दूर शिक्षार् में अनुसंधार्न

अनुसंधार्न किसी विषय क्षेत्र को सम्बन्धित समस्यार् क सर्वार्गीण विश्लेषण हैं। वार्स्तव में अनुसंधार्न वह प्रक्रियार् है जिसमें प्रदत्तों के विश्लेषण के आधार्र पर किसी समस्यार् के विश्वसनीय समार्धार्न को ज्ञार्त कियार् जार्तार् है। आप जार्नते है कि यह एक व्यक्तिगत एवं सुनियोजित प्रक्रियार् है जिसके द्वार्रार् मार्नवीय ज्ञार्न में वृद्धि की जार्ती है और मार्नव जीवन को सुगम तथार् भार्वी बनार्यार् जार्तार् है।

वार्स्तव में इसमें नवीन तथ्यों की खोज की जार्ती है तथार् नवीन सत्यों क प्रविपार्दन कियार् जार्तार् है। अनुसंधार्न में कार्यों द्वार्रार् प्रचीन प्रत्ययों तथार् तथ्यों क नवीन अर्थार्पन कियार् जार्तार् है। अंग्रेजी में अनुसंधार्न को ‘‘रिसर्च’’ कहार् जार्तार् है व दो शब्द से मिलकर बनार् है रि+सर्च ‘‘रि’’ क अंग्रेजी में अर्थ है बार्र-बार्र तथार् ‘‘सर्च’’ शब्द क अर्थ है ‘‘खोजनार्’’। अंग्रजी क यह शब्द अनुसंधार्न की प्रक्रियार् को प्रस्तुत करतार् है जिसमें शोधार्थ्र्ार्ी पूर्व किसी तथ्य को बार्र-बार्र देखतार् है जिसके सम्बन्ध में प्रदत्तों को एकत्रित्र करतार् है तथार् उनके आधार्र पर उसके सम्बन्ध में निष्कर्ष निकालतार् है।

अनुसंधार्न की परिभार्षार्यें 

  1. जाज जे मुले के अनुसार्र-‘‘शैक्षिक समस्यार्ओं के समार्धार्न के लिए व्यवस्थित रूप में बौद्धिक ढंग से वैज्ञार्निक विधि के प्रयोग तथार् अर्थार्पन को ‘अनुसंधार्न’ कहते हैं। इसके विपरीत यदि किसी व्यवस्थित अध्ययन के द्वार्रार् शिक्षार् में विकास कियार् जार्य तो उसे शैक्षिक अनुसंधार्न कहते है।’’
  2. मेकग्रेथ तथार् वार्टसन ने ‘अनुसंधार्न’ की एक व्यार्पक परिभार्षार् दी है :- ‘‘अनुसंधार्न एक प्रक्रियार् है, जिसमें खोज प्रविधि क प्रयोग कियार् जार्तार् है, जिसके निष्कषोर्ं की उपयोगितार् हो, ज्ञार्न वृद्धि की जार्य, प्रगति के लिए प्रोत्सार्हित करे, समार्ज के लिए सहार्यक हो तथार् मनुष्य को अधिक प्रभार्वशार्ली बनार् सकें। समार्ज तथार् मनुष्य अपनी समस्यार्ओं को प्रभार्वशार्ली ढंग से हल कर सकें।’’
  3. जॉन0डब्लू0बैस्ट के अनुसार्र :- ‘‘अनुसंधार्न अधिक औपचार्रिक, व्यवस्थित, तथार् गहन प्रक्रियार् है जिसमे वैज्ञार्निक विधि विश्लेषण को प्रयुक्त कियार् जार्तार् है। अनुसंधार्न में व्यवस्थित स्वरूप को सिम्म्लित कियार् जार्तार् है जिसके फलरूप निष्कर्ष निकाले जार्ते है और उनक औपचार्रिक आलेख तैयार्र कियार् जार्तार् है।’’
  4. डब्लू0 एस0 मुनरो के अनुसार्र :- ‘‘अनुसंधार्न की परिभार्षार् समस्यार् के अध्ययन विधि के रूप में की जार् सकती है जिसके समार्धार्न आंशिक तथार् पूर्ण रूप में तथ्यों एवं प्रदत्तों पर आधार्रित होते है। शोध कार्यों में तथ्य-कथनों, विचार्रों, ऐतिहार्सिक तथ्यों, आलेखों पर आधार्रित होते है, प्रदत्त प्रयोगों तथार् परीक्षार्ओं की सहार्यतार् से एकत्रित किये जार्ते है। शैक्षिक अनुसंधार्नों क अन्तिम उद्देश्य यह होतार् है कि सिद्धार्न्तों की शैक्षिक क्षेत्र में क्यार् उपयोगितार् है। प्रदत्तों क संकलन तथार् व्यवस्ार्िार् शोध कार्य नहीं है। अपितु एक प्रार्थमिक आवश्यकतार् है।’’
  5. ‘रेडमेन एवं मोरी के अनुसार्र :- ‘‘नवीन ज्ञार्न की प्रार्प्ति के लिए व्यवस्थित प्रयार्स ही अनुसंधार्न है।’’
  6. पी0एम0कुक0 के अनुसार्र :- ‘‘अनुसंधार्न किसी समस्यार् के प्रति र्इमार्नदार्री, एवं व्यार्पक रूप में समझदार्री के सार्थ की गर्इ खोज है, जिसमें तथ्यों, सिद्धार्न्तों तथार् अर्थों की जार्नकारी की जार्ती है। अनुसंधार्न की उपलब्धि तथार् निष्कर्ष प्रार्मार्णिक तथार् पुष्टियोग्य होते हैं जिससे ज्ञार्न में वृद्धि होती है।’’

अनुसंधार्न की सार्मार्न्य विशेषतार्यें 

  1. अनुसंधार्न की प्रक्रियार् से नवीन ज्ञार्न की वृद्धि एवं विकास कियार् जार्तार् है। 
  2. इसमें सार्मार्न्य नियमों तथार् सिद्धार्न्तों के प्रतिपार्दन पर बल दियार् जार्तार् है। 
  3. अनुसंधार्न की प्रक्रियार् वैज्ञार्निक, व्यवस्थित तथार् सुनियोजित होती है। 
  4. इसमें विश्वसनीय तथार् वैध प्रविधियों को प्रयुक्त कियार् जार्तार् है। 
  5. यह ताकिक तथार् वस्तुनिष्ठ प्रक्रियार् है। 
  6. अनुसंधार्न की प्रक्रियार् में प्रदत्तों के आधार्र पर परिकल्पनार्ओं की पुष्टि की जार्ती है। 
  7. इसमें व्यक्तिगत पक्षों, भार्वनार्ओं तथार् विचार्रों (रूचियों) को महत्व नही दियार् जार्तार् है। इन प्रभार्वों के लिए सार्वधार्नी रखी जार्ती है।
  8. शोध-कार्य में गुणार्त्मक तथार् परिमार्णार्त्मक प्रदत्तों की व्यवस्थार् की जार्ती है और उनक विश्लेषण करके निष्कर्ष निकाले जार्ते हैं। 
  9. शोध-कार्य में धैर्य रखनार् होतार् है तथार् इसमें शीघ्रतार् नही की जार् सकती है। 
  10. प्रत्येक शोध-कार्य की अपनी विधि तथार् प्रविधियार्ं होती है जो शोध के उद्देश्यों की प्रार्प्ति में सहार्यक होती है। 
  11. शोध-कार्य क आलेख सार्वधार्नीपूर्वक तैयार्र कियार् जार्तार् है तथार् शोध प्रबन्ध तैयार्र कियार् जार्तार् है। 
  12. प्रत्येक शोध-कार्य से निष्कर्ष निकाले जार्ते है और सार्मार्न्यीकरण क प्रतिपार्दन कियार् जार्तार् है।

शिक्षार् अनुसंधार्न क अर्थ एवं परिभार्षार् 

शिक्षार् क मुख्य लक्ष्य बार्लकों के व्यवहार्र मे विकास एवं परिवर्तन करनार् है अनुसंधार्न तथार् शिक्षण क्रियार्ओं द्वार्रार् इन लक्ष्यों की प्रार्प्ति की जार्ती है। शिक्षण की समस्यार्ओं तथार् बार्लकों के व्यवहार्र के विकास सम्बन्धी समस्यार्ओं क अध्ययन करने वार्ली प्रक्रियार् को शिक्षार् अनुसंधार्न कहते है। इस प्रकार शिक्षार् अनुसंधार्न के प्रमुख मार्नदण्ड अधोलिखित हैं :-

  1. शिक्षार् के क्षेत्र में नवीन ‘तथ्यों’ की खोज नवीन सिद्धार्न्तों तथार् सत्यों क प्रतिपार्दन करनार् अर्थार्त् नवीन ज्ञार्न की वृद्धि करनार्। 
  2. नवीन ज्ञार्न की शिक्षार् के क्षेत्र में व्यार्वहार्रिक उपयोगितार् होनी, चार्हिए, जिससे शिक्षण अभ्यार्स में सुधार्र तथार् विकास करके प्रभार्वशार्ली बनार् सकें। 
  3. शिक्षार् अनुसंधार्न की समस्यार् क्षेत्र-शिक्षण यार् बार्लक विकास होनार् चार्हिए। 
  4. शिक्षार् अनुसंधार्न की समस्यार् क स्वरूप इस प्रकार हो जिसक प्रत्यक्षीकरण कियार् जार् सकें तभी उसकी उपयोगितार् हो सकती है। 

शिक्षार्-अनुसंधार्न की अनेकों परिभार्षार्यें उपलब्ध हैं परन्तु यहार्ं पर कुछ महत्वपूर्ण तथार् व्यार्पक परिभार्षार्ओं क उल्लेख कियार् गयार् हैं-

  1. एफ0एल0 भिटनी के अनुसार्र- ‘‘शिक्षार्-अनुसंधार्न क उद्देश्य शिक्षार् की समस्यार्ओं क समार्धार्न करके उनमें योगदार्न करनार् है जिसमे वैज्ञार्निक विधि, दाशनिक विधि तथार् चिन्तन क प्रयोग कियार् जार्तार् है। वैज्ञार्निक स्तर पर विशिष्ट अनुभवों क मूल्यार्ंकन और व्यवस्थार् की जार्ती है। इसके अन्तर्गत परिकल्पनार्ओं क प्रतिपार्दन कियार् जार्तार् है। इनकी पुष्टि से सिद्धार्न्तों क प्रतिपार्दन होतार् है, इसमें निगमन चिन्तन कियार् जार्तार् है। दाशनिक शोध विधि में व्यार्पक सार्मार्न्यीकरण किये जार्ते है जिसमें सत्य एवं मूल्यों क प्रतिस्थार्पन कियार् जार्तार् है।’’ भिटनी ने अपनी इस परिभार्षार् में दो प्रकार के शिक्षार् अनुसंधार्नों क उल्लेख कियार् है-वैज्ञार्निक तथार् दाशनिक। वैज्ञार्निक शोधकार्यो से नये सिद्धार्न्तों क प्रतिपार्दन कियार् जार्तार् है और दाशनिक शोध-कार्यों से नवीन सत्यों क प्रतिस्थार्पन कियार् जार्तार् है।’’
  2. मोनरों के अनुसार्र :-‘‘शिक्षार् अनुसंधार्न क अन्तिम लक्ष्य सिद्धार्न्तों क प्रतिपार्दन करनार् और शिक्षार् के क्षेत्र में नवीन प्रक्रियार्ओं क विकास करनार्।’’ मोनरों ने ‘शिक्षार् अनुसंधार्न’ में नवीन सिद्धार्न्तों के प्रतिपार्दन के सार्थ उनकी उपयोगितार् को भी महत्व दियार्। शोध निष्कार्षों की व्यार्वहार्रिक उपयोगितार् ‘शिक्षार् अनुसंधार्न’ क प्रमुख मार्नदण्ड मार्नार् जार्तार् है।
  3. डब्लू0एम0 टैवर्स के अनुसार्र शिक्षार् अनुसंधार्न की परिभार्षार् :- ‘‘शिक्षार् अनुसधार्न वह प्रक्रियार् है जो शैक्षिक परिस्थितियों में व्यवहार्र विज्ञार्न क विकास करती है।’’ शिक्षार् अनुसंधार्नों क अन्तिम लक्ष्य शिक्षण सिद्धार्न्तों तथार् अधिनियमों क प्रतिपार्दन करनार् और शिक्षार् की प्रक्रियार् को प्रभार्वशार्ली बनार्नार् है।

शिक्षार् अनुसंधार्न के उद्देश्य 

शिक्षार् अनुसंधार्न की समस्यार्ओं में विविधतार् अधिक है इसलिए इसके प्रमुख चार्र उद्देश्य होते हैं :

  1. सैद्धार्न्तिक उद्देश्य :- शिक्षार् अनुसंधार्न में वैज्ञार्निक शोध कार्यों द्वार्रार् नये सिद्धार्न्तों तथार् नये नियमों क प्रतिपार्दन कियार् जार्तार् है। इस प्रकार के शोध-कार्य व्यार्ख्यार्त्मक होते है। इनके अन्तर्गत चरों के सह-सम्बन्धों की व्यार्ख्यार् की जार्ती है। इस प्रकार के शोध कार्यों से प्रार्थमिक रूप से नवीन ज्ञार्न की वृद्धि की जार्ती है।, जिनक उपयोग शिक्षार् की प्रक्रियार् को प्रभार्वशार्ली बनार्ने में कियार् जार्तार् है।
  2. तथ्यार्त्मक उद्देश्य :- शिक्षार् के अन्तर्गत एेि तहार्सिक शोध-कार्यों द्वार्रार् नये तथ्यों की खोज की जार्ती हैं इनके आधार्र पर वर्तमार्न को समझने में सहार्यतार् मिलती है। इन उद्देश्यों की प्रकश्ति वर्णनार्त्मक होती है, क्योंकि तथ्यों की खोज करके, उसक अथवार् घटनार्ओं क वर्णन कियार् जार्तार् है। नवीन तथ्यों की खोज शिक्षार्-प्रक्रियार् के विकास तथार् सुधार्र में सहार्यक होती है।
  3. सत्यार्त्मक उद्देश्य :- दाशार्निक ‘शोध’ कार्यों द्वार्रार् नवीन सत्यों क प्रतिस्थार्पन कियार् जार्तार् है। इनकी प्रार्प्ति अन्तिम प्रश्नों के उत्तरों से की जार्ती है। दाशनिक शोध-कार्यों द्वार्रार् शिक्षार् के उद्दश्यों, सिद्धार्न्तों तथार् शिक्षण विधियों तथार् पार्ठ्यक्रम की रचनार् की जार्ती है। शिक्षार् प्रक्रियार् के अनुभवों क चिन्तन बौद्धिक स्तर पर कियार् जार्तार् है जिससे नवीन सत्यों तथार् मूल्यों क प्रतिस्थार्पन कियार् जार्तार् है।
  4. व्यार्वहार्रिक उद्देश्य :- शिक्षार् अनुसंधार्न के निष्कर्षों क व्यार्वहार्रिक प्रयार्गे होनार् चार्हिये, परन्तु कुछ शोध-कार्यों मे केवल उपयोगितार् को ही महत्व दियार् जार्तार् है, ज्ञार्न के क्षेत्र से योगदार्न नही होतार् है। इन्हे विकासार्त्मक अनुसंधार्न भी कहते है। क्रियार्त्मक अनुसंधार्न से शिक्षार् की प्रक्रियार् में सुधार्र तथार् विकास कियार् जार्तार् है अर्थार्त् इनक उद्देश्य व्यार्वहार्रिक होतार् है। स्थार्नीय समस्यार् के समार्धार्न से भी इस उद्देश्य की प्रार्प्ति की जार्ती है।

शिक्षार्-अनुसंधार्न क वर्गीकरण

 शिक्षार्-अनुसंधार्न के उद्देश्यों से यह स्पष्ट है कि शैक्षिक अनुसंधार्नों क वर्गीकरण कर्इ प्रकार से कियार् जार् सकतार् है। प्रमुख वर्गीकरण के मार्नदण्ड अधोलिखित हैं :-

योगदार्न की दृष्टि से :- 

शोध-कार्यों के यार्गे दार्न की दृष्टि से शैक्षिक-अनुसंधार्नों को दो वर्गों में विभार्जित कर सकते हैं-

  1. मौलिक अनुसंधार्न :- इन शोध-कार्यों द्वार्रार् नवीन ज्ञार्न की वश् िद्ध की जार्ती है- नवीन सिद्धार्न्तों क प्रतिपार्दन नवीन तथ्यों की खोज, नवीन सत्यों क प्रतिस्थार्पन होतार् है। मौलिक अनुसंधार्नों से ज्ञार्न क्षेत्र में वृद्धि की जार्ती है। इन्हें उद्देश्यों की दृष्टि से तीन वर्गों में बार्ंटार् जार् सकतार् है-
    1. प्रयोगार्त्मक शोध-कार्यों से नवीन सिद्धार्न्तों तथार् नियमों क प्रतिपार्दन कियार् जार्तार् है। सर्वेक्षण-शोध भी इसी प्रकार क योगदार्न करते है। 
    2. ऐतिहार्सिक शोध कार्यों से नवीन तथ्यों की खोज की जार्ती है, जिनमें अतीत क अध्ययन कियार् जार्तार् है और उनके आधार्र पर वर्तमार्न को समझने क प्रयार्स कियार् जार्तार् है। 
    3. दाशनिक शोध कार्यों से नवीन सत्यों एवं मूल्यों क प्रतिस्थार्पन कियार् जार्तार् है। शिक्षार् क सैद्धार्न्तिक दाशनिक-अनुसंधार्नों से विकसित कियार् जार् सकतार् है।
  2. क्रियार्त्मक अनुसंधार्न :- इस प्रकार के शोध-कार्यों से स्थार्नीय समस्यार्ओं क अध्ययन कियार् जार्तार् है, जिससे शिक्षण की प्रक्रियार् में सुधार्र तथार् विकास कियार् जार्तार् है। इनसे ज्ञार्न-वृद्धि नही की जार्ती है। इन्हें प्रयोगार्त्मक अनुसंधार्न भी कहते है।

शोध-उपार्गम की दृष्टि से :-

 शोध-कार्यों में तथ्यों क अध्ययन करने के लिए दो उपार्गमों क प्रयोग कियार् जार्तार् है- अनुदैध्र्य उपार्गम तथार् कटार्व-उपार्गम।

  1. अनुर्दध्र्य-उपार्गम :- यह शब्द वनस्पति विज्ञार्न से लियार् गयार् है जब किसी पौध क अध्ययन बीज बोने से लेकर फल आने तक कियार् जार्तार् है तब उसे अनुर्दघ्र्य-उपार्गम कहार् जार्तार् है। ऐतिहार्सिक, इकार्इ तथार् उत्पति सम्बन्धी अनुसंधार्न विधियों में इसी उपार्गम क प्रयोग कियार् जार्तार् है।
  2. कटार्व-उपार्गम :- यह शब्द भी वनस्पति विज्ञार्न क है। जब किसी पौधे के तन,े पत्ती यार् जड़ तथार् अन्य किसी अंग के स्वरूप क अध्ययन करनार् होतार् है तब किसी पौधे के उस अंग क कटार्व करके अध्ययन कर लिये जार्ते हैं। तब उसे कठार्व-उपार्गम की संज्ञार् दी जार्ती है। इसमें समय क महत्व नही होतार् है। प्रयोगार्त्मक, तथार् सर्वेक्षण विधियों में इस उपार्गम क प्रयोग कियार् जार्तार् है।

शिक्षार्-अनुसंधार्न के कार्य 

शिक्षार् अनुसंधार्न के अधोलिखित प्रमुख कार्य होते हैं-

  1. शिक्षार् अनुसंधार्न क प्रमुख कार्य शिक्षार् की प्रक्रियार् में सुधार्न तथार् विकास करनार् है। यह कार्य ज्ञार्न के प्रसार्र से कियार् जार्तार् है। 
  2. शिक्षार् की प्रक्रियार् के विकास के लिए आन्तरिक सोपार्न नवीन में वृद्धि करनार् तथार् वर्तमार्न ज्ञार्न में सुधार्र करनार् है। 

शैक्षिक विकास क सम्बन्ध शिक्षार् के विभिन्न पक्षों में होतार् है-

  1. शिक्षार् के विशिष्ट क्षेत्र में ज्ञार्न में वृद्धि करनार्, उसमें सुधार्र करनार् तथार् प्रसार्र करनार् है। 
  2. शिक्षार् की समस्यार्ओं क समार्धार्न करनार्, छार्त्रों के अधिगम में विकास करनार्। शिक्षण की प्रभार्वशार्ली प्रविधियों क विकास करनार्। 
  3. शिक्षार् प्रशार्सन तथार् शिक्षार् प्रणार्ली में अनुसंधार्न प्रक्रियार् द्वार्रार् सुधार्र तथार् विकास करनार्। शैक्षिक अनुसंधार्न प्रक्रियार् द्वार्रार् शिक्षार् के सिद्धार्न्तों तथार् अभ्यार्स में योगदार्न करनार् है। शिक्षार् शार्स्त्रियों को शैक्षिक प्रक्रियार् के विकास हेतु नवीन प्रविधियों के प्रयोग में ‘शिक्षार्-अनुसंधार्न’ सहार्यतार् करती है। 

शिक्षार्-अनुसंधार्न की विशेषतार्यें 

  1. शोध-कार्य क मुख्य आधार्र शिक्षार् दर्शन होतार् है। शिक्षार् वैज्ञार्निक प्रक्रियार् भी दर्शन पर आधार्रित होती है।
  2. शिक्षार्-अनुसंधार्न की प्रक्रियार् कल्पनार्शक्ति तथार् अन्तर्द्दष्टि पर आधार्रित होती है। 
  3. शिक्षार्-अनुसंधार्न में सार्धार्रण अन्त:अनुसंधार्न उपार्गम क प्रयोग कियार् जार्तार् है। 
  4. शिक्षार्-अनुसंधार्न में निगमन ताकिक चिन्तन प्रक्रियार् को प्रयोग कियार् जार्तार् है।
  5. शिक्षार्-अनुसंधार्न के निष्कर्षों से शिक्षार्-प्रक्रियार् को उत्तम तथार् प्रभार्वशार्ली बनार्यार् जार्तार् है। 

    दूरस्थ शिक्षार् में अनुसंधार्न की भूमिका 

    दूरस्थ शिक्षार् के विषय में आप जार्नते हैं कि यह एक नवार्चार्र है। यह परम्परार्गत शिक्षार् व्यवस्थार् से पूर्णतयार् भिन्न है इसलिए मार्नव में इसके प्रचार्र-प्रसार्र में यह तथ्य भी ध्यार्तव्य है कि यह वार्स्तविक रूप में शिक्षार् के उद्देश्यों को कैसे पूरार् करेगी। अनुसंधार्न सर्वदार् ही किसी भी व्यवस्थार् को नित नयी नवीन मागदर्शन देते है और यह व्यवस्थार् में नयार् आयार्म देते है। दूर शिक्षार् में भी अनुसंधार्न की भूमिक हो कि प्रार्प्त निष्कर्षों एवं परिणार्मों से :-

    1. दूरस्थ शिक्षार् के नियोजन को नयार् स्वरूप मिले और प्रभार्वकारी नियोजन सुनिश्चित हो सकें।
    2. दूरस्थ शिक्षार् में अनुसंधार्न इसको पुर्नसगंठित करने के लिए आवश्यक है।
    3. इसके द्वार्रार् दूर शिक्षार् को समय-समय पर पार्ठ्यक्रम के संचार्लन, सम्पार्दन निर्मार्ण में गुणवत्तार् सुनिश्ति कियार् जार् सकतार् है।
    4. दूरस्थ शिक्षार् को स्वशिक्षण सार्मार्ग्री की उपयोगितार् एवं गुणवत्तार् सुनिश्चित करने में आसार्नी होगी। 
    5. यह दूरस्थ शिक्षार् के संगठन व्यवस्थार् को प्रभार्वकारी बनार्ने में सहार्यक होगें।
    6. इसके द्वार्रार् दूरस्थ शिक्षार् में आवश्यक सम्प्रेषण प्रणार्ली सुनिश्चित की जार् सकती है।
    7. पूर्व की इकार्इ में हम दूर अध्येतार्ओं की समस्यार्ओं के विषय में पढ़ चुकें है। अनुसंधार्न हमें इन समस्यार्ओं के सही उपार्य सुझार्ने क प्रयार्स करते हैं। 
    8. अनुसंधार्न के निष्कर्ष दूर संचार्र मार्ध्यमों के उपयोग के स्तर को बतार्ने के सार्थ इनके प्रयोग हेतु उपार्यों को भी प्रदर्शित करते है।

    दूरस्थ शिक्षार् में अनुसंधार्न हेतु आवश्यक क्षेत्र 

    दूरस्थ शिक्षार् में अनुसंधार्न कर्इ स्तरों पर किये जार् सकते हैं जो कि इसके विविध पक्षों से सम्बन्धित है और उन स्तरी को हम विभार्जित कर सकते हैं।

    दूरस्थ शिक्षार् में अनुसंधार्न हेतु आवश्यक क्षेत्र

    दूर शिक्षार् में अनुसंधार्न के विविध मुद्दे 

    दूर शिक्षार् में अनुसंधार्न हेतु अनेक मुद्दे भी है जैसे कि-

    1. प्रशार्सनिक स्तर पर 

    1. दूर शिक्षार् के प्रोन्नति एवं विकास हेतु आवश्यक अभिवश्त्ति।
    2.  दूर शिक्षार् में सम्पूर्ण गुणवत्तार् प्रबन्धन हेतु की समस्यार्।
    3. अध्ययन केन्द्रों में शिक्षण अधिगम वार्तार्वरण निर्मार्ण हेतु आवश्यक चुनौतियार्ं।
    4. दूर शिक्षार् के विकास हेतु प्रशार्सकों के अभिवश्त्ति एवं जार्गरूकतार् सम्बन्धी व समस्यार्यें। 
    5. मार्तश् संस्थार् एवं अध्ययन केन्द्रों में सम्बन्ध स्थार्पन की समस्यार्। 
    6. अध्ययन केन्द्रों में भौतिक संसार्धनों की आपूर्ति की समस्यार्यें।
    7. अध्ययन केन्द्रों को सम्पूर्ण सहयोग की समस्यार्।
    8. अध्ययन केन्द्रों की निरीक्षण एवं पर्यवेक्षण की समस्यार्।
    9. परार्मर्श सत्रों के गुणवत्तार्पूर्ण प्रबन्धन को सुनिश्चित करने की समस्यार्। 
    10. पार्ठ्यक्रम निर्मार्ण एवं विकास की समस्यार्। 
    11. दूर अध्येतार्ओं से सम्प्रेषण की समस्यार्। 

    2. शिक्षक स्तर पर 

    1. दूर अधिगम के प्रति सकारार्त्मक दृष्टिकोण क अभार्व।
    2. दूर अध्येतार्ओं के प्रति कम लगार्व, कम सम्बन्ध व कम अभिप्रेषण की समस्यार्। 
    3. दूर अध्येतार्ओं को शिक्षण हेतु उचित मार्ध्यम क अभार्व।
    4. संचार्र एवं तकनीकी मध्यमों द्वार्रार् शिक्षण के प्रति अभिवश्त्ति।
    5. दूर अध्येतार्ओं के सार्थ उचित सम्प्रेषण क अभार्व।
    6. दूर अध्येतार्ओं के लिए स्व अधिगम सार्मग्री के निर्मार्ण के प्रति लगार्व। 
    7. दूरस्थ मार्ध्यम द्वार्रार् शिक्षण हेतु कौशल सम्बन्धी समस्यार्।
    8. परार्मर्श सत्रों के आयोजन को सम्बन्धित समस्यार्यें। 
    9. दत्त कार्यों को उचित मूल्यार्ंकन हेतु कौशल। 
    10. दूर अध्येतार्ओं को प्रतिपुष्टि से सम्बन्धित समस्यार्। 

    दूर अध्येतार् के स्तर पर 

    1. मुक्त एवं दूरस्थ शिक्षार् के प्रति नकारार्त्मक/सकारार्त्मक दृष्टिकोण।
    2. मुक्त शिक्षार् के प्रति रूचि एवं अभिप्रेषण।
    3. दूर शिक्षार् के छार्त्र सहार्यतार् सेवार्ओं के प्रति दृष्टिकोण। 
    4. परार्मर्शदार्तार्ओं से सहयोग की समस्यार्।
    5. सम्प्रेषण सम्बन्धी समस्यार्। 
    6. सवशिक्षण सार्मग्री के प्रयोग से सम्बन्धित समस्यार्।
    7. दत्त कार्यों को करने, प्रस्तुत करने के प्रति अभिवश्त्ति।
    8. आधुनिक संचार्र मार्ध्यमों को प्रयोग करने हेतु दक्षतार् की समस्यार्। 
    9. मुद्रित स्वशिक्षण सार्मग्री के प्रति उचित दृष्टिकोण।
    10. पूरक शिक्षण सार्मग्री एकत्र करने के प्रति दृष्टिकोण। 
    11. प्रयोगार्त्मक कार्यों से सम्बन्धित समस्यार्। 
    12. मूल्यार्ंकन व्यवस्थार् के प्रति दृष्टिकोण। » अध्ययन केन्द्रों के दी गयी सुविधार्। 
    13. दूर शिक्षार् प्रार्प्त करने मे लगने वार्ले खर्च से सम्बन्धित दृष्टिकोण। 

    दूर शिक्षार् में अनुसंधार्न से लार्भ 

    दूर शिक्षार् में अनुसंधार्न के विभिन्न् मुद्दों के विषय में हम पूर्व में पढ़ चुके है। अब ये देखनार् चार्हिये कि इन विषयों पर अनुसंधार्न से दूर शिक्षार् व्यवस्थार् कैसे लार्भार्विन्त होगी।

    1. प्रबन्धन स्तर 

    1. भार्रतीय आवश्यकतार्ओं एवं परिप्रेक्ष्य में दूरस्य शिक्षार् व्यवस्थार् को पुनसंगठन करनार्। 
    2. दूर शिक्षार् कार्यक्रम की उद्देश्य एवं समस्यार्ओं को दूर करनार् सम्भव होगार्। 
    3. मार्तश्संस्थार् एवं अध्ययन केन्द्रों के मध्य समन्वय स्थार्पित हो पार्येगार्।
    4. निरीक्षण एवं पर्यवेक्षण तंत्र की स्थार्पनार् हो सकेगी। 
    5. अध्ययन केन्द्रों में उपयोगी मार्ननीय एवं भौतिक संसार्धन की व्यवस्थार् सुनिश्चित होगी। 

    2. पार्ठ्यक्रम विकास 

    दूर शिक्षार् में पार्ठ्यक्रम की गुणवत्तार् एवं विकास सुनिश्चित कियार् जार् सकेगार्।

    1. शिक्षण अधिगण प्रक्रियार् क पुर्नसंगठन हो पार्येगार्। » पार्ठ्यक्रम में शार्रीरिक, सार्मार्जिक, संज्ञार्नार्त्मक, सर्वेगार्त्मक तथार् अध्यार्त्मिक पक्षों क समार्वेशन सुनिश्चित होगार्। 
    2. अध्येतार् आवश्यकतार् के अनुसार्र विविध प्रकार के पार्ठ्यक्रमों क निर्मार्ण एवं विकास हेतु आवश्यक सहयोग। 

    3. सम्प्रेषण सार्मग्री 

    अनुसंधार्न से सम्प्रेषण प्रक्रियार् पर यह प्रभार्व पड़ेगार्।

    1. स्वशिक्षण सार्मग्री के पुर्निमार्ण एवं विकास को सुनिश्चित करनार्। 
    2. दत्त कार्यों के स्तर एवं प्रकार को सुनिश्चित कियार् जार्नार्।
    3. अध्येतार् के अनुसार्र आधुनिक संचार्र मार्ध्यमों के प्रभार्वी उपयोग हेतु प्रबन्ध सुनिश्चित करनार्। 
    4. उपबोधकों एवं अध्येतार्ओं के लिए दूर संचार्र मार्ध्यमों के प्रभार्वी प्रयोग हेतु प्रशिक्षण की व्यवस्थार्। 

    4. सम्प्रेषण प्रक्रियार् 

    दूर शिक्षार् में अनुसंधार्न से सम्प्रेषण प्रक्रियार् पर यह प्रभार्व पड़ेगार्-

    1. दूर अध्येतार् एवं उपबोधक/दूर अध्यार्पक के सार्थ सहयोगार्त्मक रवैयार् अपनार्यें जार्ने हेतु रणनीति तैयार्र हो सकेंगे। » प्रभार्वी सम्प्रेषण सत्रों के आयोजन हेतु मागदर्शन मिलेगी। 
    2. उपयोगी पार्ठ्यवस्तु के निर्मार्ण एवं सम्प्रेषण क आधर मिलेगार्। 
    3. उपबोधकों के शिक्षण तकनीकी को सम्बन्धित कियार् जार् सकेगार्। 
    4. विद्यार्थ्र्ार्ी सहयोग सेवार्ओं को तंत्र की प्रभार्वकारितार् सुनिश्चित हो सकेगी।
    5. अध्येतार्ओं को प्रभार्वी प्रतिदृष्टि प्रदार्न की जार् सकेगी। 
    6. स्वशिक्षण सार्मग्री के उचित प्रयोग की विधार् अध्येतार्ओं में विकसित की जार् सके। 

    5. परीक्षण प्रक्रियार् 

    दूर शिक्षार् में अनुसंधार्न –

    1. दूर शिक्षार् में मूल्यार्ंकन प्रक्रियार् को प्रभार्वी बनार् पार्येगें। 
    2. अध्येतार् उपयोग के अनुकुल मूल्यार्ंकत सुनिश्चित कियार् जार् सकेगार्। 
    3. सत्त आंकलन एवं मूल्यार्ंकन क आधार्र तैयार्र होगार्।
    4. मूल्यार्ंकन तंत्र में गुणवत्त सुनिश्चित की सकेगी। 

    दूर शिक्षार् में अनुसंधार्न की अति आवश्यकतार् है मुक्त विश्वविद्यार्लय इसके विभिन्न पक्षों में अनुसंधार्न हेतु अनुदार्न प्रदार्न करते है। परन्तु इस क्षेत्र मे और ध्यार्न दिय जार्ने की आवश्यकतार् है।

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