न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति प्रक्रियार्

न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति प्रक्रियार् एक स्वस्थ एवं निश्पक्ष न्यार्यपार्लिक क सबसे महत्वपूर्ण कार्य होतार् है। जितने श्रेष्ठ व्यक्ति इस प्रक्रियार् द्वार्रार् चुने जार्येगे उतनार् ही न्यार्यपार्लिक क स्तर बेहतर होगार्। संविधार्न निर्मार्ण के समय से ही इस विषय पर व्यार्पक विचार्र-विमर्श हुआ, जो अभी भी जार्री है। न्यार्यार्धीशों की निश्पक्षतार् न सिर्फ न्यार्यपार्लिक पर प्रभार्व डार्लती है। बल्कि यह संविधार्न क निर्वचन कर कार्यपार्लिक एवं विधार्यिक पर ही व्यार्पक असर रखती है। क्योंकि न्यार्यिक अधिकारी की नियुक्ति उसके सम्पूर्ण सेवार् काल के लिए होती है अत: वह कार्यपार्लिक एवं विधार्यिक के सदस्यों से ज्यार्दार् समय तक सरकार क अंग रहतार् है।

सार्थ ही न्यार्यपार्लिक व्यक्तियों के मूल अधिकारों क भी निर्वचन करती है। अत: यह सार्मार्न्य व्यक्ति के अधिकारों की प्रहरी है। यदि न्यार्यपार्लिक को हम एक किलार् मार्ने तो न्यार्यिक अधिकारी उस द्वार्रपार्ल की भार्ंति हैं जिनक सजग र्इमार्नदार्र और कर्त्तव्यनिष्ठ होनार् आवश्यक है तार्कि किले की सुरक्षार् बनी रहें।

नियुक्ति प्रक्रियार् की पृष्ठभूमि

प्रसिद्ध विधिशार्स्त्री मोन्टेस्क्यू ने सरकार क विभार्जन तीन अंगों में कियार् गयार् है कार्यपार्लिका, विधार्यिक एवं न्यार्यार्पार्लिका। सरकार क तृतीय अंग अर्थार्त न्यार्यार्पार्लिक क प्रमुख कार्य विधि क निर्वचन करनार् तथार् उसे लार्गू करनार् और रार्ज्यों व उसके नार्गरिकों के मध्य उत्पन्न विवार्दों क निपटार्रार् करनार् है। न्यार्यपार्लिक क कार्य है कि वह देश में विधि क शार्सन बनार्ये रखे तथार् सुनिश्चित करें कि शार्सन संविधार्न के अनुरूप संचार्लित हैं।

एक स्वतन्त्र और निश्पक्ष न्यार्यार्पार्लिक ही नार्गरिकों के अधिकारों की संरक्षिक हो सकती है तथार् बिनार् भय तथार् पक्षपार्त के सबको समार्न न्यार्य प्रदार्न कर सकती है। इसके लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि उच्चतम न्यार्यार्लय अपने कत्र्तव्यों के पार्लन के लिए पूर्ण रूप से स्वतन्त्र और सभी प्रकार के रार्जनीतिक दबार्बों से मुक्त हो। जब भार्रत क संविधार्न तैयार्र कियार् जार् रहार् थार् तो संविधार्न निर्मार्तार्ओं के समक्ष दो प्रकार की न्यार्यपार्लिकाओं के उदार्हरण उपस्थित थें

  1. ब्रिटेन में न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति क्रार्ऊन द्वार्रार् होती थी। इसक तार्त्पर्य यह थार् कि कार्यपार्लिक पर कोर्इ निर्बन्धन नहीं थार्। उच्च न्यार्यार्लय में न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति लाड चार्ंसलर की सलार्ह पर की जार्ती थी इसके अलार्वार् कोर्ट ऑफ अपील, हार्उस ऑफ लाड्स और किंग्स बेंच में नियुक्तियार्ं एटानी जनरल की सलार्ह पर प्रधार्नमंत्री द्वार्रार् की जार्ती थी। अत: ब्रिटेन में उच्च न्यार्यिक पदों पर नियुक्ति करने की शक्ति पूर्णतयार् कार्यपार्लिक में निहित थी। 
  2. अमेरिक में में उच्चतम न्यार्यार्लय के न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति सीनेट की सहमति प्रार्प्त हो जार्ने पर रार्ष्ट्रपति द्वार्रार् की जार्ती थी। रार्ष्ट्रपति विशेशत: एटानी जनरल द्वार्रार् सुझार्ए गये व्यक्तियों के न्यार्यार्धीश के पद के लिए नार्मित करतार् थार्। ऐसे व्यक्ति मुख्यत: रार्जनीतिक, शैक्षिक यार् विधिक पृष्टभूमि से संबन्धित होते थे तथार् सीनेट सहमति देकर उन नार्मित व्यक्तियों की नियुक्ति की पुष्टि करती थी, किन्तु रार्ष्ट्रपति द्वार्रार् नार्मित कुछ व्यक्ति सीनेट द्वार्रार् पुष्टि प्रार्प्त करने में असफल रहे। 1930 में न्यार्यार्धीश जॉन पाकर को सीनेट ने अनुमोदित नहीं कियार्। इसके अलार्वार् 1968 में न्यार्यार्धीश फोर्ट जो कि रार्ष्ट्रपति निक्सन के निकट मित्र एवं विधिक सलार्हकार थे, को भी मु0 न्यार्यार्धीश के पद पर नियुक्त हेतु अनुमोदन प्रार्प्त नहीं हो पार्यार्।

भार्रतीय संविधार्न में न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति प्रक्रियार्

भार्रतीय संविधार्न निर्मार्तार्ओं ने ब्रिटेन व अमेरिक की न्यार्यार्पार्लिक के संबन्ध में अनेक कठिनार्इयार्ं पार्यी। अत: उन्होंने भार्रतीय न्यार्यपार्लिक हेतु एक मध्यम माग अपनार्यार्। ब्रिटेन में न्यार्यपार्लिक के संदर्भ में कार्यपार्लिक को अनन्य शक्ति प्रार्प्त थी जबकि अमेरिकी न्यार्यिक प्रणार्ली में रार्जनीतिक हस्तक्षेप थार्।

जब भार्रतीय संविधार्न क निर्मार्ण कियार् जार् रहार् थार् तो रार्ष्ट्रमण्डल देशों जैसे कनार्डार्, आस्ट्रेलियार्, न्यूजीलैण्ड व यू0के0 में न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति कार्यपार्लिक द्वार्रार् की जार्ती थी। अत: उन सभी देशों से अनुभव प्रार्प्त करने के पश्चार्त भार्रतीय संविधार्न निर्मार्तार्ओं ने भार्रतीय न्यार्यपार्लिक के संबन्ध में एक मध्यम माग अपनार्यार्। उन्होंने ऐसी रीति अपनार्यी जो कि न तो कार्यपार्लिक को पूर्ण शक्ति प्रदार्न करती थी और न ही संसद को न्यार्यार्धीशों की नियुकित को प्रभार्वित करने की अनुमति देती थी।

संविधार्न निर्मार्त्री सभार् में न्यार्यपार्लिक के संबध में विचार्र विमर्श की प्रक्रियार् के दौरार्न उच्चतम न्यार्यार्लय तथार् उच्च न्यार्यार्लय में न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति के सम्बन्ध में संशोधन लार्यार् गयार्। जिस पर डार्0 अम्बेडकर ने अत्यन्त महत्वपूर्ण शब्द कहे जो निम्न प्रकार है :-

भार्रत में न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति रार्ष्ट्रपति अपने हस्तार्क्षर और मुद्रार् सहित अधि पत्र द्वार्रार् करतार् है। रार्ष्ट्रपति को इस मार्मले में कोर्इ वैवेकीय शक्ति प्रार्प्त नहीं है। अनुच्छेद 124 (2) के अनुसार्र रार्ष्ट्रपति न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति उच्चतम न्यार्यार्लय तथार् उच्च न्यार्यार्लय के ऐसे न्यार्यार्धीशों से परार्मर्श करने के पश्चार्त, जिसे वह इस प्रयोजन के लिए आवश्यक समझे, ही करेगार्। तथार् अन्य न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति रार्ष्ट्रपति सर्वदार् मुख्य न्यार्यार्धीशों के परार्मर्श से ही करेगार्।

न्यार्यार्धीशों को नियुक्त करने की रार्ष्ट्रपति की शक्ति एक औपचार्रिक शक्ति है। क्योंकि वह उस मार्मले में मंत्रि मंडल की सलार्ह से कार्य करतार् है। (अनुच्छेद 124 (2) के अनुसार्र रार्ष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट के अन्य न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति के मार्मलें में भार्रत के मुख्य न्यार्यार्धीश से परार्मर्श करने के लिए बार्ध्य है। जहार्ं तक मुख्य न्यार्यमूर्ति की नियुक्ति क प्रश्न है ;अनुच्छेद 124 के अन्र्तगत रार्ष्ट्रपति को संविधार्न द्वार्रार् विहित अर्हतार् रखने वार्ले किसी भी व्यक्ति को मुख्य न्यार्यमूर्ति नियुक्त करने की शक्ति प्रार्प्त है तथार् वह इस मार्मलें में किसी से परार्मर्श हेतु बार्ध्य नहीं है। भार्रत में न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति के इतिहार्स को निम्न चरणों के अन्तर्गत अध्ययन कियार् जार् सकतार् है:-

1. प्रथम चरण (1950 से 1981)

उच्चतम न्यार्यार्लय के वरिष्ठतम सदस्य को मुख्य न्यार्यमूर्ति तथार् अन्य न्यार्यार्धीशों को मुख्य न्यार्यार्धीश के परार्मर्श पर नियुक्ति प्रदार्न करने की प्रक्रियार् अपनार्यी जार्ती रही। तथार् धीरे-धीरे यह प्रक्रियार् एक परंपरार् के रूप में परिवर्तित हो गयी। केवल न्यार्यमूर्ति जफ इमार्म एक मार्त्र अपवार्द थे जो कि अपनी मार्नसिक वं शार्रीरिक अस्वस्थतार् के कारण वरिष्ठ होने के बार्वजूद मुख्य न्यार्यमूर्ति नहीं चुने गये। तथार् बार्द में उन्होने अपने पद से इस्तीफार् दे दियार्।

1973 में इस मार्मलें पर एक महत्वपूर्ण विवार्द खड़ार् हुआ। जब 25 अप्रैल 1973 को केशवनन्द भार्रती के मार्मलें में दिये गये निर्णय के कुछ घंटो के पश्चार्त ही सरकार ने आप्रत्यार्शित ढंग से 22 वर्षो की उपर्युक्त परम्परार् को तोड़ दियार्। सरकार ने वरिष्ठतम की उपेक्षार् करके न्यार्यमूर्ति श्री अजित नार्थ रार्य को भार्रत क मुख्य न्यार्यमूर्ति नियुक्त कियार्।

सरकार ने न्यार्यार्लय के तीन वरिष्ठतम न्यार्यार्धीशों श्री जे0एम0 शेलट, श्री के0एस0 हेगड़े तथार् श्री एस0एन0, ग्रोवर की वरिष्ठतार् की उपेक्षार् करके श्री एस. एन. रार्य को मुख्य न्यार्यमूर्ति नियुक्त कियार्। श्री रार्य के शपथ ग्रहण करने के आधे घंटे के पश्चार्त तीनों न्यार्यार्धीशों ने अपने पदों से त्यार्ग पत्र दे दियार्। सरकार के इस रवैये की बड़ी तीव्र आलोचनार् की गयी। उच्चतम न्यार्यार्लय के अधिवक्तार् संघ ने इस कदम की आलोचनार् करते हुए कहार् कि यह नियुक्ति विशुद्ध रार्जनैतिक आधार्र पर की गयी थी और इसक योग्यतार् और वरिष्ठतार् से कोर्इ संबध नहीं थार्।

सरकार की ओर से इस कदम के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिये गये सरकार क यह कथन थार् कि अनुच्छेद 124 में रार्ष्ट्रपति को प्रधार्न न्यार्यार्धीश की नियुक्ति के संबध में पूर्ण वैवेकीय शक्ति प्रदार्न की गयी है। अत: किसी भी न्यार्यार्धीश को, जिसे वह उचित समझतार् हो, मुख्य न्यार्यार्धीश नियुक्त कर सकतार् है। चार्हें वह वरिष्ठ हो यार् कनिष्ठ। यह तर्क बहुत कमजोर थार् क्योंकि 1973 तक सरकार द्वार्रार् वरिष्ठतम क्रम के अनुसार्र ही वरिष्ठतम न्यार्यार्धीश को मुख्य न्यार्यार्मूर्ति चयनित कियार् जार्तार् रहार् है। सरकार ने यह भी तर्क दियार् कि सरकार ने प्रधार्न न्यार्यार्धीश की नियुक्ति में विधि आयोग की संस्तुतियों को लार्गू कियार् थार्।

विधि आयोग, 1956 ने यह सिफार्रिश की थी कि मुख्य न्यार्यमूर्ति की नियुक्ति केवल वरिष्ठतमतार् के आधार्र पर ही नहीं की जार्नी चार्हिए बल्कि उसमें गुण उपयुक्ततार् एवं प्रशार्सनिक सक्षमतार् की भी समीक्षार् की जार्नी चार्हिए। सरकार क यह तर्क भी बहुत लचर थार्। क्योंकि विधि आयोग की रिपोर्ट 1956 में आयी थी तथार् सरकार ने 17 वर्षो तक उस रिपोर्ट को लार्गू नहीं कियार् और फिर एकाएक उस रिपोर्ट को लार्गू करने के बहार्ने 3 वरिष्ठतम न्यार्यार्धीशों की उपेक्षार् की। वार्स्तव में तीनों न्यार्यार्धीशों की उपेक्षार् इसलिए नहीं की गयी कि वे योग्यतार् नहीं रखते थे बल्कि उपेक्षार् क मुख्य कारण उनके द्वार्रार् सरकार के विरूद्ध निर्णय कियार् जार्नार् थार्।

सरकार की ओर से यह तर्क भी दियार् गयार् कि मुख्य न्यार्यार्धीशों के पद पर जिस व्यक्ति की नियुक्ति की जार्ये उसक कार्यकाल अधिक दिनों क होनार् चार्हिए। इससे मुख्य न्यार्यार्धीश को न्यार्यार्लय को एक निश्चित दिशार् देने क अवसर प्रार्प्त होगार्। किन्तु यहार्ं भी सरकार असफल रही क्योंकि त्यार्गपत्र देने वार्ले तीनों न्यार्यार्धीशों में से श्री ग्रोवर क कार्यकाल श्री ए.एन. रार्य से एक मार्ह बार्द समार्प्त होने वार्लार् थार्।

लखनार्पल वनार्म ए.एन. रार्य (1975) के मार्मले में मुख्य न्यार्यार्धीश ए.एन. रार्य की नियुक्ति क दिल्ली उच्च न्यार्यार्लय में (अनुच्छेद 126) के अधीन अधिकार पृच्छार् की रिट यार्चिक द्वार्रार् निम्नलिखित आधार्रों पर चुनौती दी गयी।

  1. कार्यपार्लिक क यह कृत्य दुर्भार्वनार् युक्त है। 
  2. यह नियुक्ति अनुच्छेद 124(2) में समार्हित वरिष्ठतार् के नियम के विरूद्ध है। 
  3. इस नियुक्ति में अनुच्छेद 124(2) में वर्णित आवश्यक परार्मर्श प्रक्रियार् क पार्लन नहीं कियार् गयार् है।

उच्च न्यार्यार्लय ने यार्चिक को अस्वीकार करते हुए कहार् कि नियुक्ति करने वार्ले प्रार्धिकारी क आशय अधिकार पृच्छार् रिट यार्चिक के संदर्भ में विसंगत है। 1976 में सरकार ने पुन: न्यार्यमूर्ति एम0एन0 बेग को न्यार्यमूर्ति एच0आर0 खन्नार् पर वरीयतार् देते हुए मुख्य न्यार्यार्धीश नियुक्त कियार्। जिसके फलस्वरूप न्यार्यमूर्ति खन्नार् ने त्यार्ग पत्र दे दियार्। ऐसार् न्यार्यमूर्ति खन्नार् द्वार्रार् बन्दी प्रत्यार्क्षीकरण मार्मलें ;ए0डी0एम0 जबलपुर वनार्म शिवकान्त शुक्लार्,) में दिये गये विसम्मति निर्णय के कारण हुआ। जिसमें उन्होने आपार्तकाल के दौरार्न जीवन के अधिकार क समर्थन कियार् थार् जिसे सरकार ने अपने विरूद्ध मार्नार्।

भार्रत संघ वनार्म सार्कल चन्द्र सेठ (1977) सु0को0 क के मार्मलें में उच्चतम न्यार्यार्लय के समक्ष ‘ परार्मर्श’ शब्द प्रथम के बार्र विचार्र हेतु आयार्। यह मार्मलार् अनुच्छेद 222 (1) में प्रयुक्त ‘परार्मर्श’ शब्द के अर्थ एवं विस्तार्र से सम्बन्धित थार्। न्यार्यमूर्ति चन्द्रचूड़ ने निर्णय देते हुए कहार् कि ‘परार्मर्श’ शब्द से तार्त्पर्य दो यार् अधिक व्यक्तियों के ऐसे सम्मिलन से है जो उन्हे किसी एक विषय पर सहीं एवं सन्तोषजनक हल प्रदार्न करने के लिए सक्षम बनार्तार् है। इस निर्णय मे उन्होने यह अभिनिर्धार्रित कियार् कि परार्मर्श क तार्त्पर्य सहमति नहीं है बल्कि पूर्ण एवं प्रभार्वी परार्मर्श है। पुन: एस0पी0 गुप्तार् वनार्म भार्रत संघ (1982) सु0को0 के मार्मलें में माच 1981 में भार्रत सरकार के विधि मंत्री द्वार्रार् रार्ज्यों के मुख्य मुंत्रियों और उच्चतम न्यार्यार्लय को भेजे गये एक परिपत्र की, (जिसके द्वार्रार् न्यार्यार्धीशों को एक उच्च न्यार्यार्लय से दूसरे उच्च न्यार्यार्लय में स्थार्नार्न्तरण व प्रस्तार्वित नियुक्ति के संबध में) अपनी सहमति देने को कहार् गयार् थार्, वैधतार् को चुनौती दी गयी थी। परिपत्र की विधि मार्न्यतार् के अलार्वार् इस मार्मलें में न्यार्यपार्लिक की स्वतंत्रतार् एवं न्यार्यार्धीशों की नियुक्तियों में प्रधार्न न्यार्यार्धीश के परार्मर्श की प्रार्थमिकतार् भी प्रश्नगत थी।

उच्चतम न्यार्यार्लय ने सार्कल चन्द्र सेठ के मार्मले में दिये निर्णय क अनुसरण करते हुए स्पष्ट कियार् कि परार्मर्श से तार्त्पर्य सहमति से नहीं बल्कि पूर्ण एवं प्रभार्वी परार्मर्श से है। अर्थार्त परार्मर्श हेतु संबधित न्यार्यार्धीश के समक्ष संपूर्ण तथ्य रखे जार्ने चार्हिए। जिसके आधार्र पर किसी व्यक्ति को न्यार्यार्धीश नियुक्त करने के लिए वह रार्ष्ट्रपति को अपनी सिफार्रिश भेजेगार्। बहुमत के निर्णय के अनुसार्र न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति के मार्मलें में कार्यपार्लिक को पूर्ण शक्ति प्रार्प्त है। सरकार द्वार्रार् कियार् गयार् कृृत्य केवल इस आधार्र पर प्रश्नार्गत कियार् जार् सकेगार् कि वह दुर्भार्ग्यनार्पूर्ण है। इस मार्मलें में विसम्मत निर्णय विसम्मत निर्णय के अनुसार्र प्रधार्न न्यार्यार्धीश के परार्मर्श को प्रार्थमिकतार् दी जार्नी चार्हिए।

2. द्वितीय चरण (1982 से 1998)

सुभार्श शर्मार् वनार्म भार्रत संघ (1991) सु0को0 के मार्मले में उच्चतम न्यार्यार्लय की तीन न्यार्यार्धीशों की पीठ ने यह मत अभिव्यक्त कियार् कि संविधार्न के अनुसार्र उच्चतम न्यार्यार्लय के न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति के मार्मलें में प्रधार्न न्यार्यार्धीश के पद क अत्यधिक महत्व है। न्यार्यार्लय ने नियुक्ति के सम्बन्ध में बड़ी पीठ द्वार्रार् विचार्र किये जार्ने क सुझार्व दियार्।

एस0सी0 एडवोकेट आन रिकार्ड एसोशियसन बनार्म भार्रत संघ (1993) सु0को0 के मार्मलें में उच्चतम न्यार्यार्लय के न्यार्यार्धीश ने एक लोक हित वार्द के द्वार्रार् उच्चतम न्यार्यार्लिक में रिक्त पदों पर नियुक्ति के संदर्भ में प्रश्न उठार्यार् थार्। इसके अलार्वार् यह मार्मलार् उच्चतम न्यार्यार्लय व उच्च न्यार्यार्लय में न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति के सम्बन्ध में अनेक महत्वपूर्ण प्रश्न उठार्तार् है। इस यार्चिक पर 9 न्यार्यार्धीशों की पीठ द्वार्रार् विचार्र कियार् गयार्। तथार् बहुमत क निर्णय न्यार्यमूर्ति जे0एस0 वर्मार् द्वार्रार् सुनार्यार् गयार्। इस पीठ ने 7:2 के बहुमत से यह अभिनिर्धार्रित कियार् कि न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति के मार्मलें उच्चतम न्यार्यार्लय के मुख्य न्यार्यमूर्ति न्यार्यार्धिपति के मत को सर्वोच्य महत्व देनार् चार्हिए। जो वह अपने सहयोगियों से परार्मर्श करके व्यक्त करतार् है। उच्चतम न्यार्यार्लय व उच्च न्यार्यार्लय के किसी भी न्यार्यार्धीश की नियुक्ति तब तक नहीं की जार् सकती है जब तक कि वह उच्चतम न्यार्यार्लय के प्रधार्न न्यार्यार्धीश के मत के अनुरूप न हों। न्यार्यार्लय ने इस मार्मलें में उच्चतम न्यार्यार्लय में न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति के संबध में निम्नलिखित दिशार् निर्देश दिये हैं :-

  1. उच्चतम न्यार्यार्लय के न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति के संबन्ध में प्रस्तार्व क प्रार्रंभ मुख्य न्यार्मूर्ति द्वार्रार् कियार् जार्नार् चार्हिए। 
  2. रार्ष्ट्रपति किसी भी व्यक्ति की नियुक्ति उच्चतम न्यार्यार्लय के न्यार्यार्धीश के रूप में तब तक नहीं करेगार् जब तक कि प्रधार्न न्यार्यार्धीशए उच्चतम न्यार्यार्लय के दो वरिष्ठ न्यार्यार्धीशों से परार्मर्श करके अपनी सिफार्रिश रार्ष्ट्रपति को न भेजे। 
  3. प्रधार्न न्यार्यार्धीश की दो वरिष्ठतम न्यार्यार्धीशों से परार्मर्श प्रक्रियार् लिखित में होनी चार्हिए। 
  4. भार्रत के मुख्य न्यार्यार्धीश के पद पर नियुक्ति उच्चतम न्यार्यार्लय के किसी वरिष्ठ न्यार्यार्धीश की ही होनी चार्हिए, जो कि उस पद को ग्रहण करने के लिए उपर्युक्त हो। 
  5. केवल अपवार्दार्त्मक परिस्थितियों में ही ऐसार् हो सकतार् है कि प्रधार्न न्यार्यार्धीश तथार् दो वरिष्ठ न्यार्यार्धीशों द्वार्रार् सिफार्रिश किये गये नार्मों पर विचार्र ही न कियार् जार्ये।

3. तृतीय चरण (1999 से अब तक)

इन री प्रेसिडेन्सियल रिफरेन्स नं0-1 (1993) के मार्मलें में यह परार्मर्श दियार् गयार् कि उच्चतम न्यार्यार्लय के न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति में मुख्य न्यार्यार्धीश की सिफार्रिश जो अन्य न्यार्यार्धीशों से परार्मर्श करने के पश्चार्त दी जार्ये, सरकार को भेजी जार्येगी। इस निर्णय के पश्चार्त यह आरोप लगार्यार् जार्ने लगार् कि मुख्य न्यार्यार्धीश अपनी सिफार्रिशों से मनमार्नें ढंग से अन्य न्यार्यार्धीशों के परार्मर्श के बिनार् भेज रहे हैं ।

यह प्रश्न तब और गम्भीर रूप में आयार् जब पिछले मुख्य न्यार्यार्धीश श्री एम0एम0 पुंछी ने परार्मर्श प्रक्रियार् क पार्लन किए बिनार् मनमार्ने ढंग से नियुक्ति की सिफार्रिश रार्ष्ट्रपति को भेजी थी । अत: रार्ष्ट्रपति महोदय ने परार्मर्श प्रक्रियार् को स्पष्ट करने के लिए अनुच्छेद 143 के आधीन सलार्ह देने हेतु इस मार्मलें को पुन: उच्चतम न्यार्यार्लय को सौंप दियार्। इस मार्मलें में 9 सदस्यीय संविधार्न पीठ क निर्णय सुनार्ते हुए न्यार्यार्धीश श्री एस0 पी0 भरूचार् ने परार्मर्श प्रक्रियार् को निम्नलिखित प्रकार से स्पष्ट कियार् :-

  1. उच्चतम न्यार्यार्लय के न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति के मार्मलें में मुख्य न्यार्यार्धीश को उच्चतम न्यार्यार्लय के चार्र वरिष्ठतम न्यार्यमूर्तियों के समूह से परार्मर्श करके ही रार्ष्ट्रपति को अपनी सिफार्रिश भेजनार् चार्हिए। अत: नियुक्ति के लिए सिफार्रिश हेतु समूह मुख्य न्यार्यार्धीश व उच्चतम न्यार्यार्लय के चार्र वरिष्ठतम न्यार्यार्मूर्तियों से मिलकर निर्मित होनार् चार्हिए। 
  2. न्यार्यार्धीशों के समूह को अपनार् परार्मर्श आम रार्य से देनार् चार्हिए। तथार् परार्मर्श प्रक्रियार् में सम्मिलित प्रत्येक न्यार्यार्धीश की सिफार्रिश चार्हे वह सम्मत हो यार् विसम्मत, लिखित रूप में होनार् चार्हिए। 
  3. यदि परार्मर्श प्रक्रियार् में सम्मिलित न्यार्यार्धीशों के समूह में बहुमत किसी व्यक्ति के विरूद्व हो तो उस व्यक्ति की न्यार्यार्धीश के रूप में नियुक्ति नही की जार्येगी। 
  4. उच्चतम न्यार्यार्लय में न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति केवल इसी आधार्र पर प्रश्नगत की जार् सकेगी कि 1993 में उच्चतम न्यार्यार्लय द्वार्रार् दिये गये निर्णय क उचित रूप से अनुपार्लन नहीं हुआ है।

तीनों चरणों की समीक्षार्

1982 में प्रथम न्यार्यार्धीश नियुक्ति मार्मलें के समय न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति की शक्ति कार्यपार्लिक में निहित थी। जबकि न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति संबन्धी दूसरे मार्मलें में नियुक्त करने की शक्ति न्यार्यपार्लिक के हार्थों में पहुंच गयीं इस संबन्ध में तीसरे मार्मलें में इसके क्षेत्र क और अधिक विस्तार्र हुआ तथार् नियुक्ति मुख्य न्यार्यार्धीश तथार् उच्चतम न्यार्यार्लय के चार्र वरिष्ठतम न्यार्यार्धीशों के समूह की सिफार्रिश पर की जार्ने लगी। इस प्रकार वर्तमार्न में अनुसरण की जार्ने वार्ली प्रक्रियार् अधिक लोक तार्न्त्रिक पार्रदश्र्ार्ी और निश्पक्ष होगी। तथार् इसके दुरूपयोग किये जार्ने की संभार्वनार् कम है।

रार्ष्ट्रीय न्यार्यिक समिति की आवश्यकतार्

उच्चतम न्यार्यार्लय के 9 सदस्यीय संविधार्न पीठ के निर्णय के पश्चार्त उच्चतम न्यार्यार्लय में न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति की प्रक्रियार् अधिक लोक तार्न्त्रिक पार्रदश्र्ार्ी एवं निश्पक्ष हो गयी है। मुख्य न्यार्यार्धीश के पद हेतु वरिष्ठतार् क नियम तथार् अन्य न्ययार्धीशों की नियुक्ति के लिए प्रधार्न न्यार्यार्धीश समेत 4 वरिष्ठ न्यार्यार्धीशों के समूह द्वार्रार् परार्मर्श प्रक्रियार् के अनुसरण होने से इस मार्मलें में कार्यपार्लिक क हस्तक्षेप अब पूर्णत: समार्प्त हो गयार् है।

न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति संबन्धी वर्तमार्न प्रक्रियार् रार्जनैतिक हस्तक्षेप एवं दबार्ब से पूर्णत: मुक्त है। तथार् प्रक्रियार् पर न्यार्यार्पार्लिक क प्रभार्वी नियंन्त्रण है किन्तु जैसार् कि विधिक सूक्ति में कहार् गयार् है कि ‘‘शक्ति से भ्रष्टार्चार्र आतार् है, और परम शक्ति से पूर्ण भ्रष्टार्चार्र आतार् है।’’ अत: न्यार्यार्धीशों की नियुक्ति के संबन्ध में न्यार्यार्पार्लिक पर कुछ नियंत्रण भी अवश्य होनार् चार्हिए।

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