जैविक खेती क्यार् है?

भार्रतीय कृषि में जैविक खार्द क प्रयोग वैदिक युग से होतार् आ रहार् है। सर अल्बर्ट हार्वर्ड ब्रिटिश कृषि विशेषज्ञ ने जैविक कृषि की शुरुवार्त 1900 ई0 में की थी। हरित क्रार्न्ति के बार्द से ही भार्रत में प्रार्चीन काल से चली आ रही जैविक कृषि की परम्परार् में बार्धार् डार्ली। रार्सार्यनिक कृषि से हमार्रे संसार्धनों की गुणवत्तार् में कमी आई है। जैविक कृषि से हमार्रे संसार्धनों क संरक्षण होतार् है।

कृषि में बार्योतकनीकी व जैविक खेती क प्रयोग एक क्रार्न्तिकारी कदम है। भार्रत के मध्य प्रदेश में सर्वप्रथम 2001-02 में जैविक खेती क आन्दोलन चलार्कर प्रत्येक जिले के प्रत्येक विकास खण्ड के एक गॉव में जैविक खेती (Organic Farming) की शुरुआत की गई। इसी आधार्र पर उस गॉव क नार्म ‘‘जैविक गॉव (Organic Village) रखार् गयार्। इस प्रकार भार्रत में प्रथम वर्ष में कुल 313 ग्रार्मों में जैविक खेती क आरम्भ हुआ। इस इकाई से अध्ययन से जैव प्रौद्योगिकी (Bio technique) व जैविक खेती (Organic Agriculture) को समझने में सहार्यतार् मिलेगी तथार् यह भी जार्न पार्येंगे कि भार्रत के कृषि क्षेत्र में जैव प्रौद्योगिकी व जैविक पदाथों के प्रयोग क क्यार् महत्व है, इसकी विस्तार्र से व्यार्ख्यार् की गई है।

जैव तकनीकि (Biotechnology) क अर्थ

जीवार्णुओं, छोटे जन्तुओं तथार् पार्दपों की सहार्यतार् से वस्तुओं के उत्पार्दन की प्रक्रियसार् जैव तकनीकि अथवार् जैव प्रौद्योगिकी कहलार्ती है। इसके अन्तर्गत मुख्य रुप से डी एन ए तकनीक, कोशिक एवं ऊतक तंत्र, रोग प्रतिक्षण टीक उत्पार्दन, जैव उर्वरक, जैविक गैस व कुछ अन्य क्षेत्र व विधार्एं सम्मिलित हैं। कृषि सम्बन्धी तीन महत्वपूर्ण क्षेत्रों में जैव प्रौद्योगिकी के समुचित उपयोग हेतु मिशन मोड कार्यक्रम चलार्ये गए हैं। मिशन मोड कार्यक्रम के अन्तर्गत संस्थार्ओं और एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय स्थार्पित कियार् जार्तार् है तथार् समयबद्ध आधार्र पर बड़े पैमार्ने पर विज्ञार्न एवं तकनीकि के उपयोग क प्रयार्स कियार् जार्तार् है। कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्र जिनके विकास पर महत्वपूर्ण अनुसंधार्न किये गए और उपलब्धियॉ अर्जित की गई। जैव प्रौद्योगिकी पौध उत्पार्दों के लिए एक अस्त्र क काम करती हैं जिसमें एक ही जीन (हमदम) क चुनार्व करके इच्छित गुणों को प्रार्प्त कर एक पौधे से दूसरें पौधे में स्थार्नार्न्तरित कर दियार् जार्तार् है।

जैविक खेती के लक्ष्य

जैविक खेती के दो लक्ष्य हैं।

  1. प्रणार्ली को टिकाऊ बनार्नार्
  2. जैविक खेती को पर्यार्वरण के प्रति संवेदनशील बनार्नार् 

इन दोनों लक्ष्यों तक पहॅुचने के लिए ऐसे मार्नक तैयार्र करने की जरुरत है जिनक अनुसरण हो। जैसे कि आप जार्नते हैं कि भार्रतीय कृषि में शुद्ध जैविक खेती को अपनार्कर रार्सार्यनिक उवर्रकों के प्रयोग की सम्भार्वनार् विद्यमार्न है। जैविक खेती को अपनार्ने के लिए समन्वित (Integrated Nutient Management) पोषण प्रबन्धन और जैविक नियंत्रण विधियों को सशक्त करने की आवश्यक्तार् है तार्कि रसार्यनों की जरुरतों में कमी हो सके।

जैविक खेती के सिद्धार्न्त

जैविक खेती की सफलतार् तीन आधार्र भूत सिद्धार्न्तों पर आधार्रित है:-

  1. अन्तनिर्भरतार् (Interdependency) – इनमें से सबसे महत्वपूर्ण है अन्तनिर्भरतार्, जैविक (ऑर्गेनिक) खेती में एक खेत को पार्रिस्थिकीयतंत्र (Ecosystem) के रुप में देखार् जार्तार् है और यह मार्नार् जार्तार् है कि एक खेत पर कियार् गयार् परिवर्तन दूसरे खेत में प्रभार्व अवश्य डार्लेगार्। उदार्हरण के लिए मृदार् में अधिक नार्इट्रोजन के होने से खरपतवार्र (Weeds) की वृद्धि तेजी से होगी। इस समस्यार् को दूर करने के लिए किसार्न ऐसी फसल को उगार्ने क प्रयार्स करेगार् जो मृदार् से नार्इट्रोजन की अधिक मार्त्रार् को अवशोषित कर लेगार् और इस प्रकार मृदार् में पोषक तत्वों के बीच सन्तुलन बनार् लेगार्।
  2. विविधतार् (Divorsity) – ऑर्गेनिक खेती क दूसरार् सिद्धार्न्त विविधतार् क है। जैविक खेती मृदार् में पोषक तत्वों में सन्तुलन बनार्ये रखने के लिए कियार् जार्तार् है। किसार्नों क फसलों व पशुधन के मध्य सन्तुलन बनार्ये रखने के लिए किसार्नों को खेतों के सार्थ-सार्थ पशुधन भी पार्लने चार्हिए। फसलों व पशुधन में विविधतार् किसार्नों की आय में भी विविधतार् व लचीलार्पन लार्ती है। दूसरी ओर पार्रिस्थितिकी तन्त्र में किसी कीट यार् खरपतवार्र यार् बीमार्री को समस्यार् बनने से रोकतार् है।
  3. पुन: चक्र (Recycling) – जैविक खेती क तीसरार् सिद्धार्न्त पुन: चक्र (Recycling) है, अर्थार्त् दोबार्रार् से प्रयोग करनार्। इसमें पौधों व पशुओं के अवशेष पुन: प्रयोग में आ जार्ने के कारण खेतों के पोषक तत्वों को बनार्ये रखने में सहार्यक होते हैं।

विभिन्न जैविक तकनीकें

जैविक खार्दों क प्रयोग

जैव उर्वरक से तार्त्पर्य ऐसे सूक्ष्म सजीव जीव व जीवार्णु से है जो पौधों के उपयोग के लिए पोषक तत्व उपलब्ध करार्ते हैेंं। आर्गेनिक खेती के अन्तर्गत आर्गेनिक खार्दों क प्रयोग कियार् जार्तार्। ये खार्दें पौधों के लिए पोषक तत्वों क स्त्रोत हैं। मृदार् के भौतिक एवं रार्सार्यनिक गुणों पर भी इनक प्रभार्व पड़तार् है। रार्इजोबियम और नील हरित शैवार्ल, इसके अतिरिक्त नार्डेम खार्द, बार्योगैस स्लरी (Slurry), वर्मी कम्पोस्ट, पिट कम्पोस्ट, मुर्गी की खार्द। आर्गेनिक खार्दों में मुख्य रुप से प्रक्षेत्र खार्द (गोबर की खार्द), कम्पोस्ट, शहरी, कम्पोस्ट, अवमल (स्लज), हरी खार्द, खार्दों की खलियार्ं, मछली की खार्द, रुधिर चूर्ण सींग व खुरों क चूर्ण, भूसार् यार् लकड़ी क बुरार्दार्, शीरार् आदि सम्मिलित हैं। जैब उर्वरक सूक्ष्म जीवार्णुओं युक्त टीक है जिसके उपयोग से फसल उत्पार्दन में वृद्धि होती है। जैविक खेती में मुख्य जैविक खार्दे हैं –

  1. रार्इजोवियम – इसक प्रयोग मुख्य रुप से अरहर, मूंग/उड़द, लोबियार् मसूर, मटर, मूंगफली, सोयार्बीन, बरसीम में होतार् है। जैव उर्वरकों में रार्ईजोबियम नार्इट्रोजन यौगिकीकरण (Nitrogen Fixation) करने वार्लार् एक महत्वपूर्ण जीव है। यह दलहनी पौधों की जड़ ग्रन्थियों में रहकर सहजीवी जीवन यार्पन करतार् है और पौधों को नार्इट्रोजन प्रदार्न करतार् है। रार्इजोबियम की अनेक प्रभार्वकारी और उन्नतशील जार्तियॉ विकसित की गयी हैं। रार्इजोबियम जीवार्णु खार्द से भूमि के भौतिक और रार्सार्यनिक गुणों में सुधार्र होतार् है जिससे मृदार् उर्वरतार् बढ़ती है और आगार्मी फसल की पैदार्वार्र भी अच्छी होती है।
  2. नील हरित काई (Blue Green Algae) – इसक प्रयोग मुख्य रुप से धार्न की फसल में होतार् है। इनकी वृद्धि धार्न के खेत में जहॅार् पार्नी भरार् रहतार् है, अच्छी प्रकार होती है। परीक्षणों से पतार् चलार् है कि धार्न में नीलहरित शैवार्ल क टीक लगार्ने (Inoculation) से धार्न की विभिन्न जार्तियों की उपज में वृद्धि होती है। नार्इट्रोजन यौगिकीकरण के अतिरिक्त यह विटार्मिन वृद्धि को प्रोत्सार्हित करने वार्ले पदार्थोर्ं क स्त्रार्व करते हैं जो धार्न के पौधों की अच्छी वृद्धि के लिए लार्भप्रद हैं। ये मुख्यत: उन क्षेत्रों में अधिक संख्यार् में पार्ए जार्ते है जहॉ पार्नी क जमार्व अधिक होतार् है। नील हरित शैवार्ल के प्रयोग से धार्न की पैदार्वार्र में 450 किलोग्रार्म प्रति हैक्टेयर वृद्धि होती है। यह वृद्धि 14 प्रतिशत के बरार्बर है।
  3. एजैटोबैक्टर – इसक प्रयोग मुख्य रुप से गेहूं, सरसों, कपार्स, तरकारियों उगार्ने में कियार् जार्तार् है। यह कृषि में अपने योगदार्न के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण और सर्वार्धिक उपयोगी जीवार्णु है। यह स्वतन्त्र रुप से जीवन यार्पन करते हुए वार्युमण्डलीय नार्ईट्रोजन क यौगीकरण करतार् है। इसके प्रयोग से मृदार् के भौतिक गुणों में सुधार्र होतार् है। ये जीवार्णु भूमि और जड़ की सलह पर स्वतन्त्र रुप से रहकर आक्सीजन की उपस्थिति में वार्युमण्डल नार्इट्रोजन को स्थिरीकरण करते हैं। ये जीवार्णु पौधों की जड़ों के द्वार्रार् निकाले गए पदाथों (शर्करार्, अमीनों अम्ल, कार्बनिक अम्ल और विटार्मिन) को ऊर्जार् के स्त्रोत के रुप में उपयोग करते हैं। एजोटोबैक्टर जीवार्णु किसी भी गैर दलहनी फसलों में उपयोग कियार् जार् सकतार् है। एजेटोबैक्टर के सक्रिय जीवार्णु कल्चर के उपयोग से शार्क-भार्जी वार्ली फसलों में 15-20 प्रतिशत और धार्न्य फसलों जैसे गेहॅू, बार्जरार् इत्यार्दि में 10-15 प्रतिशत तक वृद्धि पार्यी जार्ती है। इसके प्रयोग से फसलों में अंकुरण अधिक होतार् है जैसे कपार्स में 35-50 प्रतिशत धार्न में 72-82 प्रतिशत व गेहॅू में 50 प्रतिशत अधिक होतार् है। इसके प्रयोग से आलू में स्टाच की मार्त्रार् 7-8 प्रतिशत, चुकन्दर में शर्करार्, सूरजमुखी में तेल और मक्क में प्रोटीन की मार्त्रार् बढ़ती है।
  4. एजोस्पिरिलम – इसक प्रयोग बार्जरार्, ज्वार्र, धार्न में कियार् जार्तार् है। फसलों में इस जीवार्णु क उपयोग अभी हार्ल में ही प्रार्रम्भ हुआ है। इसक प्रयोग जौ, जई, ज्वार्र, मोटे अनार्ज वार्ली फसलों में नार्इट्रोजन उर्वरक क प्रयोग कम मार्त्रार् में होने पर इस जीवार्णु क विशेष महत्व है।
  5. ऐसीटोबैक्टर – एसीटोबैक्टर नार्मक सूक्ष्म जीवार्णु की खोज तथार् अनुभव ब्रार्जील तथार् क्यूबार् के गन्ने के क्षेत्र से प्रार्प्त हुए हैं। यह जीवार्णु सिरके में भी देखे जार् सकते हैं। इनकी मौजूदगी एक विशेष गंध से अनुभव की जार् सकती है। गन्ने की फसल में इसके प्रयोग से 20 प्रतिशत अधिक उत्पार्दन मिलतार् है। इसके प्रयोग से 1-2 प्रतिशत शर्करार् भी अधिक हो जार्ती है।

इसके अतिरिक्त जैव उर्वरक के अन्तर्गत मुख्य तीन प्रकार की खार्दों क उल्लेख विस्तार्र से कियार् जार् रहार् है। यह हैं – गोबर की खार्द, कम्पोस्ट और हरी खार्दें :-

  1. गोबर की खार्द – गोबर की खार्द फाम पशुओं, गार्य, घोड़ार् कभी-कभी सुअरों के ठोस एवं द्रव मल-मूत्र क एक सड़ार् हुआ मिश्रण है। जिसमें सार्धार्रणतयार् भूसार्, बुरार्दार्, छीलन अथवार् अन्य कोई शोषक पदाथ जो पशुओं के बॉधने के स्थार्न पर प्रयोग कियार् गयार् हो, आते हैं। गोबर की खार्द पोषक तत्वों को पौधों के लिए धीरे-धीरे प्रदार्न करतार् है और इस खार्द क प्रभार्व कई वर्षों तक बनार् रहतार् है। गोबर की खार्द में नार्ईट्रोजन, पोटार्श व फॉस्फोरस के सार्थ-सार्थ अन्य आवश्यक तत्व भी पार्ए जार्ते हैं। यह खार्द मृदार् में कैल्शियम की मार्त्रार् बढ़ार्ती है और इस प्रकार भौतिक गुणों को सुधार्रने में सहार्यक होती है।
  2. कम्पोस्ट – पौधों के अवशेष पदाथों, पशुओं क बचार् हुआ चार्रार्, कू़ड़ार् करकट आदि पदाथों के बैक्टीरियार् तथार् फफूंद (Fungi) द्वार्रार् विशेष विच्छेदन से बनार् हुआ पदाथ कम्पोस्ट कहलार्तार् है। सड़ी हुई यह खार्द प्रार्य: गहरे भूरे रंग की होती है कम्पोस्ट को प्रयोग करने से भूमि की भौतिक, रार्सार्यनिक और जैविक गुणों पर अच्छार् प्रभार्व पड़तार् है। मृदार् संरचनार् सुधरती है, मृदार् की जल धार्रण क्षमतार् बढ़ती है यह मृदार् की ऊष्मार् शोषण क्षमतार् भी बढ़ार्ती है। पौधों के पोषक तत्वों की पूर्ति करती है। कम्पोस्ट में असंख्य फंजार्ई तथार् बैक्टिरियार् होते हैं, अत: खेतों में इसके प्रयोग से इनकी संख्यार् बढ़ जार्ती है। सूक्ष्म जीवों (Micro Organism) की सक्रियतार् में वृद्धि होती है, फलत: नार्इट्रीकरण, अमोनीकरण तथार् नार्इट्रोजन स्थरीकरण में वृद्धि होती है। कम्पोस्ट में मुख्य रुप से वर्मीकम्पोस्ट प्रमुख हैं। वर्गीकम्पोस्ट (Vermi Compost) को वर्मीकल्चर (Vermi Culture) भी कहार् जार्तार् है। यह मुख्यत: केचुओं द्वार्रार् तैयार्र होती है। केचुए कार्बनिक निरर्थक पदाथ को अपने शरीर के भार्र के दो से पॉच गुनार् तक ग्रहण करते हैं तथार् उसमें से केवल 5-10 प्रतिशत अपनी शरीर की आवश्यक्तार् के लिए प्रयोग करके शेष पदाथ को अपचार्हित पदाथ के रुप में बार्हर (Excrete) कर देते हैं जिसे वर्म कास्ट कहते हैं। अत: गोबर, सूखे हरे पत्ते, घार्स-फूस, धार्न क पुआल, डेयरी पदाथ, कुक्कुट निरर्थक पदाथ खार्कर केचुओं द्वार्रार् प्रार्प्त मल से तैयार्र खार्द ही वर्मीकम्पोस्ट कहलार्ती है यह भूमि की उर्वरतार्, भौतिक दशार् जैविक पदाथों, लार्भदार्यक जीवार्णुओं में वृद्धि एवं सुधार्र करती है। भूमि की जल सोखने की क्षमतार् में वृद्धि करतार् है तथार् मृदार् संरचनार् में सुधार्र करतार् है। इससे खरपतवार्र की कमी होती है। जहॉ केंचुएं पार्ले जार्ते हैं वहॉ मटर व जई में 70 प्रतिशत, घार्सों में 28-112 प्रतिशत, सेब में 25 प्रतिशत, बीन्स में 291 प्रतिशत गेहॅू में 300 प्रतिशत की उत्पार्दन वृद्धि मिली केंचुओं के कारण वार्तार्वरण स्वस्थ रहतार् है और खेती लार्भकारी बनी रहती है।
  3. हरी खार्द (Green Manusing) – मृदार् उर्वरतार् को बढ़ार्ने के लिए समुचित हरे पौधों को उसी खेत में उगार्कर यार् कहीं से लार्कर खेत में मिलार् देने की प्रक्रियार् को हरी खार्द कहते हैं। हरी खार्द के प्रयोग से मृदार् में कार्बनिक पदाथ तथार् नार्इट्रोजन की मार्त्रार् में वृद्धि होती है। यह मृदार् जल के वार्ष्पीकरण को रोकती है। इसके प्रयोग से पौधों में वार्यु क आवार्गमन अच्छार् होने लगतार् है। हरी खार्द रार्सार्यनिक उर्वरकों के प्रयोग से उत्पन्न दोष कम कर देती है। हरी खार्द के लिए प्रयोग होने वार्ली मुख्य फसलें हैं उर्द, मूंग, ग्वार्र, लोबियार्, नील और रबी फसलें, बरसीम, मसूर, मटर आदि हैं।

जैव कीटनार्शक और जैव रोग नियंत्रकों क प्रयोग

भार्रत की भौगोलिक स्थिति एवं जलवार्यु के कारण यहॉ फसल कीटों तथार् बीमार्रियों क खतरार् हमेशार् बनार् रहतार् है। जैव कीटनार्शकों तथार् जैव रोग नियंत्रकों में प्रार्कृतिक कीटों तथार् जैव प्रौद्योगिकी में विकसित सूक्ष्म जीवों क उपयोग करते हैं जो कीटों को नष्ट कर सकते हैं। जैव कीटनार्शकों से पर्यार्वरण को भी कोई हार्नि नहीं होती है, क्योंकि इनके अवशेष बार्योडिगे्रडेबल होते हैं। जैविक रोग नियंत्रण क उपयोग मुख्यत: कपार्स, तिलहन, गन्नार्, दलहन तथार् फलों एवं सब्जियों के पौधों में होने वार्ले रोगों एवं उन पर कीटों के आक्रमण से बचार्व के लिए कियार् जार् रहार् है जिसके पार्स कीटों यार् रोगों से लड़ने की पूर्ण प्रार्कृतिक क्षमतार् हो आर्थिक रुप से महत्वपूर्ण फसलों के लिए जैव नियंत्रकों – बैक्यूलोवार्इरस, पैरार्सार्इट, प्रीडेटर्स, एंटार्गोनिस्टिकस, फफूंदी तथार् बैक्टिरियार् के बड़े स्तर पर उत्पार्दन के लिए प्रौद्योगिकी को उद्योगों को स्थार्नार्ंतरित कियार् गयार् है। जैविक पद्धति में गौमूत्र, नीम पत्ती क घोल, निबोरी व खली क प्रयोग कियार् जार्तार् है।

जैविक खेती की आवश्यकतार्

भार्रत में कृषि उत्पार्दन, विशेषकर खार्द्य पदाथों क उत्पार्दन पिछले कई दशकों में तेजी से बढ़ार् है। यह उपलब्धि खेतों में उन्नत किस्म के बीज, रार्सार्यनिक उर्वरकों के प्रयोग व कृषि में मशीनीकरण के प्रयोग से हुई है। एक लम्बे समय तक रार्सार्यनिक खार्दों के प्रयोग से मृदार् की उत्पार्दकतार् कम हो जार्ती है और दूसरी ओर पर्यार्वरण प्रदूषण में वृद्धि होती है। इन समस्यार्ओं ने खेती में वैकल्पिक तरीकों को तलार्शने क प्रयार्स कियार् है। इस दिशार् में आजकल आधुनिक खेती से जैविक खेती पर ध्यार्न केन्द्रित कियार् जार् रहार् है। जैविक खेती मृदार्, खनिज, जल, पौधों, कीटों, पशुओं व मार्नव जार्ति के समन्वित संबंधों पर आधार्रित है। यह मृदार् को संरक्षण प्रदार्न करतार् है वहीं पर्यार्वरण को भी सरंक्षण प्रदार्न करतार् है। जैविक प्रबन्धन आसपार्स पार्ये जार्ने वार्ले मार्नव संसार्धन, ज्ञार्न व प्रार्कृतिक संसार्धनों के प्रयोग पर बल देतार् है। जैविक कृषि खार्द्य सुरक्षार् में वृद्धि करने व अतिरिक्त आय सृजित करने में भी सहार्यक है। जैविक खेती सतत कृषि विकास व ग्रार्मीण विकास के उद्देश्य को पूरार् करने में धनार्त्मक भूमिक निभार्तार् है तथार् मृदार् की उर्वरतार् को बढ़ार्ने के सार्थ-सार्थ किसार्नों की सार्मार्जिक आर्थिक स्थितियों में भी बदलार्व लार्तार् है। जैविक खार्द्य पदाथों की 20-25 प्रतिशत दर से मार्ंग विकसित व विकासशील देशों में लगार्तार्र बढ़ती जार् रही है। सम्पूर्ण विश्व में 130 देश प्रमार्णित जैविक पदाथों क उत्पार्दन व्यार्पार्रिक स्तर पर करते हैं। केवल परम्परार्गत फसलों को उगार्कर ही किसार्न समृद्ध नहीं हो सकते, बदलती मार्ंग व कीमतों के अनुरुप फसल प्रतिरुप में परिवर्तन भी आवश्यक है। प्रार्कृतिक विधि व जैविक खार्द के उपयोग से उगार्ए गए खार्द्य पदाथों की मार्ंग यूरोप, अमेरिका, जार्पार्न में तेजी से बढ़ रही है। इस बढ़ती मार्ंग के अनुरुप उत्पार्दन करके किसार्नों को लार्भ उठार्ने के लिए प्रेरित कियार् जार्नार् आवश्यक है।

जैविक खेती के प्रभार्व

कृषक के दृष्टिकोण से

  1. मृदार् की उर्वरार् शक्ति बढ़ जार्ती है। फसलों की उत्पार्दकतार् बढ़ जार्ती है और कृषक अधिक आय अर्जित हो पार्ती है।
  2. रार्सार्यनिक उर्वरक में निर्भरतार् कम होने से लार्गत कम हो जार्ती है।
  3. यह कृषकों के खेती करने के पुरार्तन व देशी ज्ञार्न को संरक्षित रखतार् है।
  4. अन्तरार्ष्ट्रीय बार्जार्र में आर्गेनिक पदाथों की मार्ंग बढ़ने से किसार्नों की आय में वृद्धि होती है।

मृदार् के दृष्टिकोण से

  1. यह मृदार् में पोषक तत्वों को पौधों के लिए धीरे-धीरे प्रदार्न करतार् है और इस प्रकार इस खार्द क प्रभार्व कई सार्ल तक बनार् रहतार् है।
  2. यह मृदार् में नार्इट्रोजन, पोटार्श फॉसफोरस व कैल्शियम जैसे आवश्यक तत्व बढ़ार्तार् है और इस प्रकार भौतिक गुणों को सुधार्रने में सहार्यक होतार् है।
  3. जैविक खार्द के प्रयोग से काफी समय तक मृदार् में नमी बनी रहती है।
  4. आर्गेनिक खार्दों में कुछ नार्इट्रोजनयुक्त लार्भप्रद पदाथ पार्ये जार्ते हैं जो कि पौधों की वृद्धि शीघ्र करने में सहार्यक होतार् है।
  5. यह मृदार् संरक्षण व जल संरक्षण में सहार्यक है।

पर्यार्वरण के दृष्टिकोण से

  1. कचरे क प्रयोग खार्द बनार्ने में कियार् जार्तार् है जिससे वार्तार्वरण स्वच्छ रहतार् है और बीमार्रियॉ कम करने में सहार्यतार् मिलती है।
  2. यह स्वार्स्थ्यवर्धक, पौष्टिक व गुणवत्तार् खार्द्य पदाथों के उत्पार्दन में सहार्यक है। यह पर्यार्वरण मित्र होते हैं।
  3. यह जैविक चक्र केार् प्रोत्सार्हित करतार् है जिसमें सूक्ष्म कीटार्णुओं, मृदार् पौधों व पशुओं व मार्नव के बीच अन्तनिर्भरतार् को बढ़ार्तार् है व पार्रिस्थिकी तंत्र में सन्तुलन बनार्ये रखतार् है।
  4. रार्सार्यनिक कृषि से जहॉ हमार्रे संसार्धनों की गुणवत्तार् घटती है, वही जैविक कृषि से हमार्रे संसार्धनों क संरक्षण होतार् है।
  5. कृषि जैव विविधतार् क सरंक्षण होतार् है।

जैविक खेती समस्यार्यें/बार्धार्यें

भार्रत में कम्पोस्ट की कमीं, जैविक सार्मग्री में पोषक तत्वों क अंतर, कचरे से संग्रह करने और प्रसंस्करण करने में जटिलतार्, विभिन्न फसलों के लार्गत लार्भ अनुपार्त के सार्थ जैविक कृषि के व्यवहार्रों को शार्मिल करने में पैकेज क अभार्व और वित्तीय सहार्यतार् के बिनार् किसार्नों द्वार्रार् इसे अपनार्ने में कठिनार्ई होती है। इसके अतिरिक्त जैविक खेती की प्रगति में कई बार्धार्एं हैं :-

  1. जार्गरुकतार् की कमी – किसार्नों के पार्स कम्पोस्ट तैयार्र करने के लिए आधुनिक तकनीकों के प्रयोग की जार्नकारी क भी अभार्व है। किसार्न अधिकांशत: यह करते है कि गड्ढार् खोदकर उसे कचरे को कम मार्त्रार् में भर देते हैं। अक्सर गड्ढार् वर्षार् के जल से भर जार्तार् है और इसक परिणार्म यह होतार् है कि कचरे क ऊपरी हिस्सार् पूरी तरह कम्पोस्ट नहीं बन पार्तार् ओश्र नीचे क हिस्सार् कड़ी खली की तरह बन जार्तार् है। जैविक कम्पोस्ट तैयार्र करने के बार्रे में किसार्नों को समुचित प्रशिक्षण देने की जरुरत है।
  2. विपणन की समस्यार् – ऐसार् पार्यार् जार्तार् है कि जैविक फसलों की खेती शुरु करने के पहले उनक विपणन योग्य होनार् और पार्रंपरिक उत्पार्दों की तुलनार् में लार्भ सुनिश्चित करनार्। ऐसार् प्रमार्ण मिलार् है कि रार्जस्थार्न में जैविक गेहॅू के किसार्नों को गेहॅू के पार्रम्परिक किसार्नों की तुलनार् में कम कीमतें मिली। दोनों प्रकार के उत्पार्दों के विपणन की लार्गत भी सार्मार्न थी और गेहॅू के खरीददार्र जैविक किस्म के लिए अधिक कीमत देने को तैयार्र नहीं थे।
  3. अधिक लार्गत होनार् – भार्रत के छोटे और सीमार्न्त किसार्न पार्रम्परिक कृषि प्रणार्ली के रुप में एक प्रकार की जैविक खेती करते रहे हैं। वे खेतों को पुनर्जीवित करने के लिए स्थार्नीय अथवार् अपने संसार्धनों को इस प्रकार प्रयोग करते हैं कि परिस्थितिकी के अनुकूल वार्तार्वरण कायम रहे। जैविक खार्दों की लार्गत रार्सार्यनिक उर्वरकों से अधिक है। मूंगफली की खली, नीम के बीज और उसकी खली जैविक कम्पोस्ट, खार्द, गोबर और अन्य खार्दों क प्रयोग जैविक खार्दों के रुप में होतार् रहार् है। इनकी कीमतों में वृद्धि होने से ये छोटे किसार्नों की पहॅुच से बार्हर होते जार् रहे हैं।
  4. वित्तीय सहार्यतार् क अभार्व – जैविक उत्पार्दों के विपणन के लिए केन्द्र व रार्ज्य सरकारों की ओर से किसी प्रकार की सहार्यतार् नहीं दी जार्ती। यहार्ं तक कि जैविक खेती को बढ़ार्वार् देने के उद्देश्य से वित्तीय प्रक्रियार् क भी सर्वथार् अभार्व है।
  5. निर्यार्त की मार्ंग पूरार् करने में अक्षमतार् – अमेरिका, यूरोपीय संघ और जार्पार्न जैसे उन्नतशील देशों में जैविक उत्पार्दों की बहुत मार्ंग है। अमरीकी उपभोक्तार् जैविक उत्पार्दों के लिए 60 से 100 प्रतिशत क लार्भकारी मूल्य के भुगतार्न के लिए तैयार्र है। अंतर्रार्ष्ट्रीय व्यार्पार्र केन्द्र (आई. टी. सी.) द्वार्रार् वर्ष 2000 में करार्ए बए बार्जार्र सर्वेक्षण से यह संकेत मिलार् है कि विश्व बार्जार्रों के कई हिस्सों में जैविक उत्पार्दों की मार्ंग बढ़ी है, जबकि उसकी आपूर्ति नहीं की जार् सकती। भार्रत में जैविक पदाथों के निर्यार्त को प्रोत्सार्हन क अभार्व पार्यार् जार्तार् है।

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