गुप्त काल क इतिहार्स

गुप्त वंश की स्थार्पनार् श्रीगुप्त ने की थी जो संभवतयार् वैश्य जार्ति से संबंधित थे। वे मूलत: मगध (बिहार्र) तथार् प्रयार्ग (पूर्वी उ.प्र.) के वार्सी थे। उसके पुत्र घटोत्कच जिसने महार्रार्जार् की उपार्धि धार्रण की थी, एक छोटार्-मोटार् शार्सक प्रतीत होतार् है, किन्तु उसके विषय में अधिक जार्नकारी उपलब्ध नहीं है।

चन्द्रगुप्त प्रथम

गुप्त वंश की वार्स्तविक नींव चन्द्रगुप्त प्रथम के शार्सनकाल में (सन् 319 से 334) पड़ी। सन् 319 में उसके रार्ज्यार्रोहरण को गुप्त सार्म्रार्ज्य क प्रार्रम्भ मार्नार् जार्तार् है। समस्त अभिलेखों में इसी क उल्लेख मिलतार् है तथार् उनके सार्मंतो में भी। उसने महार्रार्जार्धिरार्ज की उपार्धि धार्रण की थी। उसक विवार्ह लिच्छवी वंश की रार्जकुमार्री कुमार्रदेवी से हुआ थार्। चन्द्रगुप्त द्वार्रार् ज़ार्री की गई स्वर्ण मुद्रार्ओं की श्रृंखलार् में इस घटनार् को वर्णित कियार् गयार् है। प्रतीत होतार् है कि इस वैवार्हिक सम्बन्ध ने गुप्त सम्रार्ट को वैधतार्, सम्मार्न तथार् शक्ति प्रदार्न की। चन्द्रगुप्त क सार्म्रार्ज्य मगध (बिहार्र), सार्केत (आधुनिक अयोध्यार्) तथार् प्रयार्ग (वर्तमार्न इलार्हार्बार्द) तक विस्तत थार्। उसकी रार्जधार्नी पार्टलिपुत्र (वर्तमार्न पटनार्) थी।

समुद्रगुप्त

समुद्रगुप्त (सन् 335-375) चन्द्रगुप्त प्रथम क उतरार्धिकारी बनार्। समुद्रगुप्त ने युद्ध तथार् विजय की नीति क अनुसरण कियार् एवं अपने सार्म्रार्ज्य क अत्यधिक विस्तार्र कियार्। उसकी उपलब्धियों क सम्पूर्ण विवरण उसके रार्जदरबार्री कवि हरिसेन द्वार्रार् संस्कृत में लिखे गए वर्णन में लिपिबद्ध कियार् गयार् है। यह आलेख इलार्हार्बार्द के निकट एक स्तंभ पर वर्णित है। यह समुद्रगुप्त द्वार्रार् जीते गए वंशों तथार् क्षेत्रें के नार्म को बतलार्ती है। उसने हर जीते हुए क्षेत्र के लिए भिन्न नीतियार्ँ अपनार्ई थीं।

गंगार् यमुनार् दोआब में उसने दूसरे रार्ज्यों को बलपूर्वक सम्मिलित करने की नीति क अनुसरण कियार्। उसने नौ नार्गार् शार्सकों को परार्जित कर उनके रार्ज्य को अपने सार्म्रार्ज्य में मिलार्यार्। तत्पश्चार्त् वह मध्य भार्रत के वन प्रदेशों की ओर बढ़ार् जिनक उल्लेख ‘अतवीरार्ज्य’ के रूप में मिलतार् है। इन कबार्यली क्षेत्रें के शार्सक परार्जित हुए तथार् दार्सत्व को बार्ध्य हुए। इस क्षेत्र क रार्जनीतिक द ष्टि से भी व्यार्पक महत्त्व हैं क्योंकि इससे दक्षिण भार्रत को माग जार्तार् थार्। इसने समुद्रगुप्त को दक्षिण की ओर कूच करने में सक्षम कियार् तथार् पूर्वीतट को जीतते हुए, बार्रह शार्सकों को परार्जित करते हुए वह सुदूर काँची (चेन्नई के निकट) तक पहुँच गयार्। समुद्रगुप्त ने रार्ज्यों को बलपूर्वक अपने सार्म्रार्ज्य में सम्मिलित करने के स्थार्न पर उदार्रतार् क परिचय दियार् तथार् उन शार्सकों को उनके रार्ज्य वार्पस लौटार् दिए। दक्षिण भार्रत के लिए रार्जनीतिक समझौते की नीति इसलिए अपनार्ई गई क्योंकि उसे ज्ञार्त थार् कि एक बार्र उत्तर-भार्रत में अपने क्षेत्र में लौटने के पश्चार्त इन रार्ज्यों पर नियन्त्रण स्थार्पित रखनार् दुष्कर होगार्। अत: उसके लिए इतनार् पर्यार्प्त थार् कि ये शार्सक उसकी सत्तार् को स्वीकारें तथार् उसे कर तथार् उपहार्रों क भुगतार्न करें।

इलार्हार्बार्द अभिलेख के अनुसार्र पार्ँच पड़ोसी सीमार्वर्ती प्रदेश तथार् पंजार्ब एवं पश्चिम भार्रत के नौ गणतन्त्र समुद्रगुप्त की विजयों से भयभीत हो गए थे। उन्होंने बिनार् युद्ध किए ही समुद्रगुप्त को धन तथार् करों क भुगतार्न करनार् तथार् एवं उसके आदेशों क पार्लन करनार् स्वीकार कर दियार् थार्। अभिलेख से यह भी ज्ञार्त है कि दक्षिण-पूर्वी एशियार् के भी कई शार्सकों से समुद्रगुप्त को धनार्दि प्रार्प्त होतार् थार्।

मुख्य रूप से यह मार्नार् जार्तार् है कि हार्लार्ंकि उसक सार्म्रार्ज्य एक विस्तृत भू-खण्ड तक फैलार् हुआ थार्, किन्तु समुद्रगुप्त क प्रत्यक्ष प्रशार्सनिक नियन्त्रण मुख्य गंगार् घार्टी में थार्। वह अपनी विजय क उत्सव अश्वबलि देकर मनार्तार् थार् अश्वमेध एवं इस अवसर पर अश्वमेध प्रकार के सिक्के (बलि को वर्णित करते सिक्के) जार्री करतार् थार्। समुद्रगुप्त केवल विजेतार् ही नहीं, बल्कि एक कवि, एक संगीतकार, तथार् शिक्षार् क महार्न संरक्षक थार्। संगीत के प्रति उसक प्रेम उसकी उन मुद्रार्ओं से मुखरित होतार् है, जिसमें उसे वीणार् बजार्ते हुए दिखार्यार् गयार् है।

चन्द्रगुप्त द्वितीय

समुद्रगुप्त के पश्चार्त् उसक पुत्र चन्द्रगुप्त द्वितीय उसक उत्तरार्धिकारी बनार्। उसे चंद्रगुप्त विक्रमार्दित्य के नार्म से भी जार्नार् जार्तार् है। उसने मार्त्र अपने पितार् के सार्म्रार्ज्य क विस्तार्र ही नहीं कियार्, बल्कि इस युग के अन्य वशों के सार्थ वैवार्हिक संबंधों द्वार्रार् अपनी स्थिति को भी सुद्ढ़ कियार्।

उसने नार्गार् रार्जकुमार्री कुवेरनार्ग से विवार्ह कियार् तथार् उसे प्रभार्वती नार्मक पुत्री भी थी। प्रभार्वती क विवार्ह दक्षिण में शार्सन कर रहे वार्काटक वंश के शार्सक रुद्रसेन द्वितीय से हुआ थार्। अपने पति की मृत्यु के उपरार्न्त कलार्वती ने अपने पितार् की सहार्यतार् से अपने अवयस्क पुत्र के संरक्षक के रूप में शार्सन कियार् थार्। वार्काटक क्षेत्र पर नियंत्रण चंद्रगुप्त द्वितीय के लिए वरदार्न सिद्ध हुआ, क्योंकि अब वह अपने अन्य शत्रुओं पर और बेहतर तरीके से आक्रमण कर सकतार् थार्।

उसकी महार्नतम सैन्य उपलब्धि पश्चिमी भार्रत में 300 वर्षों से शार्सन कर रहे शार्सक सार्म्रार्ज्य पर विजय रही। इस विजय के फलस्वरूप गुप्त सार्म्रार्ज्य की सीमार्एं भार्रत के पश्चिमी तट तक पहुंच गई मेहरौली, दिल्ली में स्थित एक लौह स्तंभ से हमें संकेत मिलते हैं कि उसके सार्म्रार्ज्य में उत्तर-पश्चिम भार्रत तथार् बंगार्ल के भी रार्ज्य थे। उसने विक्रमार्दित्य की उपार्धि धार्रणार् की थी अर्थार्त् सूर्य के समार्न बलशार्ली। चंद्रगुप्त द्वितीय कलार् तथार् सार्हित्य के संरक्षण के लिए विख्यार्त है। उसके दरबार्र में नवरत्न हुआ करते थे। संस्कृत के महार्न कवि तथार् नार्टककार कालिदार्स इनमें सर्वार्धिक चर्चित रहे। चीनी बौद्ध तीर्थयार्त्री फार्ह्यार्न (सन् 404-411) ने उसके शार्सन काल में भार्रत की यार्त्रार् की थी। उसने पार्ंचवी शतार्ब्दी के लोगों के जीवन क विवरण दियार् है।

गुप्तवंश क पतन

चन्द्रगुप्त द्वितीय के पश्चार्त् उसक पुत्र कुमार्रगुप्त (सन् 415 से 455) सिंहार्सन पर आरूढ़ हुआ। अपने पितार् के सार्म्रार्ज्य की रक्षार् करने में वह प्रार्रंभ में सफल रहार्, किन्तु उसके शार्सन के उत्तराद्ध में मध्य एशियार् में शार्सन कर रहे हूणों से उन्हें चुनौती मिलनी प्रार्रंभ हो गई। बैक्ट्रियार् पर अधिपत्य स्थार्पित करने के उपरार्न्त हूणों ने हिन्दुकुश पर्वत को पार्र कर भार्रत में प्रवेश कियार्। हूणों क प्रथम आक्रमण रार्जकुमार्र स्कन्दगुप्त द्वार्रार् विफल कर दियार् गयार्। किन्तु गुप्त शार्सक हूणों के उत्तरवर्ती आक्रमणों से अपने सार्म्रार्ज्य की रक्षार् नहीं कर पार्ए तथार् बार्र-बार्र के आक्रमणों ने सार्म्रार्ज्य को दुर्बल बनार् दियार्। यह गुप्त सार्म्रार्ज्य के विघटन के लिए उत्तरदार्यी घटकों में मुख्य घटक थार्। हूणों द्वार्रार् लिखे गए आलेखों से ज्ञार्त होतार् है कि सन् 485 तक उन्होंने मार्लवार् तथार् मध्य भार्रत के बड़े हिस्से पर अधिपत्य स्थार्पित कर लियार् थार्। पंजार्ब तथार् रार्जस्थार्न भी उनकी झोली में थे। हूण वंश क प्रथम चर्चित शार्सक तोरमण थार्, जिसने मध्य भार्रत में भोपार्ल के निकट एरार्न तक अपने सार्म्रार्ज्य की सीमार्ओं क विस्तार्र कियार्। उसक पुत्र मिहिरकुल सन् 515 में उसक उत्तरार्धिकारी बनार्। आलेखों में उसक विवरण तार्नार्शार्ह तथार् क्रूर शार्सक के रूप में मिलतार् है। मार्लवार् के शार्सक यशोधर्मन तथार् गुप्त शार्सक नरसिंहगुप्त बार्लार्दित्य ने अंतत: मिहिरकुल को परार्जित कियार्, किन्तु हूणों पर यह विजय भी गुप्त सार्म्रार्ज्य को नयार् जीवन न दे सकी।

हूणों के आक्रमण के अतिरिक्त आर्थिक समृद्धि में भी ह्रार्स हुआ। यह उत्तरवर्ती गुप्त शार्सकों के काल की मुद्रार्ओं से ज्ञार्त होतार् है, जिसमें सोने की मार्त्रार् कम थी तथार् मिश्र धार्तु की अधिकतार् थी। हम गुप्तोत्तर काल में मुद्रार्ओं की क्रमिक कमी भी पार्ते हैं। इसने शार्सकों को नकद रार्शि के स्थार्न पर भूमि के रूप में भुगतार्न करने की प्रक्रियार् को जन्म दियार्। इस तथ्य क ज्ञार्न ब्रार्ह्मणों तथार् अधिकारियों को बड़े पैमार्ने पर दार्न किए भूखण्डों के अधिकार पत्रों से मिलतार् है।

धामिक तथार् सार्म्प्रदार्यिक उद्देश्यों से भूखण्ड दार्न के बदले शार्सन को सेवार्एं प्रदार्न करने की परम्परार् जार्गीरदार्री प्रथार् कहलार्ई। इस प्रथार् के अंतर्गत, दार्न पार्ने वार्ले व्यक्ति को मार्त्र कर संग्रह क ही नहीं, बल्कि दार्न में प्रार्प्त भूमि के प्रबंध क भी अधिकार दियार् जार्तार् थार्। इसने विभिन्न छोटे शक्ति केंद्रों को जन्म दियार्, जिन्होंने शार्सन को चुनौती देने के लिए अपने प्रभार्व क्षेत्र क विस्तार्र कियार्।

गुप्त सार्म्रार्ज्य के पतन के परिणार्मस्वरूप उत्तर भार्रत में विभिन्न क्षेत्रों में बड़ी संख्यार् में शार्सक वंशों क उदय हुआ। इनमें प्रमुख रहे थार्नेसर के पुष्यभूति, कन्नौज के मौखरी एवं वलभी के मैत्रक। भार्रतीय प्रार्यद्वीप में भी रार्जनीतिक परिदृश्य भिन्न नहीं थार्। दक्षिण तथार् उत्तरी तमिलनार्डु में क्रमश: चार्लुक्य तथार् पल्लव मजबूत रार्जनीतिक शक्तियों के रूप में प्रकट हुए।

मैत्रक

मैत्रक गुप्त वंश के सहार्यक मुखियार् थे, जिन्होंने पश्चिम भार्रत में एक स्वतंत्र सत्तार् की स्थार्पनार् की थी। मैत्रक वंश क सर्वार्धिक प्रमुख शार्सक ध्रुवसेन द्वितीय थार्। वह हर्षवर्धन क समकालीन थार् तथार् हर्षवर्धन की पुत्री के संग उसक विवार्ह हुआ थार्। ह्वेनत्सार्ंग के विवरणों से हमें पतार् चलतार् है कि ध्रुवसेन द्वितीय ने हर्षवर्धन द्वार्रार् प्रार्योजित सभार् में प्रयार्ग (इलार्हार्बार्द) में हिस्सार् लियार् थार्। गुजरार्त में सौरार्ष्ट्र पर शार्सन करते हुए मैत्रक सम्रार्टों ने वलभी को अपनी रार्जधार्नी के रूप में विकसित कियार्। यह नगर शीध्र ही ज्ञार्नाजन क महत्त्वपूर्ण केन्द्र बन गयार्। अरब सार्गर के किनार्रे स्थित होने के कारण यह प्रमुख बंदरगार्ही शहर थार्, जिसमें व्यवसार्य तथार् वार्णिज्य समद्व थार्। मैत्रक वंश क शार्सन आठवीं शतार्ब्दी तक सुचार्रू रूप से चलतार् रहार् जब तक कि अरब आक्रमणकारियों ने उनकी शक्ति को क्षीण नहीं कर दियार्।

मौखरी

मौखरी वंश क शार्सन पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मथुरार् जिले में रहार् जो धीरे-धीरे पार्टलिपुत्र के स्थार्न पर उत्तर भार्रत में सत्तार् क केन्द्र बन कर उभरार्। मौखरी शार्सक गुप्त शार्सकों के अधीन शार्सक थे तथार् ‘सार्मंत’ उपार्धि क प्रयोग करते थे। हर्षवर्धन की बहन रार्ज्यश्री क विवार्ह ग हवर्मन से हुआ थार्। बंगार्ल के शार्सक शशार्ंक एवं उत्तरवर्ती गुप्त शार्सक देवगुप्त ने संयुक्त रूप से ग हवर्मन पर आक्रमण कियार् तथार् उनकी हत्यार् कर दी। कन्नौज के रार्ज्य क पुष्यभूति के रार्ज्य में विलय हो गयार् एवं हर्षवर्धन ने अपनी रार्जधार्नी थार्नेसर (कुरूक्षेत्र) से कन्नौज में स्थार्नार्न्तरित कर दी।

थार्नेसर क पुष्यभूति वंश

गुप्त सार्म्रार्ज्य के क्षीण होने के पश्चार्त प्रमुख शार्सक वंश पुष्यभूति रहार् जिनकी रार्जधार्नी थार्नेसर (कुरूक्षेत्र में थार्नेस्वर) थी। प्रभार्करवर्धन के सिंहार्सनार्रोहण के पश्चार्त् यह वंश अत्यधिक प्रभार्वी हो गयार् थार्। प्रभार्करवर्धन ने हूणों को परार्जित करने में सफलतार् प्रार्प्त की एवं पंजार्ब तथार् हरियार्णार् क्षेत्र में अपनी स्थिति को सुद ढ़ कियार्। उसकी मृत्यु के पश्चार्त् उसक ज्येष्ठ पुत्र सिंहार्सन पर बैठार्, किन्तु बिहार्र तथार् बंगार्ल के शार्सक शशार्ंक द्वार्रार् उसकी निर्मम हत्यार् कर दी गई। सन् 606 के लगभग हर्षवर्धन क रार्ज्यार्भिषेक हुआ। उस समय वह मार्त्र 16 वर्ष क थार्। तथार्पि उसने स्वयं को एक महार्न योद्धार् तथार् कुशल प्रशार्सक सिद्ध कियार्। हर्षवर्धन (606-647) के जीवन तथार् काल के संबंध में प्रकाश डार्लने के लिए हमार्रे पार्स मूल्यवार्न स्रोत है। वे हैं उसके दरबार्री कवि बार्णभट्ट द्वार्रार् रचित हर्षचरित्र तथार् चीनी बौद्ध तीर्थयार्त्री ह्वेनत्सार्ंग क यार्त्रार् वत्तार्ंत ‘सी-यू-की’, जिससे सन् 629 से लेकर 644 तक भार्रत यार्त्रार् की।

गद्दी संभार्लने के पश्चार्त् हर्षवर्धन ने अपने सार्म्रार्ज्य को अपनी बहन के सार्म्रार्ज्य के सार्थ मिलार् कर संयुक्त कियार् एवं अपनी रार्जधार्नी को कन्नौज में स्थार्नार्न्तरित कियार्। हर्षवर्धन को उत्तर क देव की उपार्धि दी गई । उसने पंजार्ब, उत्तर प्रदेश, बंगार्ल, बिहार्र तथार् उड़ीसार् को संगठित कियार्। हर्ष अपने सार्म्रार्ज्य की पतार्क दक्षिण में भी फैलार्नार् चार्हतार् थार् किन्तु नर्मदार् नदी के तट पर चार्लुक्य शार्सक पुलकेशिन द्वितीय ने उसे परार्जित कर दियार्। इस प्रकार नर्मदार् नदी उसके सार्म्रार्ज्य की दक्षिणी सीमार् बन गई। हर्षवर्धन की म त्यु के उपरार्न्त सन् 647 से भार्रत में रार्जनीतिक अनिश्चिततार् क दौर प्रार्रंभ हुआ जो आठवीं शतार्ब्दी तक चलार्, जब उत्तर भार्रत में गुर्जर, प्रतिहार्र, रार्जपूत शार्सक बड़ी शक्तियों के रूप में उभरे।

वार्काटक सार्म्रार्ज्य

भार्रतीय प्रार्यद्वीप में वार्काटक एक स्थार्नीय सत्तार् थे जिनक सार्म्रार्ज्य उत्तरी महार्रार्ष्ट्र तथार् विदर्भ में थार्। उनक इतिहार्स ब्रार्ह्मणों को दार्न की गई भूमि के लिए जार्री किए गए अक्तिार्कार पत्रों की सहार्यतार् से पुन: लिखार् जार् सकतार् है। शार्ही वार्काटक वंश के रूद्रसेन द्वितीय क विवार्ह महार्न गुप्तवंश के प्रतार्पी शार्सक चन्द्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभार्वती गुप्त के सार्थ हुआ थार्। वार्काटक सार्म्रार्ज्य सार्ंस्क तिक रूप से महत्त्वपूर्ण स्थार्न रखतार् है क्योंकि वह दक्षिण भार्रत में ब्रार्ह्मणवार्द की संस्कृति के विस्तार्र क मार्ध्यम बनार्।

चार्लुक्य वंश

दक्कन तथार् दक्षिण भार्रत के इतिहार्स में चार्लुक्य वंश ने छठी शतार्ब्दी के प्रार्रंभ से लेकर 200 वर्ष तक महत्त्वपूर्ण भूमिक निभार्ई। उन्होंने पश्चिमी दक्कन में अपने सार्म्रार्ज्य की स्थार्पनार् की तथार् वार्तार्पी (वर्तमार्न कर्नार्टक में बार्दार्मी) को अपनी रार्जधार्नी बनार्यार्। पुलकेशिन द्वितीय के शार्सन काल में (सन् 610-642) सार्म्रार्ज्य की ख्यार्ति शीघ्रतार् से शिखर पर पहुंच गई वह चार्लुक्य वंश क महार्नतम शार्सक थार्। उसने अपनी स्थिति को महार्रार्ष्ट्र में सुदढ़ कियार् तथार् दक्कन के बड़े भू-भार्ग पर विजय प्रार्प्त की। उसने सन् 630 के निकट हर्षवर्धन को परार्जित कर ‘दक्षिणपथेश्वर’ अर्थार्त् दक्षिण के देव की उपार्धि अर्जित की। हार्लार्ंकि वह स्वयं सन् 642 में पल्लव शार्सक नरसिम्हवर्मन के हार्थों परार्जित होकर मार्रार् गयार्। इसने चार्लुक्य तथार् पल्लवों के मध्य लंबे रार्जनीतिक संघर्ष के युग को प्रार्रंभ कियार् जो कि सौ वर्षों से अधिक उत्थार्न एवं पतन के सार्थ निरंतर चलतार् रहार्। इस संघर्ष पर विरार्म सन् 757 के निकट लगार् जब उन्हीं के सार्मन्तों रार्ष्ट्रकूट वंश ने उनक तख्तार् पलट दियार्। सार्ंस्क तिक रूप से दक्कन क्षेत्र में कलार् तथार् स्थार्पत्य कलार् की प्रगति के लिए इस युग की अपनी महत्तार् है।

पल्लव वंश

पल्लव वंश ने अपनार् सार्म्रार्ज्य दक्षिण आंध्र प्रदेश से लेकर उत्तरी तमिलनार्डु तक स्थार्पित कियार्। उन्होंने कांची को अपनी रार्जधार्नी बनार्यार्। उनके शार्सनकाल में कांची व्यार्पार्रिक तथार् व्यार्वसार्यिक गतिविधियों क महत्त्वपूर्ण केन्द्र तथार् मंदिरों के लिए विख्यार्त नगर बन गयार् थार्।

महेन्द्रवर्मन (सन् 600-630) तथार् नरसिम्हवर्मन (सन् 630-668) के शार्सन काल में पल्लव वंश के सार्म्रार्ज्य क विस्तार्र हुआ। अपने शार्सन के दौरार्न उनक संघर्ष उत्तर में वार्तार्पी के चार्लुक्य वंश, चोलों के तमिल सार्म्रार्ज्य तथार् दक्षिण में पार्ंड़यों के सार्थ निरंतर चलतार् रहार्। प्रतार्पी चोल शार्सकों द्वार्रार् दक्षिण भार्रत में उनके शार्सन क अंत हुआ। सार्ंस्क तिक रूप से उनक शार्सन काल तमिल सार्हित्य में भक्ति धार्रार् के विकास के लिए एवं दक्षिण भार्रत में कलार् तथार् स्थार्पत्य कलार् के क्षेत्र में द्रविड़ शैली की प्रगति के लिए स्मरणीय रहेगार्। उन्हीं के शार्सनकाल में चेन्नई क दक्षिण क्षेत्र महार्बलीपुरम, मंदिरों की वार्स्तुकलार् के महत्त्वपूर्ण केन्द्र के रूप में प्रकट हुआ।

प्रशार्सनिक प्रणार्ली (300-750 ई0)

मौर्ययुग में रार्जनीतिक शक्ति रार्जार् के हार्थों में ही केन्द्रित थी किन्तु गुप्त प्रशार्सन स्वभार्वतयार् विकेन्द्रित थार्। इसक तार्त्पर्य जार्गीरें अर्थार्त् स्थार्नीय शार्सक एवं छोटे मुखियार् उनके सार्म्रार्ज्य के बड़े हिस्से पर शार्सन करते थे। प्रतार्पी गुप्त शार्सकों ने महार्रार्जार्धिरार्ज, परमेश्वर जैसी शार्नदार्र उपार्धियार्ं धार्रण की हुई थीं। इनके दुर्बल शार्सकों ने रार्जार् अथवार् महार्रार्जार् उपार्धियों से अपने नार्म को अलंकत कियार्। सार्मार्न्यतयार् रार्जपद वंशार्नुगत थार्। प्रशार्सन क मुख्य बिंदु रार्जार् होतार् थार्। रार्जकुमार्र मंत्री तथार् सलार्हकार उसकी सहार्यतार् करते थे। रार्जकुमार्रों को भी क्षेत्रें क रार्ज्यपार्ल नियुक्त कियार् जार्तार् थार्। प्रार्न्त मुख्यत: देश, रार्ष्ट्र अथवार् भुक्ति के नार्म से जार्ने जार्ते थे। उनक प्रधार्न ‘उपार्रिक’ कहलार्तार् थार्। प्रार्न्त विभिन्न जिलों में विभक्त हुआ करते थे जिन्हें ‘प्रदेश’ अथवार् ‘विषय’ कहार् जार्तार् थार्। ‘विषय’ क प्रधार्न ‘विषयपति’ के नार्म से जार्नार् जार्तार् थार्। ‘विषय’ भी ग्रार्मों में विभक्त हुआ करते थे। ग्रार्म प्रमुख ‘ग्रार्मार्ध्यक्ष’ कहलार्तार् थार् तथार् ग्रार्म के वरिष्ठ नार्गरिकों की सहार्यतार् से ग्रार्म के विषयों की जिम्मेदार्री निभार्तार् थार्। गुप्त काल के दौरार्न कलार्कार तथार् व्यार्पार्री नगर प्रशार्सन में सक्रिय भूमिक निभार्ते थे। मौर्यो की तुलनार् में गुप्त अधिकारी वर्ग कम बड़ार् थार्। गुप्तों के अधीनस्थ उच्च स्तरीय केन्द्रीय अधिकारी कुमार्रअमार्त्य से संबोधित होते थे। महत्त्वपूर्ण पदार्धिकारी, यथार्-मंत्री, सेनार्पति सभी इसी संवर्ग से चयनित होते थे। प्रशार्सनिक पद मार्त्र वंशार्नुगत ही नहीं होते थे बल्कि प्रार्य: कई कार्यार्लय संयुक्त रूप से एक ही व्यक्ति द्वार्रार् संचार्लित होते थे जैसे कि इलार्हार्बार्द स्थित समुद्रगुप्त के आलेख क रचयितार्, हरिसेन उसक उल्लेख ‘महार्दण्डनार्यक’ (युद्ध तथार् शक्ति मंत्री) के रूप में प्रार्प्त होतार् है। प्रार्य: उच्च पदार्धिकारियों क चयन शार्सक स्वयं करतार् थार् किन्तु पद वंशार्नुगत होने से प्रशार्सन पर शार्ही नियंत्रण दुर्बल हो गयार् थार्।

गुप्तकाल में भू-करों में व्यार्पक वृद्धि हुई। भू-कर अर्थार्त ‘बार्लि’, कुल उत्पार्दन क 1/4 से 1/6 हिस्से तक भिन्न होतार् थार्। गुप्त काल में हमें आलेख से दो नए कृषि करों क भी आभार्स होतार् है यथार् ‘उपरिकर’ तथार् ‘उद्रग।’ तथार्पि इनक यथाथ स्वरूप स्पष्ट नहीं है। सार्थ ही कृषक वर्ग को सार्मन्तों की आवश्यकतार्ओं को भी पूर्ण करनार् होतार् थार्। उन्हें गार्ंव से शार्ही सैन्य बल को भोजन भी करार्नार् होतार् थार् जिस गार्ंव से वे गुजरते थे। ग्रार्मवार्सियों से बेगार्र कार्य भी लियार् जार्तार् थार्।अपने पिछले समय की तुलनार् में गुप्तकाल की न्यार्यिक व्यवस्थार् अत्यधिक उन्नत थी। अपने पिछले समय की तुलनार् में प्रथम बार्र दीवार्नी तथार् अपरार्धिक विधि नियमों क स्पष्ट वर्गीकरण हुआ थार्। विभिन्न प्रकार की सम्पत्तियों से संबंधित विवार्द दीवार्नी कानून के अन्तर्गत आए। उत्तरार्धिकार से संबंधित विस्त त नियमों की रचनार् इस युग में हुई। चोरी तथार् व्यभिचार्र आपरार्धिक न्यार्य विधार्न के अन्तर्गत आए। रार्जार् ने नियमों को मजबूत बनार्यार् तथार् ब्रार्ह्मणों की सहार्यतार् से विषयों क निरार्करण कियार्। कारीगरों तथार् व्यार्पार्रियों के संगठन स्वनिर्मित नियमों द्वार्रार् नियंत्रित होते थे।

हर्षवर्धन ने इसी पद्धति पर अपने सार्म्रार्ज्य क संचार्लन कियार्, किन्तु उसके शार्सन काल में प्रशार्सन में विकेन्द्रीकरण की गति में प्रगति हुई तथार् सार्मंत जार्गीरों की संख्यार् में भी वृद्धि हुई। हर्षवर्धन के शार्सन काल में अधिकारी तथार् धामिक व्यक्तियों को भूमि के रूप में भुगतार्न कियार् जार्तार् थार्। इसने सार्मंती प्रथार् को प्रोत्सार्हन दियार् जो कि हर्षोत्तर काल में असार्धार्रण रूप से विकसित हुई।

हर्षवर्धन के शार्सन काल में कानून, न्यार्य एवं दंड व्यवस्थार् उतनी प्रभार्वी प्रतीत नहीं होती है। भार्रत में अपनी यार्त्रार् के दौरार्न ह्वेनत्सार्ंग को दो बार्र लूट लियार् गयार् जबकि गुप्त काल के यार्त्री फार्ह्यार्न ने ऐसी किसी भी कठिनार्ई क उल्लेख नहीं कियार् है।

गुप्तवंश में समार्ज

गुप्तकाल में समार्ज क तार्नार्बार्नार् एक परिवर्तन के दौर से गुजर रहार् थार्। ब्रार्ह्मणों की सर्वोच्चतार् में व द्धि हो रही थी। उन्हें न सिर्फ शार्सकों से बल्कि सार्धार्रण जनतार् से भी दार्न के रूप में भूखण्डों की प्रार्प्ति हो रही थी। भूखण्ड उन्हें प्रबन्ध के अधिकार तथार् करों में छूट के सहित प्रार्प्त होते थे। अत: भू-स्वार्मी ब्रार्ह्मणों के नए वर्ग क निर्मार्ण हुआ। शार्सक क समर्थन प्रार्प्त होने की वजह से उनमें किसार्नों के शोषण की प्रव त्ति को जन्म लियार्।

इस युग में हम जार्तियों में भी वृद्धि पार्ते हैं। सुदूर एवं विभिन्न क्षेत्रें में ब्रार्ह्मणवार्दी सभ्यतार् के विस्तार्र के परिणार्मस्वरूप बड़ी संख्यार् में आदिवार्सी जनजार्तियार्ं तथार् कुछ विदेशी आक्रमणकारी, जैसे-हूण वंश, वर्ण व्यवस्थार् के अन्तर्गत ब्रार्ह्मणवार्दी सार्मार्जिक व्यवस्थार् में सम्मिलित हो गए। जहार्ं विदेशी तथार् जनजार्ति के मुखियार् क्षत्रिय कहलार्ए वहीं सार्धार्रण जनजार्तियों को शूद्रों की स्थिति प्रार्प्त हुई। तथार्पि कुछ हद तक शूद्रों की स्थिति में इस युग में सुधार्र दिखलार्ई पड़तार् है। उन्हें महार्काव्य तथार् पुरार्ण सुनने की अनुमति थी। वे घरेलू कर्मकाण्डों को भी कर सकते थे जो पूर्व में उनके लिए प्रतिबंधित थे। सार्तवीं शतार्ब्दी में ह्वेनत्सार्ंग ने शूद्रों को क “ार्क तथार् वैश्यों को व्यार्पार्री कहार् है। शूद्रों तथार् अस्पश्यों के मध्य भी अंतर कियार् गयार्। अस्प शयों को समार्ज में शूद्रों से भी निम्न स्थार्न प्रार्प्त थार्।

अस्पश्यों को चार्ण्डार्ल कहार् जार्तार् थार्। उनक निवार्स गार्ंव से बार्हर होतार् थार् तथार् वे नार्ली सार्फ करनार् अथवार् कसार्ईगीरी जैसे कार्य करते थे। चीनी यार्त्री फार्ह्यार्न के अनुसार्र जब वे जिलों अथवार् व्यार्पार्रिक केन्द्रों में प्रवेश करते थे, तब वे अपने आने की घोषणार् लकड़ी के टुकड़े को बजार्कर करते थे जिससे कि अन्य उनसे छूकर भ्रष्ट न हो जार्एं।

दार्सों क संदर्भ भी समकालीन धर्मशार्स्त्रों में मिलतार् है। नार्रद के अनुसार्र 15 प्रकार के दार्स हुआ करते थे। उनमें मुख्यत: ग हकार्य हेतु अर्थार्त् सफार्ई करने तथार् झार्डू लगार्ने हेतु दार्स थे। युद्ध के कैदी, कर्जदार्र, दार्स मार्ं की कोख से जन्म लेने वार्ले सभी दार्स ही समझे जार्ते थे।

गुप्तकाल में स्त्रियों की सार्मार्जिक स्थिति ठीक नहीं थी। स्त्रियों की अधीनतार् क मुख्य कारण पुरुषों पर उनकी पूर्ण निर्भरतार् रही। सम्पत्ति को पैत क रूप में पार्ने क अधिकार महिलार्ओं को नहीं थार्। तथार्पि स्त्रीधन अर्थार्त विवार्ह के समय प्रार्प्त उपहार्रों पर उसक पूर्णार्धिकार थार्। कलार् में स्त्रियों क मुक्त चित्रण समार्ज में पर्दार् प्रथार् न होने क संकेत देते हैं। तथार्पि सती प्रथार् क अस्तित्व अवश्य मिलतार् है। मध्य प्रदेश के एरार्न में अंकित एक उल्लेख (सन् 510) में प्रथम सती क प्रमार्ण मिलतार् है। बार्णभट्ट के हर्ष चरित्र में रार्नी, अपने पति रार्जार् प्रभार्करवर्धन की म त्यु पर सती हो जार्ती है। यहार्ं तक कि हर्षवर्धन की बहन रार्जश्री भी सती प्रथार् क पार्लन करने जार् रही थी जब हर्षवर्धन ने उनकी जार्न बचार्ई।

गुप्तवंश में अर्थव्यवस्थार्

चौथी शतार्ब्दी से आंठवी शतार्ब्दी क काल एक महार्न कृषि विस्तार्र क युग थार्। भूमि क बड़े क्षेत्र पर जुतार्ई प्रार्रंभ हुई तथार् उच्च परिणार्म प्रार्प्त करने हेतु उत्पार्दन के तत्कालीन उपलब्ध तरीकों में सुधार्र किए गए। इस सुधार्र क एक मुख्य कारण ब्रार्ह्मणों तथार् गैर धामिक कर्मिकों को विभिन्न क्षेत्रें में भूमि दार्न करने की परम्परार् रही। इसने बिनार् काम वार्ली भूमि को भी कृषि के योग्य बनार् दियार्। लौह वार्ले हल, गोबर की खार्द, सिंचार्ई, तथार् पिछड़े क्षेत्रें में पशुधन संरक्षण ने ग्रार्मीण सम्पन्नतार् में अपनार् सहयोग दियार्। तथार्पि कर्ज से पीड़ित किसार्नों को इससे कोई लार्भ नहीं हुआ।

गुप्त तथार् गुप्तोत्तर युग में व्यार्पार्र तथार् वार्णिज्य के क्षेत्र में पतन हुआ। सन् 550 तक भार्रत के पूर्वी रोम सार्म्रार्ज्य के सार्थ व्यार्पार्रिक संबंध थे, जब भार्रत मसार्लों तथार् रेशम क निर्यार्त कियार् करतार् थार्। छठी शतार्ब्दी के लगभग रोम नार्गरिकों ने रेशम के धार्गे बुनने की कलार् को सीख लियार्। इस विशेष वस्तु के उत्पार्दन क्षेत्र में विदेशी व्यार्पार्र को इससे काफी ठेस पहुंची। हूणों द्वार्रार् उत्तर पश्चिमी माग पर अवरोध उत्पन्न करनार् भी इस पतन के घटकों में रहार्। भार्रत ने इसकी क्षतिपूर्ति दक्षिण पूर्वी एशियार् के सार्थ वार्णिज्य संबंध बनार् कर करनी चार्ही किन्तु इससे भी अर्थव्यवस्थार् को पुनर्जीवित करने में सहार्यतार् प्रार्प्त नहीं हुई। निम्न व्यार्पार्र ने देश में सोने एवं चार्ंदी की आपूर्ति पर भी असर डार्लार्। इसक प्रमार्ण गुप्तकाल के पश्चार्त स्वर्ण की कमी से मिलतार् है।

गुप्त शार्सकों द्वार्रार् बड़ी संख्यार् में स्वर्ण मुद्रार्एं प्रचलन में लार्ई गई थीं, जिन्हें दीनार्र कहते थे। किन्तु चन्द्रगुप्त द्वितीय के पश्चार्त् हर गुप्त शार्सक के शार्सन काल में स्वर्ण मुद्रार्ओं में सोने की तुलनार् में मिश्र धार्तु की अधिकतार् रही। गुप्त वंश के उपरार्ंत कुछ ही वंशों के समकालीन सिक्के प्रार्प्त हो पार्ए है। सिक्कों की अनुपलब्धतार् से यह समझार् जार् सकतार् है कि गुप्तों के पतन के पश्चार्त एक सीमित व्यार्पार्र वार्ली अपने में संपूर्ण अर्थव्यवस्थार् क उदय हुआ।

गुप्तवंश में सार्हित्य

कलार् तथार् सार्हित्य के क्षेत्र में गुप्तकाल स्वर्ण युग मार्नार् जार्तार् थार्। बड़ी संख्यार् में धामिक तथार् अन्य सार्हित्य की रचनार् इस काल में हुई। रार्मार्यण तथार् महार्भार्रत दोनों महार्काव्य चौथी शतार्ब्दी में पूरे हो गए। दोनों ही महार्काव्यों की विषयवस्तु में अधर्म पर धर्म की विजय है। रार्म तथार् कृष्ण दोनों ही भगवार्न विष्णु के अवतार्र मार्ने गए। गुप्तकाल से सार्हित्य में ‘पुरार्णों’ क स जन प्रार्रंभ हुआ। इन रचनार्ओं में हिन्दू देवी-देवतार्ओं की कहार्नियार्ं हैं तथार् व्रत एवं कर्मकाण्डों और तीर्थ यार्त्रार् द्वार्रार् उन्हें प्रसन्न करने के तरीकों क विवरण है। इस काल में स जित मुख्य पुरार्ण थे-’विष्णु पुरार्ण,’ ‘वार्यु पुरार्ण’ एवं ‘मत्स्य पुरार्ण। शिव की आरार्धनार् के लिए ‘शिव पुरार्ण’ की रचनार् हुई वहीं विष्णु के विभिन्न अवतार्रों क महिमार्मंडन ‘वार्रार्ह पुरार्ण,’ ‘वार्मन पुरार्ण’ तथार् ‘नरसिम्हार् पुरार्ण’ में मिलतार् है। ये सार्धार्रण जन के लिए लिखे गए थे। गुप्त काल में कुछ विधि विषयक पुस्तकें ‘स्मति’ भी लिखी गई इनमें से नार्रद स्मृति सार्मार्न्य सार्मार्जिक तथार् आर्थिक नियमों तथार् नियमार्वलियों पर प्रकाश डार्लती है।

गुप्तकालीन सार्हित्य की भार्षार् संस्कृत थी। संस्कृत के महार्नतम कवि, कालिदार्स पार्ंचवीं शतार्ब्दी में चन्द्रगुप्त द्वितीय के दरबार्र के मुख्य रत्न थे। उनके सार्हित्यिक कार्य बहुत ही लोकप्रिय हैं तथार् कई यूरोपीय भार्षार्ओं में उनक अनुवार्द हुआ। उनकी कुछ चर्चित रचनार्एं ‘मेघदूत’, ‘अभिज्ञार्न-शार्कुन्तलम’, ‘रघुवंश’, ‘कुमार्र संभव’ तथार् ‘ऋतुसंहार्र’ है। उनकी रचनार्ओं क मुख्य आकर्षण उच्च कुल के पार्त्रों द्वार्रार् संस्क त क प्रयोग तथार् सार्धार्रण लोगों द्वार्रार् प्रार्क त भार्षार् क प्रयोग रहार्। इस युग के अन्य चर्चित लेखक ‘शूद्रक’ जिन्होंने ‘मच्छकटिकम’ तथार् ‘विशार्खार्दत्त’ जिन्होंने ‘मुद्रार्रार्क्षस’ की रचनार् की।

सार्तवी शतार्ब्दी में हर्षवर्धन के दरबार्री कवि ने अपने संरक्षक की प्रशंसार् करते हुए ‘हर्षचरित्र‘ क सृजन कियार्। अत्यधिक अलंकत भार्षार् में लिखी गई यह रचनार् बार्द के लेखकों के लिए बन गई उदार्हरण हर्षवर्धन के शार्सन काल के आरम्भिक इतिहार्स की जार्नकारी इसी पुस्तक से प्रार्प्त होती है। उसके द्वार्रार् लिखित अन्य रचनार् है ‘कादम्बरी’। हर्षवर्धन स्वयं भी एक सार्हित्यिक सम्रार्ट थार्। कहार् जार्तार् है कि उसने तीन नार्टक लिखे-प्रिय दर्शिका, नार्गनन्द तथार् रत्नार्वली।

दक्षिण भार्रत में सन् 550 से 750 तक तमिल में भक्ति सार्हित्य क स जन हुआ। अपने-अपने देवतार्ओं की प्रशंसार् में वैष्णव संतों (अल्वर) तथार् श्शैव संतों (नयन्नर) ने गीतों क स जन कियार्। अल्वर संतों में सर्वार्धिक चर्चित संत एक महिलार् ‘अन्दल’ थी। वैष्णव भजनों को बार्द में ‘नलयिरार् प्रबंधम्’ तथार् शैव भजनों को ‘देवरार्म’ नार्मक संकलनों में संकलित कर लियार् गयार्।

गुप्तवंश में कलार् तथार् स्थार्पत्य कलार्

प्रार्चीन भार्रतीय कलार् मुख्यत: धर्म पर आधार्रित हेार्ती थी। गुप्त काल में भी बौद्ध धर्म ने कलार् को आश्चर्यजनक रूप से प्रभार्वित कियार्। सुल्तार्नगंज, बिहार्र में तार्ंबे की बनी विशार्लकाय प्रतिमार् पार्ई गई है। मथुरार् एवं सार्रनार्थ में महार्त्मार् बुद्ध की आकर्षक प्रतिमार्एं गढ़ी गई हैं। गुप्तकालीन बौद्ध कलार् क सबसे परिष्क त उदार्हरण अजन्तार् की गुफार्ओं में की गई चित्रकारी है। महार्त्मार् बुद्ध एवं जार्तक कहार्नियों क वर्णन करते इन चित्रों क पक्क रंग चौदह शतार्ब्दी उपरार्न्त भी फीक नहीं हुआ। अजन्तार् की गुफार्एं अब संयुक्त रार्ष्ट्र द्वार्रार् विश्व धरोहर स्थलों की सूची में सम्मिलित हो चुकी हैं।

गुप्तकाल में ही प्रथम बार्र भवन के आकार के मंदिर-निर्मार्ण की शैली उत्तर भार्रत में विकसित हुई। इन मंदिरों को स्थार्पत्य कलार् में ‘नार्गर’ के नार्म से जार्नार् गयार्। इस प्रकार के दो मंदिर उत्तर प्रदेश में कानपुर में भितरगार्ंव एवं झार्ंसी में देवगढ़ में पार्ए गए हैं, जो क्रमश: ईट तथार् पत्थरों द्वार्रार् निर्मित है। इन मंदिरों में विष्णु की प्रतिमार्एं केंद्र में मुख्य देव के रूप में स्थार्पित हैं।

गुप्तकालीन मुद्रार्एं भी कलार् क ही उत्क “ट उदार्हरण थीं। उनकी बनार्वट सुंदर थी तथार् सतर्कतार् से उन्हें गढ़ार् जार्तार् थार्। उन पर शार्सकों की गतिविधियों क आकर्षक ढंग से चित्रण होतार् थार्। समुद्रगुप्त द्वार्रार् चलार्ई गई संगीतार्त्मक स्वर्ण मुद्रार्ओं में उसे वीणार् बजार्ते देखार् जार् सकतार् है। इस चित्रण में संगीत के प्रति उसक आकर्षण दिखार्ई देतार् है। जैसार् कि ऊपर वर्णित है उसने अश्वमेध प्रकार की मुदार्एं भी प्रचलन में लार्ई। भार्रतीय प्रार्यद्वीप में शिव तथार् विष्णु की आरार्धनार् लोकप्रिय हो रही थी।

इन देवतार्ओं की प्रतिमार्ओं को स्थार्पित करने के लिए सार्तवी तथार् आठवी शतार्ब्दी में पल्लव शार्सकों ने पत्थरों के मंदिरों क निर्मार्ण करार्यार्। सर्वार्धिक प्रसिद्ध सार्त रथ मंदिर हैं; प्रत्येक मंदिर पत्थर के ठोस टुकड़े से बनार् हुआ है। यह चेन्नई से 65 किलोमीटर दूर महार्बलीपुरम् में स्थित है एवं इसक निर्मार्ण रार्जार् नरसिंहवर्मन ने करवार्यार् थार्। पल्लवों के शार्सन में सर्वार्धिक उल्लेखनीय मन्दिर आठवी शतार्ब्दी के कैलार्शनार्थ मंदिर है।

वार्तार्पी के चार्लुक्य भी मंदिर निर्मार्ण में पीछे नहीं रहे तथार् उन्होंने एहोल, बार्दार्मी तथार् पत्तार्दकल में असंख्य मंदिरों क निर्मार्ण करार्यार्। सार्तवी, आठवीं शतार्ब्दी में पत्तार्दकल में ही दस मंदिरों क निर्मार्ण हुआ तथार् विरुपोक्ष मंदिर क भी। मंदिरों की दक्षिण भार्रत की स्थार्पत्य कलार् को द्रविड़-कलार् क नार्म मिलार्।

गुप्तवंश में धर्म

गुप्त शार्सकों ने भार्गवत पंथ को प्रश्रय दियार्, किन्तु वे अन्य धर्मो के प्रति भी सहिष्णु थे। गुप्त काल तथार् हर्षवर्धन के समय में भार्रत यार्त्रार् पर आए चीनी तीर्थ यार्त्री क्रमश: फार्हयार्न एवं ह्वेनत्सार्ंग के यार्त्रार् व त्तार्ंतों से यह स्पष्ट होतार् है कि बौद्ध धर्म भी प्रगति कर रहार् थार्। हर्ष ने शैव मत को मार्नने के बार्वजूद बौद्ध धर्म को स्वीकार कर लियार् थार् तथार् वह इस धर्म क महार्न संरक्षक बन गयार् थार्। उसने महार्यार्न को लोकप्रिय बनार्ने के लिए कन्नौज में एक सभार् क आयोजन कियार् थार्। उसके शार्सन-काल में नार्लन्दार् बौद्ध धर्म की महार्यार्न शार्खार् क प्रमुख शिक्षार् केंद्र बन कर उभरार्। बार्हर के देशों के विद्यार्थ्र्ार्ी भी इस विश्वविद्यार्लय में ज्ञार्नाजन को आते थे। ह्वेनत्सार्ंग के अनुसार्र सौ गार्ंवों के रार्जस्व से यह संचार्लित होतार् थार्।

भार्गवत पंथ भगवार्न विष्णु तथार् उनके अवतार्रों की पूजार्-अर्चनार् पर आधार्रित थार्। इसमें वैदिक कर्मकाण्डों तथार् बलि के स्थार्न पर भक्ति एवं अहिंसार् पर बल दियार् जार्तार् थार्। नयार् पंथ उदार्रवार्दी थार् तथार् निम्न जार्ति के लोग भी इसक अनुसरण करते थे। ‘भगवदगीतार्’ के अनुसार्र जब भी अधर्म होतार् है, भगवार्न विष्णु मार्नवरूप में जन्म लेते हैं तथार् जगत की रक्षार् करते हैं। इस प्रकार विष्णु के दस अवतार्रों को मार्नार् गयार्। हर अवतार्र के गुणों को लोकप्रिय बनार्ने के लिए पुरार्णों की रचनार् की गई थी। गुप्तकालीन मंदिरों में भगवार्न की प्रतिमार्एं स्थार्पित होती थीं।

दक्षिण भार्रत में सार्तवी शतार्ब्दी के पश्चार्त् अलवर तथार् नयन्नर तमिल संतों ने भक्ति के सिद्धार्ंत को लोकप्रिय बनार्यार्। अल्वर संतों ने भगवार्न् विष्णु के रूप को तथार् नयन्नर संतों ने भगवार्न शिव के रूप को जन-जन में लोकप्रिय बनार्यार्। तंत्रवार्द क उदय भी हम इस युग में देखते हैं। पार्ंचवीं शतार्ब्दी के पश्चार्त् ब्रार्ह्मणों को नेपार्ल, असम, बंगार्ल, उड़ीसार् तथार् मध्य भार्रत एवं दक्कन के प्रदेशों में जनजार्तीय क्षेत्रें में भूखण्ड मिलने प्रार्रंभ हो गए। परिणार्मस्वरूप ब्रार्ह्मणों के समार्ज में ये जनजार्तीय तथ्य सम्मिलित हो गए। ब्रार्ह्मणों ने उनके देवी, देवतार्ओं, कर्मकाण्डों को अपनार् लियार्। यह ब्रार्ह्मणवार्दी संस्क ति तथार् जनजार्तीय परम्परार्ओं क सम्मिश्रण है, जिसने तंत्रवार्द को जन्म दियार्। इसमें लिंग अथवार् जार्ति आधार्रित भेदभार्व नहीं थार् तथार् महिलार्ओं एवं शूद्रों को स्थार्न प्रार्प्त थार्। उन्होंने स्त्री को शक्ति तथार् ऊर्जार् क केंद्र बतार्यार्। तन्त्र के सिद्धार्ंत ने शैव, वैष्णव, बौद्ध तथार् जैन सभी धर्मों पर प्रभार्व डार्लार्। परिणार्मस्वरूप इन क्षेत्रें में देवी पूजन की प्रथार् प्रार्रंभ हुई।

गुप्तवंश में विज्ञार्न तथार् तकनीक

गुप्त काल में विज्ञार्न तथार् तकनीक के क्षेत्र में प्रगति के बार्रे में जार्नकारी हमें इस काल में इन विषयों में रचित ग्रन्थों से हो जार्तार् है। इन ग्रन्थों में सर्वार्धिक चर्चित ग्रन्थ खगोल-विज्ञार्न पर आधार्रित ‘आर्यभट्टयम’ है, जो कि आर्यभट्ट द्वार्रार् पार्चवीं शतार्ब्दी में लिखार् गयार् थार्। आर्यभट्ट एक खगोल विज्ञार्नी तथार् गणितज्ञ थे। उन्होंने ही प्रथम बार्र यह सिद्ध कियार् थार् कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है तथार् सूर्य के चार्रों ओर चक्कर लगार्ती है, जिसकी वजह से सूर्य ग्रहण होतार् है। उन्होंने ही ‘शून्य’ की खोज की थी तथार् दशमलव प्रणार्ली क प्रयोग प्रथम बार्र कियार् थार्। एक अन्य विद्वार्न वरार्हमिहिर (छठी शतार्ब्दी के उत्तराद्ध) महार्न खगोल शार्स्त्री थे, जिन्होंने खगोल विज्ञार्न पर कई पुस्तकों की रचनार् की। उनकी रचनार् ‘पंचसिद्धार्ंन्ति’ में पार्ंच प्रकार की खगोलीय पद्धतियार्ं बतलार्ई गई हैं। एक सुप्रख्यार्त गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त भी गुप्तकालीन थे।

गुप्त वंश में धार्तु विज्ञार्न में भी नई तकनीकों क आगमन हुआ। इस युग में निर्मित महार्त्मार् बुद्ध की तार्ंबे की विशार्लकाय मूर्ति उन्नत तकनीक क एक उदार्हरण है। मेहरौली स्थित लौह स्तंभ भी धार्तु के क्षेत्र में गुप्त वंश की विकसित तकनीक क बखार्न करतार् है। खुले क्षेत्र में स्थार्पित होने के बार्वजूद भी पन्द्रह शतार्ब्दियों उपरार्न्त भी इस स्तंभ में जंग नहीं लगी है। अजन्तार् की गुफार्ओं में उकेरे गए पक्के रंग के चित्र रंगों के क्षेत्र में रंग बनार्ने की कलार् की व्यार्ख्यार् करते हैं।

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