जैव मण्डल क्यार् है?
जैवमण्डल जैवमण्डल से तार्त्पर्य पृथ्वी के उस भार्ग से है जहार्ं सभी प्रकार क जीवन पार्यार् जार्तार् है। पृथ्वी के तीन परिमण्डल स्थलमंडल, वार्यु मंडल और जैवमंडल -जहॉं आपस में मिलते हैं, वही जैवमंडल स्थित हैं। जैव मंडल की परत पतली लेकिन अत्यार्धिक जटिल हैं। किसी भी प्रकार क जीवन केवल इसी परत में संभव हैं अत: यह हमार्रे लिये अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

जैव मण्डल

जीवन के लिए आवश्यक वस्तुयें भूमि, हवार् और जल इन तीनों मंडलों के मिलन क्षेत्र जो चित्र में अंकित हैं, में ही संभव हैं। हमें इस पट्टी क महत्व समझकर इसे प्रदूशित होने से बचार्नार् चार्हिये तार्कि हमार्रार् जीवन सुरक्षित रह सके। यह पट्टी वार्युमंडल में उध्र्वार्कार रूप से लगभग 10 किमी. की गहराइ तक विस्तृत है यह समुद्र में जहॉं लगभग 10.4 कि.मी. की गहराइ तक और पृथ्वी की सतह से लगभग 8.2 कि.मी. की गहराइ तक विस्तृत हैं जहार्ँ सर्वार्धिक जीवित जीव पार्यें जार्ते हैं।

जीवन के कुछ रूप विषम दशार्ओं में भी पार्यें जार्ते हैं। शैवार्ल (अलगार्इर्) और थर्मोफिलिक इस प्रकार के जीवन के दो उदार्हरण हैं। शेैवार्ल जिसे जीवन के पहले रूप में से एक मार्नार् जार्तार् हैं,बर्फीले अंटाकटिक जैसे प्रतिकूल वार्तार्वरण में भी जीवित रह सकतार् हैं। दूसरे छोर पर थर्मोफिलिक (उष्मार् पसंद करने वार्लार्) जीवार्णु सार्मार्न्यत: गहरे समुद्र में ज्वार्लार्मुखी छिद्रों में रहतार् हैं, जहार्ँ तार्पमार्न 300 डिग्री सेल्सियस से अधिक रहतार् हैं। वार्स्तव में ये जीवार्णु क्वथनार्ंक ( 0.से) से कम तार्पमार्न पर जीवित नहीं रह सकते।

जैवमंडल के घटक

जैवमंडल के तीन मूल हैं: (1) अजैविक घटक (2) जैविक घटक (3) ऊर्जार् घटक

(1) अजैविक घटक :- 

इन घटकों में वे सभी अजैविक घटक सम्मिलित होते हैं जो सभी जीवित जीवार्णओं के लिये आवश्यक होते हैं। ये हैं- (1) स्थलमंडल (भूपपर्टी क ठोस भार्ग), (2) वार्युमंडल और (3) जलमंडल। खनिज, पोशक तत्व, कुछ गैंसे तथार् जल जैविक जीवन के लिये तीन मूलभूत आवश्यकतार्यें हैं। मृदार् तथार् अवसार्द खनिज पोशक तत्वों के मुख्य भंडार्र हैं। वार्युमंडल जैविक जीवन के लिये आवश्यक गैसों क भंडार्र हैं तथार् महार्सार्गर तरल जल क प्रमुख भंडार्र है। जहार्ँ ये तीनों भंडार्र आपस में मिलते हैं, वह क्षेत्र जैविक जीवन के लिये सबसे अधिक उपजार्ऊ क्षेत्र होतार् हैं। मृदार् की उपरी परत और महार्सार्गरों के उथले भार्ग जैविक जीवन को जीवित रखने के लिये सबसे अधिक महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं।

 (2) जैविक घटक :- 

पौधे, जीव जन्तु और सूक्ष्म जीवार्णुओं सहित मार्नव पर्यार्वरण के तीन जैविक घटक हैं-

  1. पौधो – जैविक घटकों में पौधे सबसे महत्वपूर्ण हैं। केवल ये ही प्रार्थमिक उत्पार्द हैं क्योंकि ये प्रकाश संष्लेशण प्रक्रियार् द्वार्रार् अपनार् भोजन स्वंय बनार्ते हैं, इसीलिये इन्हें स्वपोशी कहार् जार्तार् हैं। ये स्वपोशी होने के सार्थ जैविक पदाथों एवं पोषक तत्वों के चक्र ण एवं पुर्नचक्रण में भी मदद करते हैं। अत: पौधे सभी जीवों के लिये भोजन और ऊर्जार् के प्रमुख स्त्रोत हैं। 
  2. पशु- पौधे के बार्द पशु मुख्य उपभोक्तार् हैं इसलिये पशुओं को विषम-तंत्र कहार् जार्तार् हैं। सार्मार्न्यत: पशुओं के निम्नलिखित तीन कार्य मार्ने जार्ते हैं-(1) पौधों द्वार्रार् भोजन के रूप में उपलब्ध करार्ये गये जैविक पदाथों क उपयोग. (2) भोजन को ऊर्जार् में बदलनार् (3) ऊर्जार् की वृद्धि और विकास में प्रयोग करनार्। 
  3. सूक्ष्मजीव- इनकी संख्यार् असीमित हैं तथार् इन्हें अपघटक के रूप में मार्नार् जार्तार् हैं। इसके अंतर्गत विभिन्न प्रकार के सूक्ष्म जीवार्ार्णु, फफूँदी आदि आते हैं। ये जीवार्णु मृत पौधों और पशुओं तथार् अन्य जैविक पदाथों को अपघटित कर देते है। इस प्रक्रियार् द्वार्रार् वे अपनार् भोजन पार््र प्त करते हैं।  अपघटन की इस प्रक्रियार् द्वार्रार् वे अपनार् भोजन प्रार्प्त करते हैं। इस प्रक्रियार् द्वार्रार् वे जटिल जैविक पदाथो को विच्छेदित तथार् अलग-अलग कर देते हैं तार्कि प्रार्थमिक उत्पार्दक अर्थार्त पौधें उनक दुबार्रार् उपयोग कर सकें। 

(3) ऊर्जार् घटक :- 

ऊर्जार् के बिनार् पृथ्वी पर जीवन संभव नहीं हो पार्तार्, ऊर्जार् प्रत्येक प्रकार के जैविक जीवन के उत्पार्दन तथार् पुर्नउत्पार्दन के लिये जरूरी हैं। सभी जीव मशीन की तरह कार्य करने के लिये ऊर्जार् क प्रयोग करते हैं तथार् ऊर्जार् के एक प्रकार को दूसरे में बदलते हैं। सूर्य ऊर्जार् क प्रमुख स्त्रोत हैं।

परिस्थितिक तथार् पार्रितंत्र 

वनस्पति जगत तथार् प्रार्णी जगत के सभी जीव एक दूसरे को प्रभार्वित करने के सार्थ-सार्थ अपने भौतिक पर्यार्वरण से भी प्रभार्वित होते हैं। पर्यार्वरण तथार् जीवों के बीच पार्रस्परिक क्रियार्ओं के अध्ययन को ‘पार्रिस्थितिकी’ कहते हैं। किसी क्षेत्र के भौतिक पर्यार्वरण तथार् उसमें रहने वार्ले जीवों के बीच होने वार्ली पार्रस्परिक क्रियार्ओं की जटिल व्यवस्थार् को ‘पार्रिस्थितिक तंत्र‘ कहते है।

परिस्थितिक तथार् पार्रितंत्र

यह किसी भी आकार क हो सकतार् हैं- जैसे छोटार् सार् तार्लार्ब, अमेजार्न क वर्षार्वन, अथवार् पूरार् संसार्र एक चित्र 5.2 एक वन क परिस्थितिक पार्रिस्थितिक तंत्र हो सकतार् हैं। पार्रितंत्र शब्द क प्रयोग सर्वप्रथम 1935 में ए.जी. टॉसले द्वार्रार् कियार् गयार् थार्। पार्रितंत्र की अवधार्रणार् मुख्यरूप से दो पहलुओं के चार्रों ओर घुमती हैं।

  1. यह विभिन्न घटकों और उपघटकों के बीच अंतर्सबंधों क अध्ययन करती हैं। 
  2. पार्रितंत्र के विभिन्न घटकों के मध्य ऊर्जार् क प्रवार्ह जो इस बार्त के लिये आवश्यक निर्धार्रक हैं कि एक जैविक समुदार्य कैसे कार्य करतार् हैं? 

    पार्रितंत्र के अंग कौन से हैं एवं वे एक-दूसरे को किस प्रकार प्रभार्वित करते हैं? आइये इसे एक छोटे से वन के उदार्हरण के रूप में समझते हैं। वन मे विभिन्न प्रकार के घार्स, पेड.-पौधे, जीवार्णु, फफूँद और पशु-पक्षी पार्ये जार्ते हैं। ये एक-दूसरे से जुड.े होते हैं। कुछ पौधे परजीवी होते हैं तथार् दूसरे पौधो से अपनार् भोजन प्रार्प्त करते हैं। इसी प्रकार कुछ प्रार्णी परभक्षी होते हैं, जो दूसरे प्रार्णियों को खार्कर जीवित रहते हैं। अनेक प्रार्णी पेड. पौधो से अपनार् भोजन प्रार्प्त कर लेते हैं। इन पार्रस्परिक संबंधों की कड.ी बहुत लंबी हैं। पौधे अपने लिये मृदार् और वार्यु से पोशक तथार् जल लेते हैं। पौधे और प्रार्णी मरकर मृदार् में मिल जार्ते हैं। मृदार् में विद्यमार्न असंख्य जीव मृत पौधों और प्रार्णियों के अवशेषों को खनिज पोशकों में बदल देते हैं। पौधे पुन: इन पोशकों को ग्रहण कर लेते हैं। वन के अनेक अंग एक-दूसरे से प्रभार्वित होने के सार्थ-सार्थ अपने भौतिक पर्यार्वरण से प्रभार्वित होते हैं। इस प्रकार ये सभी अंग एक दूसरे को प्रभार्वित करते हैं।

    1. पार्रितंत्र के कार्य-

    पक्ष क अध्ययन  कर सकते हैं- 

    1. ऊर्जार् प्रवार्ह 
    2. खार्द्य श्रृंखलार् 
    3. पोशक अथवार् जैव-भू रसार्यनिक चक्र 
    4. परिवर्धन एवं विकास 
    5. नियंत्रण रचनार्तंत्र अथवार् संत्रार्तिकी 
    6. समय और स्थार्न में विविधतार् प्रतिरूप 

    ऊर्जार् क प्रवार्ह एक स्तर से दूसरे स्तर को होतार् हैं। इसे पोशण स्तर कहते हैं। केवल उत्पार्दक (पौध)े जीव ही सूर्य ऊर्जार् को प्रकाश संश्लेषण की क्रियार् द्वार्रार् अवशोषित कर पार्रितंत्र को उपलब्ध करार्ने की क्षमतार् रखते हैं। ऊर्जार् कार्बनिक अणु जैसे कार्बोहार्इड्रेड (स्टाच) वसार् और प्रोटीन रार्सार्यनिक बंधों के रूप में पार्यी जार्ती हैं। जब यह पौधे जिनमें ऊर्जार् एकत्रित हैं, किसी जीव द्वार्रार् खार्ये जार्ते हैं, तो यह ऊर्जार् उनमें हस्तार्ंतरित हो जार्ती हैं। पार्रितंत्र में ऊर्जार् प्रवार्ह बहुत सार्रे जीवों द्वार्रार् होतार् हैं।

    उत्पार्दक (पौधे) पोशण स्तर (भोजन स्तर) में प्रथम स्थार्न पर हैं। शार्काहार्री जो पौधों पर निर्भर रहते हैं  द्वितीय भोजन स्तर पर आते है। वे मार्सं ार्हार्री जो शार्काहार्री जन्तुओं को खार्ते हैं, तृतीय पोषक स्तर पर आते हैं मार्ंसार्हार्री जो दूसरे मार्ंसार्हार्री को खार्ते हैं, चतुर्थ पोषण स्तर पर आते हैं। सर्वार्हार्री, अपघटक एवं परजीवी अपने भोजन के अनुरूप विभिन्न पोषण स्तर पर आते हैं। मनुष्य सर्वार्हार्री हैं, यदि वह अनार्ज जैसे गेंहूँ, चार्ँवल यार् शार्क-सब्जियों आदि क सेवन करतार् हैं तो यह द्वितीयस्तर पर हैं परन्तु वह मूर्गे यार् बकरे क मार्ंस खार्ते हैं, तो वह तृतीय पोषण स्तर पर मार्नार् जार्येगार्।

    इस प्रकार स्पष्ट हैं कि एक जंतु से दूसर जंतु में ऊर्जार् क स्थार्नार्न्तरण होतार् हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि सभी जीव भोजन अथवार् ऊर्जार् के लिये एक दूसरे पर आश्रित होते हैं। प्रकृति में मुख्यत: दो प्रकार की खार्द्य श्रृंख्लार् होती हैं। एक खार्द्य श्रृंखलार् हरे पौधों से प्रार्प्त होती हैं और शार्काहार्रियों से होती हुर्इ मार्ंसार्हार्रियों तक जार्ती हैं। यह श्रृंखलार् ग्रेजिंग यार् घार्स स्थलीय (चार्रे वार्ली) खार्द्य श्रृंखलार् कहलार्ती हैं। दूसरे प्रकार की खार्द्य – श्रृंखलार् मृत कार्बनिक पदाथो से शुरू होकर अन्य कर्इ तरह के जंतुओं तक जार्ती हैं जिनमें मार्ंसभक्षी, कीट तथार् सुक्ष्म जीव सभी शार्मिल हैं। इस श्रृंखलार् को मृतोपजीवी खार्द्य श्रृंखलार् कहते हैं।

    चार्रे वार्ली तथार् मृतोपजीवी खार्द्य श्रृंखलार्यें आपस में जुड़ी रहती हैं। इसी प्रकार की कर्इ श्रृंख्लार्यें आपस में जुड़कर खार्द्य जार्ल बनार्ती हैं।

     खार्द्य जार्ल

    खार्द्य श्रृंखलार् में शीर्ष पर सर्वार्हार्री हैं जो अपनी ऊर्जार् सभी तीन स्तरों से पार््र प्त करते हैं। जैसार् कि हम पूर्व में बतार् चुके हैं कि पार्ध्ै ार्ों को खार्ने वार्ले पार््र णी शार्काहार्री तथार् मार्ँसभक्षी प्रार्णियों को मार्ंसार्हार्री कहते हैं तथार् सर्वार्हार्री जीव, वे होते हैं, जो पौधों और पशु-पक्षियों दोनो को खार्तें है। मार्नव सर्वार्हार्री की श्रण्े ार्ी में आतार् हैं जो पौधों और पशु-पक्षियों दोनो को खार्ते हैं। इसलिये खार्द्य पिरार्मिड के शीर्ष पर सर्वार्हार्री अर्थार्त मार्नव ही होतार् हैं।

    2. पार्रितंत्र के प्रकार

    विभिन्न आधार्रों पर पार्रितंत्र को विविध प्रकारों में बार्ँटार् गयार् हैं परन्तु इनमें आवार्स के आधार्र पर वर्गीकरण महत्वपूर्ण हैं। इस आधार्र पर पार्रितंत्र को सार्मार्न्यत: दो भार्गों में बार्ंटार् जार् सकतार् हैं- (1) स्थलीय पार्रितंत्र और (2) जलीय पार्रितंत्र।

    (1) स्थलीय पार्रितंत्र 

    जैसार् कि नार्म से स्पष्ट हैं यह सम्पूर्ण पृथ्वी के 29 प्रतिशत भार्ग को घेरे हुए हैं। स्थलीय पार्रितंत्र मार्नव के लिये भोजन और कच्चे मार्ल क प्रमुख स्त्रोत हैं। यहार्ं पर पौधों और पशुओं के समूहों में जलीय पार्रितंत्र से अधिक विविधतार् हैं। स्थलीय जीवों में जलीय पार्रितंत्र की अपेक्षार् सहिष्णुतार् की सीमार् अधिक होती हैं लेकिन कुछ मार्मलों में जल स्थलीय कारकों को सीमित करने क कारक बन जार्तार् हैं। जहार्ँ तक उत्पार्दकतार् क प्रश्न हैं स्थार्नीय पार्रितंत्र जलीय पार्रितंत्र से अधिक उत्पार्दक हैं।

    ऊपर दी गर्इ चर्चार् स्थलीय और जलीय पार्रितंत्रों के बीच तुलनार् हैं। लेकिन स्थलीय पार्रितंत्रों की भोैतिक अवस्थार्ओं और जैविक समूहों पर उसकी प्रतिकिय्र ार् में आरै भी विभिन्नतार् है। इसलिये स्थलीय पार्रितत्रं ों को विभिन्न उपविभार्गों में बार्ंटार् गयार् हैं- (1)उच्चभूमि अथवार् पर्वतीय पार्रितंत्र (2) निम्नभूमि पार्रितंत्र (3) मरूस्थलीय पार्रितंत्र। विशिष्ट प्रयोजन और उद्देश्य के आधार्र पर इन्हें फिर उपविभार्गों में बार्ंटार् जार् सकतार् हैं। जीवन के अधिकतम रूप निम्न भूमियों में पार्यें जार्ते हैं और ये ऊँचाइ बढ़ने के सार्थ-सार्थ घटतें जार्ते हैं, क्योंकि वहार्ँ ऑक्सीजन और वार्युमंडल दार्ब घट जार्तार् हैं।

    (2) जलीय पार्रितंत्र 

    यह पार्रितंत्र पृथ्वी के धरार्तल पर विभिन्न रूपों में उपस्थित 71 प्रतिशत जल क उल्लेख करतार् हैं। स्थलीय पार्रितंत्र की तरह जलीय पार्रितंत्र को भी विभिन्न उपविभार्गों में बार्ंटार् जार् सकतार् हैं परंतु इस पार्रितंत्र के प्रमुख उप विभार्ग हैं- जलीय, ज्वार्रनदमुखीय और समुद्री पार्रितंत्र। इन पार्रितंत्रों को आगे और भी छोटे-छोटे उप विभार्गों में बार्ंटार् जार् सकतार् हैं। अगर हम इन्हें विस्तार्र की दृश्टि से अथवार् मार्पक की दृष्टि से देखे तो ये विस्तृत खुले समुद्र से लेकर छोटे तार्लार्ब तक में फैले हैं। जलीय पार्रितंत्र के विभिन्न प्रकारों के अंदर विभिन्नतार् मुख्य रूप से अजैविक कारकों से संबंधित हैं। लेकिन इन पार्रितंत्रों में रहने वार्ले जैविक समूहों में भी विभिन्नतार् मिलती हैं।

    जैसे कि पहलें भी चर्चार् की जार् चुकी हैं जलीय पार्रितंत्र की सीमार् रेखार् बनार्ने वार्लार् कारक जल की वह गहराइ हैं जहार्ं तक प्रकाश प्रवेश कर सकतार् हैं। पोशकों की इस उपलब्धतार् और विघटित ऑक्सीजन क सकेंद्रण अन्य कारक हैं। अगर हम इन सब कारकों को ध्यार्न में रखें तो यह पतार् चलतार् हैं ेिक ज्वार्रनदमुखीय पार्रितंत्र जलीय पार्रितंत्र में सबसे अधिक उत्पार्दक हैं। हार्लार्ंकि खुले समुद्र क्षेत्रफल के अनुसार्र सबसे अधिक विस्तृत है। ये स्थलीय पार्रितंत्र मे  मरूस्थलों की भार्ंति सबसे कम उत्पार्दक हैं।

    एक अन्य पहलू जो जलीय पार्रितंत्र में जीवन की विविधतार् क निर्धार्रण करतार् हैं, वह हैं जीवों की अनुकूलन शीलतार्। कुछ जीव अनन्य रूप से जल में रहते हैं जैसे – मछली । जबकि कुछ जीवों की प्रकृति जलस्थलीय हैं। कुछ महत्वपूर्ण जलथलीय जीव हैं मेंढ़क, मगरमच्छ, दरियाइ घोड़ार् और जलीय पक्षियों की विभिन्न प्रजार्तियार्ँ। आगे जल में भी कुछ जीव यार् तो केवल मीठे जल में रहते हैं यार् खार्रे जल में और कुछ जीव मीठे और खार्रे जल दोनों में रहते हैं। हिल्सार् मछली अंतिम प्रकार क उदार्हरण हैं। एचीनोडमर्स और कोलेन्ं टे्रट्स कवे ल खार्रे पार्नी में रहते है। जबकि बहुत से प्रकार की मछलियार्ँ जैसे रेहू, कतलार् आदि केवल मीठे जल मे  पाइ जार्ती हैं।

    भूमंडलीय जलवार्ार्यिक परिवर्तन

    हार्ल के वशोर्ं मे तेजी से बढ़ती हुर्इ जनसंख्यार् के उपयोग के लिये पृथ्वी वी के संसार्धनो क तेजी से दोहन, हमार्री अपव्ययी जीवन शैली आदि ने वार्युमंडल में कार्बन स्तर को अत्यार्धिक बढ़ार् दियार् हैं इससे पृथ्वी क तार्पमार्न बढ़ रहार् है।

    कार्बन डार्इ ऑक्सार्इड, कार्बन मोनोऑक्सार्इड, मिथेन ओजोन तथार् क्लोरो-फ्लोरो काबर्न ऐसी गैसे हैं जो ऊष्मार् को अवशोषित करती है। इन गैसों को ग्रीन हार्उस गैसें कहते हैं क्योंकि यह ग्रीन हार्उस की काँच की दीवार्र की तरह काम करती है। इनके द्वार्रार् अवशोषित उष्मार् बार्हर नहीं जार् सकती। क्षोभमंडल में उश्मार् क इस प्रकार रोक जार्नार् ही ग्रीन हार्उस प्रभार्व हैं।

    औद्योगिक विकास के सार्थ कोयलार्, पेट्रोलियम तथार् अन्य रसार्यनों के दोहन में वृद्धि हुर्इ हैं, इससे कार्बन डाइ ऑक्सार्इड क पर्यार्प्त मार्त्रार् में निर्मार्ण हुआ हैं। जंगलों के दोहन ने भी कार्बनडाइ आक्सइड को जन्म दियार् जिससे वार्युमंडल में तार्पमार्न बढ़ने लगार् है, जो जीवन के लिये खतरार् को बढ़ार्वार् देने के समार्न हैं।

    हरित गृह प्रभार्ार्व के परिणार्ार्म :- 

    1. यह अनुमार्न लगार्यार् गयार् हैं कि अगर कार्बन डार्इ ऑक्सार्इड के स्तर के बढ़ने की वर्तमार्न दर यही रही तो वार्युमंडलीय तार्पमार्न 21वी सदी के अंत तक 20 से 30 तक बढ़ जार्येगार्। इसके परिणार्म स्वरूप बहुत सी हिमार्नियार्ं पीछे खिसक जार्येगी, ध्रुवीय क्षत्रे ों में बर्फीली चोटियॉ  गार्यब हो जार्यंगे ी और बहुत बड़े पैमार्ने पर विश्व के अन्य भार्गों में बर्फ के भंडार्र गार्यब हो जार्येंगे। एक अनुमार्न के अनुसार्र यदि पृथ्वी की सार्री बर्फ पिघल जार्ये तो सभी महार्सार्गरों की सतह पर और निचले तटीय क्षेत्रों में लगभग 60 मीटर पार्नी बढ़ जार्येगार्। भूमंडलीय तार्पमार्न द्वार्रार् समुद्री जल स्तर में केवल 50 से 100 सेंटीमीटर की वृद्धि विश्व के निचले क्षेत्रों जैसे बार्ंग्लार्देश, पश्चिम बंगार्ल और सघन बसे हुये तटीय शहरों जैसे शंघाइ और सेन फ्रार्ंसिस्कों को जलमग्न कर देगी। 
    2. कार्बन डाइ ऑक्सार्इड के बढ़े हुये संकेंद्रण और उष्णकटीबंधीय महार्सार्गरों के अधिक गर्म होने के कारण अधिक संख्यार् में चक्रवार्त और हरीकेन आयेंगे। पर्वतों पर बर्फ के जल्दी पिघलने से मार्नसून के समय अधिक बार्ढ़े आयेंगी। संयुक्त रार्ष्ट्र पर्यार्वरण कार्यक्रम के अनुसार्र बढ़तार् हुआ समुद्री जल स्तर लगभग तीन दशकों में तटीय शहरों जैसे मुंबर्इ, बोस्टन, चिट्टगार्ँव और मनीलार् को जलमग्न कर देगार्। 
    3. भूमंडलीय तार्पमार्न में जरार् सी भी वृद्धि खार्द्यार्न्न उत्पार्दन पर प्रतिकूल असर डार्लेगी। अत: उत्तरी गोलाद्ध में गेहूँ उत्पार्दन क्षेत्र शीतोष्ण कटिबंध के उत्तर में खिसक जार्येंगे। 
    4. समुद्र के ऊपरी जलस्तर के गर्म होने से महार्सार्गरों की जैविक उत्पार्दकतार् भी कम हो जार्येगी। उध्र्वार्धर चक्रण द्वार्रार् समुद्र के निचले भार्गों से समुद्र की सतह की ओर पोशकों क परिवहन भी कम हो जार्येगार्। 

    हरित गृह प्रभार्व नियंत्रण एवं उपचार्री उपार्य

    हरित गृह प्रभार्व के लगार्तार्र बढ़ते जार्ने को उपार्यों द्वार्रार् कम कियार् जार् सकतार् है:-

    1. कार्बनडार्इऑक्सार्इड के संकेंद्रण को अत्यंत विकसित और औद्योगिक देशों जैसे संयुक्त रार्ष्ट्र अमेरिक और जार्पार्न तथार् विकासशील देशों जैसे चीन आरै भार्रत द्वार्रार् जीवार्श्म इर्ंधनों के उपयोग में जोरदार्र कटौती करके कम कियार् जार् 
    2. वैकल्पिक सफल र्इंधनों क विकास करने के लिये वैज्ञार्निक उपार्य किये जार्ने चार्हिये। मीथेन, पेट्रोलियम क विकल्प हो सकती हैं। जल विद्युत ऊर्जार् क विकास एक अच्छार् विकल्प हैं। 
    3. कारखार्नों और मोटर गार्ड़ियों से खतरनार्क गैसों के उत्सर्जन पर रोक लगनी चार्हिये। 
    4. महार्नगरों में मोटर गार्ड़ियों को चलार्ने के दिनों को सीमित करनार् भी एक अन्य विकल्प हो सकतार् हैं। सिंगार्परु और मैक्सिकों शहर इस पथ््र ार्ार् को अपनार् रहे हैं। 
    5. उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबध्ं ार्ीय देशों मे  जीवार्ष्म इर्ंधनों के विकल्प के रूप में सौर ऊर्जार् क विकास कियार् जार् सकतार् हैं। 
    6. बार्योगैस संयंत्र लगार्ने चार्हिये जो कि घरेलू उपयोग के लिये एक पार्रंपरिक ऊर्जार् क सार्धन हैं। 
    7. वनरोपण में वृद्धि करके कार्बन डार्इऑक्सार्इड स्तर को निश्चित रूप से कम कियार् जार् सकतार् हैं। जिससे अंतत: हरित गृह प्रभार्व कम हो जार्येगार्। 

    अम्लीय वर्षार् 

    ‘अम्लीय वर्षार्’ शब्द क अर्थ हैं वार्युमंडल से तर यार् सूखे अम्लीय पदाथो क पृथ्वी के धरार्तल पर निक्षेप। हार्ंलार्कि यह सार्फतौर पर वर्षार् से संबंधित हैं, परंतु प्रदूषण-कण पृथ्वी के धरार्तल पर यार् तो हिम, सहिम वृष्टि और ओलों के रूप में गिर सकते हैं अथवार् कोहरार् यार् गैसों के सूखे रूप में पृथ्वी के धरार्तल पर पहुँचते हैं। अम्लीय वर्षार् के लिय े उत्तरदार्यी मुख्य कारक सलफ्यूि रक अम्ल आरै नार्इट्रिक अम्ल को मार्नार् जार्तार् हैं। परंतु इसके लिये मुख्य रूप से मनुष्य दोषी हैं। कारखार्नों द्वार्रार् उत्सर्जित धुंआ सल्फर डार्इ-ऑक्सार्इड क मुख्य स्त्रोत हैं। जबकि ये मोटर गॉंडियों से निकलार् धुॅंआ नार्इट्रोजन आक्सार्इड क मुख्य स्त्रोत हैं ये उत्सर्जित गैंसे वार्युमंडलीय आद्रर्तार् के सार्थ मिलकर सलफ्यूरिक अम्ल और नार्इट्रिक अम्ल बनार्ती हैं जो देर सवेर विभिन्न रूपों में पृथ्वी के धरार्तल पर गिर जार्तार् हैं।

    अम्लतार् को एक चभ् मार्पक पर मार्पार् जार्तार् है जो हार्इड्रोजन आयनों के सार्पेि क्षक संकेंद्रण पर आधार्रित हैं। यह मार्पक 0 स े 14 क्रम में बटं ार् होतार् है। इसक निचलार् भार्ग अत्यधिक अम्लतार् को दर्शार्तार् हैं और ऊपर क भार्ग अत्यधिक क्षार्रीयतार् को दर्शार्तार् हैं।(देखिये चित्र 14.5) जैसार् कि पहले से बतार्यार् गयार् हैं अम्लीय वर्षार्, वर्षण के बहुत से प्रकारों से संबंधित होती हैं। यदि हम स्वच्छ और धूल रहित वार्यु में वर्षार् को देखें तो इसक मार्न 5.6 से 6-0pH के बीच होगार् जो थोड़ार् सार् अम्लीय होगार्। जब कभी भी और जहार्ं कहीं भी चभ् मार्न 5.6 से नीचे होगार् तो इससे होने वार्ले नुकसार्न देखने लार्यक होगार्।

    अम्लीय वर्षण के मार्नवीय स्वार्स्थ्य और कृषि उत्पार्दन पर पड़ने वार्ले दूरगार्मी प्रभार्वों क अभी अच्छी तरह से आकलन नहीं कियार् गयार् हैं परंतु इससे सबसे अधिक सुस्पष्ट नुकसार्न जलीय पार्रितंत्र को हो रहार् हैं। एक नदी यार् झील क पार्रितंत्र इससे सबसे अधिक प्रभार्वित होतार् है। जब इसक चभ् मार्न 5 से नीचे चलार् जार्ए ऐसे तंत्रों में कुल जीवसमूह दो से दस गुणार् कम हो जार्तार् हैं, क्योंकि बहुत कम जीव अम्ल को सहन कर सकते हैं। जैव विविधतार् भी कम हो जार्ती हैं। अम्लीयतार् क सबसे अधिक असर मछलियों पर होतार् हैं। अम्लीय परिस्थितियार्ँ मछलियों की प्रजनन क्षमतार् को कम करती हैं जिसके परिणार्मस्वरूप मछलियों की सख्ं यार् धीरे-धीरे कम हो जार्ती है। यह यूरोप और उत्तरी अमेरीक के बहुत से हिस्सों में प्रमार्णित हो चुक हैं। नावे के 33,000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में हजार्रों झीलों और सरितार्ओं में मछलियार्ं समार्प्त हो गर्इ हैं। पिछली चौथाइ शतार्ब्दी में पूर्वी संयुक्त रार्ज्य अमेरिक और कनार्डार् की सैंकड़ों झीलें जैविक मरूस्थल बन गर्इ हैं। अम्लीय वर्षार् क वनों पर सही सही प्रभार्व अभी तक अच्छी तरह नहीं समझार् जार् सक हैं परंतु कुछ प्रमार्ण यह दर्शार्ते हैं कि ये वनों के मुरझार्ने क प्रमुख कारण हैं। यह प्रत्येक महार्द्वीप मे  हो रहार् हैं  ‘‘वनों क मुरझार्नार्’’ एक जर्मन शब्द हैं जिसक अर्थ हैं वनों क मृत हो जार्नार्। यार् कम हो जार्नार् यहार्ं तक कि भवन और स्मार्रक भी नष्ट हो रहें हैं, क्योंकि अम्ल क इन पर जमार्व अपरदन क्रियार् को बढ़ार् देतार् हैं।

    अम्लीय वर्षार् एक खतरनार्क वैश्विक समस्यार् हैं और इसक असर प्रदूषण पैदार् होने के स्थार्न से बहुत दूर तक फलै सकतार् हैं। इसीलिये स्केंडिनेवियार् के देशों ने यूरोप में ब्रिटिश प्रदूषण के खिलार्फ आपत्ति की हैं और कनार्डार् ने उत्तर अमेरिक में संयुक्त रार्ज्य अमेरिक को दोषी मार्नार् हैं।

    भार्रत विश्व में जैव विविधतार् 

    भार्रत विश्व में 12 सर्वार्धिक जैवविविधतार् वार्ले देशों में से एक है। हमार्रे देश ने पृथ्वी की 2 प्रतिशत भूमि पर, विश्व की पार्ँच प्रतिशत जैवविविधतार् सहेज रखी हैं। अनुमार्नत: हमार्रे देश में 45,000 वन्य वनस्पतियों तथार् 77,000 जन्तु प्रजार्तियार्ँ हैं। भार्रत में सूचीबद्ध की गर्इ कुल वनस्पति तथार् जन्तु प्रजार्तियॉं विश्व की चिहिन्त वन्य प्रजार्तियों क 6.5 प्रतिशत हैं। भार्रत में प्रजार्ति, पार्रितंत्र तथार् जीनिक जैवविविधतार् क विशार्ल भंडार्र हैं। भार्रतीय उपमहार्द्वीप तीन जैव भौगोलिक क्षेत्रों के संगम क्षेत्र में स्थित हैं तथार् इसी कारण भार्रतीय उपमहार्द्वीप में अफ्रीकी, यूरोपीय, चीनी तथार् हिंदमलयार् सभी मूलों के लक्षणों से युक्त वनस्पतियार्ँ तथार् जन्तु पार्यें जार्ते हैं। इस जैवविविधतार् क कारण यहार्ँ पार्यी जार्ने वार्ली जलवार्यु तथार् पर्यार्वरणीय विविधतार् भी हैं। हिमार्लय की ऊंचार्इयों से लेकर समुद्र तट और मैदार्न तथार् अत्यधिक वर्षार् प्रदेश से लेकर शुष्क मरूस्थल सभी भार्रत में विद्यमार्न हैं।

    भार्रत उपमहार्द्वीप को फसल तथार् वार्नस्पतिक विविधतार् के हिन्दुस्तार्न उद्गम केंद्र के रूप में जार्नार् जार्तार् हैं। 166 फसली जार्तियार्ँ तथार् इनसे संबंधित 320 जंगली प्रजार्तियों क उद्गम यहार्ँ मार्नार् जार्तार् हैं। इन सभी प्रजार्तियों में विविधतार् चकित करार् देने वार्ली है। भार्रत विश्व के उन चार्र देशों में से हैं  जो उगाइ जार्ने वार्ली वनस्पतियों क मूल देश हैं। भार्रत में अनार्ज आदि की 51 प्रजार्तियों, फलों की 104 प्रजार्तियार्ँ मसार्लों (भोजन को महकदार्र बनार्ने वार्ले पौधे) की 27 प्रजार्तियों ,सब्जियों तथार् दार्लों की 55 प्रजार्तियार्ँ रेशेदार्र पौधों की 24 प्रजार्तियार्ँ, तेल युक्त बीजों की 12 प्रजार्तियों तथार् चार्य, कॅार्फी और गन्ने की कर्इ अन्य वन्य जार्तियार्ँ पाइ जार्ती हैं। गार्य बैल की 27 जार्तियार्ँ प्रमुख हैं। उदार्हरण के तौर पर भार्रत में पार्यी जार्ने वार्ली भैंसों की 8 जार्तियार्ँ पूरे विश्व की भैंसों की जीनिक विविधतार् क प्रतिनिधित्व करती हैं।

    जैव विविधतार् क महत्व:- 

    जैव विविधतार् हमार्रे जीवन के प्रत्येक पक्ष को प्रभार्वित करती हैं। जैवविविधतार् के महत्व को समझार् जार् सकतार् हैं। पर जैवविविधतार् के महत्व की गणनार् करनार् उतनार् ही कठिन हैं जितनार् कि इसके महत्व क वर्णन करनार्। जैवविविधतार् के महत्व को दो प्रकार से समझार् जार् सकतार् हैं। प्रत्यक्ष महत्व और अप्रत्यक्ष महत्व। जैवविविधतार् क महत्व कृषि, दवाइ और उद्योग मे सीधे तरह से समझार् जार् सकतार् हैं जैविक क्रियार्ओं के द्वार्रार् जैवविविधतार् के अप्रत्यक्ष महत्व को समझार् जार् सकतार् हैं।

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