जीवन बीमार् क्यार् है?

जीवन बीमार् की संविदार् से अभिप्रार्य भविष्य में होने वार्ली ऐसी विनिर्दिष्ट घटनार् से संरक्षार् प्रदार्न करनार् होतार् है जो अनिश्चित होती हैं। ऐसे विनििदृष्ट घटनार् से आस्तियों (Asscites) को पहुंचने वार्ली क्षतियों से संरक्षार् प्रदार्न करनार् तथार् विनिर्दिष्ट घटनार्ओं से होने वार्ली हार्नियों की भरपाइ करनार् होतार् है एवं विनिर्दिष्ट घटनार्ओं के कारण नष्ट अस्तियों क पुनर्निर्मार्ण करने हेतु बीमार्दार्र एवं बीमार्कर्तार् के बीच लिखित एक दस्तार्वेज रूपी समझौतार् होतार् है।

परिभार्षार्:-जीवन बीमार् संविदार् वह संविदार् है जिसमें एक पक्षकार (बीमार्कर्तार्) को एक निश्चित प्रतिफल के बदले में बीमार्दार्र की मृत्यु होने यार् निश्चित अवधि बीतने पर बीमार्दार्र अथवार् उसके द्वार्रार् नियति व्यक्ति को बीमित रार्शि देने क दार्यित्व ग्रहण करतार् है।

जीवन बीमार् के आवश्यक तत्व

जीवनबीमार् की प्रसंविदार् विधि रूप में तभी विधिपूर्ण होगी जब इसमें संविदार् अधि0 1972 के सभी आवश्यक तत्व उपस्थित होगे (धार्रार्-10)। जीवनबीमार् की संविदार् में सार्धार्रण संविदार् की तरह नियमों क अनुपार्लन करनार् होगार्-

  1. बीमार् की प्रस्थार्पनार् वैध रूप में होनी चार्हिए इसके लिये बीमार् करार्ने के इच्छुक व्यक्ति बीमार्दार्तार् द्वार्रार् निर्धार्रित प्रस्तार्व पत्र को भरकर अपनार् प्रस्तार्व देनार् होतार् है। 
  2. जीवन बीमार् के प्रस्थार्पनार् क प्रतिग्रहण-शर्तरहित होनी चार्हिए। बीमार्दार्तार् इसके लिये एक निर्धार्रित स्वीकृति पत्र द्वार्रार् अपनी स्वीकृति सूचित करतार् है। इस स्वीकृति पत्र में यह स्पष्ट कर दियार् जार्तार् कि बीमार् कब से प्रार्रम्भ होगार्।
  3. जीवन की संविदार् में दोनों पक्षकारों की स्वतंत्र सहमति (Free Consent) होनी चार्हिये। एवं दोनों पक्षकारों में संविदार् करने की वैध सक्षमतार् होनी चार्हिये।
  4. जीवन बीमार् की संविदार् में विधिपूर्ण उ्देश्य विधिपूर्ण प्रतिफल द्वार्रार् प्रतिबन्धित नहीं होनार् चार्हिये। 
  5. जीवन बीमार् की संविदार् किसी विधि द्वार्रार् प्रतिबन्धित नहीं होनार् चार्हिये।

जीवन बीमार् की प्रकृति

प्रकृति-जीवन बीमार् की संविदार् की प्रकृति में जीव बीमार् की संविदार् में संविदार् की प्रकृति बीमित घटनार् पर आधार्रित होती है जो दो भार्गों में विभार्जित कर सकते हैं 1. स्वत: जीवन में, 2. दूसरे जीवन में।

1. स्वत: जीवन में –

एक व्यक्ति अपने जीवन में बीमित घटनार् आयोप्य हित रखतार् है वह सिद्ध करने की कोर्इ आवश्यकतार् नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में आगोप्य हित रखतार् है। यदि ऐसार् मार्न लियार् जार्य कि जीवन को बीमित करने से वह अपनी सम्पत्ति की रक्षार् कर सकतार् है जिससे असार्मयिक मृत्यु के कारण भविष्य में प्रार्प्त होने वार्ले लार्भ और बचत की हार्नि हो सकती है सार्थ ही सार्थ चूंकि इसकी कोर्इ सीमार् नहीं है बीमित व्यक्ति आगोप्य हित की भी कोर्इ सीमार् नहीं है। इसलिए जीवन में बीमित घटनार् में आगोप्य हित की कोर्इ सीमार् नहीं है परन्तु बीमार् कम्पनी कुछ दशार्ओं में काफी सतर्क रहती है और असीमित रकम तक बीमार् निर्गमित नहीं कियार् जार् सकतार्। जहार्ं पर उसकी आय और बीमार् की रकम में पर्यार्प्त अन्तर पार्यार् जार्तार् है वहार्ं पर बीमार् कम्पनी पर्यार्प्त जार्ंच पड़तार्ल करती है। स्वार्स्थ्य, उद्देश्य और सम्पत्ति आदि को देखते हुए बीमार्पत्र निर्गमित किये जार्ते हैं। बीमार्कर्तार् की रकम तथार्ार् अवधि इन बार्तों पर आधार्रित है। जीवन बीमार् में प्रव्यार्जि की रकम कोर्इ भी दे सकतार् है।

2. दूसरे जीवन में –

दूसरे के जीवन में बीमित घटनार् आगोपय हित दो प्रकार से होतार् है-1. वह दशार् जिसमें यह मार्न लियार् जार्तार् है कि आगोप्य हित मौजूद है, 2. वह दशार् जिसमें आगोप्य हित के प्रमार्ण देने की आवश्यकतार् है। जीवन बीमार् की संविदार् की प्रकृति भार्रतीय संविदार् अधि0 1872 की धार्रार् 10 पर पूर्णत: आधार्रित है क्योंकि भार्रतीय संविदार् की प्रकृति पक्षकारों के बीच करार्रों को जो पूर्णत: विधि द्वार्रार् प्रवर्तनीय हो सके उसी भार्ंति जीवन बीमार् की संविदार् भी होती है। वह संविदार् जो अधिनियम द्वार्रार् प्रवर्तनीय करार्ये जार् सके अर्थार्त बीमार्दार्र एवं बीमार्कर्तार् के बीच ऐसी कोर्इ भी संविदार् होगी जो विधि द्वार्रार् प्रर्वतीय न करार्ये जार्य क्योंकि संविदार् की प्रकृति शून्य एवं शून्यकरणीय संविदार् आधार्रित होतार् है। वैसे ही जीवन बीमार् की संविदार् की भी प्रकृति शून्य एवं शून्यकरणीय संविदार् पर आधार्रित होगार्। जीवनबीमार् की संविदार् की प्रकृति संविदार् के सार्मार्न्य सिद्धार्न्त एवं विशिष्ट संविदार् के सिद्धार्न्त पर आधार्रित है यदि सार्मार्न्य सिद्धार्न्त के विरुद्ध विशिष्ट सिद्धार्न्त के विरुद्ध संविदार् की जार्ती है तो वह शून्य एवं शून्करणीय होगी।

जीवन बीमार् के क्षेत्र 

जीवन बीमार् की संविदार् क क्षेत्र विस्तृत है क्योंकि आधुनिक व्यवसार्य में जीवन बीमार् क सर्वोच्च स्थार्न इसकी व्यार्पकतार्, विस्तार्र क्षेत्र और महत्व क मूल रहस्य यह है कि इसक मार्नव जीवन में प्रत्यक्ष एवं घनिष्ठ सम्बन्ध है और सुरक्षार् सार्धन के रूप में यह बहुत आवश्यक, उपयोगी और हितकर सिद्ध हुआ है। जीवन बीमार् संविदार् क्षेत्र मुख्यत: है-

1. सुरक्षार् सार्धन के रूप में जीवन बीमार्-

सुरक्षार् सार्धन के रूप में जीवन बीमार् की संविदार् क क्षेत्र अतिव्यार्पक है क्योंकि जीवन बीमार् की संविदार् के क्षेत्र में पार्रिवार्रिक सुरक्षार्-सन्तार्न हेतु व्यवस्थार्, वृद्धार्वस्थार् की व्यवस्थार्, व्यार्वसार्यिक सुरक्षार्, सम्पदार् कर की व्यवस्थार्, जीवन बीमार् बनार्म धनसंचय और निवेश के रूप में जीवन बीमार् और निवेश संस्थार् के रूप में जीवन बीमार् तथार् जीवन बीमार् के अन्य सम्मिलित है:-

(I) पार्रिवार्रिक सुरक्षार्-

जीवन बीमार् मृत्योपरार्ंत पार्रिवार्रिक सुरक्षार् क अनुपम सार्धन है। परिवार्र क कर्तार्-धर्तार् अपने जीवन क बीमार् करार्कर यह प्रबंध कर लेतार् है कि उसकी मृत्यु हो जार्ने पर उसके आश्रितों के लिए आर्थिक व्यवस्थार् हो जार्ए। अत: .’जीवन बीमार् पार्रिवार्रिक सुरक्षार् की उत्तम व्यवस्थार् है। परिवार्र के भविष्य के लिए चिन्तित बीमार्दार्र को जीवन बीमार् निश्चिततार् देतार् है और उसे आश्वस्त करतार् है कि उसके न रहने पर भी परिवार्र के लोग असहार्य यार् परार्श्रित नहीं रहेंगे, क्योंकि उन्हें आर्थिक संकट से सुरक्षार् मिल जार्एगी। जीवन बीमार् एक निश्चित मूल्य की सम्पदार् है जो बीमार् करार्ते ही उत्तरार्धिकारियों के लिए निर्मित हो जार्ती है।

(II) सन्तार्न हेतु व्यवस्थार्-

बच्चों की उच्च शिक्षार् यार् कन्यार् के विवार्ह क जब समय आतार् है तब रुपयों की समस्यार् खड़ी होती है। चार्लू आय में से इसके लिए व्यवस्थार् कर सकनार् सबके लिए सहज यार् सरल नहीं हो सकतार्। पहले ही बचत द्वार्रार् इसके लिए प्रबंध करनार् होतार् है, किन्तु यदि परिवार्र के कर्तार्-धर्तार् की अल्पार्यु में मृत्यु हो जार्ए तब ऐसी बचत से काम नहीं चल सकतार्। इसलिए सन्तार्न की शिक्षार्, विवार्ह आदि की व्यवस्थार् के लिए जीवन बीमार् बड़ार् उपयोगी सिद्ध हुआ है। इसके लिए विशेष प्रकार की जीवन बीमार् पॉलिसी ली जार्ती है जिसके अन्तर्गत समय आने पर कम्पनी शिक्षार् के लिए किस्तों में और विवार्ह के लिए एकमुश्त रकम दे देती है। यदि इसी बीच बीमार्दार्र की मृत्यु हो जार्ए तब प्रीमियम नहीं देनार् पड़तार् और नियत समय पर बीमार् की रकम प्रार्प्त हो जार्ती है। इस प्रकार जीवन बीमार् द्वार्रार् मृत्यु की जोखिम संवृत्त हो जार्ती है, सन्तार्न क भविष्य सुरक्षित हो जार्तार् है और उनके लिए एक निश्चित धनरार्शि संचित हो जार्ती है।

(III) वृद्धार्वस्थार् की व्यवस्थार्-

दीर्घजीवी होने पर आर्थिक संकट उपस्थित हो सकतार् है। ऐसे सौभार्ग्यशार्ली लोग बहुत कम होंगे जिन्होंने अपनी कमाइ से इतनार् धन संचित कियार् हो जिससे बुढ़ार्पार् सुख-सुविधार् से कट सके। वृद्धार्वस्थार् में मनुष्य कार्य-निवृत्त होकर शार्न्ति और सुख से रहनार् चार्हतार् है। यह थकान की उम्र होती है। इस उम्र में सार्मार्न्यतयार् आयोपाजन-शक्ति समार्प्तप्रार्य होती है। इसके अतिरिक्त, दीर्घजीवी होने पर अस्वस्थतार् की जोखिम रहती ही है क्योंकि इन्द्रियार्ं धीरे-धीरे शिथिल होती जार्ती हैं और रोग व्यार्धि से संघर्ष करने की शार्रीरिक शक्ति क्षीण होने लगती है। यदि ऐसे समय आय क कोर्इ सार्धन न हो तब उसे औरों के सहार्रे सहनार् होगार्, जो बुढ़ार्पे की अत्यन्त दयनीय स्थिति होती है। इसलिए वृद्धार्वस्थार् के लिए नियमित आय की योजनार् पहले से बनार् लेनी चार्हिए। इसके निमित्त जीवन बीमार् बड़ार् उपयोगी और व्यार्वहार्रिक होतार् है। जीवन बीमार् बुढ़ार्पे की लकड़ी है। इसके लिए नियमित आय की व्यवस्थार् करके निश्चित रहार् जार् सकतार् है।

(IV) व्यार्वसार्यिक सुरक्षार्-

व्यार्वसार्यिक कार्य-कलार्प में केवल सम्पत्ति बीमार् यार् दार्यित्व बीमार् की विभिन्न प्रणार्लियों क ही महत्व नहीं है वरन् जीवन बीमार् भी उपयोगी पार्यार् गयार् है। व्यार्वसार्यिक सुरक्षार् की व्यवस्थार् जीवन बीमार् द्वार्रार् अनेक प्रकार से की जार्ती है। जो इस प्रकार है-

  1. एक महार्जन अपने ऋणी क जीवन बीमार् करार्कर ऋण की रकम सुरक्षित कर सकतार् है।
  2. कोर्इ व्यार्वसार्यिक संस्थार् अपने महत्वपूर्ण कर्मचार्री (Key Employee) क जीवन बीमार् करार्कर उसकी मृत्यु होने पर एक निश्चित रकम प्रार्प्त करती है और इससे काफी हद तक उस आर्थिक हार्नि की पूर्ति हो सकती है जो ऐसे अनुभवी, गुणी और योग्य कर्मचार्री की मृत्यु के कारण पहुंचती है। 
  3. सार्झेदार्री फर्म में अनेक सार्झेदार्रों की पूंजी लगी रहती है। यदि किसी सार्झेदार्र की मृत्यु हो जार्ए तब उसकी पूंजी वार्पस करने की दशार् उपस्थित होने से व्यार्पार्र में वित्तीय संकट उत्पन्न हो सकतार् है। किन्तु यदि सार्झेदार्रों क संयुक्त जीवन बीमार् करार् लियार् गयार् हो तब किसी सार्झेदार्र की मृत्यु होने पर उसकी पूंजी वार्पस करने के लिए एक निश्चित रकम बीमार् कम्पनी से मिल सकती है, और इस प्रकार व्यवसार्य में अस्थिरतार् यार् आर्थिक संकट नहीं आने पार्तार्।
  4. जीवन बीमार् पॉलिसी के आधार्र पर ऋण भी प्रार्प्त कियार् जार् सकतार् है। कोर्इ व्यवसार्यी अपनी जीवन बीमार् पॉलिसी की प्रतिभूति पर व्यवसार्य के लिए ऋण प्रार्प्त कर सकतार् है।
    1. (V)  सम्पदार् कर की व्यवस्थार्-

    बहुधार् सरकार अपने रार्जस्व के लिए सम्पदार् कर भी लगार्ती है। यह सम्पदार् कर (Estate Duty) मृतक की चल-अचल सम्पत्ति पर उत्तरार्धिकारियों में बंटने के पहले ही वसूल कियार् जार्तार् है। धनिक वर्ग की सम्पदार् भी अपार्र होती है इसलिए इस कर की रकम बहुत बड़ी हो सकती है और इसे अदार् करने के लिए बहुधार् सम्पत्ति के बेचने क संकट उपस्थित हो सकतार् है। इस संकट से सुरक्षार् प्रदार्न करने के लिए जीवन बीमार् बड़ार् महत्वपूर्ण है। सम्पत्ति क स्वार्मी एक निश्चित रकम क बीमार् करार् सकतार् है। जिससे उसकी मृत्यु होने पर बीमित रार्शि से सम्पदार् कर चुकायार् जार् सके। धनिक वर्ग लोगों के लिए यह बीमार् आर्थिक सुरक्षार् क अच्छार् सार्धन है।

    (VI) जीवन बीमार् बनार्म धन संचय-

    सुरक्षार् की व्यवस्थार् के लिए यदि नियमित रूप से बचत करके धन क संचय करते रहार् जार्ए तब जीवन बीमार् से लार्भ क्यार् है? यह जीवन बीमार् क महत्व न जार्नने वार्ले प्रार्य: ही पूदते हैं। उनक मुख्य तर्क यह होतार् है कि पार्रिवार्रिक सुरक्षार्, सन्तार्न के भविष्य और वृद्धार्वस्थार् की आर्थिक व्यवस्थार् तो बचत की योजनार् द्वार्रार् भी सुनिश्चित की जार् सकती है इसलिए जीवन बीमार् की कोर्इ आवश्यकतार् नहीं है। इस तर्क में बीमार् की वार्स्तविक प्रकृतिक की जार्नकारी क स्पष्ट अभार्व प्रकट होतार् है। इस प्रकार में तथ्यों पर ध्यार्न देनार् आवश्यक है।

    1. बचत योजनार् द्वार्रार् धन संचय की एक सीमार् यह भी है कि सभी व्यक्तियों में इतनी इच्छार्-शक्ति (will power) नहीं होती कि वे नियमित रूप से बचत की धनरार्शि संचित करते रहें। लम्बे समय तक ऐसी बचत योजनार् चलार्ने के लिए दृढ़ संकल्प चार्हिए। फिर बचत द्वार्रार् संचित धन आसार्नी से खर्च भी कर दियार् जार्तार् है, और यह भी देखार् गयार् है कि वह व्यय बहुत आवश्यक प्रयोजन के लिए नहीं होतार्। किन्तु जीवन बीमार् करार् लेने की आदत बन जार्ती है। जीवन बीमार् अनिवाय बचत (compulsory saving) क सुन्दर सार्धन है। अन्य प्रकार की बचत योजनार्ओं में ऐसी अनिवायतार् नहीं होती अत: उन पर अधिक भरोसार् नहीं कियार् जार् सकतार्। 
    2. इसके अतिरिक्त, जीवन बीमार् के लिए जो प्रीमियम दियार् जार्तार् है उस पर एक निश्चित सीमार् तक आय-कर से छूट मिलती है, और बीमित रकम पर भी सम्पदार् कर से छूट मिलती है। यह छूट जीवन बीमार् को धन संचल के अन्य सार्धनों की तुलनार् में अधिक उपयोगी और आकर्षक बनार्ती है। इन विभिन्न कारणों से जीवन बीमार् को आर्थिक सुरक्षार् की सर्वोत्तम व्यवस्थार् मार्नार् जार्तार् है।
      1. 2. निवेश के रूप में जीवन बीमार् –

      जीवन बीमार् की यह विशेषतार् है कि इसमें सुरक्षार् क तत्व भी है और निवेश (Inverstment) क तत्व भी। अन्य सभी बीमों में केवल सुरक्षार् क तत्व है, यदि बीमार्दार्र को बीमार् अवधि में कोर्इ हार्नि न पहुंचे तब उसको बीमार् कम्पनी से कोर्इ रकम नहीं मिल सकती क्योंकि ये बीमे क्षतिपूर्ति सिद्धार्न्त पर आधार्रित हैं। यदि क्षति न हुर्इ तो कोर्इ भुगतार्न भी नहीं होगार्। किन्तु जीवन बीमार् संस्थार् को दिए गए प्रीमियमों द्वार्रार् सुरक्षार् की भी व्यवस्थार् होती है और सार्थ-ही-सार्थ निवेश भी होतार् है। जीवन बीमार् के लिए बीमार्दार्तार् जो प्रीमियम देतार् है उसमें बीमार् की लार्गत के अतिरिक्त निवेश की रकम भी सम्मिलित रहती है। जीवन बीमार् उपयोगी और व्यार्वहार्रिक सिद्ध हुआ है। जीवन बीमार् बुढ़ार्पे की लकड़ी है। इसके लिए नियमित आय की व्यवस्थार् करके निश्चिन्त रहार् जार् सकतार् है।

      3. जीवन बीमार् के अन्य लार्भ-

      जीवन बीमार् संविदार् में कार्यों लार्भों के अतिरिक्त जीवन बीमार् से अन्य लार्भ भी प्रार्प्त होते हैं, जो हैं-

      (I) कार्यक्षमतार्-जीवन बीमार् व्यक्तियों को चिन्तार्-मुक्त करके उनकी दक्षतार् बढ़ार्तार् है। चिन्तार् तो चिंतार् होती है, यह मनुष्य को घुलार् देती है। जीवन बीमार् करार्ने से निश्चिततार् और मार्नसिक शार्न्ति मिलती है, आत्म-बल बढ़तार् है जिससे मनुष्य अपनी शक्ति क भरपूर प्रयोग करतार् हुआ अपनी कार्यक्षमतार् में अपेक्षित वृद्धि कर सकतार् है।

      (II) मितव्ययितार् और बचत- जीवन बीमार् मितव्ययितार् और बचत को बढ़ार्वार् देतार् है। बीमार्दार्र जार्नतार् है कि उसे नियमित रूप से प्रीमियम अदार् करते रहनार् है। इसके लिए उसे बचत करनार् आवश्यक होतार् है, क्योंकि प्रीमियम वस्तुत: अनिवाय व्यय की भार्ंति हो जार्तार् है। इसलिए जीवन बीमार् को अनिवाय बचत क सार्धन मार्नार् जार्तार् है।
      (III) सार्मार्जिक लार्भ- जीवन बीमार् एक उत्कृष्ट कोटि की सार्मार्जिक सेवार् भी है यह परिवार्रों को विघटित होने बचार्तार् है, आश्रितों को अपने सहार्रे खड़े होने की शक्ति प्रदार्न करतार् है और समार्ज में दीन, हीन, असहार्य और परार्श्रित व्यक्तियों की बार्ढ़ को रोक देतार् है। इसके अतिरिक्त जीवन बीमार् व्यक्तियों में उत्तरदार्यित्व के प्रति जार्गरूकतार् उत्पन्न करतार् है और आश्रितों के भविष्य को सुरक्षित रखने क भार्व जार्ग्रत करतार् है, जो समार्ज के दृष्टिकोण से बड़ार् मूल्यवार्न गुण मार्नार् जार्नार् चार्हिए।

      जीवन बीमार् क महत्व

      जीवन बीमार् संविदार् क महत्व पार्रिवार्रिक, व्यार्पार्रिक एवं अन्य क्षेत्रों में इस प्रकार है-

      1. पार्रिवार्रिक महत्व-

      (I) जीवन बीमार् व्यक्तियों को चिन्तार् विमुक्त बनार् देतार् है- बीमार् खरीदने से लोग आने वार्ली कठिनार्इयों के प्रति निश्चित हो जार्ते हैं। उन्हें वृद्धार्वस्थार्, अपंगतार् और रोजगार्र हार्नि की चिन्तार् कम हो जार्ती है, क्योंकि वृद्धार्वस्थार् में यार् अधिक दिन जीवित रहने पर होने वार्ली हार्नियों को पूरार् करने के लिए बीमार्दार्तार् एक निश्चित रकम देतार् है। जब व्यक्तियों को यह मार्लूम रहे कि उनके मरने के बार्द बच्चों और स्त्रियों के लिए कुछ रकम मिल जार्येगी तो निश्चत होकर अपनार् कार्य करेंगे। सार्थ ही ज्यार्दार् दिन जीवित रहने पर होने वार्ली आर्थिक कठिनार्इयों के प्रति निश्चित रहने से वर्तमार्न आय को अपने ऊपर स्वार्स्थ्य-वृद्धि के लिए ज्यार्दार् खर्च कर सकते हैं। लेकिन बीमार् करार् लेने से इस कठिनार्इयों क सार्मनार् कियार् जार्तार् है। और मनुष्य को निश्चित होकर कार्य करने क अवसर प्रार्प्त होतार् है। इसलिए यह कहार् गयार् है कि पर्यार्प्त रकम काबीमार्होने से बीमार्पत्रधार्री को बीमार् अच्छार्, भोजन, गहरी निद्रार्, वार्स्तविक आत्म-सन्तोष और कार्य करने क प्रोत्सार्हन प्रदार्न करतार् है।

      (II) बीमार् बचत को सम्भव बनार्तार् है- जीवन बीमार् बचत करने के लिए प्रेरित करतार् है। कुछ लोगों क विचार्र है कि वे बिनार् जीवन बीमार् के भी बचत कर लेते हैं, परन्तु ऐसे उत्सार्ही एवं अध्यवसार्यी व्यक्तियों के लिए भी बीमार् बचत कर लेते हैं, परन्तु सार्धार्रण बचत से सम्भव नहीं है, क्योंकि मृत्यु के कारण ये व्यक्ति बचत नहीं कर पार्येंगे, जीवन बीमार् मृत्यु होने पर कुछ इच्छित बचत को देतार् है, चार्हे उतनार् जमार् कियार् गयार् हो यार् नहीं। जीवन बीमार् के अतिरिक्त अन्य बचत योजनार्ओं में बचत सम्भव नहीं हो पार्तार्, क्योंकि बचत करनार् अनिवाय नहीं रहतार्, बचत के लिए लगार्तार्र इच्छार् नहीं रह पार्ती, आय की अपर्यार्प्ततार् प्रबल होकर सार्मने दिखाइ पड़ती है, बचत क लगार्तार्र प्रबन्ध नहीं कियार् जार् सकतार्, बचत के लिए कोर्इ प्रोत्सार्हन स्वरूप सूचनार् नहीं प्रार्प्त होती और बचत की सुरक्षार् क भी प्रश्न उठ सकतार् है। अत: लगार्तार्र बचत करनार् सम्भव प्रतीत नहीं होतार्। यदि किसी प्रकार संचय कर भी लियार् तो उसक सफलतार्पूर्वक विनियोग करनार् है।
      (III) जीवन बीमार् सुरक्षित एवं लार्भदार्यक विनियोग है- जीवन बीमार् में जमार् की गयी प्र्रव्यार्जि सुरक्षित रहती है, उसकी बीमित रकम, समर्पित मूल्य यार् प्रदत्त मूल्य के रूप में लौटार्यार् जार्तार् है। विशेष रूप से इस विनियोग क लार्भ यह है कि जितनी रकम को संचित करनार् है वह रकम संचित हो जार्येगी, चार्हे बीमित व्यक्ति की मृत्यु क्यों न हो जार्य? अन्य किसी प्रकार के विनियोग में यह सुरक्षार् नहीं है। बीमार्कर्तार् के पार्स जमार् की गयी रकम उचित रूप से लार्भदार्यक प्रतिभूतियों में विनियोजित कियार् जार्तार् है जिससे लार्भ सहित बीमार्पत्रों पर लार्भ भी मिलतार् रहतार् है। विनियोजित रकम न केवल उसके लिए ही लार्भदार्यक होती है, बल्कि उसके आश्रितों के लिए भी लार्भदार्यक होगी। उसके आश्रित संचित रकम को वृित्त के रूप में लेकर विनियोग की तमार्म कठिनार्इयों से छुटकारार् पार् जार्ते हैं। बीमित रकम क वृित्त के रूप में लेनार् अति ही लार्भदार्यक विनियोग होगार्। इसके अतिरिक्त ज्यार्दार् दिन जीवित रहने पर आर्थिक कठिनार्इयों क सार्मनार् नहीं करनार् पड़ेगार्। इसलिए यह कहार् जार्तार् है कि बीमार् एक सुरक्षित एवं लार्भदार्यक विनियोग है।
      (IV) मितव्ययितार् को बढ़ार्वार् मिलतार् है-यदि किसी प्रकार की रूकावट न हो तो वे अपनी सम्पूर्ण आय क उपभोग करनार् चार्हते हैं। भविष्य में आने वार्ली कठिनार्इयों के प्रति कम लोग जार्गरूक रहते हैं। यदि वे सभी आय वर्तमार्न समय में नष्ट कर दें तो जीवन के अन्तिम समय में कठिनाइ हो सकती है। बीमार् प्रसंविदार् उन्हें बचत की आदत डार्लकर अतिरिक्त आय को जमार् करने के लिए बार्ध्य कर देतार् है, जिससे लोगों की आदत थोड़ी ही आय में जीवन-निर्वार्ह की हो जार्ती है। जितनार् कम खर्च करेंगे उतनी ही बचत होगी और भविष्य उतनार् ही सुखमय होगार्। बैंक बचत खार्तों में इस प्रकार क प्रोत्सार्हन नहीं मिल सकतार्, वहार्ँ तो आवश्यकतार् पड़ने पर इसे निकालार् भी जार् सकतार् है। बीमार् क बहुत ही प्रभार्वशार्ली गुण मृत्यु पर निश्चित रकम क भुगतार्न है, चार्हे उतनी रकम जमार् हो यार् न हो। इसके अतिरिक्त बीमार् के अन्य लार्भों को पार्ने के लिए व्यक्ति बीमार् खरीद कर बचत के लिए प्रयत्नशील हो जार्ते हैं, जिसके परिणार्मस्वरूप उन्हें मितव्ययितार् की आदत बन जार्ती हैं।

        2. व्यार्वसार्यिक महत्व-

        बीमार् के द्वार्रार् केवल परिवार्र को ही लार्भ नहीं मिलतार्, बल्कि व्यवसार्य में भी इसक बहुत महत्व है। जो इस प्रकार है-I. महत्वपूर्ण कर्मचार्री क बीमार्-महत्वपूर्ण कर्मचार्री से तार्त्पर्य ऐसे कर्मचार्री से है, जिसक मृत्यु यार् अयोग्यतार् पर व्यार्पार्र को गम्भीर क्षति होती है तथार् उस क्षति को पूरार् करने में काफी समय लगतार् है। यह भी अन्य सम्पत्तियों की तरह से एक मूलयवार्न सम्पत्ति है, जिसके ऊपर व्यार्पार्र की आय निर्भर है। उसकी पूंजी, शक्ति, प्रार्वैधिक ज्ञार्न, अनुभव, योजनार् बनार्ने की शक्ति एवं कार्यरूप देने की योग्यतार् उसे एक मूल्यवार्न सम्पत्ति बनार् देते हैं।

        II. सार्ख में वृद्धि शोध क्षमतार् में वृद्धि- किसी व्यार्पार्र की ऋण प्रार्प्त करने की क्षमतार् उसकी सम्पत्ति, लार्भ, नकद रकम, चरित्र, व्यार्पार्र की दशार्एँ आदि पर निर्भर है। बीमार्पत्र भी एक सम्पत्ति है, अत: बीमार्पत्र की रकम जितनी अधिक होगी सार्ख की मार्त्रार् उतनी ही अधिक होती है। दूसरी आत बीमार् करार् लेने से ऋणदार्तार् को वार्पस पार्यार् जार् सकतार् है। इसके अतिरिक्त प्रव्यार्जि के सार्थ संचित रकम में वृद्धि होती रहती है। जिससे व्यार्पार्र की तरलतार् बढ़ती है। यदि लेनदार्रों यार् ऋणदार्तार्ओं को यह पतार् रहतार् है कि बीमार् के कारण मृत्यु के उपरार्न्त भी व्यार्पार्र चलतार् रहेगार् तो वे अधिक ऋण देने के सार्थ सरल शर्तों पर ऋण प्रदार्न करने में सशंकित नहीं रहेंगे।
        व्यार्पार्र अनुवृत्ति यार् स्थार्यित्व- व्यार्पार्र में कार्यशील स्वार्मी, जो एकल व्यार्पार्री, सार्झेदार्र, अंशधार्री यार् सदस्य हो सकते हैं, की मृत्यु पर व्यार्पार्र को हार्नि होगी। व्यार्पार्र बन्द हो सकतार् है, उनके आश्रित अपनी आय नहीं कमार् पार्येगे। लेकिन बीमार् होने से पर्यार्प्त रकम मिलेगी जिसक प्रयोग लिए गये ऋण को चुकाने, हार्सित हार्नि को पूरार् करने और व्यार्पार्र को सुसंगठित करने में प्रयोग कियार् जार् सकतार् है, जिससे व्यार्पार्र को समार्पन और विघटन से बचार्यार् जार् सकतार् है।

        अन्य महत्व-

        व्यार्पार्रिक और व्यक्तिगत लार्भों को देखार् जार्य तो सार्मार्जिक लार्भ अपने आप समझ में आ जार्तार् है। जब समार्ज क प्रत्येक वर्ग और व्यक्ति इससे लार्भार्न्वित होतार् है तो समार्ज अपने-आप लार्भार्न्वित होगार्। बीमार् से व्यक्तियों में जिम्मेदार्री की भार्वनार् आती है जिससे वे परिवार्र के लिए बचत करेंगे, परिवार्र सुखी रहेगार् और समार्ज के अन्य व्यक्ति इस प्रकार परिवार्र की रक्षार् कर लेंगे।

        I. देश के विकास में योगदार्न- समार्ज क संचित कोष समार्ज और देश की प्रगति में लगार्यार् जार् सकतार् है। औद्योगिक विकास को प्रोत्सार्हन मिलतार् है। पिछले क्षेत्रों में विनियोग करके विकास को सन्तुलित कियार् जार् सकतार् है। इस प्रकार देश की प्रगति होगी, व्यक्तियों की आय बढ़ेगी और वे फिर अधिक बीमार् ले सकेंगे। इस प्रकार देश के विकास के लिए पर्यार्प्त रकम मिलती रहेगी। इतनार् ही नहीं, प्रति व्यक्ति को रहने के लिए घर, काम करने के लिए रोजगार्र, भोजन के लिए कृषि उत्पार्दन, कपड़े आदि के लिए विशेष उद्योगों क विकास सम्भव होगार्, जिससे सार्मार्जिक कल्यार्ण सम्भव हो जार्येगार्।

        II. स्वार्स्थ्य में वृद्धि- व्यक्तियों के स्वार्स्थ्य में वृद्धि होगी, क्योंकि लोग बीमार् के लार्भों को पार्ने के लिएअपने स्वस्थ बनार्ये रखने क प्रयार्स करेंगे। बीमार् खरीदने के समय कुछ अज्ञार्त बीमार्रियों के पतार् लग जार्ने से व्यक्ति उसके प्रति सचेत होगार्। बीमार् करार् लेने से वृद्धार्वस्थार् और अपंगतार् आदि के समय मदद मिलेगी। समार्ज में स्वस्थ सबल वार्तार्वरण बनने से सार्मार्जिक लार्भ होगार्। लोगों के स्वस्थ रहने से मृत्यु दर में कमी आयेगी, परिणार्मस्वरूप प्रव्यार्जि की रकम कम होगी जिससे लोग ज्यार्दार् बीमार् खरीदेंगे और स्वस्थ रह सकेंगे।

        III. मुद्रार् प्रसार्र में कमी- देश में बढ़ते हुए मूल्य, जो मुद्रार् प्रसार्र के कारण हैं, बीमार् के द्वार्रार् कम कियार् जार् सकतार् है। समार्ज की अतिरिक्त आय को यदि प्रव्यार्जि के रूप में जमार् कियार् जार् सकतार् तो उतनी रकम से मुद्रार् प्रसार्र कम हो जार्येगार्। दूसरी ओर उस संचित रकम को उत्पार्दन कार्य में लगार्कर मुद्रार् प्रसार्र के इस अवकाश को पूरार् कियार् जार् सकेगार्।

        IV. सार्मार्जिक बुरार्इयों में कमी- जिस समार्ज में व्यक्ति वृद्धार्वस्थार् और असार्मयिक मृत्यु के प्रति निश्चिन्त है, सार्मार्जिक उत्थार्न के लिए निरन्तर प्रयार्स करेंगे। जैसार् बतार्यार् जार् चुक है कि लोगों में कम खर्च की आदत बनेगी। थोड़े खर्च में ज्यार्दार् संतोष पार्येंगे और अधिक रकम के लिए प्रयार्स नहीं करेंगे, तो समार्ज में अपने आप असार्मार्जिक कार्यों में कमी होगी। लोग बेर्इमार्नी यार् लार्लच को कम कर देंगे। दूसरी तरफ सार्मार्जिक और पार्रिवार्रिक अव्यवस्थार् में भी कमी आयेगी, क्योंकि रह एक व्यक्ति दुर्घटनार्, अपंगतार् वृद्धार्वस्थार् और मृत्यु के समय बीमार् से सहार्यतार् पार्येगार्। इस प्रकार व्यवस्थित और संतुलित समार्ज मे उत्पार्दन कार्य अपने आप बढ़ेंगे, जो समार्ज ओर देश की प्रगति के लिए स्वयं एक सार्धन और सार्ध्य है।

        V. शिक्षार् एवं विज्ञार्न में वृद्धि- जीवन बीमार् से आश्रितों को अच्छी शिक्षार् मिले, क्योंकि जिस शिक्षार् को बच्चे नही पार् सकते, उसके लिए व्यवस्थार् पहले से की गर्इ है, उनके मार्तार्-पितार् चार्हे जीवित रहें यार् न रहें। ये व्यक्ति विज्ञार्न में वृद्धि करने में सफल होंगे। ऊँची शिक्षार् से उनक मार्नसिक और शार्रीरिक विकास होगार्। देश में उच्च, प्रार्वैधिक और वैज्ञार्निक शिक्षार् में वृद्धि होने से देश के लिए पर्यार्प्त कुशल व्यक्ति मिलेंगे, को स्वयं भी कुछ उत्पार्दन कार्य कर सकेंगे।

        VI. समार्ज में स्नेह एवं प्रेम तथार् आनन्द में वृद्धि- जब हर एक मार्तार्-पितार् अपने बच्चों की शिक्षार्, विवार्ह पार्लन-पोषण के लिए व्यवस्थार् किये रहेंगे। पति अपने विधवार् पत्नी के लिए आय छोड़ेगार् और स्वयं वृद्धार्वस्थार् में दूसरों पर आश्रित नहीं रहेगार्।

        जीवन बीमार् के प्रकार

        1. आजीवन बीमार् – 

        आजीवन बीमार् में बीमित रकम बीमार्दार्र की मृत्यु होने पर ही देय होती है, यह रकम बीमार्दार्र स्वयं प्रार्प्त नहीं कर सकतार् है। आजीवन पॉलिसी उन लोगों के लिए सही है जो अपनी मृत्यु के उपरार्न्त पार्रिवार्रिक सुरक्षार् के लिए सम्पदार् कर क भुगतार्न करने के लिए किसी को उपहार्र यार् दार्न देने के लिए एक निश्चित धनरार्शि क प्रबन्ध करनार् चार्हते हों। आजीवन पॉलिसी की प्रीमियम दर बन्दोबस्ती बीमों की तुलनार् में कम होती है, इसीलिए आजीवन पॉलिसी को पार्रिवार्रिक सुरक्षार् के लिए सबसे सस्तार् बीमार् मार्नार् जार्तार् है। आजीवन पॉलिसियों के प्रकार-आजीवन बीमार् प्रसंविदार् मुख्यत: तीन प्रकार की होती है-(i) सार्धार्रण, (ii) सीमित संदार्य, तथार्, (iii) परिवर्तनीय।(I) सार्धार्रण आजीवन बीमार् की संविदार् (Ordinary whole life policy)-यह प्रसंविदार् ही आजीवन बीमार् क मुख्य रूप है। इस पॉलिसी को प्रार्य: मृत्योपरार्न्त सम्पदार् कर (Estate Duty) क भुगतार्न करने यार् पार्रिवार्रिक सुरक्षार् की व्यवस्थार् के उद्देश्य से लियार् जार्तार् है। इसमें बीमार्दार्र को नियमित रूप से तब तक प्रीमियम देते रहनार् पड़तार् है जब तक वह जीवित रहे। इस पॉलिसी की प्रीमियम दर सबसे कम होती है। किन्तु जीवन भर प्रीमियम देते रहने पर बोझ दीर्घजीवियों के ऊपर बहुत अधिक हो सकतार् है। इसी कारण मनोवैज्ञार्निक आधार्र पर इस पॉलिसी के प्रति बहुधार् लोग आकर्षित नहीं होते यद्यपि मृत्योपरार्न्त पार्रिवार्रिक सुरक्षार् की दीर्घकालिक बीमार् योजनार् के रूप में यह सबसे सस्ती पॉलिसी है।

        (II) सीमित संदार्य आजीवन पॉलिसी (Limited Payment whole life policy)-जो बीमार्दार्र अपनी आजीवन पॉलिसी क भुगतार्न 70 वर्ष यार् इससे कम आयु तक सीमित रखनार् चार्हतार् हो उसके लिए यह पॉलिसी है। इसमें प्रीमियम अदार् करने की एक निश्चित अवधि चुन ली जार्ती है, प्रीमियम अदार् करने क दार्यित्व उसी चुनी हुर्इ अवधि तक सीमित रहतार् है। इसकी प्रीमियम दर सार्धार्रण आजीवन पॉलिसी की दर उतनी ही अधिक होगी। सीमित संदार्य आजीवन पॉलिसी क एक रूप है ‘एकमुश्त आजीवन पॉलिसी’ (Single Premium Whole Life Policy)। इस बीमार्दार्र बीमार् करार्ते समय पॉलिसी के समस्त प्रीमियमों को एकमुश्त अदार् कर देतार् है और भविष्य में उसे प्रीमियम की कोर्इ किस्त जमार् नहीं करनी होती।

        (III) परिवर्तनशील आजीवन पॉलिसी (Convertible Whole Life Policy)- यह लार्भ रहित आजीवन पॉलिसी है जिसमें बीमार्दार्र को यह सुविधार् दी जार्ती है कि वह चार्हे तो पॉलिसी के चार्लू होने के पार्ंच वर्षों बार्द इसे किसी भी अवधि के लार्भ-रहित यार् लार्भ सहित बन्दोबस्ती बीमार् में परिवर्तित करार् ले। बन्दोबस्ती पॉलिसी में परिवर्तित करार्ते समय पुन: डार्क्टरी परीक्षार् नहीं करार्नी होगी और बीमार्दार्र से पिछले पार्ंच वर्ष की प्रीमियम की शेष रकम नहीं ली जार्एगी। इसे ‘वैकल्पिक आजीवन पॉलिसी’ (Optional Whole Life Policy) भी कहते हैं। परिवर्तन की तिथि से उसे बन्दोबस्ती बीमार् क प्रीमियम देनार् पड़ेगार्। यदि बीमार्दार्र इस विकल्प को प्रयुक्त न करें तब यह लार्भ-रहित आजीवन पॉलिसी के रूप में चार्लू रहेगी। यह पॉलिसी उन लोगों के लिए सही है जिन्होंने अभी अपनार् रोजगार्र प्रार्रम्भ कियार् है और जीवन बीमार् करार्नार् चार्हते हैं किन्तु अपनी सीमित आय के कारण अपेक्षार्कृत ऊँची दर वार्लार् बन्दोबस्ती बीमार् नहीं करार् सकते, और कुछ वर्षों बार्द आय में वृद्धि होने पर बन्दोबस्ती बीमार् करार्ने के इच्छुक हैं। आजीवन बीमार् करार्ने वार्ले प्रार्य: परिवर्तनीय आजीवन पॉलिसी ही लेनार् पसंद करते हैं क्योंकि इसे बन्दोबस्ती पॉलिसी में परिवर्तित करार्ने की सुविधार् रहती है।

        2. बन्दोबस्ती बीमार् –

        बन्दोबस्ती पॉलिसी के एक निश्चित अवधि 10, 20 यार् 30 वर्ष के लिए जीवन बीमार् करार्यार् जार्तार् है। यदि इस अवधि में बीमार्दार्र की मृत्यु हो जार्ए यार् यदि इस अवधि के अन्त तक बीमार्दार्र जीवित रहे, तब बीमित रकम क भुगतार्न कर दियार् जार्तार् है। बन्दोबस्ती बीमार् के मुख्य छ: प्रकार होते हैं : (i) सार्धार्रण, (ii) सीमित, संदार्य, (iii) विलम्बित, (iv) दुगुनार्, (v) शुद्ध, (vi) संयुक्त जीवन।(I) सार्धार्रण बन्दोबस्ती बीमार् की संविदार् (Ordinary Endowment Insurance Policy)-सार्धार्रण बन्दोबस्ती एक निश्चित अवधि की पॉलिसी है और यही सबसे अधिक प्रचलित है। इसमें प्रीमियम देने क दार्यित्व बीमार् अवधि तक सीमित रहतार् है, और इस बीच बीमार्दार्र की मृत्यु होते ही यह दार्यित्व समार्प्त हो जार्तार् है। बीमार् क रूपयार् पॉलिसी की अवधि पूर्ण जार्ने पर बीमार् की अवधि में मृत्यु होते ही यह दार्यित्व समार्प्त हो जार्तार् है। इस पॉलिसी के अन्तर्गत मृत्योपरार्न्त आश्रितों की सुरक्षार् तथार् जीवित रहने पर वृद्धार्वस्थार् के जीवन-निर्वार्ह दोनो ही के लिए धनरार्शि क प्रबन्ध होतार् है। यह पॉलिसी शुद्ध बन्दोबस्ती बीमार् और दीर्घकालिक अवधि बीमार् क मिश्रित रूप मार्नार् जार्तार् है। इसकी प्रीमियम दर आजीवन बीमार् पॉलिसी की अपेक्षार् ऊंची होती है। इसकी न्यूनतम बीमार् रार्शि बीस हजार्र रूपए हैं।

        (II) सीमित संदार्य बन्दोबस्ती बीमार् की संविदार् (Limited Payment Insurnace Endowment Policy)-सीमित संदार्य बन्दोबस्त बीमार् की संविदार् में यदि बीमार्दार्र चार्हतार् हो कि बन्दोबस्ती पॉलिसी की अवधि से कम अवधि तक प्रीमियम अदार् करके बार्द प्रीमियम देने के दार्यित्व से वह मुक्त हो जार्ए तब इसके लिए सीमित संदार्य बन्दोबस्ती पॉलिसी सही होगी। जैसे 25 वष्र्ार्ीय बीमार्दार्र 35 वर्ष की बन्दोबस्ती पॉलिसी ले रहार् है लेकिन प्रीमियम संदार्य 20 वर्ष तक करेगार् तब ऐसी पॉलिसी के लिए उसे प्रतिवर्ष अपेक्षार्कृत आर्थिक प्रीमियम देनार् होगार् किन्तु 20 वर्ष बीत जार्ने के बार्द उसे प्रीमियम नहीं देनार् पड़ेगार्। ऐसी पॉलिसी उन बीमार्दार्रों के लिए उपयुक्त होती है जो प्रीमियम अदार् करने क दार्यित्व बीमार् अवधि की तुूलनार् में अपेक्षार्कृत कम अवधि क रखनार् चार्हते हैं।

        (III) विलम्बित बन्दोबस्ती पॉलिसी (Deferred Endowment Policy):-विलम्बित बन्दोबस्त बीमार् संविदार् में सार्धार्रण बन्दोबस्ती प्रसंविदार् के समार्न है अन्तर केवल यह है कि बीमार् अवधि में बीमार्दार्र की मृत्यु होने पर बीमार् क रूपयार् तुरन्त देय नहीं होतार् वरन् बीमार् की अवधि पूर्ण होने पर ही मिलतार् है। यह पॉलिसी उनके लिए उपयुक्त है जो एक निश्चित समय आने पर ही बीमित रकम क प्रबन्ध करनार् चार्हते हों, भले ही मृत्यु पहले हो जार्ए। ऐसी पॉलिसी सन्तार्न की शिक्षार्, विवार्ह आदि के लिए ली जार्ती है। इसकी प्रीमियम दर सार्धार्रण बन्दोबस्ती पॉलिसी से कम होती है। जीवन बीमार् निगम सन्तार्न की शिक्षार् यार् विवार्ह के निमित्त उपर्युक्त प्रकार की पॉलिसी जार्री करतार् है जिसक नार्म विवार्ह बन्दोबस्ती/शिक्षार् वृत्ति पॉलिसी कहते है।

        (IV) शुद्ध बन्दोस्ती पॉलिसी (Pure Endowment Policy):-शुद्ध बन्दोबस्ती बीमार् संविदार् पॉलिसी में यह शर्त रहती है कि बीमित अवधि में यदि बीमार्दार्र की मृत्यु हो जार्ए तब बीमार् संस्थार् बीमार् की रकम देने के दार्यित्व से मुक्त हो जार्येगी। इस पॉलिसी के अधीन बीमित रकम तभी मिल सकती है जब बीमार्दार्र बीमार् अवधि पूरी होने तक जीवित रहे। यदि किसी व्यक्ति ने 20-वष्र्ार्ीय शुद्ध बन्दोबस्ती पॉलिसी ली हो तब बीमित रार्शि तभी देय होगी जब बीस वर्षों के उपरार्न्त वह जीवित रहे। यदि बीमार् अवधि में उसकी मृत्यु हो जार्ए तो बीमार् संस्थार् बीमित रार्शि क भुगतार्न नहीं करेगी। इस बीमार् पॉलिसी के लिए डॉक्टरी जॉंच नहीं की जार्ती। यह पॉलिसी दो प्रकार की होती है-(1) वार्पसी रहित (2) वार्पसी सहित। वार्पसी-रहित (Without Return) पॉलिसी के अन्तर्गत बीमार् अवधि में बीमार्दार्र की मृत्यु होने पर प्रार्प्त प्रीमियमों की पूरी रकम बीमार् संस्थार् अपने पार्स रख लेती है। इस रूप में यह पॉलिसी अब लार्गू नहीं है। इसक दूसरार् रूप है शुद्ध वार्पसी (Pure Endowment with Return Policy) जिसमें मृत्यु होने पर बीमार्दार्र द्वार्रार् जमार् की गर्इ प्रीमियम रार्शि दार्वेदार्रों को वार्पस कर दी जार्ती है।

        (V) दुगुनार् बन्दोबस्ती पॉलिसी (Double Endowment Policy):-इस पॉलिसी में बीमार् अवधि में बीमार्दार्र की मृत्यु होने पर, सार्धार्रण बन्दोबस्ती पॉलिसी की भार्ंति, बीमार् की रकम तुरन्त दे दी जार्ती है, किन्तु यदि अवधि पूर्ण होने तक बीमार्दार्र जीवित रहार् तब बीमार् की दुगुनी रकम दी जार्ती है। यह पॉलिसी सार्धार्रण बन्दोबस्ती तथार् शुद्ध बन्दोबस्ती बीमार् (वार्पसी-रहित) क सम्मिश्रण है। यह पॉलिसी उन व्यक्तियों के लिए विशेष आकर्षक होती है जिनको यह विश्वार्स हो कि वे बीमार् अवधि तक जीवित रहेंगे, यद्यपि वे यह चार्हते हैं कि यदि बीमार् अवधि के अन्तर्गत उनकी मृत्यु हो जार्ए तब परिवार्र के लिए भी आर्थिक व्यवस्थार् हो सके।

        (VI) संयुक्त जीवन बन्दोबस्ती की संविदार् (Joint Life Endowment Policy)-यह पॉलिसी एक से अधिक जीवनों क संयुक्त बीमार् करने में प्रयुक्त होती है। इसकी शर्तों के अनुसार्र-(1) बीमार् अवधि में संयुक्त बीमार्दार्रों में से किसी की मृत्यु हो जार्ने पर, अथवार् (2) अवधि बीत जार्ने पर बीमित रकम क भुगतार्न होतार् है। यह पॉलिसी प्रार्य: पति-पत्नी के जीवन पर, यार् सार्झेदार्रों के जीवन पर ली जार्ती है। जहॉं पति और पत्नी दोनों ही स्वतंन्त्र रूप से आय उपाजित करते हैं, वहॉं किसी की भी मृत्यु होने के कारण पार्रिवार्रिक आय घट जार्एगी। इसी प्रकार, सार्झेदार्रों क संयुक्त जीवन बीमार् करार् लेने से मृत सार्झेदार्र की पूजी लौटार्ने के लिए समुचित धनरार्शि की व्यवस्थार् हो जार्ती है।

        3. अवधि बीमार्  –

        अवधि बीमार् एक अस्थार्यी बीमार् (Temporary Insurance) है। यह बीमार् प्रार्य: 1 वर्ष से 7 वर्ष के लिए करार्यार् जार्तार् है। बीमार् अवधि में बीमार्दार्र की मृत्यु होने पर बीमित रकम क भुगतार्न कियार् जार्तार् है किन्तु अवधि बीत जार्ने पर बीमार् समार्प्त हो जार्तार् है और पॉलिसी पर कोर्इ रकम नहीं मिलती। यह पॉलिसी वस्तुत: शुद्ध बन्दोबस्ती पॉलिसी क विलोम (उलटार् रूप) है। यह बीमार् केवल सुरक्षार् प्रदार्न करतार् है, इसमें निवेश यार् बचत क तत्व नहीं है। इसमें समर्पण मूल्य (Surrendor Value) नहीं होतार्। इसकी उपयोगितार् ऐसे लोगों के लिए है जो अल्प अवधि के लिए सुरक्षार् की व्यवस्थार् करनार् चार्हते हों, यार् जो व्यवसार्यी अपने विशिष्ट कर्मचार्री की मृत्यु से आर्थिक हार्नि की पूर्ति के लिए उस कर्मचार्री क एक निश्चित अवधि क बीमार् करार्नार् चार्हते हों। इस पॉलिसी की प्रीमियम दर सबसे कम होती है। अवधि बीमार् की चार्र प्रकार की पॉलिसियार्ं प्रचलित हैं :(1) द्वि-वष्र्ार्ीय अस्थार्यी (2) परिवर्तनीय (3) ह्रार्समार्न तथार् (4) नवकरणीय।

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