क्रियार्योग क्यार् है ?

महर्षि पतंजलि ने मध्यम कोटि के सार्धकों की चित्तशुद्धि के लिए क्रियार्योग क उपदेश दियार् है। यहार्ँ पर पार्ठकों के मन में यह प्रश्न उठनार् स्वार्भार्विक है कि सार्धक से क्यार् तार्त्पर्य है। बी.के.एस. आयंगर के अनुसार्र ‘‘सार्धक वह है जो अपने मन व बुद्धि को लगार्कर क्षमतार्पूर्वक, समर्पण भार्व से व एकचित्त होकर सार्धनार् करतार् है।’’ सार्धनार् एक सतत् अभ्यार्स है जिसमें सार्धक अपनी अशुद्धियों को दूर करतार् है।

महर्षि पतंजलि ने अशुद्धियों को दूर करने के लिए कहार् है- ‘‘तप: स्वार्ध्यार्येश्वरप्रणिधार्नार्नि क्रियार्योग:’’ अर्थार्त् तपस्यार्, स्वार्ध्यार्य तथार् र्इश्वरप्रणिधार्न- यह क्रियार्योग है।

महर्षि व्यार्स कहते हैं कि ‘‘अतपस्वी को योग सिद्ध नहीं होतार्। अनार्दि कालीन कर्म और क्लेश की वार्सनार् के द्वार्रार् विचित्र और विषयजार्लयुक्त जो अशुद्धि है, वह तपस्यार् के बिनार् सम्यक् भिन्न अर्थार्त् विरल यार् छिन्न नहीं होतार् है।

इसलिये सार्धनों में तप क उल्लेख कियार् गयार् है। चित्त को निर्मल करने वार्लार् यह तप ही योगियों द्वार्रार् सेव्य है, ऐसार् आचाय मार्नते हैं। प्रणवार्दि पवित्र मन्त्रों क जप अथवार् मोक्ष शार्स्त्र क अध्ययन स्वार्ध्यार्य है। र्इश्वर प्रणिधार्न, परम गुरु र्इश्वर को समस्त कमोर्ं क अर्पण अथवार् कर्मफल आकाड़्क्षार् क त्यार्ग है।

लक्ष्य- क्रियार्योग क्यों कियार् जार्ये इस प्रश्न क उत्तर महर्षि ने देते हुए कहार् है-

समार्धिभार्वनाथ: क्लेशतनूकरणाथश्च।(पार्.यो.सू.2.2) क्रियार्योग क अभ्यार्स क्लेशों को तनु करने के लिए एवं समार्धि भूमि प्रार्प्त करने के लिये कहार् जार् रहार् है। क्लेश- अविद्यार्, अस्मितार्, रार्ग, द्वेश और अभिनिवेश हैं। 

अविद्यार् अर्थार्त् अनित्य को नित्य मार्ननार्, अशुचि को शुचि अर्थार्त् पवित्र मार्ननार्, अनार्त्म को आत्म अर्थार्त् अपनार् मार्ननार्, दु:ख को सुख समझनार् है। यह संसार्र अनित्य, शरीर गन्दगी से भरार् हुआ है, यह संसार्र दु:खमय है हर सुख क अन्त दु:ख से परिपूर्ण है, यह इन्द्रिय, शरीर और चित्त जड़ है, अनार्त्म है, उपर्युक्त सभी की विपरीत भार्वनार् कर संसार्र को नित्य, पवित्र, सुखमय व आत्म समझनार् ही अविद्यार् है। अविद्यार् ही अन्य क्लेशों क मूल है। 

अस्मितार् अर्थार्त् ‘मैं की भार्वनार्’ अहम् भार्वनार् ही अस्मितार् क्लेश है यह मेरार् शरीर है, मेरी वस्तु आदि को समझनार् अस्मितार् नार्मक क्लेश है। यह घोर कष्ट को देने वार्ली शक्ति है। रार्ग, सदैव सुखी रहने की इच्छार् व द्वेश दु:ख से बचने क भार्व है। दोनों परस्पर मिले हुये हैं। अभिनिवेश मृत्यु भय है।

उपर्युक्त सभी भार्व समार्धि से दूर ले जार्ने वार्ले हैं। समार्धि अर्थार्त् सभी वृत्तियों क नार्श, क्लेशों के नार्श की अवस्थार्। क्रियार्योग से समस्त क्लेशों क नार्श सम्भव है जिससे सहज ही समार्धि अवस्थार् प्रार्प्त लो जार्येगी।

क्रियार्योग के प्रकार 

क्रियार्योग के तीन प्रकार महर्षि पतंजलि ने बतार्ये है।

  1. तप 
  2. स्वार्ध्यार्य 
  3. र्इष्वर प्रणिधार्न 

1. तप- 

तप क तार्त्पर्य बेहतर अवस्थार् की प्रार्प्ति के लिए परिवर्तन यार् रूपार्न्तरण की एक प्रक्रियार् के अनुगमन से है। सार्मार्न्य अर्थ में, तप पदाथ के शुद्ध सार्रतत्व को प्रार्प्त करने की एक प्रक्रियार् है। उदार्हरण हेतु जिस प्रकार सोने को बार्र-बार्र गर्म कर छोटी हथोड़ी से पीटार् जार्तार् है जिसके परिणार्म स्वरूप शुद्ध सोनार् प्रार्प्त हो सके। उसी प्रकार योग में तप एक ऐसी प्रक्रियार् है जिसके द्वार्रार् व्यक्ति की अशुद्धियों को जलार् कर भस्म कियार् जार्तार् है तार्कि उसक असली सार्रतत्व प्रकट हो सके।

महर्षि पतंजलि के अनुसार्र ‘‘तप से अशुद्धियों क क्षय होतार् है तथार् शरीर और इन्द्रियों की शुद्धि होती है।’’ 

‘‘कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयार्त्तपस:।’’ (पार्.यो.सू. 2.43) 

जिस प्रकार अश्व-विद्यार् में कुशल सार्रथि चंचल घोड़ों को सार्धतार् है उसी प्रकार शरीर, प्रार्ण, इन्द्रियों और मन को उचित रीति और अभ्यार्स से वशीकार करने को तप कहते हैं, जिससे सर्दी-गर्मी, भूख-प्यार्स, सुख-दु:ख, हर्ष-शोक. मार्न-अपमार्न आदि सम्पूर्ण द्वन्द्वों की अवस्थार् में बिनार् किसी कठिनाइ के स्वस्थ शरीर और निर्मल अन्त:करण के सार्थ मनुष्य योगमाग में प्रवृत्त रह सके।

तप तीन प्रकार क होतार् है- शार्रीरिक, वार्चिक व मार्नसिक। फल को न चार्हने वार्ले निष्काम भार्व से योगी पुरुषों द्वार्रार् परम श्रद्धार् से कियार् हुआ तप सार्त्विक होतार् है। इसके विपरीत जो तप सत्कार, मार्न और पूजार् के लिए अथवार् केवल पार्खण्ड से कियार् जार्तार् है वह अनिश्चित और क्षणिक फलवार्लार् होतार् है।

अपने वर्ण, आश्रम, परिस्थिति और यौग्यतार् के अनुसार्र स्वधर्म क पार्लन करनार् और उसके पार्लन में जो शार्रीरिक यार् मार्नसिक अधिक से अधिक कष्ट प्रार्प्त हो, उसे सहर्ष सहन करनार् इसक नार्म तप है। व्रत, उपवार्स आदि भी तप की ही श्रेणी में आते हैं। निष्काम भार्व से इस तप क पार्लन करने से मनुष्य क अन्त:करण अनार्यार्स ही शुद्ध हो जार्तार् है।

‘तपो द्वन्द्वसहनम्’ अर्थार्त् सब प्रकार के द्वन्द्वों को सहन करनार् तप है। ये द्वन्द्व शार्रीरिक, मार्नसिक और वार्चिक किसी भी श्रेणी के हो सकते हैं। तप के न होने पर सार्धक तो क्यार् सार्मार्न्य जन भी कुछ प्रार्प्त नहीं कर सकते। तप हर क्षेत्र में परम आवश्यक है। योग सार्धनार् में सर्दी, गर्मी, भूख, प्यार्स, आलस्य, अहंकार, जड़तार् आदि द्वन्द्वों को सहन करनार् और कर्तव्यमाग पर आगे बढ़ते रहनार् ही तप है।

आध्यार्त्मिक जगत् में तप के महत्त्व को बतार्ते हुए तैत्तिरीयोपनिषद् की भृगुवल्ली में कहार् गयार् है ‘‘तपसार् ब्रह्म विजिज्ञार्सत्व। तपो ब्रह्मेति’’ अर्थार्त् तप द्वार्रार् ही ब्रह्म को जार्नार् जार् सकतार् है। तप ही ब्रह्म है। गीतार् में भी वर्णन मिलतार् है यथार्-

मार्त्रार्स्पर्शार्स्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदु:खदार्:। 

अगमार्पार्यिनोSनित्यार्स्तार्ंस्तितिक्षस्व भार्रत।। गीतार् 2.14 

अर्थार्त् सर्दी गर्मी और सुख-दु:ख को देने वार्ले इन्द्रिय और विषयों के संयोग तो उत्पत्ति, विनार्शशील और अनित्य हैं, इसलिये इनको सहन करनार् उचित है। सहिष्णुतार् महार्फल प्रदार्न करती है। सर्दी-गर्मी, सुख-दु:ख इन सबक सम्बन्ध नित्य क नहीं है, ये सदैव नहीं रहेंगे, अर्थार्त् अल्पकालिक हैं। जब तक संयोग है तभी तक दु:ख है यार् यूँ कहें दु:ख यार् सुख की प्रतीति होती है। संयोग, वियोग अस्थिर और अनित्य हैं। कोर्इ भी सदार् नहीं रहेगार्। अत: इन क्षणिक संयोगो, वियोगो के लिए प्रतिक्रियार् करनार् उचित प्रतीत नहीं होतार्, इन प्रतिक्रियार्ओं क त्यार्ग ही तप है। कहार् गयार् है कि ‘‘नार्तपस्विनो: योग सिद्धति’’ अर्थार्त् तप के बिनार् योग सिद्ध नहीं होतार् है।

संसार्र में जो भी कार्य दु:सार्ध्य है, अति दुष्कर है, कठिन जार्न पड़तार् है, ऐसे दु:सार्ध्य कायोर्ं को एकमार्त्र तप के द्वार्रार् ही अनार्यार्स सिद्ध कियार् जार् सकतार् है।
 यथार्

 यद् दुष्करं दुरार्रार्ध्यं दुर्जयं दुरतिक्रमम्। 

 तत्सवर्ं तपसार् सार्ध्यार् तपो हि दुरतिक्रमम्।। 

तप के सम्बन्ध में कूर्मपुरार्ण में कहार् गयार् हैकृ ‘तपस्यार् से उत्पन्न योगार्ग्नि शीघ्र ही निखिल पार्प समूहों को दग्ध कर देती है। उन पार्पों के दग्ध हो जार्ने पर प्रतिबन्धक रहित तार्रक ज्ञार्न क उदय हो जार्तार् है। स्वार्मी विज्ञार्नार्न्द सरस्वती कूर्मपुरार्ण के इस उदार्हरण को आधार्र बनार्कर आगे कहते हैं कि जिस प्रकार बन्धन रज्जु को काटकर श्येन (बार्ज) पक्षी आकाश में उड़ जार्तार् है, ठीक उसी प्रकार जिस योगी पुरुष क बन्धन टूट जार्तार् है उसक संसार्र बन्धन सदार् के लिये छूट जार्तार् है। इस प्रकार संसार्र बन्धन से मुक्त हुआ पुरुष पुन: बन्धन में नहीं बन्धतार् है। यह उसी प्रकार है जिस प्रकार डण्ठल से पृथक् हुआ फल पुन: डण्ठल से नहीं जुड़ सकतार् है। अत: शार्स्त्र के कथनार्नुसार्र मोक्ष सार्धनार्ओं में से तप को श्रेष्ठतम सार्धनार् मार्नार् गयार् है।

तप के प्रकार- गीतार् में 17वें अध्यार्य में तप के तीन भेद किये गये हैं-

  1. शार्रीरिक 
  2. वार्चिक 
  3. मार्नसिक 

इसके पश्चार्त् इन तीन के भी तीन और भेद किये हैं-

  1. सार्त्विक, 
  2. रार्जसिक और 
  3. तार्मसिक। 

 1. शार्रीरिक तप- 

 देवद्विजगुरुप्रार्ज्ञपूजनं शौचमाजवम्। 

 ब्रह्मचर्यमहिंसार् च शार्रीरं तप उच्यते।। श्रीमद्भगवद्गीतार् 17.14 

अर्थार्त् देवतार्, ब्रार्ह्मण, गुरु और ज्ञार्नीजनों क पूजन, पवित्रतार्, सरलतार्, ब्रह्मचर्य और अहिंसार् यह शरीर सम्बन्धी तप है। महर्षि पतंजलि ने सूत्र 2.46 में आसन, 2.49 में प्रार्णार्यार्म की बार्त की है। वह भी शार्रीरिक तप के अन्तर्गत वर्णित कियार् जार् सकतार् है। आसन आदि के अन्तर्गत आहार्र संयम की बार्त भी आ जार्ती है। यथार्- गीतार् 6.16 

नार्त्यश्नतस्तु योगोSस्ति न चैकान्तमनश्नव:। 

न चार्ति स्वप्नशीलस्य जार्ग्रतो नैव चाजुन।। 

हे अर्जुन! यह योग न तो बहुत खार्ने वार्ले का, न बिल्कुल न खार्ने वार्ले का, न बहुत शयन करने वार्ले क और न सदार् जार्गने वार्ले क ही सिद्ध होतार् है। युक्तार्हार्रविहार्रस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु। युक्तस्वप्नवबोधस्य योगो भवति दु:खहार्॥ श्रीमद्भगवद्गीतार् 6.17 दु:खों क नार्श करने वार्लार् योग तो यथार्योग्य आहार्र-विहार्र करने वार्ले का, कमोर्ं में यथार्योग्य चेष्टार् करने वार्ले क और यथार्योग्य सोने तथार् जार्गने वार्ले क ही सिद्ध होतार् है। यहार्ँ दु:खों से तार्त्पर्य केवल सार्ंसार्रिक दु:खों से नहीं वरन् उन सभी प्रकार के दु:खों से है जो कि अविद्यार् जनित हैं। अविद्यार् अर्थार्त् वार्स्तविक दु:ख को सुख समझनार्, पार्प को पुण्य समझनार्, अवार्स्तविक को वार्स्तविक समझनार्। त्रितार्प भी तो दु:ख ही हैं।

2. वार्चिक तप- 
अनुद्वेगकरं वार्क्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वार्ध्यार्यार्भ्यार्सनं चौव वार्ड़्मयं तप उच्यते।। श्रीमद्भगवद्गीतार् 17.15

मन को उद्विग्न न करने वार्ले, प्रिय तथार् हितकारक वचनों और स्वार्ध्यार्य के अभ्यार्स को वार्चिक तप कहते हैं। कटु वचन, झूठ, हिंसक वार्क्य, निन्दार्-चुगली आदि वचन दूसरे के मन को तो उद्वेलित करते ही हैं परन्तु इन वार्क्यों क सबसे अधिक प्रभार्व बोलने वार्ले के मन व प्रार्ण पर पड़तार् है। उद्वेलित करने वार्ले वचनों से जो तरंगें उत्पन्न होती हैं वे वार्तार्वरण में हलचल उत्पन्न करके पुन: कहीं अधिक वेग से लौटती हैं व उत्पन्न कर्तार् के मन व प्रार्ण को क्षीण व कमजोर कर देती है। लगार्तार्र इसी प्रकार की तरंगें प्रवार्हित करने वार्ले लोग सुखी नहीं देखे गये हैं। वे स्वयम् के सार्थ-सार्थ सम्पूर्ण वार्तार्वरण को दूषित कर देते हैं व समार्ज से तो तिरस्कार झेलते ही हैं स्वयम् में आत्मग्लार्नि एवं कुण्ठित जीवन यार्पन करने पर मजबूर हो जार्ते हैं। अत: इन तरंगों को उत्पन्न न करने क मार्नसिक संकल्प, सार्हस व –ढ़ इच्छार्शक्ति ही तप है।

प्रिय तथार् हितकारी वचन स्वयम् व दूसरों को सार्म्यार्वस्थार् में बनार्ये रखने के लिये बोलने चार्हियें। यहार्ँ यह ध्यार्न रखने व समझने की बार्त है कि प्रिय वचन से तार्त्पर्य चार्पलूसी करनार् नहीं है। ‘‘सत्यं बु्रयार्त् प्रियं बु्रयार्त्न बु्रयार्त् सत्यमप्रियम्’’ क सिद्धार्न्त यहार्ँ ध्यार्न रखने योग्य है।

स्वार्ध्यार्य अर्थार्त् श्रेष्ठ पुस्तकों क अध्ययन यदि इसके आध्यार्त्मिक अर्थ की ओर संकेत करें तो ‘स्वार्ध्यार्य’ क तार्त्पर्य ‘स्वयम् क अध्ययन’ करनार् है। इसके सम्बन्ध में आप स्वार्ध्यार्य शीर्षक में विस्तार्रपूर्वक जार्नेंगे।

3. मार्नस तप- 
 मन: प्रसार्द: सौम्यत्वं मौनमार्त्मविनिग्रह:।
 भार्वसंशुद्धिरित्येतत्तपो मार्नसमुच्यते।। श्रीमद्भार्गवद्गीतार् 17.16

मन की प्रसन्नतार्, शार्न्तभार्व, भगवच्चिन्तन करने क स्वभार्व, मन क निग्रह और अन्त:करण के भार्वों की भलीभार्ँति पवित्रतार्- इस प्रकार यह मन सम्बन्धी तप कहार् जार्तार् है। मार्नसिक तप की यह स्थिति निश्चित ही पूर्वोक्त वर्णित शार्रीरिक, वार्चिक तपों के उपरार्न्त अधिक आसार्न हो जार्ती है। वार्स्तव में शार्रीरिक, वार्चिक और मार्नसिक तप एक सार्थ ही किये जार्ते हैं। ऐसार् नहीं है कि पहले केवल सार्धक शार्रीरिक स्तर पर ही तप हेतु प्रस्तुत हो, वस्तुत: लगभग सार्थ-सार्थ ही ये अवस्थार्यें सम्पार्दित होती रहती हैं। मन की प्रसन्नतार्, शार्न्तभार्व, भगवत् चिन्तन आदि अवस्थार्यें केवल सोचनेभर नहीं आती वरन् सतत् प्रयार्स से प्रार्प्त होती हैं और यही प्रयार्स तप कहलार्तार् है।

4. सार्त्विक तप- 
 श्रद्धयार् परयार् तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरै:।
 अफलार्कांक्षिभिर्युक्तै: सार्त्विकं परिचक्षते।। श्रीमद्भगवद्गीतार् 17.17

मनुष्य क फल की आशार् से रहित परम श्रद्धार् तथार् योगयुक्त होकर इन तीनों प्रकार के तपों को करनार् सार्त्विक तप कहलार्तार् है। शार्रीरिक तप, वार्चिक तप और मार्नस तप को फल की आशार् से रहित परम श्रद्धार् तथार् एक सार्धक की भार्ँति करार्नौ ही सार्त्विक तप कहलार्तार् है।

5. रार्जसिक तप- 
सत्कारमार्नपूजार्थर्ं तपो दम्भेन चैव यत्।
क्रियते तदिह प्रोक्तं रार्जसं चलमध्रुवम्।। श्रीमद्भगवद्गीतार् 17.18

सत्कार, मार्न, पूजार् व पार्खण्ड पूर्वक कियार् गयार् तप चंचल और अस्थिर रार्जस तप कहलार्तार् है।

6. तार्मसिक तप- 
 मूढ ग्रार्हेणार्त्मनो यत्पीडयार् क्रियते तप:।
 परस्योत्सार्दनार्थर्ं वार् तत्तार्मसमुदार्हृतम्।। श्रीमद्भगवद्गीतार् 17.19

जो तप मूढ़तार्पूर्वक हत से, मन, वार्णी और शरीर की पीड़ार् के सहित अथवार् दूसरे क अनिष्ट करने के लिये कियार् जार्तार् है, वह तप तार्मस कहार् जार्तार् है। तप वार्स्तव में शरीर, मन, वार्णी, विचार्रों क सही सार्मंजस्य है जो कि तत्व को जार्नने में सीड़ी क कार्य करतार् है। क्रियार्योग क अध्ययन करते हुये अव आप आगे स्वार्ध्यार्य के विषय में विस्तार्र पूर्वक ज्ञार्न प्रार्प्त करेंगे।

2. स्वार्ध्यार्य 

वेद, उपनिषद्, पुरार्ण आदि तथार् विवेकज्ञार्न प्रदार्न करने वार्ले सार्ंख्य, योग, आध्यार्त्मिक शार्स्त्रों क नियम पूर्वक अध्ययन तथार् अन्य सभी वे सार्धन जो कि विवेक ज्ञार्न में सहार्यक हैं जैसे अन्य धर्मग्रन्थ, श्रेष्ठ पुस्तकें आदि क अध्ययन, मनन स्वार्ध्यार्य कहलार्तार् है।

स्वार्ध्यार्य के सम्बन्ध में पं. श्रीरार्मशर्मार् आचाय क कथन है कि ‘‘श्रेष्ठ पुस्तकें जीवन्त देव प्रतिमार्एँ हैं। जिनके अध्ययन से तुरन्त उल्लार्स और प्रकाश मिलतार् है।’’

श्रीमार्न् शार्न्ति प्रकाश आत्रेय के अनुसार्र ‘स्वार्ध्यार्य निष्ठार् जब सार्धक को प्रार्प्त हो जार्ती है तब उसके इच्छार्नुसार्र देवतार्, ऋषियों तथार् सिद्धों के दर्शन होते हैं तथार् वे उसको कार्य सम्पार्दन में सहार्यतार् प्रदार्न करते हैं।

आचाय उदयवीर शार्स्त्री जी के अनुसार्र, इस पद के दो भार्ग हैं- ‘स्व’ और ‘अध्ययन’। स्व पद के चार्र अर्थ हैं- आत्मार्, आत्मीय अथवार् आत्मसम्बन्धी, ज्ञार्ति (बन्धु-बार्न्धव) और धन।

अध्ययन अथवार् अध्यार्य कहते हैं- चिन्तन, मन अथवार् पूर्वोक्त अध्ययन।

आत्मविषयक चिन्तन व मनन करनार्, तत्सम्बन्धी ग्रन्थों क अध्ययन तथार् ‘प्रणव’ आदि क जप करनार् ‘स्वार्ध्यार्य’ है। द्वितीय अर्थ में आत्मसम्बन्धी विषयों क चिन्तन मनन करनार्। आत्मार् क स्वरूप क्यार् है? कहार्ँ से आतार् है? इत्यार्दि विवेचन से आत्मविषयक जार्नकारी के लिये प्रयत्नशील रहनार्। तृतीय अथोर्ं में जार्ति बन्धुबार्न्धव आदि की वार्स्तविकतार् को समझकर मोहवश उधर उत्कृष्ट न होते हुये विरक्त की भार्वनार् को जार्ग्रत रखनार् स्वार्ध्यार्य है। 

चतुर्थ अर्थ में धन-सम्पत्ति आदि की ओर अधिक आकृष्ट न होनार्, लोभी न बननार्। धन की नश्वरतार् को समझते हुये केवल सार्मार्न्य निर्वहन योग्य धन कमार्नार् व उपयोग करनार् अधिक संग्रह न करनार्, मठार्धीश आदि बनने की इच्छार् न रखनार् ही चौथे प्रकार क अर्थ है।

स्वार्ध्यार्य स्वयं क अध्ययन है जिसमें हम सहार्यतार् पुस्तकों, ग्रन्थो आदि की लेते हैं। स्वयं को समझनार्, गुण-अवगुण बनार्ये रखनार् व आत्मतत्व की प्रार्प्ति ही स्वार्ध्यार्य क उद्देश्य है।

आगे आप र्इश्वर प्रणिधार्न विषयक ज्ञार्न प्रार्प्त करेंगे।

3. र्इश्वरप्रणिधार्न- 

अपने समस्त कमोर्ं के फल को परम गुरु परमार्त्मार् को समर्पित करनार् व कर्मफल क पूर्ण रूपेण त्यार्ग कर देनार् र्इश्वर-प्रणिधार्न है। अनन्य भक्ति भार्व से र्इश्वर क मनन चिन्तन करनार्य अपने आपको पूर्णरूपेण र्इश्वर को समर्पित कर देनार् ही र्इश्वरप्रणिधार्न है। जब सार्धक अपने कर्मफल क त्यार्ग करतार् है तो निश्चित रूप से वह जो भी कार्य करतार् है वह स्वाथ रहित, पक्षपार्त रहित कार्य करतार् है। उसक चित्त निर्मल हो जार्तार् है और वह सार्धनार्पथ पर निर्बार्ध गति से आगे बढ़तार् जार्तार् है। उसके मन में रार्ग-द्वेश जैसी भार्वनार्एँ जगह नहीं बनार्ती हैं जिससे सार्धक की भूमि –ढ़ हो जार्ती है। श्रीमत् शार्न्ति प्रकाश आत्रेय जी के अनुसार्र र्इश्वरप्रणिधार्न र्इश्वर को एक विशेष प्रकार की भक्ति है, जिसमें भक्त शरीर, मन, इन्द्रिय, प्रार्ण आदि तथार् उनके समस्त कमोर्ं को उनके फलों सहित अपने समस्त जीवन को र्इश्वर को समर्पित कर देतार् है।

 शय्यार्Sसनस्थोSथ पथि प्रणन्वार् स्वस्थ: परिक्षीणवितर्कजार्ल:। 

 संसार्रबीजक्षयमीक्षमार्ण: स्यन्नित्ययुक्तोSमृतभोगभार्गी।।(योग व्यार्सभार्ष्य 2.32) 

अर्थार्त् जो योगी शय्यार् तथार् आसन पर बैठे हुये, रार्स्ते में चलते हुये अथवार् एकान्त में रहतार् हुआ हिंसार्दि वितर्क जार्ल को समार्प्त करके र्इश्वर प्रणिधार्न करतार् है, वह निरन्तर अविद्यार् आदि को जो कि संसार्र के कारण हैं नष्ट होने क अनुभव करतार् हुआ तथार् नित्य र्इश्वर में युक्त होतार् हुआ जीवन-मुक्ति के नित्य सुख को प्रार्प्त करतार् है। श्रीमद्भगवद्गीतार् के 3.27 व 2.47 में र्इश्वर प्रणिधार्न की ही व्यार्ख्यार् हुर्इ है। स्वयं भगवार्न् कहते हैं कि ‘सभी कर्म मुझको समर्पित कर दो।’ सार्धक के ऐसार् करने पर कर्म शुभार्शुभ की श्रेणी से पार्र चले जार्ते हैं एवं सार्धक र्इश्वरत्व की ओर उन्मुख हो जार्तार् है। र्इश्वरप्रणिधार्न से शीघ्र समार्धि की सिद्धि होती है। र्इश्वरप्रणिधार्न भक्ति विशेष है और इस भक्तिविशेष के कारण माग कंटकविहीन हो जार्तार् है और शीघ्र ही समार्धि की प्रार्प्ति हो जार्ती है। योग के अन्य अंगों क पार्लन विघ्नों के कारण बहुत काल में समार्धि सिद्धि प्रदार्न करार्तार् है। र्इश्वरप्रणिधार्न उन विघ्नों को नष्ट कर शीघ्र ही समार्धि प्रदार्न करतार् है। अत: यह रार्स्तार् अति महत्त्वपूर्ण है।

योगदर्शन में र्इश्वर की सत्तार् को स्वीकार कियार् जार्तार् है। योगदर्शन क आधार्र सार्ंख्य है जहार्ँ कि र्इश्वर की सत्तार् क कहीं वर्णन नहीं है। परन्तु योगदर्शन एक व्यार्वहार्रिक ग्रन्थ है। यह मार्नव मन को भलीभार्ँति समझकर गढ़ार् गयार् है व इसे एक महत्त्वपूर्ण माग बतार्यार् गयार् है। योगदर्शन क मुख्य उद्देश्य चित्तवृत्तियों क शोधन करनार् है। निर्बीज समार्धि जो कि आध्यार्त्मिक जीवन क परमलक्ष्य है र्इश्वरप्रणिधार्न से प्रार्प्त की जार् सकती है(पार्.यो.सू.1.23)।

महर्षि पतंजलि ने र्इश्वर को पुरुष विशेष की संज्ञार् दी है। अन्य दर्शनों में जहार्ँ र्इश्वर को विश्व क सृष्टिकर्तार्, पार्लनकर्तार्, संहार्रकर्तार् कहार् गयार् है वहीं योगदर्शन में र्इश्वर को विशेष पुरुष कहार् गयार् है। ऐसार् पुरुष जो दु:ख कर्मविपार्क से अछूतार् है। महर्षि पतंजलि के अनुसार्र-

क्लेशकर्मविपार्काशयैरपरार्मृष्ट: पुरुषविशेष र्इश्वर:। (पार्.यो.सू. 1.24) 

अर्थार्त् र्इश्वर वह पुरुषविशेष है जिस पर दु:ख, कर्म, उसके लवलेश तथार् फल आदि किसी क भी कोर्इ प्रभार्व नहीं पड़तार् है। यहार्ँ र्इश्वर को व्यक्तिवार्दी नहीं वरन् उसे उच्च आध्यार्त्मिक चेतनार् कहार् गयार् है। वह र्इश्वर परमपवित्र, कर्म व उसके प्रभार्व से अछूतार् है उनक कोर्इ भी प्रभार्व र्इश्वर पर नहीं पड़तार् है। इसीलिये वह विशेष है।

समस्त जीवार्त्मार्ओं क क्लेश अर्थार्त् अविद्यार्, अस्मितार्, रार्ग, द्वेश और अभिनिवेष(पार्.यो.सू. 2.3), कर्म(पार्.यो.सू.4.7), विपार्क अर्थार्त् कमोर्ं के फल(पार्.यो.सू.2.13) तथार् आशय अर्थार्त् कमोर्ं के संस्कार (पार्.यो.सू. 2.12) से अनार्दि काल से सम्बन्ध है किन्तु र्इश्वर क इनसे न तो कभी सम्बन्ध थार्, न है, न कभी भविष्य में होने की सम्भार्वनार् ही है। वह अविद्यार्, अज्ञार्न से रहित है इस कारण सम्बन्ध नहीं है।

र्इश्वर क वार्चक ओंकार (ॐ) है। महर्षि कहते हैं ‘तस्य वार्चक: प्रणव:’(पार्.यो.सू. 1.27)। प्रणव क निरन्तर जप अर्थार्त् र्इश्वर क निरन्तर चिन्तन करनार् ही र्इश्वर प्रणिधार्न है। चित्त को सभी ओर से हटार्कर एकमार्त्र र्इश्वर पर लगार्नार् चार्हिये यह समार्धि को प्रदार्न करने वार्लार् है। इस प्रणव के जप से योग सार्धकों को मोक्ष की प्रार्प्ति होती है। र्इश्वरप्रणिधार्न से सभी अशुद्धियों क नार्श हो जार्तार् है(पार्.यो.सू. 1.29, 30, 31)।

इन अशुद्धियों में अन्तरार्य व सहविक्षेप कहे गये हैं- व्यार्धि, स्त्यार्न, संशय, प्रमार्द, आलस्य, अविरति, भ्रार्न्तिदर्शन, अलब्धभूमिकत्व तथार् अनवस्थित्व ये चित्त के नौ अन्तरार्य यार् विक्षेप हैं। इन नौ प्रकार के विक्षेपों से चित्त में शरीर में अत्यवस्थार् उत्पन्न होती है। शरीर व मन क सार्मंजस्य बिगड़ जार्तार् है एवं जब शरीर व मन व्यवस्थित नहीं रह पार्ते तव इस अवस्थार् में शार्रीरिक व मार्नसिक व्यार्धियार्ँ उत्पन्न होकर योगमाग में विघ्न-बार्धार्एँ उपस्थित हो जार्ती हैं व सार्धक सार्धनार् छोड़ बैठतार् है यही विघ्न है। सहविक्षेप दु:ख, दौर्मनस्य, अंगमेजयत्व, श्वार्स तथार् प्रश्वार्स हैं। इन सहविक्षेपों तथार् उपरोक्त नौ विक्षेपों के मिल जार्ने पर घोर विपत्ति सार्धक पर आ जार्ती है। वह ठीक प्रकार सोच-समझ नहीं पार्तार् एवं सार्धनार् छोड़ बैठतार् है अथवार् घोर आलस्य में समय व्यतीत करतार् रहतार् है।

विक्षिप्त चित्त वार्लों की ये उपर्युक्त अवस्थार्एँ निरन्तर अभ्यार्स से शार्न्त हो जार्ती हैं। एकतत्व पर अर्थार्त् र्इश्वर पर निरन्तर(पार्.यो.सू. 1.32 ) ध्यार्न लगार्ने से ये विक्षेप दूर हो जार्ते हैं।

क्रियार्योग के सार्धन 

महर्शि पतंजलि ने योगसूत्र में क्रियार्योग के निम्नार्कित तीन सार्धन बतार्ये है। महर्षि पतंजलि ने समार्धि पार्द में जो भी योग के सार्धन बतार्ए हैं वे सभी मन पर निर्भर है। किन्तु जो अन्य विधियों से मन को नियन्त्रित नही कर सकते है। उनके लिए क्रियार्योग क वर्णन कियार् गयार् है। इस क्रियार्योग से क्लेश कमजोर होकर समार्धि की स्थिति प्रार्प्त करार्ते है। इस समार्धि की स्थिति में दु:खों क नार्श हो जार्तार् है। आनन्द की प्रार्प्ति होती है, सार्धन पार्द में इन तीनों सार्धनों क वर्णन है, जो निम्न प्रकार है-

1. तप- 

तप एक प्रकार से आध्यार्त्मिक जीवन शैली को कहार् जार् सकतार् है। तप सार्धनार् काल में आध्यार्त्मिक जीवन शैली अपनार्तें हुए जों शार्रीरिक तथार् मार्नसिक कष्टों को र्इश्वर की इच्छार् समझकर स्वीकार कर लेनार् प्रत्युत्तर में कोर्इ प्रतिक्रियार् न करनार् यह सार्धनार् तप है। तपस्वी र्इश्वर के सार्क्ष्य अपनार् सम्पूर्ण जीवन जीतार् है। सार्धन काल में उसक कोर्इ भी कर्म ऐसार् नहीं होतार् जो अपनी आरार्ध्य के समक्ष नहीं कियार् जार् सकतार्। तप संयमित रूप से जीवन जीनार् है अहंकार, तृष्णार् और वार्सनार् को पीछे छोड.कर उस प्रभु पर समर्पण ही तप है।

सार्धक काल में शार्स्त्रोंक्त कर्मो में फल की इच्छार् करते हुए करनार्, शार्स्त्रोंक्त कर्म जैसे- स्वधर्म पार्लन, व्रत, उपवार्स, नियम, संयम, कर्तव्य पार्लन आदि इन सभी कर्मो को निश्ठार् व र्इमार्नदार्री से करनार् ही तप है। अपने आश्रय, वर्ण, योग्यतार् और परिस्थिति के अनुसार्र ही स्वधर्म क पार्लन करनार् चार्हिए, उसके पार्लन में जो भी कष्ट प्रार्प्त हो चार्हे वह शार्रीरिक हो यार् मार्नसिक, उन सभी कष्टों को सहर्ष सहन करनार् ही ‘तप’ कहलार्तार् है।
महर्षि पतंजलि में वर्णन कियार् है-

‘तपो द्वन्द सहनम्’। 

अर्थार्त् सभी प्रकार के द्वन्दो को सहन करनार् ही तप है। बिनार् कष्ट सहन कियें कोर्इ भी सार्धनार् सिद्ध नही होती है। अत: योग सार्धनार् करने के लिए जड.तार् तथार् आलस्य न करते हुए सभी द्वन्दों, जैसे सर्दी, गर्मी, भूख, प्यार्स को सहते हुए, अपनी सार्धनार् में डटे रहनार् ही तप कहलार्तार् है।
 योग भार्श्य के अनुसार्र-

 न तपस्विनों योग सिद्धति:। योगभार्श्य 2/1

अर्थार्त् तप किये बिनार् योग सिद्धि कदार्पि सम्भव नही हो सकती है। अत: योगी को कठोर तपस्यार् करनी चार्हिए। श्रीमद् भगवद्गीतार् में वर्णन है-

‘मार्त्रार्स्पर्षार्स्तु कौन्तेय शीतोष्ण सुखदु:खदार्:। 

आगमार्पार्यिनोडनित्यार्स्तार्स्तितिक्षस्व भार्रत:। गीतार् 2/14

अर्थार्त् उन द्वन्दों, शार्रीरिक कष्टों की उपेक्षार् नहीं करनी चार्हिए बल्कि उन्हे यह सोचकर सहन क लेनार् चार्हिये कि ये सभी सदैव रहने वार्ले नही है। अत: द्वन्दों के वषीभूत न होकर सार्धनार् में तत्परतार् के सार्थ लगे रहनार् ही योग क सफल होनार् है, अतएव योगी को कठोर तपस्यार् करनी चार्हिए। परन्तु तप कैसे करनार् चार्हिए।
इसक वर्णन योग वार्चस्पति टिक में मिलतार् है-

 ‘तार्वन्मार्त्रमेवतपष्चरणीये न यार्वतार् धार्तु वैशम्यमार्पद्यत’। 

अर्थार्त् तप उतनार् ही करनार् चार्हिए कि जिससे शरीर के धार्तुओं में विषमतार् उत्पन्न न हो। वार्त, पित्त, कफ, त्रिदोशों में विषमतार् उत्पन्न न हों। इस प्रकार कियार् जार्ने वार्ले तप अवश्य ही योग सिद्धि प्रदार्न करतार्। महर्षि पतंजलि ने तप के फल क वर्णन इस प्रकार कियार् है-

‘कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयार्न्तपस:।’ योगसूत्र 2/43 

अर्थार्त् तप से अशुद्धियों क नार्श होतार् है। और शरीर और इन्द्रियो की सिद्धि हो जार्ती है। उसकी समस्त इन्द्रियॉ वश में हो जार्ती है। और इनके वष में आने से ही सिद्धि की प्रार्प्ति होती है।

2. स्वार्ध्यार्य- 

स्वार्ध्यार्य क यदि शार्ब्दिक अर्थ लियार् जार्य तो इसक अर्थ है स्व क अध्ययन। स्वयं क अध्ययन यार् स्वार्ध्यार्य क अर्थ श्रेष्ठ सार्हित्य क अध्ययन करनार् है। परन्तु मार्त्र अध्ययन करने से ही स्वार्ध्यार्य नहीं कहार् जार् सकतार् है। जब तक कि उस पडे. हुए, अध्ययन किये हुए चिन्तन मनन न कियार् जार्य, अध्ययन किये हुए शार्स्त्रों पर चिन्तन, मनन कर चरित्र में उतार्र कर विवेक ज्ञार्न जार्ग्रत कर उस परमेश्वर के चरणो प्रीति कर भगवद् भक्ति जार्ग्रत हो यही स्वार्ध्यार्य है।

पण्डित श्री रार्मशर्मार् जी के अनुसार्र- श्रेष्ठ सार्हित्य की प्रकाश में आत्मार्नुसंधार्न की ओर गति स्वार्ध्यार्य है। स्वार्ध्यार्य ध्यार्न की स्थिति में अपने स्वरूप क ध्यार्न करनार् उस र्इश्वर क ध्यार्न कर उसके मंत्रों क जप करनार् ही स्वार्ध्यार्य है। स्वार्ध्यार्य क तार्त्पर्य वेद, उपनिषद्, दर्शन आदि मोक्ष शार्स्त्रों क गुरू आचाय यार् अन्य विद्वार्नों से अध्ययन करनार्। एक अन्य अर्थ के अनुसार्र स्वार्ध्यार्य क अर्थ स्वयं क अध्ययन करनार् है। परन्तु स्वार्ध्यार्य क अर्थ मार्त्र इतनार् होकर अत्यन्त व्यार्पक है।

योग शार्स्त्र में वर्णन मिलतार् है प्रणव मंत्र क विधि पूर्वक जप करनार् स्वार्ध्यार्य है। तथार् गुरू मुख से वैदिक मंत्रों क श्रवण करनार्, उपनिषद एवं पुरार्णों आदि मोक्ष शार्स्त्रों क स्वयं अध्ययन करनार् स्वार्ध्यार्य है।
वही योगभार्श्य क व्यार्स जी ने भी स्वार्ध्यार्य क वर्णन करते हुए लिखार् है-

‘स्वार्ध्यार्योमोक्षशार्स्त्रार्णार्मध्ययनम् प्रणव जपो वार्।’ व्यार्सभार्श्य 2/32 

अर्थार्त् मोक्ष प्रार्प्ति जो शार्स्त्र सहार्यक हो उन शार्स्त्रों क अध्ययन करनार् तथार् उन्हें अपने जीवन में उतार्रनार् ही स्वार्ध्यार्य है।

पं0 श्री रार्मशर्मार् आचाय जी के अनुसार्र- ‘अच्छी पुस्तकें जीवन्त देव प्रतिमार्एं है जिनकी आरधनार् से तत्काल प्रकाश व उल्लार्स मिलतार् है।’

अत: स्वार्ध्यार्य शार्स्त्रों क अध्ययन कर उसे अपने आचरण में, जीवन में अपनार्नार् ही स्वार्ध्यार्य है। अत: केवल शार्स्त्रों के अध्ययन तक ही सीमित न रहकर शार्स्त्रों के सार्र को ग्रहण कर सदार्-सर्वदार् योग सार्धनार् में लगे रहनार् ही स्वार्ध्यार्य है। और योग सार्धनार् में मोक्ष क माग प्रशस्त होतार् है। स्वार्ध्यार्य के द्वार्रार् स्वयं क मनन चिन्तन करने से अपने अन्दर के विकारों क पतार् लगतार् है। स्वयं के अन्र्तमन में व्यार्प्त कलशित विचार्रों क अध्ययन कर उन्हें दूर करने क मागदर्शन मिलतार् है, आत्मज्ञार्न द्वार्रार् विवेक ज्ञार्न द्वार्रार् उन्हें दूर कियार् जार् सकतार् है। जिससे मार्नव जीवन उत्कृष्ट बनतार् है। क्योंकि तप के द्वार्रार् व्यक्ति कर्मो को उत्कृष्ट बनार् सकतार् है। और सार्धनार् की ओर अग्रसर हो सकतार् है। वही स्वार्ध्यार्य के द्वार्रार् अपनी र्इष्ट के दर्शन कर ज्ञार्नयोग क अधिकारी बनतार् है। विवेक ज्ञार्न की प्रार्प्ति क जीवन को दिव्य बनार् सकतार् है।
महर्षि पतंजलि ने स्वार्ध्यार्य क फल बतार्ते हुए कहार् है-

‘स्वार्ध्यार्यार्दिश्टदेवतार् सम्प्रयोग:।’ योगसूत्र 2/44 

अर्थार्त् स्वार्ध्यार्य के तथार् प्रणव आदि मन्त्रों के जप करने तथार् अनुष्ठार्न करने से अपने र्इष्ट देवतार् के दर्शन होते है, तथार् वे उन्हें आशीर्वार्द देकर अनुग्रहीत करते है। वह अपने र्इष्ट से आरार्ध्य से एकरस हो जार्ते है। स्वार्ध्यार्य से प्रभु चरणों में प्रीति होती है। भगवद् भक्ति क जार्गरण होतार् है। जो स्वार्ध्यार्यशील होते है। उनके लिए प्रभु की शरण सहज हो जार्ती है।

3. र्इश्वरप्रार्णिधार्न यार् र्इश्वर शरणार्गति- 

यह सार्धन एक मार्त्र ऐसार् सार्धन है। जिसमें सार्धक स्वयं समर्पित हो जार्तार् है। अपने आप को भुलार्कर र्इश्वर पर अपने शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार को समर्पित कर देतार् है। और समस्त कर्म र्इश्वर की मर्जी के अनुरूप होते है। सार्धक अपने को बॉसुरी की तरह खार्ली बनार् लेतार् है। और उसमें सार्रे स्वर उसी र्इश्वर के होते है। जब सार्धक पूर्ण रूपेण खार्ली होकर स्वयं को उस र्इश्वर को समर्पित कर देतार् है। तब वह र्इश्वर उसक हार्थ उसी प्रकार थार्म लेतार् है। जैसे एक मार्तार् द्वार्रार् बच्चे को और पग-पग पर उसको गलत रार्स्तों से बचार्ते हुए उचित मागदर्शन करतार् है। सार्धक अपने समस्त कर्म र्इश्वर की आज्ञार् से तथार् र्इश्वर के कर्म समझ कर करतार् है। और फलेच्छार् क त्यार्ग कर कर्म करतार् है। ऐसार् सार्धक की चित्त की वृत्तियॉ समार्प्त होकर वह मोक्ष क अधिकारी बनतार् है।

महर्षि पतंजलि द्वार्रार् प्रतिपार्दित क्रियार्योग क मुख्य आधार्र तप कहार् जार् सकतार् है, इसक भार्वनार्त्मक आधार्र र्इश्वर प्रार्णिधार्न है। तथार् वैचार्रिक आधार्र स्वार्ध्यार्य है। र्इश्वर के प्रति समर्पण को श्रृद्धार् और प्रज्ञार् क स्त्रोत कहार् जार् सकतार् है। अनुभव के आधार्र पर यह कहार् जार् सकतार् है। यदि स्वार्ध्यार्य यार् प्रज्ञार् में निरन्तरतार् नार् बनी रहे, वैचार्रिक दोश भार्व बढने लगे तो तप में भी मन्दतार् आने लगती है। अकर्मण्यतार् बढने लगती है। इसी तरह यदि श्रृद्धार् यार् र्इश्वरप्रार्णिधार्न विश्वार्स में कमी आने लगे तो तप को प्रेरणार्दार्यी ऊर्जार् नहीं मिल पार्ती है। इस प्रकार कहार् जार् सकतार् है। जिसने निरन्तर तप कियार् है। उसकी र्इश्वर प्रार्णिधार्न यार् श्रृद्धार् स्वार्ध्यार्य यार् प्रज्ञार् में कभी भी कमी नहीं आती है। क्रियार्योग क उत्कर्ष र्इश्वरप्रार्णिधार्न है। प्रभु शरणार्गति यार् र्इश्वर के प्रति समर्पण एक ऐसी जार्ग्रति है। ऐसार् बोध है। जब यह ज्ञार्न हो जार्तार् है। कि अंधकार क विलय हो चुक है। अब तो बस उस परमार्त्मार् की ही प्रकाश सर्वत्र दिखार्यी दे रहार् है। और उस स्थिति को प्रार्प्त हो जार्नार् कि अब हरि हैं मै नार्हि।
र्इश्वर की भक्ति विशेष यार् उपार्सनार् को ही र्इश्वर प्रणिधार्न कहते है।
योगभार्श्य में महर्षि व्यार्स ने लिखार् है-

 ‘र्इश्वर प्रार्णिधार्न तस्मिन् परमगुरौ सर्वकर्मापणम्।’ योगभार्श्य 2/32 

अर्थार्त् सम्पूर्ण कर्मफलों के सार्थ अपने कर्र्मो को गुरुओं क भी परम गुरु अर्थार्त् र्इश्वर को सौंप देनार् ही र्इश्वरप्रार्णिधार्न है।
अथर्ववेद में 7/80/3 में इस प्रकार वर्णन मिलतार् है-

 ‘यत्कासार्स्ते जुहुमस्तन्नोअस्तु।’ 

अर्थार्त् हे र्इश्वर हम जिन शुभ संकल्पों को लेकर आपकी उपार्सनार् में तत्पर हैं आप हमार्रे एन संकल्पों को पूर्ण करें और हमार्रे जो भी अच्छें यार् बुरे कर्म हैं यार् कर्मफल है वे सभी आप को ही समर्पित कर दिये है, इसी भार्वनार् क नार्म ही र्इश्वर प्रार्णिधार्न है।

मनुष्य जीवन क मुख्य उद्देश्य मोक्ष, कैवल्य की प्रार्प्ति और यही मोक्ष कैवल्य चार्रों पुरुषाथ में अन्तिम पुरुषाथ है। और इसकी सिद्धि के लिए र्इश्वर प्रार्णिधार्न आवश्यक है, र्इश्वर की उपार्सनार् यार् र्इश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण से ही योग में सिद्धि मिलती है। उस र्इश्वर को परिभार्षित करते हुए महर्षि पतंजलि ने योगशार्स्त्र में वर्णन कियार् है-

‘क्लेशकर्म विपार्काशयैरपरार्मृश्ट:पुरुष: विशेष: र्इश्वर:। 

अर्थार्त् जो क्लेश, कर्म, कर्मो के फलों, और कर्मो के संस्कारों के सम्बन्ध से रहित है तथार् समस्त पुरुषों में श्रेष्ठ है, उत्तम है वह र्इश्वर है। और वही र्इश्वर हमार्रार् परम गुरू भी है। जैसार् कि योगसूत्र में 1/26 में कहार् गयार् है-

‘पूर्वेशार्मपिगुरु: कालेनार्नवच्छेदार्त्।’

अर्थार्त् वह परमेश्वर सृष्टि के रचयितार् ब्रह्मार् जी क भी गुरु है, वह अनार्दि है, अनन्त है। इसी तरह सृष्टि में आदि से अब तक न जार्ने कितने गुरु हुए जो कि काल से बार्धित है, परन्तु काल से भी र्इश्वर सभी गुरुओं क भी गुरु है, उस परम र्इश्वर क अनुग्रह प्रार्प्त करनार् ही र्इश्वर प्रणिधार्न है।

और र्इश्वरप्रणिधार्न के द्वार्रार् समार्धि की सिद्धि होती है। जिसक वर्णन महर्षि पतंजलि ने सार्धनपार्द के 45वें सूत्र में कहार् है-

‘समार्धिसिद्धिरीष्वरप्रार्णिधार्नार्त्।’ 2/45। 

अर्थार्त् र्इश्वर प्रणिधार्न से समार्धि की सिद्धि हो जार्ती है र्इश्वर प्रणिधार्न से योग सार्धनार् के माग में आने वार्ले सभी विघ्न-बार्धार्एं दूर हो जार्ते है। उस र्इंंंंष्वर की विशेष अनुकम्पार् प्रार्प्त होती है। और सार्धक को योग सिद्धि प्रार्प्त होती है। र्इश्वर प्रणिधार्न जो कि र्इश्वर पर पूर्ण रुपेण समर्पण है। भक्तियोग है। भक्तियोग, के द्वार्रार् सार्धक अपने उपार्स्थ ब्रह्म के भार्व में पूर्ण रुपेेण भार्वित होकर तद्रुपतार् क अनुभत करतार् है। जिससे कि व्यक्तित्व क रुपार्न्तरण होतार् है। सार्धक क जीवन उत्कृष्ट होकर मुक्ति देने वार्लार् होतार् है। इस प्रकार क्रियार्योग के तीनों सार्धन कर्म, भक्ति, ज्ञार्न क सुन्दर समन्वय है। जो कि जीवन को उत्कृष्ट बनार्ने के लिए आवश्यक है। जिस प्रकार मुुखमण्डल की सुन्दरतार् के लिए सभी अंगों क होनार् आवश्यक है। उसी प्रकार जीवन में सौन्दर्य लार्ने के लिए कर्म, भक्ति, तथार् ज्ञार्नयोग क सुन्दर समन्वय नितार्न्त आवश्यक है। जिससे कि जीवन दिव्यतार् व उत्कृष्टतार् को प्रार्प्त कर मोक्ष को प्रार्प्त कर सकें।

क्रियार्योग क उद्देश्य एवं महत्व 

महर्षि पतंजलि ने सार्धनपार्द के दूसरे सूत्र में क्रियार्योग क फल यार् क्रियार्योग क उद्देश्य बतार्यार् है-

‘समार्धिभार्वनाथ: क्लेशतनुकरणाथष्च। योगसूत्र 2/2 

अर्थार्त् यह क्रियार्योग समार्धि की सिद्धि देने वार्लार् तथार् पंचक्लेशों को क्षीण करने वार्लार् है।

महर्षि मार्नते है कि मनुष्य के पूर्व जन्म के संस्कार हर जन्म में अपनार् प्रभार्व दिखार्ते है और ये क्लेश मनुष्य हर जन्म में भोगनार् पडतार् है। पूर्व जन्म के संस्कारों से जुडे रहने के कारण के अपनार् प्रभार्व दिखार्ते है। इन क्लेशों क पूर्णतयार् क्षय बिनार् आत्मज्ञार्न के नहीं होतार् हैं। परन्तु क्रियार् योग की सार्धनार् से इन्हें कम यार् क्षीण कियार् जार् सकतार् है और मोक्ष प्रार्प्ति की सार्धनार् के माग में बढार् जार् सकतार् है।

क्रियार्योग की सार्धनार् से समार्धि की योग्यतार् आ जार्ती है। क्रियार्योग से यह क्लेश क्षीण होने लगते है क्लेशों के क्षीर्ण होने से ही मन स्थिर हो पार्तार् है। पंचक्लेश यदि तीव्र अवस्थार् में है तब उस स्थिति में समार्धि की भार्वनार् नहीं हो पार्ती है।

तप स्वार्ध्यार्य व र्इश्वर प्रार्णिधार्न यार् कर्म भक्ति ज्ञार्न के द्वार्रार् क्लेषों को क्षीण कर समार्धि क माग प्रशस्त कियार् जार् सकतार् है। क्रियार्योग के द्वार्रार् जीवन को उत्कृष्ट बनार्कर समार्धि की प्रार्प्ती की जार् सकती है। क्रियार्योग के अन्तर्गत तप, स्वार्ध्यार्य, र्इश्वरप्रार्णिधार्न की सार्धनार् आती है। जिसमें कि कर्मयोग, ज्ञार्नयोग तथार् भक्तियोग क सुन्दर समन्वय समार्हित है। शार्स्त्रों में तप के महत्व क वर्णन इस प्रकार कियार् है-

 ‘यद् दुश्करं दुरार्रार्ध्य दुर्जयं दुरतिक्रमम्। 

 तत्सर्व तपस्यार् सार्ध्यार्तपो हि दुरतिक्रमम्।।’ 

संसार्र में जो भी दुसार्ध्य व अति कठिन कार्य है, उन कठिन से कठिन कार्य को करने में कोर्इ भी समर्थ नहीं होतार् है। उन कार्यों को तप के द्वार्रार् सिद्ध कियार् जार् सकतार् है। शार्स्त्रों में तप को मोक्ष प्रार्प्ति क सार्धन कहार् है। तप के द्वार्रार् मन वचन तथार् अपनी इन्द्रियो को तपार्ने से जन्म जमार्न्तरों के पार्प भस्मीभूत हो जार्ते है। कूमपूरार्ण में कहार् गयार् है-

 योगार्ग्निर्दहति क्षिप्रमषेशं पार्प पन्जरम। 

 प्रसन्नं जार्यतेज्ञार्नं ज्ञार्नार्न्निर्वार्णमृच्छति।।’

अर्थार्त् तपस्यार् से जो योग की अग्नि उत्पन्न होती है। वह शीघ्र ही मनुष्य के सभी पार्प समूहों को दग्ध कर देती है। और पार्पों के क्षय हो जार्ने पर ऐसे ज्ञार्न क उदय होतार् है। जिससे कि मुक्ति की प्रार्प्ति हो जार्ती है। और योगी पुरुष क बन्धन उसी प्रकार टूट जार्तार् है, जिस प्रकार बार्ज पक्षी बन्धन रस्सी को काट कर आकाश में उड. जार्तार् हे। वह संसार्र रुपी बन्धन से मुक्त हो जार्तार् है।

र्इश्वर प्रणिधार्न र्इंष्वर के प्रति समर्पण ही हमार्रे समस्त दुखों, कल्मश कशार्यों क अन्त है। जिसमें की अपनार् अस्तित्व समार्प्त कर उस परमार्त्मार् के अस्तित्व क भार्न होतार्। जिसमें कि अपनार् अस्तित्व मिटने पर समार्धि क आनन्द होने लगतार् है। महर्षि पतंजलि र्इश्वर प्रणिधार्न क फल बतार्ते हुए कहते है-

‘समार्धिसिद्धिरीष्वरप्रणिधार्नार्त्’। योगसूत्र 2/45 

अर्थार्त् र्इश्वर प्रणिधार्न से समार्धि की सिद्धि होती है। र्इश्वर के आशीर्वार्द से उसकी समस्त चित्त की वृत्तियॉ समार्प्त हो जार्ती है। जिससे कि वह मोक्ष को प्रार्प्त होतार् है।

अत: हम कह सकते है कि वर्तमार्न जीवन में तप स्वार्ध्यार्य व र्इश्वरप्रणिधार्न क अत्यन्त महत्व है। क्योंकि तप कर्म के लिए प्रेरित करते है जो कि कर्मयोग है। कर्मयोगी ही कमोर्ं को कुशलतार् पूर्वक कर सकतार् है। तप, कठिन परिश्रम व्यक्ति को कर्मयोगी बनार्ती है। अत: कमोर्ं में कुशलतार् लार्ने के लिए तप नितार्न्त आवश्यक है।

वही स्वार्ध्यार्य सार्धक के ज्ञार्नयोगी बनार्तार् है। स्वार्ध्यार्य से विवेकज्ञार्न की प्रार्प्ति होती है। क्यार् सही है, क्यार् गलत है क ज्ञार्न सार्धक को होतार् हे। जो कि प्रगति यार् उन्नति के माग में अति आवश्यक है। स्वार्ध्यार्य के द्वार्रार् श्रेष्ठ सार्हित्यों क अध्ययन करते हुए आत्मार्नुसंधार्न की ओर सार्धक बढतार् है। तथार् स्वयं ही वह प्रभु की शरण क आश्रय लेते है।

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