नेपार्ल क इतिहार्स

नेपार्ल मुख्यत: हिमार्लय की पर्वत श्रृंखलार्ओं के मध्य बसार् एक पर्वतीय देश है, जो भार्रत से पूरी तरह से घिरार् हुआ है। इसकी सीमार्ओं में अगर मार्नचित्र के आधार्र पर देखार् जार्ए तो उत्तर में चीन क तिब्बत क्षेत्र तथार् दक्षिण, पूर्व एवं पश्चिम में भार्रत की सीमार्एॅ आती हैं। नेपार्ल क सम्पूर्ण क्षेत्रफल लगभग 147181 वर्ग कि0मी0 है। यह दक्षिण एशियार् क तीसरार् सबसे बड़ार् देश है। नेपार्ल को मुख्य रूप से पर्वतीय क्षेत्र, घार्टी क्षेत्र एवं तरार्ई क्षेत्र तीन भार्गों में विभार्जित कियार् जार् सकतार् है। नेपार्ल क पर्वतीय क्षेत्र उत्तर में स्थिति है जो नेपार्ल क सबसे ऊँचार् क्षेत्र है। विश्व स्तर पर अगर तुलनार् की जार्ए तो विश्व की 10 सर्वोच्च पर्वत श्रंखलार्ओं में से 8, जिसमें मार्उंट एवरेस्ट (सार्गरमार्थार्) (8848 मी0), कंचनजंधार् (8598 मी0), महार्लू (8481 मी0), धौलार्गिरी (8172 मी0) तथार् अन्नपूर्णार्-प्रथम (8091 मी0) पूर्णत: यार् अंशत: इसी क्षेत्र में अवस्थित है।

मध्य हिमार्लय क्षेत्र यार् घार्टी क्षेत्र में अनेक प्रमुख नदियार्ँ, जिनमें सेती, करनार्ली, हेरी-काली गण्डकी, त्रिशूली, संकोसी, अरूण तथार् तार्मूर बहती हैं। नेपार्ल में स्थित सभी नदियार्ँ चार्र प्रमुख नद् अवस्थार्ओं करनार्ली, नार्रार्यणी, गण्डकी तथार् कोसी क निर्मार्ण करती हैं, जो घार्टी क्षेत्र के महार्खण्डों से होकर बहती हैं। मध्य हिमार्लय क्षेत्र में 1000 से 2000 मीटर के मध्य पर्वत श्रृंखलार्ऐं स्थित है। इस क्षेत्र में कृषि करने के लिए अनेक समतल घार्टियार्ँ पार्यी जार्ती हैं, । नेपार्ल क दक्षिणतम क्षेत्र तरार्ई क क्षेत्र कहलार्तार् है, जो सार्मार्न्यतयार् समतल तथार् उर्वर है। प्रार्य: देखार् जार्ए तो नेपार्ल क अधिकतम क्षेत्र गंग प्रदेश क उत्तरी विस्तार्र है।

सम्भवत: नेपार्ल में 2,500 वर्ष के पूर्व ही तिब्बती-बर्मीज मूल के लोग आ चुके थे। इसी प्रकार नेपार्ल में इन्डो-आर्यन जार्तियों ने 1,500 ईशार् पूर्व के आसपार्स प्रवेश कियार्। करीब 1,000 ईशार् पूर्व नेपार्ल में छोटे-छोटे रार्ज्य और रार्ज्य संगठनों की स्थार्पनार् हुई। सिद्धाथ गौतम (ईसार् पूर्व 563-483) शार्क्य वंश के क्षत्रिय थे, जिन्होंने अपनार् रार्जकाज छोड़कर तपस्वी क जीवन निर्वार्ह कियार् और अपनी तपस्यार् के कारण वह बुद्ध बन गए। नेपार्ल क चौथी शतार्ब्दी में गुप्तवंश के अधीन कठपुतली रार्ज्य बनने के 250 ईसार् पूर्व तक इस क्षेत्र में उत्तर भार्रत के मौर्य सार्म्रार्ज्य क प्रभार्व पड़ार्। नेपार्ल में वैशार्ली के लिच्छवियों के रार्ज्य की स्थार्पनार् 5वीं शतार्ब्दी के उत्तराध में आकर हुई, जो 8वीं शतार्ब्दी के उत्तराध में अस्त हो गयार् और इसके सार्थ ही नेपार्ल में सन् 879 ई0 से नेवार्र (नेपार्ल की एक जार्ति) युग क उदय हुआ, फिर भी इन लोगों के देशभर में नियन्त्रण क आकलन कर पार्नार् मुश्किल है। दक्षिण भार्रत से आए चार्लुक्य सार्म्रार्ज्य क प्रभार्व नेपार्ल के दक्षिणी भूभार्ग में 11वीं शतार्ब्दी के उत्तराध के आस-पार्स दिखार्ई पड़तार् है। प्रार्य: ऐसार् मार्नार् जार्तार् है कि चार्लुक्यों के प्रभार्व में आकर ही नेपार्ल में धामिक परिवर्तन होने लगार्, क्योंकि उस समय शार्सकों ने बौद्ध धर्म को छोड़कर हिन्दू धर्म क समर्थन कियार्।

नेपार्ल रार्ष्ट्र में प्रमुख औद्योगिक जिलों की संख्यार् 11 हैं। जिनके नार्म बार्लार्जु, हिटौडार्, पार्टन, नेपार्लगंज, धार्रन, पोखरार्, भुटवल, भक्तपुर, वीरेन्द्र नगर, धनकुटार् और रार्जबिरार्ज औद्योगिक क्षेत्र है। नेपार्ल में संचार्लित अनेक उधोग है, जिनमें मुख्य उद्योगों की श्रेणी में जूट उद्योग, कागज उद्योग, कपड़ार् उद्योग, चीनी, सिगरेट, मार्चिस, चार्य और सार्बुन उद्योग, सीमेंट और टैनिंग उद्योग को शार्मिल कियार् जार्तार् है। इसके अलार्वार् नेपार्ल के कुटीर उद्योग क अभिन्न भार्ग के रूप में सूती वस्त्र उद्योग, ऊनी कपड़े एवं कालीन, मेटेल वक्र, काष्ठ उद्योग, बार्ंस आधार्रित उद्योग और चमड़ार् उद्योग आते है। नेपार्ल एक कृषि पर आधार्रित अर्थव्यवस्थार्, पहार्ड़ी भूमि क्षेत्र, मिश्रित अर्थव्यवस्थार् तथार् तेज गति से बढ़ती जनसंख्यार् तथार् पूंजी निवेश की गति क धीमार् स्तर तथार् विदेशों से प्रार्प्त आर्थिक सहार्यतार् पर ज्यार्दार् निर्भरतार् वार्लार् देश है। इन सभी के कारण नेपार्ल के विकास में रूकावट बनार् हुआ है।

भार्रत के समार्न ही नेपार्ल भी एक कृषि प्रधार्न देश है और इसकी लगभग 85 प्रतिशत जनसंख्यार् कृषि कार्य में लगी हुई है किन्तु नेपार्ल क लगभग 10 प्रतिशत भार्ग ही कृषि योग्य है। नेपार्ल में उत्पार्दित होने वार्ली मुख्य फसलें मक्का, धार्न, गेहूं, जौ और ज्वार्र-बार्जरार् हैं, इसके अलार्वार् नेपार्ल की नगदी फसलों में गन्नार्, तिलहन, तम्बार्कू, आलू और जूट मुख्य हैं। नेपार्ल को एक हिन्दू रार्ष्ट्र के रूप में नेपार्ल के महार्रार्जार् द्वार्रार् सन् 1962 ई0 में स्थार्पित कियार् गयार्। यहार्ं हिन्दू धर्म में विश्वार्स रखने वार्ले नार्गरिकों की संख्यार् सबसे ज्यार्दार् है, जो कुल आबार्दी क लगभग 85 प्रतिशत से अधिक हैं। इस हिन्दु आबार्दी की अगर भार्रत में हिन्दुओं के प्रतिशत से तुलनार् की जार्ए तो यह उससे भी अधिक है। उसके बार्द नेपार्ल में दूसरे स्थार्न पर बौद्ध धर्म को मार्नने वार्ले आते हैं, जो कि 7.78 प्रतिशत है तथार् तीसरे स्थार्न पर इस्लार्म धर्म क प्रतिशत 3.53 है। उसके बार्द नेपार्ल में कुछ अल्पसंख्यक समुदार्य जैसे ईसार्इयों क 0.17, जैन धर्म क प्रतिशत 0.04 है। सार्थ ही नेपार्ल में अचिन्हित धर्मार्वलिम्ब्यों क प्रतिशत 0.06 है।

नेपार्ल में नेपार्ली, मैथिली, भोजपुरी, थार्रू, तमंग एवं नेवार्री छह मार्तृभार्षार्एं बोली जार्ती हैं। इन सभी में नेपार्ली बोलने वार्लो की संख्यार् सबसे अधिक हैं। नेपार्ल में मार्तृभार्षार्ओं के अलार्वार् 18 स्थार्नीय भार्षार्एं भी बोली जार्ती है-जो कि क्रमश: रार्ई, मगर, अवधी, लिम्बू, गुरंग, उर्दू, हिन्दी, शेरपार्, रार्जवंशी, चिपार्ंग, बंगार्ली, सतार्र, धनुवार्र, मार्रवार्डी, झार्ंझर, धीमल, तमिल और मार्ंझी हैं। इन मार्तृभार्षार्ओं तथार् स्थार्नीय भार्षार्ओं के अलार्वार् आठ विदेशी भार्षार्एं संथार्ली, थकाली, दरार्ई, जीरेल, रार्जी, अंग्रेजी, कुम्हल तथार् ब्यार्ंसी भी बोली जार्ती है। इन भार्षार्ओं में नेपार्ली नेपार्ल की रार्जभार्षार् है और इसी के कारण से यहॉ के लोगों को भी नेपार्ली कहार् जार्तार् है। तिब्बत एवं भार्रत से नेपार्ल की संस्कृति मिलती-जुलती दिखार्ई देती है। इन देशों की वेशभूषार् एवं पकवार्न इत्यार्दि एक जैसे ही हैं। नेपार्ल के प्रधार्नमंत्री जंग बहार्दुर रार्णार् की विदेश यार्त्रार् के बार्द सन् 1894 ई0 में स्थार्पित ‘दरबार्र हार्ईस्कूल’ से नेपार्ल में आधुनिक शिक्षार् की शुरूआत हुई थी, इस यार्त्रार् के पूर्व यहॉ धर्मशार्स्त्रीय दर्शन पर ही आधार्रित शिक्षार् मार्त्र दी जार्ती थी। नेपार्ल के विद्यार्थ्र्ार्ी अपने आगे की उच्च शिक्षार् भार्रत आकर ग्रहण कियार् करते थे। नेपार्ल के प्रधार्नमंत्रियों में कलकत्तार् विश्वविद्यार्लय से मैट्रिक की सनद प्रार्प्त करने वार्लार् चन्द्र शमशेर प्रथम व्यक्ति थार्। नेपार्ल में आधुनिक शिक्षार् की शुरूआत होने के बार्द भी यह आम नेपार्ली जनतार् के लिए सर्वसुलभ नहीं थी। नेपार्ल के उच्च पदार्धिकारी रार्णार्वंशीय ही पहले हो सकते थे। नेपार्ल सदीयों से ही जार्तियों क एक अजार्यबघर रहार् है। इसकी अधिकांश जार्तियार्ं तिब्बत के निवार्सियों से बहुत मिलती-जुलती हैं। नेपार्ल में गोरखार् जार्ति शब्द क प्रचलन 12वीं शतार्ब्दी में हुआ, काठमार्ण्डू के पश्चिम में गोरखार् नगर बसार् हुआ है, यहार्ं पर प्रार्चीन काल में शैवमत के प्रचार्रक गुरू गोरखनार्थ तपस्यार् करते थे, प्रार्य: ऐसार् मार्नार् जार्तार् है कि उन्हीं के नार्म पर यहार्ं के रहने वार्ले गोरखे कहे जार्ते हैं।

नेपार्ल में ब्रार्म्हणों के अलार्वार् ठकुरी एवं खस जार्ति के क्षत्रिय अधिक प्रसिद्ध हैं। ठकुरी क्षत्रियों की उप-जार्तियों में शार्ह, शार्ही, सेन, मल्ल, खार्न एवं चन तथार् खस क्षत्रियों की उप-जार्तियों में पार्ंडे, थार्पार्, बस्नेत, बिष्ट एवं कंवर विशेष प्रसिद्ध है। नेपार्ल में ठकुरी एवं खस शुद्ध हिन्दू धर्म को मार्नने वार्ली जार्तियॉ है। नेपार्ल के गोरखार् अपनी ही जार्ति में विवार्ह करते है और इस प्रकार गोरखार् अपनार् रक्त शुद्ध रखने पर गर्व करते है। परन्तु नेपार्ल में तार्मार्ंग, गुरूंग एवं मगर मूलत: बौद्ध जार्तियार्ं हैं, जो केवल नार्म-मार्त्र के लिए ही हिन्दू हैं। प्रार्य: ऐसार् मार्नार् जार्तार् है कि नेपार्ली जार्तीय संरचनार् की उत्पत्ति भार्रतीय जार्तीय संरचनार् से हुई हैं।8

नेपार्ल की प्रार्चीनतम निवार्सी नेवार्र जार्ति के लोगों को कहॉ जार्तार् हैं। जो बार्द के दिनों में काठमार्ण्डू घार्टी में आ कर बस गए। इन लोगों द्वार्रार् ही नेपार्ल के व्यार्पार्र एवं उद्योगों पर अपनार् एकाधिकार स्थार्पित कर लियार् गयार् थार्। मगर एवं गुरूँग जार्ति पश्चिमी नेपार्ल के निवार्सी हैं, यह दोनों जार्तियॉ मंगोल जार्ति के वंशज प्रतीत होते हैं। इनके विषय में यह मार्नार् जार्तार् है कि यह लोग देश-विदेश की सैनिक सेवार्ओं में लगे हुए हैं। नेपार्ल के सुदूर पूर्व की पहार्ड़ी प्रदेशों में निवार्स करने वार्ली जार्तियार्ं लिम्बूज एवं किरार्ती हैं। यह शिकारप्रिय जार्तियार्ं हैं। भार्रतीय रार्ज्य सिक्किम के पार्स लेपचार् जार्ति के लोग पार्ए जार्ते हैं। जिनक रहन-सहन भोटियार् लोगों के समार्न है। नेपार्ल के उत्तरी सीमार्वर्ती क्षेत्रों में शेरपार्, थार्कल एवं भोटियार् जार्ति के लोग निवार्स करते हैं। इनकी संस्कृति, धर्म तथार् रहन-सहन तिब्बती लोगों के समार्न है। इनके अलार्वार् नेपार्ल के तरार्ई प्रदेश में थार्रू, थिमल एवं दनवार्र जार्ति के लोग पार्ए जार्ते हैं।

नेपार्ल ने जो वर्तमार्न आकार प्रार्प्त कियार् है। इसे एक देश के रूप में, 18वीं शतार्ब्दी में ही विकसित कियार् गयार् थार्, परन्तु नेपार्ल क ऎतिहार्सिक आविर्भार्व प्रथम सहस्त्रार्ब्दि ईसार् पूर्व से ही हो गयार् थार्। पुरार्तार्त्विक प्रमार्णों से यह पतार् चलार्तार् है कि नेपार्ल के कुछ क्षेत्र दस हजार्र वर्षों से भी अधिक से अधिवार्सित हैं। काठमार्ण्डू क्षेत्र के प्रथम शार्सक किरार्ट पर्वतीय जनजार्ति मार्ने जार्ते हैं, परन्तु लगभग ईसवी के आसपार्स स्थार्पित लिच्छवी वंश नेपार्ल क निश्चित रूप से प्रथम रार्जवंश थार्। 12वीं शतार्ब्दी में लिच्छिवी शार्सनकाल से ही नेपार्ल के रार्जनैतिक इतिहार्स की प्रमार्णिक जार्नकारी प्रार्प्त होती है, फिर भी ऐसार् मार्नार् जार्तार् है कि नेपार्ल पर गोपार्ल, किरार्त वंशियों और सोम वंशियों ने भी शार्सन कियार्। जिनके विषय में सार्क्ष्य नेपार्ल में प्रार्प्त शिलार्लेख एवं हस्तलिखित वंशार्वलियार्ं तथार् अन्य प्रार्चीन सार्हित्यों से प्रार्प्त होती हैं। नेपार्ल के किरार्त रार्जार् सुगिको के शार्सनकाल में सम्रार्ट अशोक काठमार्ण्डू आयार् थार्। नेपार्ल के पार्टन में बौद्ध धर्म क व्यार्पक प्रचार्र-प्रसार्र सम्रार्ट अशोक ने कियार्। डेनियल रार्इट की वंशार्वली के कथन से यह सार्क्ष्य प्रार्प्त होतार् है कि सम्रार्ट अशोक अपनी पुत्री चार्रूमती के सार्थ 14वें किरार्त शार्सक रार्जार् सुगिको के शार्सनकाल में काठमार्ण्डू की यार्त्रार् पर नेपार्ल पहुँचे थे।

नेपार्ल के किरार्त शार्सक को लगार् कि सम्रार्ट अशोक अपनी विशार्ल सेनार् के सार्थ काठमार्ण्डू घार्टी पर हमलार् करने आ रहार् है। इस भय के कारण सुगिको एवं अन्य किरार्त शार्सक अपनार्-अपनार् रार्ज्य छोड़कर गोकर्ण के वनों में जार् छिप गए। बार्द में उनक भय निरार्धार्र निकलार्। यद्यपि शेखर सिंह गौतम की पुस्तक ‘भार्रत खण्ड और नेपार्ल’ में किरार्त वंश एक शक्तिशार्ली, विशार्ल एवं समृद्धशार्ली वंश थार्। इस पुस्तक के अनुसार्र बलोचिस्तार्न जो अब पार्किस्तार्न में है, इसे भी किरार्तों ने ही बसार्यार् थार्। नेपार्ल में किरार्तों की शक्ति जब कमजोर हुई तो सोमवंश रार्जपूतों क हमलार् शुरू हुआ। नेपार्ल में आखिरी किरार्त वंश क शार्सक ‘मस्ती’ थार्। जिसको सोमवंशी शार्सक निमिष ने परार्जित कियार् तथार् इसके सार्थ ही काठमार्ण्डू घार्टी पर सोमवंश क परचम लहरार्ने लगार्। रार्जार् निमिष के पश्चार्त् क्रमश: सत्तार्क्षर, काकवर्मार् एवं पशुपेक्षदेव इत्यार्दि प्रमुख सोमवंशिय शार्सक हुए। नेपार्ल में भगवार्न पशुपतिनार्थ मंदिर क जीर्णोद्धार्र पशुपेक्षदेव ने ही करार्यार् थार्, सार्थ ही उसने अपने रार्ज्य को व्यवस्थित करने की भी कोशिश की थी। इसके बार्द नेपार्ल क शार्सक सोमवंशी भार्स्कर वर्मार् हुआ, इसके द्वार्रार् सोमवंशी रार्ज्य की सीमार्ओं क और अधिक विस्तार्र कियार् गयार् थार्। अन्त में भार्स्कर वर्मार् द्वार्रार् लिच्छवी वंशीय भूमि वर्मार् को अपनार् उत्तरार्धिकारी मार्न लियार् गयार्। लेखक बार्लचन्द्र शर्मार् द्वार्रार् किरार्त शार्सन काल को ‘‘नेपार्ल संस्कृति क उत्पत्तिकाल’’ तथार् ‘‘नेपार्ल की ऐतिहार्सिक रूपरेखार्’’ क काल मार्नार् गयार् है।

भार्रत के लिच्छिवि वंश द्वार्रार् नेपार्ल के काठमार्ण्डू में वैशार्ली छोड़कर प्रवेश कियार् गयार् थार्। डॉ0 मजूमदार्र ने यह मार्नार् हैं कि लिच्छिवि वैशार्ली से ही काठमार्ण्डू की ओर आए थे, लेकिन डॉ0 स्मिथ लिच्छिवि रार्ज्य को पार्टिलीपुत्र समीप मार्नते हैं। इस प्रकार डॉ0 स्मिथ एवं डॉ0 ब्लयूर दोनों कि एक रार्य हैं। दोनों ही यह मार्नते हैं कि लिच्छिवि मूल रूप से नेपार्ली ही थे। इन सभी तर्कों के पश्चार्त् भी पण्डित भगवार्नलार्ल के संग्रहीत लिच्छिविरार्ज जयदेव परमचक्रकाम के शिलार्पट्ट में भी वंशार्वली दी गयी है और इस वंशार्वली से स्पष्ट होतार् है कि लिच्छिवियों ने लम्बे समय तक नेपार्ल रार्ष्ट्र पर शार्सन कियार् थार्। सुपुष्प लिच्छवियों क प्रथम रार्जार् थार्। सुपुष्प पार्टलिपुत्र के गुप्त रार्जार्ओं से परार्जित होने के पश्चार्त् नेपार्ल की तरार्ई में आ गयार्।

नेपार्ल में प्रार्प्त शिलार्लेखों से लिच्छिवियों द्वार्रार् अपने आप को कई उपार्धियों से सुशोभित करने क भी पतार् चलतार् है। इनके द्वार्रार् महार्दण्डनार्यक, महार्प्रतिहार्र, युवरार्ज और महार्सार्मार्न्त आदि उपार्धियों को धार्रण कियार् गयार् थार्। लिच्छिवियों एवं भार्रत के गुप्त शार्सकों के मध्य बहुत ही घनिष्ठ सम्बन्ध होने क भी प्रमार्ण इतिहार्स में मिलतार् है। इसी कारण से डार्. फ्लोट ने गुप्त संवत को वार्स्तव में लिच्छिवि संवत ही लिखार् है। समुद्रगुप्त के पितार् चन्द्रगुप्त तथार् उनकी पत्नी लिच्छिवी कुमार्र देवी से नेपार्ल में गुप्त संवत क प्रचलन प्रार्रम्भ हुआ। सम्रार्ट चन्द्रगुप्त विक्रमार्दित्य के सार्थ लिच्छिवीरार्ज की पुत्री कुमार्र देवी क विवार्ह होने के उपरार्न्त लिच्छिवियों तथार् गुप्तों के मध्य घनिष्ठतार् बढ़ने के बार्द गुप्त सार्म्रार्ज्य की मुद्रार् पर ‘लिच्छिवय’ शब्द तक उत्कीर्ण होने लगार्। कुमार्र देवी से ही समुद्रगुप्त क जन्म हुआ।

वंशार्वली के अनुसार्र लिच्छवि रार्जार् जयकामदेव की मृत्यु के उपरार्न्त नुवार्कोट क ठकुरी वंशी रार्जार् भार्स्करदेव काठमार्ण्डू घार्टी के एक प्रभार्ग क रार्जार् बनार्। नेवार्री भार्षार् में हस्तलिखित एक ग्रंथ ‘विष्णु धर्म’ में भार्स्करदेव पर टिप्पणी की गयी है कि उसके द्वार्रार् परम भट्टार्रक महार्रार्जार्धिरार्ज परमेश्वर की उपार्धि धार्रण कियार् गयार् थार्। भार्स्कर देव के उपरार्न्त बलदेव ठकुरी वंश क शार्सक बनार्। बलदेव के पश्चार्त् नार्गाजुन देव रार्जार् हुआ। इस वंश क अन्तीम शार्सक शंकरदेव हुआ। शंकर देव के शार्सन काल के दौरार्न उसकी रार्जधार्नी पार्टन-ललितपुर थी। उसके समय में ही धर्म पुत्रिका, पष्ट सहस्त्रिक एवं बोधिचर्मार्वतार्र जैसे ग्रंथों की रचनार् हुई। नेपार्ल पर लिच्छिवि रार्जार्ओं क शार्सनकाल करीब 900 सार्लों तक रहार्।

ठकुरी वंश ने नेपार्ल की चित्रकलार् को बहुत हद तक प्रभार्वित कियार्। सूर्य वंशी क्षत्रियों ने ठकुरी वंश के सार्मन्तों तथार् रार्जार्ओं को परार्जित कर अपने रार्ज्य की स्थार्पनार् की। वार्मार्देव इस वंश क पहलार् क्षत्रिय रार्जार् हुआ। इसी क एक नार्म वार्णदेव भी मिलतार् है। इसके पश्चार्त् रार्महर्ष देव तथार् सदार्शिव देव रार्जार् हुए। इन शार्सकों के उपरार्न्त इन्द्रदेव और फिर मार्नदेव शार्सक हुए। मार्नदेव ने अपने पुत्र नरेन्द्र देव को शार्सन क कमार्न सौंप दियार् और स्वयं बौद्ध चक्र बिहार्र में बौद्ध भिक्षु के रूप में अपनार् शेश जीवन व्यतीत कियार्। नरेन्द्र देव पश्चार्त् आनन्द देव शार्सक हुआ। आनन्द देव ने सन् 1165 ई0 से सन् 1166 ई0 तक शार्सन कियार्। कुछ हस्तलिखित ग्रंथ आनन्द देव के शार्सनकाल को सन् 1156 ई0 से लेकर सन् 1166 ई0 तक मार्नते हैं। इसके पश्चार्त् रूद्रदेव शार्सक हुआ। रूद्रदेव ने करीब 8 वर्ष 1 मार्ह तक शार्सन कियार्, उसके पश्चार्त् सम्पूर्ण सत्तार् अपने पुत्र के हार्थों में सौंप कर एक सार्धार्रण पुरूष की तरह जीवन जीने लगार्।

रूद्रदेव के उपरार्न्त अमृतदेव ने शार्सन संभार्लार्। अमृतदेव करीब 3 सार्ल 11 मार्ह तक शार्सक रहार्। इसके उपरार्न्त रत्नदेव शार्सक हुआ। इसके उपरार्न्त गुणकामदेव, लक्ष्मीकामदेव एवं विजयकामदेव नार्मक रार्जार् हुए। अन्त में विजयकामदेव क उत्तरार्धिकारी अरिमल्लदेव हुआ। मल्ल युद्ध करते समय ही उसे सन्तार्नोत्पत्ति क समार्चार्र प्रार्प्त हुआ और उसने अपने पुत्र के नार्म के सार्थ मल्ल की उपार्धि जोड़ दी। प्रजार्तियों के इतिहार्सकारों के अनुसार्र सूर्यवंशी शार्सकों के द्वार्रार् अपनार् अधिक समय सूर्य की उपार्सनार् में लगार्यार् जार्तार् थार्। नेपार्ल में मल्लों क उदय 12वीं शतार्ब्दी के अंतिम वर्श में मार्नार् गयार् है और इन्होंने सन् 1769 ई0 तक शार्सन कियार्। प्रार्य: ऐसार् मार्नार् जार्तार् है कि यह भार्रत से आए हुए रार्जपूत थे। 13वीं  शतार्ब्दी काल के दौरार्न अलार्उद्दीन खिलजी के हमले से भयभीत होकर चित्तौड़ के रार्जार् चित्रसेन के भार्ई जिलरार्य एवं अंजलि रार्य अपने सार्त सौ सैनिकों के सार्थ हिमार्लय के तलहटी में जार्कर बस गए। उस समय गंडक नदी के पश्चिमी क्षेत्र में करम सिंह क शार्सन थार्। जिसकी रार्जधार्नी रार्जपुर थी। जिलरार्य एवं अंजलि रार्य ने लगभग 20 वर्षों तक रार्जार् करम सिंह की सेवार् की और इस सेवार् के उपरार्न्त उनके रार्ज्य पर अधिकार कर लियार्। इन्हीं के वंषजों में पृथ्वी नरार्यण “ार्ार्ह गोरखार् रार्ज्य क शार्सक हुआ। गोरखार् शार्सक पृथ्वी नार्रार्यण शार्ह ने सन् 1769 ई0 में अनेक छोटे-छोटे रार्ज्यों को मिलार्कर नेपार्ल रार्ज्य की स्थार्पनार् की।

नेपार्ल में शार्हवंश क अंतिम रार्जार् रार्जेन्द्र हुआ। इनके द्वार्रार् आपसी प्रतिस्पर्धार् में लगे गुटों को एक दूसरे से भिड़ार्ते रहने के प्रयार्सों ने नेपार्ल को रार्जनैतिक अरार्जकतार् की ओर धकेल दियार्। इनके शार्सनकाल में एक के बार्द एक तेजी से मंत्रिमंडल में बदलार्व हुए। जिससे नेपार्ल देश गृह युद्ध के कगार्र पर पहुंच गयार् और इसके कारण देश पर लगभग पूरी तरह छिन्न भिन्न हो जार्ने क खतरार् पैदार् हो गयार्। इसक लार्भ कुंवर जंगबहार्दुर ने उठार्यार्, जोकि इतिहार्स में जंग बहार्दुर रार्णार् के नार्म से जार्नार् जार्तार् है। उसने सन् 1846 ई0 में, रार्जमहल में भार्री कत्लेआम करार्कर सभी विरोधी रार्जनैतिक गुटों क सफार्यार् कर दियार्। सार्थ ही उसने रार्जार् के विशेषार्धिकारों को समार्प्त कर सत्तार् पर कब्जार् कियार् और निरकुंश सत्तार् को अपने परिवार्र के हार्थों में केन्द्रित कर लियार्। इस प्रकार जंग बहार्दुर ने एक नई खोज की, जो रार्णार् शार्सन को पिछले पार्रिवार्रिक शार्सनों से अलग करती है। उसने रार्जार् सुरेन्द्र से जबर्दस्ती सन् 1856 ई0 की सनद (रार्जसी आदेश) जार्री करवार्कर रार्णार् शार्सन के अस्तित्व के लिए वैधार्निक आधार्र प्रदार्न कियार्। इस सनद के आधार्र पर उसके द्वार्रार् अपने परिवार्र की हैसियत को रार्जनैतिक संरचनार् के भीतर स्थार्पित कर लियार् गयार्। इस दस्तार्वेज ने जंग बहार्दुर एवं उसके उत्तरार्धिकारियों को, नार्गरिक तथार् सैन्य प्रशार्सन, न्यार्य एवं विदेशी संबंधों में निरंकुश सत्तार् प्रदार्न कर दी, जिसमें रार्जार् के आदेशों को रार्ष्ट्रीय हितों के लिए अपर्यार्प्त अथवार् विरोधार्भार्सयुक्त होने पर नजरअंदार्ज कर देने क अधिकार शार्मिल थार्। इसप्रकार रार्जसी परिवार्र ने अपनी सभी संप्रभु शक्तियों क समर्पण कर दियार् और स्वयं महल के आहार्ते में एकांतवार्स में रहने लगे। इसके बदले शार्ह रार्जार्ओं को अधिक गौरवशार्ली, बल्कि एक तरह से विडम्बनार्पूर्ण महार्रार्जार्धिरार्ज (रार्जार्ओं के रार्जार्) की उपार्धि से सम्मार्नित कियार् गयार्।

सन् 1856 ई0 की सनद के द्वार्रार् प्रधार्नमंत्री क पद शार्श्वत रूप से रार्णार्ओं को प्रार्प्त हो गयार् और इसके सार्थ ही उन्हें काशी एवं लार्मजुंग के महार्रार्जार् की उपार्धि भी प्रदार्न कर दी। इस सनद ने देश में रार्णार् परिवार्र के शार्सन के लिए वैधार्निक आधार्र उपलब्ध करार् दियार्। प्रार्य: कहार् जार्तार् है कि जंग बहार्दुर रार्जतंत्र की संस्थार् से पूरे तौर पर मुक्ति पार्नार् चार्हतार् थार्, जिसके लिए कुछ इतिहार्सकारों क मननार् है कि उसने भार्रत के ब्रिटिश शार्सकों की स्वीकृति प्रार्प्त करनी चार्ही थी। किन्तु वह इसमें सफल नहीं हो सक तथार् उसे शार्ह वंश के बंधक रार्जतंत्र के सार्थ ही संतोष करनार् पड़ार्, जो कि रार्णार् के प्रभुत्व वार्ली रार्जनैतिक व्यवस्थार् के अन्तर्गत एक संस्थार् के रूप में बरकरार्र रहार्। इसप्रकार नेपार्ल में जो रार्जनैतिक प्रणार्ली उभर कर सार्मने आयी, उस प्रणार्ली को रार्णार्शार्ही अथवार् रार्णार्वार्द कहार् जार्तार् है। रार्णार् प्रशार्सकों द्वार्रार् रार्जनैतिक प्रशार्सनिक प्रणार्ली के स्वेच्छार्चार्री चरित्र को बनार्ए रखार् गयार् और रार्णार् प्रधार्नमंत्री ही सत्तार् क वार्स्तविक स्रोंत बन गयार्। शार्ह के शार्सन के दौरार्न रार्णार् परिवार्र के सदस्यों को रार्जनैतिक एवं प्रशार्सनिक पदों पर बैठार्ने क कार्य पुरार्ने कुलीनों को हटार्कर कियार् गयार्। इस प्रकार नेपार्ल में रार्णार् प्रधार्नमंत्री क पद उत्तरार्धिकार के रूप में एक के बार्द दूसरे भार्ई को मिलतार् गयार्। रार्णार् शार्सकों ने फरमार्न एवं उद्धोषणार्एं जार्री कर देश के प्रशार्सन को चलार्ने क कार्य कियार्। उन्होनें इसके लिए नेपार्ल में किसी संविधार्न क निर्धार्रण नहीं कियार्। इस प्रकार रार्णार्ओं की कानूनी एवं प्रशार्सनिक प्रणार्ली फरमार्नों एवं उद्धोषणार्ओं पर ही आधार्रित रही।

नेपार्ल में यद्यपि रार्णार् शार्सक एक ऐसी निरंकुश रार्जनैतिक प्रणार्ली स्थार्पित करने क प्रयार्स करते रहे, जो देष को अलग-थलग रखने, समार्ज को रार्जनैतिक रूप से दबार्कर रखने तथार् सार्थ ही नेपार्ल की अर्थव्यवस्थार् को पिछड़ार् हुआ बनार्ए रखने में सफल सार्बित हो सके, परन्तु देश विश्व व्यवस्थार् में होने वार्ली परिवर्तन की हवार्ओं से अछुतार् नहीं रह सका, जो उस समय समूचे एशियार् में बह रही थीं। 20वीं शतार्ब्दी के प्रार्रम्भ काल में उदयीमार्न शिक्षित मध्यम वर्ग द्वार्रार् रार्णार् निरंकुशतार् की आलोचनार् की जार्ने लगी तथार् रार्जनैतिक एवं सार्मार्जिक पिछड़ेपन के लिए रार्णार्ओं को दोषी ठहरार्यार् जार्ने लगार्। इसी काल के दौरार्न भार्रत में जोर शोर से चल रहे सार्मार्जिक, धामिक एवं सार्म्रार्ज्यवार्द विरोधी आंदोलनों ने भी नेपार्लियों को प्रभार्वित कियार्, जिसने रार्णार् तार्नार्शार्ही के खिलार्फ आवार्ज उठार्ने के लिए शक्ति क कार्य कियार्। रार्जवंषों ने नेपार्ल के सार्हित्य तथार् वहार्ँकी वार्स्तुकलार्ओं को प्रभार्वित करने क कार्य कियार्। अंशु वर्मार् द्वार्रार् देवपार्टन क 9 मंजिलार् कैलार्शकुट भवन सन् 589 ई0 में बनवार्यार् गयार् थार्। उसने महार्रार्जार्धिरार्ज की उपार्धि अपने नार्म के सार्थ जोड़ी एवं मुद्रार्एं चलवार्ई। रार्जार् नरेन्द्रदेव ने रार्जदरबार्र बनवार्यार्, जो पगौड़ार् शैली पर आधार्रित थार्। पशुपेक्ष्यदेव ने काशी से मिट्टी मंगवार् कर पशुपतिनार्थ मंदिर क निर्मार्ण करार्यार् एवं मंदिर के शिखर पर सोने की चार्दर चढ़वार्ई। इसी प्रकार रार्जार् शिवदेव द्वार्रार् भोट विष्टि गुटी की स्थार्पनार् की गई। जयदेव जो संस्कृत क विद्वार्न थार्, ने एक स्तुति पशुपतिनार्थ मंदिर के पार्स शिलार् पर अंकित करवार्ई। जयदेव गुणकामदेव द्वार्रार् ही सन् 713 ई. में काठमार्ण्डू नगर को स्थार्पित कियार् गयार्। इसके अलार्वार् 9वीं शतार्ब्दी में यहार्ं कई मंदिर तथार् स्तूप आदि बने। जिसमें स्वयंभूनार्थ, काष्ठमण्डप, महार्बौद्ध तथार् कुम्भेश्वर प्रमुख है। गुणकामदेव ने इन्द्रयार्त्रार्, कृष्ण यार्त्रार् तथार् लार्खे यार्त्रार् जैसे उत्सव शुरू करवार्यार्।

ठकुरी वंश के अंतिम रार्जार् शंकरदेव हुआ, इसके समय में अष्ट सहस्त्रिका, धर्म पुत्रिका, बोधि चर्मार्वतार्र जैसे ग्रन्थों की रचनार् की गई। नेपार्ल में मैथिली भार्षार् में सबसे अधिक नार्टक रार्य मल्ल के वक्त में लिखे गए। जीतमित्र ने कई मंदिरों क निर्मार्ण करार्यार् एवं अश्वमेध नार्ट्य तथार् जैमिनी भार्रत गं्रथ लिखे। इसप्रकार लिच्छिवियों से लेकर मल्लों तक ने नेपार्ल की प्रार्चीन कलार् तथार् सार्हित्य को गहरे ढ़ंग से प्रभार्वित करने क कार्य कियार्। इनके द्वार्रार् अनेकों मन्दिरों क जीर्णोद्धार्र करते हुए ऐतिहार्सिक भवनों क निर्मार्ण करवार्यार् गयार्। नेपार्ल पर मोनार्देव के शार्सन क वर्णन मिलतार् है, जो एक लिच्छवी शार्सक थार्, लेकिन विभिन्न छोटे-छोटे रियार्सतों पर विजय प्रार्प्त करके उन्हें एकीकृत कर सन् 1769 ई0 में नेपार्ल रार्ज्य की स्थार्पनार् करने वार्लार् शार्सक गोरखार् रार्जार् पृथ्वीनार्रार्यण शार्ह थार्। शार्ह शार्सकों ने एक निरंकुश रार्जनैतिक प्रणार्ली स्थार्पित कियार्, जिसमें रार्जतंत्र सत्तार् के केन्द्र में थार्, किन्तु रार्जार् ही शक्ति क एक मार्त्र स्रोंत थार्। शार्ह रार्जार् के मुंह से निकलने वार्ले शब्द तथार् आदेश ही देश के नियम एवं कानून मार्ने जार्ने लगे थे। रार्जार् के निर्णयों को चुनौती नहीं दी जार् सकती थी और इसके सार्थ ही वह हर तरह के न्यार्य क अंतिम स्रोत थार्। उत्तरवर्ती काल में, शार्सक परिवार्र के भीतर सत्तार् के लिए होने वार्ले आंतरिक संघर्श ने इनकी स्थिति को कमजोर बनार् दियार्। एक अन्य कारक ने भी इनकी परिस्थिति को ज्यार्दार् बिगार्ड़ने में महत्वपूर्ण भूमिक निभार्ई। शार्हों के लिए यह एक दुर्घटनार् ही थी कि 18वीं शतार्ब्दी के अंतिम दशक में एक संक्षिप्त अंतरार्ल को छोड़कर सन् 1777 ई0 से सन् 1832 ई0 तक रार्जसिंहार्सन पर नार्बार्लिक लोगों को रार्जार् बनार्कर बैठार्नार् पड़ार्। इसके कारण प्रति शार्सकों एवं मंत्रियों (देसी भार्षार् में जिन्हें ‘‘मुक्तियार्र’’ कहॉ जार्तार् थार्) को, रार्जनैतिक प्रक्रियार् से रार्जार् को लगभग अलग-थलग रखकर, अपने हार्थों में सत्तार् को केन्द्रीत करने क अवसर मिल गयार्। पुन: उच्च जार्ति के अनेक प्रतिभार्शार्ली परिवार्र रार्ज्य के तीव्र विस्तार्र के चलते शार्हों की शार्सक प्रणार्ली में शरीक हो गए, जिनकी शार्ह वंश के प्रति वफार्दार्री अथवार् सेवार् की कोई स्थार्पित परम्परार् नहीं थी। इस प्रक्रियार् में गोरखार् कुलीन परिवार्रों के बीच सत्तार् के केन्द्रीयकरण को तथार् जनतार् की जनतार्ंत्रिक आकांक्षार्ओं को उनके द्वार्रार् स्वीकार न किए जार्ने क भार्रतीय नेतृत्व ने पसन्द नहीं कियार्। नेपार्ल की जनवार्दी शक्तियार् को भार्रत की जनतार् ने भी समर्थन प्रदार्न कियार्।

इस तरह इस काल में रार्जनैतिक प्रणार्ली एक पिरार्मिड नुमार् संरचनार् बनकर रह गई थी। जो कि वार्स्तव में कुछ प्रमुख ब्रार्ह्मण परिवार्रों की सलार्ह पर चलने वार्ली प्रणार्ली के अलार्वार् कुछ नहीं थी, इन्हीं परिवार्रों के मध्य सत्तार् तथार् प्रभार्व क आवंटन समय-समय बदलतार् रहार्, जिसमें प्रमुख थे, चौतरियार्ओं (शार्ह परिवार्र की एक संगोत्रीय शार्खार्) क सन् 1785 ई0 से सन् 1794 ई0 तक प्रभुत्व रहार्, सन् 1799 ई0 से सन् 1805 ई0 तक पार्ण्डे, तथार् सन् 1806 ई0 से सन् 1837 ई0 तक थार्पार्ओं क दबदबार् रहार्। इन सभी में भीमसेन थार्पार् ने रार्ज्य की पूर्णशक्ति धार्रण कर ली थी।

इन सभी के शार्सन काल में रार्जनैतिक प्रक्रियार् के लक्ष्य तथार् तरीके अधिकांश तौर पर अपरिवर्तित ही रहे। इसप्रकार इसकाल में इन सभी परिवार्रों ने अनिवाय रूप से एक ही तरह से प्रशार्सन क संचार्लन कियार् थार्। इन्होनें अपनार् अधिक ध्यार्न भौतिक एवं रार्जनैतिक सौभार्ग्य को बढ़ार्ने पर लगार्यार्। इस तरह से परिवार्रवार्द ही रार्जनैतिक प्रणार्ली की आत्मार् बन गयार् और प्रार्थमिक वफार्दार्री रार्ष्ट्र अथवार् रार्जतंत्र की संस्थार्ओं के बजार्ए, परिवार्र के प्रति ही रही। जिसके कारण से नेपार्ली प्रशार्सन क गठन भी पार्रिवार्रिक अथवार् प्रभुत्वशार्ली परिवार्रों की अनेक शार्खार्ओं के बीच बंट गई। इसप्रकार से किसी को सौंपी गई रेजीमेण्टों की संख्यार् ही उसकी अपेक्षित शक्ति एवं प्रभार्व की सबसे विश्वस्त सूचक बन गई। यहार्ं तक कि इस काल के दौरार्न अव्यवस्थार् वार्ली रार्जनैतिक परिस्थिति में भी शार्ह वंश ने अपनी सरकार के लिए वैधतार् के लिए जरूरी अंतिम स्रोत के रूप में, शार्सक परिवार्रों द्वार्रार् जटिल जोड़-तोड़ के लंबे समय के दौरार्न रार्जसिंहार्सन में वह निरन्तरतार् तथार् स्थिरतार् प्रदार्न करतार् रहार्। किन्तु शार्सक परिवार्र स्वयं भी रार्जनैतिक महत्वार्कांक्षार्ओं से बचार् नहीं रहार् और उसक व्यवहार्र भी अक्सर कुलीनों की भार्ंति परिवार्रवार्द को बढ़ार्ने की भार्वनार् क शिकार रहार्। यह सबसे अधिक थार्पार् परिवार्र के पतन ( सन् 1837 ई0 ) तथार् रार्णार् परिवार्र के उदय ( सन् 1846 ई0 ) के बीच के काल में दिखार्ई दियार्, जबकि रार्जार् रार्जेन्द्र ने रार्जसी परिवार्र की सत्तार् को बहार्ल करने की कोशिश की। हार्लार्ंकि उसके काल की बुनियार्दी रार्जनैतिक परिस्थिति प्रतिकूल थी और उसकी कोशिशों से अंतत: रार्जवंश पर विपत्ति क पहार्ड़ टूट पड़ार्।

गोरखार् शार्सक पृथ्वी नार्रार्यण शार्ह द्वार्रार् सन् 1769 ई0 नेपार्ली रार्ष्ट्र की आधार्रशिलार् रखी गई। नेपार्ल देश एक रार्ज्य के रूप में सन् 1769 ई0 में ही अस्तित्व में आयार् किन्तु संविधार्न निर्मार्ण की प्रक्रियार् सन् 1948 ई0 में जार्कर शुरू हो सकी। पुन: चार्र दशकों के अवधि के भीतर ही देश को संविधार्न निर्मार्ण के अनेक प्रयार्सों के दौर से गुजरनार् पड़ार्, विभिन्न अवधियों में, रार्ज्य में रार्जनैतिक घटनार् विकास को भिन्न-भिन्न दिशार्एं प्रदार्न करने वार्ले विभिन्न संविधार्न लार्गू किए गए। सन् 1950 ई0 में अधिनार्यकवार्दी रार्णार् प्रणार्ली क तख्तार् पलट के बार्द, जो जनतार्ंत्रिक प्रयोग कियार् गयार् थार्, उसे सन् 1960 ई0 में तब धक्क लगार्, जब रार्जार् महेन्द्र ने संसदीय स्वरूप वार्ली शार्सन प्रणार्ली को निरस्त करके रार्जार् के प्रत्यक्ष शार्सन की स्थार्पनार् की। एक निरंकुश रार्जतंत्र के अधीन अपने प्रत्यक्ष शार्सन को वैधतार् क मुखौटार् प्रदार्न करने के लिए रार्जार् महेन्द्र ने सन् 1962 ई0 में पाटी विहीन पंचार्यती लोकतंत्र, नार्मक एक प्रणार्ली लार्गू की। इस प्रणार्ली में, जन्मजार्त तौर पर जनतार्ंत्रिक तत्व क अभार्व थार् और सार्थ ही यह प्रणार्ली सच्ची प्रतिनिधि संस्थार्ओं की बहार्ली कर पार्ने में अक्षम थी। बहुदलीय जनतंत्र की स्थार्पनार् के लिए चलार्ये गए एक सफल संघर्ष के बार्द सन् 1990 ई0 में पंचार्यती युग क अंत हो गयार् और देश में एक बार्र फिर संसदीय प्रणार्ली की स्थार्पनार् हो गई।

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