परार्मर्श के प्रकार

कुछ विद्वार्नों ने परार्मर्श के अन्य तीन प्रकारों क उल्लेख कियार् है यथार्-

  1. निदेशार्त्मक परार्मर्श-इस प्रकार के परार्मर्श में परार्मर्शक ही सम्पूर्ण प्रक्रियार् क निर्णार्यक होतार् है। प्रत्यार्शी परार्मर्शदार्तार् के ओदशों के अनुकूल अपने को ढार्लतार् है। इसे कभी-कभी आदेशार्त्मक परार्मर्श भी कहते हैं। इस क्रियार् के मूल में परार्मर्शक ही रहतार् है। 
  2. अनिदेशार्त्मक परार्मर्श-इस प्रकार के परार्मर्श मे  परार्मर्शप्राथी क विशेष महत्व होतार् है। इसमें वह अपनी समस्यार् प्रस्तुत करने तथार् समस्यार् के समार्ध ार्ार्न की प्रक्रियार् में बिनार् किसी शंक यार् संकोच के परार्मर्शक से रार्य मार्ँगतार् है। इसे सेवाथी-केन्द्रित परार्मर्श कहते हैं। इसकी विषद व्यार्ख्यार् आगे की जार्एगी। 
  3. समन्वित परार्मर्श-इसमें परार्मर्शक न अति सक्रिय रहतार् है और न अति उदार्सीन रहतार् है। उसकी भूमिक अत्यन्त मधुर एवं मुलार्यम होती है।

निदेशार्त्मक परार्मर्श 

विलियम्सन (1950) नार्मक विद्वार्न इसक जनक मार्नार् जार्तार् है। उसके अनुसार्र निदेशार्त्मक परार्मर्श में ताकिकतार् एवं प्रभार्व दोनों को ध्यार्न में रखार् जार्तार् है। उसने परार्मर्श को एक प्रभार्वकारी सम्बन्ध मार्नार् है और बल दियार् है कि इस में बहस, विश्लेशण, तर्क-वितर्क आदि सम्मिलित रहतार् है किन्तु यह परार्मर्श किसी भी प्रकार औपचार्रिक नहीं होने पार्तार्। इस प्रकार के परार्मर्श क सिद्धार्न्त विलियम्सन ने व्यार्वसार्यिक परार्मर्श से लियार् और बार्द में इसक समन्वयन शैक्षिक एवं व्यक्तित्व सम्बन्धी निर्देशन से कर दियार्। यह परार्मर्श सार्क्षार्त्कार एवं प्रश्नार्वली पद्धति से दियार् जार्तार् है विलि एव एण्ड्र ने अपनी पुस्तक ‘‘मार्डर्न मेथड्स एण्ड टेक्निकस इन गार्इडेंस’’ में निदेशार्त्मक परार्मर्श की निम्न विशेषतार्एँं बतार्यी हैं :

  1. परार्मर्शदार्तार् अधिक योग्य, प्रशिक्षित, अनुभवी एवं ज्ञार्नी होतार् है वह अच्छार् समस्यार् समार्धार्न दे सकतार् है। 
  2. परार्मर्श एक बौद्धिक प्रक्रियार् है। 
  3. परार्मर्श प्राथी पक्षपार्त व सूचनार्ओं के अभार्व में समस्यार् निदार्न नहीं कर सकतार्। 
  4. परार्मर्श क उद्देश्य समस्यार् समार्धार्न अवस्थार् मार्ध्यम से निर्धार्रित किये जार्ते हैं। 

निदेशार्त्मक परार्मर्श की मूलभूत मार्न्यतार्एँ- 

  1. इस परार्मर्श क उद्देश्य सेवाथी के व्यक्तित्व क अधिकतम विकास है। 
  2. प्रत्येक व्यक्ति की कुछ विशिष्टतार्एँ होती हैं। जिनक विकास समार्ज में रहकर ही हो सकतार् है। 
  3. परार्मर्श स्वैच्छिक होतार् है। 
  4. परार्मर्श की प्रकृति उपचार्रार्त्मक होती है। यह तभी उपलब्ध करार्यार् जार्तार् है जब समस्यार् उत्पन्न होती है। 
  5. परार्मर्श में मूल्यार्ंकन की व्यवस्थार् नही होती। 
  6. परार्मर्शदार्तार् की दृष्टि प्राथी की समस्यार्ओं तथार् वैयक्तिक विकास पर केन्द्रीत रहतार् है। 
  7. परार्मर्श प्राथी को सम्मार्न दियार् जार्तार् है।

निदेशार्त्मक परार्मर्श प्रक्रियार् में निहित सोपार्न-

  1. विश्लेशषार्त्मक-इसके अन्तर्गत सर्वप्रथम व्यक्ति के मूल्यार्कंन हते ु परार्मर्शदार्तार् व्यक्ति से सम्बन्धित सूचनार्एँ एवं आँकड़े एकत्र करतार् है। इसके अतिरिक्त वह संकलित अभिलेख, सार्क्षार्त्कार एवं अन्य लोगों की मदद भी लेतार् है। प्रदत्त्ार्ों के विश्लेषण हेतु चिकित्सीय मनोमित्त्ार्ीय एवं पार्श्र्वचित्र क प्रयोग कियार् जार्तार् है। 
  2. संश्लेषण-विलियम्स के अनुसार्र प्राथी से सम्बन्धित आँकडाऱ्ें एवं सूचनार्ओं को समझते हुए उसको सार्रार्ंश रूप में प्रस्तुत करने की क्रियार् पर बल दियार् जार्तार् है। इसके लिए प्रत्यार्शी से सार्क्षार्त्कार, वातार् एवं संगोश्ठी करके तथ्यों को इकट्ठार् कियार् जार्तार् है। 
  3. निदार्न-परार्मर्शप्राथी की समस्यार्ओं की पहचार्न इस स्तर पर की जार्ती है। समस्यार् के कारणों तक पहुॅचने क भी प्रयार्स कियार् जार्तार् है। 
  4. पूर्वार्मार्न-इस सोपार्न में प्रत्यार्शी की समस्यार्ओं के सम्बन्ध में पूर्व कथन किये जार्ते हैं। इसक स्वरूप मूलत: परिकल्पनार्त्मक होतार् है। 
  5. परार्मर्श-निदेशार्त्मक परार्मर्श में प्रयुक्त प्रार्य: यह अन्तिम सोपार्न हैं जिसमें प्रत्यार्शी से जार्नकारी प्रार्प्त करके समस्यार् क समार्धार्न कियार् जार्तार् है। 
  6. अनुगमन-इस स्तर पर प्रत्यार्शी को दिये गये परार्मर्श क पुनव्र्यवस्थार्पन कियार् जार्तार् है। विलियम्सन ने अनुगमन हेतु कर्इ सोपार्नों की चर्चार् की है, जैसे प्रत्यार्शी से सम्पर्क करनार्, प्रत्यार्शी में आत्म-विश्वार्स उत्पन्न करनार्, प्रत्यार्शी को निर्देशत करनार् कि वह अपनार् माग स्वयं निर्धार्रित कर ले, उसकी समस्यार्ओं की विषद् व्यार्ख्यार् करनार् आदि। यदि आवश्यकतार् हो तो प्रत्यार्शी को अन्य सक्षम कार्यकर्त्त्ार्ार्ओं के पार्स भी भेजार् जार् सकतार् है।
    1. विलियम्सन एवं डाले ने अपनी पुस्तक ‘‘स्टूडेन्टस परसनेल वर्क’’ में निम्न सोपार्नों क स्पश्ट उल्लेख कियार् है : 
    2. विभिन्न विधियों तथार् उपकरणों के मार्ध्यम से आँकड़े संग्रहित कर उनक विश्लेषण करनार्।
    3. आँकड़ों क यार्न्त्रिक व आकृतिक संगठन कर उनक संश्लेषण करनार् । 
    4. छार्त्र की समस्यार् के कारणों को ज्ञार्त कर निदार्न ज्ञार्त करनार्।
    5. परार्मर्श यार् उपचार्र। 
    6. मूल्यार्ंकन यार् अनुगमन। 

निदेशार्त्मक परार्मर्श के लार्भ- 

  1. इस प्रकार के परार्मर्श से समय की बचत होती है। 
  2. इस में समस्यार्ओं पर विशेष बल दियार् जार्तार् है। 
  3. परार्मर्शदार्तार् तथार् प्राथी में आमने-सार्मने बार्त होती है। 
  4. परार्मर्शदार्तार् क ध्यार्न प्रत्यार्शी की भार्वनार्ओं की अपेक्षार् उसकी बुद्धि पर टिकतार् है। 
  5. परार्मर्शदार्तार् सहज रूप में उपलब्ध रहतार् है।

निर्देशार्त्मक परार्मर्श की कमियार्ँ

  1. प्रत्यार्शी पूर्णतयार् परार्मर्शक पर निर्भर रहतार् है। 
  2. प्रत्यार्शी के स्वतन्त्र न होने के कारण उस पर परार्मर्श क प्रभार्व कम पड़तार् है। 
  3. प्रत्यार्शी के दृष्टिकोण क विकास न हो पार्ने के कारण वह अपनी समस्यार् क निरार्करण स्वयं नहीं कर पार्तार्। 
  4. परार्मर्शदार्तार् के प्रधार्न होने से प्राथी में अपनी क्षमतार्ओं को उत्पन्न करनार् कठिन हो जार्तार् है। 
  5. प्रत्यार्शी के विषय में अपेक्षित सूचनार्ओं के अभार्व में उत्त्ार्म परार्मर्श नहीं मिल पार्तार्। 
  6. परार्मर्शदार्तार् के अधिक महत्व से मनोवैज्ञार्निक प्रक्रियार् नही हो पार्ती। 

अनिदेशार्त्मक परार्मर्श 

निदेशार्त्मक परार्मर्श के प्रतिकूल यह प्रत्यार्शी केन्द्रित परार्मर्श है। इसमें प्रार्थ्र्ार्ी के आत्मज्ञार्न, आत्मसिद्धि तथार् आत्मनिर्भरतार् पर विशेष दृष्टि रखी जार्ती है। इसे समस्यार्-केन्द्रित परार्मर्श भी कहार् जार्तार् है। इस प्रकार के परार्मर्श के प्रमुख प्रवर्तक कार्ल रोजर्स मार्ने जार्ते हैं। यह परार्मर्श अपेक्षार्कृत नवीन है और इसके अन्तर्गत व्यक्तित्व विकास, समूह-नेतृत्व, शिक्षार् एवं अधिगम, सृजनार्त्मक आदि सम्मिलित है। परार्मर्शक ऐसे वार्तार्वरण क सृजन करतार् है जिसमें सेवाथी स्वतन्त्र रूप से इच्छार्नुसार्र अपनार् निर्मार्ण कर सके।

यह परार्मर्श प्रार्थ्र्ार्ी के इर्द-गिर्द घूमती हैं। इसमें प्राथी को आत्मप्रदर्शन, भार्वनार्ओं, विचार्रों एवं अभिवृित्त्ार्यों को रखने के लिये स्वतन्त्रतार् दी जार्ती है। परार्मर्शदार्तार् निरपेक्ष रहतार् है। वह बीच में बार्धक नहीं बनतार् और स्वयं दोनों के मध्य बेहतर समन्वयन क प्रयार्स करतार् है। इसमें खुले प्रश्न पूछे जार्ते हैं और ये प्रश्न हल्की संरचनार् के होते है। उत्त्ार्र परार्मर्श प्राथी स्वयं देतार् है। परार्मर्शदार्तार् प्रार्प्त जार्नकारी क विश्लेषण कर अर्थ निकालतार् है। प्राथी को बोलते समय सही विधार् के लिये प्रोत्सार्हित कियार् जार्तार् है और प्राथी को आभार्स होतार् है कि परार्मर्शदार्तार् उसके विचार्रों को सम्मार्न दे रहार् है। परार्मर्शदार्तार् सत्य को जार्नने हेतु प्रश्न नहीं पूछतार्। इस प्रक्रियार् में सभी को प्रशिक्षित मनोवैज्ञार्निक की तरह ही अधिकार होतार् है और प्राथी स्वयं विद्वार्न तथार् समझदार्र की तरह ही प्रतिक्रियार् करतार् है।

अनिदेशार्त्मक परार्मर्श की मार्न्यतार्एँ

  1. व्यक्ति के अस्तित्व में आस्थार्-रार्जे र्स व्यक्ति के अस्तित्व को मार्नतार् है और उसक यह विश्वार्स है कि व्यक्ति अपने विषय में निर्णय लेने में सक्षम है। 
  2. आत्मसिद्धि की प्र्रवृित्त्ार्-प्रत्यार्शी में आत्मसिद्धि, आत्मविकास तथार् आत्मनिर्भरतार् की प्रवृित्त्ार् होती है। रोजर्स यह मार्नते हैं कि व्यक्ति की अन्तर्निहित क्षमतार् होती है।
  3. मार्नवतार् में विश्वार्स-मनुश्य मूलत: सद्भार्वी तथार् विश्वसनीय होतार् है। कभी-कभी व्यक्ति के जीवन में ऐसी उत्त्ोजनार् उभरती है जो उसे सन्माग से दूर हटार्ने क प्रयार्स करती है। ऐसी स्थिति में परार्मर्श के मार्ध्यम से उनक शमन कियार् जार्तार् है और व्यक्ति को सन्मागोन्मुख कियार् जार्तार् है।
  4. मार्नव की बुद्धिमत्त्ार्ार् में विश्वार्स-इस निमित्त्ार् रार्जे र्स व्यक्ति की बुद्धिमतार् में अधिक विश्वार्स रखतार् है। उसकी मार्न्यतार् है कि विशम परिस्थितियों में वह अपनी चैतन्यतार् क प्रयोग करतार् है और संगठन से ऊपर उठ कर अपनी कार्यसिद्धि करतार् है।

उपर्युक्त के अतिरिक्त विलियम स्नार्इडर ने चार्र अन्य मार्न्यतार्ओं को स्वीकृति दी है-

  1. व्यक्ति अपने जीवन क लक्ष्य स्वयं निर्धार्रित कर सकतार् है। 
  2. अपने द्वार्रार् निर्धार्रित लक्ष्य की प्रार्प्ति में उसे संतोश होतार् है। 
  3. अनिदेशार्त्मक परार्मर्श में प्रत्यार्शी अपने विचार्र प्रस्तुत करने के लिए स्वतन्त्र रहतार् है। अत: परार्मर्श के पष्चार्त् वह स्वयं निर्णय लेने में सक्षम हो जार्तार् है। 
  4. व्यक्ति के समार्योजन में उसक सार्ंवेगिक द्वन्द्व बार्धक होतार् है। 
  5. अपने द्वार्रार् निर्धार्रिते लक्ष्य की प्रार्प्ति में उसे संतोश होतार् है।

अनिदेशार्त्मक परार्मर्श के प्रमुख सिद्धार्न्त

  1. प्राथी क समार्दर-अनिदेशार्त्मक परार्मर्श में सेवाथी की सत्यनिष्ठार् और उसकी व्यक्तिगत स्वार्यतत्तार् को समार्हित कियार् जार्तार् है। परार्मर्शक परार्मर्श देतार् है किन्तु निर्णय प्रत्यार्शी पर छोड़ देतार् है। 
  2. समग्र व्यक्तित्व पर ध्यार्न-प्राथी के व्यक्तित्व के सम्यक् विकास पर परार्मर्शक क ध्यार्न रहतार् है। अनिदेशार्त्मक परार्मर्श क यह दूसरार् प्रमुख सिद्धार्न्त है। इसके अन्तर्गत प्रत्यार्शी की क्षमतार् क इस प्रकार विकास कियार् जार्तार् है कि वह अपनी समस्यार् क निदार्न स्वयं कर सके। 
  3. सहिष्णुतार् क सिद्धार्न्त-विचार्र-स्वार्तत्र्ं य की स्थिति में परार्मर्शक को अपनी सहिश्णुतार् एवं स्वीकृति क परिचय देनार् पड़तार् है। परार्मर्शदार्तार् प्रत्यार्शी में यह भार्वनार् उत्पन्न् करनार् चार्हतार् है कि प्रत्यार्शी की बार्तें ध्यार्न से सुनी जार् रही हैं और परार्मर्शक उसके विचार्रों से सहमत है। 
  4. परार्मर्श प्राथी में अपनी क्षमतार्ओं को जार्नने और समझने की शक्ति उत्पन्न् करनार्-परार्मर्शप्राथी के सम्मुख परार्मर्शदार्तार् एसे ी परिस्थिति उत्पन्न् करतार् है कि वह अपने में निहित क्षमतार्ओं को पहचार्न सके और परिस्थितियों से समार्योजन करनार् सीख सके। परार्मर्श के मार्ध्यम से ही ऐसी परिस्थिति उत्पन्न् की जार्ती है।

परार्मर्श प्रक्रियार् में निहित सोपार्न-

  1. वातार्लार्प-परार्मशर्क तथार् प्राथी के मध्य कछु आपैचार्रिक तथार् कछु अनौपचार्रिक बैठकें होती हैं। बैठकों क उद्देश्य परार्मर्शक तथार् प्राथी के मध्य सौहादपूर्ण वार्तार्वरण क निर्मार्ण करनार् है तार्कि परार्मर्शप्राथी अपनी बार्त स्वतन्त्र रूप से प्रस्तुत कर सके। इसे मैत्री-उपचार्र भी कहते है। 
  2. जार्ँच पड़़तार्ल-इस सोपार्न के अन्तर्गत परार्मर्शक अनके विधियों क प्रयोग करतार् है। इनमें से कुछ प्रत्यक्ष विधियार्ँ होती हैं और कुछ परोक्ष विधियार्ँ होती है। इसक मुख्य उद्देश्य सेवाथी के सम्बन्ध में हर प्रकार की जार्नकारी प्रार्प्त करनार् है। 
  3. संवेग-विमोचन-परार्मर्शप्राथी एक समस्यार्युक्त व्यक्ति है जिसके अपने सवेंग तथार् तनार्व होते है। वह अपनी समस्यार् को परार्मर्शक के सम्मुख तभी रख पार्तार् है जब उसके मनोभार्वों को पूर्णतयार् विमोचित कर दियार् जार्य। इसलिए तृतीय सोपार्न में परार्मर्शक क यह प्रयार्स होतार् है कि प्रत्यार्शी सभी पूर्वार्ग्रहों तथार् तनार्वों से मुक्त होकर अपनी समस्यार् प्रस्तुत करें। 
  4. सुझार्वों पर चर्चार्-इसमें प्रत्यार्शी की भूि मक प्रमुख होती है। परार्मर्शक द्वार्रार् दिये गये सुझार्वों पर वह आलोचनार्त्मक दृष्टिकोण अपनार्तार् है और उस पर टीका-टिप्पणी करतार् है। 
  5. योजनार् क निर्मार्ण-समस्यार्ओं के प्रस्तुतीकरण के लिए किसी योजनार्-निर्मार्ण क अवसर प्रत्यार्शी को दियार् जार्तार् है। इस योजनार् निर्मार्ण में परार्मर्शदार्तार् एवं प्राथी दोनों क सहयोग होतार् है। 
  6. योजनार् क्रियार्न्वयन एवं प्राथी-बनार्यी गयी योजनार् क क्रियार्न्वयन तथार् मूल्यार्ंकन इस सोपार्न के अन्तर्गत होतार् है। 

निदेशार्त्मक तथार् अनिदेशार्त्मक परार्मर्श में अन्तर 

परार्मर्शप्राथी क हित दोनों क लक्ष्य है किन्तु इस लक्ष्य की प्रार्प्ति के सार्धन भिन्न है। अन्तर सार्धन क है, प्रविधि क है, लक्ष्य क नहीं। फिर भी अन्तर के  बिन्दु दृष्ट हैं-

  1. निदेशार्त्मक परार्मर्श यह मार्नकर चलतार् है कि प्रत्यार्शी अपनी समस्यार् से इतनार् दबार् रहतार् है कि वह अपनी क्षमतार् को न तो पहचार्न पार्तार् है और न अपने पूर्वार्ग्रह से मुक्त हो पार्तार् है। इसके विपरीत अनिदेशार्त्मक परार्मर्श यह मार्नतार् है कि सेवाथी क्षमतार्युक्त है और स्वतन्त्र वार्तार्वरण पार्ने पर वह अपनी समस्यार् क समार्धार्न स्वयं कर सकतार् है। 
  2. व्यक्ति क चिन्तन बुद्धि एवं संवेग क सम्मिश्रण है। वह कभी एक क प्रयोग करतार् है कभी दूसरे का। निदेशार्त्मक परार्मर्श प्रत्यार्शी की बुद्धि पर अधिक बल देतार् है और उसी के अनुरूप परार्मर्श प्रदार्न करतार् है। अनिदेशार्त्मक परार्मर्श व्यक्ति के संवेग पर बल देतार् है और प्रयार्स करतार् है कि व्यक्ति अपने तनार्वग्रस्त मनोभार्वों से मुक्त होकर परार्मर्षित हो। 
  3. निदेशार्त्मक परार्मर्श समस्यार्-केन्द्रित है और अनिदेशार्त्मक परार्मर्श व्यक्ति-केन्द्रित है। एक में समस्यार् को दृष्टिगत करके और दूसरे में प्रत्यार्शी को दृष्टि में रखकर परार्मर्श दियार् जार्तार् है। 
  4. निदेशार्त्मक परार्मर्श विश्लेषणार्त्मक है और अनिदेशार्त्मक परार्मर्श संष्लेशणार्त्मक है। 
  5. निदेशार्त्मक परार्मर्श समयबद्ध है जबकि अनिदेशार्त्मक परार्मर्श है। दूसरे प्रकार के परार्मर्श में अपेक्षार्कृत अधिक समय लगतार् है। 
  6. निदेशार्त्मक परार्मर्श में प्रत्यार्शी के विगत जीवन क कोर्इ सहार्रार् नहीं लियार् जार्तार् जबकि अनिदेशार्त्मक में उसके अतीत के विषय में जार्ननार् आवश्यक होतार् है।

अनिदेशार्त्मक परार्मर्श से लार्भ

  1. अनिदेशार्त्मक परार्मर्श निश्चय रूप में स्वीकार करतार् है कि प्रत्यार्शी में विकास की क्षमतार् निहित है। 
  2. प्रत्यार्शी उन्मुख होने के कारण किसी अन्य प्रकार के परख की आवश्यकतार् नहीं होती। 
  3. इसमें व्यक्ति को तनार्व रहित बनार्ने क प्रयार्स कियार् जार्तार् है और अवचेतन मन की गुत्थियों को उभार्र कर चेतनमन में लार्यार् जार्तार् है। 
  4. इस प्रकार के परार्मर्श में जो प्रभार्व मार्नव मस्तिश्क पर छोड़े जार्ते हैं, वे स्थार्यी होते हैं। 

सीमार्एँ

  1. यह परार्मर्श मनोविश्लेषणार्त्मक तह तक नहीं पहुँच पार्तार्। 
  2. इसमें समस्यार्ओं की अभिव्यक्ति क अवसर दियार् जार्तार् है किन्तु समस्यार्ओं की उत्पित्त्ार् के कारणों क निदार्न नहीं होतार्। 
  3. कभी-कभी प्रत्यार्शी न तो अपनी समस्यार् को ठीक से समझ पार्तार् है और न ठीक से प्रस्तुत ही कर पार्तार् है। 
  4. कभी-कभी परार्मर्शक की उदार्सीनतार् के कारण प्रत्यार्शी अपनी समस्यार् को स्पश्ट करने में असफल रहतार् है।
  5. कर्इ बार्र अधिक लचीलेपन से उचित परिस्थितियार्ँ नहीं बन पार्ती। 
  6. परार्मर्शदार्तार् प्रार्थ्र्ार्ी के संसार्धन, निर्णय एवं विद्वतार् पर विश्वार्स नहीं कर सकतार्। 
  7. सभी समस्यार् मौखिक रूप से निदार्न नहीं हो पार्ती। 
  8. परार्मर्शदार्तार् के निरपेक्ष होने से प्रार्थ्र्ार्ी सही सूचनार् नहीं देतार्। 

    समन्वित परार्मर्श 

    वह एक मध्यम वर्गीय प्रविधि है। इसके प्रमुख प्रवर्त्त्ार्कों में एफ0सी0 टोम क नार्म उल्लेखनीय है। समन्वित परार्मर्श में निदेशार्त्मक से अनिदेशार्त्मक की ओर बढ़ते हैं। यह प्रविधि पूर्णतयार् व्यक्ति, परिस्थिति तथार् समस्यार् पर आधार्रित होती है। इसके अन्तर्गत जिन तकनीकों क प्रयोग कियार् जार्तार् है उनमें प्रत्यार्शी में विश्वार्स जगार्नार्, उसे सूचनार्एँ प्रदार्न करनार्, परीक्षण करनार् आदि हैं। इस प्रविधि में परार्मर्शदार्तार् व प्रार्थ्र्ार्ी दोनों सक्रिय एवं सहयोगी होते हैं और निदेशार्त्मक व अनिदेशार्त्मक दोनों ही प्रविधियों के प्रयोग के कारण दोनों बार्री-बार्री से वातार् में प्रतिभार्ग करते हैं और समस्यार् क समार्धार्न मिलकर निकालते है।

    समन्वित परार्मर्श की प्रक्रियार्

    1. प्र्रत्यार्शी के व्यंिक्ंतत्व सम्बन्धी विशेषतार्ओं तथार् उसकी आवश्यकतार्ओं क अध्ययन-इसके अन्तगर्त परार्मर्श प्राथी की आवश्यकतार्ओं उसकी समस्यार्ओं तथार् उसके व्यक्तिगत विशेषतार्ओं क अध्ययन कियार् जार्तार् है। परार्मर्श की प्रक्रियार् में आगे बढ़ने के पूर्व परार्मर्शक प्रत्यार्शी के विषय में पूरी जार्नकारी प्रार्प्त कर लेतार् है। 
    2. उचित तकनीक क चयन-परार्मर्शप्राथी की आवश्यकतार्ओ समस्यार्ओं तथार् अपेक्षार्ओं से पूर्णतयार् अवगत हो जार्ने के उपरार्न्त परार्मर्शक उचित प्रविधि यार् तकनीक क चयन करतार् है। 
    3. तकनीकों क प्रयोग-तकनीक क चयन परार्मर्शक किसी विशिष्ट परिस्थिति में ही करतार् है। परिस्थिति क चयन समस्यार् की प्रकृति एवं प्रत्यार्शी क स्वभार्व देखकर कियार् जार्तार् है। 
    4. प्रयुक्त तकनीकों के प्रभार्वों क मूल्यार्ंकन-अनेक विधियों क प्रयोग करके यह देखार् जार्तार् है कि प्रत्यार्शी को परार्मर्शित करने में जो तकनीक प्रयोग में लार्ये गये उनक प्रत्यार्शी पर क्यार् प्रभार्व पड़ार्। 
    5. परार्मर्श की तैयार्री-इस स्तर पर परार्मर्श एवं निर्देशन हेतु उचित तैयार्री की जार्ती है। 
    6. प्रत्यार्शी के विचार्रों से अवगत होनार्-सम्पूर्ण प्रक्रियार् के विषय में प्रत्यार्शी के विचार्र जार्नने के प्रयार्स किये जार्ते हैं। 

    समन्वित परार्मर्श की विशेषतार्एँ 

    एफ0सी0 टोम के अनुसार्र समन्वित परार्मर्श की विशेषतार्एँ हैं-

    1. इस प्रकार के परार्मर्श में समन्वयक विधि क प्रयोग कियार् जार्तार् है। 
    2. मुख्य भूमिक परार्मर्शप्राथी की होती है और परार्मर्शक प्रार्य: उदार्सीन रहतार् है।
    3. कार्य क्षमतार् पर अधिक बल दियार् जार्तार् है। सम्पूर्ण प्रक्रियार् परार्मर्शक, परार्मर्शप्राथी की समस्यार्-समार्धार्न की क्षमतार् के इर्द-गिर्द घूमती है। 
    4. यह प्रक्रियार् कम खर्चीली है। प्रार्य: सभी प्रविधियों क प्रयोग कर लियार् जार्तार् है।
    5. प्रत्यार्शी, उसकी समस्यार् तथार् उसकी स्थिति को देखते हुए परार्मर्शक के सम्मुख निदेशार्त्मक तथार् अनिदेशार्त्मक के विकल्प खुले रहते हैं। 
    6. प्रत्यार्शी को समस्यार् क समार्धार्न निकालने क पूर्ण अवसर प्रदार्न कियार् जार्तार् है। 

    समन्वित परार्मर्श की सीमार्यें 

    1. अधिकांशत: लोग इस प्रक्रियार् को ठीक से समझ नहीं पार्ते और इसे अवसर प्रधार्न कहते हैं।
    2. दोनों अनिदेशार्त्मक व निदेशार्त्मक प्रविधि को जोड़ार् नहीं जार् सकतार्। 
    3. प्राथी को स्वतन्त्रतार् देने के आधार्र और उसकी सीमार् पर कोर्इ स्पष्ट संकेत नहीं है। 
    4. दोनों प्रविधियों के मिलार्ने से उचित माग चयन और परिणार्म प्रार्प्ति में भी दुविधार् होती है।

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