जर्मनी क एकीकरण
फ्रार्सं की क्रार्ंति द्वार्रार् उत्पन्न नवीन विचार्रों से जर्मनी प्रभार्वित हुआ थार्। नेपोलियन ने अपनी विजयों द्वार्रार् विभिन्न जर्मन-रार्ज्यों को रार्इर्न -संघ के अंतर्गत संगठित कियार्, जिससे जर्मन-रार्ज्यों को एक सार्थ रहने क एहसार्स हुआ। इससे जर्मनी में एकतार् की भार्वनार् क प्रसार्र हुआ। यही कारण थार् कि जर्मन-रार्ज्यों ने वियनार्-कांगे्रस के समक्ष उन्हें एक सूत्र में संगठित करने की पेशकश की, पर उस पर कोई ध्यार्न नहीं दियार् गयार्।

वियनार् कांग्रेस द्वार्रार् जमर्न -रार्ज्यों की जो नवीन व्यवस्थार् की गयी, उसके अनुसार्र उन्हें शिथिल संघ के रूप में संगठित कियार् गयार् और उसक अध्यक्ष ऑस्ट्रियार् को बनार्यार् गयार्। रार्जवंशो के हितों को ध्यार्न में रखते हुए विविध जर्मन रार्ज्यों क पुनरूद्धार्र कियार् गयार्। इन रार्ज्यों के लिए एक संघीय सभार् क गठन कियार् गयार्, जिसक अधिवेशन फ्रेंकफर्ट में होतार् थार्। इसके सदस्य जनतार् द्वार्रार् निर्वार्चित न होकर विभिन्न रार्ज्यों के रार्जार्ओं द्वार्रार् मनोनीत किए जार्ते थे। ये शार्सक नवीन विचार्रों के विरोधी थे और रार्ष्ट्रीय एकतार् की बार्त को नार्पसंद करते थे किन्तु जमर्न रार्ज्यों की जनतार् में रार्ष्ट्रीयतार् और स्वतंत्रतार् की भार्वनार् विद्यमार्न थी। यह नवीन व्यवस्थार् इस प्रकार थी कि वहार्ँ आस्ट्रियार् क वर्चस्व विद्यमार्न थार्। इस जर्मन क्षेत्र में लगभग 39 रार्ज्य थे जिनक एक संघ बनार्यार् गयार् थार्।

जर्मनी के विभिन्न रार्ज्यों में चुंगीकर के अलग-अलग नियम थे, जिनसे वहार्ं के व्यार्पार्रिक विकास में बड़ी अड़चने आती थीं। इस बार्धार् को दूर करने के लिए जर्मन रार्ज्यों ने मिलकर चुङ्गी संघ क निर्मार्ण कियार्। यह एक प्रकार क व्यार्पार्रिक संघ थार्, जिसक अधिवेशन प्रतिवर्ष होतार् थार्। इस संघ क निर्णय सर्वसम्मत होतार् थार्। अब सार्रे जर्मन रार्ज्यों में एक ही प्रकार क सीमार् शुल्क लार्गू कर दियार् गयार्। इस व्यवस्थार् से जर्मनी के व्यार्पार्र क विकास हुआ, सार्थ ही इसने वहार्ँ एकतार् की भार्वनार् क सूत्रपार्त भी कियार्। इस प्रकार इस आर्थिक एकीकरण से रार्जनीतिक एकतार् की भार्वनार् को गति प्रार्प्त हुई। वार्स्तव में, जर्मन रार्ज्यों के एकीकरण की दिशार् में यह पहलार् महत्वपपूर्णार् कदम थार्।

फ्रार्ंस की क्रार्न्तियों क प्रभार्व

जर्मनी की जनतार् में रार्ष्ट्रीय भार्वनार् कार्य कर रही थी। देश के अंदर अनेक गुप्त समितियार्ँ निर्मित हुई थीं। ये समितियार्ँ नवीन विचार्रों क प्रसार्र कर रही थीं। यही कारण थार् कि 1830 ई. और 1848 ई. में फ्रार्सं में होने वार्ली क्रार्ंतियों क प्रभार्व वहार्ँ भी पड़ार् और वहार्ँ की जनतार् ने भी विद्रार्हे कर दियार्। यद्यपि ये क्रार्ंतियार्ँ सफल न हुइर् तथार्पि इससे देश की जनतार् में रार्जनीतिक चते नार् क आविर्भार्व हुआ।

1860 ई. में जब इटली की रार्ष्ट्रीय एकतार् क कार्य काफी कुछ पूरार् हो गयार् तब जमर्न जनतार् में भी आशार् क संचार्र हुआ और वह भी एकीकरण की दिशार् में गतिशील हुई। इटली के एकीकरण क कार्य पीडमार्ण्ट के रार्जार् के नेतृत्व में हो रहार् थार्। इसी तरह जर्मन देशभक्तों ने प्रशार् के नेतृत्व में जर्मनी के एकीकरण के कार्य को संपन्न करने क निशचय कियार्। इस समय प्रशार् क शार्सक विलियम प्रथम तथार् चार्ंसलर बिस्माक थार् किन्तु इन जर्मन देशभक्तों के समक्ष दो प्रमुख समस्यार्यें थीं-

  1. आस्ट्रियार् के प्रभुत्व से छुटकारार् पार्नार्। 
  2. जर्मन-रार्ज्यों को प्रशार् के नेतृत्व में संगठित करनार्।

बिस्माक क उदय

ऑटो एडवर्ड लियोपोल्ड बिस्माक क जन्म 1815 ई. में ब्रेडनबगर् के एक कुलीन परिवार्र में हुआ थार्। बिस्माक की शिक्षार् बर्लिन में हुई थी। 1847 ई. में ही वह प्रशार् की प्रतिनिधि-सभार् क सदस्य चनु ार् गयार्। वह जर्मन रार्ज्यों की संसद में प्रशार् क प्रतिनिधित्व करतार् थार्। वह नवीन विचार्रों क प्रबल विरोधी थार्। 1859 ई. में वह रूस में जर्मनी के रार्जदूत के रूप में नियुक्त हुआ। 1862 ई. में वह पेिरस क रार्जदूत बनार्कर भेजार् गयार्। इन पदों पर रहकर वह अनेक लोगों के संपर्क में आयार्। उसे यूरोप की रार्जनीतिक स्थिति को भी समझने क अवसर मिलार्। 1862 ई. में प्रशार् के शार्सक विलियम प्रथम ने उसे देश क चार्ँसलर (प्रधार्न मंत्री) नियुक्त कियार्।

बिस्माक ‘रक्त और लोहे’ की नीति क समर्थक थार्। उसकी रुचि लोकतंत्र ओर संसदीय पद्धति में नहीं थी। वह सेनार् और रार्जनीति के कार्य में विशेश रुचि रखतार् थार्। इन्हीं पर आश्रित हो, वह अपने उद्दशे यों को प्रार्प्त करनार् चार्हतार् थार्। वह प्रशार् को सैनिक दृष्टि से मजबूत कर यूरोप की रार्जनीति में उसके वर्चस्व को कायम करनार् चार्हतार् थार्। वह आस्ट्रियार् को जर्मन संघ से निकाल बार्हर कर प्रशार् के नेतृत्व में जर्मनी क एकीकरण करनार् चार्हतार् थार्। वह सभार्ओं और भार्शणों में विशवार्स नहीं करतार् थार्। वह सेनार् और शस्त्र द्वार्रार् देश की समस्यार्ओं क सुलझार्नार् चार्हतार् थार्। वह अवैधार्निक कार्य करने से भी नहीं हिचकतार् थार्।

बिस्माक और जर्मनी क एकीकरण

प्रशार् की सैनिक शक्ति में वृद्धि कर तथार् कूटनीति क सहार्रार् लेकर उसने जर्मन रार्ज्यों के एकीकरण के कार्य को पूरार् कियार्। इस कार्य को पूरार् करने के लिए उसने तीन प्रमुख युद्ध लड़े। इन सभी युद्धों में सफल होकर उसने जर्मन-रार्ज्यों के एकीकरण के कार्य को पूरार् कियार्। इससे यूरोपीय इतिहार्स क स्वरूप ही बदल गयार्।

डेनमाक से युद्ध (1864 ई.)

सर्वप्रथम बिस्माक ने अपनी शक्ति क प्रहार्र डेनमाक के रार्ज्य पर कियार्। जर्मनी और डेनमाक के बीच दो प्रदेश विद्यमार्न थे, जिनके नार्म शलेसविग और हॉलस्टीन थे। ये दोनों प्रदेश सदियों से डेनमाक के अधिकार में थे, पर इसके भार्ग नहीं थे। हॉलस्टीन की जनतार् जर्मन जार्ति की थी, जबकि शलेसविग में आधे जर्मन और आधे डेन थे।

19वीं सदी में अन्य देशों की तरह डेनमाक में भी रार्ष्ट्रीयतार् की लहर फैली, जिससे प्रभार्वित होकर डेन देशभक्तों ने देश के एकीकरण क प्रयत्न कियार्। वे चार्हते थे कि उक्त दोनों रार्ज्यों को डेनमाक में शार्मिल कर उसकी शक्ति को सुदृढ़ कर लियार् जार्ए। फलस्वरूप 1863 ई. में डेनमाक के शार्सक क्रिश्चियन दशम् ने उक्त प्रदेशों को अपने रार्ज्य में शार्मिल करने की घोषणार् कर दी। उसक यह कायर् 1852 ई. में संपन्न लंदन समझौते के विरूद्ध थार्, इसीलिए जमर्न रार्ज्यों ने इसक विरोध कियार्। उन्होंने यह मार्ंग की कि इन प्रदेशो को डेनमाक के अधिकार से मुक्त कियार् जार्ए। प्रशार् ने भी डेनमाक की इस नीति क विरोध कियार्। बिस्माक ने सोचार् कि डेनमाक के खिलार्फ युद्ध करने क यह अनुकूल अवसर है। वह इन प्रदेशों पर प्रशार् क अधिकार स्थार्पित करने क इच्छुक थार्। इस कार्य को वह अकेले न कर आस्ट्रियार् के सहयोग से पूरार् करनार् चार्हतार् थार्, तार्कि प्रशार् के खिलार्फ कोई विपरीत प्रतिक्रियार् न हो। आस्ट्रियार् ने भी इस कार्य में प्रशार् क सहयोग करनार् उचित समझार्। इसक कारण यह थार् कि यदि प्रशार् इस मार्मले में अकेले हस्तक्षेप करतार् तो जर्मनी में ऑस्ट्रियार् क प्रभार्व कम हो जार्तार्। इसके अतिरिक्त वह 1852 ई. के लंदन समझौते क पूर्ण रूप से पार्लन करनार् चार्हतार् थार्। इस प्रकार प्रशार् और ऑस्ट्रियार् दोनों ने सम्मिलित रूप से डेनमाक के खिलार्फ सैनिक कार्यवार्ही करने क निशचय कियार्। फलस्वरूप 1864 ई. में उन्होंने डेनमाक पर आक्रमण कर दियार्। डेनमाक परार्जित हो गयार् और उसने आक्रमणकारियों के सार्थ एक समझौतार् कियार्। इसके अनुसार्र उसे शलेसविग और हॉलस्टील के सार्थ-सार्थ लार्यनबुर्ग के अधिकार से भी वंचित होनार् पड़ार्।

गेस्टीन क समझौतार्

इस समझौते के अनुसार्र शलेसविग और हॉलस्टीन के प्रदेश तो डेनमाक से ले लिये गए, पर इस लूट के मार्ल के बंटवार्रे के संबंध में प्रशार् और ऑस्ट्रियार् में मतभेद हो गयार्। इस प्रशन को लेकर दोनों के बीच काफी कटुतार् उत्पन्न हो गयी। ऑस्ट्रियार् अपनी आंतरिक स्थिति के कारण युद्ध करने के पक्ष में नहीं थार् जबकि प्रशार् इस प्रसंग के मार्ध्यम से ऑस्ट्रियार् को जर्मन रार्ज्य संघ में कमजोर करनार् चार्हतार् थार्। अंतत: दोनों के बीच 14 अगस्त 1865 ई. को गेस्टीन नार्मक स्थार्न पर समझौतार् हो गयार्, जो ‘गेस्टीन-समझौतार्’ के नार्म से जार्नार् जार्तार् है। यह समझौतार् इस प्रकार थार्-

  1.  शलेसविंग प्रशियार् को दियार् गयार्। 
  2. हॉलस्टीन पर आस्ट्रियार् क अधिकार मार्न लियार् गयार्। 
  3. लार्यनवर्ग क प्रदेश प्रशार् ने खरीद लियार्, जिसक मूल्य ऑस्ट्रियार् को दियार् गयार्।

यह समझौतार् बिस्माक की कूटनीतिक विजय थी। वह इसे एक अस्थार्यी समझौतार् मार्नतार् थार्, जिसकी अवहेलनार् कभी भी की जार् सकती थी। अत: आगे चलकर इसके खिलार्फ प्रतिक्रियार् होनार् स्वार्भार्विक थी।

ऑस्ट्रो-प्रशियन युद्ध

वार्स्तव में बिस्माक की इच्छार् ऑस्ट्रियार् को युद्ध में परार्स्त कर उसे जर्मन संघ से बहिश्कृत करनार् थार्। इस दिशार् में उसने तैयार्री करनी आरंभ कर दी थी पर यह कार्य सरल न थार्, क्योंकि ऑस्ट्रियार् यूरोप क एक महत्वपूर्ण रार्ज्य थार् और उस पर आक्रमण करने से अंतर्रार्श्ट्रीय संबंधों पर असर पड़ सकतार् थार्। अत: ऑस्ट्रियार् के खिलार्फ सैनिक कार्यवार्ही करने के पूर्व बिस्माक अन्य रार्ज्यों की मंशार् जार्न लेनार् चार्हतार् थार्। इस प्रकार युद्ध के पूर्व उसने कूटनीतिक चार्ल द्वार्रार् अन्य रार्ज्यों की संभार्वित प्रतिक्रियार् को समझ लेनार् आवशयक समझार्। गे्रटब्रिटेन के इस युद्ध में हस्तक्षेप करने की संभार्वनार् न थी, क्योंकि वह एकाकीपन की नीति पर चल रहार् थार्। रूस बिस्माक क मित्र थार्। उसने फ्रार्ंस को लार्लच देकर युद्ध में तटस्थ रहने क आशवार्सन प्रार्प्त कर लियार्। नेपोलियन तृतीय ने तटस्थ रहनार् रार्ष्ट्रीय हित में उचित समझार्। उसने यह सोचार् कि ऑस्ट्रियार् और प्रशार् के युद्धों से उनकी शक्ति क्षीण होगी और उस स्थिति से फ्रार्ंस को विकास करने क अवसर प्रार्प्त होगार्। 1866 ई. में प्रशार् और इटली के बीच संधि हो गयी, जिसके अनुसार्र इटली ने युद्ध में प्रशार् क सार्थ देने क आशवार्सन दियार्। इसके बदले बिस्माक ने युद्ध में सफल होने के पशचार्त इटली को वेनेशियार् देने क वचन दियार्। इस संधि की सूचनार् पार्कर ऑस्ट्रियार् बड़ार् चिंतित हुआ। अब ऑस्ट्रियार् और प्रशार् की सैनिक तैयार्रियार्ँ तीव्र गति से चलने लगीं। इस प्रकार प्रशार् और ऑस्ट्रियार् के बीच युद्ध की स्थिति निर्मित हो गयी। अब युद्ध के लिए केवल अवसर ढढूंने की आवश्यकतार् थी। ॉलेसविग और हॉलस्टीन संबधी समझौते में युद्ध के कारणों को ढूँढ़ निकालनार् कोई कठिन कार्य न थार्। 1866 ई. में प्रशार् को यह अवसर प्रार्प्त हुआ और उसने ऑस्ट्रियार् के खिलार्फ युद्ध घोशित कर दियार्। इटली प्रशार् क सार्थ दे रहार् थार्। यह युद्ध सेडोवार् के मैदार्न में दोनो के बीच सार्त सप्तार्ह तक चलार्, जिसमें ऑस्ट्रियार् परार्जित हुआ। इस युद्ध की समार्प्ति प्रार्ग की संधि द्वार्रार् हुई, जिसकी शर्तें इस प्रकार थीं-

  1. ऑस्ट्रियार् के नेतृत्व में जो जर्मन-संघ बनार् थार्, वह समार्प्त कर दियार् गयार्।
  2.  शलेसविग और हॉलस्टीन प्रशार् को दे दिये गये। 
  3. दक्षिण के जर्मन-रार्ज्यों की स्वतंत्रतार् को मार्न लियार् गयार्। 
  4. वेनेशियार् क प्रदेश इटली को दे दियार् गयार्। 
  5. ऑस्ट्रियार् को युद्ध क हरजार्नार् देनार् पड़ार्।

जर्मन रार्जसंघ की स्थार्पनार्

इस युद्ध के फलस्वरूप जमर्न -रार्ज्यों से ऑस्ट्रियार् क वर्चस्व समार्प्त हो गयार्। अब वहार्ँ प्रशार् क प्रभार्व कायम हो गयार्। इस युद्ध के बार्द प्रशार् को अनेक नवीन प्रदेश मिले, जिसके कारण अब वह यूरोप क शक्तिशार्ली रार्ज्य मार्नार् जार्ने लगार्। अब बिस्माक भी यूरोप में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति बन गयार्। प्रशार् की इस सफलतार् ने परोक्ष रूप से फ्रार्ंस की भार्वी परार्जय क संकेत दियार्। इस प्रकार इस युद्ध से प्रशार् को अनेक लार्भ हुए।

होनेवर, हेसकेसल, नार्सो और फ्रेंकफर्ट प्रशार् के रार्ज्य में शार्मिल कर लिये गये। इसके बार्द उसने जमर्न -रार्ज्यों को नये सिरे से अपने नेतृत्व में संगठित करने क प्रयार्स कियार्। किन्तु दक्षिण-रार्ज्यों के विरोध के कारण ऐसार् करनार् संभव नहीं हुआ। ऐसी स्थिति में यह उचित समझार् गयार् कि चार्र दक्षिण जमर्न रार्ज्यों को छोड़कर (बवेिरयार्, बटु र्मवर्ग, बार्देन और हेसं ) शेश जमर्न -रार्ज्यों क संगठन प्रशार् के नेतृत्व में बनार् लियार् जार्ए। बिस्माक ने ऐसार् ही कियार्। इस प्रकार उसने उत्तरी जमर्न रार्ज्यों क गठन कर लियार्। इसमें 21 जर्मन रार्ज्य शार्मिल थे। इस नवीन संघ क अध्यक्ष प्रशार् को बनार्यार् गयार्। बिस्माक इस संघ क प्रथम चार्ँसलर नियुक्त हुआ। वह वहार्ँ गठित होने वार्ली संघीय परिशद क अध्यक्ष भी नियुक्त कियार् गयार्। इस परिशद में कुल 43 सदस्य थे, जिनमें 17 सदस्य प्रशार् के थे। संघ के अध्यक्ष के रूप में प्रशार् के रार्जार् को अनेक महत्वपूर्ण कार्यों जसै े युद्ध एवं संधि को संपार्दित करने क अधिकार थार्। दूसरी सभार् क नार्म लोकसभार् थार्, जिसके सदस्य वयस्क मतार्धिकार के अनुसार्र जनतार् द्वार्रार् चुने जार्ते थे।

इस प्रकार बिस्माक जर्मनी के एकीकरण की दिशार् में काफी आगे बढ़ गयार्। अब उसके लिए केवल अंतिम कार्य करनार् ही शेश थार्।

फ्रेंको पर्शियन युद्ध

जर्मनी के एकीकरण के लिए बिस्माक ने फ्रार्सं से अंतिम युद्ध कियार्, क्योंिक उसे परार्जित किये बिनार् दक्षिण के चार्र जर्मन रार्ज्यों को जर्मन संघ में शार्मिल करनार् असंभव थार्। उधर फ्रार्सं ऑस्ट्रियार् के विरूद्ध प्रशार् की विजय से अपने को अपमार्नित महसूस कर रहार् थार्। उसक विचार्र थार् कि दोनों के बीच चलने वार्लार् युद्ध दीघर्क ार्लीन होगार् किन्तु आशार् के विपरीत यह युद्ध जल्दी समार्प्त हो गयार्, जिसमें प्रशार् को सफलतार् मिली।

फ्रार्ंस के रार्श्ट्रपति नेपोलियन तृतीय ने अपनी गिरती हुई प्रतिश्ठार् को पुन: जीवित करने के लिए फ्रार्सं की सीमार् को रार्इन-नदी तक विस्तृत करने क विचार्र कियार्, किन्तु वह इस कार्य में सफल नहीं हो सका। बिस्माक अपनी कूटनीतिक चार्लों द्वार्रार् फ्रार्ंस की हर इच्छार् को असफल करतार् रहार्। नेपार्लियन ने हॉलैण्ड से लक्जेमबर्ग लेनार् चार्हार्, पर बिस्माक के विरोध के कारण वह संभव न हो सका। इसमें दोनों के बीच कटुतार् की भार्वनार् निर्मित हो गयी। फ्रार्ंस समझतार् थार् कि प्रशार् के उत्कर्श के कारण उसकी स्थिति नार्जुक हो गयी है। उधर प्रशार् भी फ्रार्ंस को अपने माग क बार्धक मार्नतार् थार्। फलस्वरूप दोनो देशों के अखबार्र एक दूसरे के खिलार्फ जहर उगलने लगे। एसेी स्थिति में दोनो के बीच युद्ध आवशयक प्रतीत होने लगार्।

स्पेन की रार्जगद्दी क मार्मलार्

इसी बीच स्पने में उत्त्ार्रार्धिकार क प्रशन उपस्थित हो गयार्, जिससे वहार्ं गृहयुद्ध प्रार्रभ हो गयार्। 1863 ई. में स्पेन की जनतार् ने विद्रोह करके रार्नी ईसार्बेलार् द्वितीय को देश से निकाल दियार् और उसके स्थार्न पर प्रशार् के सम्रार्ट के रिशतेदार्र लियोपोल्र्ड को वहार्ँ क नयार् शार्सक बनार्ने क विचार्र कियार्। नेपोलियन इसके तैयार्र न थार्, क्योंकि ऐसार् होने से स्पेन पर भी प्रशार् क प्रभार्व स्थार्पित हो जार्तार्। फ्रार्ंस के विरोध को देखते हुए लियोपोल्ड ने अपनी उम्मीदवार्री क परित्यार्ग कर दियार्। किन्तु फ्रार्ंस इससे संतुश्ट नहीं हुआ। उसने यह आशवार्सन चार्हार् कि भविश्य में भी प्रशार् क कोई रार्जकुमार्र स्पने क शार्सक नहीं होगार्। यह नेपोलियन की मनमार्नी और प्रशार् क अपमार्न थार्। अत: इस घटनार् के कारण 15 जुलार्ई 1870 ई. को फ्रार्ंस ने प्रशार् के विरूद्ध युद्ध की घोशणार् कर दी।

यह युद्ध सीडार्न के मैदार्न में लड़ार् गयार्, जिसमें नेपोलियन तृतीय परार्जित कर दियार् गयार्। जर्मन सेनार्एँ फ्रार्ंस के अंदर तक घुस गयीं। 20 जनवरी 1871 ई. को पेरिस के पतन के पशचार्त युद्ध समार्प्त हो गयार्। अतं त: दोनो के बीच एक संधि हुई, जो इतिहार्स में ‘फेकं फर्ट की संधि’ के नार्म से विख्यार्त हुआ। इसकी शर्तें इस प्रकार थीं-

  1. फ्रार्सं को अल्सार्स और लॉरेन के प्रदेश प्रशार् को सौंपने होगे। 
  2. फ्रार्सं को युद्ध क हरजार्नार् 20 करोड़ पार्उंड देनार् होगें । 
  3. हरजार्ने की अदार्यगी तक जमर्न सेनार् फ्रार्ंस में बनी रहेगी। यह संधि फ्रार्ंस के लिए अत्यंत ही अपमार्नजनक सिद्ध हुई और इसके परिणार्म दूरगार्मी सिद्ध हुए और जिसने दोनों के बीच दुशमनी की जड़ें मजबूत कर दीं।

जर्मन-सार्म्रार्ज्य क गठन

सीडार्न के युद्ध के बार्द दक्षिण जर्मनी के चार्र रार्ज्यों-बवेरियार्, बार्देन, बुटर्मवर्ग और हेसं को जर्मन संघ में शार्मिल कर उसे जर्मनी (जर्मन सार्म्रार्ज्य) एक नयार् नार्म दियार् गयार्। प्रशार् क रार्जार् जर्मनी क भी शार्सक घार्ेि शत कियार् गयार्। इस प्रकार जमर्नी क एकीकरण पूर्ण हुआ। 18 जनवरी 1871 ई. में विलियम प्रथम क रार्ज्यार्भिशेक जर्मनी के सम्रार्ट के रूप में हुआ। इस असंभव से लगने वार्ले कार्य को पूर्ण करने क श्रेय बिस्माक को है।

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