द्वितीय विश्व युद्ध

द्वितीय विश्व-युद्ध के कारण

लगभग बीस वर्षों की ‘शार्ंति’ के बार्द 1 सितम्बर, 1939 के दिन युद्ध की अग्नि ने फिर सार्रे यूरोप को अपनी लपटों में समेट लियार् और कुछ ही दिनों में यह संघर्ष विश्वव्यार्पी हो गयार्। विगत दो शतार्ब्दियों के इतिहार्स के अध्ययन के बार्द यह प्रश्न स्वार्भार्विक है कि शार्ंति स्थार्पित रखने के अथक प्रयार्सों के बार्द भी द्वितीय-विश्व युद्ध क्यों छिड़ गयार्? क्यार् संसार्र के लार्गे और विविध देशों के शार्सक यह चार्हते थे? नहीं; यह गलत है। समूचे संसार्र में शार्यद कोर्इ भी समझदार्र व्यक्ति ऐसार् नहीं थार् जो युद्ध की कामनार् करतार् हो। ‘बच्चे-बूढ़े स्त्री-पुरूष तथार् सभी वगर् की जनतार् शार्ंति चार्हती थी। इसी तरह यूरोप की कोर्इ सरकार युद्ध नहीं चार्हती थी। यहार्ँ तक कि जर्मन सरकार भी युद्ध से बचनार् चार्हती थी। स्वयं हिटलर भी युद्ध नहीं चार्हतार् थार्। अन्तिम समय तक हिटलर क यही विचार्र थार् कि संकट पैदार् करके, धार्ँस देकर, डरार्-धमकाकर पोलैंड से डार्न्जिंग छीन लियार् जार्य। वह जार्नतार् थार् कि युद्ध से उसक सर्वनार्श हो जार्यगार्। बिनार् युद्ध किये ही विजय हार्सिल कर लेनार् उसकी चार्ल थी। वार्स्तव में ‘युद्ध के बिनार् विजय’ के सिद्धार्ंत पर ही उसकी सार्री मार्न-मर्यार्दार् निर्भर थी। पर ऐसार् न हो सका। किसी की इच्छार् नहीं होने पर भी युद्ध छिड़ गयार्। ऐसार् क्यों हुआ और इसके लिए कानै जिम्मेदार्र थार्?

वर्सार्य-संधि

1919 र्इ. के पेरिस-शार्ंति सम्मेलन में शार्ंति क महल नहीं खड़ार् कियार् जार् सकतार् थार्। उस समय यह आम विश्वार्स थार् कि वर्सार्य-संधि के द्वार्रार् एक ऐसे विष वृक्ष के बीज क आरोपण कियार् गयार् है जो कुछ ही समय में एक विशार्ल संहार्रक वृक्ष के रूप में खड़ार् हो जार्यगार् और उसक कटु फल सभों को बुरी तरह चखनार् पड़गे ार्। कहार् जार्तार् थार् कि विलसन के आदर्शवार्दी सिद्धार्ंत के आधार्र पर वर्सार्य-व्यवस्थार् की स्थार्पनार् हुर्इ थी लेकिन यह वातार् सर्वथार् गलत है। विलसन के आदर्शों को किसी भी स्थार्न पर नहीं अपनार्यार् गयार् थार्। परार्जित रार्ज्यों के सम्मुख ‘आरोपित संधियों’ को स्वीकार करने के सिवार् कोर्इ चार्रार् नहीं थार्। उनके लिए यही बुद्धिमार्नी थी कि वे आँख मीचकर कठोर संधि के कड़वे घूँट को चुपचार्प कण्ठ से नीचे उतार्र ले। लेकिन, यह स्थिति अधिक दिनों तक टिकने वार्ली नहीं थी। यह निश्चित थार् कि कभी-न-कभी वह समय अवश्य आयगार् जब जर्मनी एक शक्तिशार्ली रार्ज्य बनेगार् और वर्सार्य के घोर अपमार्न क बदलार् अपने शत्रुओं से लेगार्। विजय के मद में चूर मित्ररार्ष्ट्रों ने इस बार्त पर जरार् भी ध्यार्न नहीं दियार् कि जर्मनी के सार्थ इस प्रकार क दुव्र्यवहार्र करके भविष्य के लिए कितने खतरनार्क कांटे बो रहे हैं।

वर्सार्य-व्यवस्थार् की एक दूसरी कमजोरी भी थी। उसके द्वार्रार् यूरोप में अनेक ‘खतरार् केन्द्रों’ क निर्मार्ण हुआ थार्। कहार् जार्तार् है कि इस व्यवस्थार् के कारण यूरोप क ‘बार्ल्कनीकरण’ हो गयार्। झूठी रार्ष्ट्रीयतार् के नार्म पर यूरोप के टुकड़े-टुकड़े कर दिये गये और पुरार्ने सार्म्रार्ज्यों के स्थार्न पर असंख्य छोटे-छोटे रार्ज्य पैदार् हो गये। प्रार्य: ये सब रार्ज्य भविष्य के खतरे के तूफार्नी केन्द्र थे। इनके अतिरिक्त वर्सार्य-व्यवस्थार् के द्वार्रार् सुडेटनलैंड, डार्न्जिग, पोलिश गार्लियार्रे जैसे असंख्य एल्सस-लोरेन पैदार् हो गये थे। यह निश्चित थार् कि उपयुक्त समय आने पर इन खतरनार्क केन्द्रों में संकट उपस्थित होंगे और अन्तर्रार्ष्ट्रीय रार्जनीति पर उनक बहुत बुरार् असर पड़ेगार् लेकिन 1919 के अदूरदश्र्ार्ी रार्जनेतार् शार्यद इसकी कल्पनार् नहीं कर सके। हिटलर के उत्कर्ष में इस बार्त से बड़ी मदद मिली थी। अतएव यदि वर्सार्य-व्यवस्थार् को युद्ध क एक कारण मार्नार् जार्य तो कुछ गलत न होगार्।

ब्रिटेन की नीति

इसमें कोर्इ शक नहीं कि जर्मनी से शक्ति-संतुलन क सिद्धार्ंत ब्रिटिश विदेश-नीति क एक महत्वपूर्ण तत्व रहतार् आयार् है। पर युद्धोत्तर-काल की ब्रिटिश नीति में इस तत्व पर अधिक जोर देनार् इतिहार्स के सार्थ अन्यार्य करनार् होगार्। वार्स्तव में इस काल की ब्रिटिश विदेश-नीति में शक्ति संतुलन क सिद्धार्ंत उतनार् प्रबल नहीं थार् जितनार् रूसी सार्म्यवार्द के प्रसार्र को रोकने क प्रश्न थार्। जिस ब्रिटिश-नीति को तुष्टिकरण की नीति कहार् जार्तार् है, वह वार्स्तव में ‘प्रोत्सार्हित करो की नीति’ थी। सार्म्रार्ज्यवार्दी ब्रिटेन की सबसे बड़ी समस्यार् जर्मनी नहीं, वरन सार्म्यवार्दी प्रसार्र को रोकनार् थार्। इस काल में ब्रिटेन में नीति-निर्धार्रिकों क यह अनुमार्न थार् कि एशियार् में जार्पार्न और सोवियत-संघ तथार् यूरोप में जर्मनी और सोवियत-संघ भविष्य के वार्स्तविक प्रतिद्वन्द्वी हैं। अगर इन शक्तियों को आपस में लड़ार्तार् रहार् जार्य और इस तरह एक दूसरे पर रूकावट डार्लते रहे तो ब्रिटेन निर्विरोध अपने विश्वव्यार्पी सार्म्रार्ज्य को कायम रखे रह सकतार् है। ब्रिटेन की नीति यह थी कि फ्रार्ंस के सार्थ असहयोग करके, उस पर दबार्व डार्लकर हिटलर, मुसोलिनी और हिरोहितों को सार्म्यवार्दी रूस के खिलार्फ उभार्ड़ार् जार्य और उसकी सहार्यतार् करके सार्म्यवार्दी रूस क विनार्श करवार् दियार् जार्य। इनमें शक्ति-संतुलन क कोर्इ सिद्धार्ंत काम नहीं कर रहार् थार्; क्योंकि सोवियत-संध अभी बहुत कमजोर थार्।

ब्रिटिश शार्सकों की यह नीति गलत तर्क पर आधार्रित थी। उसक कारण यह थार् कि उस समय ब्रिटेन की नीति क निधार ण कुछ अनुभवहीन तथार् कट्टर सार्म्यवार्द विरोधी व्यक्तियों के हार्थ में थार्। कर्नलब्लिम्प, चैम्बरलेन, बैंक ऑफ इंगलैंड के गवर्नर मार्ंग्टेग्यू नार्रमन, लाड वेभरबु्रक, जेकोव अस्टर (लन्दन टार्इम्स) तथार् गार्रविन (ऑवजर्बर) जैसे पत्रकार, डीन इक जैसे लेखक, कैन्टरबरी के आर्चविशप तथार् अनेक पूंजीपति, सार्मन्त, जमींदार्र और प्रतिक्रियार्वार्दी इस गुट के प्रमुख सदस्य थे और इन्हीं लोगो के हार्थों में ब्रिटेन के भार्ग्य-निर्धार्रण क काम थार्। जिसे देश के नीति-निर्धार्रण में ऐसे लोगों क हार्थ हो वहार्ं की नीति सार्म्यवार्दी विरोध नहीं तो और क्यार् हो सकती थी? चैम्बरलेन इस दल क नेतार् थार्, इन लोगों के हार्थ की कठपतु ली। मर्इ, 1937 में चेम्बरलने ब्रिटेन क प्रधार्नमंत्री बनार्। तथार्कथित तुष्टिकरण की नीति की वह प्रतिमूर्ति ही थार्। चेकोस्लोवार्कियार् क विनार्श उसने इसी उद्देश्य से करार्यार् कि इससे हिटलर प्रोत्सार्हित होकर सोवियत-संध पर चढ़ाइ कर बैठेगार्। इसी भवनार् से प्रेरित होकर वह पोलैंड के विनार्श में भी अपनार् सहयोग देने को तैयार्र थार्। किन्तु हिटलर के जिद्द के कारण वह अपने इस कुकार्य में सफल नहीं हो सका। उसकी गलत नीति क परिणार्म सार्रे संसार्र को भुगतनार् पड़ार्।

रार्ष्ट्रसंघ के भार्रत क उल्लंघन

रार्ष्ट्रसंघ के विधार्न पर हस्तार्क्षर करके सभी सदस्य-रार्ज्यों के वार्दार् कियार् थार् कि वे सार्मूहिक रूप से सब की प्रार्देशिक अखंडतार् और रार्जनीतिक स्वतंत्रतार् की रक्षार् करेगेंं लेकिन जब मौक आयार् तब सब-के सब पीछे हट गय।े जार्पार्न, चीन को और इटली अबीसीनियार् को रौंदतार् रहार्। दोनों आक्रार्न्त देश रार्ष्ट्रसंघ के सदस्य थे, पर किसी ने कुछ नहीं कियार्। इसके बार्द चेकोस्लोवार्कियार् की बार्री आयी। फ्रार्ंस चेकोस्लोवार्कियार् की रक्षार् करने के लिए वचनबद्ध थार्। लेकिन जब समय आयार् तो वह अपने मित्र को बचार्ने तो नहीं ही गयार्, उल्टे उसके विनार्श में सहार्यक हो गयार्। म्यूि नख समझार्तै े के बार्द ब्रिटेन और फ्रार्ंस परिवर्तित चेक-सीमार् की गार्रण्टी दिये हुए थे। पर जब हिटलर बचे हुए चेक-रार्ज्य को भी हड़पने लगार् तो किसी ने उसक विरोध नहीं कियार्। इससे बढ़कर विश्वार्सघार्त और क्यार् हो सकतार् से आक्रार्मक प्रवृत्तियों को काफी प्रोत्सार्हन मिलार्। जार्पार्न ने चीन पर आक्रमण कियार् और उसे कोर्इ दण्ड नहीं मिलार्। मुसोलिनी को इससे प्रोत्सार्हन मिलार् और उसने अबीसीनियार् पर चढ़ाइ कर दी। अबीसीनियार् पर आक्रमण करने वार्ले को कोर्इ दण्ड नहीं मिलार्। इसलिए हिटलर ने आस्ट्रियार् और चेकोस्लोवार्कियार् को हड़प लियार्। आस्ट्रियार् और चेकोस्लोवार्कियार् पर आक्रमण क भी विरोध नहीं कियार् गयार्। फिर इस कमजोरी से लार्भ उठार्कर हिटलर ने पोलैंड पर चढ़ाइ कर दी। अगर सभी रार्ष्ट्र अपने दिये गये वचनों क पार्लन करते रहते और आक्रार्मक प्रवृत्तियों को प्रोत्सार्हन नहीं मिलतार् और दूसरार् विश्व-युद्ध नहीं होतार्।

यूरोपीय गुटबन्दियार्ं

आधुनिक युग में दुनियार् के अधिकतर लोगों के मन में यह एक अंधविश्वार्स जम गयार् है कि सैन्य-संधि तथार् गुटबंदी के द्वार्रार् विश्व-शार्ंति कायम रखी जार् सकती है। शार्ंति बनार्ये रखने के नार्म पर यूरोपीय रार्ज्यों के बीच विविध संधियार्ं हुर्इ जिसके फलस्वरूप यूरोप फिर से दो विरोधी गुटों में बट गयार्। एक गुट क नेतार् जर्मनी थार् और दूसरे क फ्रार्ंस। यहार्ं पर यह स्पष्ट कर देनार् अनुचित नहीं कि इन गुटों के मलू में दो बार्तें थी : एक सैद्धार्ंति समार्नतार् और दूसरी हितों की एकतार्। इटली, जार्पार्न और जर्मनी एक सिद्धार्ंत (तार्नार्शार्ही) में विश्वार्स करते थे। वर्सार्य-संधि से उनकी समार्न रूप से शिकायत थी और उसक उल्लंघन करके अपनी शक्ति को बढ़ार्ने में उनक एक समार्न हित थार् इसके विपरीत फ्रार्ंस, चेकोस्लोवार्कियार्, पोलैंड इत्यार्दि देशों क एक हित थार्। वर्सार्य-व्यवस्थार् से उन्हें काफी लार्भ पहुँचार् थार् और इसलिए यथार्स्थिति बनार्ये रखने में ही उनक हित थार्। बहुत दिनों तक ब्रिटेन इस गुट में शार्मिल नहीं हुआ; पर अधिक दिनों तक ब्रिटेन गुट से अलग नहीं रह सका। परिस्थिति से बार्ध्य होकर उसे भी इस गटु में सम्मिलित होनार् पड़ार्। उधर रूस की स्थिति कुछ दूसरी ही थी। सार्म्यवार्दी होने के कारण पूंजीवार्दी और फार्सिस्टवार्दी दोनों गुट उससे घृणार् करते थे और कोर्इ उसको अपने गुट में सम्मिलित करनार् नहीं चार्हतार् थार्। पर, जब यूरोप की स्थिति बिगड़ने लगी तो दोनों गुट उसे अपने-अपने गुट में शार्मिल करने के लिए प्रयार्स करने लग।े अंत में जर्मनी को इस प्रयार्स में सफलतार् मिली और सोवियत-संघ उसके गुट में सम्मिलित हो गयार्। इसके फलस्वरूप यूरोप क वार्तार्वरण दूषित होने लगार् तथार् रार्ष्ट्रों के बीच मनमुटार्व पैदार् होने लगार्। रार्ष्ट्रों के परस्पर संबंध बिगड़ने में इन गुटबंदियों क बहुत हार्थ थार्। इस दृष्टि से गुटबंदियार्ं द्वितीय विश्व-युद्ध क बहुत बड़ार् कारण थी।

भातनिर्मार्न की प्रतिस्पर्धार्

जब रार्ष्ट्रों के बीच मनमुटार्व पैदार् होने लगतार् है, एक देश, दूसरे देश से सशंकित होने लगतार् है तो वे अपनी सुरक्षार् के प्रबंध में जुट जार्ते हैं। इस अवस्थार् में सुरक्षार् क एकमार्त्र उपार्य हथियार्रबन्दी समझार् जार्तार् है। जो रार्ष्ट्र जितनार् अधिक शक्तिशार्ली होगार्, जिसके पार्स जितनी अधिक सेनार् रहेगी, वह अपने को उतनार् ही अधिक बलवार्न समझतार् है। इस सिद्धार्तं में यूरोप के सभी रार्ज्य विश्वार्स करते थे। युद्ध के बार्द जर्मनी यद्यपि बिल्कुल पस्त पड़ार् हुआ थार्, फिर फ्रार्ंस को जर्मनी से काफी डर थार्। इसलिए वह हथियार्रबंदी में हमेशार् लगार् रहतार् थार्। युद्ध के बार्द भी वह सैनिक शक्ति में सर्वप्रथम स्थार्न रखतार् थार्। हर वर्ष उसक सैनिक बजट बढ़तार् ही जार्तार् थार्। प्रथम महार्युद्ध में फ्रार्ंस की सीमार् को जर्मनी बड़ी आसार्नी से पार्र कर गयार् थार्। अत: भार्वी जर्मन आक्रमण से बचने के लिए फ्रार्ंस ने 1937 में स्विटजरलैंड की सीमार् से किलों की एक श्रृंखलार् तैयार्र की जिसको मैगिनो लार्इन कहते है।

1933 में जब संसार्र की स्थिति काफी बिगड़ गयी तो ब्रिटेन में भी हथियार्रबंदी शुरू हो गयी। फ्रार्ंस के सार्थी देशों में यह क्रम पहले से ही जार्री थार्। ब्रिटेन क अनुकरण करते हुए वे देश भी हथियार्रबंदी करने लग,े जो अभी तक चुप बठै े थे। इस समय तक जर्मनी में नार्त्सी-क्रार्ंति हो चुकी थी। हिटलर ने वर्सार्य की संधि की उस शर्त को जिसके द्वार्रार् जर्मनी पर सैनिक पार्बंदियार्ं लगार् दी गयी थीं, सबसे पहले मार्नने से इनकार कर दियार् और जार्रे -जोर से हथियार्रबंदी करने लगार्। कुछ ही दिनों में जर्मनी की सैन्य-शक्ति भी काफी बढ़ गयी। उसकी थल-सेनार् और वार्यु-सेनार् संसार्र की सबसे शक्तिशार्ली सैन्य शक्ति थी। फ्रार्ंस की मैगिनो लार्इन के जवार्ब में उसने भी एक समार्नन्तर सीगफ्रीड लार्इन बनार्यी, जो किसी भी स्थिति में फ्रार्ंस की किलेबंदी से कम नहीं थी। इस प्रकार देखते-देखते सार्रार् यूरोप एक शस्त्रार्गार्र हो गयार्। सभी देशों में सैनिक-सेवार् अनिवाय कर दी गर्इ। रार्ष्ट्रीय बजट क अधिकांश बजट सेनार् पर खर्च होतार् थार्। वर्षों तक रार्ष्ट्रसंघ के तत्वार्धार्न में इस बार्त क प्रयार्स होतार् रहार् कि हथियार्रबंदी की होड़ रूक जार्य। लेकिन, रार्ष्ट्रसंघ को सफलतार् नहीं मिली और यूरोप में शस्त्रीकरण की दौड़ होती रही। इस सैनिक तैयार्री यही निष्कर्ष निकलत है कि शस्त्रनिर्मार्ण की प्रतिस्पर्धार् द्वितीय विश्वयुद्ध क एक प्रमुख कारण थार्।

रार्ष्ट्रसंघ की कमजोरियार्ं

प्रथम विश्व-युद्ध के बार्द रार्ष्ट्रसंघ की स्थार्पनार् इसी उद्देश्य से की गयी थी कि वह संसार्र में शक्ति कामय रखेगार्। लेकिन, जब समय बीतने लगार् और परीक्षार् क अवसर आयार् तो रार्ष्ट्रसंघ एक बिल्कुलन शक्तिहीन संस्थार् सार्बित हइुर् । जहार्ं तक छोटे-छोटे रार्ष्ट्रों के पार्रस्परिक झगड़ों क प्रश्न थार् रार्ष्ट्रसंघ को उनमें कुछ सफलतार् मिली, लेकिन जब बड़े रार्ष्ट्रों क मार्मलार् आयार् तो रार्ष्ट्रसंघ कुछ भी नहीं कर सका। जार्पार्न ने चीन पर चढ़ाइ कर दी और इटली ने असीसीनियार् पर हमलार् कियार्, पर रार्ष्ट्रसंघ उनको रोकने में बिल्कुल असमर्थ रहार्। अधिनार्यकी को पतार् चलार् कि रार्ष्ट्रसंघ बिल्कुल शक्तिहीन संस्थार् है और वे जो चहे कर सकते हैं। पर, रार्ष्ट्रसंघ की असफलतार् के लिए उस संस्थार् को दोष देनार् ठीक नहीं है। रार्ष्ट्रसंघ रार्ष्ट्रों की एक संस्थार् थी और यह उनक कर्तव्य थार् कि वे उस संस्थार् को सफल बनार्यें। रार्ष्ट्रसंघ ने अबीसीनियार् पर आक्रमण करने के अपरार्ध में हटली को दण्ड दियार्। इसके विरूद्ध आर्थिक पार्बन्दियार्ं लगार्यी गयीं लेकिन ब्रिटेन और फ्रार्ंस ने इसमें रार्ष्ट्रसंघ के सार्थ सहयार्गे नहीं कियार्। रार्ष्ट्रसंघ की निष्क्रियतार् के जो भी कारण हो, लेकिन उस पर से लोगों क विश्वार्स जार्तार् रहार् और जिस उद्देश्य से इसकी स्थार्पनार् हुर्इ थी उसकी पूर्ति करने में वह सर्वथार् असफल रहार्। इसीलिए रार्ष्ट्रसंघ की कमजोरियों को भी द्वितीय विश्वयुद्ध के लिए उत्तरदार्यी मार्नार् जार्तार् है।

द्वितीय विश्व-युद्ध की घटनार्यें

1. पोलैण्ड क युद्ध

1 सितम्बर 1937 र्इ. को जर्मनी ने पोलैण्ड पर आक्रमण कियार्, क्योंकि उसने उसकी अनुचित मार्ँगार्ं े को स्वीकार नहीं कियार् थार्। जर्मनी ने पोलैण्ड पर जल, थल और वार्यु सेनार् से आक्रमण कियार्। पोलैण्ड की सेनार् जर्मनी को सेनार् क सार्मार्न करने में असमर्थ रही। पंद्रह दिन में जर्मन सेनार् क पोलैण्ड की रार्जधार्नी बार्रसार् पर अधिकार हो गयार्। एक समझौते द्वार्रार् दोनों ने पोलैण्ड क विभार्जन स्वीकार कियार्।

2. रूस क फिनलैण्ड पर आक्रमण

रूस फिनलैण्ड पर अधिकार करनार् चार्हतार् थार्। उसने फिनलैण्ड की सरकार से बंदरगार्ह और द्वीप मार्ँगे और जब उसने उनको देने से इंकार कियार् तो रूस ने 30 नवम्बर 1936 र्इ. को फिनलैण्ड पर आक्रमण कर उसको अपने अधिकार में कियार्।

3. नावे और डेनमाक पर आक्रमण

9 अपै्रल 1940 र्इ. को जर्मनी ने नावे पर आक्रमण कर उसके कर्इ बंदरगार्हों पर आक्रमण कियार् और वहार्ँ एक नर्इ सरकार क संगठन कियार्। इसी दिन जर्मनी ने डेनमाक की रार्जधार्नी कोपेनहेगन पर भी अधिकार कर लियार्। इन विजयों क परिणार्म यह हुआ कि इंग्लैण्ड के प्रधार्नमंत्री चेम्बरलेन को त्यार्ग-पत्र देनार् पड़ार् और उसके स्थार्न पर चर्चिल इंग्लैण्ड क प्रधार्नमंत्री बनार्।

4. हॉलैण्ड और बेल्जियम क पतन

10 मर्इ 1940 र्इ. को जर्मनी ने हॉलैण्ड पर आक्रमण कियार्। 19 मर्इ को डच सेनार्ओं ने आत्मसमर्पण कर दियार्। हॉलैण्ड पर जर्मनी क अधिकार हो गयार्। हॉलैण्ड के सार्थ-सार्थ जर्मनी ने बेल्जियम पर भी आक्रमण कियार् बेल्जियम की रक्षाथ ब्रिटिश सेनार्यें बेल्यिजम में प्रवेश करने गयी थीं इसी समय उसने फ्रार्ंस पर भी आक्रमण कर दियार् थार्। जर्मनी ने बेि ल्जयम के कर्इ नगरों पर आक्रमण कियार्। 27 मर्इ को बेल्जियम की सेनार् को आत्मसमर्पण करनार् पड़ार्।

5. फ्रार्ंस की परार्जय

3 जून 1940 र्इ. को जर्मनी ने तीन ओर से फ्रार्ंस पर आक्रमण कियार्। 3 जून को उसने फ्रार्ंस की रक्षार् पंक्ति को तोड़ डार्ल और चार्रों ओर से पेरिस नगर पर आक्रमण कियार्। 10 जून को इटली ने फ्रार्ंस के विरूद्ध युद्ध की घोषणार् की और फ्रार्ंस पर आक्रमण कियार्। 19 जून को जर्मनी की सेनार् क पेरिस नगर पर अधिकार हुआ। 22 जून को फ्रार्ंस ने आत्मसमर्पण कियार् और युद्ध विरार्म संधि हुर्इ।

6. यूगोस्लार्वियार् और यूनार्न की परार्जय

28 अक्टूबर को हिटलर क ध्यार्न र्इरार्न और मिश्र की ओर आकर्षित हुआ। उसने 28 अक्टूबर 1940 र्इ. को ग्रीस को यह संदेश भेजार् कि वह अपने कुछ प्रदेश जर्मनी को प्रदार्न करे। ग्रीस अभी तक भी समझ नहीं कर पार्यार् थार् कि उस पर आक्रमण कर दियार् गयार् है। इटली की सेनार् ने उस पर आक्रमण कियार्। ग्रीस ने बड़ी वीरतार् से उसक सार्मनार् कियार्। बार्द में उसकी सहार्यतार् के लिए जर्मन सेनार् आर्इ। इसी बीच में जर्मनी ने हंगरी, रूमार्नियार् और बल्गार्रियार् से संधि की। यूगोस्लार्वियार् ने संधि करने से इंकार कर दियार्। 6 अप्रैल, 1941 को जर्मनी ने यूगोस्लार्वियार् के विरूद्ध युद्ध की घोषणार् की और 11 दिन के युद्ध के पश्चार्त् जर्मनी विजयी हुआ। इससे निश्चित होकर हिटलर ने ग्रीस पर भीषण आक्रमण कियार् गयार्। ब्रिटेन ने यूनार्न की सहार्यतार् की, किंतु जर्मनी विजयी हुआ। उसने 21 अप्रैल को हथियार्र डार्ल दिये। जर्मनी क अधिकार एथेसं पर 26 अप्रैल को हुआ। 20 मर्इ को जर्मनी ने कीट द्वीप पर अधिकार कियार्। इस प्रकार पूर्वी भूमध्यसार्गर पर जर्मनी और इटली क अधिकार पूर्णतयार् स्थार्पित हो गयार्।

7. जार्पार्न और अमेरिक क युद्ध में प्रवेश

जार्पार्न समस्त एशियार् को अपने अधिकार में करनार् चार्हतार् थार्। दिसम्बर 1940 को उसने हवाइ सेनार् द्वार्रार् पर्ल हाबर पर आक्रमण कियार्। इस आक्रमण से अमेरिक को बहुत क्षति हुर्इ। जार्पार्न ने शीघ्र ही शंघाइ, हार्ंगकांग मलार्यार् और सिंगार्पुर पर भी हवाइ आक्रमण किये और अंग्रेजों के दो विशार्ल जंगी जहार्जों को डुबार् दियार्। जार्पार्न ने फिर फिलीपार्इन द्वीप समूह पर आक्रमण कियार् और उस पर अपनार् अधिकार स्थार्पित कियार्। इसके बार्द हार्ंगकागं पर जार्पार्न क अधिकार हो गयार्। इसे बार्द जार्पार्नियों ने मलार्यार् होकर सिंगार्पुर पर अधिकार कियार्। कुछ ही समय में जार्पार्नियों ने सुमार्त्रार्, जार्घार्, बोर्नियार् तथार् बार्ली, आदि द्वीपों पर अधिकार कियार्। उन्होनें े 8 माच 1942 र्इ. को रंगून पर अधिकार कियार्। उन्होंने न्यूगार्इनार् द्वीप पर भी अपनार् अधिकार कियार्। बर्मार् पर अधिकार करने के उपरार्तं उन्होनें भार्रत पर उत्तर-पूर्व की ओर आक्रमण कियार्, किंतु उनकी सफलतार् प्रार्प्त नहीं हुर्इं बार्द में बर्मार् पर ब्रिटेन और अमेि रकन सेनार्ओं ने अधिकार कियार्। फिलिपार्इन्स पर भी अमेरिक ने अधिकार कियार् और जार्पार्न की परार्जय होनी आंरभ हो गर्इ।

8. यूरोप में युद्ध

1942 र्इ के ग्रीष्म काल के आगमन पर जर्मनी ने रूस पर बड़ार् भीषण आक्रमण कियार्। जर्मनी की सेनार्यें स्आलिनग्रार्ड तक पहुँचने में सफल हुर्इ। उधर अफ्रीक में जर्मनी सेनार्पति रोमल विजयी हो रहार् थार्, किंतु शीघ्र ही मित्र-रार्ष्ट्रों ने रोमल को परार्स्त करनार् आरंभ कियार्। उन्होंने सिसली पर अधिकार कियार्। इसी समय इटली में मुसोलिनी के विरूद्ध आंदोलन आंरभ हुआ। मुसोलिनी बंदी बनार् लियार् गयार्। इटली की नर्इ सरकार ने मित्र-रार्ष्ट्रों की सेनार्ओं क सार्मनार् कियार्। इसी समय जर्मन सेनार्यें इटली पहुँची और मित्र-रार्ष्ट्रों की सेनार्ओं क डटकर सार्मनार् कियार्, किंतु अंत में जर्मनी को इटली छोड़नार् पड़ार् और वह मित्र-रार्ष्ट्रों के अधिकार में आ गयार्।

युद्ध क अंत

ब्रिटिश और अमेरिकन सेनार्ओं ने फ्रार्ंस की उत्तरी-पश्चिमी सीमार् में प्रवेश और जर्मनी पर आक्रमण करने आरंभ किए। फ्रार्ंस मुक्त हो गयार्। फिर उन्होंने बेि ल्जयम से जमर्न सेनार् को भगार्यार् और हॉलैण्ड को मुक्त कियार्। नवम्बर 1944 र्इ. में मित्र रार्ष्ट्रों ने जर्मनी पर स्थल सेनार् द्वार्रार् आक्रमण कियार्। जर्मनी ने इसक बड़े सार्हस तथार् वीरतार् से सार्मनार् कियार्। दूसरी और रूसी सेनार्यें विजय प्रार्प्त करती हुर्इ जर्मनी की सीमार् में प्रवेश करने लगीं। रूस की सेनार् ने चेकोस्लोवार्कियार्, रूमार्नियार्, आस्ट्रियार् आदि को जर्मनी से मुक्ति दिलवाइ और जर्मनी की रार्जधार्नी बर्लिन पर आक्रमण कियार्। मर्इ 1945 र्इ. को बर्लिन पर रूसी सेनार्ओं पर अधिकार हो गयार्।

इस प्रकार मित्र-रार्ष्ट्र यूरोप में विजयी हुए। अब उन्होनें जार्पार्न को परार्स्त करने की ओर विशेष ध्यार्न दियार्। जुलाइ 1945 र्इ. में जार्पार्न पर हवाइ आक्रमण कियार् गयार्। रूस ने जार्पार्न के विरूद्ध युद्ध की घोषणार् की। 5 अगस्त 1945 के दिन हिरोशिमार् और नार्कासार्की पर एटम बम गिरार्यार् गयार् जिससे जार्पार्न को बहुत हार्नि हुर्इ। 15 अगस्त 1945 र्इ. के दिन जार्पार्न ने आत्म-समर्पण कर दियार्। इस प्रकार तार्नार्शार्ही रार्ज्यों क अंत हुआ और लोकतंत्रवार्दी रार्ज्यों को सफलतार् प्रार्प्त हुर्इ।

द्वितीय विश्वयुद्ध के प्रभार्व

जन-धन क अत्यार्धिक विनार्श

द्वितीय विश्वयुद्ध पूर्ववर्ती युद्धों की तुलनार् में सर्वार्धिक विनार्शकारी युद्ध मार्नार् जार्तार् है। इस युद्ध में संपत्ति और मार्नव-जीवन क विशार्ल पैमार्ने पर विनार्श हुआ, उसक सही आँकलन विश्व के गणितज्ञ भी नहीं कर सके। इस युद्ध क क्षेत्र विश्वव्यार्पी थार् तथार् इसे विनार्शकारी परिणार्मों क क्षेत्र भी अत्यंत व्यार्पक थार्।

इस युद्ध में अनुमार्नत: एक करोड़ पचार्स लार्ख सैनिकों तथार् एक करोड़ नार्गरिकों को अपने जीवन से हार्थ धोनार् पड़ार् तथार् लगभग एक करोड़ सैनिक बुरी तरह घार्यल हुए। मार्नव जीवन की क्षति के सार्थ-सार्थ यह युद्ध अपार्र आर्थिक क्षति, बरबार्दी तथार् विनार्श की दृष्टि से भी अविस्मरणीय है। ऐसार् अनुमार्न है कि इस युद्ध में भार्ग लेने वार्ले देशों क लगभग एक लार्ख करार्डे रूपये व्यय हुआ थार्। अकेले इंग्लैण्ड ने लगभग दो हजार्र करोड़ रूपये व्यय कियार् थार्। जबकि जर्मनी, फ्रार्ंस, पोलैण्ड आदि देशों के आर्थिक नुकसार्न क अनुमार्न लगार्नार् कठिन है। इस प्रकार इस युद्ध में विश्व के विभिé देश्ज्ञों की रार्ष्ट्रीय संपत्ति क व्यार्पक पैमार्ने पर विनार्श हुआ थार्।

औपनिवेशिक सार्म्रार्ज्य क अंत

द्वितीय विश्वयुद्ध के परिणार्मस्वरूप एशियार् महार्द्वीप में स्थित यूरोपीय शक्तियों के औपनिवेशिक सार्म्रार्ज्य क अंत हो गयार्। जिस प्रकार प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चार्त् बहुत से रार्ज्यों को स्वतंत्रतार् प्रदार्न कर दी गयी थी, ठीक उसी प्रकार भार्रत, लंका, बर्मार्, मलार्यार्, मिस्र तथार् कुछ अन्य देशों को द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चार्त् ब्रिटिश दार्सतार् से मुक्त कर दियार् गयार्। इसी प्रकार हॉलैण्ड, फ्रार्ंस तथार् पुर्तगार्ल के एशियाइ सार्म्रार्ज्य कमजोर हो गये तथार् इन देशों के अधीनस्थ एशियाइ रार्ज्यों को स्वतंत्र कर दियार् गयार्। इस प्रकार द्वितीय विश्वयुद्ध के परिणार्मस्वरूप एशियार् महार्द्वीप क रार्जनीतिक मार्नचित्र पूरी तरह परिवर्तित हो गयार्, तथार् वहार्ँ पर यूरोपीय सार्म्रार्ज्य पूरी तरह समार्प्त हो गयार्।

शक्ति-संतुलन क हस्तार्ंतरण

विश्व के महार्न रार्ष्ट्रों की तुलनार्त्मक स्थिति को द्वितीय विश्वयुद्ध ने अत्यधिक प्रभार्वित कियार् थार्। इस युद्ध से पूर्व विश्व क नेतृत्व इंग्लैण्ड के हार्थों में थार्, किंतु इसके पश्चार्त् नेतृत्व की बार्गडोर इंग्लैण्ड के हार्थों से निकलकर अमेरिक व रूस के अधिकार में पहुँच गयी। विश्वयुद्ध में जर्मनी, जार्पार्न तथार् इटली के पतन के फलस्वरूप रूस, पूर्वी यूरोप क सर्वार्धिक प्रभार्वशार्ली व शक्तिशार्ली रार्ष्ट्र बन गयार्। एस्टोनियार्, लेटेवियार्, लिथूएनियार् तथार् पोलैण्ड व फिनलैण्ड पर रूस क पुन: अधिकार हो गयार्। पूर्वी यूरोप में केवल टर्की व यूनार्न दो रार्ज्य ऐसे थे जो सार्ेि वयत संघ की सीमार् से बार्हर थे। दूसरी और , पश्चिमी यूरोप के देशों क ध्यार्न अमेरिक की तरफ आकर्षित हुआ। फ्रार्ंस , इटली तथार् स्पेन ने अमेरिक के सार्थ अपने रार्जनीतिक संबंध स्थार्पित कर लिये। इस प्रकार संपूर्ण यूरोप महार्द्वीप दो परस्पर विरोधी विचार्रधार्रार्ओं में विभार्जित हो गयार्। एक विचार्रधार्रार् क नेतृत्व अमेरिक कर रहार् थार्, जबकि दूसरी विचार्रधार्रार् की बार्गडोर रूस के हार्थों में थी। पूर्वी यूरोप के देशों पर रूस क प्रभार्व स्थार्पित हो गयार्, पार्किस्तार्न, मिस्र, अरब, अफ्रीक आदि रूस की नीतियों से प्रभार्वित न हुए। इस प्रकार शक्ति क संतुलन रूस एवं अमेरिक के नियंत्रण में स्थित हो गयार्।

अंतर्रार्ष्ट्रीय की भार्वनार् क विकास

द्वितीय विश्वयुद्ध के विनार्शकारी परिणार्मों ने विभिन्न देशों की आँखें खोल दी थी। वे इस बार्त क अनुभव करने लगे कि परस्पर सहयोग, विश्वार्स तथार् मित्रतार् के बिनार् शार्ंति व व्यवस्थार् की स्थार्पनार् नहीं की जार् सकती। उन्होंने यह भी अनुभव कियार् कि समस्यार्ओं क समार्धार्न युद्ध के मार्ध्यम से नहीं हो सकतार्। इसी प्रकार की भार्वनार्ओं क उदय प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चार्त् भी हुआ थार् तथार् पार्रस्परिक सहयार्गे की भार्वनार् को कार्यरूप में परिणित करने के लिए रार्ष्ट्र-संघ की स्थार्पनार् की गयी थी। किंतु विभिन्न देशों के स्वाथी दृष्टिकोण के कारण यह संस्थार् असफल हो गयी और द्वितीय विश्वयुद्ध प्रार्रभ्ं ार् हो गयार्। किंतु इस युद्ध के समार्प्त होने के बार्द देशों ने पार्रस्परिक सहयोग की आवश्यकतार् एवं महत्व क पुन: अनुभव कियार्, तथार् उन्होनें अपनी समस्यार्ओं को शार्ंतिपूर्ण तरीकों से हल करने क निश्चय कियार् तार्कि युद्ध क खतरार् सदैव के लिए समार्प्त हो सके तथार् विश्व-स्तर पर शार्ंति की स्थार्पनार् की जार् सके। संयुक्त रार्ष्ट्र-संघ, जिसकी स्थार्पनार् 1945 र्इ. में की गयी थी, पूर्णत: इसी भार्वनार् पर आधार्रित थार्। इस संस्थार् क आधार्रभूत लक्ष्य अंतर्रार्ष्ट्रीय शार्ंति एवं सुरक्षार् की भार्वनार् कायम करनार् तथार् अंतर्रार्ष्ट्रीय सहयोग एवं मैत्री-भार्वनार् क विकास करनार् थार्।

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