न्यार्यिक सक्रियतार्

न्यार्यिक सक्रियतार् की उत्पत्ति

प्रजार्तन्त्र के तीन प्रमुख स्तम्भों न्यार्यपार्लिका, विधार्यिक एवं कार्यपार्लिक में से जब विधार्यिक तथार् कार्यपार्लिक स्वयं को प्रदत्त कार्यों को करने में शिथिलतार् प्रकट करें यार् असमर्थ हो जार्ये तो प्रजार्तंत्र के तीसरे स्तम्भ के रूप में न्यार्यार्पार्लिक इन कार्यों क संपार्दन करने हेतु आगे आती है। यही अवधार्रणार् न्यार्यिक सक्रियतार् कहलार्ती है। न्यार्यिक सक्रियतार् की संकल्पनार् क त्वरित गति से विकास उच्चतम न्यार्यार्लय द्वार्रार् मेनक गार्ंधी बनार्म भार्रत संघ (AIR 1978 SC 597) के मार्मले में दिये गये निर्णय के उपरार्न्त हुआ।

न्यार्यिक सृजनशीलतार् एक निर्धार्रित तरीके एवं मार्नकों के अनुसार्र न्यार्यिक विवेक क प्रयोग करके की जार्ती है। विगत कुछ दशकों से न्यार्यिक सक्रियतार् की बार्त जोर पकड़ रही है। यद्यपि इसक नकारार्त्मक एवं रूढ़िवार्दी स्वरूप अमेरिक में 1930 के दशक में तथार् भार्रत में 1950-60 के दशक में प्रभार्वकारी रहार् है। फिर इसके प्रगतिशील स्वरूप की चर्चार् विगत अर्द्धशतक से ज्यार्दार् समय से प्रकाश में आयी है। जहार्ँ तक न्यार्यिक सक्रियतार् के प्रार्संगिकतार् की बार्त है यहार्ँ पर इस परिप्रेक्ष्य में संवैधार्निक उपबन्ध तथार् उसके ऐतिहार्सिक पृश्ठभूमि क अध्ययन समीचीन होगार्।

फ्रार्ंस के रार्जनीतिक दाशनिक बैरेन तथार् मॉण्टेस्क्यू ने अपनी पुस्तक ‘Spirit de laws’ में किसी भी लोकतंत्रार्त्मक रार्ज्य में प्रशार्सन के सम्बन्ध में एक मॉडल प्रतिपार्दित कियार् जो कि शक्ति पृथक्करण के सिद्धार्न्त के रूप में जार्नार् जार्तार् है। यह मॉडल ‘त्रिस्तरीय रार्जव्यवस्थार्’ के नार्म से भी प्रसिद्ध है। इस सिद्धार्न्त के अन्तर्गत सरकार के तीन प्रमुख अंग होते हैं, जो कि विधार्यिका, कार्यपार्लिक एवं न्यार्यपार्लिक हैं। प्रत्येक अंग क भिन्न-भिन्न कार्य, शक्तियार्ँ एवं उत्तरदार्यित्व होतार् है। विधार्यिक क मुख्य कार्य विधि-निर्मार्ण करनार्, कार्यपार्लिक क कार्य उस विधि को प्रवर्तित करनार् है तथार् न्यार्यार्पार्लिक अपने समक्ष प्रस्तुत विधि के भंग सम्बन्धी विशिष्ट मार्मलों को विधि के अनुसार्र निस्तार्रित करती है।

हमार्रार् संविधार्न भी एक सुविकसित दस्तार्वेज है। इसमें सरकार के विभिन्न अंगों को पृथक-पृथक कृत्य सौंपे गये हैं। प्रत्येक अंग की शक्तियोंं, विशेषार्धिकारों एवं कर्तव्यों के सम्बन्ध में कोर्इ अस्पष्टतार् नहीं है। विधार्यिक को विधि निर्मार्ण, न्यार्यार्पार्लिक को विधि क निर्वचन तथार् कार्यपार्लिक को विधि के प्रवर्तन क कार्य प्रदार्न कियार् गयार् है। तथार् इसमें किसी भी प्रकार से अतिक्रमण यार् अतिव्यार्पन क सम्भार्वनार् नहीं दिखती। इस प्रकार यह सिद्धार्न्त प्रत्येक अंग द्वार्रार् अपने क्षेत्र में स्वार्यत्ततार् बनार्ये रखने क उदार्हरण प्रस्तुत करतार् है।

किन्तु संविधार्न उस स्थिति पर मौन है जबकि सरकार क कोर्इ भी अंग संविधार्न में वर्णित शक्ति पृथक्करण की अनदेखी करते हुए कार्य करे यार् उसक अनुसरण न करे। ऐसे अनेकों दृष्टार्न्त हैं जबकि कार्यपार्लिक एवं न्यार्यार्पार्लिक के मध्य मतभेद की स्थिति उत्पन्न हुयी है।

अन्य लोकतार्ंत्रिक देश भी विधार्यिक एवं कार्यपार्लिक के मध्य शक्तियों के संकेन्द्रण की समस्यार् क सार्मनार् कर चुके हैं तथार् वहार्ँ संवैधार्निक विकास की प्रक्रियार् के दौरार्न इस प्रकार की समस्यार्ओं क निदार्न भी कर लियार् गयार्।

इंग्लैण्ड संसदीय प्रणार्ली के शार्सन क अतिउत्तम उदार्हरण है तथार् वहार्ँ विधार्यी वर्चस्व को आसार्नी से स्थार्पित कियार् गयार् है। ब्रिटिश मॉडल के शार्सन में विधार्यिक की सर्वोच्चतार् स्थार्पित होने क एक अन्य कारण संविधार्न क लिखित न होनार् भी है।

अमेरिक में संघीय संविधार्न क गठन संविधार्न की सर्वोच्चतार् के सिद्धार्न्त पर कियार् गयार् है। बार्द में अमेरिक क संविधार्न न्यार्यिक पुनर्विलोकन के सिद्धार्न्त के प्रतिपार्दन होने से अन्य अंगों की अपेक्षार् और अधिक शक्तिशार्ली हो गयार्। अत: अमेरिक में संघीय न्यार्यार्लय न्यार्यिक पुनर्विलोकन की पूर्ण एवं व्यार्पक शक्तियों क प्रयोग करतार् है। अमेरिकन प्रणार्ली में कोर्इ भी विधि न्यार्यिक पुनर्विलोकन से परे नहीं है। अत: वहार्ँ की लोकतार्ंत्रिक व्यवस्थार् में न्यार्यिक सर्वोच्चतार् व्यार्प्त है।

भार्रतीय संविधार्न में इंग्लैण्ड व अमेरिक की लोकतंत्रार्त्मक व्यवस्थार् से भिन्न व्यवस्थार् को अपनार्यार् गयार् है। हमार्रे संविधार्न में संघीय गुणों से युक्त संसदीय प्रणार्ली की सरकार को अपनार्यार् गयार् है। ऐसी संसदीय प्रणार्ली की सरकार जो कि विधार्यी सर्वोच्चतार् की ओर संकेत करती है। किन्तु संविधार्न क संघीय गुण सर्वोच्च न्यार्यार्लय को न्यार्यिक पुनर्विलोकन की शक्ति क प्रयोग करने हेतु सक्षम बनार्तार् है। अत: वर्तमार्न समस्यार् की जड़े हमार्रे संविधार्न की परिकल्पनार् में भी पार्यी जार्ती है।

संविधार्न के अन्तर्गत विधार्यिक एंव न्यार्यार्पार्लिक की स्वतन्त्रतार् को सुनिश्चित करने के लिए अनेकों प्रार्वधार्न किये गये हैं। जो कि दोनों के मध्य एक लक्ष्मण रेखार् खींचते हैं। संविधार्न के अनुच्छेद 121 एवं 211 के अन्तर्गत विधार्यिक को न्यार्यार्धीशों द्वार्रार् अपने कर्तव्यों के निर्वहन में किये गये आचरण पर चर्चार् करने से रोकतार् है। इसी प्रकार अनुच्छेद 122 व न्यार्यपार्लिक को विधार्नमण्डल की आंतरिक कार्यवार्हियों के सन्दर्भ में विचार्रण करने पर रोक लगार्तार् है। अनुच्छेद 105/194 के अन्तर्गत विधार्नमण्डल के सदस्यों के भार्षण एवं मत देने की स्वतन्त्रतार् के सन्दर्भ में न्यार्यार्लय द्वार्रार् हस्तक्षेप पर रोक लगार्तार् है। अनुच्छेद 13, 32 एवं 226 न्यार्यपार्लिक को विधार्यिक द्वार्रार् अतिक्रमण किये जार्ने की स्थिति में न्यार्यिक पुनर्विलोकन की शक्ति प्रदार्न करते हैं। प्रार्रम्भ में भार्रतीय उच्चतम न्यार्यार्लय ने अनु0 21 के प्रार्वधार्नों क शार्ब्दिक निर्वचन करते हुए विधि द्वार्रार् स्थार्पित प्रक्रियार् क अर्थ ऐसी प्रक्रियार् जो विधार्नमण्डल द्वार्रार् निर्धार्रित की गयी हो, के रूप में स्पष्ट करते हुए ए0के0 गोपार्लन बनार्म मद्रार्स रार्ज्य (AIR 1952 SC 27) के मार्मले में इग्लैण्ड की विधिक प्रणार्ली की आधार्र मार्नते हुए विधि की विश्लेशणार्त्मक व्यार्ख्यार् को महत्व दियार्। तत्पश्चार्त मेनक गार्ंधी बनार्म भार्रत संघ के वार्द उच्चतम न्यार्यार्लय ने विधि द्वार्रार् स्थार्पित प्रक्रियार् की समार्जशार्स्त्रीय व्यार्ख्यार् करते हुये इसे उचित ऋतु तथार् न्यार्यपूर्ण प्रक्रियार् के रूप में प्रकट कियार् है। इस के अनुसार्र न्यार्यार्लय ने अनेक निर्णयों के मार्ध्यम से नार्गरिकों के हितों में होने वार्ले संघर्ष में सार्मंजस्य बैठार्कर संविधार्न के प्रमुख उद्देश्य सार्मार्जिक आर्थिक एवं रार्जनीतिक न्यार्य को पूरार् करने क प्रयार्स कियार् तथार् वितरणार्त्मक एवं उपचार्रार्त्मक, न्यार्य नार्गरिकों को प्रदार्न करने क माग प्रशस्त कियार्।

कुल लोगों क यह भी मत है कि बार्द में न्यार्यार्लय ने विधि की यर्थार्थवार्दी विचार्रधार्रार् क माग अपनार्कर न्यार्यिक अतिरेकवार्द की स्थिति को जन्म दे दियार् जो स्वीकार्य नहीं है क्योंकि इससे संविधार्न के मुख्य उद्देश्य लोकतंत्र तथार् विधि के शार्सन के आहत होने की सम्भार्वनार् उत्पन्न हो गयी है।

न्यार्यिक सक्रियतार् एवं अनुच्छेद 21

वर्तमार्न समय में भार्रतीय संविधार्न क अनुच्छेद 21 क व्यार्पक स्वरूप भार्रतीय उच्चतम न्यार्यार्लय की क्रियार्शीलतार् को प्रतिविम्बित करतार् है। न्यार्यिक सक्रियतार् क आधार्र अनु0 21, न्यार्यिक पुर्नविलोकन अनु0 13-(1), अनु0 13 (2), अनु0 32 तथार् 142 है। इसकी उत्पत्ति इसी के आधार्र पर हुयी तथार् इसी क अति विकसित रूप ही न्यार्यिक अतिसक्रियतार् है। अनु0 21 को संविधार्न में सम्मिलित करते समय संविधार्न सभार् में काफी विचार्र विमर्ष हुआ और इसके लिए विभिन्न प्रचलित संविधार्नों क अध्ययन कियार् गयार्, परन्तु इसके बार्द भी स्थिति स्पष्ट न होने के कारण डॉ0 बी0एन0रार्व को अमेरिक भेजार् गयार् तार्कि वह वहार्ँ प्रार्ण एवं दैहिक स्वतन्त्रतार् की स्थिति क अवलोकन कर सके।

डॉ0 बी0एन0रार्व ने इस सम्बन्ध में न्यार्यार्धीश फ्रैन्कफर्टर से बार्तचीत की उन्होंने कहार् कि भार्रत एक नव निर्मित लोकतार्न्त्रिक देश है। अत: स्थिति को नियन्त्रित रखने के लिए किसी भी सरकार के निकाय को इतनार् शक्तिशार्ली नहीं बनार्यार् जार् सकतार् जितनार् कि अमेरिक में उच्चतम न्यार्यार्लय है। जहार्ँ तक न्यार्यिक सक्रियतार्वार्द की आवश्यकतार् क प्रश्न है तो इससे इन्कार करनार् उचित नहीं कहार् जार् सकतार् क्योंकि यदि कोर्इ फैसलार् यार् कार्य कार्यार्पार्लिक के कार्यक्षेत्र के अन्तर्गत है और वह उसक उचित नियोजन नहीं करतार् है तो उसके उचित नियोजन के लिये न्यार्यार्पार्लिक प्रभार्वी भूमिक निभार् सकती है।

न्यार्यिक अतिसक्रियतार् अथवार् न्यार्यिक अतिरेकवार्द

भार्रतीय लोकतन्त्र में विधार्यिक एवं न्यार्यपार्लिक के मध्य टकरार्व की घटनार् कोर्इ नर्इ नहीं है। दोनों के मध्य मतभेद किसी संवधि को प्रयोगार्त्मक रूप से लार्गू करने में उत्पन्न नहीं होते बल्कि ऐसार् कभी-कभी एक अंग द्वार्रार् दूसरे अंग के क्षेत्र में अतिक्रमण से होतार् है। यह एक दूसरे के प्रति ऐसार् विरोध होतार् है जो कि शीघ्रतार् से गम्भीर रूप प्रार्प्त कर लेतार् है। पहलार् प्रत्यक्ष मतभेद 1965 में सार्मने आयार् जो कि केशव सिंह के मार्मले में उत्पन्न हुआ थार् इस मार्मले में जो विधिक एवं संवैधार्निक प्रश्न अन्र्तवलित थार् वह संसद के अपने प्रार्धिकारियों के ऊपर अनन्य क्षेत्रार्धिकार के सम्बन्ध में थार् जिसके द्वार्रार् वह अपने विशेषार्धिकारों क वर्णन तथार् संरक्षण तथार् उन्हें बनार्ए रख सकती है।

श्रीमती इन्दिरार् गार्ँधी ने न्यार्यपार्लिक के ऊपर संसदीय सर्वोच्चतार् को स्थार्पित करने के लिए 24 वें, 25वें तथार् 42वें संविधार्न संशोधन के रूप में श्रृंखलार्बद्ध प्रयार्स किए। यहार्ँ तक कि उन्होंने एक अवर न्यार्यार्धीश को वरिश्ठ न्यार्यार्धीश पर वरीयतार् देते हुए मुख्य न्यार्यार्धीश के रूप में नियुक्ति देकर न्यार्यपार्लिक के मनोबल को गिरार्ने क प्रयार्स कियार्। यह मार्मलार् केशवार्नन्द भार्रती के मार्मले में आधार्रित संरचनार् के सिद्धार्न्त के प्रतिपार्दन के पश्चार्त् ही सुलझ सका। इस निर्णय के द्वार्रार् संविधार्न के मूलभूत लक्षणों के आधार्र पर उसकी सर्वोच्चतार् स्थार्पित की गर्इ।

दूसरार् विवार्द 1990 के पश्चार्त् मध्य के वर्शो में उत्पन्न हुआ जबकि उस समय विधमार्न शक्तियों के संतुलन को संविधार्न के चार्र महत्वपूर्ण निर्वेचनों द्वार्रार् उलट दियार् गयार् विभिन्न उच्च न्यार्यार्लयों में अनुच्छेद 356 क पुर्ननिर्वचन कियार् जिससे की रार्ज्यपार्ल की रार्ज्य सरकारों को बर्खार्स्त करने की अपवार्द रहित शक्तियार्ँ कम कर दी गर्इ। न्यार्यार्लय की अपनी अवमार्ननार् को दंडित करने की अनुच्छेद 142 के अन्तर्गत शक्ति क विस्तार्र कियार् गयार् तथार् उच्चतम न्यार्यार्लय की अन्र्तनिहित शक्तियों के दार्यरे में अनेकों विस्तृत सीमार्ओं वार्ले विषयों को शार्मिल कियार् गयार्।

अन्य पिछड़ार् वर्ग के लिए नौकरियों में आरक्षण नीति से सम्बन्धित निर्णय के कारण अपेक्षार्ओं से परे रार्जनीतिक गर्मार्हट उत्पन्न हुर्इ किन्तु महत्वपूर्ण परिवर्तन 1994 में अनुच्छेद 124 तथार् 217 के अन्तर्गत न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति प्रक्रियार् में आयार्। जबकि कार्यपार्लिक के अनन्य अधिकारो को कम करके उच्चतम न्यार्यार्लयों के न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति के सम्बन्ध में ब्श्रप् तथार् चार्र वरिश्ठ न्यार्यार्धीशों क एक कॉलेजियम निर्मित करने क निर्णय लियार् गयार्। विवार्द के तीसरे मुद्दे में शीघ्रतार् से गम्भीर रूप 2006 में धार्रण कियार् जो कि आज तक विद्यमार्न है।

उच्चतम न्यार्यार्लय द्वार्रार् केन्द्रीय शिक्षण संस्थार्ओं में पिछड़ी जार्ति के लिए आरक्षण, लार्भ के पद क मार्मलार्, धन लेकर संसद में प्रश्न पूछने क मार्मलार्, नवीं अनुसूची क न्यार्यिक पुर्नविलोकन तथार् दिल्ली में लैण्ड सीलिंग कुछ ज्वलन्त मार्मले हैं। जिनके सम्बन्ध में विधार्यिक से विवार्द की स्थिति उत्पन्न हुर्इ। जब तक कि ये निस्तार्रित नहीं हो जार्ते ये प्रशार्सन के लिए गम्भीर एवं अप्रत्यक्ष प्रभार्व उत्पन्न करेंगे।

कुछ मार्मलों में जब न्यार्यार्लय इस सक्रियतार्वार्द के सिद्धार्न्त क अधिक प्रयोग करते हुए विधार्यी यार् कार्यपार्लिकीय विषयों में घुसपैठ यार् बलार्त प्रवेश करतार् है तो यही न्यार्यिक अतिसक्रियतार्वार्द यार् न्यार्यिक अतिरेकवार्द क रूप धार्रण कर लेतार् है। इसी बार्त को ध्यार्न में रखते हुये भार्रत संघ बनार्म संकल चन्द्र सेठ (ए0आर्इ0आर0 1977) सु0को0 के वार्द में न्यार्यमूर्ति कृष्णार् अय्यर तथार् न्यार्यमूर्ति फ़ज्लअली ने स्पष्ट कियार् थार् कि संविधार्निक संहितार् को समझते समय तथार् इसक निर्वचन करते समय गत समय की जड़े, विद्यमार्न समय की आपत्तियों तथार् भविष्य के बीज कर्मण्यतार्वार्दी न्यार्यार्धीश की निगार्ह में होने चार्हिए।

पुन: द पीपुल्स यूनियन फार्र सिविल लिबाटीज बनार्म भार्रत संघ (1995 SCC 138) के मार्मले में उच्चतम न्यार्यार्लय ने दूरभार्ष से सम्बन्धित एकान्ततार् के मार्नवार्धिकारों को स्वीकार कियार् है, परन्तु इसक आधार्र मार्नवार्धिकारों के सावभौमिक घोषणार्, 1948 के अनु0 12 और नार्गरिक तथार् रार्जनैतिक अधिकारों की अन्तर्रार्ष्ट्रीय प्रसंविदार् के अनु0 17 को मार्नार् गयार्। इस वार्द में यह मत व्यक्त कियार् गयार् है कि ऐसी अन्तर्रार्ष्ट्रीय प्रसंविदार्यें अथवार् अभिसमय जो भार्रतीय संविधार्न द्वार्रार् प्रत्यार्भूत मूल अधिकारों की व्यार्ख्यार् करते हैं यार् प्रभार्वकारी बनार्ते हैं उन्हें मूलार्धिकारों की लघु मुखार्कृति मार्नकर प्रभार्वी मार्नार् जार् सकतार् है।

इसी प्रकार ऐपरेल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउसिंल बनार्म ए0के0 चौपड़ार् (AIR 1999 SC 625) के मार्मले में सक्रियतार्वार्दी रूख अपनार्कर उच्चतम न्यार्यार्लय ने कामकाजी महिलार्ओं के यौन उत्पीड़न के सन्दर्भ में महिलार्ओं के विरूद्ध सभी प्रकार के उत्पीड़न को अमार्न्य करार्र दियार् एवं विभेदीकरण उन्मूलन अभिसमय, 1979 तथ बीजिंग घोशणार् के मार्नकों को लार्गू कियार्। पुन: गीतार् हरिहरन बनार्म रिजर्व बैंक ऑफ इण्डियार् [(1999) 2 SCC 228, के मार्मले में न्यार्यार्लय ने स्पष्ट कियार् कि देश की नार्गरिक विधि क अर्थार्न्वयन करते समय न्यार्यार्लयों क दार्यित्व है कि वे अन्तर्रार्ष्ट्रीय मार्नकों क सम्यक् सम्मार्न करें।

न्यार्यिक सक्रियतार् क एक रूप यह भी है कि न्यार्यार्लय विधार्यिक को विधि निर्मार्ण हेतु अभिप्रेरित करें। बैंग्लोर वार्टर सप्लाइ कं0 एण्ड सीवरेज बोर्ड बनार्म ए0 रार्जप्पार् [(1978 1 me0 fu0ia0 1051)] के वार्द में उच्चतम न्यार्यार्लय ने औद्योगिक विवार्द अधि0, 1947 के अन्तर्गत परिभार्षित उद्योग विस्तार्र एवं अनिश्चिततार् के बिन्दुओं को उजार्गर करते हुये अपेक्षार् की कि अब समय आ गयार् है जबकि विधार्नमण्डल में संदिग्धतार् हटार्ने एवं सन्देहों को दूर करने के लिये तथार् सभी विवार्दों को सदार् के लिए शार्न्त करने हेतु स्थार्पक विधेयक प्रस्तुत करनार् चार्हिए। न्यार्यिक सक्रियतार् के अग्रिम चरण के रूप में उच्चतम न्यार्यार्लय ने वैकल्पिक व्यवस्थार् के रूप में भी कदम उठार्यार् है।

इसी प्रकार एक अन्य वार्द विशार्खार् बनार्म रार्जस्थार्न रार्ज्य (AIR 1997 SCC 3011) के मार्मले में तीन सदस्यी पीठ ने निर्णय सुनार्ते हुये कहार् कि कामकाजी महिलार्ओं के यौन उत्पीड़न को रोकने तथार् यौन समतार् को सुनिश्चित करने के लिए विधार्नमण्डल को समुचित विधि क निर्मार्ण करनार् चार्हिए। डी0के0 वसु बनार्म पश्चिम बंगार्ल रार्ज्य [(1997) 1 SCC 416), के वार्द में न्यार्यार्धीश डॉ0 आनन्द ने पुलिस अभिरक्षार् में हुर्इ मृत्यु पर नार्रार्जगी जार्हिर करते हुये निण्र्ार्ीत कियार् कि गिरफ्तार्री के सम्बन्ध में जब तक विधार्यी उपबन्ध नहीं बनार् दिये जार्ते तब तक के लिये ग्यार्रह विधार्यी प्रकृति के निर्देश लार्गू रहेंगे।

न्यार्यिक सक्रियतार् के ग्रार्ह्यतार् के आयार्म को स्पष्ट करते हुए धन्नार्लार्ल बनार्म कालार्वतमी बाइ (1996) सु0को0 के मार्मलें में न्यार्यार्धिपति आर0सी0 लार्होटी ने स्पष्ट कियार् कि न्यार्यिक पूर्वोक्ति के आभार्व में न्यार्यलय को सशक्त तर्क ताकिक सोच सार्मार्न्य प्रज्ञार् तथार् लोक कल्यार्ण के लिये कार्य करने की प्रबल धार्रणार् पर आधार्रित होनार् चार्हिए। न्यार्यिक सक्रियतार् जब उपरोक्त सीमार्ंओं क अतिक्रमण करने लगती है तो वह न्यार्यिक अति सक्रियतार् क रूख अख्तियार्र लेती है। उदार्हरण स्वरूप पर्यार्वरण संरक्षण के सन्दर्भ में उच्चतम न्यार्यार्लय द्वार्रार् इतने निर्देश जार्री किये गये कि निर्देशों के अम्बार्र क अनुपार्लन उनके अननुपार्लन में ही सम्भव है।

उदार्हरण स्वरूप बैल्लोर सिटी बेलफेयर फोरम बनार्म भार्रत संघ (1997) सु0को0 के मार्मलें में तमिलनार्डू चर्मशेार्धन शलार्ओं में उत्पन्न पर्यार्वरण समस्यार् के सन्दर्भ केन्द्र सरकार, पुलिस अधीक्षक तथार् जिलार्धिकारियों आदि को निर्देश, एम0सी0 मेहतार् बनार्म भार्रत संघ (1992) सु0को0 के मार्मलें में केन्द्रीय प्रदूशण नियन्त्रण बोर्ड को निर्देश रार्मकृश्ण बनार्म केरल रार्ज्य में धूम्रपार्न वर्जित करने हेतु जिलार् कलेक्टरों पुलिस महार्निर्देशक एवं परिसर मार्लिकों को निर्देश, एम0सी0मेहतार् बनार्म भार्रत संघ (1988) सु0को0 में कानपुर महार्नगर पार्लिक को निर्देश तथार् इसी प्रकार अन्य न्यार्यार्लय द्वार्रार् इस सम्बन्ध में अनेक निर्देश जार्री किये गये है।

न्यार्यिक सक्रियतार् एवं विधिक अस्थिरतार्

कभी-कभी न्यार्यिक अति सक्रियतार् द्वार्रार् विधि के स्थार्यित्व एवं लोकतार्ंत्रिक भार्रतीय व्यवस्थार् को भी खतरार् उत्पन्न हो जार्तार् है। भार्रतीय संविधार्न के अनु0 142 में प्रदत्त शक्ति को प्रयोग करने में उच्चतम न्यार्यलय द्वार्रार् इतनी नम्यतार् एवं वैस्तार्रिक दृष्टिकोण अपनार्यार् गयार् है कि डार्0 जी0पी0 सिंह ने यहार्ंँ तक कह डार्लार् कि अनु0 142 क प्रार्य: प्रयोग एवं सार्मार्न्य मागदर्शक निर्देश जार्री करने से इस उपबन्ध क अवशिष्ट न्यार्यिक शक्ति की जगह विधार्यी शक्ति के रूप में प्रयोग हो रहार् है जो न्यार्यिक सक्रियतार् क गलत प्रयोग है। इन री विनय चन्द मिश्रार् (1995) सु0को0 के वार्द में अधिवक्तार् को दण्डित करने तथार् लार्इसेन्स निलम्बित करने के आदेश के उपरार्न्त सुप्रीम कोर्ट बार्र एशोसियेसन के बार्द में इन्हे रद्द करने से विधि में अनिश्चततार् के उत्पन्न होती है। यही स्थिति कामनकाज ए रजिस्टर्ड सोसार्यटी बनार्म भार्रत संघ के वार्द में कैप्टन सतीश शर्मार् द्वार्रार् जार्री अवैध लार्इसेंस के सम्बन्ध अपने ही दो पूर्व निर्णयों को अपार्स्त करनार् तथार् कैप्टन सतीश शर्मार् को अपरार्ध से मुक्त करनार् विधि में अनिश्चिततार् क बुलार्वार् देतार् है। इसी प्रकार एम0सी0 मेहतार् बनार्म कमलनार्थ के वार्द में अनु0 142 के अन्र्तगत अर्थदण्ड लगार्नार् तथार् पुनर्विलोकन यार्चिक में अपनी अधिकारितार् से इन्कार करनार् विधि की अनिश्चिततार् को बढ़ार्वार् देनार् है।

विधि में निश्चिततार् न्यार्यिक पूर्व निर्णय क मूलार्धार्र है तथार् सम्यक न्यार्य प्रशार्सन हेतु आवश्यक रूप से अपेक्षित है। परन्तु उच्चतम न्यार्यार्लय ने स्वयं के निर्णयों की अन्तिमतार् पर प्रश्न चिन्ह लगार् दियार् है। कुछ वर्ष पहले उच्चतम न्यार्यलय द्वार्रार् दिये गये एक विवार्दार्स्पद फैसले में बुद्विजीवियों को न्यार्यपार्लिक तथार् कार्यपार्लिक के कार्यक्षेत्रों एवं अधिकारों क तुलनार्त्मक अध्ययन करने को विवश कियार् यह फैसलार् तमिलनार्डु के सरकारी कर्मचार्रियों की हड़तार्ल से जुड़ार् थार् तमिलनार्डु सरकार ने कुछ सरकारी कर्मचार्रियों एवं शिक्षकों को पी0 एफ0 के भुगतार्न पर असमर्थतार् व्यक्त की परिणार्म स्वरूप 12 लार्ख से अधिक शिक्षक तथार् कर्मचार्री जुलाइ 2003 की शुरूआत में हड़तार्ल पर चले गये।

तमिलनार्डु सरकार ने उनसे काम पर वार्पस आने की अपील की तथार् सभी हड़तार्ली कर्मचार्रियों पर एस्मार् लार्गू कर दियार्। इस घटनार्क्रम में 1700 से अधिक लोगों की गिरफ्तार्री हुर्इ तथार् 2 लार्ख से ज्यार्दार् हड़तार्ली कर्मचार्रियों को बर्खार्स्त कर दियार् गयार्। मजदूर संगठनों तथार् अन्य सरकारी संगठनों ने सरकार के इस रवैये के विरूद्ध उच्चतम न्यार्यार्लय में अपील की, उच्चतम न्यार्यलय ने सरकार विशेष के निर्णयों को ही नहीं बल्कि सभी सरकारी कर्मचार्रियों के सन्दर्भ में यह फैसलार् दियार् कि हड़तार्ल कर्मचार्रियों के मौलिक अधिकार के अन्र्तगत नहीं आती है और न ही इसे नैतिक आधार्र पर मार्न्यतार् दी जार् सकती है।

इसी फैसले के बार्द विवार्द एवं बहस शुरू हुर्इ जिसमें कुछ बुद्धिजीवियों द्वार्रार् इस फैसले को कार्यपार्लिक के कार्यक्षेत्र में अतिक्रमण तो कुछ के द्वार्रार् लोकतन्त्र के वर्चस्व की चुनौती के रूप में देखार् गयार्। इस वार्द विवार्द से यह तो स्पष्ट हे कि जहार्ँ न्यार्यपार्लिक ने न्यार्यिक सक्रियतार् दिखार्कर वार्हवार्ही लूटी इस प्रकार के फैसले से स्वंय को कठघरे में खड़ार् कर लियार्।

इसी प्रकार एक अन्य मार्मलें में अर्जुनमुडार् बनार्म झार्रखण्ड रार्ज्य में उच्चतम न्यार्यार्लय ने झार्रखण्ड विधार्न सभार् में बहुमत सिद्ध करने की कार्यवार्ही के सम्बन्ध में इसकी वीडियों रिकार्डिंग करने तथार् इस कार्यवार्ही को सचिव तथार् पुलिस महार्निदेशक के देखरेख में करार्ने के फैसले से काफी ऊहार्पोह मची तथार् संसद में इस विषय पर काफी हंगार्मार् हुआ तथार् सोमनार्थ चटर्जी ने तो इस निर्णय को विधार्यिक के कार्य में हस्तक्षेप तथार् लोकतार्ंत्रिक व्यवस्थार् के प्रतिकूल बतार्यार्।

इस प्रकार के कर्इ मार्मलों में न्यार्यिक सक्रियतार् प्रदर्शित करते हुये जो निर्णय उच्चतम न्यार्यार्लय द्वार्रार् प्रस्तुत किये जार्ते है वे सर्वदार् ही सही नहीं होते तथार् कभी-कभी तो इसे न्यार्यपार्लिक बनार्म संसद यार् विधार्नमण्डल के रूप में देखार् जार्ने लगतार् है।

न्यार्यिक सक्रियतार् पर आपत्तियार्ँ

इस प्रकार की न्यार्ययिक सक्रियतार् यार् न्यार्यिक आतंकवार्द के प्रयोग को विभिन्न विद्वार्नों ने आपत्तिजनक मार्नार् है। इन लोगों ने उन परिणार्मों को व्यक्त कियार् हैं जो न्यार्यिक अतिसक्रियतार् से उत्पन्न होते है –

  1. न्यार्यिक अति सकिय्रतार्वार्द न्यार्यार्लय की रार्जनीतिक निष्पक्षतार् में सतत लोक विश्वार्स को खतरे में डार्ल देते है। जो विधि के शार्सन के सार्तत्य के लिये आवश्यक है। 
  2. इस प्रकार कार्य करने से न्यार्यार्लय अपनी प्रमार्णिकतार् क समर्पण कर सकतार् है। क्योंकि इस प्रकार कार्य करके न्यार्यार्लय अपनी सींमार्ओं क अतिक्रमण करतार् है तथार् अपनी प्रार्रम्भिक भूमिक को पूरार् करने में अक्षम हो जार्तार् है। 
  3. यह लोगों को नैतिक एवं रार्जनैतिक दार्यित्वों को पूरार् करने में पंगु बनार् देतार् है। तथार् वे न्यार्यार्लय पर अवलम्बित हो जार्ते है। 
  4. न्यार्यिक अतिसक्रियतार् विधि में अनिश्चितार् उत्पन्न करती है, जबकि विधि में निश्चिततार् तथार् स्थार्यित्व न्यार्य प्रशार्सन के लिये आवश्यक है। 
  5. यह नहीं कहार् जार् सकतार् कि न्यार्यिक अतिसक्रियतार् न हो तो शक्ति संतुलन में असंतुलन होगार्। क्योंकि ऐसे बहुत से क्षेत्र है जहॉ न्यार्यलय हस्तक्षेप नहीं करते है। 
  6. कुछ क विश्वार्स है कि न्यार्यार्लय क सरकार के दोनों अंगो द्वार्रार् इस्तेमार्ल कियार् जार् सकतार् है। तथार् अलोकप्रिय कार्यो के लिये न्यार्यार्लय को अप्रत्यक्ष रूप में प्रयोग कर सकते है।

न्यार्यार्लय के अतिसक्रियतार्वार्द से उत्पन्न विधि के स्थार्यित्व के खतरे, संस्थार्गत सम्मार्न पर प्रश्नचिन्ह तथार् विधि में ग्रार्ह्यतार् की कमी के प्रश्न पर न्यार्यार्लय चिन्तित नजर आने लगे है। इसी कारण एम0आर्इ0 विल्डर्स लि0 बनार्म भार्रत संघ में न्यार्यार्लय ने स्पष्ट कियार् कि न्यार्यार्लय क कार्य विधार्न निर्मित करनार् नहीं हैं और दार्ण्डिक विधार्नों क निर्मार्ण करनार् कठोर रूप से न्यार्यार्लय की परिधि के बार्हर है।

यूनियन ऑफ इण्डियार् एसोसियेशन फार्र डिमोक्रेटिक रिफाम के बार्द में उच्चतम ने अनु0 324 क निर्वचन करने में अत्यन्त संतुलित रुख अपनार्यार् है। न्यार्यार्लय ने कहार् कि उच्चतम न्यार्यार्लय किसी अधिनियम अथवार् संविधिक नियम को संशोधित करने हेतु निर्देश जार्री नहीं कर सकतार् है। यह संसद क कार्य है। परन्तु यह भी समार्न रूप से सुस्थार्पित है कि यदि किसी विशेष प्रकरण पर अधिनियम यार् परिनियम चुप है और प्रवर्तन करने वार्ले प्रार्धिकारी के पार्स लार्गू करने की संविधार्निक अथवार् संविधिक शक्ति उपलब्ध है तो जब तक उचित विधि निर्मित नही हो जार्ती तब तक उक्त विषय की रिक्ततार् अथवार् शून्यतार् को पूरार् करने हेतु न्यार्यार्लय आवश्यक रूप से निर्देश अथवार् आदेश जार्री कर सकतार् है।

जीजेफ पीटर बनार्म गोवार् रार्ज्य के वार्द में यह कहार् गयार् कि न्यार्यिक सक्रियतार् को संविधिक निर्वचन के सन्दर्भ में सीमित सृजनशीलतार् के सार्थ स्वीकार करनार् होगार्। न्यार्यिक सक्रियतार् वहीं तक ग्रार्ह्य मार्नी जार् सकती है। जहार्ँ तक वह संतुलित न्यार्यिक सृजनशीलतार् एवं लोक स्वीकृति को आमंत्रित करती है।

बी0 बनर्जी बनार्म अनीतार् पार्न के वार्द में उच्चतम न्यार्यार्लय ने चेतार्वनी दी कि न्यार्यार्लय को तृतीय सदन के रूप में कार्य नहींं करनार् चार्हिए। न्यार्यार्लय यदि अति संवेदन शील एवं रार्जनीतिक मार्मलों में सक्रियतार् दिखार्येगार् तो उसे रार्जनीतिक आलोचनार् क भी शिकार होनार् पड़ेगार्।

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