निर्देशन के प्रतिमार्न

निर्देशन के प्रतिमार्न क अभिप्रार्य वह प्रार्रूप है जिसके अन्तर्गत निर्देशन की प्रक्रियार् को संचार्लित कियार् जार्तार् है। निर्देशक के विविध प्रतिमार्नों क स्वरूप समय-समय पर निर्देशन प्रक्रियार् में हो रहे परिवर्तनों के कारण ही निकलकर आयार् है। प्रतिमार्नों की प्रमुख भूमिक निर्देशन प्रक्रियार् को वस्तुनिषठ एवं सावभौमिक स्वरूप प्रदार्न करनार् है। शर्टजर एण्ड स्टोन ने अपनी पुस्तक ‘फण्डार्मैण्टल ऑफ गार्इडेस’ में निर्देशन के 10 प्रतिमार्नों क उल्लेख कियार् है। ये प्रतिमार्न विभिन्न कार्यक्रमों में अलग-अलग मनोवैज्ञार्निको द्वार्रार् विकसित किये गये। सार्मार्न्यत: विकास के क्रम की दृष्टि से निर्देशन के प्रतिमार्नों को निम्न प्रकार वर्गीकृत कियार् जार् सकतार् है।

निर्देशन के विकास काल में जिन विद्धार्नों ने प्रतिमार्नों क विकास कियार्, उनमें पासन तथार् ब्रिवर क मुख्य स्थार्न है :-

1. पासन क प्रतिमार्न –

फ्रैकं पासन ने सन् 1908 र्इ0 में बॉस्टन नार्मक नगर में अपनार् व्यवसार्यिक निर्देशन केन्द्र स्थार्पित कियार् थार्। इन्होने ही व्यार्वसार्यिक निर्देशन शब्द क प्रतिपार्दन कियार्। पासन ने व्यार्वसार्यिक निर्देशन के क्षेत्र में, सर्वप्रथम जो पुस्तक लिखी, वह है ‘बिजिंग ए वोकेशन’। पासन के प्रतिमार्न को जिन लोगों ने स्वीकार कियार् उनमें मेयर ब्लूम फील्ड प्रमुख थे। बार्द में वे व्यार्वसार्यिक केन्द्र के अध्यक्ष भी बने तथार् सन् (1911) में अमेरिक के हार्रवर्ड विश्वविद्यार्लय में व्यवसार्यिक निर्देशन क प्रथम पार्ठ्यक्रम भी आरम्भ कियार्।
पासन द्वार्रार् प्रतिपार्दित प्रतिमार्न की विशेषतार् यह है कि इसमें व्यवसार्य की आवश्यकतार् यार् मार्ंग के अनुरूप व्यक्ति की अभियोग्यतार्ओं क आकलन कियार् जार्तार् हैं। पासन क मार्ननार् थार् कि यदि व्यक्ति को अपनी रूचियों व योग्यतार्ओं के अनुरूप व्यवसार्य प्रार्प्त हो जार्तार् है तो इससे उस 110/ शिक्षार् में निर्देशन एवं परार्मर्श व्यक्ति को न केवल व्यवसार्य संतोष प्रार्प्त होगार् बल्कि वह व्यक्ति समार्ज में भी साथ भूमिक क निर्वार्ह कर सकेगार्। पासन ने अपने अनुभवों के आधार्र पर स्वीकार कियार् कि व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकतार् है- अनुभवी व्यक्ति द्वार्रार् व्यवसार्य के चयन में सहार्यतार् प्रार्प्त करनार्। व्यक्ति की इसी आवश्यकतार् की पूर्ति के सार्धन के रूप में पासन ने व्यार्वसार्यिक निर्देशन क प्रतिपार्दन कियार्।

इस विश्लेषणार्त्मक अध्ययन के द्वार्रार् व्यवसार्य विशेष के चयन की व्यक्तिगत इच्छार् से पहले व्यक्ति की अभियोग्यतार्ओं को जार्नने क प्रयार्स कियार्। इससे निर्देशन प्रक्रियार् के अन्तर्गत व्यक्ति में आत्मविश्लेषण शक्ति यार् क्षमतार् के विकास को ज्ञार्त करने क प्रयत्न कियार् जार्तार् है। जिससे व्यक्ति अपने द्वार्रार् चयनित व्यवसार्य के अनुकूल ही अपनी योग्यतार्ओं एवं क्षमतार्ओं के विकास पर ध्यार्न केन्द्रित कर सकें। इस प्रक्रियार् में उसे (व्यक्ति) विभिन्न व्यवसार्य स्थलों एवं उद्योगों में भेजार् जार्तार् है, जिससे वह वहार्ं की वार्स्तविक परिस्थितियों से अवगत हो सके और उसी के अनुरूप सही निर्णय ले सकें।

पासन क यह मॉडल बार्ह्य रूप से अत्यन्त सरल एवं उपयोगी लगतार् है। यद्यपि वैज्ञार्निकों द्वार्रार् पासन के मॉडल के आधार्र पर किये गये अनुसंधार्नों से अनेक त्रुटियार्ँ सार्मने आर्इ हैं। पासन प्रतिमार्न की आलोचनार् इस आधार्र पर की गर्इ कि इसमें सिद्धार्न्त प्रार्रम्भ में ही व्यार्वहार्रिक स्वरूप ग्रहण कर लेतार् है, जिससे सिद्धार्न्त की वैध् ार्तार् न्यून रह जार्ती है। वैज्ञार्निकों ने पासन के प्रतिमार्न को विधि की दृष्टि से भी दोषपूर्ण मार्नार्। इस प्रतिमार्न की सावर्भार्मिक उपयोगितार् के सम्बन्ध में भी वैज्ञार्निकों को संदेह है क्योंकि इस प्रतिमार्न क प्रतिपार्दन पासन ने केवल एक नगर के कुछ अप्रवार्सी युवार्ओं के आधार्र पर कियार् थार्।

2. ब्रीवर क प्रतिमार्न –

ब्रीवर की पुस्तक ‘एजुकेशन एण्ड गार्इडेन्स’ द्वार्रार् उनके इस प्रतिमार्न की जार्नकारी होती है। ब्रीवर ने 1916-17 में हार्वर्ड विश्वविद्यार्लय में अध्यार्पन क कार्य कियार्। तदुपरार्न्त कैलीफोर्नियार् विश्वविद्यार्लय में व्यार्वसार्यिक शिक्षार् के पार्ठ्यक्रम एवं व्यार्वसार्यिक निर्देशन क अध्यार्पन कियार्। ब्रीवर ने मार्ध्यमिक विद्यार्लयों में कार्य करने पर बल दियार् और मार्ध्यमिक स्तर के लिए परार्मर्शदार्तार्ओं को तैयार्र करने के कार्य को प्रमुखतार् दी। निर्देशन को स्पष्ट करते हुए ब्रीवर ने लिखार् है, ‘‘निर्देशन को बहुधार् गलत ढंग से समझार् जार्तार् है। इसे ‘आत्म-निर्देशन’ के रूप में ही ढंग से जार्नार् जार् सकतार् है। इसे अभियोजन, सुझार्ार्व, निर्देशित करने अथवार् किसी के उत्तरदार्यित्व निभार्ने के रूप में लेनार् भ्रार्मक है।’’

मार्ध्यमिक विद्यार्लयों के अपने अनुभवों के आधार्र पर ब्रीवर ने कहार् कि निर्देशन बार्लार्कों को समझने और संगठित करने वार्लार् कार्य है जिससे वे व्यक्तिगत व सहयोगी कार्यो में सुधार्र लार् सकें। इस धार्रणार् के पीछे ब्रीवर क स्पष्ट विचार्र थार् कि शिक्षार् क उद्देश्य बार्लक को अर्थपूर्ण जीवन के लिए तैयार्र करनार् है जिससे वह ज्ञार्न व बुद्धिपूर्ण लक्ष्य को ग्रहण कर सकें। इस प्रकार शिक्षार् व निर्देश ब्रीवर के अनुसार्र दो भिन्न वस्तुएं न थी वरन् परस्पर सम्बन्धित पूरक प्रक्रियार्ओं के रूप में उनक अस्तित्व है। ब्रीवर महोदय ने निर्देशन प्रतिमार्न क प्रतिपार्दन करते हुए सार्त मार्नकों क उल्लेख कियार् हे, जो इस प्रकार है :-

  1. प्रार्थ्री को किसी समस्यार् क समार्धार्न, कार्य विशेष के सम्पार्दन अथवार् लक्ष्य की प्रार्प्ति हेतु ही निर्देशन प्रदार्न कियार् जार्तार् है।
  2. निर्देशित होने वार्ले व्यक्ति (प्रार्थ्री ) के द्वार्रार् उत्सार्ह प्रदर्शन और निर्देशन की मार्ंग को स्वीकार करनार् आवश्यक है।
  3. निर्देशन अथवार् परार्मर्शदार्तार् क व्यवहार्र मित्रवत्, सहार्नुभूतिपूर्ण एवं बुद्धिपूर्ण होनार् चार्हिए।
  4. निर्देशन अनुभवी, ज्ञार्नी, बुद्धिमार्न होनार् भी आवश्यक है। 
  5. निर्देशन की पद्धतियार्ं नवीन अनुभवों तथार् ज्ञार्न प्रार्प्ति क अवसर सुलभ करार्ती है।
  6. निर्देशन प्रार्प्त करने वार्ले व्यक्ति की निर्देशन में सहमति, निर्देशन क स्वेच्छार्नुसार्र उपयोग एवं स्वयं निर्णय लेने की स्वतंत्रतार् होनी आवश्क है।
  7. निर्देशन क समग्र लक्ष्य यह होतार् है कि व्यक्ति कालार्न्तर में ‘आत्म-निर्देशन’ की प्रक्रियार् के पक्ष में ही जार्यें।
      ब्रीवर के प्रतिमार्न से दो धार्रणार्यें स्पष्ट होती है-पहली, शिक्षार् व निर्देशन में सम्बन्ध तथार् दूसरी, आत्म-निर्देशन जिसे निर्देशन के पर्यार्य के रूप में स्वीकार कियार् गयार् है।

      निर्देशन के मध्यकालीन प्रतिमार्न

1. प्रार्क्टर क प्रतिमार्न –

इस प्रतिमार्न क प्रतिपार्दन विलियम एम0प्रार्क्टर ने कियार्। उनके अनुसार्र निर्देशन मुख्य रूप से वितरण एवं समार्योजन में सहार्यतार् देनार् है। वितरण शब्द से यहॉ अभिप्रार्य उस प्रक्रियार् से है जिसमें बार्लक अपने आसपार्स के वार्तार्वरण को समझने की क्षमतार् विकसित करने हेतु प्रेरित कियार् जार्तार् है और समार्योजन वार्स्तव में परार्मर्शदार्तार् द्वार्रार् दी जार्ने वार्ली सहार्यतार् है जो कि व्यक्ति को अपने लक्ष्य के अनुरूप अपने तथार् वार्तार्वरण के सम्बन्ध में प्रार्प्त ज्ञार्न को एकीकृत करने में सफल न होने पर दी जार्ती है उक्त दोनों कार्यो को करते हुये निर्देशन के लक्ष्य होगें।

  1. प्रार्थ्री को उपयुक्त लक्ष्यों के निर्धार्रण में सहयोग प्रदार्न करनार्।
  2. प्रार्थ्री में भविष्य में अपेक्षित क्रियार्ओं को सम्पार्दित करते हुये संतोष प्रार्प्ति की कुशलतार् विकसित करनार्।
  3. विद्यार्लयी क्रियार्ओं के सार्थ सार्मार्जिक क्रियार्ओं एवं व्यक्तिगत सुख के लिये उपयुक्त उद्देश्यों के निर्धार्रण की दक्षतार् विकसित करनार्।
  4. प्रार्थ्री को निम्न क्षेत्रों से सम्बन्धित उपयुक्त सूचनार् प्रार्प्ति की कुशलतार् विकसित करनार्।

अ) विद्यार्लयी एवं गैर विद्यार्लयी क्रियार्कलार्प में उसकी सफलतार् एवं संतोष के माग एवं उपार्य।
ब) बार्लक की व्यक्तिगत रूचि एवं क्षमतार्यें।
स) विद्यार्थ्री के चयन क निर्धार्रण करने वार्ली सभी वार्स्तविक क्षमतार्यें।
द) विद्यार्लयी जीवन से इतर अन्य व्यार्वसार्यिक प्रशिक्षण एवं रोजगार्र के अवसर।

प्रतिमार्न की विशेषतार् –

यह मुख्य रूप से व्यक्ति एव वार्तार्वरण के मध्य सतुलन एवं समार्योजन पर ही केन्द्रित है। इसक विषय क्षेत्र सुकुचित है। इसमें निर्देशन को मुख्य रूप केवल समस्यार् से मुक्ति क सार्धन मार्नार् गयार् है और इसके सार्थ ही इस बार्त पर भी बल दियार् जार् रहार् है कि निर्देशन क एक प्रमुख कार्य व्यक्ति को सुखी जीवन जीने हेतु आवश्यक सुविधार् भी प्रदार्न करनार् है। वुण्ड्स क प्रतिमार्न-

विलियम वुण्ड्स ने निर्देशन को नैदार्निक प्रक्रियार् के रूप में मार्नार्। 1879 में इन्होंने जर्मनी में अपनी मनोवैज्ञार्निक प्रयोगशार्लार् की स्थार्पनार् की। यह प्रतिमार्न अपने समय में बहुत प्रसिद्ध हुआ क्योंकि-

  1. तार्त्कालिक निर्देशन पद्धतियों की प्रकृति अस्पष्ट थी।
  2. इसमें व्यक्ति समग्र आन्तरिक विश्लेषण को केन्द्रिय महत्व दियार् गयार्।
  3. निर्देशन के क्षेत्र में संगठनार्त्मक व्यवस्थार् को जन्म देने कार्य इसी प्रतिमार्न में हुआ।

इस प्रतिमार्न की प्रमुख विशेषतार्ए निम्नलिखित है-

  1. निर्देशार्त्मकतार्
  2.  सलार्हकार
  3. प्रशार्सनिक
  4. चिकित्सार् समूहों में निर्देशन क्रियार्ओं के विभार्जन
  5. विद्याथियों को सर्वार्गीर्ण लार्भ पहुचार्ने क लक्ष्य।

इस प्रतिमार्न के प्रमुख सोपार्न है-

  1. विश्लेषण
  2. संश्लेषण
  3. निदार्न एवं उपचार्र
  4. अनुगार्मी कार्यक्रम

यह प्रतिमार्न आर्थिक व कुशलतार् की दृश्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ है।

2. जोन्स तथार् मेयर क प्रतिमार्न-

जोन्स एवं मेयर के प्रतिमार्न की आधार्रभूत मार्न्यतार् है कि निर्देशन निर्णय लेने में सहार्यतार् है। अस्तु मेयर के ही शब्दों में- ‘‘निर्देशन की परिस्थिति तभी उत्पन्न होती है जब विद्यार्थ्री को चुनार्व विवेचन तथार् समार्योजन के लिए सहार्यतार् की आवश्यकतार् होती है। इसक प्रत्यक्ष सम्बन्ध निर्णय लेने की प्रक्रियार् से है।जोन्स तथार् मेयर क मार्ननार् है कि निर्णय लेने की समस्यार् तभी उत्पन्न होती है जब-

  1. व्यक्ति यह नही जार्नतार् कि किन सूचनार्ओं की आवश्यकतार् उसे हैं।
  2. किन सूचनार्ओं की उसे आशार् रखनी चार्हिए।
  3. क्यार् उपलब्ध सूचनार्ओं क उपयोग करने में वह असमर्थ है। उपरोक्त परिस्थिति में निर्णय लेने वार्ले प्रतिमार्न के कुछ तथ्य महत्वपूर्ण मार्ने जार्ते है-

      3. स्ट्रैंग क प्रतिमार्न-

      स्ट्रैंग के निर्देशन प्रतिमार्न की केन्द्रीय धार्रणार् चयन प्रक्रियार् पर आधार्रित है। चयन अर्थार्त् अनेक व्यवस्थार्ओं यार् स्रोतों में से विकल्पों क चयन। इस आधार्र पर स्ट्रैंग ने यह प्रतिपार्दित कियार् कि निर्देशन प्रत्यक्ष रूप से व्यक्ति को जार्नने, शैक्षिक अवसरों को जार्नने तथार् विद्यार्थ्री को उपयुक्त विकल्प के चयन में सहार्यतार् प्रदार्न करने से सम्बन्धित है। इस प्रकार प्रतिमार्न में निहित मार्न्यतार्ए निम्नलिखित है-

      1. विद्यार्थ्री को समय-समय पर विशिष्ठ व्यवसार्यिक सहार्यतार् की आवश्यकतार् होती है; जिससे वे स्वयं को भली प्रकार से समझने में समर्थ हो सकें।
      2. यह विशेष सहार्यतार् शैक्षिक प्रकृति की होती है।
      3. विद्याथियों में सीखने की अन्त: र्निहित प्रतिमार् होती है और वे स्वयं के लिए योजनार् बनार्ने में समर्थ होते है।
      4. विद्याथियों को सहार्यतार् प्रदार्न करने के कार्य में अनेक विधियों मतों तथार् तकनीकों क समार्वेष करनार् चार्हिए।
        उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है कि स्ट्रैंग के प्रतिमार्न की धार्रणार् अधिक व्यार्पक है तथार् इस प्रतिमार्न में परार्मर्शदार्तार् को अधिक स्वतन्त्रतार् प्रार्प्त होती है किन्तु आलोचको की यह मार्न्यतार् है कि यह प्रतिमार्न किसी स्थार्यी दर्शन पर आधार्रित नही है और नही परार्मर्शदार्तार् विभिन्न विधियों में निपुण होतार् है अत: इसकी व्यार्वहार्रिकतार् संदिग्ध है।

निर्देशन के आधुनिक प्रतिमार्न 

1. हॉयट क प्रतिमार्न-

हॉयट ने अपने इस प्रतिमार्न क प्रतिपार्दन 1962 में कियार् थार्। इस प्रतिमार्न की आधार्रभूत मार्न्यतार्एं निम्नलिखित हैं :-

  1. इस प्रतिमार्न में निर्देशन कार्यक्रम को विद्यार्लयी सेवार् यार् सहयोग के यप में स्वीकार कियार् गयार् है। 
  2. इसमें परार्मर्शदार्तार् वह केन्द्रीय तत्व है जिस पर निर्देशन कार्यक्रम के संचार्लन क समग्र दार्यित्व रहतार् है।

 इस प्रतिमार्न में यह मार्नार् गयार् है कि परार्मर्श सेवार्ओं की सफलतार् तभी सम्भव है जबकि इसके लक्ष्य, विद्यार्लय के उद्देश्यों के सार्थ ही अंगीकृत किए जार्एं। यही कारण है इसमें परार्मर्शदार्तार् की शिक्षार् के प्रति प्रतिबद्धतार् को महत्वपूर्ण मार्नार् गयार् है। इस प्रतिमार्न मे विशेष बल इस तथ्य पर दियार् गयार् है कि परार्मर्शदार्तार् अपने को शिक्षार्विद् मार्ने तथार् शिक्षकों को प्रोत्सार्हित करनार्, इसक प्रमुख कार्य है।

 इसमें शिक्षार् व निर्देशन को सहगार्ती प्रक्रियार् के रूप में स्वीकार कियार् गयार् तथार् शिक्षक व परार्मर्शदार्तार् के मध्य विरोध की स्थिति को न्यून रखने क प्रयार्स कियार् गयार्। इस प्रकार इस प्रतिमार्न से शिक्षण एवं शैक्षिक प्रशार्सन के मध्य भी समार्योजन स्थार्पित करने मे सहार्यतार् प्रार्प्त होती है तथार् विद्याथियों के मार्नसिक स्वार्स्यि क उत्तरदार्यित्व कुछ व्यक्तियों तक सीमित न रहकर, सम्पूर्ण व्यवस्थार् पर आ जार्तार् है।

2. लिटिल तथार् चैपमैन क प्रतिमार्न –

निर्देशन क विकासार्त्मक चरित्र इस प्रतिमार्न की विशेषतार् है। इसकी धार्रणार् अन्य प्रतिमार्नों की अपेक्षार् अधिक विस्तृत है क्योंकि इस प्रतिमार्न में व्यक्तिगत, व्यार्वसार्यिक, शैक्षिक, सार्मार्जिक अनुभवों तथार् विद्यार्थ्र्ार्ी के जीवन की समस्त अवस्थार्ओं में सहार्यतार् करने के विचार्र पर अधिक बल दियार् गयार् है।

लिटिल तथार् चैपमैन ने अपनी पुस्त्क ‘डेवलेपमेन्टल गार्इडेन्स इन सैकेन्ड्री स्कूल’ में इस प्रतिमार्न की विस्तृत व्यार्ख्यार् की। यद्यपि निर्देशन को विकास के उपार्गम के रूप में सर्वप्रथम प्रस्तुत करने क श्रेय हरमन जे0 पीटरसन को है तथार् इसके विकास में योगदार्न है, लिटिल तथार् चैपमैन का। विकासार्त्मक निर्देशन प्रतिमार्न में आत्मज्ञार्न के आधार्र पर व्यक्तिगत पूर्णतार् तथार् प्रभार्वकतार् अर्जित करने पर विशेष बल दियार् गयार् है। निर्देशन द्वार्रार् विकास की सम्पूर्ण प्रक्रियार् को आगे बढ़ार्ने क प्रयार्स कियार् जार्तार् है। इस कारण लिटिल तथार् चैपमैन ने परार्मर्शदार्तार्, अध्यार्पक, प्रशार्सक, विशेषज्ञ तथार् अन्य कार्यकर्तार् के सम्मिलित प्रयार्सों को निर्देशन कार्यक्रम क अभिन्न अंग मार्नार् है। निर्देशन, विकास व शिक्षार् के सार्थ निरन्तर चलने वार्ली प्रक्रियार् है।

3. मैथ्यूूसन क प्रतिमार्न-

मैथ्यसू न ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘गार्इडेन्स पॉलसी एण्ड प्रैक्टिस’ में चार्र ऐसे क्षेत्रों को बतार्यार्, जिनक सम्बन्ध निर्देशन की आवश्यकतार्ओं से हैं, वे चार्र क्षेत्र हैं :-

  1. मूल्यार्ंकन तथार् स्वंय को समझने की आवश्यकतार्। 
  2. स्वंय तथार् वार्तार्वरण की मार्ंगों तथार् वार्स्त्विकतार्ओं के मध्य समार्योजन करने की आवश्यकतार्। 
  3. वर्तमार्न तथार् भविष्य की स्थितियों के प्रति सचेत रहने की आवश्यकतार्। 
  4. व्यक्तिगत क्षमतार्ओं को विकसित करने की आवश्यकतार्।

मैथ्यूसन ने अपने प्रतिमार्न में निर्देशन के स्वरूप को विकासार्त्मक मार्नार्। उनके अनुसार्र :-

  1. निर्दशन से व्यक्ति को अधिक सूचनार्यें प्रार्प्त होती है। 
  2. वह स्वंय की योग्यतार्ओं को निर्धार्रित के अनुसार्र गत्यार्त्मक बनार्ने क प्रयार्स करतार् है। 
  3. निर्देशन की सहार्यतार् से व्यक्ति, लम्बे समय तक अपने विकास की योजनार् बनार् सकतार् है।

मैथ्यूसन ने निर्देशन के अन्तर्गत विद्यार्लय के समस्त कर्मचार्रियों के सहयोग तथार् उस व्यक्ति की स्वंय की सहभार्गितार् को आवश्यक बतार्यार् है।

3. शोलेन क प्रतिमार्न-

एडवर्ड ए0 शार्ले ने ने 1962 मे इस प्रतिमार्न क प्रतिपार्दन कियार्। इस प्रतिमार्न में निर्देशन को ‘सार्मार्जिक पुनर्निमाण’ के रूप में स्वीकृत कियार् गयार्। शोलेन ने पार्ंचवें दशक के अन्त में पार्यार् कि निर्देशन के क्षेत्र में विशेषज्ञों क बहुत प्रभार्व है। इसके अतिरिक्त निर्देशन को जटिल बनार्ने के प्रयार्सों में होड़ लगी थी। अत: ऐसे में शोलेन द्वार्रार् प्रतिपार्दित प्रतिमार्न एक आंदोलन के रूप में सार्मने आयार्, जिसमें निर्देशन को विभिन्न जटिलतार्ओं से मुक्त कर, सरल व समार्ज के अनुकूल बनार्ने पर विशेष बल दियार् गयार्।

इस प्रतिमार्न की मुख्य भूमिक सार्मार्जिक रूप से स्वीकृत मार्ंगों के अनुरूप व्यक्तिगत विकास में सहयोग से सम्बन्धित थी। इसमें विद्याथियों द्वार्रार् शार्ंतिपूर्णार् जीवन, संयम व मूल्यपरक जीवन अपनार्ने पर बल दियार् गयार्। इस प्रतिमार्न की मुख्य विशेषतार् शिक्षार् और समार्ज के बीच रचनार्त्मक सम्बन्ध बनार्ने से थी। समार्जिक विचार्र के कारण ही शोलेन के प्रतिमार्न की आदर्श प्रतिमार्न मार्नार् गयार्।

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