ग्रार्मदार्न की अवधार्रणार्
यदि किसी गॉव में रहने वार्ले 80 प्रतिशत भू-स्वार्मी अपनी भूमि क स्वार्मित्व भूमिहीनों को प्रदार्न कर दें तथार् प्रदार्न की गयी यह भूमि सम्पूर्ण भूमि के 51 प्रतिशत से अधिक हो तो गॉव क ग्रार्मदार्न में मिली हुयी भूमि क स्वार्मित्व सम्पूर्ण समुदार्य क होतार् है, किसी एक व्यक्ति क नहीं । ग्रार्मदार्न के महत्व पर प्रकाश डार्लते हुये विनोबार् जी ने इसके 7 लार्भ बतार्यें हैं:-

  1. निर्धरतार् उन्मूलन।
  2. भू-स्वार्मी के हृदय के प्रेम एवं श्रद्वार् की उत्पत्ति तथार् उसक नैतिक उत्थार्न । 
  3. मित्रतार् की भार्वनार् एवं पार्रस्परिक सहयोग की वृद्वि, वर्ग संद्यर्ष में कमीं, द्यृणार् की भार्वनार् की समार्प्ति। 
  4. धामिक उत्थार्न तथार् सत्य एवं धर्म में विश्वार्स। 
  5. नवीन सार्मार्जिक व्यवस्थार् क अभ्युदार्य। 
  6. रचनार्त्मक कार्यों में वृद्वि तथार् समार्ज क उत्थार्न। 
  7. विश्व शार्न्ति में सहयोग। 

लोक शक्ति 

विनोबार् जी ने लोक शक्ति के निर्मार्ण क संकल्प कियार् तार्कि जनमार्नस में आत्मविश्वार्स एवं अहिंसार् की भार्वनार् को सुदृढ बनार्यार् जार् सके। लोक शक्ति और सैनिक शक्ति के विपरीत है। सरकारी कानून लोक शक्ति क निर्मार्ण नहीं कर सकते। लोक शक्ति समार्प्त हो जार्ने पर रार्ज्य एवं समार्ज क स्वत: विनार्श हो जार्येगार्। लोक शक्ति क प्रार्दुर्भार्व तभी हो सकतार् है जब लोग आत्म कश्ट एवं सत्यार्ग्रह के लिये तैयार्र हों। लोकशक्ति मे वृद्वि के सार्थ- सार्थ उसी अनुपार्त में रार्ज्यशक्ति क हार्स होतार् है, तथार् रार्ज्य शक्ति कम होने पर लोगों में सुख एवं समृद्वि की वृद्वि होती है। समार्ज में शन्ति की स्थार्पनार् तब तक नहीं हो सकती जब तक कि लोक शक्ति में वृद्वि न हों। यदि शक्तिषार्ली शार्सक कम से कम अपने- अपने देशों में स्वर्ग की स्थार्पनार् अवश्य कर देते किन्तु ऐसार् नहीं हुआ क्योंकि लोकशक्ति क अभार्व थार्। लोक शक्ति को विकसित करनार् ही एक ऐसार् माग है जिस पर आगे चलकर एक वर्ग विहीन, रार्ज्य विहीन तथार् शेार्षण मुक्त समार्ज अर्थार्त् सर्वोदय समार्ज की स्थार्पनार् की जार् सकती है।

वैश्वीकरण व मार्नव विकास 

विश्व की विभिन्न अर्थव्यवस्थार्ओं को वस्तुओं तथार् सेवार्ओं, प्रौद्योगिकी, पूँजी तथार् यहार्ं तक कि श्रम अथवार् मार्नव पूंजी के बेरोकटोक प्रवार्ह के सार्थ एकीकृत करने की प्रक्रियार् ही वैश्वीकरण है। इस प्रकार, वैश्वीकरण के चार्र प्रतिमार्न है:-

  1. रार्ष्ट्र रार्ज्यों के मध्य वस्तुओं व सेवार्ओं के सुगम प्रवार्ह को सुनिश्चित करने के लिए व्यार्पार्र अवरोधकों में कमी। 
  2. ऐसे वार्तवार्रण क निर्मार्ण करनार् जिसमें रार्ष्ट्र रार्ज्यों के मध्य पूंजी के निवेश हेतु निरन्तर प्रवार्ह हो सके। 
  3. प्रौद्योगिकी के प्रवार्ह को अनुमति देने वार्ले वार्तार्वरण क निर्मार्ण करनार्।
  4. विकासशील देशों के दृष्टिकोण के अनुसार्र, ऐसे वार्तार्वरण क निर्मार्ण करनार्, जिसमें विश्व के विभिन्न देशों के मध्य मार्नव शक्ति व श्रम क आदार्न-प्रदार्न सुगमतार्पूर्वक हो सके। 

वैश्वीकरण के इस दौर में पूरी दुनियार् में बड़ार् उथल-पुथल हो रहार् है। एन्थोनी गिडेनस ने अपनी पुस्तक दि कान्सीक्वेन्सेज ऑफ मॉडर्निटी (The Consequences of Moderity, 1990) में वैश्वीकरण की व्यार्ख्यार् विस्तार्र पूर्वक की है। उनक कहनार् है विभिन्न लोगों और दुनियार् के विभिन्न क्षेत्रों के बीच बढ़ती हुर्इ अन्योन्यार्श्रितार् यार् पार्रस्परिकतार् ही वैश्वीकरण है। यह पार्रस्परिकतार् सार्मार्जिक और आर्थिक संबंधों में होती है। इसमें समय और स्थार्न सिमट जार्ते हैं। इसी संदर्भ में गार्ंधी जी के इस वक्तव्य को भी देखनार् होगार्। वे लिखते हैं ‘‘मैं नहीं चार्हतार् कि मेरार् मकान चार्रों ओर दीवार्रों से घिरार् हो और मेरी खिड़कियार्ं बन्द हों। मैं तो चार्हतार् हूँ कि सभी देशों की सार्ंस्कृतियों की हवार्एं मेरे घर में जितनी भी आजार्दी से बह सके बहे। लेकिन मैं यह नहीं चार्हतार् कि उनमें से कोर्इ भी हवार् मुझे मेरी जड़ों से ही उखार्ड़ दे।’’

हम दूसरे देशों में जार्ते रहे हैं आरै दूसरे देशों के लोग हमार्रे यहार्ँ आते रहे है व्यार्पार्रिक लेन-देन आरै सार्ंस्कृतिक अदार्न-पद्र ार्न भी हम हमेशार् करते रहे है इन प्रक्रियार् में भी शेष देश से कभी कटे नहीं बल्कि पहले से भी ज्यार्दार् जडु ़ते रहे है अत: यह हमार्रे लिए कोर्इ नर्इ बार्त नहीं है। किन्तु भार्रत में वैश्वीकरण समतार्, न्यार्य और विश्व-बन्धुत्व के आधार्र पर होनार् चार्हिए। वैश्वीकरण के संबंध में यह आम धार्रणार् है कि समार्जवार्द समार्प्त हो गयार् है और पूँजीवार्द विश्व-विजेतार् बन गयार् है। अत: भार्रत को भी अब समार्जवार्द क स्वप्न देखनार् बंद कर देनार् चार्हिए और पूँजीवार्द को ही अपनी नियति मार्न लेनार् चार्हिए। इस धार्रणार् क प्रचार्र यह कहते हुए कियार् जार् रहार् है कि पूँजीवार्द की गति के नियमों के अनुसार्र सम्पूर्ण विश्व की अर्थव्यवस्थार् एक हो गर्इ है। अत: भार्रतीय अर्थव्यवस्थार् को वैश्विक, पूँजीवार्द से जोड़नार् तथार् घरेलू आर्थिक नीतियों को पूँजीवार्दी क सिद्धार्न्त बनार्कर चलनार् अनिवाय हो गयार् है।

प्रसिद्ध अर्थशार्स्त्री दिलीप एस0 स्वार्मी ने अपनी पुस्तक ‘विश्व बंकै और भार्रतीय अथर्व् यवस्थार् क वैश्वीकरण’ में विश्व बंकै , अन्तराष् ट्रीय मुदार््र कोष और नियमों से भार्रत की नर्इ आर्थिक नीति क संबंध स्पष्ट करने वार्ले बहुत से अन्य और आँकड़े देकर यह सिद्ध कियार् गयार् है कि भार्रत में वैश्वीकरण की जो प्रक्रियार् 1991 में शुरू हुर्इ है वह स्वार्धीनतार् के समय से चली आ रही है। इसक उद्देश्य न तो गरीबी और न बेरोजगार्री को कम करनार् है और न लोगों की बुनियार्दी जरूरतें पूरी करतार् है। इसक मुख्य जोर आर्थिक गतिविधियों में रार्ज्य के हस्तक्षेप को न्यूनतम करनार् और बार्जार्र की अदृश्य शक्तियों को तथार् कीमतों की प्रक्रियार् को छूट देतार् है कि वे रार्ष्ट्रीय संसार्धनों को जहार्ँ चार्हे वहार्ँ लगार्यें। भार्रत ने उन वैश्विक बार्जार्र, शक्तियों के आगे घुटने टेक दिये हैं जिन पर बहुरार्ष्ट्रीय निगमों क अधिपत्य हैं।

मार्नव विकास रिपोर्ट: 2000: संयुक्त रार्ष्ट्र संघ विकास कार्यक्रम (UNDP) के अन्तर्गत प्रकाशित मार्नव विकास रिपोर्ट में कहार् गयार् है कि आधुनिक युग वस्तुत: वैश्वीकरण क युग है। यह रिपोर्ट कहती है कि वैश्वीकरण दुनियार् के लिये नयार् नहीं है। इसक प्रार्रंभ 16वीं शतार्ब्दी से हैं। लेकिन आज क वैश्वीकरण अतीत के वैश्वीकरण से भिन्न है। इस रिपोर्ट ने वैश्वीकरण को चार्र विशेषतार्ओं द्वार्रार् परिभार्षित कियार् है:-

  1. नये बार्जार्र (New Market) :- विदेशी विनिमय और पूँजी बार्जार्र वैश्वीय स्तर पर जुड़े हुए हैं आरै ये बार्जार्र चार्बै ीसों घंटे काम करते है इनके लिए भौतिक दूरियार्ं कोर्इ अर्थ नहीं रखतीं। 
  2. नये उपकरण (New Tools) :- आज के विश्व में लोगों के लिए कर्इ नये उपकरण आ गये हैं। इनमें इंटरनेट लिंक्स, सेल्यूलर फोन्स और मीडियार् तंत्र सम्मिलित हैं। 
  3.  नये एक्टर यार् कर्तार् :- वैश्वीकरण की प्रक्रियार् ऐसी हैं जिसमें कार्यों क संपार्दन करने के लिए कर्इ कर्तार् हैं। इन कर्तार्ओं में विश्व व्यार्पार्र संगठन, गैर सरकारी संगठन, रेडक्रार्स आदि सम्मिलित हैं। 
  4. नये नियम :- अब सार्रे काम संविदार् के मार्ध्यम से होते हैं। बहुरार्ष्ट्रीय कंपनियों दुनियार् भर के रार्ष्ट्र रार्ज्यों के सार्थ सीधार् व्यपार्र समझौतार् करती है ये कतिपय नये नियम हैं जो वैश्वीकरण के आर्थिक और सार्ंस्कृतिक कार्यक्रमों को लार्गू करने में सहार्यतार् देते हैं। 

यह रिपोर्ट बतार्ती है कि अपने नये अवतार्र में वैश्वीकरण अधिक शक्तिशार्ली बन गयार् है। इसे अधिक स्पष्ट करते हुए रिपोर्ट कहती है :- ‘‘वैश्वीय बार्जार्र, वैश्वीय तकनीकी तंत्र, वैश्वीय विचार्र और वैश्वीय सुदृढ़तार्, यह आशार् की जार् सकती है, संसार्र भर के लोगों को समृद्धि देगें। लोगों के बीच पार्रस्परिकतार् और आत्मनिर्भरतार् में आशार् की जार्ती है कि लोग सार्झार् मूल्यों में विश्वार्स स्थार्पित करेंगे और दुनियार् भर के लोगों क विकास होगार्।

मार्नव विकास पर वैश्वीकरण क सकारार्त्मक प्रभार्व :- 

  1. संयुक्त रार्ष्ट्र, IMF विश्व बंकै , OECD तथार् विश्व व्यार्पार्र संगठन जैसे कर्इ अन्तर्रार्ष्ट्रीय संस्थार्ओं ने वैश्वीकरण के विचार्र को अपनार्ते हुए मार्नार् है कि विभिन्न रार्ष्ट्रों के बीच व्यार्पार्र में वृद्धि होने के कारण प्रत्येक व्यक्ति की आमदनी में बढ़ोत्तरी हुर्इ हैं। 
  2. रार्ष्ट्रों के मध्य अधिक मार्त्रार् में आयार्त-निर्यार्त होने के कारण विश्व की समृद्धि बढ़ी है और यह इसलिए संभव हुआ क्योंकि संपूर्ण विश्व में सभी व्यक्तियों के लिए समार्न नियम बनार्ये गये हैं जिनक पार्लन करनार् उनके लिए आवश्यक हैं। 
  3. अन्तर्रार्ष्ट्रीय संगठनों के मतार्नुसार्र वैश्वीकरण के मार्ध्यम से संयुक्त रार्ष्ट्र तथार् अन्य व्यार्पार्रिक समुदार्यों के मध्य श्रम, मार्नव अधिकार, पर्यार्वरण इत्यार्दि से संबंधित मार्नकों से जुड़े हुए मूल्यों को स्थार्पित कियार् गयार् है तथार् इसकी उन्नति के लिए निरंतर प्रयार्स किये जार् रहे हैं। 
  4. वैश्वीकरण के समर्थक यह कहते हैं कि इस बार्त के बहुत से सार्क्ष्य मिल जार्येंगे कि विभिन्न गरीब देशों में से जिन देशों में दूसरे देशों के सार्थ व्यार्पार्र स्थार्पित कियार् है उनमें से अधिकांश की आय में वृद्धि तथार् जिसने अन्य देशों के सार्थ व्यार्पार्र स्थार्पित नहीं कियार् उनकी गरीबी में वृद्धि देखी गयी हैं। 
  5. ऐसे कुछ देश जिन्होंने सीमार् संबंधी करों एवं नियमों में भार्री कमी की है, उनहोंने रोजगार्र व रार्ष्ट्रीय आय में वृद्धि कुछ हद तक कर प्रार्प्त कर ली है, क्योंकि वैश्वीकरण के मार्ध्यम से श्रम व पूँजी क मार्त्र आयार्त ही नहीं कियार् जार् रहार् है बल्कि एक बृहद् स्तर पर इसक निर्यार्त होने पर बहुत अधिक लार्भ मिल रहार् है। 
  6. यह कहार् जार्तार् है कि कोर्इ देश जितनार् अधिक अन्य देशों से व्यार्पार्र करतार् है, वहार्ं के नार्गरिकों क जीवन स्तर उतनार् ही सुधरतार् है। 
  7. बहुत से विकासशील देशों, मैक्सिको, तुर्की, थार्इलैण्ड आदि ने अपनी अर्थव्यवस्थार् में उन्नति क अनुभव करते हुए वैश्वीकरण के पक्ष में आवार्ज उठार्यी है।
  8. आस्ट्रेलियार् के भूतपूर्व विदेश मंत्री ने कहार् थार् कि वैश्वीकरण ने आस्ट्रेलियार् में सकल घरेलू उत्पार्द, रोजगार्र, पार्रिवार्रिक आय व जीवन स्तर को बढ़ार्ने में बहुत अहम भूमिक निभाइ है। 
  9. वैश्वीकरण क एक महत्वपूर्ण योगदार्न यह है कि इसके कारण श्रम- संबंधी कार्यों व आर्थिक संरचनार् में महिलार्ओं की भार्गेदार्री आश्चर्यजनक रूप से बढ़ी है। 
  10. वैश्वीकरण के कारण बार्जार्र की संरचनार् में वृद्धि हुर्इ है। जिसके कारण स्थार्नीय समुदार्य से लोगों क सम्पर्क छूटतार् जार् रहार् है इसक सकारार्त्मक पहलू यह है कि बार्जार्र से संबंधित संबंधों में प्रार्थमिक लगार्व की भार्वनार् कम हो गयी है जिससे व्यक्ति भार्वनार्त्मक सहार्रार् प्रार्प्त करने हेतु अपने परिवार्र पर अधिक निर्भर हो गयार् है। 

मार्नव विकास पर वैश्वीकरण क नकारार्त्मक प्रभार्व :- 

विकास रिपोर्ट (UNDP 2001) ने वैश्वीकरण के दुष्परिणार्मों को निम्न बिन्दुओं में रखार् हैं :- ;

  1. वैश्वीकरण ने मार्नव सुरक्षार् को एक अजीब तरह की धमकी दी है। एक ओर तो धनी और समृद्ध देश हैंं जिनमें पूरी रार्जनीतिक स्वतंत्रतार् है, स्थार्यित्व है और दूसरी तरफ गरीब देश है।  जिनमें विपन्नतार् है।  आरै नार्गरिक नार्म मार्त्र को भी नहीं है। अमेरिक जैसे धनार्ढ्य देश में आधी रार्त को आदमी सिर ऊँचार् उठार् के चहलकदमी कर सकतार् है उसकी पूरी सुरक्षार् है। दूसरी ओर स्वतंत्रतार् से अपने दैनिक काम-काज चलार् पार्नार् नार्गरिकों के लिए दूभर हो जार्तार् है। कब, किस समय गार्ज गिर पड़े, इसकी कोर्इ सुरक्षार् नहीं। 
  2. यह सही है कि नर्इ सूचनार् और संचार्र तकनीकी ने वैश्वीकरण की प्रक्रियार् द्वार्रार् लोगों को एक सूत्र में बार्ंध दियार् है पर इसक एक यह भी परिणार्म निकलतार् है कि दुनियार् के कुछ लोग अपने आप को पृथक समझते हैं। इस विभार्जन के कारण भी वैश्वीकरण क विरोध होने लगार् है।
  3. वैश्वीकरण के दौरार्न यह स्थिति है कि धनार्ढ्य देश ज्ञार्न पर अपनार् नियंत्रण रखने लगे हैं। इसके परिणार्मस्वरूप गरीब देश हार्शिये पर आ गये हैं। वे अपने आपको असुरक्षित समझने लगे हैं। उदार्हरण के लिए थार्इलैण्ड जैसे देश में अफ्रीक की तुलनार् में अधिक सेल्यूलर फोन हैं। दक्षिण एशियार् जहार्ं दुनियार् के 23 प्रतिशत लोग रहते हैं, एक प्रतिशत से कम लोगों के पार्स टेलीफोन हैं। 
  4. लगभग 80 प्रतिशत वेबसार्इट में अंग्रेजी भार्षार् चलती है, जबकि बोलने वार्लों में दस व्यक्तियों में एक व्यक्ति हैं। 
  5.  वैश्वीकरण ने तकनीकी तंत्र को जो सुविधार्एं पद्र ार्न की है।  उनके प्रयोगों ने दुनियार् को दो भार्गों में बार्ंट दियार् है। रिपोर्ट कहती है:- वैश्वीकरण ने दो समार्न्तर दुनियार्एं खड़ी कर दी हैं। एक दुनियार् वह है जिसके पार्स आय है, शिक्षार् और शैक्षिक संपर्क है, उसके लिए सूचनार् प्रार्प्त करनार् सरल और सुविधार्जनक है और दूसरी ओर दूसरी दुनियार् वह है जो अनिश्चित है, धीमी है और जिसके लिए सूचनार् तक पहंचु नार् महंगार् है। जब ये दोनों दुनियार्एं सार्थ-सार्थ रहती हैं और प्रतियोगतार्एं करती हैं तो निश्चित रूप से गरीबों की दुनियार् पिछड़ जार्ती हैं। 
  6. मार्नव विकास रिपोर्ट ने अपने उपसंहार्र में एक पते की टिप्पणी की है। यह कहार्नी है कि वैश्वीकरण में समय सिकुड़ गयार् है, स्थार्न सिकुड़ गयार् है। रार्ष्ट्रीय सीमार्एं ओझल हो रही हैं, लेकिन यब सब किसके लिए? इसक उत्तर बहुत स्पष्ट हैं वैश्वीकरण के लार्भ और बहतु अधिक लार्भ धनवार्न देशों एवं धनवार्न लोगों की झोली में गये हैं। आम देश और आम आदमी तो ठगे-ठगे और बिखरे-बिखरे दिखाइ देते हैं।

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