गुप्तकाल में सार्ंस्कृतिक विकास

गुप्तकाल में सार्ंस्कृतिक विकास

1. ब्रार्ह्मण और बौद्धधर्म क विकास- 

गुप्तों के पूर्व शार्सन काल में बौद्ध धर्म एक प्रमुख धर्म थार् । गुप्त सम्रार्ट ब्रार्ह्मण धर्म के अनुयार्यी थे, इस कारण ब्रार्ह्मण धर्म के विकास में सहयोग दियार् । हिन्दू धर्म क पुनर्जार्गरण हुआ। बौद्ध धर्म के विकास में अवरोध उत्पन्न हुआ । गुप्तकाल में ब्रार्ह्मणों क प्रभार्व अत्यधिक बढ़ार् । इसकाल में हिन्दू देवी देवतार्ओं की मूर्तियार्ं बनी । इसके अतिरिक्त यह काल धामिक और धर्म निरपेक्ष सार्हित्य के लिए प्रसिद्ध है । गणित और विज्ञार्न के क्षेत्र में आश्चर्यजनक विकास हुआ । अशोक ने बौद्ध धर्म को संरक्षण दियार् और अपने जीवन क अधिक समय शार्न्ति और अहिंसार् के प्रचार्र में लगार्यार् । सम्रार्ट ब्रार्म्हणों को ग्रार्मदार्न भी दियार् करते थे ।

2. जार्तियों क आविर्भार्व- 

इस काल में अनेक जार्तियों क आविर्भार्व हुआ, वर्ण प्रभार्वित होने लगार् । विजेतार् आक्रन्तार्ओं ने अपने आप को उच्च कुल कहने लगार् । हूण रार्जपूत स्वीकार करने लगे । जार्तियों क निर्मार्ण होने लगार् युद्ध बंदियों व दार्सों को कार्य क बंटवार्रार् कियार् जार्ने लगार् व उसे जार्तियों में बार्ंटने लगे । जो शार्रीरिक व कठोर परिश्रम क कार्य करते थे उन्हें शुद्र कहार् । शुद्रों की स्थिति दियनीय थी कठोर परिश्रम के बार्वजूद इन्हें अच्छे भोजन पार्नी की सुविधार् नहीं होती थी । तथार्कथित उच्च समार्ज शुद्रों के सार्थ धृणार्पूर्ण व्यवहार्र करते थे व उन्हें नीची निगार्ह से देखते थे ।

3. स्त्रियों की दशार्- 

इस काल में स्त्रियों की दशार् में सुधार्र हुआ । वह पुरूषों के सार्थ कंघे से कंघार् मिलार्कर काम करती थी । घुमने फिरने कार्यकरने, धामिक अनुष्ठार्न में सहयोग करने व पवित्र कार्यो में सहभार्गितार् निभार्ती थी । धामिक ग्रंथ पढ़ने सुनने क अधिकार थार् । सती प्रथार् क उदार्हरण सर्वप्रथम 510 र्इ. में मिलतार् है । सार्थ ही उन्हें पुर्नविवार्ह क भी अधिकार मिलार् ।

4. सदार्चार्रितार्- 

गुप्तकालीन समार्ज व लार्गे ों में नैतिकलार् क पार्लन कियार् जार्तार् थार् । सार्मार्जिक आदर्शों से परिपूर्ण थार् । सदार्चार्र, सत्य, समम्भार्व, अहिंसार् के गुण विद्यमार्न थे । फार्ह्यार्न के अनुसार्र- ‘‘जनतार् में अपरार्ध करने की भार्वनार् ही नहीं थी । जनतार् सुखी संतुष्ठ और समृद्ध थी ।’’

5. धर्म- 

भार्रतीय यूनार्नी रार्जार् मिनेन्डर बौद्ध धर्म में दीक्षित हो गयार् । बौद्ध धर्म को रार्जकीय संरक्षण प्रदार्न कियार् । कनिष्क ने भी बौद्ध धर्म के विकास विस्तार्र के प्रयार्स कियार् । उसी के शार्सन काल में महार्यार्न बौद्ध धर्म की शिक्षार्ओं को अन्तिम रूप देने के लिए चौथी बौद्धसभार् क आयोजन कियार् गयार् थार् । महार्यार्न सम्प्रदार्य में धीरे-धीरे बुद्ध की मूर्ति क पूजार् करने लगार् । इस तरह मूर्ति पूजार् क प्रचलन प्रार्रम्भ हुआ ।

गुप्तकाल में ब्रार्म्हणवार्द प्रार्रंभिक वैदिक धर्म से काफी भिन्न थार् । वैदिक काल के देवी देवतार्ओं की महत्तार् बढ़ गर्इ । इन्द्र, अग्नि, व सूर्य आदि कृष्ण को देवतार् के विष्णु अवतार्र के रूप में पूजार् किये जार्ने लगार् । ब्रार्म्हणों के पुनरूथार्न के बार्द बहुत ही धामिक रचार्नार्ऐं लिखी गर्इ । इस काल में रार्मार्यण महार्भार्रत को विस्तृत कियार् गयार् ।
गुप्त काल में यज्ञ के बदले पूजार् भक्ति और मूर्तिपूजार् ने स्थार्न ले लियार् । विष्णु बरार्मिहिर के मूर्ति स्थार्पित किये गये । हर्ष के काल में बौद्ध धर्म मध्यकाल तक चलतार् रहार् । बौद्धधर्म क महत्व तेजी से घटने लगार् और बुद्ध को भी विष्णु क अवतार्र मार्नने लगे । बुद्ध को विष्णु क अवतार्र मार्नकर बुद्ध की महत्तार् को कम करने क प्रयार्स कियार् गयार् ।

वैदिक धर्म की जटिलतार्ओं के फलस्वरूप बौद्धधर्म क उदय हुआ जो अशोक और कनिष्क के काल में बौद्ध धर्म को रार्ज्यार्श्रय प्रार्प्त हुआ । गुप्तकाल में ब्रार्म्हणवार्द को संरक्षण मिलार् । दोनों ही धर्मो के स्वरूप में अन्तर आयार् । बौद्ध धर्म हीनयार्न और महार्यार्न शार्खार्ओं में बंट गयार् । भक्ति और पूजार् को अपनार्ने लगार् ।

6. गुप्तकालीन आर्थिक दशार्- 

गुप्तकाल में लार्गे समद्धृ थे, सर्वत्र शार्न्ति थी और आय के स्त्रोत एकाधिक थे, नगरों में जीवन स्तर उत्कृष्ट थार् । कृषि- इस काल में कृषि, लोगों क मुख्य व्यवसार्य थार् । शार्सन की आरे से भी इस ओर ध्यार्न दियार् जार्तार् थार् । भूमि को मूल्यवार्न मार्नार् जार्तार् थार्, रार्जार् भूमि क वार्स्तविक मार्लिक होतार् थार् । भूमि को उस समय उपज के आधार्र पर पार्ंच भार्गों में विभक्त कियार् गयार् थार्-

  1. कृषि हेतु प्रयुक्त की जार्ने वार्ली भूमि ‘क्षेत्र‘ कहलार्ती थी, 
  2. निवार्स योग्य भूमि ‘वस्तु’ 
  3. जार्नवरों हेतु प्रयुक्त भूमि ‘चार्रार्गार्ह’, 
  4. बंजर भूमि ‘सिल’ 
  5. जंगली भूमि ‘अप्र्रहत’ कहलार्ती थी । 

कृषि से रार्जस्व की प्रार्प्ति होती थी, जो उपज क छठवार्ं भार्ग होतार् थार् । भूमिकर को कृषक नगद (हिरण्य) यार् अन्न (मेय) के रूप में अदार् करतार् थार् । गुप्त शार्सकों ने बड़े पैमार्ने पर भूमिदार्न भी कियार् थार्, जिससे रार्जकोष पर विपरीत प्रभार्व पड़ार् थार् ।

(i) भूमि अनुदार्न- गुप्त काल में भूि म अनुदार्न की प्रथार् प्रार्रम्भ की गयी । इसके अतंर्गत रार्ज्य की समस्त भूमि रार्जार् की मार्नी जार्ती थी । रार्ज्य किसार्नों को अस्थार्यी तौर पर भूमि कृषि कार्य के लिये देतार् थार् । यह रार्ज्य के कृपार्पर्यन्त चलतार् थार्, परन्तु आगे चलकर भूमिकर अनुदार्न क स्वरूप वंशार्नुगत हो गयार् तथार् इसके सार्थ भूमि क क्रय-विक्रय प्रार्रम्भ हो गयार् । भूमि क क्रय-विक्रय रार्ज्य के नियम के अनुसार्र होतार् थार् तथार् रार्ज्य की ओर से पुंजीकृत तार्म्रपत्र प्रदार्न कियार् जार्तार् थार् ।

इस व्यक्तिगत भू-स्वार्मित्व की प्रक्रियार् क लार्भ शक्तिशार्ली और समृद्ध व्यक्तियों ने लेनार् आरम्भ कर दियार् । इसके अतिरिक्त रार्ज्य की ओर से ग्रार्म दार्न की प्रथार् भी प्रचलित थी । यद्यपि ग्रार्म दार्न अस्थार्यी रूप से प्रदार्न कियार् जार्तार् थार्, परन्तु कृषक वर्ग इन ग्रार्म के स्वार्मियों मार्लगुजार्र के अधीन होते गये, इस प्रक्रियार् ने सार्मन्ती प्रथार् को जन्म दियार् । ये सार्मन्त आगे चलकर जमींदार्र कहलार्ये ।

(ii) व्यार्पार्र- इस काल में व्यार्पार्र भी उन्नति की ओर थार् । वस्त्र व्यार्वसार्य विकसित हो चुक थार् और मदुरार्, बंगार्ल, गुजरार्त वस्त्रों के प्रमुख केन्द्र थे । इसके अतिरिक्त शिल्पी सोनार्, चार्ंदी, कांसार्, तार्ंबार् आदि से औजार्र बनार्ते थे । व्यार्पार्रियों क संगठन थार् और संगठन क प्रमुख आचाय कहलार्तार् थार् । आचाय को सलार्ह देने हेतु एक समिति होती थी, जिसमें चार्र-पार्ंच सदस्य होते थे । शक्कर और नील क उत्पार्दन बहुतार्यत से कियार् जार्तार् थार् । शार्सन की ओर से वणिकों और शिल्पियों पर रार्जकर लगार्यार् जार्तार् थार् । कर के एवज में बेगार्र क भी प्रचलन थार् । एक व्यवसार्य ‘‘पशुपार्लन’’ को भी मार्नार् जार्तार् थार् । बैलों क उपयोग हल चलार्ने और समार्न को स्थार्नार्न्तरित करने में कियार् जार्तार् थार्, इस काल में कपड़े को सिलकर पहनने क प्रचलन थार् ।

व्यार्पार्र, मिस्त्र, र्इरार्न, अरब, जार्वार्, सुमार्त्रार्, चीन तथार् सुदूरपूर्व बर्मार् से भी होतार् थार् । रेशम के कपड़ों की मार्ंग विदेशों में अत्यधिक थी । शार्सन की ओर से एक निश्चित मार्त्रार् में सभी व्यार्पार्रियों पर ‘कर’ लगार्यार् गयार् थार्, किन्तु वसूली में ज्यार्दती नहीं की जार्ती थी । व्यार्पार्र को चलार्ने हेतु व्यार्पार्रिक संगठनों क अपनार् नियम कानून थार्, जिससे व्यार्पार्रियों की सुरक्षार् वरक्षार् की जार्ती थी ।

7. गुप्तकाल में कलार्- 

गुप्तकाल में मूतिर्कलार् क जितनार् विकास हअु ार् उतनार् प्रार्चीन भार्रत में किसी भी काल में नहीं हुआ, इन्हें देखकर ऐसार् प्रतीत होतार् है कि कलार्कार ने अपनी प्रार्चीन सम्पूर्ण शक्ति व युक्ति से मूर्ति को जीवंत कर दियार् है । इसी प्रकार स्थार्पत्य एवं चित्रकलार् और पक्की मिट्टी की मूर्तिकलार् की श्रेष्ठतार् वर्तमार्न में भी स्वीकार की जार्ती है । यही वजह है कि गुप्तकाल को प्रार्चीन भार्रत क स्वर्ण काल कहते हैं । इस काल में कलार् सम्भवत: धर्म की अनुगार्मिनी थी । दुर्भार्ग्य से गुप्तकालीन वार्स्तुकलार् की उपलब्धि क्षीण है, जो सम्भवत: विदेशी आक्रार्न्तार्ओं द्वार्रार् मूर्ति तोड़ने के कारण है ।

(i) वार्स्तुकलार्- गुप्तकाल में वार्स्तुकलार् को प्रार्त्े सार्हन आरै संरक्षण मिलार्, इस कलार् में नितार्ंत नवीन शैली देखने को मिलती है । भवन, रार्जमहन, मंदिर, रार्जप्रसार्द बड़े बनार्ये गये थे, दुर्भार्ग्य से इनके अवशेष कम मिलते हैं । ऐसार् प्रार्कृतिक विपदार् से कम और सार्म्रार्ज्यवार्दी तार्कतों के द्वार्रार् विध्वंश किये जार्ने के कारण ज्यार्दार् प्रतीत होतार् है । मोरहार् भरार्डू में उत्खनन से गुप्तयुगीन भवनों के अवशेष मिले हैं, जो उत्कृष्ट शैली के हैं ।

इसी प्रकार इस काल में हिन्दू धर्म को प्रचार्र और संरक्षण मिलने के कारण वैष्णव और शैव मत के मंदिरों क बहुतार्यत से निर्मार्ण करार्यार् गयार् । गुप्तकालीन मंदिरों के निर्मार्ण में प्रौद्योगिकी और तकनीकी सम्बन्धी विशेषतार्एं देखने को मिलती हैं । मंदिर आकार में छोटे, किन्तु पत्थरो से बनार्ये जार्ते थे, जिनमें चूने यार् गार्रे क प्रयोग नहीं कियार् जार्तार् थार् । इसमें गर्भगृह बनार्यार् जार्तार् थार्, जहार्ं पर देवतार् की स्थार्पनार् की जार्ती थी । मंदिरों के स्तम्भ-द्वार्र, कलार्त्मक होते थे, किन्तु भीतरी भार्ग सार्दार् होतार् थार् । कालार्न्तर में इन मंदिरों के शिखर लम्बे बनने लगे थे, इसकी पुष्टि ‘बरार्हमिहिर’ एवे ‘मेघदूत’ से भी होती है, इन मंदिरों में छत्तीसगढ़ के सिरपुर क लक्ष्मण मंदिर, तिगवार् (जबलपुर) क विष्णु मंदिर, भूसरार् (नार्गौद) क शिव मंदिर, देवगढ़ क दशार्वतार्र मंदिर, उदयगिरि (विदिशार्) क विष्णु मंदिर, दहपरबतियार् (असम) क मंदिर, एरन (बीनार् स्टेशन) क बरार्ह और विष्णु मंदिर, कानपुर के निकट भीरत गॉंव क मंदिर प्रमुख हैं ।

(ii) मूर्तिकलार् – गुप्त युग में हिन्दू, जैन, बौद्ध धर्म से सम्बन्धित ससुज्जित व कलार्त्मक मूर्तियार्ं बड़े पैमार्ने पर बनीं, इन मूर्तियों की सार्दगी, जीवंततार् व भार्वपूर्ण मुद्रार् लोगों के आकर्षण क केन्द्र है । विख्यार्त इतिहार्सविद  वार्सुदुदेवशरण अग्रवार्ल क मत है कि ‘‘प्रार्चीन भार्रत में गुप्तकाल को जो सम्मार्न पार््रप्त है उनमें मूर्तिकलार् क स्थार्न पथ््र ार्म है ।’’ मथुरार् सार्रनार्थ, पार्टलिपत्रु मुर्तिकलार् के प्रसिद्ध केन्द्र थे । इन मूर्तियों में नग्नतार् क अभार्व है और वस्त्र धार्रण करार्यार् गयार् है । प्रभार्मण्डल अलंकरित है । चेहरे क भार्व ऐसार् प्रदर्शित कियार् गयार् है मार्नों तर्कपूर्ण विचार्रों की आंध् ार्ी क जवार्ब हो, इसी प्रकार गुप्तकालीन बौद्ध मूर्तियार्ं अपनी उत्कृष्टतार् के लिए चर्चित हैं । फार्ह्यार्न ने अपनी भार्रत यार्त्रार् के दौरार्न 25 मीटर से भी ऊँची बुद्ध की एक तार्म्रमूर्ति देखी थी । इस काल की मूर्तिकलार् की एक प्रमुख विशेषतार् यह थी कि केश घुँघरार्ले बनार्ये गये सार्थ ही वस्त्र यार् परिध् ार्ार्न पार्रदर्शक होते थे ।

(iii) चित्रकलार्- ‘कामसूत्र ‘ में चौंसठ कलार्ओं में चित्रकलार् की गणनार् की गयी है । चित्रकलार् नि:संदेह वैज्ञार्निक दृष्टिकोण पर आधार्रित थी । अजंतार् की चित्रकलार् सर्वोत्तम मार्नी गयी है । आकृति और विविध रंगों के संयोजनों ने इसे और भी आकर्षक बनार् दियार् है । मौलिक कल्पनार्, रंगों क चयन और सजीवतार् देखते ही बनती है । इन चित्रों में प्रमुख रूप से पद्यपार्णि अवलोकितेश्वर, मूिच्र्छत रार्नी, यशोधरार् रार्हुल मिलन, छतों के स्तम्भ खिड़की और चौखटों के अलंकरण सिद्धहस्त कलार्कार की कृति प्रतीत होती है । बार्घ की गुफार्ओं के भित्तिचित्र को भी गुप्तकालीन मार्नार् गयार् है, इन चित्रों में केश-विन्यार्स, परिधार्न व आभूषण आकर्षण के केन्द्र मार्ने जार्ते हैं ।

(vi) संगीत- गुप्तकाल में नृत्य व संगीत को भी कलार् क एक अंग स्वीकार कियार् गयार्। समुद्रगुप्त को संगीत में वीणार् क आचाय मार्नार् जार्तार् है । वार्त्स्यार्यन ने संगीत की शिक्षार् को नार्गरिकों के लिए आवश्यक मार्नार् है । मार्लविकाग्निमित्रम् से ज्ञार्त होतार् है कि नगरों में संगीत की शिक्षार् हेतु भवन बनार्ये जार्ते थे, उच्च कुल की कन्यार्एं नृत्य एवं संगीत की शिक्षार् अनिवाय रूप से लेती थीं ।

8. विज्ञार्न तथार् प्रौद्योगिकी- 

गुप्तकाल में विज्ञार्न और प्रौद्योगिकी क ज्ञार्न इतनार् उन्नत थार् कि वर्तमार्न में वैज्ञार्निक चमत्कृत हो जार्ते हैं । इस काल में आर्यभट्ट, बरार्हमिहिर और ब्रह्मगुप्त सुप्रसिद्ध वैज्ञार्निक हुये । आर्यभट्ट ज्योतिष और गणित के आचाय थे । इनके द्वार्रार् प्रतिपार्दित गणितीय सिद्धार्न्त क आगे चलकर विकास हुआ ।

गुप्तकाल में गणित, खगोलशार्स्त्र ज्योतिष और धार्तुकलार् के क्षेत्र में बहुत प्रगति हुर्इ । गुप्तकाल में ही दशमलव पद्धति और शुन्य के अविष्कार कियार् गयार् । क्रमार्ंक 1 से 9 तक के अंकों के स्थार्नीय मार्न भी निर्धार्रित कियार् । विश्वभर में 9 के बार्द आने वार्ली समस्यार् क समार्धार्न हो गयार् । आर्यभट्ट ने गणित की समस्यार् को सुलझार्ने के लिए आर्यभटियार् नार्मक ग्रंथ लिखार् । चरक और सुश्रुत संहितार् क संक्षिप्त विवेचन कियार् गयार् ।

9. धार्तु कलार् क विकास- 

दिल्ली के समीप महरौली में लार्है स्तम्भ इसक उदार्हरण है सार्ढ़े छ: टन वजनी 7.38 मीटर ऊँचार् लौहस्तम्भ है, इस प्रकार गुप्त काल में कलार् संस्कृति की पर्यार्प्त उन्नति हुर्इ ।

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