जार्ति की उत्पत्ति
भार्रत में जार्ति की उत्पत्ति के विषय में अनेक सिद्धार्न्त प्रतिपार्दित किए गए हैं लेकिन कोर्इ भी सिद्धार्न्त सही व्यार्ख्यार् नहीं करतार्। रिज़ले ने जार्ति की उत्पत्ति प्रजार्तीय भिन्नतार्ओं (racial differences) के कारण बताइ, नेसफील्ड तथार् इबेट्सन ने पेशे को इसक कारण बतार्यार्, अबे डुबॉयस ने ब्रार्ह्मणों की भूमिक को इसक कारण बतार्यार्, और हट्टन ने ‘‘मार्नार्’’ (Mana) को।

परम्परार्गत सिद्धार्न्त 

कुछ पश्चिमी एवं गैर-भार्रतीय विद्वार्नों जैसे स्यू (Hsu) ने हिन्दू समार्ज को अन्ध विश्वार्सों पर केन्द्रित समार्ज बतार्यार् है, जिसमें लोग भार्वमय (abstract) सत्य से प्रलोभित होते हैं तथार् इस सत्य को रहस्यवार्द द्वार्रार् ढूंढ़ने क प्रयत्न करते है न कि विज्ञार्न द्वार्रार्। ये विद्वार्न मार्नते हैं कि हिन्दू लोग चरम सत्य (ultimate reality) से निकटतार् ढूंढ़ते हैं और प्रत्येक वस्तु एवं घटनार् की व्यार्ख्यार् र्इश्वर तथार् धर्म में ढूंढ़ते हैं। जार्ति जैसी संस्थार् की उत्पत्ति को ये ‘‘ब्रह्मार्’’ के शरीर में खोजते हैं। परम्परार्त्मक सिद्धार्न्त के अनुसार्र जार्ति प्रणार्ली दैवी विधार्न (divine ordinacne) द्वार्रार् स्थार्पित की गर्इ है यार् फिर कम से कम र्इश्वर के अनुमोदन (divine approval) से तो अवश्य ही। समार्जशार्स्त्रीय सिद्धार्न्त की मार्न्यतार् है कि जार्ति प्रणार्ली मार्नव निर्मित (man-made) है यार् फिर कृत्रिम रूप से रचित (artifically-created) है और यह स्तरीकरण की प्रदत्त (ascriptive) प्रणार्ली है जिसमें प्रस्थिति तथार् भूमिक क निर्धार्रण जन्म से होतार् है। परम्परार्गत सिद्धार्न्त जार्ति प्रणार्ली को एक स्वार्भार्विक (normal) व प्रार्कृतिक प्रणार्ली मार्नतार् है। इस सिद्धार्न्त के दो रूप हैं: मिथकीय (mythical) और आध्यार्त्मिक (metaphysical)।

मिथकीय कथन एवं पुरार्ण-कथार् के अनुसार्र चार्र वर्ण ही चार्र जार्तियार्ं हैं और ये चार्रों जार्तियार्ं ब्रह्म के शरीर के चार्र अंगों से निकली हैं। इसके अनुसार्र जार्ति सार्मार्जिक कार्यों क प्रार्कृतिक रूप से निर्धार्रित एक संगठन है तथार् एक विशेष जार्ति में व्यक्ति की सदस्यतार् धर्म और कर्म संबंधी सिद्धार्न्तों के आधार्र पर समझाइ जार् सकती है।

जार्ति क आध्यार्त्मिक (metaphysical) रूप जार्ति के लक्षणों, कार्यों तथार् संस्तरण पर बल देतार् है। प्रत्येक जार्ति क अलग कार्य (function) होतार् है और यह कार्य उस (जार्ति) के सदस्यों के ‘‘स्वभार्व’’ तथार् ‘‘गुणों’’ पर आधार्रित होतार् है। हिन्दू दृष्टिकोण से व्यक्ति क स्वभार्व दो गुणों में निहित हैं: गोत्रिक और नार्मिका। ‘‘गोत्रिका’’ क अर्थ वंशार्नुगत गुणों से है जो व्यक्ति अपनी वंश परम्परार् अथवार् गोत्र से प्रार्प्त करतार् है, और जिसकी वह अपने परिवार्र के सभी सदस्यों के सार्थ भार्गीदार्री करतार् है। ‘‘नार्मिका’’ व्यक्ति के गुणों से संबंध रखती हैं जो कि विशेष रूप से व्यक्ति के अपने होते हैं तथार् वह व्यक्ति उन गुणों की परिवार्र के सदस्यों के सार्थ भार्गीदार्री नहीं करतार् है।

‘‘स्वभार्व’’ तथार् ‘‘कार्य’’ (व्यवसार्य) को परस्पर अलग नहीं कियार् जार् सकतार्। यह जार्ति के दूसरे लक्षण की व्यार्ख्यार् करतार् है; वह है: ‘‘निश्चित व्यवसार्य’’। प्रकार्य (functions) दो प्रकार के होते हैं: सार्मार्न्य (ordinary) तथार् असार्मार्न्य/असार्धार्रण (extraordinary)। सार्मार्न्य प्रकार्य वे हैं जिनमें किसी विशेष दक्षतार् यार् कुशलतार् की आवश्यकतार् नहीं होती है, जबकि असार्धार्रण प्रकार्य वे हैं जिनको करने के लिए विशेष ज्ञार्न की आवश्यकतार् होती है। असार्धार्रण प्रकार्य फिर तीन प्रकार के होते हैं: तकनीकी-आर्थिक प्रकार्य (techno-economic) रार्जनैतिक वैधार्निक प्रकार्य (politico-legl) सार्ंस्कृतिक-धामिक प्रकार्य (cultural-religious)। ब्रार्ह्मण सार्ंस्कृतिक-धामिक प्रकार्यों में लगे हैं, क्षत्रिय रार्जनैतिक-वैधार्निक प्रकार्यों में, वैश्य तकनीकी-आर्थिक प्रकार्यों में, और शूद्र सार्मार्न्य प्रकार्यों में। प्रथम तीन ‘‘द्विज’’ श्रेणी में आते हैं, क्योंकि उनको पूर्व जन्म में प्रशिक्षण प्रार्प्त हुआ थार्। उपरोक्त तथ्य चार्र वर्णों की संस्तरणार्त्मक व्यवस्थार् की व्यार्ख्यार् करते हैं, जिन्हें परम्परार्त्मक सिद्धार्न्त में चार्र जार्तियार्ँ मार्नी गयी है। प्रकार्यों में अन्तर के आधार्र पर संस्तरणार्त्मक संगठन में खार्नपार्न संबंधी बन्धनों क अस्तित्व स्वार्भार्विक ही है। इन प्रतिबन्धों के अभार्व में प्रकार्य विभार्जन क उद्देश्य ही पीछे रह जार्येगार्। अत: समूहों के विभिन्न धामिक क्रियार्कलार्पों एवं विवार्ह प्रतिबन्धों की व्यार्ख्यार् स्वयं ही हो जार्ती है। यही परम्परार्त्मक सिद्धार्न्त क आध्यार्त्मिक पक्ष है।

जार्ति की उत्पत्ति के सिद्धार्न्तों में परम्परार्त्मक सिद्धार्न्त विद्वार्नों द्वार्रार् विशेष रूप से दो कारणों से अस्वीकार कियार् गयार् है- प्रथम, यह सिद्धार्न्त जार्ति को स्वार्भार्विक घटनार् मार्नतार् है; द्वितीय, यह चार्र वर्णों को ही चार्र जार्तियार्ं बतार्तार् है। इस सन्दर्भ में एम0एन0 श्रीनिवार्स ने भी लिखार् है कि जार्ति के आधार्र पर समार्ज क चार्र भार्गों में विभार्जन तथ्यों क एक विशुद्ध सरलीकरण मार्त्र है। जार्ति व्यवस्थार् की वार्स्तविक इकार्इ ‘‘वर्ण’’ नहीं अपितु ‘‘जार्ति’’ है, जो एक छोटार् अन्तर्विवार्ही समूह है, जो परम्परार्गत व्यवसार्य अपनार्तार् है तथार् जिसे कुछ सार्ंस्कृतिक, धामिक व न्यार्यिक स्वार्यत्रतार् प्रार्प्त है।

ब्रार्ह्मण सिद्धार्न्त

फ्रार्ंसीसी विद्वार्न अबे डुबॉयस (Abe Dubois) क मार्ननार् है कि भार्रत में जार्ति प्रथार् क उद्भव और विकास ब्रार्ह्मणों के द्वार्रार् बनाइ गर्इ एक चतुर योजनार् है जो कि ब्रार्ह्मणों ने अपनी सत्तार् चिरस्थाइ रखने के लिए रची थी। ब्रार्ह्मणों ने गैर-ब्रार्ह्मणों के सार्थ खार्ने-पीने, विवार्ह तथार् सार्मार्जिक संबंधों में प्रतिबन्ध लगार् दिए जिससे उनकी धामिक पवित्रतार् बनी रहे जो कि उनके द्वार्रार् किए जार्ने वार्ले पुरोहिती कृत्य करने के लिए आवश्यक है। सार्थ ही उन्होंने स्वयं को ‘‘ब्रार्ह्मन’’ और अन्य ग्रन्थों में ऊँचार् पद दियार् और अपने लिए विशेषार्धिकार और परमार्धिकार बनार् लिए और अन्य सभी लोगों को निम्न पद प्रदार्न किये।

धुर्ये क भी विश्वार्स है कि जार्ति की उत्पत्ति में ब्रार्ह्मणों की प्रमुख भूमिक है। अत: वे ब्रार्ह्मण सिद्धार्न्त क समर्थन करते हैं। उनकी मार्न्यतार् है कि वे सभी विविध कारक जो जार्ति-समार्ज की विशेषतार् बतार्ते हैं, ब्रार्ह्मणों के उन प्रयत्नों क फल हैं जो उन्होंने स्वयं को आदिवार्सियों तथार् शूद्रों के धामिक व सार्मार्जिक सम्पर्क से पृथक रखने तथार् ब्रार्ह्मण सभ्यतार् को ऊंचार् बनार्ए रखने के लिए किए थे।

समार्ज में जो सार्मार्जिक प्रतिमार्न इस सर्वसम्मार्नीय वर्ग (यार्नि कि ब्रार्ह्मणों) ने स्थार्पित कियार्, वह अन्य समूहों ने सम्मार्न प्रार्प्त करने के लिए नकल करनार् शुरू कियार्। इस प्रकार विवार्ह संबंधी तथार् खार्न-पार्न संबंधी मौलिक प्रतिबन्ध, जो समार्ज में केवल चार्र वर्गों के विचार्र पर आधार्रित थे, प्रत्येक समूह की विशेषतार्एं बन गए। अत: धुर्ये ने स्पष्टत: लिखार् है कि ‘‘भार्रत में जार्ति इण्डोआर्यन संस्कृति के ब्रार्ह्मणों क बच्चार् है जो कि गंगार् और यमुनार् के मैदार्न में पलार् है और वहार्ँ से देश के दूसरे भार्गों में ले जार्यार् गयार् है’’।

हट्टन बहरहार्ल अनुभव करते हैं कि जार्ति की उत्पत्ति के विषय में ब्रार्ह्मणीय सिद्धार्न्त को स्वीकार करनार् कठिन है। उन्होंने इसके विपक्ष में दो तर्क दिए हैं:

  1. यदि इस सिद्धार्न्त को स्वीकार कर लियार् जार्ये तो इसक अर्थ होगार् कि जार्ति क उद्भव तब हुआ होगार् जब ब्रार्ह्मणों ने रार्जनैतिक शक्ति प्रार्प्त की होगी। लेकिन हट्टन क मार्ननार् है कि जार्ति क उद्भव इतनी विलम्ब से नहीं हुआ होगार्।
  2. जार्ति के समार्न गहरी जड़ों वार्ली संस्थार् किसी प्रशार्सनिक उपार्य के द्वार्रार् थोपी नहीं जार् सकती है।

प्रजार्तियों सिद्धार्न्त

हरबर्ट रिज़ले इस सिद्धार्न्त के सबसे बड़े प्रतिपार्दक रहे हैं, यद्यपि इनके इस सिद्धार्न्त क अनुमोदन धुर्ये, मजूमदार्र, वैस्टरमाक और अन्य विद्वार्नों ने भी कियार् है। इस सिद्धार्न्त के अनुसार्र संस्कृतियों के संघर्ष तथार् प्रजार्तियों के सम्पर्क से भार्रत में जार्ति के निर्मार्ण की प्रक्रियार् सम्भव हुर्इ। विश्व इतिहार्स में जब कभी किन्हीं लोगों ने दूसरे लोगों को अपने आधीन कियार्, विजेतार्ओं ने परार्जित लोगों की स्त्रियों को न केवल अपनी रखैल यार् पत्नी बनार्यार्, अपितु अपनी लड़कियार्ँ उन्हें देने से मनार् कर दियार्। जब ये दो समूह (परार्जित व विजेतार्) एक ही प्रजार्ति के तथार् एक ही रंग आदि के होते हैं, तो इनमें पूर्ण सम्मिश्रण (amalgamation) हो जार्तार् है। लेकिन यदि वे अलग-अलग प्रजार्ति यार् रंग के हों तो विकास की दिशार् अलग रार्स्तों पर चलती है। इस प्रकार उच्च समूह की स्त्रियार्ँ और निम्न समूहों के पुरुषों के अनियमित मेल-जोल के कारण एक अर्द्ध-नस्ल (half-breed) क वर्ग बन जार्तार् है जिसके सदस्य केवल आपस में ही विवार्ह करते हैं तथार् हर दृष्टि से एक जार्ति के रूप में कार्य करते हैं।

भार्रत में भी प्रवार्सी आर्यों के संस्कारों के बार्रे में अपने ही विचार्र थे। वे मूल निवार्सियों को अपने से निकृष्ट समझते थे। इसके अतिरिक्त, आर्य लोग पितृवंशीय थे जबकि परार्जित मूल निवार्सी मार्तृवंशीय थे। उन्होंने आदिवार्सियों की लड़कियों से विवार्ह तो कियार् किन्तु अपनी लड़कियों को उन्हें नहीं दियार्। ऐसे विवार्हों से उत्पन्न बच्चों को समार्ज में निम्नतम स्थार्न प्रदार्न कियार् गयार् और उन्हें ‘‘चार्ण्डार्ल’’ कहार् गयार्। अत: अर्द्ध-नस्ल समूह की उत्पत्ति तथार् प्रजार्ति श्रेष्ठतार् की भार्वनार् परिणार्मत: जार्ति व्यवस्थार् के उत्पत्ति क कारण बन गये। रिज़ले के प्रजार्तीय सिद्धार्न्त क समर्थन अनेक विद्वार्नों ने कियार् है। धुर्ये के अनुसार्र मूल निवार्सियों की तुलनार् में अधिक सभ्य एवं गौर वर्ण (fair) होने के नार्ते आर्यों ने अपनार् अलगपन दर्शार्ने की चेष्टार् की है। सार्मार्जिक व्यवहार्र में एकांतिक तथार् संस्कारों की पवित्रतार् में उनक विश्वार्स मूल निवार्सियों से भिन्न थार्। वे मूल निवार्सियों के बार्रे में कठोर शब्द प्रयोग करते थे और उनके सार्थ सार्मार्जिक क्रियार्ओं में अनेक प्रतिबन्ध लगार्ते थे।

एन0के0 दत्त, डी0एन0 मजूमदार्र और वेस्टरमाक ने भी जार्ति व्यवस्थार् की उत्पत्ति संबंधी प्रजार्तीय सिद्धार्न्त क समर्थन कियार् है। वेस्टरमाक क कहनार् है कि आर्यों के आगमन से पूर्व भार्रत में श्यार्म वर्ण के लोग रहते थे। मूल निवार्सियों की आर्यों के प्रति विद्वेष की भार्वनार् तथार् आर्यों की उदार्सीनतार् जो मूल निवार्सियों के प्रति उनमें थी, दोनों ही तथ्यों ने आर्यों और अनायों में तीव्र भेद विकसित किये। इन्हीं भेदों के कारण जार्ति व्यवस्थार् क जन्म हुआ। हट्टन के विचार्र से भी प्रजार्ति जार्ति व्यवस्थार् की उत्पत्ति में एक आवश्यक कारक है। यदि रिज़ले के सिद्धार्न्त को स्वीकार कियार् जार्ये तब तो जार्ति व्यवस्थार् ने केवल भार्रत में होनी चार्हिए बल्कि उन सभी समार्जों में भी होनी चार्हिए जिन पर अन्य प्रजार्तीय समूहों ने विजय प्रार्प्त की। रिज़ले क स्वयं क मत भी यही है कि जार्ति प्रथार् भार्रत तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह तो स्पष्ट रूप से दक्षिण अमेरिका, कनार्डार्, मैक्सिको आदि में भी विद्यमार्न है।

व्यार्वसार्यिक सिद्धार्न्त

जार्ति प्रणार्ली की उत्पत्ति के विषय में इस सिद्धार्न्त के प्रतिपार्दक ने सफील्ड व उसके समर्थक डैन्जिल इब्बेटसन विश्वार्स करते हैं कि जार्ति की उत्पत्ति को प्रजार्ति यार् धर्म से कुछ लेनार्-देनार् नहीं है, बल्कि पेशार् ही जार्ति व्यवस्थार् की उत्पत्ति के लिए उत्तरदार्यी है। नेसफील्ड मार्नते हैं कि एक पेशार् की तकनीकी दक्षतार् वंशार्नुक्रम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दे दी जार्ती थी तथार् लोग एक ही पेशे को लम्बे समय तक अपनार्ते रहते थे और इस प्रकार ‘‘व्यार्वसार्यिक संघों’’ (occupational guilds) क अस्तित्व प्रार्रम्भ हुआ जिनको बार्द में ‘‘जार्ति’’ कहार् जार्ने लगार्। उनके अनुसार्र, जार्ति प्रथार् में संस्तरण (hierarchy) व्यवसार्यों से जुड़ी श्रेष्ठतार् व हीनतार् की भार्वनार् क नतीजार् है। उनक मार्ननार् है कि किसी भी जार्ति क उच्च यार् निम्न दर्जार् इस बार्त पर निर्भर करतार् है कि तत्संबंधी उद्योग जिसक जार्ति प्रतिनिधित्व करती है, वह संस्कृति के विकसित यार् पिछड़ेपन की अवस्थार् से संबद्ध है। वे धार्तु शिल्पियों (artisans) क उदार्हरण देते हैं जो टोकरी बनार्ने वार्लों और धार्तु क प्रयोग न करने वार्ले पेशों में लगे लोगों से स्वयं को श्रेष्ठ समझते हैं। यह समझार्ते हुए कि ब्रार्ह्मणों ने जार्तीय संस्तरण व्यवस्थार् में किस प्रकार श्रेष्ठ पद बनार् लियार्, वे कहते हैं कि ब्रार्ह्मण भी ‘‘पेशार्’’ की दृष्टि से संस्कारों, बलि देने, यज्ञ, व जप में विशिष्टतार् लिए हुए थे। क्योंकि उस समार्ज में सार्मार्जिक जीवन में यज्ञ और बलि क बड़ार् महत्व थार्, इसलिये ब्रार्ह्मण समार्ज में महत्वपूर्ण और सम्मार्ननीय बन गए। इस प्रकार ब्रार्ह्मण जार्ति व्यवस्थार् में प्रथम थे और इसी मॉडल पर अन्य शेष जार्तियार्ं बनीं। नेसफील्ड ने जार्ति उत्पत्ति के दो कारण दिए हैं: पेशार् यार् व्यवसार्य, और जनजार्ति क संगठन।

नेसफील्ड क समर्थन करते हुए डेन्जिल इब्बेटसन ने भी जार्ति की उत्पत्ति को तीन कारकों क परिणार्म मार्नार् है: (i) जनजार्ति (ii) संघ (guilds) (iii) धर्म। वह कहते हैं कि जनजार्तियार्ँ पेशेवर संघों के रूप में विकसित हुर्इ और वे (संघ) धामिक रूप से कार्य करने लगे और इस प्रकार सार्मार्जिक विकास की प्रक्रियार् में उनक जार्तियों के रूप में विकास हुआ। अनेक विद्वार्नों ने नेसफील्ड और इब्बेटसन के सिद्धार्न्तों की आलोचनार् की है। सेनाट (Senart) ने एक प्रश्न रखार् है कि चूंकि अनेक जार्तियार्ं एक से अधिक पेशों में लगी हैं, वे अपने नार्म किस प्रकार रखती हैं? क्यार् वे अपने प्रमुख (dominant) व्यवसार्य पर नार्म रखती है? सेनाट दार्वार् करते हैं कि रूस में अनेक गार्ँव ऐसे हैं जहार्ं समूची जनसंख्यार् एक ही पेशे में लगी होती है; जैसे, जूते बनार्ने में यार् वर्तन बनार्ने, आदि में। ये गार्ँव केवल समूहों क एकत्रीकरण नहीं हैं जो कि एक ही समुदार्य के रूप में उदित हुए बल्कि ऐसे समुदार्य के रूप में हैं जो केवल एक ही उद्योग में लगे हैं। व्यवसार्य समूहीकरण क कारण ही है, अपितु समूहीकरण ही पेशेवर समुदार्य के लिए उत्तरदार्यी होतार् है। तब फिर भार्रत में ऐसार् क्यों नहीं है?

डी0एन0 मजूमदार्र (1952:292) ने भी नेसफील्ड के विचार्रों की आलोचनार् की है, विशेषकर जार्तीय संस्तरण की, जिसमें पेशों के आधार्र पर श्रेष्ठतार् व हीनतार् की भार्वनार् क विकास बतार्यार् गयार् है। उनकी मार्न्यतार् है कि जार्तियों की प्रस्थिति पेशे की श्रेष्ठतार् व हीनतार् पर निर्भर नहीं करती है, बल्कि रक्त की शुद्धतार् की मार्त्रार् और समूहों के एकाकीपन की सीमार् पर निर्भर करती है। हट्टन भी विश्वार्स करते हैं कि नेसफील्ड क व्यार्वसार्यिक सिद्धार्न्त विभिन्न कृषक जार्तियों के सार्मार्जिक स्तर की व्यार्ख्यार् नहीं करतार् है।

केतकर क सिद्धार्न्त

केतकर ने जार्ति की उत्पत्ति प्रार्रम्भिक जनजार्तियों से तथार् मनुष्यों की मनोवैज्ञार्निक पक्षपार्ती प्रवृत्तियों (prejudicial tendencies) से मार्नी है। उनक विश्वार्स है कि जार्तियार्ं विकसित जनजार्तियार्ं यार् परिवर्तित (converted) वर्ग हैं। अनेक जनजार्तियार्ं जो भार्रत के विभिन्न भार्गों में रहती थीं, विभिन्न इकार्इयों के रूप में मौजूद थीं और अन्तर्विवार्ह प्रथार् के चलन में आने के बार्द वे सब यूरोपियन जनजार्तियों की तरह एक दूसरे से नहीं मिलीं। इनमें से अनेक जनजार्तियार्ं आपस में संघर्षरत रहीं क्योंकि उनके सरदार्रों ने यार् तो सीमार् के प्रश्न पर संघर्ष कियार् थार् यार् फिर एक कबीले के किसी व्यक्ति ने दूसरे कबीले की किसी लड़की क अपहरण कर लियार् थार्। इन संघर्षों के कारण लोग दूसरी जनजार्तियों में विवार्ह की अवहेलनार् करते रहे और हर प्रकार से अपनी ही जनजार्ति के सदस्यों के बीच अन्तर्क्रियार् करते रहे। केतकर आगे और मार्नते हैं कि ‘‘जार्ति व्यवस्थार् की उत्पत्ति’’ के विषय में बार्त करने की अपेक्षार्, हमें ‘‘जार्ति के विविध लक्षणों की उत्पत्ति’’ के विषय में बार्त करनी चार्हिए क्योंकि प्रत्येक लक्षण के पीछे उसकी उत्पत्ति क एक इतिहार्स है न कि पूरी जार्ति व्यवस्थार् का, क्योंकि जार्ति व्यवस्थार् के विभिन्न लक्षणों के विकास की प्रक्रियार् में 3000 वर्ष क समय लगार्। इस प्रकार केतकर के अनुसार्र ‘‘जार्ति की उत्पत्ति’’ कथन क कोर्इ अर्थ नहीं है, यद्यपि अन्तर्विवार्ह की अपनी उत्पत्ति है, वंशार्नुगत पेशे और खार्नपार्ने के प्रतिबन्धों की अपनी उत्पत्ति क इतिहार्स है, पुरोहितों की प्रभुतार् (ascendency) और उनकी प्रथार्भार्व की अपनी उत्पत्ति है, तथार् पवित्रतार् और अपवित्रतार् की भी अपनी उत्पत्ति है। इस प्रकार इनमें से प्रत्येक घटनार् (लक्षण) की उत्पत्ति हो सकती है, लेकिन जब तक ‘‘जार्तियार्ं’’ जैसे शब्द सार्मूहिक अभिव्यक्ति के रूप में रहेंगे तब तक ‘‘जार्ति व्यवस्थार्’’ की उत्पत्ति के विषय में विचार्र भी नहीं कियार् जार् सकतार्।

केतकर के सिद्धार्न्त की आलोचनार्त्मक मूल्यार्ंकन की आवश्यकतार् है। उनक मुख्य विचार्र कि जार्तियों की उत्पत्ति जनजार्तियों से हुर्इ, रार्इस के टोटमवार्द सिद्धार्न्त क स्वार्भार्विक परिणार्म मार्लूम पड़तार् है जिसके अनुसार्र जार्ति की उत्पत्ति टोटम तथार् निषेधों (taboos) में विश्वार्स के कारण हुर्इ। बी0एस0 गुहार् ने भी रार्इस के सिद्धार्न्त के समार्न ही सिद्धार्न्त क प्रतिपार्दन कियार्। बनर्जी ने भी बतार्यार् है कि जार्ति की उत्पत्ति आदिकाल के जार्दू-टोनों में विश्वार्स के कारण हुर्इ। जनजार्तियों से जार्तियों की उत्पत्ति के सिद्धार्न्त को स्वीकार करने क अर्थ होगार् उस तथ्य को स्वीकार करनार् कि जार्ति व्यवस्थार् क विकास आर्यों द्वार्रार् न होकर मूल निवार्सी द्रविड़ों द्वार्रार् हुआ।

सेनाट क सिद्धार्न्त

सेनाट ने जार्ति व्यवस्थार् की उत्पत्ति क स्रोत आर्यों को मार्नार् है। उनकी मार्न्यतार् है कि जार्ति व्यवस्थार् के लक्षण आर्य प्रजार्ति की सभी शार्खार्ओं में समार्न रूप से उपयोग और परम्परार्ओं क अंग हैं और ये समार्न लक्षण हैं: व्यक्तिगत जीवन, विवार्ह-भोजन, तथार् संस्कारों को नियमित करने क क्षेत्रार्धिकार, कुछ आरार्धनार् के व्यवहार्र तथार् निगमित संगठन आदि। भार्रतीय, यूनार्नी और रोमवार्सी सभी तो आर्य हैं और उनकी सभ्यतार्एं प्रार्चीनतम हैं। सेनाट इन तीनों में कुछ समार्नतार्एं पार्ते हैं। जिस प्रकार भार्रत में तीन प्रमुख समूह है परिवार्र, गोत्र और जार्ति उसी प्रकार जेन (gen), क्यूरियार् (Curia) और जनजार्ति (tribe) रोम में, तथार् परिवार्र, फ्रत्रिय (Pharatria) और फार्इल (Phyle) यूनार्न में हैं। जिस प्रकार गोत्र भार्रत में बर्हिविवार्ही समूह है उसी प्रकार रोम में जेन तथार् यूनार्न में फ्रत्रिय भी अपने ही समूह में विवार्ह संबंध सीमित रखते हैं। भार्रतीय ब्रार्ह्मण और रोमन पार्दरी दोनों ही को अनुलोम (Hypergamous) विवार्ह के अधिकार हैं। उसी प्रकार, जिस तरह भार्रत में विवार्ह के बार्द स्त्री के गोत्र क परिवर्तन उसके पति के गोत्र में हो जार्तार् है उसी तरह क रिवार्ज रोम में भी प्रचलित है। भार्रत के ‘‘हुक्क पार्नी बन्द’’ (बहिष्कार) रिवार्ज की तुलनार् रोम में एक रिवार्ज (Interdict acquae igni) से की जार् सकती है। जैसे भार्रत में जार्ति पंचार्यतें हैं और सरपंच उसक मुखियार् और सबसे अधिक शक्तिमार्न नेतार् होतार् है, उसी प्रकार रोम और यूनार्न में भी इसी प्रकार की शक्तिवार्न समितियार्ं होती हैं। इस तुलनार् के आधार्र पर सेनाट मार्नते हैं कि जार्ति, प्रार्चीन आर्यों की संस्थार्ओं की सार्मार्न्य विकसित रूप है। भार्रत में, तथार्पि विशेष दशार्ओं के कारण, जार्ति ने विशेष रूप धार्रण कियार् है।

लेकिन दैहलमन तथार् नरमदेश्वर प्रसार्द जैसे विद्वार्नों ने सेनाट के सिद्धार्न्त की आलोचनार् की है। नरमदेश्वर प्रसार्द की मार्न्यतार् है कि सेनाट से सहमति कठिन है क्योंकि उनके द्वार्रार् दिए गए ऐतिहार्सिक समार्नार्न्तर सार्क्ष्य उत्पत्ति की व्यार्ख्यार् नहीं करते हैं। उनक कहनार् है कि प्रार्चीन भार्रत में जार्ति व्यवस्थार् थी ही नहीं जैसार् कि सेनाट ने बतार्यार्, बल्कि यह तो ब्रार्ह्मण युग में विकसित हुर्इ।

हट्टन क ‘‘मार्नार्’’ सिद्धार्न्त

हट्टन ने आदिम अवधार्रणार् (conception) ‘‘मार्नार्’’ पर जार्तियों की उत्पत्ति के लिए जोर डार्लार् है, जिसक समर्थन शरद चन्द्र रार्य, रार्इस तथार् स्माट जैसे विद्वार्नों ने कियार् है। हट्टन के अनुसार्र ‘‘मार्नार्’’ एक अवैयक्तिक, अलौकिक तथार् अदृश्य शक्ति है जो व्यक्तियों, वस्तुओं व स्थार्नों में मिलती है। यह विश्वार्स कियार् जार्तार् है कि ‘‘मार्नार्’’ को व्यक्तियों को हार्नि पहुंचार्ने की शक्ति है। जहार्ं पर भी ‘‘मार्नार्’’ में विश्वार्स प्रचलित है वहार्ँ एक संरक्षक (protective) उपार्य के रूप में ‘‘निषेध’’ में भी विश्वार्स मिलतार् है। अत: एक जनजार्ति के सदस्यों को दूसरी जनजार्तियों के ‘‘मार्नार्’’ से बचार्ने के लिए उन पर खार्न-पार्न, अन्तर्विवार्ह और पार्रस्परिक अन्त:क्रियार् संबंधी निषेध लगार्ये गये थे। हट्टन क कहनार् है कि जनजार्तियार्ं अपरिचितों के खार्ने को खतरनार्क मार्नती हैं। अत: दूसरों के सार्थ सहभोज पर प्रतिबन्ध तथार् सम्पर्क रखने पर रोक इस विश्वार्स पर आधार्रित है कि ये (सहभोज और सम्पर्क) अपरिचितों के खतरनार्क ‘‘आत्मार्-पदाथ’’ (soul-matter) से संदूषित (infected) हो सकते हैं।

सहभोज के निषेधों की तरह ही अन्य निषेध भी लोगों को ‘‘मार्नार्’’ से बचार्ने के लिए लगार्ए गए। हट्टन मार्ननार् है कि ‘‘मार्नार्’’ सिद्धार्न्त अन्य धर्मों में भी मार्नार् जार्तार् है। बौद्धों में यह ‘‘इधि’’ (Iddhi), मुसलमार्नों में ‘‘कुदरत’’ और हिन्दुओं में ‘‘शक्ति’’ नार्म से यह परिचित है। तथार्पि ऐसार् लगतार् है कि ऋग्वैदिक आक्रमणकारियों के रूप में जब आर्य भार्रत में आये तो उनमें जो श्रेणीकृत (graded) सार्मार्जिक वर्ग थे उनके सार्मार्जिक और रार्जनैतिक प्रभार्व के कारण ही हमार्रे उस समार्ज में सार्मार्जिक प्रार्थमिकतार् क सिद्धार्न्त स्थार्पित हुआ जो पहले से ही निषेधों के कारण पृथक्कृत (isolated) समूहों में विभार्जित थार्। डी0एन0 मजूमदार्र ने हट्टन की ‘‘मार्नार्’’ के आधार्र पर जार्ति की व्यार्ख्यार् की आलोचनार् की है। वे मार्नते हैं कि दूसरे समार्जों में भी जनजार्तियार्ं ‘‘मार्नार्’’ में विश्वार्स करतीं हैं, लेकिन हमें वहार्ँ जार्ति व्यवस्थार् नहीं मिलती। भार्रत में यह (जार्ति व्यवस्थार्) प्रजार्तीय संघर्षों एवं भेदों क फल है।

अन्त में जार्ति की उत्पत्ति के संबंध में यह कहार् जार् सकतार् है कि ‘‘विविध कारकों’’ वार्ले सिद्धार्न्त को स्वीकार करते हुए यह मार्ननार् अनुचित नहीं होगार् कि भार्रत में जार्ति व्यवस्थार् की उत्पत्ति के कारकों में प्रमुख इस प्रकार हैं प्रजार्तीय-भिन्नतार्ओं के कारण आर्यों की मूल निवार्सियों से श्रेष्ठतार् की भार्वनार्, ब्रार्ह्मणों क एकाधिकार पूर्ण पुरोहितपन, पेशों की भिन्नतार्, और संस्कारों की पवित्रतार् और अपवित्रतार् से सम्बद्ध धामिक विचार्र जो कि आरम्भ में शूद्रों (मूल निवार्सियों) पर लार्गू किये गये थे और बार्द में कुछ पेशों के प्रति वैचार्रिक अपवित्रतार् संबंधी विचार्र के कारण अन्य समूहों पर भी लार्गू किये गये। इस संबंध में यह भी स्मरणीय है कि जार्ति व्यवस्थार् के विकास में अनेक कारकों क योग रहार् है। समूहों की विखण्डन की प्रवृत्ति, एवं एकतार् की भार्वनार् तथार् प्रत्येक जार्ति में ‘‘हम भार्व’’ को कुछ निम्न सार्मार्जिक-रार्जनैतिक कारकों द्वार्रार् प्रश्रय मिलार्; जैसे, रार्ज्य द्वार्रार् कठोर सैनिक नियंत्रण क अभार्व, कानून और प्रथार् संबंधी समार्न स्तर को लार्गू करने के लिए शार्सकों की अनिच्छार्, विविध समूहों की भिन्न प्रथार्ओं को वैध मार्नने के लिए उन (शार्सकों) की तत्परतार्, तथार् घटनार्ओं को अपने आप समार्योजन करने के लिए समय देने की उनकी प्रवृत्ति। इन सभी कारकों ने कुछ भिन्नतार्ओं पर आधार्रित जार्ति के निर्मार्ण को प्रोत्सार्हित कियार्।

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