवं व्यवहार्रों को गलत ढंग से लार्गू करने के परिणार्मस्वरूप उत्पन्न होती हैं। अमेरिकी श्रम विभार्ग ने परिवेदनार्ओं को दो भार्गों में बार्ंटार् है : –

  1. श्रमिक परिवेदनार्एं तथार् 
  2. प्रबंधकीय(नियोक्तार्) परिवेदनार्ए।

परिवेदनार् निवार्रण प्रक्रियार् की आवश्यकतार् 

परिवेदनार्, चार्हे वह श्रमिक वर्ग की हो अथवार् प्रबन्धन की, उसक त्वरित निवार्रण होनार् आवश्यक है, क्योंकि :

  1. अधिकांश परिवेदनार्एँ श्रमिकों के मनोबल, उत्पार्दकतार् एवं सहयोग की भार्वनार् को कम कर देती है,, जिससे श्रमिक अशार्ंति फैलने क भी खतरार् हो सकतार् हैं। 
  2. परिवेदनार् निवार्रण प्रक्रियार् प्रशार्सन के ऊपर एक अंकुश क कार्य करती है और प्रबन्धकों को अविवेकपूर्ण निर्णय लेने से रोकती है। 
  3. कर्मचार्रियों में निरार्शार् और असंतोष कम करने तथार् उनके अधिकारों की रक्षार् करने मे परिवेदनार् निवार्रण की एक सुनिश्चित प्रणार्ली एवं प्रक्रियार् होने पर सफलतार् मिल सकती हैं। 
  4. कर्मचार्रियों के रोष को कम करने में यह प्रक्रियार् एक सुरक्षार् उपकरण क काम करती है। क्योंकि इस प्रक्रियार् से उन्हें न्यार्य प्रार्प्त करने क एक वैधार्निक रार्स्तार् मिल जार्तार् है। यह प्रक्रियार् श्रमिक समस्यार्ओं पर विचार्र विनिमय क अवसर देती हैं। 
  5. परिवेदनार् की प्रस्तुति एक ऊध्र्व  सम्प्रेषण है, जिससे शिखर पब्र न्धक कर्मचार्रियों की निरार्शार्ओं, समस्यार्ओं, अपेक्षार्ओं व कल्यार्ण सम्बन्धी आवश्यकतार्ओं से परिचित हो जार्तार् है। इससे कम्पनी के विस्तार्र आदि की योजनार्एँ बनार्ते व नीति निर्धार्रण के समय श्रमिक वर्ग के हितों क संरक्षण होने की संभार्वनार् बढ़ जार्ती है। 

परिवेदनार् निवार्रण क्रियार्विधि की पूर्व शर्ते 

परिवेदनार् निवार्रण प्िर क्रयार् की सफलतार् की पूर्व शर्त हैं, जिन पर ध्यार्न दियार् जार्नार् आवश्यक है:-

  1. परिवेदनार् निवार्रण क्रियार्विधि सरल एवं शीघ्र निर्णय लेने वार्ली होनी चार्हिए।
  2. इस क्रियार् विधि में कम से कम औपचार्रिकतार्एँ हों, व समस्यार् समार्धार्न की समयार्वधि निश्चित हो।
  3. सम्पूर्ण प्रणार्ली को चरणों में विभार्जित कियार् जार्नार् चार्हिए। प्रत्येक चरण की कार्यवार्ही पूर्ण करने की समय सीमार् निर्धार्रित की जार्नी चार्हिए।
  4. परिवेदनार् निवार्रण क्रियार् विधि वार्स्तव में सार्मूहिक सौदेबार्जी क ही एक रूप है। अत: इस प्रक्रियार् में श्रम संघ एवं उसके प्रतिनिधियों क सक्रिय सहयोग सुनिश्चित कियार् जार्नार् चार्हिए। 
  5. परिवेदनार् प्रस्तुत करने वार्ले प्रत्येक व्यक्ति को अपनी समस्यार् पर विचार्र विमर्श क पर्यार्प्त अवसर मिलनार् चार्हिए। उसे यह ज्ञार्त रहनार् चार्हिए कि परिवेदनार् प्रणार्ली के विभिन्न स्तरों पर किस प्रकार कार्यवार्ही की जार् रही है।
  6. निर्णय निष्पक्ष होने चार्हिए तथार् इसमें परिवेदनार् निवार्रण के सिद्धार्न्तों क पार्लन कियार् जार्नार् चार्हिए।
  7. परिवेदनार् निवार्रण क्रियार् विधि में सभी स्तरों पर प्रक्रियार्ओं एवं तथ्यों के अभिलेखन की स्पष्ट व सरल प्रणार्ली होनी चार्हिए, तार्कि निर्णयों में एकरूपतार् रहे व पार्रदर्शितार् बनी रहे।

परिवेदनार् निवार्रण प्रक्रियार् के प्रमुख तत्व 

  1. परिवेदनार् निवार्रण प्रक्रियार् क प्रमुख उद्देश्य कर्मचार्रियों एवं प्रबन्धकों में अच्छे सम्बन्ध बनार्नार् है। अत: प्रक्रियार् तथार् प्रचलित नियमों एवं कानूनों में तार्लमेल होनार् चार्हिए। 
  2. परिवेदनार् निवार्रण प्रक्रियार् में लचीलार्पन होनार् चार्हिए तार्कि समय एवं परिस्थितियों के अनुसार्र उसमें परिवर्तन लार्यार् जार् सके। 
  3. परिवेदनार् प्रक्रियार् सरल एवं सभी कर्मचार्रियों के लिए सुगम होनी चार्हिए। 
  4. सार्धार्रणतयार् मार्मले को दो स्तरों से ऊपर नहीं ले जार्नार् चार्हिए तथार् निर्णय से असन्तोष की दशार् में परिवेदनार्कर्तार् को शिखर प्रबन्धक के पार्स अपील करने क अधिकार होनार् चार्हिए। 
  5. परिवेदनार्एँ प्रार्प्त करने के लिए एक सक्षम अधिकारी क नियुक्ति होनी चार्हिए, तार्कि कर्मचार्री को यह पतार् रहे कि परिवेदनार् किसके पार्स प्रस्तुत करनी हैं। 
  6. परिवेदनार् निवार्रण समिति क आकार यथार्संभव छोटार् होनार् चार्हिए, जिसमें अधिक से अधिक 4 से 6 सदस्य हो। 
  7. परिवेदनार् निवार्रण समिति में प्रबन्धन क प्रतिनिधित्व कम से कम विभार्गीय स्तर के प्रबन्धकों द्वार्रार् ही कियार् जार्नार् चार्हिए। 

परिवेदनार् निवार्रण के सिद्धार्न्त 

मार्इकेल जे0 ज्यूसियस ने परिवेदनार् निवार्रण के समय अपनार्ए जार्ने वार्ले 4 सिद्धार्न्त बतार्ए हैं।

1.सार्क्षार्त्कार क सिद्धार्न्त –

इस सिद्धार्न्त के अन्तर्गत यह प्रतिपार्दित कियार् गयार् है कि अच्छे औद्योगिक सम्बन्ध बनार्ए रखने के लिए प्रबन्धकों को चार्हिए कि वे कर्मचार्रियों से यदार् कदार् बार्तें पूछते रहें :-

  1. उनक हार्ल चार्ल व आरार्म की स्थिति 
  2. व्यक्तिगत सम्बन्धों क निर्मार्ण एवं संधार्रण 
  3. कार्य के प्रति चौकसी एवं लोच 

सार्थ ही, प्रबन्धकों को कर्मचार्रियों से बार्त करते समय कार्य करने चार्हिए :-

  1. कर्मचार्रियों से अनौपचार्रिक ढंग से बार्त करनार्। 
  2. कर्मचार्रियों की भार्वनार्ओं को समझनार् एवं उन्हें सद्भार्व से सुननार्। 
  3. समस्यार्ओं को सही ढंग से समझनार् एवं समझार्नार्। 
  4. बार्त के लिए सुविधार्जनक वार्तार्वरण क निर्मार्ण करनार्। 
  5. उनकी बार्त क भार्वाथ समझने क यत्न करनार्। 
  6. बार्तचीत क निष्कर्ष निकालनार्। 
  7. महत्वपूर्ण बार्तों को लेखबद्ध करनार्। 

2. कर्मचार्रियों के प्रति प्रबन्धकों की मनोवृत्ति क सिद्धार्न्त –

प्रबन्धकों को कर्मचार्रियों के प्रति सकारार्त्मक दृष्टिकोण रखनार् चार्हिए। किसी भी परिस्थिति में पूर्वार्ग्रह यार् पक्षपार्त से काम नहीं लेनार् चार्हिए। प्रबन्धक को अपनी बुद्धि क प्रयोग करते हुए शिकायत क औचित्य निर्धार्रण करनार् चार्हिए तथार् निर्णय काफी सोच समझकर विवेकपूर्ण ढंग से करनार् चार्हिए। एक भी गलत निर्णय प्रबन्धन की प्रतिष्ठार् एवं विश्वसनीयतार् को हार्नि पहुँचार् सकतार् है। प्रबन्धकों को कर्मचार्रियों की परिवेदनार् सुनने में रूचि दिखार्नी चार्हिए। उनके प्रति सद्भार्वनार् क परिचय देनार् चार्हिए। परन्तु यह भी ध्यार्न रहे कि झूठी शिकायतों व मनगढ़न्त बार्तों पर आसार्नी से विश्वार्स न करके उनकी जार्ँच करार्यी जार्ए। तभी यह प्रतिष्ठार्न के सर्वोत्तम हित में रहेगार्।

3. प्रबन्धकों के उत्तरदार्यित्व क सिद्धार्न्त –

कर्मचार्रियों की परिवेदनार्ओं के प्रति उचित अथवार् अनुचित निर्णय के लिए प्रबन्धकों क उत्तरदार्यित्व होतार् है। कर्मचार्रियों को यह पूर्ण विश्वार्स होनार् चार्हिए कि प्रबन्धक उनके लिए अहितकारी कदम कभी नहीं उठार्एँगें। प्रबन्धकों में कर्मचार्रियों क यह सद्विश्वार्स ही औद्योगिक शार्ंति को प्रोत्सार्हन देतार् है। अत: प्रबन्धकों क यह दार्यित्व है कि वे कर्मचार्रियों में अपनी विश्वसनीयतार् कायम करें।

4. दीर्घकालीन सिद्धार्न्त –

किसी भी निर्णय से पहले प्रबन्धकों को संगठन के दीर्घकालीन हितों को ध्यार्न में रखनार् चार्हिए। कर्इ बार्र कर्मचार्रियों की तार्त्कालिक प्रसन्नतार् को ध्यार्न में रखकर लिए गये निर्णयों से दीर्घ काल में संगठन को अत्यधिक हार्नि उठार्नी पड़ सकती है, जिससे न केवल गलत परम्परार् स्थार्पित होगी, वरन् कर्मचार्रियों क भी दीर्घकालीन हित प्रभार्वित होगार्। इस प्रकार, यह ध्यार्न रखनार् चार्हिए कि परिवेदनार् निवार्रण क अंतिम उद्देश्य औद्योगिक शार्ंति को प्रोत्सार्हन देनार् है। इस उद्देश्य की प्रार्प्ति के लिए उचित सम्प्रेषण प्रणार्ली क उपयोग, कर्मचार्रियों से निरन्तर संपर्क एवं अनौपचार्रिक वातार्लार्प, शिकायतों को सद्भार्व पूर्वक सुननार् व उनके औचित्य क पक्षपार्त एवं पूर्वार्ग्रहरहित निर्धार्रण तथार् संगठन के दीर्घकालीन हितों को ध्यार्न में रखते हुए उचित निर्णय लेनार् आवश्यक है।

श्रम संघ वार्ले संगठन में परिवेदनार् निवार्रण प्रक्रियार् 

  1. प्रथम चरण (पर्यवेक्षकीय स्तर) में तीन व्यक्ति होते हैं – कर्मचार्री, पर्यवेक्षक तथार् श्रम सघ क प्रतिनिधि। परिवेदनार् मौखिक यार् लिखित रूप में प्रस्तुत की जार्ती है। यदि पर्यवेक्षक चतुर, बुद्धिमार्न व समस्यार् निवार्रण में कुशल हो तो अधिकांश परिवेदनार्ओं क निवार्रण तत्काल कियार् जार् सकतार् है। 
  2. द्वितीय चरण (विभार्गीय प्रबन्धक स्तर) में उच्चस्तरीय अधिकारी, मुख्य व्यार्वसार्यिक प्रतिनिधि, अधीक्षक, औद्योगिक सम्बन्ध अधिकारी यार् कार्मिक प्रबन्धक हो सकतार् है। प्रथम चरण में परिवेदनार् निवार्रण न हो सकने पर पर्यवेक्षक द्वार्रार् परिवेदनार् लिखित रूप में उच्चस्तरीय अधिकारी के पार्स भेजी जार्ती है। यह अधिकारी अपने स्तर से परिवेदनार् क निवार्रण करने में कर्इ बार्र सफल हो जार्तार् है।
  3. तृतीय चरण (समिति स्तर) – द्वितीय स्तर पर असफलतार् मिलने पर परिवेदनार् को परिवेदनार् समिति के पार्स भेजार् जार्तार् है। इस समिति में नियोक्तार् व श्रम संघ दोनों के प्रतिनिधि होते हैं। परिवेदनार् लिखित रूप में प्रस्तुत की जार्ती है तथार् उसक निवार्रण करने की यह समिति पूरी चेष्टार् करती है। 
  4. चतुर्थ चरण (शीर्ष प्रबन्धन स्तर) – समिति स्तर पर परिवेदनार् क संतोषजनक निवार्रण न होने पर उसे शिखर प्रबन्धक के सुपुर्द कर दियार् जार्तार् है।
  5. पंचम चरण (पंच निर्णय) – चतुर्थ चरण में संतोषजनक समार्धार्न न हो पार्ने पर अंतिम रूप से परिवेदनार् को एक स्वतंत्र व निष्पक्ष व्यक्ति को पंच निर्णय के लिए सार्ंपै दी जार्ती है। इस स्तर पर सरकार भी नियमार्नुसार्र हस्तक्षेप कर सकती है। पंच निर्णय को दोनों पक्षों को मार्ननार् पड़तार् है। 

भार्रत में परिवेदनार् निवार्रण प्रक्रियार् 

भार्रतीय श्रम सम्मेलन (1928) मेंं परिवेदनार् निवार्रण के लिए त्रिपक्षीय व्यवस्थार् अपनार्यी गयी, जो इस प्रकार है :-

  1. प्रबन्धक तथार् श्रम संघ मिलकर आपसी समझौते के आधार्र पर एक ऐसी परिवेदनार् निवार्रण क्रियार् विधि निश्चित करेंगे, जिससे समस्यार् निवार्रण की दशार् में सम्पूर्ण जार्ँच पड़तार्ल तथार् शीघ्र निर्णय संभव हो सके। 
  2. वे दोनों पक्ष किसी एकतरफार् निर्णय पर नहीं पहुँचेगें। 

वे परिवेदनार् निवार्रण प्रक्रियार् क पूर्ण पार्लन करेंगे। सम्मेलन में एक परिवेदनार् समिति के गठन क सुझार्व दियार् गयार् थार्। इस समिति क गठन  होगार् :

  1. इस समिति में 4 से 6 सदस्य होंगे। 
  2. इस समिति क गठन प्रत्येक उद्योग के लिए कियार् जार्एगार्। 
  3. जहार्ँ श्रम संघ को मार्न्यतार् दी गयी हो, वहार्ँ प्रबन्धन के 2 प्रतिनिधि, श्रम संघ क एक प्रतिनिधि, तथार् परिवेदनार् से सम्बन्धित विभार्ग क एक प्रतिनिधि समिति में होनार् चार्हिए। 
  4. जहार्ँ श्रम संघ की मार्न्यतार् न हो, वहार्ँ संघ के प्रतिनिधि के स्थार्न पर कर्मचार्री कार्य समिति क एक सदस्य रखार् जार्तार् है।
  5. प्रबन्धकीय प्रतिनिधि सम्बन्धित विभार्ग क अध्यक्ष होनार् चार्हिए। परिवेदनार् निवार्रण प्रक्रियार् में दैनिक परिवेदनार्ओं को सुलझार्ने के लिए सार्मूहिक समझौतार् प्रणार्ली क उपयोग कियार् जार्तार् है। इस प्रक्रियार् के तीन भार्ग होते है : 
  1. विभार्गीय प्रतिनिधि 
  2. परिवेदनार् समिति यार् कार्य समिति 
  3. पंच निर्णय 

उपरोक्त प्रक्रियार् सेवार् मुक्ति यार् निष्कासन के परिवार्द में लार्गू नहीं होती। ऐसी अवस्थार् में निष्कासन करने वार्ले अधिकारी के पार्स निष्कासन आदेश निकलने के एक सप्तार्ह की अवधि में अपील की जार् सकती है।

आदर्श परिवेदनार् निवार्रण प्रक्रियार् 

आदर्श परिवेदनार् निवार्रण प्रक्रियार् की व्यवस्थार् सभी श्रमिकों की परिवेदनार्ओं के सम्यक निवार्रण के द्वार्रार् उन्हें न्यार्य दिलार्ने की दृष्टि से अपनार्यी जार् सकती है। इसके अन्तर्गत प्रत्येक इकार्इ में यह व्यवस्थार् की जार्ती है कि एक परिवेदनार् निवार्रण मशीन ही कायम की जार्ये। इस मशीनरी क गठन करने के लिए प्रत्येक विभार्ग (यदि विभार्ग छोटार् हो तो विभार्गों के एक समूह से प्रतिनिधि चयन कर भेजे जार्ते हैं। प्रत्येक पार्री के लिए अलग-अलग प्रतिनिधि होते हैं। ये प्रतिनिधि कम से कम एक वर्ष की अवधि के लिए कार्य करते हैं। यदि किसी संघ द्वार्रार् सर्वसम्मति से चुने गये प्रतिनिधियों की सूची प्रबन्धकों को दे दी जार्ती है, तो चयन करने की आवश्यकतार् नहीं पड़ती। दो यार् तीन विभार्गीय श्रम प्रतिनिधि एवं दो यार् तीन विभार्गार्ध्यक्ष मिलकर परिवेदनार् निवार्रण समिति करते हैं। प्रबन्धन की ओर से प्रत्येक विभार्ग में मनोनीत सदस्य के पार्स सर्वप्रथम कोर्इ विवार्द प्रस्तुत कियार् जार्तार् है। बार्द में यह परिवार्द विभार्गीय अध्यक्षों के पार्स प्रस्तुत कियार् जार्तार् है। सेवार् मुक्ति आदि मार्मलों में अपील के लिए प्रबन्धक द्वार्रार् सक्षम अधिकारी क मनोनयन कर दियार् जार्तार् है। परिवेदनार् प्रक्रियार् एवं निर्णय को लार्गू करने की प्रक्रियार् इस प्रकार चलती है :

परिवार्द निर्णय की दिशार् निर्णय पार्लन की दिशार्

शीर्ष प्रबन्धक

शीर्ष प्रबन्धक

अधीक्षक

अधीक्षक
 ↓

पर्यवेक्षक

पर्यवेक्षक

श्रमिक

 श्रमिक

परिवेदनार् निवार्रण प्रक्रियार् –

  1. एक असन्तुष्ट कर्मचार्री सर्वप्रथम अपनी परिवेदनार् निकटस्थ सक्षम अधिकारी को मौखिक रूप से प्रस्तुत करेगार्। यह अधिकारी 48 घंटे में अपनार् प्रत्युत्तर देगार्। 
  2. प्रत्युत्तर से असंतुष्ट होने यार् निर्धार्रित अवधि में उत्तर प्रार्प्त न होने पर वह यार् तो व्यक्तिगत रूप से यार् फिर अपने संघ के प्रतिनिधि के मार्ध्यम से परिवेदनार् को संबंधित विभार्गार्ध्यक्ष के सम्मुख प्रस्तुत करेगार्। (इस कार्य के लिए विभार्ग में दिन व समय निश्चित किये जार्एँ, जब कि कर्मचार्री अपनार् परिवार्द प्रस्तुत कर सके।) विभार्गीय अध्यक्ष अपनार् निर्णय परिवेदनार् प्रार्प्त होने के तीन दिन बार्द देगार्। यदि निर्धार्रित अवधि में निर्णय न दे सकेगार् तो उसक कारण स्पष्ट करेगार्। 
  3. विभार्गीय अध्यक्ष से सअन्तुष्ट रहने पर परिवार्द कर्तार् अपनी परिवेदनार् को परिवेदनार् समिति के पार्स अगे्िर “ार्त करने की पार््र थर्न ार् कर सकतार् है। पार््र थर्न ार् पत्र प्रार्प्त होने से 7 दिन की अवधि में यह समिति अपनी सिफार्रिशें प्रबन्धन को भेज देगी। इस अवधि में सिफार्रिश न कर पार्ने पर परिवेदनार् समिति कारण स्पष्ट करेगी। परिवेदनार् समिति की सिफार्रिशें प्रबन्धकों द्वार्रार् निर्विवार्द रूप से लार्गू की जार्एंगी; यदि समिति के सदस्यों में मतभेद होगार् तो सभी सम्बन्धित सूचनार्एँ व आलेख प्रबन्धक के सार्मने रखे जार्एँगे, जिसक निर्णय अंतिम होगार् व इस निर्णय को तीन दिन में सम्प्रेषित कर दियार् जार्एगार्। 
  4. यदि प्रबन्धक निर्धार्रित अवधि में अपनार् निर्णय न दे सके अथवार् निर्णय असंतोषजनक हो तो श्रमिक इसके पुनरार्वलोकन हेतु निवेदन कर सकतार् है। इस प्रकार की अपील के समय संघ के प्िर तनिधि भी भार्ग ले सकते हैं। पब्र न्धकों की ओर से इस पुनरार्वलोकन अपील पर एक सप्तार्ह में निर्णय देने की व्यवस्थार् है। 
  5. उक्त निर्णय पर असहमति होने पर श्रम संघ एवं प्रबन्धक मिलकर मार्मले के ऐच्छिक पंच निर्णय के लिए भेज सकते हैं। यह अग्रप्रेषण प्रबन्धक के निर्णय के उपरार्न्त 7 दिन की अवधि में ही कियार् जार् सकतार् है। 
  6. एक परिवेदनार् उस समय विवार्द बन जार्ती है, जब परिवेदनार् निवार्रण की दृष्टि से प्रबन्धक द्वार्रार् दियार् गयार् अन्तिम निर्णय भी श्रमिक को मार्न्य न हो। बिन्दु 1 से 5 तक श्रमिक द्वार्रार् की गयी कार्यवार्ही में समझौतार् संयंत्र तब तक किसी प्रकार क हस्तक्षेप नहीं करेगी, जब तक कि सभी सार्धनों क उपयोग करने पर भी समार्धार्न प्रार्प्त न हो सक हो।
  7. यदि प्रबन्धक द्वार्रार् लिए गये किसी निर्णय के फलस्वरूप कोर्इ परिवेदनार् उत्पन्न होती है तो पहले श्रमिक आदेश क पार्लन करेगार्, तत्पश्चार्त् परिवेदनार् प्रस्तुत कर सकेगार्। यदि आदेश निकलने तथार् लार्गू होने में कुछ अन्तर है तो परिवेदनार् तुरन्त प्रस्तुत की जार् सकेगी, परन्तु श्रमिक को फिर भी आदेश क पार्लन करनार् पड़ेगार्। प्रबन्धक को सलार्ह दी जार्ती है कि वह परिवेदनार् निवार्रण प्रक्रियार् में प्रार्प्त मार्मले के सभी तथ्यों पर पूरार् विचार्र कर ही निर्णय दे।
  8. परिवेदनार् समिति में श्रमिक प्रतिनिधि मार्मले की जार्ँच पड़तार्ल से सम्बन्धित किसी भी दस्तार्वेज क अवलोकन कर सकतार् है। किन्तु प्रबन्धकीय प्रतिनिधि ऐसी सूचनार् यार् प्रमार्ण उपलब्ध करार्ने से मनार् कर सकतार् है, जिसे वह गोपनीय समझतार् हो। ऐसे गोपनीय प्रमार्णों क प्रयोग परिवेदनार् प्रक्रियार् के अन्तर्गत श्रमिक के विरूद्ध नहीं कियार् जार्एगार्। 
  9. एक चरण से दूसरे चरण पर अपील करते समय समयार्वधि क ध्यार्न अवश्य रखार् जार्नार् चार्हिए।इस उद्देश्य से श्रमिक निर्णय प्रार्प्त करने के उपरार्ंत यार् निश्चित अवधि में निर्णय नहीं प्रार्प्त होने पर 72 घंटों में उच्च चरण पर अपील कर सकतार् है। 
  10. अपील क समय निर्धार्रित करने में किसी भी स्तर पर छुट्ठी क दिन शार्मिल नहीं कियार् जार्एगार्। 
  11. प्रबन्धन परिवेदनार् प्रक्रियार् के संचार्लन हेतु लिपिकीय व अन्य कर्मचार्रियों की व्यवस्थार् करेंगे।परिवेदनार् निवार्रण प्रक्रियार् के अन्तर्गत बुलार्ए जार्ने पर यदि श्रमिक को कार्य छोड़ कर जार्नार् पड़े तो उसे अपने अधिकारी से पूर्व अनुमति प्रार्प्त करनार् आवश्यक होगार्। इस प्रक्रियार् में श्रमिक को किसी प्रकार की हार्नि नहीं होगी। 
  12. यदि किसी ऐसे व्यक्ति के खिलार्फ परिवेदनार् प्रस्तुत की गयी हो, जो परिवेदनार् निवार्रण प्रक्रियार् क हिस्सार् हो, तो श्रमिक अपनार् मार्मलार् विभार्गीय अध्यक्ष के पार्स ले जार् सकतार् है।
  13. निष्कासन यार् पदमुक्ति के प्रबन्धकीय निर्णय के विरूद्ध दार्यर परिवेदनार् के मार्मले में उपर्युक्त प्रक्रियार् लार्गू नहीं होगी। उस दशार् में प्रभार्वित श्रमिक स्वयं को पदमुक्त करने वार्ले अधिकारी यार् प्रबन्धक द्वार्रार् मनोनीत किसी वरिष्ठ अधिकारी के समक्ष अपील कर सकतार् है। यह अपील आदेश प्रार्प्ति के एक सप्तार्ह के अन्दर हो जार्नार् चार्हिए। अपील की सुनवाइ के समय श्रमिक यदि चार्हे तो किसी सहयोगी यार् श्रम संघ के प्रतिनिधि को अपने सार्थ रख सकतार् है।

व्यवस्थित परिवेदनार् निवार्रण प्रक्रियार् के लार्भ 

संस्थार्न में व्यवस्थित परिवेदनार् निवार्रण प्रणार्ली के उपलब्ध होने से सार्मार्न्य असंतोष बड़े विवार्द क रूप नहीं ले पार्ते। सुनियोजित परिवेदनार् प्रक्रियार् के लार्भ है :-

  1. इससे प्रत्येक कर्मचार्री को यह संज्ञार्न रहतार् है कि किस व्यवस्थित श्रंख्ृ ार्लार् क अनुगमन कर वह अपनी परिवेदनार् वैधार्निक रूप से व्यक्त सकतार् है। 
  2. पूर्व निर्धार्रित प्रक्रियार् को अपनार्कर किसी भी परिवेदनार् को ठीक से समझार् व उसक निपटार्रार् कियार् जार् सकतार् है। 
  3.  यह ऐसार् उपकरण तैयार्र करतार् है जिससे कर्मचार्री अपनी भार्वनार्ओं को प्रस्तुत कर सकतार् हैं।
  4. यह प्रणार्ली परिवेदनार्एँ सुलझार्ने के एक प्रमुख सार्धन के रूप में काम करतीहै। 
  5. श्रम संघ एवं प्रबन्ध के बीच अच्छे सम्न्ध बनार्ए रखने तथार् कर्इ प्रकार की समस्यार्ओं क हल निकालने के लिए यह एक अच्छार् मार्ध्यम हो सकतार् है।
  6. कर्मचार्री की परिवेदनार् पर त्वरित कार्यवार्ही होने से उसे संतोष मिलतार् है तथार् औद्योगिक शार्ंति को बढ़ार्वार् मिलतार् है।
  7. इस प्रणार्ली में सम्प्रेषण क मार्ध्यम के रूप में उपयोग होतार् है।
  8. व्यवस्थित प्रणार्ली होने से परिवेदनार् सुलझार्ने में एकरूपतार् बनी रहती है। 
  9. श्रमिक वर्ग को अपनी परिवेदनार् व शिकायत के न्यार्यपूर्ण निस्तार्रण क विश्वार्स उत्पन्न हो जार्तार् है।
  10. व्यवस्थित प्रणार्ली होने पर हर कार्य नियमार्नुसार्र होतार् है। अत: निर्णय अधिक विश्वसनीय हो जार्ते है। 
  11. परिवेदनार् निवार्रण की व्यवस्थित प्रणार्ली होने पर इस प्रक्रियार् में कोर्इ व्यक्तिगत वैमनस्य उत्पन्न नहीं होतार्। 

इस प्रकार व्यवस्थित परिवेदनार् निवार्रण क्रियार्विधि से औद्योगिक विवार्दों व श्रमिकों की शिकायतों क त्वरित समार्धार्न हो जार्ने से औद्योगिक मार्हौल में सुधार्र होतार् है, जोकि उत्पार्दकतार् को बढ़ार्वार् देने वार्लार् सार्बित होतार् है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *