पत्रकारितार् और अनुवार्द

पत्रकारितार् में अनुवार्द की समस्यार् से परिचय करार्ने की दृष्टि से प्रस्तुत लेख ‘पत्रकारितार् और अनुवार्द’ में समार्चार्र मार्ध्यमो के लिए लिखे जार्ने वार्ले समार्चार्रो के अनुवार्द की समस्यार् की चर्चार् की गर्इ है। इसके सार्थ ही पत्रकारितार् की भार्षार् के अनुवार्द, शैली, शीर्षक-उपशीर्षक, मुहार्वरे एवं लार्क्षणिक पदबंधों, पार्रिभार्षिक शब्दार्वली के अनुवार्द की समस्यार् और उसके समार्धार्न पर विस्तार्र से समझार् गयार् है। सार्थ ही पत्रकारितार् में पार्रिभार्षिक शब्दार्वली के अनुवार्द की समस्यार् और उसके समार्धार्न एवं पार्रिभार्षिक शब्दार्वार्ली के कुछ नमूने पर भी सविस्तार्र से चर्चार् की गर्इ है।

पत्रकारितार् और अनुवार्द का सार्मार्न्य परिचय 

यों तो पत्रकार को एकाधिक भार्षार्ओं क ज्ञार्न होनार् अपेक्षित होतार् है किन्तु भार्रत के सन्दर्भ में क्षेत्रीय भार्षार्ओं की पत्रकारितार् में अनुवार्द क बहुत महत्वपूर्ण स्थार्न है। अत: हिंदी अथवार् अन्य किसी भार्रतीय भार्षार् के समार्चार्र पत्र की भार्षार् के ज्ञार्न के अतिरिक्त अंग्रेजी क अच्छार् ज्ञार्न होनार् बहुत जरूरी है। इसक कारण है कि अभी तक भार्षाइ पत्र प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडियार्(पीटीआर्इ), यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडियार्(यूएनआर्इ) जैसी समार्चार्ए एजेंिसयों पर निर्भर हैं। रयटूर आदि विदेशी समार्चार्र एजेंिसयों भी अंग्रेज के मार्ध्यम से ही समार्चार्र देती हैं। इसके अतिरिक्त भार्षाइ पत्रिकाओ को भी बहुत सी रचनार्एँ, बहुत से लेख और फीचर अंग्रेजी में ही प्रार्प्त हार्ते हैं। अत: हिंदी भार्षाइ पत्रकार वार्स्तव में एक अनुवार्दक के रूप में ही प्रार्य: कार्य करतार् है।

अनुवार्द की यह प्रक्रियार् एकतरफार् नहीं है। हिंदी इलार्कों की बहुत सी ऐसी खबरें होती है जिनक हिंदी से अंग्रेजी में प्रतिदिन अनुवार्द कियार् जार्तार् है। अगर हिंदी एजेंसियार्ं अंग्रेजी अनुवार्द करती हैं तो अंग्रेजी एजेंसियार्ं भी हिंदी इलार्कों की खबरों क हिंदी से अंग्रेजी में अनुवार्द करती हैं। हिंदी एजेंिसयों को अनुवार्द करनार् इसलिए मजबूरी है कि हिंदी एजेंिसयों के संवार्ददार्तार् गैर हिंदी इलार्को में नहीं हैं और विदेशों में भी नहीं हैं। किसी इलार्के की खबरें सिफ इसलिए हम देने से मनार् नहीं कर सकते कि वहार्ं हमार्रार् अपनार् यार्नि हिंदी क संवार्ददार्तार् नहीं है। इसलिए उन इलार्कों से अंग्रेजी में आनेवार्ली खबरों क हिंदी में अनुवार्द करनार् पड़तार् है।

पत्रकारितार् में अनुवार्द की समस्यार्एँ 

पत्रकारितार् के क्षेत्र में अनुवार्द प्रत्येक समय आवश्यकतार् होती है। किंतु यह विडंबनार् ही है कि हमार्रे हिंदी अनुवार्दकों के पार्स अनुवार्द के लिए अधिक समय नहीं होतार् है। उन्हें तो दी गर्इ सार्मग्री क तुरंत अनुवार्द और प्रकाशन करनार् होतार् है। यह भी चिंतनीय है कि यह समार्चार्र किसी भी विषय से संबद्ध हो सकतार् है। यह आवश्यक नहीं कि अनुवार्दक को उस विषय की पूर्ण जार्नकारी ही हो। इसी प्रकार यह भी संभव है कि कभी कभी कथ्य क संपूर्णतयार् अंतर न हो सके, क्योंकि प्रत्येक भार्षार् क पार्ठक वर्ग तथार् सार्मार्जिक, सार्ंस्कृतिक संदर्भ अलग ही होते हैं। इस प्रकार अनुवार्दकों के सार्मने कर्इ समस्यार् सफल पत्रकारितार् के लिए बार्धार्एँ बनती हैं जिसमें प्रमुख हैं।

1. भार्षार् की समस्यार् 

पत्रकारितार् के क्षेत्र में अनुवार्द करते समय सबसे पहले भार्षार् संरचनार् की समस्यार् देखने को मिलते हैं। भार्षार् के संदर्भ में दो-तीन प्रश्न हमार्रे सार्मने उठते हैं- एक पत्रकारितार् की भार्षार् स्वरूप क्यार् है? क्यार् पत्रकारितार् की भार्षार् स्वरूप विशिष्ट है? हार्ँ, अवश्य पर विज्ञार्न और आयुर्विज्ञार्न की भार्षार् के समार्न न तकनीकी है और न तो अधिक सार्हित्यिक ही है और न ही सार्मार्न्य बोलचार्ल की भार्षार्। इसे हम किसी सीमार् तक लिखित और औपचार्रिक भार्षार् के समकक्ष तथार् निश्चित प्रयोजनमूलक स्तर पर से संबद्ध भार्षार् मार्न सकते हैं। हम इसे संपार्दित शैली में प्रस्तुत भार्षार् मार्न सकते हैं, जहार्ं प्रत्येक विषय सुविचरित है, प्रत्येक विषय के लिए निश्चित स्थार्न, स्तंभ और पृष्ठ हैं। कभी कभी स्थिति विशेष में पार्रिभार्षिक शब्दों क प्रयार्गे करनार् पड़तार् है। प्रार्य: पत्र की भार्षार् में लोक व्यवहार्र में प्रयुक्त होने वार्ली शब्दार्वार्ली क प्रार्युर्य रहतार् है। पत्रकारितार् की भार्षार् में सर्वजन सुबोधतार् तथार् प्रयोगधर्मितार् क गुण होनार् आवश्यक है।

प्रत्येक भार्षार् की निजी संरचनार् होती है। अनुवार्दक को इस ओर विशेष ध्यार्न देनार् चार्हिए।स उसे हिंदी की प्रकृति के अनुकूल और उपर्युक्त पत्रकारितार् की भार्षार् की विशेषतार्ओं को ध्यार्न में रखकर अनुवार्द करने की चेष्टार् करनी चार्हिए। जिससे सहजतार् और स्वार्भार्विकतार् बनी रहे। हिंदी में अनुवार्द करते समय अंगे्रजी वार्क्य रचनार् क अनुसरण करने की अपेक्षार् वार्क्य को जटिल तथार् अस्पष्ट न बनार्कर, उसे दो-तीन छोटे वार्क्यों में तार्डे ़नार् अच्छार् रहतार् है। उदार्हरण के लिए-
In the pre independence era, Indian newspapers covered only politics, for the majority of them at that time were fighting for country’s freedom.
‘‘स्वार्तंत्र्य-पूर्व युग में, भार्रतीय समार्चार्र पत्र रार्जनीतिक चर्चार् तक सीमित थे। उनमें से अधिकांश, उस समय देश की स्वतंत्रतार् के लिए जूझ रहे थे।’’
उपर्युक्त उदार्हरण में एक दीर्घ वार्क्य को दो वार्क्यों में तोडऩे से कथन में सौंदर्य और आक्रार्मकतार् क समार्वेश हुआ है।

2. मुहार्वरो, शैली, लार्क्षणिक पदबंधों की समस्यार् 

प्रार्य: अनुवार्दक अंग्रेजी मुहार्वरो, शैली, लार्क्षणिक पदबंधों आदि के समार्नार्ंतर हिंदी में मुहार्वरें आदि नहीं ढूंढते। शार्ब्दिक भ्रष्ट अनुवार्द करने के कारण एक अस्वार्भार्विकतार् क भार्व बनार् रहतार् है। उदार्हरण के लिए-
Put him behind the bars – उसे जेल के सीखंचों के पीछे भेज दियार् जार्ए।
We were stunned with astonishment- हम आश्चर्य से स्तब्ध रह।
उपर्युक्त उदार्हरणों में हिंदी की स्वार्भार्विक प्रवृत्ति क हनन करते हुए अंग्रेजी क शब्द-प्रति-शब्द अनुवार्द प्रस्तुत कियार् गयार् है। इससे एक फार्लतूपन क आभार्स होतार् है।

3. पत्रकारितार् में सार्धार्रण ज्ञार्न, तुरंत निर्णय की समस्यार् 

उप संपार्दको  आदि को रार्त-भर बैठकर प्रार्प्त होने वार्ले समार्चार्रो को सार्थ-सार्थ हिंदी में अनूदित करके देनार् होतार् है। समय के एक-एक मिनट क इतनार् हिसार्ब होतार् है कि अंग्रेजी में प्रार्प्त सार्मग्री में कोर्इ शब्द/अभिव्यक्त समझ न आने पर शब्दकोश/ज्ञार्नकोश आदि देखने यार् सोचने क वक्त भी प्रार्य: नहीं होतार्। किंतु पत्रकार बहुत कुशल अनुवार्दक होते हैं एकदम नए शब्द क भार्व समझकर ही वे काफी अच्छे हिंदी समार्नक दे देते हैं और वही हिंदी समार्नक यार् प्रतिशब्द जनतार् में, पार्ठकों में चल भी पड़ते हैं। लेकिन कभी कभी पत्रकार की असार्वधार्नी यार् उसके अज्ञार्न से अनुवार्द में भयकंर भूलें हो जार्ती है, जैसे-एक बार्र एक उपसंपार्दक ने( salt) क अनुवार्द ‘नमक समझौतार्’ कर दियार् जबकि वहार्ं ‘सार्ल्ट’ क अर्थ ‘नमक’ नहीं बल्कि Strategic Arms Limitation Treaty थार्। इस प्रकार के अन्य उदार्हरण देखार् जार् सकतार् है-
Legend of Glory- गौरव गार्थार्, Limitless- सीमार्हीन, Lovely Baby- सलोनार् शिशु, The Knight of Kabul- काबुल क वीर अत: पत्रकार अनुवार्दक को सार्धार्रण ज्ञार्न तथार् विषय को समझने की क्षमतार् होनार् परमार्वश्यक है।

4. शब्द-प्रति-शब्द अनुवार्द की समस्यार् 

समार्चार्र पत्रों के अनुवार्द में स्वार्भार्विकतार् और बोधगम्यतार् होनार् बहुत आवश्यक है। यहार्ं अनुवार्दक के तकनीकी रूप से सही होने से भी काम नहीं चलतार्-उसक सरल और जार्नदार्र होनार् भी जरूरी है। इस संदर्भ में नवभार्रत टार्इम्स मुंबर्इ के मुख्य संवार्ददार्तार् श्रीलार्ल मिश्र क कहनार् है- प्रार्य: यह देखार् गयार् है कि कुछ उप संपार्दक अनुवार्द क ढार्ंचार् तैयार्र करते हैं। शब्दकोश से शब्दों क अर्थ देख लेते हैं। येन केन प्रकारेण व एक वार्क्य तैयार्र कर देते हैं। तकनीकी दृष्टि से उनक अनुवार्द प्रार्य: सही भी रहतार् है। उसे सही अनुवार्द की संज्ञार् दी जार् सकती है, लेकिन उनमें जार्न नहीं रहती है। वार्क्य सही भी होतार् है लेकिन उसक कुछ अर्थ नहीं निकलतार् है। हिंदी पत्रकारों द्वार्रार् हुए निम्नलिखित गलत अनुवार्दों के असर क अनुमार्न लगार्तार्र समझार् जार् सकतार् है-
Twentieth Century Fox- बीसवीं शतार्ब्दी की लोमडी एक विदेशी फिल्म कंपनी क नार्म
Topless Dress-शिखरहीन पोशार्क(नग्न वक्ष)
Call Money- मंगनी क रुपयार्(शीघ्रार्वधि रार्शि)
Informal visit- गैर रस्मी मुलार्कात(अनौपचार्रिक भेटं )
Railway Gard- रेलवे के पहरेदार्र
Flowery Language- मुस्कुरार्ती हुर्इ भार्षार्(सजीली भार्षार्/औपचार्रिक भार्षार्)
यहार्ं एक बार्त और उल्लेखनीय है कि जहार्ं तक हो सके अप्रचलित शब्दों के व्यवहार्र से बचनार् चार्हिए जैसे absass के लिए ‘विद्रधि’ के स्थार्न पर ‘फोड़ार्’ ही ठीक है, appendix को ‘उडुकपुछ’ करने के बदल अप्रचलित शब्द लार्ने की अपेक्षार् इन्हें हिंदी में ध्वनि अनुकूल द्वार्रार् भी रार्खार् जार् सकतार् है।

5. शैली की समस्यार् 

समार्चार्र पत्रों में विषय के अनुसार्र समार्चार्रों की पृथक-पृथक शैलियार्ं होनार् स्वार्भार्विक है जैसे कि अंग्रेजी पत्रो  में होतार् ही है। किंतु भार्रतीय भार्षार्ओं के पत्रों क पार्ठक विषय के अनुसार्र भार्षार् की गूढतार् को प्रार्य: अस्वीकार करके सरल भार्षार् को ही स्वीकार करतार् है। अत: पत्रकारों को गढू -से- गढू विषय के समार्चार्र फीचर आदि भी सरलतम भार्षार् में अनूदित करने पड़त े हैं। यह कुछ वैसार् ही हो जार्तार् है जैसे किसी 8-10 सार्ल के बच्चे को उसकी भार्षार् में न्यूक्लीयर विखंडन की पूर्ण प्रक्रियार् समझार्नार् पड़।े अत: सरल शैली की समस्यार् भी अनुवार्द की एक प्रमुख समस्यार् बन जार्ती है।

6. शीर्षक-उपशीर्षकों आदि की समस्यार् 

शीर्षकों के अनुवार्द में कर्इ तरह की बार्धार्एँ हैं, जैसे शीर्षक में उसके लिए पृष्ठ पर रखी गर्इ जगह के अनुसार्र शब्दों की संख्यार् क चयन करनार् पड़तार् है। शीर्षक क रोचक/आकर्षक होनार् तथार् विषय की प्रतीति करार्ने वार्लार् होनार् आवश्यक है। अतएव शीर्षकों के मार्मले में शब्दार्नुवार्द यार् भार्वार्नुवार्द से भी काम नहीं चलतार्, बल्कि उनक छार्यार्नुवार्द क यार् पुन: सृजन ही करनार् पड़तार् है।

पत्रकारितार् में पार्रिभार्षिक शब्दार्वली 

अपने दिन प्रतिदिन के व्यवहार्र में हम भार्षार् और उसकी शब्दार्वली क ही प्रयोग करते हैं। अपने सार्मार्न्य जीवन को चलार्ने के लिए हम जिन शब्दों क प्रयोग करते हैं उनमें प्रार्य: भार्षार् के सार्रे स्वर, व्यंजन तथार् संज्ञार् आदि शब्द आ जार्ते हैं। यह भार्षार् क सार्मार्न्य रूप है किंतु भार्षार् के कुछ ऐसे शब्द भी हैं जो इन सार्मार्न्य शब्दों से भिन्न होते हैं। ऐसे शब्दों को मोटे रूम से दो वगोर्ंे में रखार् जार्तार् है- 1.पार्रिभार्षिक 2.अर्ध पार्रिभार्षिक। बृहत् हिंदी शब्दकोश में पार्रिभार्षिक शबदार्वली की परिभार्षार् इस प्रकार की गर्इ है-जिसक प्रयोग किसी विशिष्ट अर्थ में कियार् जार्ए, जो कोर्इ विशिष्ट अर्थ सूचित करे, उसे पार्रिभार्षिक कहते हैं तथार् विशिष्ट अर्थ में प्रयुक्त होनेवार्ले शब्दों की सूची को ‘पार्रिभार्षिक शब्दार्वली’ कहते हैं। इस तरह पार्रिभार्षिक शब्द वह शब्द है जो किसी विशेष ज्ञार्न के क्षेत्र में एक निश्चित अर्थ में प्रयुक्त होतार् है। चंूिक हमार्री पार्रिभार्षिक शब्दार्वली बहुत कुछ अंग्रेजी पर आधार्रित है अत: अंग्रेजी की शब्द संपदार् पर कुछ विचार्र करनार् चार्हिए। पिछले सौ-डेढ सौ वर्षों में अंग्रेजी के शब्द भंडार्र में लगभग 90-95 प्रतिशत अंश तकनीकी एवं वैज्ञार्निक शब्दों क ही रहार् है। प्रत्येक वर्ष अंग्रेजी के 10-15 हजार्र शब्द प्रचलन से बार्हर हो जार्ते हैं और 20-25 हजार्र नए शब्द जुड़ जार्ते हैं। यह जोड़-घटार्व भी मुख्यत: पार्रिभार्षिक शब्दों क होतार् है। और इन सभी अंग्रेजी शब्दों के लिए हिंदी में सम शब्दों क निर्धार्रण नहीं हुआ है।

जहार्ं तक पत्रकारितार् की बार्त है पत्रकारितार् क कार्य है इसके जरिए लोगों को समसार्मयिक घटनार् एवं विचार्र आदि के बार्रे में लोगों को सूचित करनार् है। इसके अलार्वार् विभिन्न विषय पर शिक्षार् देनार्, लोगों क मनार्रेंजन करनार्, लोकतंत्र की रक्षार् करनार् और जनमत है। ऐसे में इन विषयों की अभिव्यक्ति के लिए पार्रिभार्षिक शब्द बड़े ही महत्वपूर्ण होते हैं। दूसरी बार्त यह है कि समार्चार्र पत्र पढ़ते समय यार् टेलीविजन देखते समय यार् रेडियो सुनते समय कोर्इ शब्दकोश लेकर नहीं बैठतार् है। पार्ठक/दर्शक/श्रोतार् सुबह की चार्य के सार्थ, सफर के दौरार्न यार् कहीं समय व्यतीत कर रहार् हो देश दुनियार्की खबरों को समझनार् एवं जार्ननार् चार्हतार् है। तीसरी बार्त यह है कि समार्चार्र पत्र पत्रिकाओं तथार् टीवी के पार्ठक/दर्शक बच्चे से लेकर बुढ़े तथार् सार्क्षर से लेकर बुद्धीजीवी तक के लिए होतार् है। ऐसे में पार्ठक वर्ग को समझ में आए उस तरह की भार्षार्, शब्दों क उपयोग करनार् पड़तार् है। यदि अर्थ निश्चित नहीं होगार् तो उसक प्रयोक्तार् उसे एक अर्थ में प्रयुक्त करेगार् और श्रोतार् यार् पार्ठक उसे दूसरे अर्थ में लेगार्।

पार्रिभार्शिक शब्दार्वली की समस्यार् 

पत्रकारितार् क कार्य रोजार्नार् देश, दुनियार् में घटित घटनार्ओं, आंदोलन, घोटार्लार्, आविष्कार, विभिन्न समस्यार् अपने कलेवर में लिए हुए रहते हैं तो यह निश्चित है कि इसमें सभी प्रकार की चीजें आ जार्ती है। इसके सार्थ ही कुछ ऐसे शब्द आ जार्ते हैं जो अपनी विशिष्टतार् लिए हुए रहते हैं। इसमें कोर्इ आंचलिक शब्द हो सकतार् है, कोर्इ ज्ञार्न विज्ञार्न के शब्द हो सकतार् है, कार्यार्लयीन शब्द हो सकतार् है, इतिहार्स से संबंधित हो सकतार् है। इन शब्दों को पार्ठकों के सार्मने रखनार् पत्रकार के लिए चुनौती होती है। ऐसे शब्दों क हिंदी में अनुवार्द करके रखार् जार्ए यार् उसे ऐसे ही लिप्यंतरण कर दियार् जार्ए यार् उसके लिए कोर्इ नयार् शब्द गढ़ लियार् जार्ए। पत्रकार को यह भी ध्यार्न रखनार् होतार् है कि ऐसे शब्द के मार्यने क्यार् हैं क्योंकि यह सीधे समार्ज के लोगों तक पहुंचतार् है। दूसरी बार्त यह होतार् है कि पत्रकार को समार्चार्र लिखते समय इतनार् समय नहीं होतार् है कि वह इसबार्रे में शब्दकोश क सहार्रार् ले यार् विभिन्न विशेषज्ञों से पूछतार्छ करके कोर्इ ठोस निर्णय लियार् जार्ए।

पार्रिभार्षिक शब्द की विशेषतार्एँ- 

पार्रिभार्षिक शब्दों में निम्नलिखित विशेषतार्एँ अपेक्षित हैं-

  1. उच्चरण- पार्रिभार्षिक शब्द उच्चार्रण की दृष्टि से सुविधार्जनक होनार् चार्हिए 
  2. अर्थ- पार्रिभार्षिक शब्द क अर्थ सुनिश्चित परिधि से युक्त तथार् स्पष्ट होनार् चार्हिए। सार्थ ही विज्ञार्न यार् शार्स्त्र विशेष में एक संकल्प अथवार् वस्तु आदि के लिए एक ही पार्रिभार्षिक शब्द होनार् चार्हिए एवं प्रत्येक पार्रिभार्षिक शब्द क एक ही अर्थ होनार् चार्हिए 
  3. लघुतार्- यथार्संभव पार्रिभार्षिक शब्दों क आकार छोटार् होनार् चार्हिए तार्कि प्रयोक्तार् को सुविधार् रहे। शब्द व्यार्ख्यार्त्मक हो इसके बजार्य उसक पार्रदश्र्ार्ी होनार् बेहतर है। 
  4. उर्बरतार्- पार्रिभार्षिक शब्द उर्वर होनार् चार्हिए अर्थार्त उसे ऐसार् बनार्ए जार् सकें यथार् Fertile, Fertility, Fertilizer आदि यार् उर्वर, उर्वरकतार्, उर्वरक अति उर्वर आदि। 
  5. रूप- एक श्रेणी के पार्रिभार्षिक शब्दों में रूप सार्म्य होनार् चार्हिए जैसे Science, Scientific, Scientist आदि अथवार् विशेषज्ञों के नार्म-Scientist , Cytologist, Botanist, Cardiologist, Dramatist आदि। 
  6. प्रसार्र योग्यतार्- भार्रत और हिंदी के संदर्भ में पार्रिभार्षिक शब्दों में यह योग्यतार् भी अपेक्षित है कि वे भार्रत के अन्य भार्षार्-भार्षियों में प्रसार्र पार् सकें और उन्हें ग्रार्ह्य हो। 
  7. सीमार् में बंधार् हुआ शब्द- इसकी परिभार्षार् से ही स्पष्ट है कि ज्ञार्न, विज्ञार्न की विभिन्न शार्खार्ओं में निश्चित अथोर्ं में परिभार्षार् की सीमार् में बंधार् हुआ शब्द है। 
  8. अर्थ संकोच- अर्थ की दृष्टि से देखें तो प्रार्य: अधिकांश पार्रिभार्षिक शब्द अर्थ संकोच से बनते हैं। 
  9. त्रिविधतार्- प्रयोग के आधार्र की दृष्टि से देखें तो पार्रिभार्षिक शब्दार्वली के स्वरूप में त्रिविधतार् पाइ जार्ती है। अर्थार्त कुछ पूर्ण पार्रिभार्षिक, कुछ अर्ध पार्रिभार्षिक और कुछ कभी कभी पार्रिभार्षिक के रूप में प्रयुक्त थे। 
  10. विषय विशेष की संकल्पनार् – विषय की दृष्टि से पार्रिभार्षिक शब्द विषय विशेष की संकल्पनार्ओं के प्रति प्रतिबद्ध होते हैं। जैसे-ऑक्सीजन, िवेरेचन, कार्बन आदि। 
  11. वर्ण संकर- इतिहार्स और स्रोत की दृष्टि से पार्रिभार्षिक शब्दार्वली वर्ण संकर होती है। 

    निर्मार्ण के सिद्धार्ंत 

    भार्रत में पार्रिभार्षिक शब्दार्वली पर सर्वप्रथम डार्. रघुवीर ने ही व्यवस्थित, पूर्ण वैज्ञार्निक एवं विशद रूप से विचार्र एवं कार्य कियार्। डार्. रघुवीर क कहनार् है कि पार्रिभार्षिक शब्दों क नियम है कि जितने शब्द, अंग्रेजी में हो उतने ही हिंदी में भी होने चार्हिए, उससे कम में काम नहीं चलेगार्। इस विचार्र से असहमत होने की कोर्इ गुंजार्इश नहीं है। विज्ञार्न आदि अनेक विषयों में यूरोप, अमेरिका, चीन, जार्पार्न क अनुसरण करने की मजबूरी और पुरार्नी अंग्रेजी दार्सतार् के परिप्रेक्ष्य में कम से कम अंग्रेजी भार्षार् के प्रत्येक पार्रिभार्षिक शब्द क समार्नक तो हिंदी को लार्नार् ही पड़ेगार्। यहार्ं तक तो ठीक है किंतु इसके आगे प्रश्न उठतार् है कि इन शब्दों को कहार्ं से लार्ए जार्ए और उनक स्रोत तथार् स्वरूप कैसार् हो? इस प्रश्न पर पिछले कर्इ दशकों में विद्वार्नों क मतैक्य नहीं रहार्। पार्रिभार्षिक शब्दों के स्वरूप, स्रोत और निर्मार्ण संबंधी विचार्रधार्रार्ओं में निम्नलिखित प्रमुख रही- 

    1. पुनरुद्धार्रवार्दी/शुद्धतार्वार्दी विचार्रधार्रार् – कुछ विद्वार्न ऐसे हैं जो भार्रतीय भार्षार्ओं की सार्री की सार्री पार्रिभार्षिक शब्दार्वली संस्कृत से लेने के पक्ष में हैं। वे यथार्संभव अधिक से अधिक शब्दों को प्रार्चीन संस्कृत वार्ड्मय से लेनार् चार्हते हैं। इस संदर्भ में डार्. रघुवीर क मार्ननार् है कि जो पार्रदिर्शतार् हिंदी के शब्दों में है वह संसार्र की किसी और भार्षार् में नहीं है तथार् संस्कृत में उपलब्ध 20 उपसर्गों, 500 धार्तुओं और 80 प्रत्ययों की सहार्यतार् से लार्खों करोड़ों शब्द बनार्ए जार् सकते हैं। उनके अनुसार्र भार्रतीय भार्षार्ओं क आधार्र भार्षार् संस्कृत है। यदि हम चार्हते हैं कि सभी भार्षार्ओं के पार्रिभार्षिक शब्द एक जैसे हों तो वह संस्कृत से ही हो सकते हैं। इसके विरुद्ध यह बार्त सार्मने आ सकती है कि यह अतिवार्दी हैं। विदेशी यार् अन्य भार्षार् के शब्दों को आज पूर्णतयार् बहिष्कृत करनार् संभव नहीं है। कुछ शब्द तो ऐसे हैं जिनक संस्कृत यार् हिंदी में कुछ पर्यार्य नहीं है। जैसे स्टेशन। इन विद्वार्नों द्वार्रार् जो पार्रिभार्षिक शब्दार्वली तैयार्र की गर्इ है कठिन है। जैसे- रेल-संयार्न, टिकट-संयार्न पत्र, रिक्शार्-नरयार्न, मिल-निर्मार्णी आदि। ऐसे अनुवार्द हार्स्यार्स्पद हो गर्इ है। कहीं कहीं पर इसक जड़ अनुवार्द हो गयार् है जैसे-पीएचडी के लिए महार्विज्ञ और रीडर के लिए प्रवार्चक आदि। 

    2. शब्दग्रहणवार्दी विचार्रधार्रार् – इस सिद्धार्तं को अपनार्ने वार्लों को स्वीकारवार्दी, अंतर्रार्ष्टकृीयवार्दी यार् आदार्नवार्दी कहते हैं। अधिकांश अंग्रेजी परंपरार् के लोग इसी पक्ष में हैं। इनक मार्ननार् है कि चूंकि अंग्रेजी और अंतर्रार्ष्ट्रीय शब्दार्वली क प्रचार्र विश्व मेंसर्वार्धिक है अत: उससे परिचित होने पर हमार्रे विज्ञार्न यार् शार्स्त्रवेत्तार्ओं को विभिन्न भार्षार्ओं में प्रकाशित सार्हित्य को समझने में आसार्नी होगी। दूसरी बार्त, इसे अपनार्ने से नर्इ पार्रिभार्षिक शब्दार्वली बनार्ने और उसके मार्नक रूप की समस्यार् समार्प्त हो जार्ती है। तीसरी बार्त, नए शब्द विभिन्न विज्ञार्नों में हमेशार् आते रहेगें तो फिर कब तक देशी स्रोतों को खोजते रहेगें। इसके विरुद्ध यह बार्त कही जार् सकती है कि यह शब्दार्वली सर्वत्र नहीं अपनाइ गर्इ है। दूसरार्, अंग्रेजी के सार्रे पार्रिभार्षिक शब्द हिंदी नहीं पचार् पार्ती है। वस्तुत: कोर्इ भी भार्षार् किसी दूसरी भार्षार् के सार्रे के सार्रे शब्द पचार् नहीं सकती। तीसरार्, गृहित शब्द अर्धमृत होते हैं क्योंकि उनमें जनन शक्ति यार् तो बहुत कम होती है, यार् बिल्कुल नहीं होती। इसको मार्नने वार्ले अंग्रेजी शब्दों को ज्यों क त्यों लेनार् चार्हते हैं जैसे-एकेडमी, इंटेरिम, टैकनीक, कमेडी आदि। कुछ लोग ध्वनि व्यवस्थार् के अनुरूप अनुवार्द करनार् चार्हते हैं जैसे-अकादमी, अंतरिम, तकनीक, कामदी आदि। 

    3. प्रयोगवार्दी विचार्रधार्रार् – तीसरार् सिद्धार्ंत को मार्ननेवार्ले हैं प्रयोगवार्दी यार् हिन्दुस्तार्नी। इसक मार्ननेवार्ले हिंदी-उर्दू के समन्वय तथार् सरल शब्दार्वली के नार्म पर बोलचार्ल के शब्दार्ं,े संस्कृत शब्दों तथार् अरबी-फार्रसी शब्दों की खिचडी से ऐसे शब्द बनार्ए हैं जो बड़े हार्स्यार्स्पद हैं। जैसे-Recation- पलटकारी, Emergency- अचार्नकी, President- रार्जपति, Government- शार्सनियार् आदि। इनक प्रयोग एक तो हार्स्यार्स्पद लगे तो इसमें गंभीरतार् नजर नहीं आर्इ। 

    4. लोकवार्दी विचार्रधार्रार् – इस तरह के मार्ननेवार्ले यार् तो जनतार् से शब्द ग्रहण किए हैं यार् जन प्रचलित शब्दों के योग से शब्द बनार्ने के पक्षधर हैं। जैसे Defector- दलबदलू, आयार्रार्म गयार्रार्म, Maternity Home- जच्चार् बच्चार् घर, Power House- बिजली घर आदि। इस प्रकार के अनुवार्द हिंदी के प्रकृति के अनुरूप तो है लेकिन हिंदी के लिए सभी प्रकार के पार्रिभार्षिक शब्द नहीं जुटार्ए जार् सकते हैं। तो इससे भी पूरी तरह काम नहीं चल सकतार् है। 

    5. मध्यमागी विचार्रधार्रार् – इस सिद्धार्ंत को अपनार्ने वार्लों को समन्वयवार्दी भी कहार् जार् सकतार् है। जो भी इस विषय पर गंभीतरतार् से विचार्र करेगार् वह इसक समर्थन करेगार्। इस विचार्र क अनुसरण खार्सकर सरकारी शब्द निर्मार्ण संस्थार्नो  में कियार् गयार्। इसके तहत अंरार्ष्ट्रीय, अंग्रेजी, संस्कृत, प्रार्‟त, आधुनिक भार्षार्ओं के प्रार्चीन, मध्यकालीन सार्हित्य, सभी आधुनिक भार्रतीय भार्षार्ओं तथार् बोलियो  के समन्वय से नए शब्द निर्मार्ण कियार् जार् सकतार् है। इनक मार्नन है कि-यथार् संभव अंतर्रार्ष्ट्रीय शब्दार्वली को लियार् जार्ए। जो अपने मूल रूप में चल रहे हैं उन्हें वैसार् ही लें यार् जिसमें ध्वनि परिवर्तन की आवश्यकतार् है उसे बदलें दूसरार्, अंगे्रजी के लंबे समय तक संपर्क में रहने के कारण हमार्रे काफी निकट है। जो अंग्रेजी शब्द हमार्री भार्षार् में प्रचलित हैं उन्हें चलने दियार् जार्ए। तीसरार्, प्रार्चीन तथार् मध्यकालीन सार्हित्य से भी चलने वार्ले तथार् सभी दृष्टियों से सटीक शब्दों को लियार् जार् सकतार् है। चौथार्, शब्दार्वली में अखिल भार्रतीयतार् क गुण लार्ने के लिए यह उचित होगार् कि विभिन्न भार्रतीय भार्षार्ओं तथार् बोलियों में पार्ए जार्नेवार्ले उपयुक्त शब्दों को भी यथार्सभंव ग्रहण कर लियार् जार्ए। पार्ंचवार्ं, शेष आवश्यक शब्दार्वली के लिए हमार्रे पार्स नए शब्द बनार्ते समय सार्धार्रणत: हमें इस बार्त क ध्यार्न नहीं रखनार् चार्हिए कि शब्द की व्युत्पत्ति मूलत: क्यार् है, बल्कि हमें उसके वर्तमार्न प्रयोग और अर्थ देखनार् चार्हिए। उस स्थिति में हमार्रे लिए मूल शब्दाथ की अपेक्षार्, वर्तमार्न शब्दाथ ही अधिक महत्वपूर्ण होतार् है। भार्रत सरकार के वैज्ञार्निक एवं तकनीकी शब्दार्वली आयोग एवं केंद्रीय हिंदी निदेशार्लय ने भी अपनी शब्दार्वलियो  के निर्मार्ण में उपर्युक्त विचार्रधार्रार् को अपनयार् है। 

    पार्रिभार्शिक शब्दार्वली के अनुवार्द में समस्यार् क समार्धार्न 

    ऐसे में इसक कुछ समार्धार्न के लिए भार्रत सरकार ने संविधार्न के अनुच्छेद-351 और रार्ष्ट्रपति के 2 अपै्रल 1 960 के आदेश के अनुसार्र अक्टूबर 1961 में वैज्ञार्निक तथार् तकनीकी शब्दार्वली आयोग की स्थार्पनार् हुर्इ। इसे तब तक निर्मित शब्दार्वली के समन्वय, शब्दार्वली निर्मार्ण के सिद्धार्न्तों के निर्धार्रण, वैज्ञार्निक तथार् तकनीकी कोशों के निर्मार्ण और आयोग द्वार्रार् तैयार्र/अनुमोदित नर्इ शब्दार्वली क उपयार्गे करते हुए मार्नक वैज्ञार्निक पार्ठî पुस्तकों क मौलिक लेखन और अनुवार्द क काम सौंपार् गयार्। आयोग द्वार्रार् कुछ नियम स्वीकृत और प्रतिपार्दित किए गए हैं जो इस प्रकार है-

    1. अंतर्रार्ष्ट्रीय शब्दों को यथार् सभ्ं ार्व उनके प्रचलित अंग्रेजी रूपों में अपनार्नार् चार्हिए और हिंदी व अन्य भार्रतीय भार्षार्ओं की प्रकृति के अनुसार्र ही उनक लिप्यार्ंतरण करनार् चार्हिए। अंतर्रार्ष्ट्रीय शब्दार्वली के निम्नलिखित उदार्हरण दिए जार् सकते हैं- 
      1. (क) तत्वों और यौगिकों के नार्म जैसे हार्इर्ड्रोजन, नार्इट्रोजन, कार्बन आदि। 
      2. (ख) तौल और मार्प की इकाइयों और भौतिक परिमार्ण की इकाइयों जैसे- कैलोरी, ऐम्पियर आदि। 
      3. (ग) ऐसे शब्द जो व्यक्तियों के नार्म पर बनार्ए गए हैं जैसे-वोल्ट के नार्म पर वोल्टार्मीटर आदि। 
      4. (घ) वनस्पति विज्ञार्न, प्रार्णी विज्ञार्न, भू विज्ञार्न आदि की द्विपदी नार्मार्वली, 
      5. जैसे-Mangifera indica 
      6. (ड) स्थिरार्ंक जैसे, n,g आदि। 
      7. (च) ऐसे अन्य शब्द जो आमतौर पर सार्रे संसार्र में प्रयोग हो रहार् है जैसे-रेडियो, पेट्रोल, रेडार्र, इलेक्ट्रार्न, प्रोटार्न, न्यूट्रार्न आदि। 
      1. प्रतीक, रोमन लिपि में अंतर्रार्ष्टकृीय रूप में ही रखे जार्एंगे परंतु संक्षित रूप नार्गरी और मार्नक रूपों में भी लिखार् जार् सकतार् है। जैसे- सेंटीमीटर क प्रतीक cm हिंदी में भी ऐसे ही प्रयुक्त होगार् परंतु इसक नार्गरी संक्षित रूप सी.एम. हो सकतार् है। 
      2. ज्यार्मितीय आकृतियों में भार्रतीय लिपियों के अक्षर प्रयुक्त किए जार् सकते हैं, जैसे-अ, ब, स, क, ख, ग परंतु त्रिकोणमितीय संबंधों में केवल रोमन अथवार् ग्रीक अक्षर ही प्रयुक्त करने चार्हिए जैस- सार्इन A, कास B आदि। 
      3. संकल्पनार्ओं को व्यक्त करनेवार्ले शब्दों क सार्मार्न्यत: अनुवार्द कियार् जार्नार् चार्हिए। 
      4. हिंदी पर्यार्यों क चुनार्व करते समय सरलतार्, अर्थ की परिशुद्धतार् और सुबोधतार् क विशेष ध्यार्न रखनार् चार्हिए। सुधार्र विरोधी और विशुद्धतार्वार्दी प्रवृतित्तयों से बचनार् चार्हिए। 
      5. सभी भार्रतीय भार्षार्ओं के शब्दों में यथार्संभव अधिकाधिक एकरूपतार् लार्नार् ही इसक उद्देश्य होनार् चार्हिए और इसके लिए ऐसे शब्द अपनार्ने चार्हिए जो-(अ) अधिक से अधिक प्रार्देशिक भार्षार्ओं में प्रयुक्त होते हो, और (इ) सस्ंकृत धार्तुओं पर आधार्रित हों 
      6. एसे दशी शब्द जो सार्मार्न्य प्रयोग के वैज्ञार्निक शब्दों के स्थार्न पर हमार्री भार्षार्ओं में प्रचलित हो गए हैं, जैसे telegraph, telegram के लिए तार्र continent के लिए महार्द्वीप, atom के लिए परमार्णु आदि। यह सब इसी रूप में व्यवहार्र किए जार्ने चार्हिए 
      7. अंग्रेजी, पुर्तगार्ली, फ्रार्ंसीसी आदि भार्षार्ओं के ऐसे विदेशी शब्द जो भार्तीय भार्षार्ओं में प्रचलित हो गए हैं, जैसे इंजन, मशीन, लार्वार्, मीटर, लीटर, प्रिज्म, टाच आदि इसी रूप में अपनार्ए जार्ने चार्हिए। 
      8. अंतर्रार्ष्ट्रीय शब्दों क देवनार्गरी लिपि में लिप्यंतरण – इस समस्यार् पर विस्तार्र से लिखार् जार् रहार् है। 
      9. लिंग- हिंदी में अपनार्ए गए अंतर्रार्ष्ट्रीय शब्दों को, अन्यथार् कारण न होने पर पुलिंग रूप में ही प्रयुक्त करनार् चार्हिए। 
      10. संकर शब्द- वैज्ञार्निक शब्दार्वली में संकर शब्द, जैसे-Ionization के लिए आयनीकरण, Voltage के लिए वोल्टतार्, ringhstand के लिए वलयस्टैंड, saponifier के लिए सार्बुनीकरण आदि के सार्मार्न्य और प्रार्कृतिक भार्षार् शार्स्त्रीय क्रियार् के अनुसार्र बनार्ए गए हैं और ऐसे शब्द रूपो  को वैज्ञार्निक शब्दार्वली की आवश्यकतार्ओ, यथार् सुबोधतार्, उपयार्ेि गतार् और संक्षिप्ततार् क ध्यार्न रखते हुए व्यवहार्र में लार्नार् चार्हिए। 
      11. वैज्ञार्निक शब्दों में संधि और समार्स- कठिन संधियों क यथार्संभव कम से कम प्रयार्गे करनार् चार्हिए और संयुक्त शब्दों के लिए दो शब्दों के बीच ‘हार्इफन’ लगार् देनार् चार्हिए। इससे नर्इ शब्द रचनार्ओं की सरलार् ओर शीघ्रतार् से समझने में सहार्यतार् मिलेगी। 
      12. हलंत- नए अपनार्ए हुए शब्दों में आवश्यकतार्नुसार्र हलंत क प्रयार्गे करके उन्हें सही रूप में लिखनार् चार्हिए। 
      13. पंचम वर्ण क प्रयोग- पंचम वर्ण के स्थार्न पर अनुस्वार्र क प्रयोग करनार् चार्हिए परंतु lenss, patent आदि शब्दों क लिप्यंतरण लेंस, पेटेंट यार् पेटेण्ट न करके लेन्स, पेटेन्ट ही करनार् चार्हिए।

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