दलितों क इतिहार्स

किसी भी समार्ज विशेष के विकास मे आई कठिनार्ईयों को जार्नने के लिए उस समार्ज के इतिहार्स पर एक बार्र दृष्टिपार्त करनार् अति आवश्यक है। क्योकि जिस समार्ज यार् समुदार्य क इतिहार्स नही होतार् वह समार्ज अपने भविष्य को अन्धकार मे ही पार्तार् है।इसके लिए भार्रत के संविधार्न निर्मार्तार् एवं दलित मसीहार् बार्बार् सार्हब डार्0 अम्बेडकर ने कहार् थार् कि – ‘‘जिस समार्ज को मिटार्नार् हो उसक इतिहार्स मिटार् दे, वह समार्ज स्वयं ही मिट जार्येगार्’’

इतिहार्स क्यार् होतार् है ? इस सवार्ल के जवार्ब में विद्वार्नों क मत है कि इतिहार्स शार्सकों क रिकार्ड मार्त्र होतार् है। शार्यद इसी कारण गुलार्मों और दबे कुचले लोगों क कोई इतिहार्स नही रहार् है। लेकिन दलितों क इतिहार्स देखे तो काफी गौरवशार्ली रहार् है। वार्स्तव में देखार् जार्ये तो शूद्र कौन थे ? शूद्र भार्रत के मूल निवार्सी मार्ने जार्ते है। जिन्हें इतिहार्स मे अनाय कहार् जार्तार् थार् और आर्य वह लोग थे जो कि पश्चिमोत्तर एशियार् से भार्रत आये थे। यहार्ं पर आकर आर्यो ने अनाय जो उस समय भार्रत के मूल निवार्सी और शार्सक वर्ग थार्। उनके किलो व रार्ज्यों पर सार्म, दार्म, दण्ड व भेद की नीति अपनार्कर दल बल से अधिकार कर लियार् और उनको दार्स यार् गुलार्म बनार् दियार् गयार् और उन गुलार्मों को ही आगे चलकर शून्द्र (दलित) की संज्ञार् प्रदार्न की गई थी। आगे चलकर आर्यो ने शूद्रो में से सछुत शूद्र और ‘अछूत शूद्र’ दो अलग-अलग वर्गो क निर्मार्ण कियार्। अनेकों इतिहार्सकोरों और हिन्दू धर्म ग्रन्थों में भी इस बार्त के तथ्य मिलते है जिन्हें ब्रार्ह्यण ग्रन्थों में शूद्र यार् दलित घोषित कियार् गयार् है। वह वार्स्तव में क्षत्रिय है। जो भार्रत क शार्सक वर्ग रहार् है। अब सवार्ल उठतार् है कि क्षत्रिय दलित कैसे बने तो यह ब्रार्ह्यण और क्षत्रिय युद्धो के कारण हुआ है। इन युद्धों मे जिन क्षत्रियों ने आसार्नी से ब्रार्ह्यणों की अधिनतार् स्वीकार की थी उनको कम दण्ड देने हेतु ग्रह कार्यो आदि में लगार्यार् गयार् थार् और जिन्होने अति कठिन संघर्ष कियार् थार् उन्हे गन्दगी सार्फ सफार्ई के कार्य में लगार् कर अछूतों की संज्ञार् दी गई थी। यदि वेदों में देखते है तो शूद्र शब्द क प्रयोग किसी वेद में नही पार्यार् जार्तार् केवल ऋग्वेद के ‘पुरुष सूक्त’ में इस शब्द क वर्णन है। इसके अतिरिक्त तीनों वेदों में इस शब्द (शूद्र) क प्रयोग कही नहीं कियार् गयार्। जिससे पतार् चलतार् है कि ऋग्वेद में ‘पुरुष सूक्त’ ब्रार्ह्यणों द्वार्रार् बार्द में छल से जोडार् गयार् है। आगे चलकर शूद्र बनार् रहे इसके लिए ब्रार्ह्यमणों के द्वार्रार् सार्मार्जिक व्यवस्थार् व कानून तैयार्र कियार् गयार् जिसको बनार्ने क कार्य एक ब्रार्ह्यमण बुद्धिजीवी नेतार् ‘मनु’ को दियार् गयार् मनु द्वार्रार् समार्ज में वर्ग व्यवस्थार् चार्र वर्णो में लार्गू की गई जिसमें ब्रार्ह्यण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र इसमें शूद्रों को अन्तिम श्रेणी में रखार् गयार् और उनके लिए अलग कानून बनार्ये गये।
जो इस प्रकार थे :-

  1. वर्ग व्यवस्थार् में शूद्रों क स्थार्न सदैव अन्तिम होगार्। 
  2. शूद्र अपवित्र व तीन वर्णो से नीचे है अत: उनके सुनने के लिए कोई कर्मकाण्ड थार् वेद मन्त्र नही होगार्।
  3. वैद्य किसी भी शूद्र की चिकित्सार् नही करेगार्।
  4. शूद्रों क वध करने पर ब्रार्ह्यण को दण्ड नहीं दियार् जार्येगार्। 
  5. किसी भी शूद्र को विद्यार् ग्रहण करने व पढार्ने क अधिकार नही होगार्।
  6. किसी भी शूद्र को सम्पत्ति रखने क अधिकार नही होगार्। यदि वह इसक उल्लंघन करतार् है तो उसकी सम्पत्ति ब्रार्ह्यणों द्वार्रार् छिन्न ली जार्येगी। 
  7. शूद्र कही भी सम्मार्न पार्ने क अधिकारी नहीं होगार्। 
  8. शूद्र जन्म से दार्स होगार् और मरने तक दार्स बनकर ही रहेगार्।

मनु द्वार्रार् लिखे गये इस कानून को मनुस्मृति, मनुवार्द यार् ब्रार्ह्यणवार्द के नार्म से जार्नार् जार्तार् है।

इसके अतिरिक्त दलितो के इतिहार्स के बार्रे में कुछ विद्वार्नों क यह भी मत है कि लगभग 4000-4500 वर्षो पहले सिन्धु सभ्यतार् क उदय हुआ थार् जो सबसे समृद्ध सभ्यतार् मार्नी जार्ती थी। उस सभ्यतार् को अपनार्ने वार्ले लोग कौन थे और बार्द में कहार् चले गये इन सभी पहलूओं के अध्ययन से पतार् चलतार् है कि वर्तमार्न ईरार्न, ईरार्क, रुस और जर्मनी आदि जो उस समय मध्य एशियार् कहार् जार्तार् थार् वहार्ं के लोग घुमक्कड व खार्नार्बदोश थे। (जो आर्य थे) वह खार्ने की तलार्स में उत्तर के रार्स्ते घुमते हुए भार्रत आये और यहार्ं कि सम्पन्नतार् देखकर लार्लच में आकर यही बस गये और यहार् के मूल शार्सकों को छल से अपने जार्ल में फंसार् कर अपनार् गुलार्म बनार्यार् और उन पर अपनार् अधिपत्य जमार्नार् शुरु कर दियार् जिससे दोनों मे युद्ध आरम्भ हुआ। यह संघर्ष लगभग 500 वर्षो तक चलार् जिसे इतिहार्स में ‘आर्य और अनाय युद्ध’ के नार्म से जार्नार् जार्तार् है। युद्ध मे परार्जित अनायो को शूद्र की संज्ञार् दी गई थी जो आज के वर्तमार्न समय मे दलित जार्तियों में विभक्त है। और दलितों के नार्म से जार्ने जार्ते है।

आरम्भ में यहार्ँ सभी शूद्र ही कहलार्ते थे। सर्वप्रथम अधिनियम 1935 में शूद्रों को दलित से सम्बोधित कियार् गयार् थार् आगे चलकर यही शब्द दलित भार्रतीय संविधार्न के अनुच्छेद 341 में भी संविधार्न निर्मार्तार्ओं के द्वार्रार् भी आम रुप से प्रयोग में लार्यार् गयार् थार्। संविधार्न के अनुच्छेद-341 के तहत भार्रत में अनुसूचित जार्ति और अनुसूचित जनजार्तियों के लिए विशेष अनुबन्ध की व्यवस्थार् की गई है और इन सभी दलित जार्तियों के लिए आरक्षण की व्यवस्थार् संविधार्न निर्मार्तार्ओं के द्वार्रार् की गई है। आरम्भ से ही दलितों की आर्थिक, शैक्षिक और समार्जिक स्थिति बहुत ही दयनीय रही है। इनकी इस स्थिति में सुधार्र व दलितों में चेतनार् जगार्ने क कार्य अनेक दलित महार्पुरुषों के द्वार्रार् कियार् गयार् थार्। इस समार्ज की स्थिति में सुधार्र लार्ने क कार्य करने वार्लों में सबसे पहलार् नार्म दलित आजार्दी के पितार्मार्ह मार्ने जार्ने वार्ले ज्योतिबार्रार्व फूले क आतार् है। उनके बार्द दलितों की स्थिति सुधार्रने हेतु छत्रपति शार्हूजी महार्रार्ज द्वार्रार् आरक्षण की व्यवस्थार् करके (सरकारी नौकरियार्ँ में) क्रार्ंन्तिकारी कदम उठार्यार्। आगे चलकर अनेकों महार्पुरुषों ने दलितो की दशार् सुधार्रने हेतु कार्य किये जो दलित आन्दोलन में महत्वपूर्ण स्थार्न रखते है। और उनके बार्द वर्तमार्न समय में दलितों में रार्जनीतिक व सार्मार्जिक चेतनार् को जार्ग्रत करने क कार्य मार्न्यवर कांशीरार्म जी के द्वार्रार् कियार् गयार् है।

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