खार्नवार् क युद्ध
रार्णार् संग्रार्म सिंह ने खार्नवार् के मैदार्न में 16 माच, 1527 ई. को पड़ार्व डार्लार्। 17 माच, 1527 ई. को बार्बर खार्नवार् पहुँच गयार्। दोनों के शिविरों के बीच चार्र मील की दूरी थी। रार्णार् सार्ंगार् की सैन्य संख्यार् बार्बर की तुलनार् में लगभग दुगुनी थी, किन्तु बयार्नार् युद्ध के बार्द उसने सीधार् बार्बर की ओर बढ़ने की अपेक्षार् भुमार्वर क माग पकड़ार् जिसके कारण खार्नवार् तक पहुँचने में उसे बहुत समय लग गयार् और इतनार् समय नहीं मिल सक जिससे कि वह अपनी सैनिक टुकड़ियों को पंक्तियों में सजार् पार्तार्। बार्बर ने अपनी व्यूह रचनार् पार्नीपत के समार्न ही की थी। उसने अपनी सम्पूर्ण व्यवस्थार् खार्नवार् पहुँचने के लगभग 10-25 दिन पहले की थी।1 गुलबदन बेगम, हुमार्यूंनार्मार् (रिजवी), मुगलकालीन भार्रत, पृ. 367; श्रीवार्स्तव, आशीर्वार्दी लार्ल , पूर्वोक्त कृति, पृ. 23.

खार्नवार् क युद्ध 17 माच, 1527 को हुआ। मुगल सेनार् के केन्द्र में स्वयं बार्बर थार्। केन्द्र के दार्यें हार्थ की ओर चिन तैमूर सुल्तार्न, मिर्जार् सुलेमार्न, ख्वार्जार् दोस्त खार्बन्द, कमार्लुद्दीन यूनुस अली, जलार्लुद्दीन शार्ह मंसूर बरलार्स, दरवेश मुहम्मद सार्रबार्न, अब्दुल्लार् कितार्बदार्र, निजार्मुद्दीन दोस्त ईशक आगार् नियुक्त थे। केन्द्र के बार्यें हार्थ की ओर सुल्तार्न अलार्उद्दीन आलम खार्ं, शेख जैन ख्वार्फी, निजार्मुद्दीन अली खलीफार् क पुत्र कमार्लुद्दीन मुहिब अली, कूच बेग क भार्ई तरदी बेग और पुत्र शेर अफगार्न, आरार्इश खार्ं, ख्वार्जार् कमार्लुद्दीन हुसैन नियुक्त थे। मुगल सेनार् क दार्यार्ं भार्ग हुमार्यूं के नेतृत्व में थो। उसके दार्यें हार्थ की ओर कासिम हुसैन सुल्तार्न, निजार्मुद्दीन अहमद यूसुफ ऊगलार्कची, हिन्दू बेग कूचीन, खुसरो कैकुल्तार्श, किबार्म बेग उर्दूशार्ह, वली करार् कूजी खार्जिन, पीर कुली सीस्तार्नी, ख्वार्तार् पहलवार्न बदख्शार्नी, अब्दुल शकूर, एरार्क क रार्जपूत सुलेमार्न आक तथार् सीस्तार्न क रार्जदूत हुसैन आक थे। हुमार्यूं के बार्ई ओर मीर हार्मार्, मुहम्मदी कैकुल्तार्श और निजार्मुद्दीन ख्वार्जगी असद जार्नदार्र थे। सार्थ ही खार्नार् दिलार्वर खार्ं, मलिक दार्द करार्रार्नी, शेख गूरन आदि हिन्दुस्तार्नी अमीर भी हुमार्यूं के दार्यें बार्जू में अपने-अपने निश्चित स्थार्न पर खड़े थे। मुगल सेनार् के बार्एं भार्ग क नेतृत्व मैंहदी ख्वार्जार्, मुहम्मद सुल्तार्न मिर्जार्, आदिल सुल्तार्न, अब्दुल अजीज मीर आखूर, मुहम्मद अली जंगजंग, कुतलूक कदम करार्वल, शार्ह हुसैन बार्रबेगी, जार्न बेग अल्क को सौंपार् गयार्। सार्थ ही कमार्ल खार्ं, जलार्ल खार्ं, अली खार्ं, शेखजार्दार् फार्रमूली तथार् निजार्म खार्ं आदि हिन्दुस्तार्नी अमीर भी इसी भार्ग क नेतृत्व कर रहे थे। दार्ई तुलुगमार् में तरदी यक्क तथार् मलिक कासिम और बार्ई तुलुगमार् में मोमिन अल्क तथार् रूस्तम तुर्कमार्न की कुछ विशेष दस्ते देकर नियुक्ति की गई। उस्तार्द अली कुली अपनी तोपों के सार्थ केन्द्र में बार्बर के आगे और मुस्तफार् रूमी दार्एं भार्ग के केन्द्र में हुमार्यूं के आगे थार्।

युद्ध एक पहर तथार् दो घड़ी (लगभग प्रार्त: 9-10 बजे के बीच क समय) व्यतीत हो जार्ने के उपरार्न्त प्रार्रम्भ होकर दिन के अंतिम पहर तक चलतार् रहार्। सर्वप्रथम रार्जपूत सेनार् के बार्एं भार्ग ने मेदिनी रार्य और रार्व मार्लदेव आदि के नेतृत्व में मुगलों के दार्एं भार्ग के दार्एं पक्ष में खुसरो कैकुल्तार्श और मलिक कासिम पर हमलार् कियार्। रार्जपूतों क यह आक्रमण इतनार् तीव्र थार् कि मुगलों की सेनार् के दार्यें और बार्यें भार्ग अस्त-व्यस्त हो गए तथार् दार्यें भार्ग के लिए तो मैदार्न में खड़ार् होनार् कठिन हो गयार्। रश्बु्रक विलियम्स के अनुसार्र, “यह कुछ क्षण बहुत ही खतरनार्क थे, क्योंकि एक तुलुगमार् आक्रमण करने में अभ्यस्त होतार् है बचार्व करने में नहीं और इस समय वह अपनी कमजोरी के चिन्ह प्रकट करने लगार् थार्। यदि दार्यें भार्ग के दार्यें बार्जू की सेनार् पूर्णरूप से परार्स्त हो गई होती तो शत्रु पूरी की पूरी पंक्ति को समेट लेतार् और इस प्रकार तुरन्त परार्जय हो जार्ती और फिर विजय पार्नार् कठिन हो जार्तार्।” 1 रिजवी, मुगल कालीन भार्रत, बार्बर, पृ. 241-244; रार्धेश्यार्म, मुगु सम्रार्ट् बार्बर, पृ. 310-311; वन्दनार् पार्रार्शर, बार्बर : भार्रतीय संदर्भ में, पृ. 64.

इस परिस्थिति से स्वयं को बचार्ने के लिए बार्बर ने तुरन्त ही चिन तैमूर सुल्तार्न को सहार्यतार् के लिए भेजार्। चिन तैमूर सुल्तार्न ने आगे बढ़कर शत्रु की सेनार् के बार्यें भार्ग पर आक्रमण कर उसे छिन्न-भिन्न कर दियार् तथार् उनके प्रभार्व को घटार् दियार्। इतनार् ही नहीं चिन तैमूर सुल्तार्न ने सेनार् के दार्यें भार्ग को इस योग्य बनार् दियार् कि वह अपनी पूरी शक्ति के सार्थ शत्रु पर आक्रमण कर सके। इस प्रकार जब मुगल सेनार् के दार्यें भार्ग ने रार्णार् सार्ंगार् की सेनार् पर आक्रमण कियार् तो उन्हें हार्रकर पीछे हटनार् पड़ार्, जिसके कारण उनकी सेनार् के मध्य तथार् बार्एं भार्ग के बीच काफी दूरी हो गई। 2 मुगलों ने इस अवसर क पूरार्-पूरार् लार्भ उठार्यार्। मुस्तफार् रूमी, जो कि तोपखार्ने क अध्यक्ष थार्, ने अपनी लकड़ी की तिपार्इयों को, जिन पर तोपें रखी हुई थी, मैदार्न में आगे ढकेल दियार् तथार् तोपों की मार्र शुरू कर दी। तोपों की मार्र ने रार्जपूत सेनार् को आतंकित कर दियार्। अखय रार्ज, रार्यमल रार्ठौड़ और हसन खार्ं मेवार्ती मुगलों के दार्एं पक्ष से संघर्षरत थे। ऐसे प्रतीत हो रहार् थार् कि बिनार् किसी निर्णय के युद्ध समार्प्त हो जार्एगार्। युद्ध में रार्णार् सार्ंगार् की जीत की संभार्वनार् थी किन्तु बार्बर ने कासिम हुसैन सुल्तार्न, किवार्म बेग उर्दूशार्ह, हिन्दू बेग, मुहम्मदी कैकुल्तार्श और निजार्मुद्दीन ख्वार्जगी असद को सेनार् के दार्यें भार्ग की सहार्यतार् के लिए भेजार्। घोर युद्ध शुरू हुआ। इसी समय रार्जपूतों की सहार्यतार् के लिए भी और सेनार् आ गई तथार् उन्होंने मुगलों के दार्यें भार्ग पर पुन: दबार्व डार्लनार् शुरू कियार्। 1 रश्बु्रक विलियम्स, ऐन इम्पार्यर बिल्डर ऑफ दि सिक्सटीन्थ सेन्चुरी, पृ. 153. 2 वही, पृ. 153; शर्मार्, जी.एन., मेवार्ड़ एण्ड दि मुगल एम्पार्यर्स, पृ. 32.

बार्बर ने पुन: अपनी सेनार् के मध्य भार्ग से सैनिक टुकड़ियार्ं सेनार् के दार्यें भार्ग की सहार्यतार् के लिए भेजी जिसमें यूनुस अली, शार्ह मंसूर बरलार्स, अब्दुल्लार् कितार्बदार्र आरै दार्सेत ईश्क आक आदि थे। ये एक-एक करके शत्रु पर टूट पड़े और उन्हें छिन्न-भिन्न करने की पूरी कोशिश की। मुस्तफार् ने तोपों की सहार्यतार् से रार्जपूतों के आक्रमण को नार्काम कर दियार्। रार्जपूत मुगलों की तोपों की भयार्नक मार्र के सार्मने टिक नहीं सके। कुछ ही समय बार्द दोनों ओर की सेनार् के सभी भार्गों से युद्ध प्रार्रम्भ हो चुक थार्। मुगलों ने रार्जपूतों के प्रत्येक आक्रमण क डटकर मुकाबलार् कियार् और वे मैदार्न में जमे रहे। धीरे-धीरे मुगल तोपों ने रार्जपूतों की सैन्य संख्यार् को कम करनार् शुरू कर दियार्। युद्ध में अनेक रार्जपूत योद्धार् मार्रे गये किन्तु कुछ समय तक युद्ध चलतार् रहार्। इसी समय रार्णार् सार्ंगार् गंभीर रूप से घार्यल हो गयार्। उसे मूिच्र्छत अवस्थार् में पृथ्वीरार्ज, मार्लदेव और अखय रार्ज दूदार् के संरक्षण में युद्ध क्षेत्र से हटार्कर बसवार्ं नार्मक स्थार्न पर पहुँचार् दियार् गयार्। रार्जपूत सरदार्रों ने सर्वसम्मति से अज्जार् झार्लार् के ऊपर छत्र-चंवर (रार्ज-चिन्ह) लगार् कर उसे रार्णार् के हार्थी पर बिठार् दियार्, जिससे रार्णार् की अनुपस्थिति में रार्जपूत सैनिक नेतृत्वविहीन होकर भार्गने न लगें। परंतु रार्जपूत सेनार् में रार्णार् के युद्ध क्षेत्र छोड़ देने क समार्चार्र शीघ्र ही फैल गयार् और उनमें भगदड़ मच गई। रार्जपूत सेनार्एँ मैदार्न छोड़कर भार्गने लगीं किंतु मुगलों ने उन पर धार्वार् बोल दियार्। सेनार् के मध्य भार्ग को लेकर बार्बर अन्य भार्गों की सहार्यताथ रवार्नार् हुआ।1 इसी समय सिलहदी विश्वार्सघार्त करके रिजवी, मुगल कालीन मुगलों से मिल गयार् और बार्बर को यह सूचनार् दे दी कि रार्णार् संग्रार्म सिंह तो बहुत पहले ही मैदार्न छोड़कर भार्ग गयार् है। इस समय तक मुगलों ने युद्ध जीत लियार् थार् एवं रार्जपूत पूर्णरूप से परार्जित हो गए थे। बार्बर ने अपने सैनिकों की विजय की खबर क स्वार्गत कियार्। यह उसके जीवन क सबसे शुभ दिन थार्। बार्बर ने रार्णार् सार्ंगार् की खोज के लिए एक सैन्य टुकड़ी भी भेजी कितु उसक कोई पतार् नहीं लगार्। दोपहर तक युद्ध समार्प्त हो गयार्। रार्जपूत सेनार् युद्ध स्थल से भार्ग खड़ी हुई। बार्बर ने गार्जी की उपार्धि धार्रण की।1 समझार् जार्तार् है कि जब रार्णार् सार्ंगार् को होश आयार् तो उसने मुगलों से प्रतिशोध लिए बिनार् चित्तौड़ वार्पस न जार्ने की कसम खार्ई। इसलिए जब बार्बर चंदेरी घेरे हुए थार्, तब रार्णार् ने युद्ध की तैयार्री करके इरिच को घेर लियार्, किन्तु अन्य रार्जपूत सार्मन्त पुन: मुगलों से युद्ध करने के इच्छुक नहीं थे, इसलिए उन्होंने रार्णार् संग्रार्म सिंह को जहर दे दियार्।1 बार्बरनार्मार् (अनु.) भार्ग -2, पृ. 547-574; 

खार्नवार् के युद्ध में बार्बर की विजय के कारण

बार्बर की रण कुशलतार् और सैन्य संगठन – बार्बर ने अपनी सैन्य कुशलतार्, अनुभव, युद्ध प्रणार्ली, धैर्य तथार् कुशल तोपखार्ने, सुन्दर योजनार् एवं सैन्य-संचार्लन के कारण युद्ध में विजय प्रार्प्त की। पार्नीपत के युद्ध की भार्ंति खार्नवार् के युद्ध ने एक बार्र पुन: यह सिद्ध कर दियार् कि युद्ध में सफलतार् कई बार्तों पर निर्भर करती है। केवल मार्त्र सैनिकों की संख्यार् के बल पर ही युद्ध नहीं जीतार् जार् सकतार् है। वार्स्तव में बार्बर द्वार्रार् सेनार् क नेतृत्व और उसकी तुलुगमार् विधि बहुत ही उपयोगी सिद्ध हुई। उसने अपने धैर्य, सार्हस और नेतृत्व शक्ति के बल पर ही एक ओजस्वी भार्षण देकर अपने हतोत्सार्हित सैनिकों के मनोबल को ऊँचार् उठार्यार् और खार्नवार् के युद्ध को ‘जिहार्द’ में परिवर्तित करके विजय प्रार्प्त की।भार्रत (बार्बर), पृ. 234-48; अकबरनार्मार् (अनु.), भार्ग-1, पृ. 261-66; ब्रिग्स, दि हिस्ट्री ऑफ दि रार्इज ऑफ दि मुहम्मडन पार्वर इन इण्डियार्, भार्ग-2, पृ. 55-58.

सिलहदी द्वार्रार् विश्वार्सघार्त और रार्णार् सार्ंगार् की अकर्मण्यतार् –रार्जपूत स्रोत-कर्नल टॉड1 , हरविलार्स शार्रदार् 2 , श्यार्मल दार्स3 आदि के ग्रंथों के अनुसार्र रार्यसेन के शार्सक सिलहदी द्वार्रार् विश्वार्सघार्त व युद्ध की प्रार्रम्भिक स्थिति से ही रार्णार् सार्ंगार् की अकर्मण्यतार् से रार्जपूतों की परार्जय हुई। रार्जपूत स्रोतों क कहनार् है कि सिलहदी क रार्णार् सार्ंगार् की सेनार् से अलग हो जार्ने से युद्ध क सम्पूर्ण ढार्ंचार् ही बदल गयार्। लेकिन रश्बु्रक विलियम्स, लेनपूल आदि इससे सहमत नहीं हैं।

रश्बु्रक विलियम्स क विचार्र है कि ‘सिलहदी क बार्बर की ओर मिल जार्ने से उसे कोई लार्भ नहीं मिलार् थार्। खार्नवार् के युद्ध के बार्द उसक शेष जीवन मार्लवार् की रार्जनीति तक ही सीमित रहार्। अपनी प्रतिष्ठार् को बचार्ने के लिए परार्जित पक्ष द्वार्रार् विश्वार्सघार्त क आरोप लगार्नार् एक आम बार्त है।’

डॉ. जी.एन.शर्मार् ने लिखार् है कि ‘रार्जपूत वृत्तार्न्तकारों ने रार्णार् सार्ंगार् की खार्नवार् के युद्ध में परार्जय की सम्पूर्ण जिम्मेदार्री ‘सिलहदी के विश्वार्सघार्त’ पर डार्ली है, किन्तु यह कहनार् गलत है कि रार्णार् सार्ंगार् की परार्जय क मार्त्र कारण ‘सिलहदी क विश्वार्सघार्त’ थार्। घटनार्ओं से स्पष्ट है कि रार्णार् सार्ंगार् के रणक्षेत्र से चले जार्ने के बार्द ही सिलहदी ने पक्ष परिवर्तन कियार् थार् और तब तक सार्ंगार् की सेनार् लगभग परार्जय के अंतिम चरण में थी। वार्स्तव में सिलहदी द्वार्रार् पक्ष परिवर्तन के पहले ही बार्बर युद्ध जीत चुक थार्।’1 टॉड, एननल्स एण्ड एण्टीक्वीटीज ऑफ रार्जस्थार्न, वार्ल्यूम -1, पृ. 356. 2 शार्रदार्, महार्रार्जार् सार्गार्, पृ. 145. 3 श्यार्मल दार्स, वीर विनोद, वार्ल्यूम -1, पृ. 366. 4 रश्बु्रक विलियम्स, ऐन इम्पार्यर बिल्डर ऑफ दि सिक्सटीन्थ सेन्चुरी, पृ. 155-156.

शार्रदार् क मार्ननार् है कि युद्ध जब निर्णार्यक परिस्थिति में थार्, उसके पूर्व ही सिलहदी बार्बर से जार् मिलार् थार्।2 मेवार्ड़ के संक्षिप्त इतिहार्स के अनुसार्र सिलहदी ने रार्णार् सार्ंगार् के रणक्षेत्र से चले जार्ने के बार्द पक्ष परिवर्तन कियार् थार्।3 डॉ. ए.सी. बनर्जी की मार्न्यतार् है कि ‘सिलहदी क जार्नार् भी निश्चयार्त्मक नहीं है क्योंकि उसक लड़क भूपत रार्णार् सार्ंगार् की ओर से लड़तार् हुआ मार्रार् गयार् थार्।’

बार्बरनार्मार् में भी इस घटनार् क कोई विवरण नहीं मिलतार्। अन्य मुगल वृत्तार्न्तकार भी इस विषय में मौन है। केवल निजार्मुद्दीन यह लिखतार् है कि ‘परोक्ष की सेनार्ओं ने इस्लार्म के सैनिकों की सहार्यतार् की।’4 वन्दनार् पार्रार्शर क कथन है कि यद्यपि किसी एक सरदार्र क दल बदल लेनार् सम्पूर्ण सेनार् की परार्जय क कारण नहीं हो सकतार् किन्तु फिर भी 35,000 सवार्रों के नेतार् क ऐसी स्थिति में शत्रु से मिल जार्नार्, जब संघर्ष बरार्बरी क हो रहार् हो, युद्ध को निर्णार्यक मोड़ देने और उसक संतुलन शत्रु की ओर झुकाने में अवश्य सहार्यक हो सकतार् है।1 इस संबंध में यह बार्त भी उल्लेखनीय है कि रार्णार् सार्ंगार् को मूिर्च्छत अवस्थार् में खार्नवार् के रण क्षेत्र से हटार्कर बसवार्ं नार्मक स्थार्न पर ले जार्यार् गयार् तो इस बार्त की सूचनार् सिलहदी ने ही बार्बर की सेनार् को दी कि ‘रार्णार् सार्ंगार् तो युद्ध स्थल छोड़ चुक है।’ इस सूचनार् से अवश्य ही बार्बर और उसके सैनिकों क मनोबल बढ़ार् तथार् युद्ध के अंतिम क्षणों में रार्जपूतों पर प्रबल प्रहार्र करने के लिए उन्हें प्रोत्सार्हन मिलार् जिससे युद्ध क निर्णय पूर्णरूप से उनके पक्ष में रहार्।1 शर्मार्, जी.एन., मेवार्ड़ एण्ड दि मुगल एम्पार्यर्स, पृ. 36. 2 शार्रदार्, महार्रार्णार् सार्गार्, पृ. 145. 3 एम.एस., मेवार्ड़ क संक्षिप्त इतिहार्स, पृ. 142-143. 4 निजार्मुद्दीन, तबकाते अकबरी, भार्ग-2, पृ. 16.

सैन्य कारण – रार्णार् सार्ंगार् की सेनार् में अधिकांश रार्जपूत पैदल थे, जबकि मुगल सेनार् में अश्वार्रोहियों की प्रमुखतार् थी। रार्णार् सार्ंगार् के पैदल सैनिकों की शक्ति बार्बर के फुर्तीले घुड़सवार्रों से दब कर रह गई। सार्ंगार् के हथियार्र भी पुरार्ने ढंग के थे। बार्बर के तोपखार्ने ने एक प्रमुख भूमिक निभार्ई तथार् उस्तार्द अली कुली और मुस्तफार् रूमी ने अपनी क्षमतार् क सुंदर परिचय दियार्। रार्णार् सार्ंगार् के तीर गोलियों क जबार्व देने में कामयार्ब न हो सके। इसके अतिरिक्त बार्बर ने खार्नवार् के युद्ध में उजबेक, तुर्क, मुगल युद्ध पद्धतियों क सही समन्वय और उपयोग कियार्। बार्बर द्वार्रार् सैनिकों क जमार्व इस ढंग से कियार् गयार् कि शत्रु पक्ष की अधिक सैन्य संख्यार् उसकी सफलतार् के माग में बार्धक न बन सकी। डॉ. जी.एन. शर्मार् ने लिखार् है कि ‘बार्बर एक कुशल सेनार्पति की भार्ंति रणक्षेत्र के हर भार्ग पर निगार्ह रख रहार् थार् और अपने सैनिकों की गतिविधियों क निर्देशन कर रहार् थार् वहीं रार्णार् सार्ंगार् ने एक सार्धार्रण सैनिक के समार्न युद्ध कियार्।1 रार्धेश्यार्म क मन्तव्य है कि एक बार्र फिर केवल अपनी सैन्य कुशलतार्, अनुभव, युद्ध-प्रणार्ली, धैर्य तथार् कुशल तोपखार्ने, सुंदर योजनार् एवं सैन्य-संचार्लन के कारण बार्बर ने युद्ध जीतार्। पार्नीपत के युद्ध की भार्ंति खार्नवार् के युद्ध ने यह सिद्ध कर दियार् कि युद्ध में सफलतार् अन्यार्न्य बार्तों पर निर्भर करती है। मार्त्र सैनिकों की संख्यार् के बल पर ही युद्ध नहीं जीतार् जार् सकतार् है।1 वन्दनार् पार्रार्शर, बार्बर : भार्रतीय संदर्भ में, पृ. 65. 2 रार्धेश्यार्म, मुगल सम्रार्ट् बार्बर, पृ. 314-315.

अनुशार्सनहीन सेनार् – खार्नवार् के युद्ध के दौरार्न रार्णार् सार्ंगार् की जो लम्बी-चौड़ी सेनार् थी उसमें एकरूपतार् और अनुशार्सन क अभार्व थार्। रार्णार् की सेनार् भिन्न-भिन्न रार्जपूत रार्जार्ओं और सरदार्रों की सेनार् थी, जिसकी स्वार्मिभक्ति रार्णार् की अपेक्षार् अपने सरदार्रों के प्रति अधिक थी। भिन्न-भिन्न रार्जपूत सैनिक एक नेतार् के अधीन संगठित न होकर अपने-अपने सरदार्रों के झण्डे के नीचे ही लड़ सकते थे। इसलिए स्वार्भार्विक तौर पर सेनार् में वार्ंछनीय अनुशार्सन नहीं थार्। बार्बर ने स्वयं लिखार् है कि -’सार्ंगार् एक अनुशार्सनहीन भीड़ क नेतृत्व कर रहार् थार्।’3 अस्वार्भार्विक संगठन – डॉ. ए.सी.बनर्जी की मार्न्यतार् है कि रार्णार् सार्ंगार् की ओर से अफगार्न और रार्जपूत दोनों युद्ध में लड़ रहे थे, किन्तु उनक यह गठबंधन अस्वार्भार्विक थार्। अफगार्न और रार्जपूत धर्म, उद्देश्य और परम्परार्ओं की दृष्टि से बिल्कुल भिन्न थे, फिर वे संयुक्त रूप से कैसे लड़ सकते थे? ऐसे अस्वार्भार्विक संगठन के अधीन विजय प्रार्प्त कर पार्नार् दुष्कर है। 1 बार्बरनार्मार्, (अनु.), भार्ग-2, पृ. 574; डॉ. जी.एन.शर्मार्, मेवार्ड़ एण्ड दि मुगल एम्पार्यर्स, पृ. 37. 2 रार्धेश्यार्म, पूर्वोक्त कृति, पृ. 315. 3 शर्मार्, जी.एन., मेवार्ड़ एण्ड दि मुगल एम्पार्यर्स, पृ. 37. 

सार्ंगार् क रण क्षेत्र में घार्यल हो जार्नार् – हरविलार्स शार्रदार् की मार्न्यतार् है कि रार्णार् सार्ंगार् के खार्नवार् युद्ध के दौरार्न घार्यल हो जार्ने, मूिच्र्छत अवस्थार् में उन्हें रण क्षेत्र से सुरक्षित स्थार्न पर ले जार्ने के कारण रार्जपूत सेनार् नेतृत्व-विहीन हो गई तथार् अपनार् सार्हस खो बैठी।1 सार्ंगार् की अनुपस्थिति से रार्जपूत सेनार् में भगदड़ मच गई और वे रण क्षेत्र छोड़कर भार्गने लगे। यह उनकी परार्जय क कारण बनार्। लेकिन तथ्यों क आलोचनार्त्मक दृष्टि से अध्ययन करने पर इसे भी हार्र क कारण नहीं मार्नार् जार् सकतार्।

सार्ंगार् की व्यक्तिगत भूलें – रार्णार् सार्ंगार् ने समय और परिस्थितियों क लार्भ नहीं उठार्यार्। बयार्नार् के युद्ध में बार्बर के सैनिकों की परार्जय के बार्द उनक मनोबल काफी गिर चुक थार्। यद्यपि मुहम्मद शरीफ ज्योतिषी की भविष्यवार्णी ने मुगल सेनार् को और भी अधिक हतोत्सार्हित कर दियार् थार्। उसके अमीर रार्जपूतों से युद्ध करने को तैयार्र न थे। ऐसी स्थिति में यदि रार्णार् सार्ंगार् तुरन्त आक्रमण कर देतार् तो संभव है कि परिणार्म उसके पक्ष में होतार्। किन्तु रार्णार् सार्ंगार् ने बयार्नार् से आगरार् की ओर बढ़ने के लिए भुसार्वर क एक लम्बार् माग चुनार् जिससे बार्बर को अपनी स्थिति सुधार्रने क पर्यार्प्त अवसर मिल गयार्। उसने इसक लार्भ उठार्कर युद्ध में विजय प्रार्प्त की।

बार्बर की सेनार् को विश्रार्म और शक्ति संगठन क अवसर – पार्नीपत के युद्ध के बार्द बार्बर की सेनार् को विश्रार्म करने तथार् अपनी थकान मिटार्ने क पर्यार्प्त अवसर मिल गयार्। बार्बर ने इस समयार्वधि में भार्वी युद्ध के लिए पूर्ण तैयार्रियार्ं कर ली, यथार् – सैनिकों की रक्षार् के लिए खार्इयार्ं खुदवार्नार्, पहियेदार्र तिपार्इयार्ं बनवार्नार् और सैन्य टुकड़ियों को अपने-अपने स्थार्न पर युद्ध करने के लिए पंक्तिबद्ध करनार् आदि। इसके विपरीत रार्णार् सार्ंगार् ने अपनी सेनार् की रक्षार् के लिए कोई कारगर कदम नहीं उठार्ये।1 रिजवी, मुगलकालीन भार्रत (बार्बर), पृ. 234-48. 

उपर्युक्त कारणों से खार्नवार् के मैदार्न में बार्बर की विजय निर्णार्यक रही।

खार्नवार् के युद्ध के परिणार्म

भार्रतवर्ष के इतिहार्स में खार्नवार् क युद्ध बहुत ही महत्त्वपूणर् है। यदि पार्नीपत के प्रथम युद्ध ने भार्रत में लोदी वंश के शार्सन को सदैव के लिए समार्प्त कर दियार् तो खार्नवार् के युद्ध ने रार्जपूतों की शक्ति को कुचल दियार्। इस युद्ध के कुछ महत्त्वपूर्ण परिणार्म थे –

मेवार्ड़ के गौरव क अंत – खार्नवार् के युद्ध में रार्णार् सार्ंगार् की युद्ध और कूटनीति दोनों में ही बार्बर से परार्जय हुई। इस युद्ध के पश्चार्त् मेवार्ड़ रार्ज्य के गौरव क अन्त हो गयार्। सार्ंगार् की मृत्यु से मेवार्ड़ क प्रभार्व जो महार्रार्णार् कुंभार् के समय से लेकर अब तक बहुत बढ़-चढ़ गयार् थार्, वह एकदम कम हो गयार्। इस युद्ध के कारण मेवार्ड़ की सीमार् और शक्ति कम हो गयी। फलत: इसके स्थार्न पर मार्लदेव के नेतृत्व में मार्रवार्ड़ शक्ति-सम्पन्न हो गयार्।

रार्जस्थार्न की स्वतंत्रतार् क अन्त : एक युग की समार्प्ति – खार्नवार् के युद्ध में रार्जपूतों की परार्जय केवल मेवार्ड़ के लिए ही नहीं अपितु रार्जस्थार्न के लिए भी बहुत ही घार्तक प्रमार्णित हुई। रार्जस्थार्न की सदियों पुरार्नी स्वतंत्रतार् तथार् उसकी प्रार्चीन हिन्दू संस्कृति को सफलतार्पूर्वक अक्षुण्ण बनार्ये रख सकने वार्लार् अब कोई भी शार्सक नहीं रह गयार् थार्। रार्जस्थार्न के लिए यह युद्ध एक युग की समार्प्ति क प्रतीक थार्। डॉरघ् ार्ुबीर सिंह के मतार्नुसार्र ‘खार्नवार् के युद्ध क्षेत्र में आग उगलती हुई मुगल तोपों ने रार्जपूतों के प्रमुख नेतार् और मेवार्ड़ के महार्न् प्रतार्पी शार्सक रार्णार् सार्ंगार् की परार्जय को ही सुनिश्चित नहीं बनार् दियार् थार्, अपितु उन्होंने मध्यकालीन रार्जस्थार्न के अतं की भी स्पष्ट घोषणार् कर दी थी।’

रार्जस्थार्न के योद्धार्ओं को पहली बार्र तोपों क सार्मनार् करनार् पड़ार् थार्। बार्बर की व्यूह रचनार् एवं पार्श्र्वों पर आक्रमण करने की उसकी युद्ध-प्रणार्ली भी रार्जपूतों के लिए सर्वथार् नई तथार् उनकी सेनार् में परार्जय जनक अस्त-व्यस्ततार् उत्पन्न कर देने वार्ली थी। सार्थ ही यह युद्ध रार्जपूतों में युद्ध-विद्यार् के विकास के लिए एक नयार् अध्यार्य प्रार्रम्भ करने वार्लार् थार्।

रार्जनीतिक परार्धीनतार् के सार्थ-सार्थ रार्जस्थार्न में इस युद्ध में परार्जय के कारण यहार्ं की कलार्, संस्कृति और विद्यार् क भी ह्रार्स होने लगार्, क्योंकि मुगलों की अधीनतार् में आने के कारण वह नए-नए विदेशी प्रभार्वों से अछूतार् नहीं रह सका। इससे रार्जस्थार्न क मध्यकालीन स्वरूप ही बदल गयार्। रार्जस्थार्न में रार्जनीतिक एकतार् की स्थार्पनार् हुई। सार्थ ही धीरे-धीरे समूचे रार्जस्थार्न की संस्कृति तथार् सार्हित्य में इस युद्ध ने और मुगल सम्पर्क ने एक अनोखी समार्नतार् भी उत्पन्न कर दी। मुगल सार्म्रार्ज्य की स्थार्पनार् के बार्द उत्तरी भार्रत में उत्पन्न होने वार्ली नई सम्मिलित हिन्दू-मुस्लिम संस्कृति क प्रभार्व कुछ समय बार्द रार्जस्थार्न के निवार्सियों के आचार्र-विचार्र, रहन-सहन, वेशभूषार्, खार्न-पार्न आदि में भी दिखार्ई देने लगार्। इन सभी नवीन प्रवृत्तियों तथार् महत्त्वपूर्ण क्रार्ंतिकारी प्रभार्वों की शुरूआत खार्नवार् के युद्ध के बार्द तथार् उसी के परिणार्मों की देन है। इसलिए रार्जस्थार्न के इतिहार्स में पूर्व आधुनिक काल क प्रार्रम्भ इस निर्णार्यक युद्ध के दिन से ही मार्नार् जार्नार् चार्हिए।

रार्जपूत शक्ति क ह्रार्स – खार्नवार् के युद्ध में परार्जय के कारण रार्जपूतों की संगठित शक्ति नष्ट हो गई। खार्नवार् के युद्ध में रार्जपूतों की प्रतिष्ठार् क आतंक जो पिछले दस वर्षों से भार्रत में मुसलमार्नों की आंखों में छार्यार् हुआ थार्, सदैव के लिए दूर कर दियार्।1 इस परार्जय के बार्द शेष रार्जपूत रार्ज्यों को बार्बर और अकबर ने अपने अधीन कर लियार्। रश्बु्रक विलियम्स की यह मार्न्यतार् अतिशयोक्तिपूर्ण है कि खार्नवार् के युद्ध से रार्जपूत शक्ति सदैव के लिए नष्ट हो गयी। यद्यपि यह सत्य है कि खार्नवार् के युद्ध में हर रार्जपूत परिवार्र क एक-न-एक योद्धार् अवश्य मार्रार् गयार्। रार्जपूत इस युद्ध के बार्द भविष्य में संगठित होकर शत्रु क मुकाबलार् करने की बार्त ही नहीं सोच सके। रार्जपूतों के लिए यह युद्ध भयंकर सिद्ध हुआ, मेवार्ड़ की सीमार् और शक्ति घट गई, रार्जपूत संगठन जो मेवार्ड़ की शक्ति और प्रतिष्ठार् पर निर्भर थी, वह भी समार्प्त हो गयार्, किन्तु रार्जपूत शक्ति नष्ट नहीं हुई। स्वयं बार्बर ने भी यह अनुभव कियार् थार्, इसीलिए उसने भी इस महत्त्वपूर्ण विजय के बार्वजूद रार्जपूतार्नार् में अपनार् सार्म्रार्ज्य विस्तार्र करने क प्रयार्स नहीं कियार्। कुछ ही वर्षों में रार्जपूतों की शक्ति पुन: बढ़ गई।2 जब शेरशार्ह सूरी ने रार्जपूतों से युद्ध एस.आर. शर्मार् के अनुसार्र रार्जपूतों के सर्वोच्चतार् क भय, जो गत दस वर्षों से मंडरार् रहार् थार्। वह सदैव के लिए समार्प्त हो गयार्। 1 रश्बु्रक विलियम्स, ऐन इम्पार्यर बिल्डर ऑफ दि सिक्सटींथ सेंचुरी, पृ. 156; लेनपलू बार्बर, पृ. 182;

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