चीन-जार्पार्न युद्ध (1894 र्इ.)

युद्ध के कारण

कोरियार् में जार्पार्न क स्वाथ

जार्पार्न ने अपने सार्म्रार्ज्यवार्द क मुख्य लक्ष्य चीन को बनार्यार् और सर्वप्रथम कोरियार् में उसने चीन के सार्थ अपनी शक्ति क प्रयोग कियार्। कोरियार् अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण सार्मार्जिक और रार्जनीतिक दृष्टि से जार्पार्न के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण थार्। इसलिए कोरियार् प्रार्यद्वीप में जार्पार्न की बहुत रूचि थी।

चीन के मचू सम्रार्टों ने 17वीं शतार्ब्दी में कोरियार् पर अधिकार कर लियार् थार् और तभी से कोरियार् चीन क अधीन प्रदेश मार्नार् जार्तार् थार्। यद्यपि कोरियार् क अपनार् पृथक रार्जार् होतार् थार्, किन्तु कोरियार् क स्वतंत्र रार्जार् चीन के सम्रार्ट् को अपनार् अधिपति स्वीकार करतार् थार्। इस तरह कोरियार् क रार्ज्य चीन के एक संरक्षित रार्ज्य के समार्न थार्।

कोरियार् प्रार्यद्वीप में जार्पार्न क परंपरार्गत स्वाथ थार् लेकिन, अभी तक तक जार्पार्न को इस स्वाथ को पूरार् करने क मार्कै ार् नहीं मिलार् थार्। किन्तु अब जार्पार्न में सैनिकवार्द क जन्म हो चुक थार्। अत: यह आवश्यक हो गयार् कि वह कोरियार् के संबंध में उग्र नीति क अवलंबन करे। इस समय कोरियार् यूरोपीय रार्ज्यों की सार्म्रार्ज्यवार्दी नीति के भँवरजार्ल में फँस रहार् थार् ऐसी स्थिति में कोरियार् चीन के हार्थ से निकलकर किसी भी यूरोपीय देश के अधिकार में जार् सकतार् थार्। इसलिए जार्पार्न की चिंतार् बढ़ी और उसने तय कियार् कि वह कोरियार् को उसके भार्ग्य पर नहीं छोड़ सकतार्।

कोरियार् में जार्पार्न क प्रवेश

1875 र्इ. में जार्पार्न क एक जहार्ज कोरियार् के समुद्रतट पर पहुँचार्। कोरियार् की सरकार ने इस जहार्ज पर गोलार्बार्री शुरू कर दी। इस कारण उग्रवार्दी जार्पार्नी नेतार् कोरियार् के विरूद्ध युद्ध घोषित करने की मार्ँग करने लगे। लेकिन, उस समय जार्पार्न के अधिकारियों ने संयम से काम लियार्। कोरियार् के विरूद्ध युद्ध छेड़ने के बदले उन्होंने निश्चय कियार् कि जार्पार्न एक दूतमण्डल कोरियार् भेजे, जो वहार्ँ की सरकार को जार्पार्न के सार्थ नियमार्नुसार्र व्यार्पार्रिक संधि करने के लिए प्रेरित करे। 1876 र्इ. में यह दूतमण्डल कोरियार् की रार्जधार्नी पहुँचार् और कोरियार् ने जार्पार्न के लिए व्यार्पार्र के खोल दिए गए इस प्रकार जार्पार्न को कर्इ व्यार्पार्रिक विशेषधार्धिकार प्रार्प्त हुए। जार्पार्न को कोरियार् में रार्ज्यक्षेत्रार्तीत अधिकार भी मिलार् और उसने कोरियार् की स्वतंत्र सत्तार् को मार्न्यतार् दे दी। यह चीनी सम्प्रभुतार् को चुनौती थी किन्तु इसके फलस्वरूप कोरियार् में जार्पार्नियों के पैर जम गए। इस प्रकार कुछ समय के लिए कोरियार् में शार्ंति हो गर्इ, लेकिन चीन-जार्पार्न क मनमुटार्व चलतार् ही रहार्।

चीन-जार्पार्न युद्ध क आरंभ

1891 र्इ. में रूस ने फ्रार्ंस से कर्ज लेकर पैंतीस सौ मील लंबी ट्रार्ंस सार्इबेरियन रेलवे बनार्ने क निश्चय कियार्। इसके लिए वह दक्षिण कोरियार् में अड्डार् बनार्नार् चार्हतार् थार्। इससे जार्पार्न के कान खड़ े हो गए। इसी बीच कोरियार् में 1894 र्इ. में एक विद्रार्हे हो गयार्। तोगं हार्क दल के नेतृत्व में हुआ यह विद्रोह मुख्यत: विदेशियों के खिलार्फ हुआ थार्। शार्ही फौज इसे दबार्ने में असमर्थ रही। अतएव, उसने चीन से मदद मार्ँगी। चीन की सरकार ने चीनी सैनिकों क एक दस्तार् भेज दियार्, किंतु 1885 र्इ. के समझौते के अनुसार्र जार्पार्न को इसकी सूचनार् पहले न देकर बार्द में दी। जार्पार्न ने विरोध कियार् कि इतनी बड़ी संख्यार् में चीन के सैनिकों क कोरियार् में पहुँचनार् संधि की शतोर् के विरूद्ध थार्। बदले में जार्पार्नी शार्सकों ने भी चीन को विधिवत सूचित कर सार्त हजार्र सैनिक कोरियार् भेज दिए। चीन और जार्पार्न की सेनार्ओं के कोरियार् में घुसने के पहले ही कोरियार् की सरकार ने बलवे को दबार् दियार्। किन्तु कोरियार् की भूमि पर दो विदेशी सेनार्एँ डटी रहीं। ऐसार् प्रतीत हुआ कि दोनों के मध्य किसी भी क्षण युद्ध छिड़ जार्एगार्।

अगस्त 1894 र्इ. में एक चीनी जहार्ज चीनी सैनिकों सहित कोरियार् की ओर जार् रहार् थार्। जार्पार्न ने माग में ही उसे पकड़ लियार् और, चूँकि उक्त जहार्ज ने आत्मसमर्पण नहीं कियार्, अत: उस पर आक्रमण कर दियार् गयार्, फलस्वरूप प्रत्येक चीनी यार्त्री समुद्र में डुबो दियार् गयार्। इस घटनार् से क्षुब्ध होकर चीन ने 1 अगस्त, 1894 को जार्पार्न के विरूद्ध युद्ध की घोषणार् कर दी और इस प्रकार प्रथम चीन-जार्पार्न युद्ध आरंभ हो गयार्।

युद्ध की घटनार्यें एवं परिणार्म

यह युद्ध लगभग नौ महीनों तक चलार् जिसमें जार्पार्नियों की विजय हुर्इ। जार्पार्न की सैनिक तैयार्रियार्ँ बहुत ही श्रेष्ठ थीं। जार्पार्न की डेढ़ लार्ख सेनार् को श्रेष्ठ प्रशिक्षण दियार् गयार् थार्। जार्पार्नी सैनिकों को यथार्संभव वेतन मिलतार् थार् और उनके जनरल अनुभवी और अत्यंत योग्य थे। उन्हें गोलार्-बार्रूद और अन्य रसद की वस्तुएँ यथार्समय तथार् आवश्यकतार्नुसार्र मिलती थीं। जार्पार्नी नौसेनार् में पर्यार्प्त संख्यार् में यार्त्री जहार्ज थे, जो सेनार् अथवार् युद्ध सार्मग्री एक रक्षणेत्र से दूसरे में शीघ्रतार् से पहुँचार्यार् करते थे।

इसके विपरीत, चीन की सेनार् एकदम बेकार थी। उसके पार्स न शस्त्र थे और न उसके सैनिक प्रशिक्षित थे तथार् सैनिकों को नियमित वते न भी नहीं मिलतार् थार्। उसके सेनार्पति भी अयार्ग्े य थे। इसके अतिरिक्त चीन क शार्सन प्रबंध भी दूषित और भ्रष्ट थार्।

ऐसी स्थिति में चीन की परार्जय अवश्यंभार्वी थी। वस्तुत:, युद्ध के प्रार्रंभ और अंत तक कभी और चीन को कोर्इ सफलतार् प्रार्प्त नहीं हुर्इ। सितम्बर के अंत तक चीनी सेनार् को कोरियार् से भार्गनार् पड़ार् और यार्लू नदी की मुठभेड़ में चीनी बेड़े की भीषण परार्जय हुर्इ। जार्पार्न की एक सेनार् ने मंचूरियार् पर और दूसरी ने लियार्ओतुंग प्रार्यद्वीप पर आक्रमण कियार्। किंगचार्ऊ और टार्ंकिन क पतन हो गयार् और नवम्बर में पोर्ट आर्थर पर भी जार्पार्न ने अधिकार कर लियार्। 1895 र्इ. के प्रार्रंभ में जार्पार्न की सेनार्एँ शार्ंतुंग जार् पहुँची जो कोरियार् के दूसरे छोर पर स्थित थार्। फरवरी के मध्य तक बेर्इहाइवेर्इ क भी पतन हो गयार्। उत्तर में कर्इ चीनी रक्षार् चौकियों पर जार्पार्न ने अधिकार कर लियार्। इसके उपरार्ंत जार्पार्न की सेनार्एँ चीन की रार्जधार्नी की ओर बढ़ने लगीं। इस स्थिति में चीन की सरकार ने जार्पार्न के सार्थ संधि कर लेनार् ही उचित समझार्।

शिमोनोस्की की संधि

17 अपै्रल, 1895 र्इ. को चीन और जार्पार्न के बीच युद्ध समार्प्त करने के लिए एक संधि हो गर्इ, जिसकी प्रमुख शर्तें अग्रलिखित थी –

  1. कोरियार् को स्वतंत्र रार्ज्य के रूप में स्वीकार कियार् गयार् और यह निश्चय हुआ कि उस पर चीन क किसी भी तरह क प्रभुत्व न रहे। 
  2. चीन ने जार्पार्न को फार्रमोसार्, पेस्काडोर्स और लियार्ओतुंग प्रार्यद्वीप दे दिए। 
  3. चीन ने जार्पार्न को 200,000,000 तैल (चीनी सिक्का) हर्जार्नार् देनार् स्वीकार कियार्। जब तक यह रकम चीन नहीं चुक देतार् तब तक जार्पार्न वेहाइवेर्इ के बंदरगार्ह पर कब्जार् रख सकतार् थार्। 
  4. चीन ने जार्पार्न से एक व्यार्पार्रिक संधि की जिसमें उसने जार्पार्नी उद्योग और व्यार्पार्र के लिए चुंगकिंग, सूचो, हार्ंगचो, के बंदरगार्ह खार्ले दिए और उसे वे सब सहूि लयतें दी जो यूरोपीय देशों को प्रार्प्त थी।

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