क्रार्ंतिकारी आंदोलन

क्रार्ंतिकारी आंदोलन की पृष्ठभूमि 

भार्रतीय स्वार्धीनतार् आंदोलन की एक पृथक धार्रार् क्रार्ंतिकारी आंदोलन है। भार्रत के नवयुवकों क एक वर्ग हिंसार्त्मक संघर्ष को रार्जनीतिक प्रार्प्ति के लिए आवश्यक मार्नते थे। वे स्वयं को मार्तृभूमि के लिए बलिदार्न करने को तैयार्र थे और हिंसक मार्ध्यमों से ब्रिटिश शार्सन को भयभीत कर, आतंकित कर देश से निकाल देनार् चार्हते थे। यह अक्रार्मक रार्ष्ट्रवार्द की विचार्रधार्रार् है। उन्नीसवीं शतार्ब्दी के अंतिम चरण में चार्रों ओर फैलती असंतोष की लहर, अकाल, भूकम्प, महार्मार्री क प्रकोप और बढ़ती गरीबी तथार् भार्रतीय जनतार् की कठिनाइयों के प्रति शार्सन की उदार्सीनतार् ने भार्रतीय नवयुवकों में विदेशी ब्रिटिश शार्सन के प्रति आक्रमक विरोध की भार्वनार्ओं को भड़कायार्। आसुरी ब्रिटिश शार्सन को समार्प्त करने के लिए अस्त्र क प्रयोग करनार् ही होगार्। इस विचार्रधार्रार् ने देश में क्रार्ंतिकारी आंदोलन को जन्म दियार्। समार्चार्र पत्रों, लेखों के मार्ध्यम से संगीत तथार् नार्टकों क मंचन कर लोगों को प्रेरित करनार् दार्सतार् के प्रति उनमें विरोध पैदार् करनार्, उन्हें मार्तृभूमि से पे्रम करनार् सिखार्कर निडर बनार्नार् और अस्त्र शस्त्र क निर्मार्ण करने अथवार् उसे खरीदने के लिए धन प्रार्प्त करने हेतु क्रार्ंतिकारी रार्जनैतिक डकौतियार्ं करनार् उनके सार्धन थे। क्रार्ंतिकारी सार्हित्य द्वार्रार् अपने विचार्रों कर गुप्त समीतियों के मार्ध्यम से क्रार्ंतिकारी गतिविधियों को वे अंजार्म देते थे। ब्रिटिश शार्सक वर्ग को आतंकित करने हेतु वे रार्जनैतिक हत्यार्ओं को उचित मार्नते थे।

क्रार्ंतिकारी आंदोलन क विकास : प्रथम चरण

क्रार्ंतिकारी आंदोलन क जन्म महार्रार्ष्ट्र में हुआ थार् लेकिन कालार्ंतर में इसक प्रधार्न केन्द्र बंगार्ल बन गयार्। भार्रत के अन्य प्रार्ंतो तथार् विदेशों में भी भार्रतीय क्रार्ंतिकारी सक्रिय हुए।

1. बंगार्ल

बंगार्ल के क्रार्ंतिकारी नेतार् बरीन्द्र कुमार्र घोष (अरविंद घोष के छोटे भाइ) और भूपेन्द्र नार्थ दत्त (स्वार्मी विवेकानंद के छोटे भाइ) थे। इन दोनों ने युगार्ंतर तथार् संध्यार् नार्मक क्रार्ंतिकारी पत्रों द्वार्रार् क्रार्ंतिकारी विचार्रधार्रार् क प्रचार्र कियार्। इन्हें क्रार्ंति क अग्रदूत भी मार्नार् जार्तार् है। युगार्ंतर और संध्यार् दोनों अत्यधिक लोकप्रिय सिद्ध हुए। क्रार्ंतिकारियों ने अनुशीलन-समिति नार्मक संस्थार् क गठन कियार् जिसमें सदस्यों को भार्रतीय इतिहार्स, संस्कृति और रार्ष्ट्रवार्द तथार् रार्जद्रोहार्त्मक सिद्धार्ंतो की शिक्षार् व शार्रीरिक प्रशिक्षण दियार् जार्तार् थार्। इसकी लगभग 200 शार्खार्एं थी तथार् ढार्क और कलकत्तार् इसके मुख्य केन्द्र थे। इसके सदस्यों को मार्ं काली के समक्ष अपने कर्तव्यों क निर्वार्ह करने के हेतु व्रत लेनार् पड़तार् थार्।

बंगार्ल में 1907 से ही वार्तार्वरण क्रार्ंतिमय हो गयार् थार् और अंग्रेजी शार्सन के विरूद्ध सशस्त्र आंदोलन प्रार्रंभ हो गयार्। 6 दिसंबर 1907 को मिदनार्पुर के समीप क्रार्ंतिकारियों द्वार्रार् उस रेलगार्ड़ी में बम फेंक गयार् जिसमें बंगार्ल क गर्वनर यार्त्रार् कर रहार् थार्। दूसरी घटनार् 23 दिसंबर 1907 को हुर्इ जब क्रार्ंतिकारियों ने ढार्क के भूतपूर्व जिलार् मजिस्ट्रेट को गोली मार्रने क असफल प्रयत्न कियार् थार्। तीसरी घटनार् 30 अप्रैल, 1908 को मुजफरपुर में घटी जिसने भार्रत तथार् ब्रिटेन में पूरी सनसनी फैलार् दी। क्रार्ंतिकारियों ने मुजफरपुर के जज किंग्सफोर्ड की हत्यार् करने क प्रयार्स कियार्। किंतु किंग्सफोर्ड के स्थार्न पर उसकी गार्ड़ी में दो अंगरेज महिलार्एं थीं जो घटनार्स्थल पर ही मार्री गर्इ। इस अपरार्ध के लिए 18 वष्र्ार्ीय युवक खुदुदुदीरार्म बोसेसेस को फार्ंसी की सजार् दी गर्इ। खुदीरार्म के बलिदार्न क भार्रतीय युवकों पर गहरार् प्रभार्व पड़ार्। वह बंगार्ल क रार्ष्ट्रीयवीर शहीद बन गयार्। उस पर देश भक्तिपूर्ण कवितार्एँ लिखी गयी जो हर बंगार्ली की जुबार्न पर छार् गर्इ। अगली घटनार् अलीपुर “ार्ड़यंत्र केस 1910 के नार्म से प्रसिद्ध है। सरकार को कलकत्तार् में एक क्रार्ंतिकारी “ार्ड़यंत्र क बोध हुआ। जिसमें कुछ बम डार्यनार्मार्इट और कारतूस बरार्मद हुए। इस घटनार् के संबंध में 31 व्यक्ति गिरतार्र हुए जिनमें अरविंद घोष भी थे। कन्हाइलार्ल और सत्येन्द्र को फार्ंसी की सजार् मिली तथार् वीरेन्द्र को देश निष्कासन की। अंत में क्रार्ंतिकारियों की ओर से कुछ अन्य हत्यार्एं भी की गर्इ जिनक संबंध मुजफरपुर तथार् अलीपुर केस से थार्।

2. महार्रार्ष्ट्र

क्रार्ंतिकारी आंदोलन बंगार्ल से पहले महार्रार्ष्ट्र में प्रार्रंभ हो गयार् थार्। महार्रार्ष्ट्र में क्रार्ंतिकारी आंदोलन के नेतार् चार्पेकेकेकर बंधु विनार्यक दार्मोदेदेदर सार्वरकर एवं उनके भाइ गणेश सार्वरकर तथार् श्यार्मजी कृष्ण वर्मार् थे। लोकमार्न्य तिलक के बंदी बनार्ए जार्ने पर महार्रार्ष्ट्र में क्रार्ंतिकारी आंदोलन क उदय हुआ। तिलक की रचनार्ओं से क्रार्ंतिकारियों ने प्रेरणार् ग्रहण की थी। क्रार्ंतिकारियों के संगंठन अभिनव भार्रत क केन्द्र नार्सिक थार्। सार्वरकर बंधुओं ने सन् 1900 में एक देशभक्त संगठन मित्र मेलेलेलार् की स्थार्पनार् की थी। सन् 1904 में यह एक क्रार्ंतिकारी संगठन बन गयार् और इसक नार्म अभिनव भार्रत कर दियार् गयार्। संपूर्ण महार्रार्ष्ट में इसकी शार्खार्एं फैली हुर्इ है। प्रशार्सन को निष्क्रिय बनार्ने के लिए क्रार्ंतिकारियों के संगठनों द्वार्रार् रार्जनीतिक हत्यार्ओं और नौकरशार्ही को आतंकित करने के लिए प्रचार्र कार्य किए गए थे। महार्रार्ष्ट्र में क्रार्ंतिकारियों क नार्रार् थार् प्रार््रार््रार्ण देनेनेने से पूर्व प्रार््रार््रार्ण ले लो।े सन् 1899 में रैण्ड एवं अयेस्र्ट की हत्यार् की गर्इ। चार्पेकर बन्धुओं को इसके लिए दण्ड दियार् गयार्। ऐसार् कहार् जार्तार् है कि इन अंग्रेंजी की हत्यार् में श्यार्मजी कृष्ण वर्मार् क हार्थ थार्। वे इसके बार्द इंग्लैण्ड चले गये। सन् 1906 में विनार्यक दार्मोदर सार्वरकर भी इंग्लैण्ड चले गये और श्यार्मजी कृष्ण वर्मार् क हार्थ बंटार्ने लगे। वे दोनों लंदन से अपने संदेश तथार् क्रार्ंतिकारी शस्त्र गणेश्ेश्ेश सार्वरकर को भेजार् करते थे। 1909 में उन्होनें में गणेश सार्वरकर के नार्म पिस्तौलों क एक पासल भेजार् थार्। पासल मिलने से पूर्व 2 माच 1909 को उन्हें पुलिस द्वार्रार् बंदी बनार् लियार् गयार्। उनके विरूद्ध रार्जद्रोहार्त्मक सार्हित्य के प्रकाशन क आरोप थार्। 9 जून 1909 को उन्हें आजीवन देश निर्वार्सन क दण्ड दियार् गयार्। दिसंबर 1909 में नार्सिक के जिलार्धिकारी जेकसन को गार्ली से उड़ार् दियार् गयार्। उन्होनें गणेश सार्वरकर को दण्ड दियार् थार्। अभिनव समिति के 27 सदस्यों पर अभियोग चलार्यार् गयार्। और उनमें से तीन को मृत्यु दण्ड दियार् गयार्। नवंबर 1909 में गर्वनर लाड मिण्टो पर बम फेंककर हत्यार् करने क असफल प्रयार्स कियार् गयार् थार्। दार्मोदर सार्वरकर भी बंदी बनार्कर जहार्ज से भार्रत भेजे गये। वे किसी प्रकार जहार्ज से बच निकले। समुद्र को तैरकर फ्रार्ंस के बंदरगार्ह में शरण ली। लेकिन वे भी गिरफ्तार्र कर लिए गए। उन्हें आजीवन कारार्वार्स क दण्ड दियार् गयार्।

3. पंजार्ब

प्रार्रंभ में पंजार्ब में बंगार्ल तथार् महार्रार्ष्ट्र जैसी गुप्त समितियार्ं नहीं थी, लेकिन सरकार की भूमि संबंधी नीति के कारण जनतार् के विभिन्न वर्गो में तीव्र असंतोष फैलार्। 1907 र्इ. में सरदार्र अजीत सिंह, भाइ परमार्नंद तथार् लार्लार् हरदयार्ल ने क्रार्ंतिकारियों क संगठित कियार्। सरदार्र अजीत सिंह और सूफी प्रसार्द ने मिलकर भार्रत मार्तार् सोसार्यटी नार्मक संस्थार् की स्थार्पनार् की। इस समय बार्ंके दयार्ल जी पंजार्ब की सभार्ओं में एक गीत गार्यार् करते थे। जिसकी प्रथम पंक्ति थी: पगड़ी़ संभार्ल ओं जट्ट्टटार् पगड़ी़ संभार्ल ओ पंजार्ब में यह गीत उतनार् ही लोकप्रिय थार्, जितनार् बंगार्ल में वन्दे मार्तरम्। 1907 में लार्लार् लार्जपतरार्य और सरदार्र अजीत सिंह की गिरफ्तार्री से असंतोष बढ़ने लगार्। कुछ समय के लिए पंजार्ब में जन असंतोष इतनार् बढ़ गयार् कि शार्सक 1907 र्इ. में 10 मर्इ को (जो 1857 की क्रार्ंति के प्रार्रंभ क दिन थार्) प्रदेशव्यार्पी विद्रोह की आशंक करने लगे थे। परंतु 1909 र्इ. में सरकार द्वार्रार् भूमि संबंध् ार्ी नीति में जनतार् की इच्छार्नुसार्र परिवर्तन कर दिये जार्ने पर क्रार्ंतिकारी गतिविधियों में कमी आर्इ। दिल्ली उस समय पंजार्ब क ही एक हिस्सार् थी। बंगार्ली एवं पंजार्बी देशभक्तों के लिए दिल्ली संगम स्थल थार्। 23 दिसम्बर, 1912 को दिल्ली के रार्जधार्नी बनने पर गर्वनर जनरल हाडिंग के ऊपर बम फेंककर हत्यार् क असफल प्रयार्स कियार् गयार्। मर्इ, 1913 लार्हौर में अंग्रेज अधिकारियों की हत्यार् क प्रयत्न कियार् गयार्। इस घटनार् के फलस्वरूप दिल्ली के क्रार्ंतिकारियों क पतार् लग गयार्। दिल्ली “ार्ड़यंत्र काण्ड में 13 व्यक्ति गिरतार्र किये गये। मार्स्टर अमीरचन्द्र इस समय दिल्ली के सबसे बड़े क्रार्ंतिकारी थे।

4. मद्रार्स

मद्रार्स में भी क्रार्ंतिकारी आंदोलन क सूत्रपार्त हुआ। विपिनचन्द्र पार्ल ने 1907 में मद्रार्स क दौरार् कर अपने विचार्रों क प्रचार्र कियार्। अरविंद घोष के विरूद्ध गवार्ही न देने के कारण उन्हें 6 मार्ह क दण्ड दियार् गयार्। कारार्वार्स से छूटने पर उनके सम्मार्न में स्थार्नीय क्रार्ंतिकारी नेतार् सुब्रहार्ण्यम शिव एवं चिदम्बरम पिल्ले ने स्वार्गत क आयोजन कियार्। फलस्वरूप इन दोनों को 12 माच 1909 को बंदी बनार् लियार् गयार्, इसकी प्रतिक्रियार् टिनेवली में उपद्रव के रूप में हुर्इ। शार्सन ने समार्चार्र पत्र के संपार्दकों एवं आंदोलनकारी नेतार्ओं को गिरफ्तार्र कर उन पर मुकदमार् चलार्यार्। इससे जनतार् में उत्तेजनार् फैल गर्इ। क्रार्ंतिकारी संगठित होने लगे। उन्होनें सरकारी संपत्ति को हार्नि पहुंचार्यी और पुलिस चौकी एवं थार्नों पर हमले किये गये। शार्सन क दमन चक्र शुरू हो गयार्। नवयुवकों में उत्तेजनार् जार्गृत हुर्इ। एम.पीतिहल आचाय एवं बी.बी. एस. नय्यर उनके प्रेरणार्स्रोत थे। 17 जून 1911 को टिनेवली के क्रार्ंतिकारियों ने जिलार् मजिस्ट्रेट ऐश की हत्यार् कर दी गर्इ।

5. विदेशी में क्रार्ंतिकारी आंदोलन

भार्रतीय क्रार्ंतिकारियों की गतिविधियार्ं देश तक ही सीमित न थी। अपितु वे विदेशों में भी सक्रिय थे। इंग्लैण्ड में श्यार्मजी कृष्ण वर्मार् ने 1905 में नेशनल होमरूल सोसार्यटी की स्थार्पनार् की। उनके द्वार्रार् इंडियन सोशियार्लार्जिस्ट नार्मक मार्सिक पत्र क प्रकाशन कियार् जार्तार् थार्। दार्मोदर विनार्यक सार्वरकर ने 1906 में लंदन पहुंचकर भार्रतीय क्रार्ंतिकारियों की सहार्यतार् क कार्य प्रार्रंभ कियार्। उन्होनें वहार्ं से अपने भाइ गणेश सार्वरकर को पिस्तौलें भेजी थी। गणेश सार्वरकर को ब्रिटिश शार्सन के विरूद्ध युद्ध की घोषणार् करने के अपरार्ध में देश निष्कासन क दण्ड मिलार् थार्। विनार्यक सार्वरकर को लंदन में गिरफ्तार्र कर अण्डमार्न में आजीवन कारार्वार्स क दण्ड दियार् गयार् थार्।

फ्रार्ंस में क्रार्ंतिकारियों की सहार्यतार् मैडम भीखार्जी कामार् करती थी। एक गुजरार्ती व्यार्पार्री एम.एस.रार्नार् एक पार्रसी महिलार् भीखार्जी कामार् से विवार्ह कर पेरिस में बस गये थे। इनके द्वार्रार् भार्रतीय छार्त्रों को दो हजार्र रूपए की यार्त्रार् छार्त्रवृत्तियार्ं दी जार्ती थी। मैडम कामार् वन्देमार्तरम् नार्मक पत्र क संपार्दन करती थी। यूरोप के भार्रतीय क्रार्ंतिकारी भार्रत में क्रार्ंतिकारियों की सहार्यतार् करते थे। ब्रिटिश शार्सन के द्वार्रार् किये जार् रहे अत्यार्चार्रों क बदलार् लेने के लिए मदनलार्ल धींगंगंगरार् ने सर फ्रार्ंसिस कर्जन विली, जो भार्रत-मंत्री कार्यार्लय के एडीसी थे, को 1 जुलाइ, 1909 को गोली मार्र दी थी। इस अपरार्ध के लिए धींगरार् को मृत्यु दण्ड दियार् गयार्। मदनलार्ल धींगरार् ने अभियोग के समय बयार्न देते हुए कहार् थार् कि परतंत्रतार् की बेड़ियों में जकड़ार् देश सदैव युद्धस्थल ही बनार् रहतार् है। इसी प्रकार अमेरिक महार्द्वीप में भी भार्रतीय क्रार्ंतिकारी सक्रिय थे। लार्लार् हरदयार्ल ने 1913 में सेनफ्रार्ंसिसको में गदर पाटी क गठन कियार् थार्। उन्होनें उर्दू एवं गुरूमुखी में दो समार्चार्र पत्र निकाले तथार् अंग्रेजों के विरूद्ध संगठित संघर्ष क नेतृत्व कियार्। कनार्डार् एवं अमेरिक में गदरपाटी की अनेक शार्खार्एं खोली गयी। माच 1914 में उन्हें अमेरिकी सरकार द्वार्रार् बंदी बनार्यार् गयार् और बार्द में वे जमार्नत पर रिहार् किए गए। बार्द में वे स्विट्जरलैंड चले गये।

1907 में भाइ परमार्नंद भी यूरोप में, इंडियार् सोसेसेसार्यटी से संबंद्ध थे जो प्रवार्सी भार्रतीयों क प्रमुख क्रार्ंतिकारी संगठन थार्। 1909 में सरदार्र अजीत सिंह फार्रस होकर पेरिस पहुंचे थे। 1913 में कोमार् गार्टार् मार्रू जहार्ज काण्ड हुआ थार्। कनार्डार् में प्रवार्स करने वार्ले सिक्खों के संबंध में कनार्डार् सरकार द्वार्रार् बनार्ए गए कानून क विरोध करते हुए बार्ब गुरूदत्तसिंह नार्मक एक धनी व्यार्पार्री जो कनार्डार् में बस गये थे, ने एक जार्पार्नी जहार्ज कोमार् गार्टार् मार्रू किरार्ये पर लियार् और यह जहार्ज सीधे कनार्डार् के लिए 500 भार्रतीयों को लेकर कलकत्तार् से चलार्। कनार्डार् की सरकार ने इस जहार्ज को बंदरगार्ह में घुसने नहीं दियार्। उसे डुबार्ने के लिए युद्धपोत भेजे और सिक्खों पर अनेक अत्यार्चार्र किए गए। उन पर उबलतार् पार्नी डार्लने क प्रयार्स कियार्। दो मार्ह तक जहार्ं समुद्र में खड़ार् रहार्। इसे सिंगार्पुर एवं हार्ंगकांग के बंदरगार्हों में प्रवेश की अनुमति भी नहीं दी गयी। अंत में वह वार्पस कलकत्तार् पहुॅचार्। यार्त्रियों को एक रेलगार्ड़ी द्वार्रार् भेजने की योजनार् बनार्यी गयी। यार्त्रियों ने विद्रोह कर दियार्। विद्रोह के दमन करने में 8 सिख मार्रे गये। और अनेक घार्यल हुए। बार्बार् गुरूदत्तसिंह भी घार्यल हुए परंतु बचकर निकल गये। भार्रतीयों को कनार्डार् में बसने रोकने के लिए बनार्ए गए इस कानून की विधि क सिखों ने विरोध कियार्। मेवार्सिंह ने कनार्डार् के विदेश विभार्ग के प्रधार्न होपकिंस की हत्यार् कर दी। इस कार्य में भी गदर दल ने प्रमुख योगदार्न दियार् थार्।

क्रार्ंतिकारी आंदोलन : द्वितीय चरण

1919 में जब महार्त्मार् गार्ंधी द्वार्रार् असहयोग आंदोलन प्रार्रंभ कियार् गयार् तो क्रार्ंतिकारियों द्वार्रार् भी इस आंदोलन के परिणार्मों की उत्सुकतार् के सार्थ प्रतीक्षार् की जार्ने लगी। लेकिन जब इस आंदोलन को अपने लक्ष्य में सफलतार् प्रार्प्त नहीं हुर्इ तो क्रार्ंतिकारियों के द्वार्रार् अपने कार्य प्रार्रंभ कर दिये गये। यह क्रार्ंतिकारी आंदोलन क द्वितीय चरण थार्।

1. काकोरी केस :

फरवरी 1920 में जेल से रिहार् होने के बार्द शचीन्द्र सार्न्यार्ल के द्वार्रार् भार्रत के सार्रे क्रार्ंतिकारी दलों को संगंिठत करके हिन्दुस्तार्न प्रजार्तार्ंत्रिक संघ की स्थार्पनार् की गर्इं। इस क्रार्ंतिकारी दल के द्वार्रार् देश में सशस्त्र क्रार्ंति करने के लिए बड़ी मार्त्रार् में शस्त्र खरीदे गए और इन शार्स्त्रों की कीमत चुकाने के लिए रेलगार्ड़ी में जार् रहे सरकारी खजार्ने को लखनऊ के निकट काकोरी में लूटने की योजनार् बनाइ गर्इ। 9 अगस्त 1925 को काकोरी के निकट गार्ड़ी रोक कर क्रार्ंतिकारियों के द्वार्रार् खजार्नार् लूट लियार् गयार्। लेकिन पुलिस गुप्तचर विभार्ग ने क्रार्ंतिकारियों को गिरतार्र कर लियार्। इन पर मुकदमार् चलार्यार् गयार्। इसे ही काकोरेरेरी “ार्ड़य़य़यंत्र केसेसेस के नार्म से जार्नार् जार्तार् है। इसके नार्यक थे पंण्डित रार्मप्रसार्द बिस्मिल। इस केस में रार्मप्रस्रस्रसार्द बिस्मिल, रार्जेन्द्र लार्हिड़ी़, रोशन सिंह और अशफार्क उल्लार्ह को फार्ंसी, शचीन्द्र नार्थ सार्न्यार्ल व बख्शी को आजन्म कारार्वार्स, मन्मथनार्थ गुप्त को 14 वर्ष की कैद व अन्य को कर्इ वर्ष की सजार्यें दी गर्इ। सरफरोशी की तमन्नार् के गार्यक रार्मप्रसार्द बिस्मिल ने मुल्को मिल्लत पर इस प्रकार अपनी शहदत दे दी।

2. असेम्बली बमकाण्ड

इसके पश्चार्त् सरदार्र भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त, चन्द्रशेखर व रार्जगुरू आदि के द्वार्रार् क्रार्ंतिकारी दल क नार्म जो हिन्दुस्तार्न सोशलिस्ट रिपब्लिकन पाटी थार्, हिन्दुस्तार्न सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी रख दियार् गयार्। 10 अक्टूबर 1928 को लार्हौर में सार्इमन कमीशन के विरोध में निकले जुलूस क नेतृत्व करते वयोवृद्ध नेतार् और शेरे-पंजार्ब के नार्म से प्रसिद्ध लार्लार् लार्जपतरार्य पर अंग्रेज पुलिस कप्तार्न सार्ण्डर्स के द्वार्रार् भीषण लार्ठी चाज कियार् गयार् थार्। जिसके परिणार्मस्वरूप लार्लार्जी की मृत्यु हो गर्इ। लार्लार्जी की यह मृत्यु भार्रत के लिए एक रार्ष्ट्रीय अपमार्न थार्। और क्रार्ंतिकारियों ने इसक बदलार् 17 दिसंबर 1928 को गोली मार्रकर सार्ण्डर्स की हत्यार् कर ले लियार् गयार्। इसके बार्द 8 अप्रैल 1929 को एक और घटनार् हुर्इ। केन्द्रीय असेम्बली में पब्लिक सेफ्टी बिल पर बहस चल रही थी। सदन में इस विधेयक की अस्वीकृति निश्चित थी, लेकिन यह भी निश्चित थार् कि गर्वनर जनर्रल अपने विशेष अधिकारों के आधार्र पर इसे कानून क रूप दे देगार्। इसके पहले सरकार द्वार्रार् जनतार् की इच्छार् के विरूद्ध बल पूर्वक ट्रेड डिस्प्यूटस बिल पार्स कियार् गयार् थार्। हिन्दुस्तार्न सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी की केन्द्रीय समिति के निर्णय पर इस बिल को रूकवार्ने और सरकार को जनतार् क मूल्य समझार्ने के लिए असेम्बली में बम फेंक गयार् थार्। इस कार्य के लिए भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को चुनार् गयार्। यह भी निश्चत कियार् गयार् कि ये व्यक्ति बम फेंकने के बार्द भार्गे नहीं वरन् अपने आपको गिरफ्तार्र करवार् दें। तथार् कोर्ट में बयार्न देकर हिन्दुस्तार्न रिपब्लिकन आर्मी के उद्देश्य और कार्यक्रम पर प्रकाश डार्लें।

8 अप्रैल 1921 को जब पब्लिक सेफ्टी बिल पर मत पड़ने वार्ले थे तो सरदार्र भगतसिंह ने दिल्ली की केन्द्रीय असेम्बली में बम फेंका। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने इंकलार्ब जिन्दार्बार्द, सार्म्रार्ज्यवार्द क नार्श हो के नार्रे लगार्ए। बम के सार्थ फेंके गये पर्चे में लिखार् हुआ थार् बहरों को सुनार्ने के लिए बमों की आवश्यकतार् है। बम फेंकने क उद्देश्य किसी की हत्यार् करनार् नहीं, वरन् देश में जार्गृति पैदार् करनार् ही थार्। भगत सिंह और दत्त ने अपने आपको गिरफ्तार्र करवार् दियार् गयार्। पुलिस ने इन पर मुकदमार् चलार्यार्। अदार्लत में एक लंबार् बयार्न देकर इन क्रार्ंतिकारियों ने हिन्दुस्तार्न रिपब्लिकन आर्मी के उद्देश्यों और कार्यक्रमों पर प्रकाश डार्लार्। पुलिस ने सरदार्र भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त के अतिरिक्त उनके कर्इ सार्थियों को गिरतार्र कियार् थार्। मुकदमें की कार्यवाइ के दौरार्न अदार्लतों में ये क्रार्ंतिकारी ‘सरफोशी की तमन्नार् अब हमार्रे दिल में है’ और ‘मेरार् रंग दे बसंती चोलार्’ जैसी गीत गार्ते थे। इन क्रार्ंतिकारियों ने जेल की अमार्नवीय स्थिति के विरूद्ध आमरण अनशन प्रार्रंभ कर दियार्। इस लंबे अनशन से भार्रतीय जनतार् बहुत क्षुब्ध और उद्धेलित थी। अनशन के 64 वें दिन 13 सितंबर को यतीनदार्स की मृत्यु हो गर्इ। मौत की खबर सुनकर पूरार् देश रोयार्। 23 माच, 1931 को सरदार्र भगत सिंह शिवार्रार्म, रार्जगुरू और सुखदेव को फार्ंसी की सजार् दे दी गर्इ। फार्ंसी के तख्ते पर ये नौजवार्न क्रार्ंतिकारी गार् रहे थे- दिल से निकलेगी न मर कर भी वतन की उल्फत, मेरी मिट्ट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आयेगी। शहीदों के इस बलिदार्न पर सार्रे देश में शोक मनार्यार् गयार्।

3. चटगार्ंव विद्रोह

इस काल में बंगार्ल में भी क्रार्ंतिकारी संगठित होने लगे इस क्षेत्र में सबसे अधिक सक्रिय थार्, चटगार्ंव क्रार्ंतिकारियों क वर्ग जिसके नेतार् मार्स्टर सूर्यसेन थे, और उनके सहयोगी अनंत सिंह, गणेश घोष और लोकीनार्थ बार्ठल थे। इन्होनें चटगार्ंव विद्रोह की योजनार् बनाइ, जिसमें चटगार्ंव के दो शार्स्त्रार्गार्रों पर कब्जार् कर हथियार्रों को लूटनार्, संचार्र व्यवस्थार् को नष्ट करनार् और रेल-संपर्क को भंग करनार् शार्मिल थार्। निश्चित दिन 18 अप्रैल 1930 को पुलिस शार्स्त्रार्गार्र पर कब्जार् कर लियार् गयार्, किंतु ये लोग गोलार्-बार्रूद पार्ने में असफल रहे। वंदे मार्तरम् और इंकलार्ब जिंदार्बार्द के नार्रों के बीच कालेज शस्त्रार्गार्र के बार्हर सूर्यसेन ने तिरंगार् फहरार्यार् और एक काम चलार्ऊ क्रार्ंतिकारी सरकार के गठन की घोषणार् की। लेकिन ये मुट्ठी भर युवार् क्रार्ंतिकारी ब्रिटिश सेनार् से लोहार् नहीं ले सकते थे, अत: जलार्लार्बार्द की पहार्ड़ियों में जमकर संघर्ष के बार्द सूर्यसेन और कर्इ अन्य बवार्ल के गार्ंवो में छिपने में सफल रहे, जहार्ं बेइंतहार् जुल्म के बार्वजूद गार्ंव वार्लो ने इन्हें शरण दी। लेकिन फरवरी 1933 में सूर्यसेन गिरफ्तार्र कर लिये गये और 12 जनवरी 1934 को उन्हें फार्ंसी पर लटक दियार् गयार्।

काकोरी केस में चन्द्रशेखर आजार्द भी शार्मिल हुए थे, परंतु वे सरकार के हार्थ नहीं आये। अब क्रार्ंतिकारी दल के नेतृत्व क भार्र चन्द्रशेखर आजार्द पर आयार्, उनके सहयोगी थे, यशपार्ल, सुखदेव रार्ज, रार्धार्मोहन गोकुल जी और भगवती चरण बोहरार्। श्री बोहरार् की धर्मपत्नी श्रीमति दुर्गार् देवी ने भी क्रार्ंतिकारी आंदोलन में सार्हसिक भूमिक निभाइ।

वार्यसरार्य लाड इरविन ने महार्त्मार् गार्ंधी तथार् जनतार् की अपीलों के बार्द भी भगत सिंह तथार् उनके सार्थियों के मृत्युदंण्ड को कम नहीं कियार् थार्। चन्द्रशेखर आजार्द तथार् यशपार्ल ने 23 दिसंबर 1929 र्इ. को निजार्मुद्दीन स्टेशन के पार्स वार्यसार्रय इरिवन की ट्रेन को बम से उड़ार् देने की योजनार् बनाइ। निश्चित समय पर सफल कार्यवार्ही के बार्वजूद वार्यसरार्य बार्ल-बार्ल बच गये। इसी दिन एक क्रार्ंतिकारी हरीकिशन ने भी पंजार्ब के गर्वनर पर गोली चलाइ, वे घार्यल हो गये किन्तु उनकी मृत्यु नहीं हुर्इ।

चन्द्रशेखर यशपार्ल को रूस भेजनार् चार्हते थे, तार्कि वहार्ं से स्वार्धीनतार्-संघर्ष में कुछ सहार्यतार् प्रार्प्त की जार् सके। 27 फरवरी 1931 र्इ. को वे इस प्रसंग में क्रार्ंतिकारी सुखदेव रार्ज से इलार्हार्बार्द के अल्फ्रेड पाक में मंत्रणार् कर रहे थे कि पुलिस वहार्ं आ पहुंची और दोनों तरफ से गोलीबार्री की गर्इ और आजार्द भी शहीद हो गए। आजार्द की मृत्यु से क्रार्ंतिकारी दल की अपूरणीय क्षति हुर्इ। क्रार्ंतिकारियों के अदम्य सार्हस, देशप्रेम और बलिदार्न ने भार्रत के रार्ष्ट्रीय आंदोलन में एक नयार् अध्यार्य जोड़ार् है। केन्द्रीय संगठन की कमी, धन के अभार्व और शिक्षित युवार् वर्ग तक सीमित रहने के कारण थे, अपने उद्देश्य .. …….. भार्रत की स्वतंत्रतार् तो हार्सिल नार् कर सके पर इन्हें असफल भी नहीं मार्नार् जार् सकतार्। संपूर्ण भार्रत उनके बलिदार्नों के समक्ष नतमस्तक हुआ है।

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