चक्रवार्त के प्रकार

चक्रवार्त एक वृहद वार्युरार्शि है जिसमें हवार्यें निम्न वार्युदार्ब की ओर घूमती हैं। इसमें निम्न वार्युदार्ब केन्द्र में रहतार् है बार्हर की ओर वार्युदार्ब बढ़तार् जार्तार् है। इस निम्न वार्युदार्ब क्षेत्र को द्रोणिक (Trough), गतिचक्र, डिपे्रशन तथार् निम्न वार्ब केन्द्र भी कहते हैं। इसमें केन्द्र में निम्न वार्युदार्ब के कारण हवार्यें बार्हर चार्रों ओर से केन्द्र की ओर प्रवार्हित होती है। इस वार्युदार्ब प्रणार्ली में वार्युदार्ब प्रवणतार् बार्हर से केन्द्र की ओर स्थार्पित हो जार्ती है। इसमें पवन प्रवार्ह फेरेल के नियम उत्तरी गोलाइ में गतिशील वार्यु अपने पथ के दार्यें तथार् दक्षिणी गोलाइ में बार्यें मुड़ जार्ती है। इसमें न्यून रेखार्एं वृत्तार्कार तथार् अण्डार्कार होती है। जब यह क्षेत्र गोलार्कार न होकर वृहत आकार में होतार् है तो उसे गर्त चक्र द्रोणिक कहते हैं। इन चक्रवार्तों को दो भार्गों में विभार्जित कियार् जार् सकतार् है :-

  1. उष्ण कटिबन्धीय चक्रवार्त
  2. शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवार्त

उष्ण कटिबन्धीय चक्रवार्त

उष्ण कटिबन्धीय चक्रवार्त की उत्पत्ति अयन वर्ती क्षेत्रों (300 उत्तरी अक्षार्ंश से 300 दक्षिणी अक्षार्ंश) के मध्य होती है। इन चक्रवार्तों को विश्व में अलग-अलग नार्मों से पुकारार् जार्तार् है। जैसे भार्रत और बार्ंग्लार्देश के पूर्वी तटीय प्रदेशों में चक्रवार्त, संयुक्त रार्ज्य अमेरिक में हरिकेन, आस्ट्रेलियार् में विली विली, द0पू0 एशियार् में टार्इफून तथार् जार्पार्न में टैफू के नार्म से जार्नार् जार्तार् है।

उष्ण कटिबन्धीय चक्रवार्तों की उत्पत्ति विशार्ल गर्म सार्गरों में होती है जिसमें समुद्र तल क तार्पमार्न 270से0 होतार् है। यह तार्प विषुवत रेखार् के निकट होतार् है लेकिन इसमें पृथ्वी क घूर्णन शून्य होनार् चार्हिए। इसी कारण चक्रवार्त विषुवत रेखार् से दूर 10 से 150 अक्षार्ंशों पर उत्पé होते है। इसकी उत्पत्ति के लिए उध्र्वार्धर वार्यु कर्तन बार्धक होतार् है। इसी कारण ये चक्रवार्त जेट स्ट्रोम के नीचे पैदार् नहीं होते हैं।

ये चक्रवार्त अत्यधिक विनार्शकारी वार्युमण्डलीय तूफार्न होते हैं। इसमें पवन वेग तीव्र होतार् है। मूसलार्धार्र वृष्टि होती है। तटवर्ती भार्गों में तीव्र पवन वेग तथार् तेज वर्षार् तथार् उच्च ज्वार्रीय तरंगों के कारण जल प्लार्वन की स्थिति हो जार्ती है तथार् धन-जन की काफी हार्नि होती है। उष्ण कटिबन्धीय चक्रवार्त अत्यधिक प्रचण्ड वेग वार्ले और विनार्शकारी प्रार्कृतिक प्रकोप है। इसके कारण पिछले दो दशकों में विश्व भर में 19 लार्ख लोगों की मृत्यु हो चुकी है। ऐसार् मार्नार् जार्तार् है कि 10000 व्यक्ति प्रति वर्ष चक्रवार्त से काल के ग्रार्स बन जार्ते हैं। इन चक्रवार्तों के द्वार्रार् सार्गरीय तटीय क्षेत्र तो प्रभार्वित होते है सार्थ ही प्रार्कृतिक भूदृश्य भी परिवर्तित हो जार्ते हैं। जंगली क्षेत्रों को हार्नि पहुँचती हैं।

उष्ण कटिबन्धीय चक्रवार्तों को पवन वेग के आधार्र पर पार्ंच भार्गों में बार्ंटार् जार् सकतार् है –
उष्ण कटिबन्धीय चक्रवार्त प्रार्कृतिक आपदार् वार्ले प्रकोप होते हैं। इसके द्वार्रार् आर्थिक, सार्मार्जिक तथार् पर्यार्वरणीय प्रभार्व निम्न रूपों में होतार् है। पिछले कुछ वर्षों से विकसित देशों में जनधन की हार्नि कम हुर्इ है। इसक प्रमुख कारण है कि इन देशों में उष्ण कटिबन्धीय चक्रवार्तीय तूफार्नों की अग्रिम जार्नकारी लोगों को शीघ्र उपलब्ध करार् दी जार्ती है। वहार्ँ पर आपदार् की पूर्व तैयार्री और निवार्रण की अच्छी व्यवस्थार् है।

  1. प्रथम उष्ण – 90-125 किमी/घंटार् मकानों को न्यून कटिबन्धीय चक्रवार्त उष्ण कटिबन्धीय चक्रवार्त क्षति, फसलों व वृक्षों को अल्प हार्नि।
  2. द्वितीय उष्ण – 125-164 किमी/घंटार् भवनों को क्षति, कटिबन्धीय चक्रवार्त चक्रवार्तीय तूफार्न कुछ फसलों को (Tropical Storm) अधिक नुकसार्न, विद्युत आपूर्ति बार्धित
  3. तृतीय – (प्रचण्ड उष्ण 165-225 किमी/घंटार् भवनों की छतें कटिबन्धीय चक्रवार्त) प्रचण्ड चक्रवार्ती तूफार्न उखड़ जार्ती है। (Hurricane) फसलें पूर्णत: नष्ट हो जार्ती है।
  4. चतुर्थ – (प्रचण्ड उष्ण 275-279 किमी/घंटार् भवनों की छत कटिबन्धीय चक्रवार्त) हरिकेन, अधिक प्रचण्ड नष्ट, फसलों और चक्रवार्तीय तूफार्न पशुधन क अधिक विनार्श, बिजली एवं जल के आपूर्ति तंत्रों में व्यवधार्न।
  5. पंचम – (प्रचण्ड उष्ण 280-किमी/घंटार् हरिकेन, विनार्शार्त्मक कटिबन्धीय चक्रवार्त) अत्यधिक प्रचण्ड चक्रवार्तीय हवार्आ के कारण तूफार्न सम्पूर्ण क्षेत्र क पूर्णत: विनार्श

जबकि विकासशील देशों में आपदार् निवार्रण एवं न्यूनीकरण के लिए आवश्यक संसार्धनों क अभार्व है। इसी कारण जन-धन की अधिक हार्नि होती है। उष्ण कटिबन्धीय चक्रवार्त इन रूपों में क्षति पहुँचार्ते हैं :-

  1. खेतों में खड़ी फसल नष्ट हो जार्ती है। पार्लतू पशु तथार् जंगली जार्नवर भी मर जार्ते हैं।
  2. अत्यधिक प्रचण्ड चक्रवार्त आने पर सार्गर तटीय क्षेत्र अधिक प्रभार्वित होते है तथार् धन जन की हार्नि होती है। 
  3. चक्रवार्त के कारण मार्नवीय पर्यार्वरण को अधिक क्षति पहुँचती है। चक्रवार्त क तीव्र पवन वेग घरों की छत को अलग कर देतार् है तथार् भवनों को मलबे के रूप में परिवर्तित कर देतार् है। 
  4. तीव्र पवन वेग के कारण घर के बार्हर रखी वस्तु उड़कर अन्यत्र दूर चली जार्ती है उसके बार्द वह वार्पस नहीं मिलती है। 
  5. प्रार्कृतिक वनस्पतियों खार्सकर वन नष्ट हो जार्ते हैं। 
  6. चक्रवार्तीय वर्षार् के कारण पहार्ड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन की घटनार्एं घटती है जिससे पहार्ड़ी क्षेत्रों के माग अवरूद्ध हो जार्ते हैं। आबार्दी वार्ले क्षेत्र को भी अधिक क्षति उठार्नी पड़ती है। 
  7. चक्रवार्तीय वर्षार् के कारण नदियों में बार्ढ़ आ जार्ती है जिससे निचले क्षेत्रों में स्थार्यी रूप से जल के जमार्व के कारण मलेरियार्, डेंगू तथार् डार्यरियार् जैसी बीमार्री फैलने लगती है। 
  8. चक्रवार्तीय वर्षार् से प्रभार्वित क्षेत्रों में सीवेज पार्इप लार्इन टूट जार्ती है जिससे मल फैलने के कारण व्यक्ति संक्रार्मक रोग के चपेट में आ जार्ते हैं। 
  9. अस्पतार्ल भी क्षतिग्रस्त हो जार्ते हैं जिससे विभिé बीमार्रियों से गस्त व्यक्तियों को चिकित्सार् सही समय पर नहीं मिल पार्ती है। 
  10. चक्रवार्तों से उत्पé सार्गरीय लहरों के कारण सार्गरीय जलयार्न टूट जार्ते है जिसमें कर्इ लोग मर जार्ते है। जलयार्न में कीमती सार्मार्न हो तो आर्थिक क्षति भी उठार्नी पड़ती है। 
  11. प्रचण्ड चक्रवार्त के समय अधिक लोग अन्यत्र पलार्यन कर जार्ते हैं। उनके घरों के नष्ट होने पर लोग बेघर हो जार्ते हैं। 
  12. चक्रवार्त के बार्द भवनो, सीवर लार्इन, विद्युत लार्इन, पार्इप लार्इन आदि की मरम्मत में अधिक धन व्यय होतार् है। 
  13. चक्रवार्तीय वर्षार् से सार्गरीय पर्यार्वरण को भी क्षति पहुंचती है। सार्गर तटीय भार्गों में स्थित बार्लुक स्तूप, सार्गरीय पुलिन तथार् प्रवार्ल भित्तियों क विनार्श हो जार्तार् है। 
  14. इसके कारण परिवहन एवं संचार्र के सार्धनों, विद्युत एवं जल आपूर्ति लार्इन क्षति ग्रस्त हो जार्ती है।
  15. प्रभार्वित क्षेत्र के लोग रोजगार्र की तलार्श में नगरों की ओर पलार्यन कर जार्ते हैं। 
  16. व्यक्ति परिवार्र के सदस्यों की मृत्यु, फसल और पशुधन नष्ट होने के कारण मार्नसिक बीमार्री से ग्रसित हो जार्ते हैं। 
  17. आर्थिक संस्थार्नों के नष्ट हो जार्ने से बेरोजगार्री की समस्यार् बढ़ जार्ती है।

उष्ण कटिबन्धीय चक्रवार्त के लक्षण

  1. उष्ण कटिबन्धीय चक्रवार्तों के केन्द्र में वार्युदार्ब निम्न होतार् है। केन्द्र से बार्हर की ओर वार्युदार्ब अधिक होतार् है। इसी कारण हवार्एं बार्हर से केन्द्र की ओर तीव्रगति से चलती हैं। 
  2. उष्ण कटिबन्धीय चक्रवार्त वर्ष के निश्चित समय में आते हैं। इनक समय ग्रीष्म काल में होतार् है। 
  3. ये चक्रवार्त सार्गरीय भार्ग में तीव्र गति से चलते हैं। तटवर्ती क्षेत्र तक पहुँचते-पहुँचते इनकी गति कम हो जार्ती है। इसी कारण ये तटवर्ती भार्गों में अधिक वर्षार् करते हैं जबकि आन्तरिक भार्गों में पहुँचने से पहले समार्प्त हो जार्ते हैं। 
  4. इन चक्रवार्तों की गति में अन्तर होतार् है। जैसे क्षीण चक्रवार्त 32 किमी प्रतिघंटार्, हरिकेन 120 किमी0 प्रति घंटार् की रफ्तार्र से चलते हैं।
  5.  इनके आकार में पर्यार्प्त अन्तर होतार् है। छोटे चक्रवार्तों क व्यार्स 50 किमी0 से भी कम होतार् है जबकि बड़े चक्रवार्तों क व्यार्स 300 किमी0 तक होतार् है। 
  6. ये कभी गतिशील होते हैं तो कभी एक स्थार्न पर स्थार्यी हो जार्ते हैं। वे उस स्थार्न पर कर्इ दिनों तक अधिक वर्षार् करते हैं। 
  7. इनक तीव्र वेग, तूफार्नी स्वभार्व तथार् एक ही स्थार्न पर कर्इ दिनों तक स्थार्यी रहने के कारण मूसलार्धार्र वृष्टि होती है तथार् भयंकर वार्ढ़ें आती है जिससे जन-धन की अपार्र हार्नि होती है।

शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवार्त

इन चक्रवार्तों की उत्पत्ति 300-650 अक्षार्ंशों के मध्य होती है। जहार्ँ पर उष्ण कटिबन्धीय तथ ध्रुवीय वार्युरार्शियों क अभिक्षरण होतार् है। पश्चिमी वार्यु प्रवार्ह से सम्बन्धित होने के कारण इन चक्रवार्तों क प्रवार्ह पश्चिम से पूर्व की ओर होतार् है। इनकी उत्पत्ति और विकास शीत ऋतु में अधिक होतार् है। उत्तरी गोलाद्ध में इनकी उत्पत्ति के दो क्षेत्र हैं –

  1. उत्तरी प्रशार्न्त महार्सार्गर के पश्चिमी तटवर्ती क्षेत्र से अल्यूशियन निम्न क्षेत्र क विस्तृत महार्सार्गरीय तल।
  2. उत्तरी आन्ध्रमहार्सार्गर के पश्चिमी किनार्रे से आइसलैण्ड स्थित निम्न दार्ब क्षेत्र के मध्य क भार्ग। इसके अलार्वार् सार्इबेरियार्, चीन तथार् फिलीपार्इन्स के निकटवर्ती क्षेत्रों में इन गर्तों की उत्पत्ति होती है। दक्षिणी गोलाद्ध में इन चक्रवार्तों की उत्पत्ति समार्न रूप से होती है लेकिन 600 दक्षिणी अक्षार्ंश पर स्थल खण्ड के अभार्व के कारण ये चक्रवार्तीय तूफार्न बड़े प्रबल तथार् विनार्शकारी होते हैं। ऐसे तूफार्न उपध्रुवीय निम्नदार्ब द्रोणी में संकेन्द्रित होते हैं।

शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवार्त के लक्षण

  1. शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवार्तों में हवार्यें बहुत मंद गति से चलती है जबकि उष्ण कटिबन्धीय चक्रवार्त जैसे हरिकेन, टार्इफून, टार्रनेडों आदि में हवार्यें तीव्र वेग से चलती हैं। 
  2. ये चक्रवार्त सदैव पश्चिम से पूर्व की ओर चलते हैं। इनके पूर्वी भार्ग में पूर्वी हवार्ए, उत्तरी भार्ग में उत्तरी पूर्वी हवार्यें तथार् उत्तरी पश्चिमी खण्ड में उत्तरी पश्चिमी हवार्यें चलती हैं। 
  3. इस चक्रवार्त के विभिé भार्गों में तार्पमार्न भिन्न-भिन्न रहतार् है। अग्रभार्ग में उष्ण कटिबन्धीय गर्म व नम हवार्ओं के कारण तार्पमार्न अधिक तथार् पृश्ठ भार्ग में शीतल शुष्क ध्रुवीय हवार्ओं के कारण तार्पमार्न कम रहतार् है। 
  4. इन चक्रवार्तों से शीत काल में वर्षार् अधिक होती है। जबकि ग्रीष्म काल में ये अधिक विकसित नहीं होते। 
  5. इन चक्रवार्तों की गति अनिश्चित होती है। ग्रीष्म काल की अपेक्षार् शीत काल में इनकी गति अधिक होती है।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवार्तों की अपेक्षार् उष्ण कटिबन्धीय चक्रवार्त अधिक विनार्शकारी होते हैं। इनके आने पर मूसलार्धार्र वृष्टि, तीव्र पवन वेग तथार् बार्ढ़ की स्थिति उत्पé हो जार्ती है। अधिक निम्न वार्युदार्ब तथार् तीव्र वेग वार्ली वार्यु के कारण सार्गरीय सतह में अस्वार्भार्विक उभार्र उत्पé होतार् है। इसी को तूफार्न महार्लहर तथार् ज्वार्रीय महार्लहर कहते है। जब ये लहरें उच्च ज्वार्र के सार्थ आती है तो सार्गर तटीय भार्गों में प्रविष्ट हो कर जल प्रलय की स्थिति लार् देती हैं। इससे धन-जन की अधिक हार्नि होती है।

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