कार्ल माक्स के सिद्धार्ंत
माक्सवार्द को सर्वप्रथम वैज्ञार्निक आधार्र प्रदार्न करने क श्रेय कार्ल माक्स व उसके सहयोगी एंजिल्स को जार्तार् है। फ्रार्ंसीसी विचार्रकों सेण्ट सार्ईमन तथार् चार्ल्र्स फोरियर ने जिस समार्जवार्द क प्रतिपार्दन कियार् थार्, वह काल्पनिक थार्। माक्स ने अपनी पुस्तकों ‘Das Capital’ तथार् ‘Comunist Manifesto’ के वैज्ञार्निक समार्जवार्द क प्रतिपार्दन कियार्। वेपर ने कहार् है कि ‘‘पूर्ववर्ती समार्जवार्दी विचार्रकों ने सुन्दर गुलार्बों के स्वप्न लिए थे, गुलार्ब के पौधे उगार्ने के लिए जमीन तैयार्र नहीं की।’’ यह कार्य तो माक्स ने कियार्। उसने काल्पनिक समार्जवार्द को व्यार्वहार्रिक धरार्तल पर प्रतिष्ठित कियार्। उसने एक वैज्ञार्निक की तरह सार्मार्जिक प्रगति के लिए उत्तरदार्यी तत्वों को खोज निकालार् और एक वर्ग विहीन समार्ज की स्थार्पनार् के लिए विधिवत् प्रक्रियार् क रार्स्तार् बतार्यार्। इसलिए माक्स क दर्शन अत्यन्त सुसम्बद्ध व व्यवस्थित होने के कारण वैज्ञार्निक है और उसक समार्जवार्द भी वैज्ञार्निक समार्जवार्द है। माक्स के दर्शन को मोटे तौर पर तीन भार्गों में बार्ंटार् जार् सकतार् है-

  1. Dialectical Materialism (द्वन्द्वार्त्मक भौतिकवार्द)
  2. Historical Materialism (ऐतिहार्सिक भौतिकवार्द)
  3. Theory of Class – Struggle and Concept of Surplus – Value (वर्ग संघर्ष क सिद्धार्न्त एवं अतिरिक्त मूल्य की अवधार्रणार्)

द्वन्द्वार्त्मक भौतिकवार्द 

द्वन्द्वार्त्मक भौतिकवार्द क सिद्धार्न्त माक्स के सम्पूर्ण चिन्तन क केन्द्र बिन्दु है। माक्स ने हीगल के द्वन्द्ववार्द को अपने इस सिद्धार्न्त क आधार्र बनार्यार् है। माक्स क मार्ननार् है कि संसार्र में हर प्रगति द्वन्द्वार्त्मक रूप में हो रही है। हीगल के विचार्र तत्व के स्थार्न पर द्वन्द्वार्त्मक रूप में हो रही है। हीगल के विचार्र तत्व के स्थार्न पर माक्स ने पदाथ तत्व को महत्वपूर्ण बतार्यार् है। माक्स के अनुसार्र जड़ प्रकृति यार् पदाथ ही इस सृष्टि क एकमार्त्र मूल तत्व है। इसे इन्द्रिय ज्ञार्न से देखार् जार् सकतार् है। जो सिद्धार्न्त जड़ प्रकृति यार् पदाथ में विश्वार्स रखतार् है, भौतिकवार्द कहलार्तार् है। माक्स के अनुसार्र आत्मार् तत्व क कोई अस्तित्व नहीं है। इसके विपरीत पेड़-पौधे, जीव-जन्तु, मकान आदि वस्तुएं प्रत्यक्ष रूप से देखी जार् सकती है, इसलिए ये सत्य है। ये भौतिक वस्तुएं ही विचार्रों क आधार्र होती है। माक्स क मार्ननार् है कि इस जगत क विकास किसी अप्रार्कृतिक शक्ति के अधीन न होकर, उसकी अन्र्तमयी विकासशील प्रकृति क ही परिणार्म है।

हीगल ने द्वन्द्वार्त्मक क प्रयोग विश्वार्त्मार् (World Spirit) के विचार्र को स्पष्ट करने के लिए कियार् है। हीगल ने द्वन्द्ववार्द की प्रक्रियार् के तीन अंग-वार्द (Thesis), प्रतिवार्द (Anti – Thesis) तथार् संवार्द (Synthesis) है। हीगल क मार्ननार् है कि प्रत्येक वस्तु के विचार्र में ही विरोधी तत्वों क समार्वेश होतार् है। कालार्न्तर में जब ये विरोधी तत्व वार्द पर हार्वी हो जार्ते हैं तो निषेधार्त्मक निषेध (Negative Negation) के नियम के द्वार्रार् प्रतिवार्द क जन्म होतार् है। यही द्वन्द्वार्त्मक प्रक्रियार् क प्रमुख आधार्र है। सही अर्थों में द्वन्द्वार्त्मकतार् विरोधी तत्वों क अध्ययन है। विकास विरोधी तत्वों के बीच संघर्ष क परिणार्म है। इसी के एक उच्चतर वस्तु क जन्म होतार् है। इसी से सभी ऐतिहार्सिक व सार्मार्जिक परिवर्तन होते हैं। माक्स ने हीगल के द्वन्द्वार्त्मक को तो सत्य मार्नार् है। लेकिन उसके विचार्र तत्व क प्रतिकार कियार् है। उसने पदाथ तत्व को महत्व देकर भौतिकवार्द क ही पोषण कियार् है। उसके अनुसार्र द्वन्द्वार्त्मक विकास पदाथ यार् जड़ प्रकृति की परस्पर विरोधमयी प्रकृति के कारण होतार् है। इसलिए उसक भौतिकवार्द द्वन्द्वार्त्मक भौतिकवार्द (Dialectical Materialism) है।

द्वन्द्वार्त्मक भौतिकवार्द (Dialectical Materialism)–माक्स के इस सिद्धार्न्त को समझने के लिए द्वन्द्व, भौतिक तथार् वार्द तीनों शब्दों क अलग-अलग अर्थ समझनार् आवश्यक है। (क) ‘द्वन्द्व’ से तार्त्पर्य है-दो विरोधी पक्षों क संघर्ष। (ख) ‘भौतिक’ क अर्थ है-जड़ तत्व अथवार् अचेतन तत्व। ‘वार्द’ से तार्त्पर्य है-सिद्धार्न्त, विचार्र यार् धार्रणार्। इस प्रकार सरल अर्थ में ‘द्वन्द्वार्त्मक भौतिकवार्द’ क अर्थ है वह भौतिकवार्द जो द्वन्द्ववार्द की पद्धति को स्वीकृत हो। अर्थार्त् जड़ प्रकृतियार् पदाथ को सृष्टि क मौलिक तत्व मार्नने वार्लार् सिद्धार्न्त भौतिकवार्द है। इसी तरह द्वन्द्ववार्दी प्रक्रियार् के अनुसार्र जड़ जगत में निरन्तर परिवर्तन होतार् रहतार् है। पदाथ की विरोधमयी प्रकृति के कारण इस सृष्टि में निरन्तर होने वार्लार् परिवर्तन यार् विकास द्वन्द्वार्त्मक भौतिकवार्द कहलार्तार् है।

द्वन्द्वार्त्मक भौतिवार्द की आधार्रभूत मार्न्यतार्एं – माक्स के द्वन्द्वार्त्मक भौतिकवार्द की आधार्रभूत मार्न्यतार्एं यार् धार्रणार्एं हैं-

  1. सृष्टि क मूल तत्व ‘पदाथ’ है। 
  2. सृष्टि और उसमें मौजूद मार्नव-समार्ज क विकास द्वन्द्वार्त्मक पद्धति से होतार् है। 

माक्स क मार्ननार् है कि यह सार्रार् संसार्र ‘पदाथ’ (Matter) पर ही आधार्रित है अर्थार्त् इस सृष्टि क स्वभार्व पदाथवार्दी है। इसलिए विश्व के विभिन्न रूप गतिशील पदाथ के विकास के विभिन्न रूपों के प्रतीक हैं और यह विकास द्वन्द्वार्त्मरक पद्धति द्वार्रार् होतार् है। इसलिए भोतिक विकास आत्मिक विकास से अधिक महत्वपूर्ण है। इस जगत क विकास किसी बार्हरी शक्ति के अधीन न होकर, उसकी भीतरी शक्ति तथार् उसको स्वभार्व में परिवत्रन क ही परिणार्म हैं इस तरह माक्स ने पूर्ववर्ती माक्सवार्द के ऊपर लगार्ए गए कई आपेक्षों क हल पेश कर दियार्।

माक्स की द्वन्द्वार्त्मक प्रक्रियार् – माक्स तथार् एंजिल्स ने अपनी इस प्रक्रियार् को अनेक उदार्हरणों द्वार्रार् समझार्यार् है। गेहूं के पौधे क उदार्हरण देते हुए उन्होंने कहार् है कि गेहूं क दार्नार् एक वार्द है। भूमि में बो देने पर यह गलकर यार् नष्ट होकर अंकुरित होतार् है और एक पौधे क रूप ले लेतार् है। यह पौधार् द्वन्द्वार्त्मक विकास में ‘प्रतिवार्द’ (Anti – thesis) है। इस प्रक्रियार् क तीसरार् चरण पौधे में बार्ली क आनार्, उसक पकनार् तथार् उसमें दार्ने बनकर पौधे क सूख जार्नार् है। यह संवार्द कहलार्तार् है। यह वार्द और प्रतिवार्द दोनों से श्रेष्ठ है। उन्होंने आगे उदार्हरण देते हुए कहार् है कि पूंजीवार्द ‘वार्द’ है। सर्वहार्रार् वर्ग के अधिनार्यकवार्द को ‘प्रतिवार्द’ तथार् सार्म्यवार्द संवार्द कहार् जार् सकतार् है। यहार्ं पूंजीवार्द संघर्ष के बार्द विकसित रूप में पौधार् रूपी अधिनार्यकवार्द की स्थार्नार् होगी जो अन्त में सार्म्यवार्दी व्यवस्थार् के रूप में पहुंचकर आदर्श व्यवस्थार् (संवार्द) क रूप ले लेगार्।

माक्स क मार्ननार् है कि द्वन्द्ववार्द की यह प्रक्रियार् निरन्तर चलती रहती है। कालार्न्तर में वार्द, प्रतिवार्द तथार् प्रतिवार्द संवार्द बनकर वार्पिस पूर्ववत स्थिति (वार्द) में आ जार्ते हैं। जैसे गेहूं के दार्ने से पौधार् बननार्, पौधे से फिर दार्ने बननार्, प्रत्येक वस्तु की विरोधमयी प्रवृत्ति ही द्वन्द्वार्त्मक विकास क आधार्र होती है। इससे ही नए विचार्र (संवार्द) क जन्म होतार् है। इस प्रक्रियार् में पहले किसी वस्तु क ‘निषेद्य’ (Negation) होतार् है और बार्द में ‘निषेद्य क निषेद्य’ (Negation of Negation) होतार् है और एक उच्चतर वस्तु अस्तित्व में आ जार्ती है।

द्वन्द्वार्त्मक भौतिकवार्द की विशेषतार्एं

  1. आंगिक एकतार् – माक्स के अनुसार्र इस भौतिक जगत में समस्त वस्तुएं व घटनार्एं एक-दूसरे से सम्बन्धित है। इसक कारण इस संसार्र क भौतिक होनार् है। यहार्ं पदाथ क अस्तित्व विचार्र से पहले है। संसार्र में सभी पदाथ व घटनार्एं एक-दूसरे पर आश्रित है अर्थार्त् उनमें पार्रस्परिक निर्भरतार् क गुण पार्यार् जार्तार् है। इसलिए अवश्य ही सभी पदाथ एक-दूसरे को प्रभार्वित भी करते हैं और उनमें आंगिक एकतार् भी है। एक घटनार् को समझे बिनार् दूसरी घटनार् क यथाथ रूप नहीं समझार् जार् सकतार् है।
  2. परिवर्तनशीलतार् – माक्स क मार्ननार् है कि आर्थिक शक्तियार्ं संसार्र के समस्त क्रियार्-कलार्पों क आधार्र होती है। ये सार्मार्जिक व रार्जनीतिक विकास की प्रक्रियार् पर भी गहरार् प्रभार्व डार्लती है। ये आर्थिक शक्तियार्ं स्वयं भी परिवर्तनशील होती हैं और सार्मार्जिक विकास की प्रक्रियार् को भी परिवर्तित करती हैं। यह सब कुछ द्वन्द्ववार्दी प्रक्रियार् पर ही आधार्रित होतार् है। इसलिए विश्व में कुछ भी शार्श्वत् व स्थार्यी नहीं है। प्रकृति निरन्तर रूप बदलती रहती है। परिवर्तन ही सृष्टि क नियम है।
  3. गतिशीलतार् – माक्स क मार्ननार् है कि प्रकृति में पार्यार् जार्ने वार्लार् प्रत्येक पदाथ गतिशील है। जो आज है, कल नहीं थार्, कल थार् वह आज नहीं है और जो आज है वह कल नहीं होगार्। गतिशीलतार् क यह सिद्धार्न्त इस जड़ प्रकृति में निरन्तर कार्य करतार् है और नई-नई वस्तुओं यार् पदाथों क निर्मार्ण करतार् है। इसलिए यह भौतिकवार्दी विश्व सदैव गतिशील व प्रगतिशील है। इसे गतिशील बनने में किसी बार्हरी शक्ति की आवश्यकतार् नहीं होती है। स्वत’ ही गतिशील रहतार् है क्योंकि गतिशीलतार् जड़ प्रकृति क स्वभार्व है।
  4. परिमार्णार्त्मक एवं गुणार्त्मक परिवर्तन – प्रकृति में परिवर्तन एवं विकास सार्धार्रण रीति से केवल परिमार्णार्त्मक (Quantitative) ही नहीं होते बल्कि गुणार्त्मक (Qualitative) भी होते हैं। ये परिवर्तन क्रार्न्तिकारी तरीके से होते हैं। पुरार्ने पदाथ नष्ट होकर नए रूप में बदल जार्ते हें और पुरार्नी वस्तुओं में परिमार्णार्त्मक परिवर्तन विशेष बिन्दु पर आकर गुणार्त्मक परिवर्तन क रूप ले लेते हैं। जैसे पार्नी गर्म होने के बार्द एक विशेष बिन्दु पर भार्प बन जार्एगार् और उसमें गुणार्त्मक परिवर्तन आ जार्एगार्। इस गुणार्त्मक परिवर्तन की प्रक्रियार् को क्रार्न्तिकारी प्रक्रियार् कहार् जार्तार् है। ये परिवर्तन धीरे-धीरे न होकर झटके के सार्थ व शीघ्र होते हैं। इसी से पदाथ क पुरार्नार् रूप नष्ट होतार् है और नयार् रूप अस्तित्व में आतार् है।
  5. संघर्ष – माक्स क मार्ननार् है कि प्रत्येक वस्तु में संघर्ष यार् प्रतिरोध क गुण अवश्य पार्यार् जार्तार् है। यह विरोध नकारार्त्मक व सकारार्त्मक दोनों होतार् है। जगत के विकास क आधार्र यही संघर्ष है। संघर्ष के मार्ध्यम से ही विरोधी पदाथों में आपसी टकरार्व होकर नए पदाथ को जन्म देतार् है। इस संघर्ष में ही नई वस्तु क अस्तित्व छिपार् होतार् है।

द्वन्द्वदार्त्मक भौतिकवार्द के नियम 

  1. विपरीत गुणों की एकतार् व संघर्ष क नियम – यह नियम माक्स के द्वन्द्वार्त्मक भौतिकवार्द क प्रमुख भार्ग है। इसे द्वन्द्ववार्द क सार्र तत्व भी कहार् जार् सकतार् है। यह नियम प्रकृति, समार्ज और चिन्तन के विकास की द्वन्द्ववार्दी प्रक्रियार् को समझने के लिए अति आवश्यक है। इस नियम के अनुसार्र संसार्र की सभी वस्तुओं के अन्दर विरोध अन्तनिर्हित है। विरोधों के संघर्ष के परिणार्मस्वरूप ही जगत के विकास की प्रक्रियार् चलती है। इसी के द्वार्रार् मार्त्रार्त्मक परिवर्तन गुणार्त्मक परिवर्तन में बदलते हैं। माक्स ने एक चुम्बक क उदार्हरण देकर बतार्यार् है कि प्रत्येक चुम्बक के दो ध्रुव होते हैं, जिन्हें उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव के नार्म से जार्नार् जार्तार् है। ये एक दूसरे के निषेद्यक (Negative) होते हुए भी एक दूसरे से सम्बद्ध होते हैं। चुम्बक के कितने भी टुकड़े कर दिए जार्एं ये परस्पर विरोधी ध्रुव नष्ट नहीं होते। इसी प्रकार चुम्बक की तरह प्रत्येक वस्तु यार् पदाथ में परस्पर विरोधी ध्रुव विद्यमार्न रहते हैं। वे उसके आन्तरिक पक्षों, प्रवृत्तियों यार् शक्तियों के प्रतीक हैं, जो परस्पर निषेद्यक होने के बार्वजूद भी परस्पर सम्बन्धित होते हैं। इन परस्पर अन्तर्विरोधी अविच्छेदनीय सम्बन्धों से ही विपरीतों की एकतार् क जन्म होतार् है। उदार्हरण के लिए, श्रमिक और पूंजीपति एक-दूसरे के विपरीत वर्ग-चरित्र होते हुए भी एक एकतार्बद्ध पूंजीवार्दी समार्ज क निर्मार्ण करते हैं। इनमें से एक क अभार्व पूंजीवार्दी समार्ज के अस्तित्व को नष्ट कर देगार्। इस प्रकार कहार् जार् सकतार् है कि किसी वस्तु की एकतार् की सीमार्ओं के भीतर ही विरोधियों के बीच संघर्ष चलतार् रहतार् है। यही पदाथ और चेतनार् के विकास क स्रोत है। लेनिन ने कहार् है कि-’’विकास विपरीतों क संषर्घ है।’’ जिस वस्तु में जितनी संघर्ष की प्रवृत्ति रहती है, वह वस्तु उतनी ही गतिशील व परिवर्तन होती है। यही समार्ज के विकास क आधार्र है।
  2. परिणार्मार्त्मक द्वार्रार् गुणार्त्मक परिवर्तन क नियम – माक्स क कहनार् है कि मार्त्रार् में बड़ार् अन्तर आने पर गुण में भी भार्री अन्तर आ जार्तार् है। यही नियम प्रकृति में होने वार्ली आकस्मिक घटनार्ओं की व्यार्ख्यार् क आधार्र है। उदार्हरण के लिए-जैसे हम पार्नी को गर्म करते हैं तो वह एक निश्चित बिन्दु पर भार्प में बदल जार्तार् है। उसी प्रकार उसक तार्पक्रम एक निश्चित बिन्दु तक कम करने पर वह बर्फ बन जार्तार् है। यह जल क गुणार्त्मक परिवर्तन है। इस तरह वस्तुओं में भार्री मार्त्रार्त्मक परिवर्तन से गुणार्त्मक परिवर्तन होनार् अवश्यम्भार्वी हो जार्तार् है। वैसे तो छोटे-मोटे परिवर्तन सृष्टि क समस्त वस्तुओं में निरन्तर होते रहते हैं, लेकिन उनसे वस्तु के मूल स्वरूप में कोई बदलार्व नहीं आतार्। यह वस्तु के मूल स्वरूप में कोई बदलार्व नहीं आतार्। यह परिवर्तन तो विशेष बिन्दु पर ही होतार् है। ये परिवर्तन जब सार्मार्जिक क्षेत्र में होते हैं तो इन्हें हम क्रार्न्ति कहते हैं। कुछ समय तक धीरे-धीरे परिवर्तन होने के बार्द औद्योगिक क्रार्न्ति, फ्रेंच रार्ज्य क्रार्न्ति रूसी रार्ज्य क्रार्न्ति जैसे परितर्वन अकस्मार्त् ही होते हैं। उदार्हरणाथ औद्योगिक क्रार्न्ति यार् पूंजीवार्द क परिवर्तन होने से पहले उपनिवेशों के शोषण से थोड़े से ही पूंजीपतियों के पार्स पूंजी क संग्रह होने लगतार् है और दूसरी तरफ किसार्नों के जमीनों से वंचित होने पर भूसम्पत्ति सर्वहार्रार् वर्ग की संख्यार् बढ़ने लगती है। ये दोनों परिवर्तन धीरे-धीरे होते हैं। किन्तु एक समय ऐसार् आतार् है जब कारखार्नों को बनार्ने के लिए पर्यार्प्त पूंजी व मजदूर उपलब्ध हो जार्ते हैं तो उसी समय औद्योगिक क्रार्न्ति आती है और पूंजीवार्द की स्थार्पनार् हो जार्ती है। माक्स क्रार्न्ति की स्वार्भार्विकतार् को सिद्ध करने के लिए इस नियम क औचित्य सिद्ध करतार् है और कहतार् है कि परिमार्णार्त्मक से गुणार्त्मक परिवर्तन करने वार्ली क्रार्न्तियार्ं ह नई सार्मार्जिक व्यवस्थार् की स्थार्पनार् करती है और सार्मार्जिक प्रगति क माग प्रशस्त करती है। माक्स क कहनार् है कि इसी नियम के तहत पूंजीवार्द लम्बी छंलार्ग द्वार्रार् समार्जवार्द में बदल जार्एगार् और सार्मार्जिक व्यवस्थार् में भार्री गुणार्त्मक अन्तर आएगार्।
  3. निषेद्यार्ार्त्मक निषेद्य क नियम – यह नियम प्रकृति के विकास क अन्तिम नियम प्रकृति के विकास की सार्मार्न्य दशार् पर प्रकाश डार्लतार् है। ‘निषेद्य’ शब्द क सर्वप्रथम प्रयोग हीगल ने विचार्र तत्व के विकास के लिए कियार् थार्। माक्स ने इसक प्रयोग भौतिक जगत में कियार्। निषेद्य शब्द क अर्थ किसी पुरार्नी वस्तु से उत्पन्न नई वस्तु क पुरार्नी वस्तु को अभिभूत कर लेने से है। अत: निषेद्य विकास क प्रमुख अंग है। किसी भी क्षेत्र में तब तक कोई विकास नहीं हो सकतार् जब तक कि वह अपने अस्तित्व के पुरार्ने रूप क निषेद्य न करे। निषेद्य ही अन्तर्विरोधों क समार्धार्न करतार् है। पुरार्नी वस्तुओं क स्थार्न नई वस्तु लेती है। विकास के इस क्रम में पुरार्नार् नयार् हो जार्तार् है और फिर कोई और नयार् उसक स्थार्न ले लेतार् है। इस प्रकार विकास क यह क्रम निरन्तर चलतार् रहतार् है। यह निषेद्य की प्रक्रियार् समय की अविरल धार्रार् के समार्न निर्बार्धार् रूप से चलती रहती है। प्रत्येक पुरार्नार् नए को जन्म देते समय उसके निषेद्य को जन्म देकर इस विकास की प्रक्रियार् को गतिशील बनार्तार् है। निषेद्य से निषेद्य की उत्पत्ति होती है। कालार्न्तर में निषेद्य निषेद्य को जन्म देतार् है और निषेद्य क अनन्त क्रम जार्री रहतार् है। अत: विकास अनगणित क्रमबद्ध निषेद्यों की एक सत्य कहार्नी है। अर्थार्त् प्रगति द्वन्द्वार्त्मक विकास की आम दशार् है। यह सर्पिल आकार में उच्च से उच्चतर स्थिति की तरफ निरन्तर प्रवार्हमार्न रहती है। माक्स ने उदार्हरण देकर निषेद्य की प्रक्रियार् को समझार्ते हुए कहार् है-’’आदिम सार्म्यवार्द क दार्स समार्ज, दार्स समार्ज क सार्मन्तवार्द, सार्मन्तवार्द क पूंजीवार्द, पूंजीवार्द क समार्जवार्द निषेद्य करतार् है। इनमें प्रत्येक अगलार् प्रथम क निषेद्य है और यह प्रक्रियार् सतत् रूप से चलती है। यही विकास क आधार्र है। एंजिल्स ने इसको समझार्ते हुए कहार् है कि-अण्डों से तितलियार्ं अण्डों क निषेद्य करके ही उत्पन्न होती हैं और नए अण्डे तब उत्पन्न होते हैं जब तितलियों क निषेद्य हो जार्तार् है। इसी तरह माक्स ने कहार् है कि निजी सम्पत्तिवार्दी समार्ज व्यवस्थार् आदिम सार्म्यवार्द क निषेद्य है और इसके स्थार्न पर निषेद्य द्वार्रार् वैज्ञार्निक समार्जवार्द की स्थार्नार् होगी जो पहले दोनों से श्रेष्ठ होगार्। इस तरह प्रत्येक पदाथ में अन्तर्विरोधों के संघर्ष में निषेद्य क नियम कार्य करतार् है और इसी से समार्ज की प्रगति क माग आगे बढ़तार् है। अत: निषेद्यार्त्मक निषेद्य क नियम प्रगति क आधार्र है।

माक्स के द्वन्द्ववार्द की हीगल के द्वन्द्ववार्द से तुलनार्

यद्यपि माक्स ने द्वन्द्वार्त्मक पद्धति क विचार्र हीगल से लियार् थार् लेकिन फिर भी उन दोनों में आपसी मतभेद पार्ए जार्ते हैं।

  1. दोनों में समार्नतार् – हीगल तथार् माक्स दोनों द्वन्द्वार्त्मक प्रक्रियार् के तीन तत्वों वार्द, प्रतिवार्द व संवार्द में विश्वार्स करते हैं। माक्स भी हीगल की तरह विश्वार्स करतार् है कि ‘वार्द’ में निषेद्य होने पर प्रतिपार्द क जन्म होतार् है और कालार्न्तर में ‘प्रतिवार्द’ भी निषेद्य के गुण द्वार्रार् ‘संवार्द’ बन जार्तार् है। यह प्रक्रियार् निषेद्यार्त्मक निषेद्य के नियम द्वार्रार् अनवरत रूप से चलती रहती है। कालार्न्तर में संवार्द निषेद्य द्वार्रार् वार्द को उत्पन्न करतार् है। इस प्रकार यह प्रक्रियार् जल चक्र के समार्न प्रकृति में सदैव विद्यमार्न रहती है। इस तरह हीगल व माक्स दोनों द्वन्द्ववार्दी प्रक्रियार् पर समार्नतार् क रूख रखते हैं।
  2. दोनों में असमार्नतार् – माक्स ने हीगल के विपरीत भौतिकवार्द को अपने दर्शन क आधार्र बनार्यार् है। हीगल के मत में भौतिक वस्तुएं, प्रकृति आदि आत्मार् के विकार यार् उससे उत्पन्न हैं। लेकिन माक्स क कहनार् है जिसे हम आत्मार्, मन अथवार् मस्तिष्क कहते हैं, वह उसी प्रकार भौतिक शरीर से उत्पन्न वस्तुएं हैं जैसे घड़ी के पुर्जों को एक निश्चित क्रम से संयुक्त करने पर उसमें गति आ जार्ती है। इस प्रकार हीगल विचार्रों को प्रधार्न मार्नते हुए पदाथ को विचार्रों क प्रतिबिम्ब मार्नतार् है। किन्तु माक्स ‘पदाथ’ तत्व को प्रमुख देतार् है और उसक विचार्र है कि ‘पदाथ’ से ही विचार्रों की उत्पत्ति होती है। माक्स ने कहार् है-’’मार्नवीय चेतनार् उसके सार्मार्जिक अस्तित्व उसकी चेतनार् क निर्धार्रण करतार् है।’’ माक्स ने आगे कहार् है कि ‘‘मैंने हीगल के द्वन्द्ववार्द को जो शीर्षार्सन कर रहार् थार्, उसके अन्दर छिपे विचार्रों को जार्नने के लिए पैरों के बल खड़ार् कियार् है।’’ इससे स्पष्ट हो जार्तार् है कि हीगल व माक्स में आधार्रभूत समार्नतार् होते हुए भी दोनों की द्वन्द्ववार्दी पद्धति में कुछ अन्तर भी है।

द्वन्द्वार्त्मक भौतिकवार्द की आलोचनार्

  1. गूढ़ तथार् अस्पष्ट –माक्स ने द्वन्द्ववार्द की जो व्यार्ख्यार् की है, उसमें अस्पष्टतार् क पुट अधिक है। वेवर ने उसकी इस धार्रणार् को अत्यधिक रहस्यमयी बतार्यार् है। उसने आगे कहार् है-’’माक्स यह नहीं बतार्तार् कि भौतिकवार्द से उसक क्यार् अभिप्रार्य है। वह केवल यही बतार्तार् है कि उसक भौतिकवार्द यार्न्त्रिक न होकर द्वन्द्वार्त्मक है। माक्स ने यह नहीं बतार्यार् कि पदाथ किस तरह गतिशील होतार् है। लेनिन ने स्वयं स्वीकार कियार् है कि हीगल के द्वन्द्ववार्द को समझे बिनार् माक्स के द्वन्द्ववार्द को समझनार् अति कठिन कार्य है। अत: माक्स क द्वन्द्वार्त्मक भौतिकवार्द अत्यन्त रहस्यमी है। यद्यपि लेनिन तथार् अन्य सार्म्यवार्दी लेखकों ने अपनी रचनार्ओं में इसको स्थार्न देने क प्रयार्स तो कियार् है, लेकिन वे इसकी विस्तृत विवेचनार् करने में असफल रहे। इसक प्रमुख कारण इसकी अस्पष्टतार् है।
  2. आत्म-तत्व की उपेक्षार् – इस सिद्धार्न्त की प्रमुख आलोचनार् यह भी है कि आत्म तत्व की घोर उपेक्षार् करतार् है। माक्स ऐन्द्रिय ज्ञार्न को ही प्रार्मार्णिक मार्नतार् है। भार्रतीय आध्यार्त्मवार्दी विचार्रकों व लेखकों के मन में माक्स की बार्त उतर नहीं सकती। माक्स ने जितने बल से जड़ जगत की सत्तार् सिद्ध की ही; दूसरे व्यक्ति उतनी ही प्रबलतार् से अनुभव के आधार्र पर आत्मार् की सत्तार् सिद्ध करते हैं। अत: आत्मार् के तत्व में विश्वार्स रखने वार्लों की दृष्टि से विशेष रूप से भार्रतीय आध्यार्त्मवार्द की दृष्टि से माक्स क यह सिद्धार्न्त गलत है।
  3. विकास एवं जड़-चेतन पदाथ – आलोचकों क कहनार् है कि द्वन्द्ववार्द आदर्शवार्द से तो कदार्चित सम्भव हो सकतार् है, लेकिन भौतिकवार्द में नहीं। विवेक यार् विश्वार्त्मार् आन्तरिक आवश्यकतार्ओं के कारण स्वयं विकसित हो सकती है, परन्तु पदाथ जो आत्मार् विहीन होतार् है, स्वयं विकसित नहीं हो सकतार्। इसलिए जड़ जगत में होने वार्ले सार्रे परिवर्तन आन्तरिक शक्ति की बजार्य बार्हरी शक्ति क ही परिणार्म है। उदार्हरण के लिए मोटर एक जड़-पदाथ है। वह स्वयं नहीं चल सकती। उसे चलार्ने के लिए चेतन पदाथ की आवश्यकतार् पड़ती है। इस तरह जड़ व चेतन को समार्न मार्ननार् व उनकी तुलनार् करनार् तर्कसंगत नहीं हो सकतार्। भौतिक जगत के नियम उसी रूप में मार्नव-समार्ज में लार्गू नहीं हो सकते। माक्स के वर्ग-विहीन समार्ज की स्थार्पनार् भौतिक आधार्र पर ही नहीं हो सकती बल्कि सर्वहार्रार् वर्ग की क्रार्न्ति की प्रेरणार् में मार्नवीय चेतनार् क बहुत बड़ार् हार्थ होतार् है।
  4. अप्रार्मार्णिक – माक्स ने अपने द्वन्द्वार्त्मक भौतिकवार्द की पुष्टि दृष्टार्ंतों के आधार्र पर की है न कि प्रमार्णों के आधार्र पर। दृष्टार्ंतों क प्रयोग भी मनमार्ने ढंग से कियार् गयार् है। प्रार्णिशार्स्त्र के नियम इतिहार्स के नियमों से भिन्न होते हैं। लेनिन तथार् एंजिल्स ने स्वयं कहार् थार्-’’जीवशार्स्त्र के विचार्रों को हमें सार्मार्जिक विज्ञार्नों के क्षेत्र में नहीं लार्नार् चार्हिए।’’ अत: यह मार्ननार् अनुचित है कि भौतिक जगत के नियम मार्नव जीवन के समार्न रूप से लार्गू हो सकते हैं। ऐसार् कोई स्पष्ट प्रमार्ण माक्स ने नहीं दियार्, जिससे मार्नार् जार् सके कि भौतिक जगत व प्रार्णी जगत के नियम समार्न हैं।
  5. नैतिक मूल्यों की उपेक्षार् – माक्स ने पदाथ तत्व को मार्नवीय चेतनार् एवं अंत:करण से अधिक महत्व दियार् है। उसने मनुष्य को स्वाथी प्रार्णी मार्नार् है जो अपने हितों के लिए नैतिक मूल्यों एवं मर्यार्दार्ओं की उपेक्षार् करतार् है। सत्य तो यह हे कि मनुष्य स्वाथी होने के सार्थ परोपकार क गुण भी रखतार् है। इस तरह नैतिक मूल्यों की उपेक्षार् करके माक्स ने पक्षपार्ती व एकांगी दृष्टिकोण क ही परिचय दियार् है।
  6. सार्मार्जिक जीवन में अमार्न्य – माक्स क द्वन्द्वार्त्मक भौतिकवार्द क सिद्धार्न्त जड़ जगत् से सम्बन्धित एक भौतिकवार्दी वैज्ञार्निक सिद्धार्न्त है, जिसे मार्नव के समार्जिक जगत् में पूरी तरह से लार्गू करनार् कठिन है। वस्तुत: सार्मार्जिक जीवन की मुख्य इकाई स्वयं व्यक्ति होतार् है जो पदाथ की तरह व्यवहार्र नहीं करतार् है। सार्मार्जिक जीवन की घटनार्एं प्रकृति के नियमों के अनुसार्र चलती है। इस तरह सार्मार्जिक जीवन के सन्दर्भ में माक्स की वैज्ञार्किन दृष्टि क दार्वार् खोखलार् व अमार्न्य है तथार् माक्स क द्वन्द्वार्त्मक भौतिकवार्द क सिद्धार्न्त सार्मार्जिक जीन में लार्गू नहीं हो सकतार्।
  7. मनोवैज्ञार्निक दोष – माक्स ने भौतिक जगत के विकास क आधार्र संघर्ष (Struggle) को मार्नार् है। वह भौतिक संतुष्टि को ही मार्नसिक संतुष्टि क आधार्र मार्नतार् है। किन्तु यह एक मनोवैज्ञार्निक सत्य है कि कई बार्र मनुष्य दु:खों में भी मार्नसिक रूप से संतुलित रहतार् है। कई बार्र निर्धन व्यक्ति धनवार्नों की बजार्य अधिक संतुष्ट दिखार्ई देतार् है। इस तरह माक्स ने सहयोग, प्रेम, सहार्नुभूति एवं सहिष्णुतार् आदि मार्नवीय गुणों की उपेक्षार् करके मार्नवीय स्वभार्व क दोषपूर्ण चित्रण कियार् है। उसने सार्मार्जिक प्रगति क आधार्र ‘संघर्ष’ प्रगति क माग अवरुद्ध करतार् है। सार्मार्जिक विकास क माग रोककर सार्मार्जिक विघटन को जन्म देतार् है। इस तरह माक्स क यह मनोवैज्ञार्निक विश्लेषण गलत है।
  8. नियतिवार्द क समर्थन – माक्स क मार्ननार् है कि मार्नव-विकास की प्रक्रियार् पूर्व-निश्चित है। इस विकास प्रक्रियार् में किसी प्रकार क परिवर्तन नहीं कियार् जार् सकतार् है। इस प्रकार माक्स ने नियतिवार्द क समर्थन कियार् है। उसके अनुसार्र संसार्र की प्रत्येक घटनार् ऐतिहार्सिक नियतिवार्द क ही परिणार्म है। माक्स ने ‘मार्नव की स्वतन्त्र इच्छार्’ की घोर उपेक्षार् की है। इतिहार्स में ऐसे अनेक उदार्हरण हैं जब मनुष्य ने अपनी स्वतन्त्र इच्छार् के बल पर इतिहार्स की धार्रार् को मोड़ दियार्। इस विश्व में प्रत्येक घटनार् के पीछे नियतिवार्द के सार्थ-सार्थ मार्नवीय चेतनार् क भी हार्थ होतार् है।

इस प्रकार माक्स के द्वन्द्वार्त्मक भौतिकवार्द की वैज्ञार्निकतार् व पूर्णतार् को पूरी तरह स्वीकार नहीं कियार् जार् सकतार् है। उसके इस सिद्धार्न्त में अनेक दोष हैं। इसके लिए स्वयं माक्स काफी हद तक दोषी है। हैलोवल ने कहार् है-’’माक्स स्वयं एक गम्भीर दाशनिक नहीं थार्, जो कुछ गम्भीरतार् उसमें है वह सब हीगल के कारण है।’’ इस तरह सेबार्इन तथार् वेवर ने भी दर्शनशार्स्त्र की बजार्य रार्जनीति, कानून तथार् अर्थशार्स्त्र क ज्ञार्तार् मार्नार् है। प्रो0 हंट ने माक्स के द्वन्द्वार्त्मक भौतिकवार्द को अवैज्ञार्निक कहार् है। इस प्रकार निष्कर्ष तौर पर कहार् जार् सकतार् है कि माक्स क द्वन्द्वार्त्मक भौतिकवार्द क सिद्धार्न्त न तो मौलिक है और स्पष्ट है। यह अनेक विसंगतियों क कच्चार् चिट्ठार् है।

लेकिन अनेक दोषों के बार्वजूद भी रार्जनीतिक चिन्तन के इतिहस में सिद्धार्न्त क विशेष महत्व है। माक्स ने इस सिद्धार्न्त के बल पर यह बतार्यार् कि मनुष्य की सार्री समस्यार्एं इहिलौकिक हैं। समार्ज की कोई भी अवस्थार् चिर-स्थार्यी नहीं है और सार्मार्जिक परिवर्तन में भौतिक (आर्थिक) परिस्थितियों की भूमिक महत्वपूर्ण व आधार्रभूत होती है। इस सिद्धार्न्त के आधार्र पर माक्स नए समार्ज की स्थार्पनार् क माग प्रशस्त कियार् और पूंजीवार्द के शोषण से मजदूरों को मुक्ति दिलार्कर सार्म्यवार्दी समार्ज की स्थार्पनार् के स्वप्न देखार्। इस सिद्धार्न्त के आधार्र पर ही माक्स धामिक रूढ़ियों व अंधविश्वार्सों क खंडन कियार् और धर्मनिरपेक्षतार् की धार्रणार् को सबल आधार्र प्रदार्न कियार्। इस तरह माक्स ने यथाथवार्दी चिन्तन को एक ठोस व विश्वसनीय आधार्र प्रदार्न कियार् और समार्जवार्दियों ने यह दृढ़ विश्वार्स पैदार् कियार् कि उनकी विचार्रधार्रार् पूर्ण वैज्ञार्निक है और सार्म्यवार्द की स्थार्पनार् अवश्यम्भार्वी है। इस सिद्धार्न्त क महत्व इस बार्त से स्पष्ट हो जार्तार् है कि आगे लेनिन तथार् अन्य समार्जवार्दी विचार्रकों ने माक्स की ही विचार्रधार्रार् को अपने चिन्तन क आधार्र बनार्यार् और माक्स की भविष्यवार्णियों की सुरक्षार् की।

ऐतिहार्सिक भौतिकवार्द

माक्स ने अपने सिद्धार्न्त ‘द्वन्द्वार्त्मक भौतिकवार्द’ (Dialectical Materialism) क प्रयोग ऐतिहार्सिक व सार्मार्जिक विकास की व्यार्ख्यार् करने के लिए कियार्। उसने बतार्यार् कि मार्नव-इतिहार्स में होने वार्ले विभिन्न परिवर्तनों और घटनार्ओं के पीछे आर्थिक शक्तियों क हार्थ होतार् है। इसलिए उसने अपने ‘द्वन्द्वार्त्मक भौतिकवार्द’ के सिद्धार्न्त के आधार्र पर इतिहार्स की व्यार्ख्यार् को ऐतिहार्सिक भौतिकवार्द यार् ‘इतिहार्स की भौतिकवार्दी’ व्यार्ख्यार् (Materialistic Interpretation of History) क नार्म दियार्, आगे चलकर अनेक विद्वार्नों ने इस सिद्धार्न्त को ‘इतिहार्स की आर्थिक व्यार्ख्यार्’ (Economic Interpretation of History), ‘आर्थिक नियतिवार्द’ (Economic Determinism) आदि नार्मों से भी पुकारार् गयार्। इस प्रकार माक्स क यह सिद्धार्न्त भ्रमजार्ल में फंस गयार्। माक्स के अनुसार्र ऐतिहार्सिक विकास क निर्णार्यक तत्व उत्पार्दन शक्तियार्ं हैं। उसके आर्थिक नियतिवार्द के अनुसार्र मनुष्य जो कुछ भी करतार् है, उसक निर्णय आर्थिक यार् भौतिक कार्यों द्वार्रार् होतार् है। मनुष्य आर्थिक शक्तियों क दार्स है। इस सिद्धार्न्त के अनुसार्र माक्स ने यह बतार्यार् है कि ‘इतिहार्स क निर्धार्रण अन्तिम रूप में आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार्र होतार् है।’’ इस प्रकार माक्स के सिद्धार्न्त क नार्म इतिहार्स की आर्थिक व्यार्ख्यार् होनार् चार्हिए। लेकिन माक्स ने ‘भौतिकवार्द’ शब्द क प्रयोग हीगल के आशीर्वार्द से अपने सिद्धार्न्त को अलग व उलटार् रखने के लिए इसक नार्म ऐतिहार्सिक भौतिकवार्द ही रखार्।

सिद्धार्न्त की व्यार्ख्यार् 

माक्स क कहनार् है कि मनुष्य जार्ति को रार्जनीति, धर्म विज्ञार्न आदि क विकास करने से पहले खार्ने-पीने की, निवार्स की और कपड़ों की जरूरत होती है। इसलिए प्रत्येक देश की रार्जनीतिक संस्थार्एं, उसकी सार्मार्जिक व्यार्ख्यार्, उसके व्यार्पार्र और उद्योग, कलार्, दर्शन, रीतियार्ं, आचरण, परम्परार्एं, नियम, धर्म तथार् नैतिकतार् जीवन की भौतिक आवश्यकतार्ओं द्वार्रार् प्रभार्वित रूप धार्रण करती हैं। एंजिल्स के अनुसार्र ‘‘एक निश्चित समय में एक निश्चित जार्ति में जीवन-निर्वार्ह के तार्त्कालिक भौतिक सार्धनों क उत्पार्दन एवं आर्थिक विकास की मार्त्रार् एक ऐसी नींव होती है जिस पर उस जार्ति की रार्ज्य विषयक संस्थार्एं, कानूनी विचार्र, कलार् एवं धामिक विचार्र आधार्रित होते हैं।’’ माक्स ने आगे कहार् है कि इतिहार्स की सार्मार्जिक और रार्जनीतिक क्रार्न्तियार्ं जीवन की भौतिक अवस्थार्ओं के कारण होती हैं, सत्य तथार् न्यार्य के अमूर्त विचार्रों यार् भगवार्न की इच्छार् के कारण नहीं। जीवन की भौतिक अवस्थार्ओं से उसक तार्त्पर्य वार्तार्वरण, उत्पार्दन, वितरण और विनिमय से है, और उनमें भी उत्पार्दन सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। माक्स ने अपने इस सिद्धार्न्त को भूत और भविष्य दोनों में क्रार्न्तियों के लिए कियार् है। भूतकाल की क्रार्न्ति सार्मंतवार्दियों के खिलार्फ बुर्जुआवार्दियों की थी और भविष्य की क्रार्न्ति बुर्जुआवार्दियों (पूंजीपतियों) के विरूद्ध सर्वहार्रार् वर्ग (मजदूर वर्ग) की होगी। माक्स के ऐतिहार्सिक भौतिकवार्द की व्यार्ख्यार् इन शीर्षकों के अन्तर्गत की जार् सकती है:-

  1. भोजन की आवश्यकतार् – इस सिद्धार्न्तक मौलिक तत्व यह है कि मनुष्य के जीवन के लिए भोजन पहली आवश्यकतार् है। उसक जीवित रहनार् इस बार्त पर निर्भर करतार् है कि वह अपने लिए प्रार्कृतिक सार्धनों से कितनार् भोजन प्रार्प्त करतार् है। अत: मनुष्य के समस्त क्रियार्-कलार्पों क आधार्र उत्पार्दन प्रणार्ली है और इसी से समार्ज की रचनार् होती है।
  2. उत्पार्दन की शक्तियार्ं – माक्स कहतार् है कि उत्पार्दन की समस्त शक्तियों में प्रार्कृतिक सार्धन, मशीन, यन्त्र, उत्पार्दन, कलार् तथार् मनुष्यों के मार्नसिक और नैतिक गुण शार्मिल हैं। ये शक्तियार्ं समस्त मार्नव और सार्मार्जिक इतिहार्स की निर्धार्रक हैं। किसी युग की कानूनी और रार्जनीतिक संस्थार्एं सार्ंस्कृतिक उत्पार्दन के सार्धनों की उपज है। धामिक विश्वार्सों और दर्शन क आधार्र भी उत्पार्दन की शक्तियार्ं ही हैं। एंजिल्स ने कहार् है-’’इतिहार्स के प्रत्येक काल में आर्थिक उत्पार्दन और विनिमय की पद्धति तद्जनित सार्मार्जिक संगठन क वह आधार्र बनार्ते हैं जिसके ऊपर उसक निर्मार्ण होतार् है और केवल जिसके द्वार्रार् ही उनके रार्जनीतिक और बौद्धिक जीवन की व्यार्ख्यार् की जार् सकती है।’’ इस तरह कहार् जार् सकतार् है कि उत्पार्दन और वितरण की प्रणार्ली में परिवर्तन होने पर उसके अनुरूप ही सार्मार्जिक, रार्जनीतिक और धामिक संस्थार्ओं में भी परिवर्तन आते हैं। उत्पार्दन की शक्तियार्ं ही सार्मार्जिक और रार्जनीतिक ढार्ंचे क आधार्र है। इस ढार्ंचे से मनुष्यों के पार्रस्परिक सम्बन्ध निर्धार्रित होते हैं और यही ‘उत्पार्दन के सम्बन्ध’ भी कहलार्ते हैं। अत: उत्पार्दन की शक्तियार्ं ही समस्त मार्नवीय संस्थार्ओं की रूपरेखार् क आधार्र है। मनुष्यों के समस्त क्रियार्-कलार्प इसी की परिधि में आते हैं।
  3. परिवर्तनशील उत्पार्दन-शक्तियों क सार्मार्जिक सम्बन्धों पर प्रभार्व – माक्स क कहनार् है कि ‘‘जीवन के भौतिक सार्धनों की उत्पार्दन पद्धति सार्मार्जिक, रार्जनीतिक तथार् बौद्धिक जीवन की समस्त क्रियार्ओं को निर्धार्रित करती है।’’ उत्पार्दन की शक्तियार्ं सदैव समार्न न रहकर परिवर्तित होती रहती है और सार्थ में सार्मार्जिक सम्बन्धों को भी परिवर्तित करती है। यही कारण है कि औद्योगिक क्रार्न्ति से पहले हस्तचलित यन्त्रों के युग में समार्ज क स्वरूप सार्मंतवार्दी थार् और औद्योगिक क्रार्न्ति के बार्द वार्ष्पचलित तथार् अन्य ऊर्जार्चार्लित यन्त्रों के प्रयोग के युग में अर्थार्त मशीनी युग में औद्योगिक पूंजीवार्दी समार्ज की स्थार्पनार् हुई है। माक्स क विश्वार्स है कि यह विकास (उत्पार्दन शक्तियों क विकास) समार्नार्न्तर चलतार् है और यदि यह विकास (उत्पार्दन शक्तियों क विकास) समार्नार्न्तर चलतार् है और यदि कृत्रिम उपार्यों से इसके रार्स्ते में रूकावट डार्लने क कोई प्रयार्स कियार् जार्तार् है तो स्वार्भार्विक रूप से संकट क जन्म होतार् है। समार्जवार्दी व्यवस्थार् ऐसे सभी दोषों से मुक्त रहती है। अत: यह बार्त सही है कि परिवर्तनशील उत्पार्दन शक्तियार्ं ही सार्मार्जिक सम्बन्धों क नए सिरे से निर्धार्रण करती हैं।
  4. उत्पार्दन एवं उत्पार्दन शक्ति के विकास की द्वन्द्ववार्द से प्रार्प्ति – माक्स क कहनार् है कि उत्पार्दन की शक्तियों में तब तक परिवर्तन चलतार् रहतार् है जब तक की उत्पार्दन की सर्वश्रेष्ठ अवस्थार् नहीं आ जार्ती। इसी के आधार्र पर माक्स ने पूंजीवार्द को समार्जवार्द की दिशार् में ले जार्ने क प्रयार्स कियार् है। इस तरह पुरार्नी व्यवस्थार् नष्ट हो जार्ती है और नवीन व्यवस्थार् क जन्म होतार् है। उत्पार्दन शक्तियों क पूर्णतार्: की तरफ विकसित व परिवर्तित होते रहनार् ही सार्मार्जिक परिवर्तन व विकास क आधार्र है।
  5. आर्थिक व्यवस्थार् और धर्म – माक्स ने धर्म की आलोचनार् की है। वह इसक पूर्ण रूप से विरोध करते हुए कहतार् है कि ‘‘धर्म दोषपूर्ण आर्थिक व्यवस्थार् क परिणार्म है और यह अफीम के नशे की तरह है।’’ यह पूंजीपतियों द्वार्रार् मजदूर वर्ग को अनेक दु:खों से दूर रखने यार् दु:ख भूलार्ने क सार्धन है। धर्म क डर दिखार्कर पूंजीपति वर्ग मजदूर वर्ग को स्वर्गलोक की कल्पनार् करार्तार् है। इससे वे यह अनुभव करते हैं कि एक दिन वे अभार्वों तथार् चिंतार्ओं से मुक्त होकर सुखी जीवन क उपभोग अवश्य करेंगे।
  6. इतिहार्स की अनिवायतार् में विश्वार्स – माक्स इतिहार्स की अनिवायतार् में विश्वार्स करते हुए कहतार् है कि ‘‘उत्पार्दन की शक्तियों के अनुकूल जिस प्रकार के उत्पार्दन सम्बन्धों की आवश्यकतार् होगी, वे अवश्य की अवतरित होंगे। मनुष्य केवल उनके आने में देरी कर सकतार् है यार् उन्हें शीघ्रतार् से लार् सकतार् है, स्थार्यी रूप से रोक नहीं सकतार्।’’ इस तरह माक्स परिवर्तनों को अवश्यम्भार्वी मार्नतार् है और मनुष्य के नियन्त्रण से बार्हर की बार्त स्वीकार करतार् है।
  7. इतिहार्स क काल विभार्जन – माक्स ने उत्पार्दन के सम्बन्धों यार् आर्थिक दशार्ओं के आधार्र पर इतिहार्स को इन युगों में बार्ंटार् है-
    1. आदिम सार्म्यवार्द क युग अथवार् प्रार्चीन सार्म्यवार्द – यह युग इतिहार्स क प्रार्रम्भिक काल है। इस युग में मार्नव की आवश्यकतार्एं अत्यन्त सीमित थी। वह फल-फूल खार्कर अपनी भूख मिटार् लेतार् थार्। इस युग में कोई वर्ग संघर्ष नहीं थार्। इस युग में व्यक्तिगत सम्पति क अभार्व थार्। उत्पार्दन के सार्धनों पर किसी एक व्यक्ति क अधिकार नहीं थार्। समार्ज शोषक और शोषित वर्गों में नहीं बंटार् हुआ थार्। संयुक्त श्रम के कारण उत्पार्दन की शक्तियों पर सबक अधिकार थार्। सभी कार्य व्यक्ति द्वार्रार् सार्मूहिक रूप से किए जार्ते थे। सभी व्यक्ति सहयोग व समार्नतार् के सिद्धार्न्त क पार्लन करते थे। इस युग में कोई विषमतार् नहीं थी। लेकिन यह व्यवस्थार् अधिक दिन तक नहीं चली।
    2. दार्सत्व युग अथवार् समार्ज – व्यक्तिगत सम्पत्ति के उदय ने आदिम सार्म्यवार्द को समार्प्त कर दियार् और उत्पार्दन के सार्धनों पर व्यक्तिगत स्वार्मित्वहोने के कारण दार्स-युग क प्रार्रम्भ हुआ। अब व्यक्ति के शिकार के स्थार्न पर खेती करने लगार् और पशु पार्लने लग गयार्। इस युग में शक्तिशार्ली व्यक्ति उत्पार्दन के सार्धनों पर अधिकार जतार्ने लगे और कमजोर व्यक्ति उनके अधीन हो गए। इससे समार्ज में स्वार्मी और दार्स दो वर्ग बन गए। उत्पार्दन के सार्धनों पर जिसक कब्जार् होतार् थार् वह स्वार्मी तथार् उत्पार्दन के सार्धनों से वंचित व्यक्ति दार्स बन गए। स्वार्मी दार्सों के श्रम क इच्छार्नुसार्र प्रयोग करने लग गए। स्वार्मी बड़ी कठोरतार् व निर्दयतार् से दार्सों क शोषण करने लग गए। दार्सों पर स्वार्मियों क पूरार् अधिकार होतार् थार्। जैसे-जैसे स्वार्मियों के पार्स आर्थिक शक्ति बढ़ गई वैसे ही दार्स प्रथार् भी कुरुप होती गई, दार्सों के अधिक शोषण से दार्सों में विद्रोह की भार्वनार् क जन्म हुआ और विद्रोह को कुचलने के लिए उत्पीड़न के नए सार्धन रार्ज्य क जन्म हुआ। रार्ज्य ने शोषक वर्ग के ही हितों को सुरक्षित बनार्यार्। इस युग में वर्ग-संघर्ष क जन्म हुआ, अपनी चरम सीमार् पर पहुंचकर दार्स-प्रणार्ली अपने अन्तर्विरोधों के कारण नष्ट होने लगी और उसके स्थार्न पर सार्मंतवार्दी प्रणार्ली क जन्म हुआ।
    3. सार्मन्तवार्दी युग अथवार् समार्ज – दार्स-युग की समार्प्ति के बार्द मार्नव समार्ज ने सार्मन्तवार्दी युग में प्रवेश कियार्। इस युग में आजीविक क प्रमुख सार्धन कृषि थार्। इस युग में समस्त भूमि रार्जार् के अधीन थी। रार्जार् ने भूमि को अपने सार्मन्तों में बार्ंटार् हुआ थे। ये सार्मंत आवश्यकतार् पड़ने पर रार्जार् की हर तरह से मदद करते थे। ये सार्मंत कुलीन व्यक्ति थे। इन्होंने भूमि को छोटे-छोटे किसार्नों में बार्ंट रखार् थार्। किसार्नों पर सार्मन्तों क नियंत्रण थार्। किसार्न सार्मंतों को ही अपने स्वार्मी मार्नते थें इस युग में उत्पार्दन के सार्धनों पर सार्मंतों तथार् शार्सक वर्ग क अधिकार थार्। इस युग में छोटे-छोटे उद्योगों क जन्म भी हो चुक थार्। कानून और धर्म सार्मन्तों तथार् शार्सक वर्ग के हितों के ही पोषक थे। इस युग में किसार्नों क अत्यधिक शोषण होतार् थार् और उनक दशार् दार्सों की तरह थी।
    4. पूंजीवार्दी युग अथवार् समार्ज – मध्य युग की समार्प्ति पर सार्मन्त युग की उत्पार्दक शक्तियों तथार् उत्पार्दन-सम्बन्धों के विरूद्ध आवार्ज उठार्नी शुरू करदी। नगरों में व्यार्पार्री वर्ग ने नए-नए आविष्कारों क लार्भ उठार्कर उत्पार्दन प्रणार्ली में आश्चर्यजनक परिवर्तन किए और उद्योगों क तेजी से विकास होने लगार्। कोयले और भार्ंप की शक्ति के आविष्कार ने औद्योगिक क्रार्न्ति को जन्म दियार्। अब कृषि प्रधार्न अर्थव्यवस्थार् क स्थार्न उद्योगों ने लेनार् शुरू कर दियार्। अब पूंजीपतियों ने अपने उत्पार्दन को बढ़ार्ने के लिए श्रमिकों क सहार्रार् लेनार् शुरू कियार् और उन्हें कम वेतन देकर उनक शोषण करनार् शुरू कर दियार्। इस तरह औद्योगिक क्रार्न्ति के परिणार्मस्वरूप समार्ज दो वर्गों पूंजीपति तथार् श्रमिक वर्ग में बंट गयार्। सार्मार्जिक सम्बन्धों में आए नवीन परिवर्तनों से वर्ग-संघर्ष उग्र होने लग गयार्। ऐसार् संघष आज भी विद्यमार्न है। पूंजीपतियों द्वार्रार् श्रमिक वर्ग क शोषण कोई नई बार्त नहीं है। उनक शोषण लम्बे समय से होतार् आ रहार् है। आज भी श्रमिक वर्ग पूंजीपति वर्ग के शोषण क शिकार है।
    5. समार्जवार्दी युग अथवार् समार्ज – श्रमिकों क अत्यधिक शोषण श्रमिकों को संगठित होने के लिए बार्ध्य करतार् है और विद्यमार्न व्यवस्थार् के खिलार्फ क्रार्न्ति करने के लिए प्रेरित करतार् है। रूस की 1917 की क्रार्न्ति द्वार्र जार्र की तार्नार्शार्ही क अन्त करनार् तथार् सर्वहार्रार् वर्ग की तार्नार्शार्ही स्थार्पित होनार् इसक प्रमुख उदार्हरण है। पूंजीपति वर्ग द्वार्रार् दिए गए कष्टों से छुटकारार् पार्ने के लिए क्रार्न्ति के सिवार्य अन्य कोई उपार्य श्रमिकों के पार्स नहीं है। यद्यपि यह क्रार्न्ति चीन और रूस में ही आई है। विश्व के अनेक पूंजीवार्दी देश आज भी बेहिचक श्रमिकों क शोषण कर रहे हैं। माक्स क विश्वार्स थार् कि पूंजीवार्द में ही अनेक विनार्श के बीज निहित हैं। इसक विनार्श अवश्यम्भार्वी है। इसके अन्त पर ही नए समार्ज व सार्मार्जिक सम्बन्धों की स्थार्पनार् होगी जो अगले चरण में पूर्ण सार्म्यवार्द क रूप ले लेगार्।
    6. सार्म्यवार्दी युग अथवार् समार्ज – सर्वहार्रार् वर्ग की क्रार्न्ति के बार्द उत्पार्दन के सार्धनों पर सर्वहार्रार् वर्ग क अधिनार्यकत्व स्थार्पित होगार् और संक्रमणशील अवस्थार् से गुजरने के बार्द समार्जवार्दी व्यवस्थार् पूर्ण सार्म्यवार्द क स्थार्न ले लेगी। इसे रार्ज्यविहीन समार्ज की स्थिति प्रकट होगी। समार्ज में पूर्ण समार्नतार् और सार्म्य क सार्म्रार्ज्य स्थार्पित होगार्। पूंजीपति वर्ग बिल्कुल लुप्त हो जएगार् और समार्ज में श्रमजीवियों क वर्ग ही शेष बचेगार्। विरोधी वर्ग के अभार्व में वर्ग संघर्ष भी समार्प्त हो जार्एगार्। शोषण के सभी सार्धन भी लुप्त हो जार्एंगे। इससे आदर्श समार्ज की अवस्थार् आएगी। माक्स ने इस व्यवस्थार् की दो विशेषतार्एं बतार्ई हैं-
      1. यह अवस्थार् वर्ग-विहीन होगी। इसमें शेार्षक व शोषित दो वर्ग न होकर उत्पार्दन के सार्धनों क स्वार्मी बहुसंख्यक वर्ग श्रमिक वर्ग यार् सर्वहार्रार् वर्ग होगार्। रार्जनीतिक शक्ति के प्रयेार्ग की आवश्यकतार् न रहने पर रार्ज्य नार्म की सस्थार्क स्वयं लोप हो जार्एगार्। क्योंकि रार्ज्य पूंजीपति वर्ग के शोषण क प्रभार्वशार्ली सार्धन होतार् है। श्रमिक वर्ग को इसकी कोई आवश्यकतार् नहीं रहेगी।
      2. इस अवस्थार् में ‘सार्मार्जिक संसार्धनों के वितरण क सिद्धार्न्त’ लार्गू होगार् अर्थार्त् प्रत्येक व्यक्ति अपनी योग्यतार् के अनुसार्र कार्य करेगार् और उसकी आवश्यकतार्ओं की पूर्ति स्वयं हो जार्एगी।
  8. मार्नव-इतिहार्स की कुंजी वर्ग-संघर्ष है – माक्स क मार्ननार् है कि मार्नव समार्ज क इतिहार्स वर्ग संघर्ष क इतिहार्स है। प्रत्येक युग में परस्पर विरोधी दो वर्ग रहे हैं। दार्स-युग में स्वार्मी और दार्स, सार्मन्तवार्दी युग में किसार्न और सार्मंत तथार् पूंजीपति वर्ग (बुजुर्आ वर्ग) तथार् श्रमिक वर्ग (सर्वहार्रार् वर्ग) क अस्तित्व रहार् है। इन दोनों वर्गों के हित अलग-अलग होने के कारण वर्ग-संघर्ष (Class – Struggle) क जन्म होतार् है। यही वर्ग संघर्ष समार्ज में परिवर्तन तथार् विकास क प्रेरक तत्व है। माक्स क मार्ननार् है कि इसी वर्ग-संघर्ष के कारण अन्तत: समार्जवार्द की स्थार्पनार् होगी और सार्मार्जिक सम्बन्धों क निर्धार्रण नए सिरे से होगी। उस अवस्थार् में समार्ज शोषण मुक्त होगार् उसमें समार्नतार् तथार् सार्म्यवार्द क सिद्धार्न्त पूर्ण रूप से अपनार् कार्य करेगार्।

माक्स के ऐतिहार्सिक भौतिकवार्दी सिद्धार्न्त के निहिताथ 

  1. किसी समार्ज के विकास की प्रक्रियार् में आर्थिक तत्वों की भूमिक सबसे अधिक महत्वपूर्ण होती है।
  2. इतिहार्स क अध्ययन मार्नव-समार्ज के विकास के नियम जार्नने के लिए कियार् जार्तार् है।
  3. प्रकृति के विकास के नियमों की तरह समार्ज के विकास के भी कुछ वैज्ञार्निक नियम हैं।
  4. उत्पार्दक-शक्तियों में परिवर्तन से उत्पार्दकीय सम्बन्धों में भी परिवर्तन हो जार्तार् है।
  5. प्रत्येक युग की सम्पूर्ण सार्मार्जिक व्यवस्थार् पर आधिपत्य उत्पार्दन के सार्धनों पर स्वार्मित्व वार्ले वर्ग क ही होतार् है।
  6. सार्मार्जिक जीवन के परितर्वन आर्थिक शक्तियों के कारण होते हैं। इनके पीछे किसी ईश्वरीय इच्छार् यार् संयोग क कोई हार्थ नहीं होतार् है।
  7. वर्ग-संघर्ष सार्मार्जिक विकास की कुंजी है और दार्स-युग से लेकर सर्वहार्रार् वर्ग के अधिनार्यकवार्द तक वर्ग-संघर्ष ने ही सार्मार्जिक व्यवस्थार्ओं में परिवर्तन किए हैं। लेकिन सार्म्यवार्दी युग की स्थार्पनार् पर इस वर्ग-संघर्ष की प्रक्रियार् क अन्त हो जार्एगार्। 8ण् इतिहार्स की आर्थिक व्यार्ख्यार् के मार्ध्यम से माक्स पूंजीवार्द के अन्त तथार् सार्म्यवार्द के आगमन की अनिवायतार् व्यक्त करतार् है।

ऐतिहार्सिक भौतिकवार्द की आलोचनार्

माक्स के ऐतिहार्सिक भौतिकवार्द क सिद्धार्न्त अनेक आलोचनार्ओं क शिकार हुआ है। इसकी आलोचनार् के आधार्र हैं:-

  1. मार्नव इतिहार्स के विकास में केवल आर्थिक तत्व ही निर्धार्रक नहीं – माक्स ने आर्थिक तत्वों को मार्नव समार्ज क निर्धार्रक मार्नने की भार्री भूल की है। मार्नव इतिहार्स के विकास में धर्म, दर्शन, रार्जनीति, नैतिकतार् आदि क महत्वपूर्ण योगदार्न होतार् है। इसके अतिरिक्त जलवार्यु, न्यार्य की इच्छार्, विवेक, लार्भ तथार् मार्नव की महतवकांक्षार्एं, भार्वनार्एं, अभिलार्क्षार्एं भी मार्नवीय क्रियार्ओं में प्रभार्वी रही है। जार्तीय पक्षपार्त, षड्यंत्र, अन्धविश्वार्स, लैंगिक इच्छार्, लैंगिक आकर्षण, अधिकार, नार्म तथार् प्रसिद्धि की लिप्सार्ओं पर माक्स क सिद्धार्न्त प्रकाश नहीं डार्लतार्। संसार्र में संघर्षों क कारण आर्थिक तत्व ही नहीं रहे हैं। इनके पीछे और आर्थिक तत्वों ईष्र्यार्, प्रदर्शन की इच्छार्, शक्ति और सत्तार् क प्रेम आदि क भी महत्वपूर्ण योगदार्न होतार् है।
  2. रार्जनीतिक सत्तार् क एकमार्त्र आधार्र आर्थिक सत्तार् नहीं है – माक्स क मार्ननार् है कि समार्ज में जिस वर्ग क उत्पार्दन के सार्धनों पर स्वार्मित्व होतार् है, समार्ज की सत्तार् पर भी उसक ही अधिकार होतार् है। पूंजीवार्दी अवस्थार् में तो यह ठीक है लेकिन हर अवस्थार् में संभव नहीं हो सकतार्। प्रार्चीन भार्रत में ब्रार्ह्मणों और क्षत्रियों के पार्स रार्जनीतिक सत्तार् अत्यधिक थी, फिर भी वे आर्थिक सत्तार् से अभार्वग्रस्त थे। मध्ययुग में पोप की शक्ति क आधार्र आर्थिक स्वार्मित्व पर निर्भर नहीं थार्। वर्तमार्न युग में कर्मचार्री वर्ग क महत्व आर्थिक सत्तार् के कारण न होकर उनकी मार्नसिक शक्ति के कारण है। अत: सदैव आर्थिक सत्तार् ही रार्जनीतिक सत्तार् क आधार्र नहीं होती।
  3. दैवीय व संयोग तत्वों की उपेक्षार् – माक्स ने अपने इस सिद्धार्ंत में संयोग तत्व की घोर उपेक्षार् की है। न्यूटन ने संयोगवश ही सेब को पेड़ से गिरते देखकर गुरुत्वार्कर्षण क नियम प्रतिपार्दित कियार् थार्। एक दु:खी व्यक्ति को देखकर ही महार्त्मार् बुद्ध क सार्रार् जीवन दर्शन ही बदल गयार्। नेपोलियन कभी भी ख्यार्ति प्रार्प्त नहीं कर सकतार् थार् यदि जिनोआ ने 1768 में कोर्सिक को फ्रार्ंस को न सौंपार् होतार्। नेपोलियन फ्रार्ंस के स्थार्न पर इटली क नार्गरिक होतार्। 1917 में यदि जर्मनी की सरकार लेनिन को वार्पिस रूस लौटने की आज्ञार् नहीं देती तो बोल्शेविक क्रार्ंति नहीं होती। वर्तमार्न समय की संसदार्त्मक प्रणार्ली आकस्मिक घटनार्ओं क परिणार्म है। इस प्रकार मार्नव इतिहार्स में परिवर्तन व विकास आकस्मिक कारणों से होते हैं, आर्थिक कारणों से नहीं।
  4. आर्थिक तत्व ही संघर्ष क एकमार्त्र कारण नहीं है – माक्स क कहनार् है कि आज तक क इतिहार्स उत्पार्दन शक्तियों में होने वार्ले संघर्ष क परिणार्म है। लेकिन सत्य तो यह है कि युद्ध केवल आर्थिक कारणों से ही नहीं हुए हैं। महार्भार्रत क युद्ध, रार्वण पर रार्म क आक्रमण, आर्थिक प्रेरणार्ओं से युक्त नहीं थे। इनके पीछे मनोवैज्ञार्निक तत्वों-ईष्र्यार्, द्वेष, बदलार्, पार्प क नार्श करने व धर्म की रक्षार् करने की भार्वनार् आदि बलशार्ली थी। सिकन्दर द्वार्रार् भार्रत पर आक्रमण के पीछे उसकी विश्व विजय की महत्वार्कांक्षार् थी। दो महार्शक्तियों में लम्बे समय तक चलने वार्लार् शीतयुद्ध (Cold – war) विचार्रधार्रार्ओं क संघर्ष थार्, ब्रटेंड रसल ने कहार् है-’’हमार्रे रार्जनीतिक जीवन की बड़ी-बड़ी घटनार्ओं क निर्धार्रण भौतिक अवस्थार्ओं और मार्नवीय भार्वनार्ओं की पार्रस्परिक क्रियार्ओं के द्वार्रार् होतार् है।’’ अत: संघर्षों के पीछे आर्थिक तत्वों के सार्थ गैर-आर्थिक तत्वों क भी महत्वपूर्ण योगदार्न होतार् है।
  5. उत्पार्दन प्रणार्ली ही विचार्र को जन्म नहीं देती, विचार्र भी उत्पार्दन प्रणार्ली को जन्म देते हैं – माक्स के इन सिद्धार्न्त के अनुसार्र उत्पार्दन प्रणार्ली ही विचार्र की जन्मदार्तार् है। जबकि सत्य तो यह है कि विचार्र भी उत्पार्दन प्रणार्ली को जन्म देते हैं। उदार्हरणत: सोवियत प्रणार्ली, जो 1917 की क्रार्न्ति के बार्द स्थार्पित की गई, सार्म्यवार्दी सिद्धार्न्त की उपज है। फार्सिस्ट प्रार्णी फार्सिस्ट सिद्धार्न्त जो इटली में मुसोलिनी ने पेश कियार् थार्, की उपज है। नार्जीवार्दी प्रणार्ली जर्मनी में हिटलर के नार्जीवार्द की देन है। अत: विचार्र भी उत्पार्दन प्रणार्ली की जननी होते हैं।
  6. मार्नवीय इतिहार्स के कालक्रम क निर्धार्रण संभव नहीं है – माक्स ने अपनी आर्थिक व्यार्ख्यार् के अन्तर्गत इतिहार्स क काल विभार्जन-दार्स युग, सार्मन्तवार्दी युग, पूंजीवार्दी युग, सर्वहार्रार् वर्ग क अधिनार्यकत्व और सार्म्यवार्दी युग में कियार् है। उसक यह काल विभार्ार्जन गलत है। यह आवश्यक नहीं है कि सर्वहार्रार् वर्ग क अधिनार्यक पूंजीवार्द के पूर्ण विकास के बार्द ही आए। रूस में 1917 की क्रार्न्ति से पहले वहार्ं पूंजीवार्द न होकर कृषि प्रधार्न रार्ज्य थार्। इसी तरह चीन सर्वहार्रार् क्रार्न्ति से पूर्व कोई औद्योगिक दृष्टि से विकसित रार्ष्ट्र नहीं थार्। अत: माक्स क काल विभार्जन ताकिक दृष्टि से गलत है।
  7. रार्ज्य-विहीन समार्ज क विचार्र गलत है – माक्स क यह सोचनार् गलत है कि इतिहार्स क विकास क्रम रार्ज्यविहीन समार्ज पर आकर रूक जार्एगार्। क्यार् सार्म्यवार्दी युग में पदाथ क अन्तर्निहित गुण ‘गतिशीलतार्’ समार्प्त हो जार्एगार्। यदि गतिशीलतार् क पदाथ क स्वार्भार्विक गुण है तो उसमें सार्म्यवार्दी अवस्थार् में भी अवश्य ही परिवर्तन होगार्। उत्पार्दन के सार्धन बदलेंगे, सार्मार्जिक सम्बन्धों में परिवर्तन आएगार् तथार् वर्गविहीन समार्ज क प्रतिवार्द उत्पन्न होकर सार्म्यवार्द को भी नष्ट कर देगार्। अत: माक्स क ‘गतिशीलतार् क सिद्धार्न्त’ सार्म्यवार्द के ऊपर आकर रूक जार्एगार्, तर्कसंगत व वैज्ञार्निक नहीं हो सकतार्।
  8. सावभौमिकतार् क अभार्व – एक दाशनिकतार्वार्दी सिद्धार्न्त के रूप में इतिहार्स की आर्थिक व्यार्ख्यार् सार्रे संसार्र पर व हर क्षेत्र में लार्गू नहीं हो सकती। लॉस्की के अनुसार्र-’’आर्थिक पृष्ठभूमि पर सार्रार् वर्णन करने क आग्रह मूलत: मिथ्यार् है।’’ उसने कहार् है कि बार्ल्कान रार्ष्ट्रवार्द क केवल मार्त्र आर्थिक पृष्ठभूमि के आधार्र पर वर्णन नहीं कियार् जार् सकतार्। इसके अतिरिक्त मार्नव जीवन के समस्त पहलूओं को आर्थिक तत्व द्वार्रार् प्रभार्वित मार्ननार् सर्वथार् गलत है। आर्थिक तत्व मार्नवीय मार्मलों को प्रभार्वित तो कर सकतार् है, लेकिन उनक निर्धार्रण नहीं।
  9. अवैज्ञार्निकतार् – माक्स ने इस सिद्धार्न्त को गम्भीर अनुशीलन व वैज्ञार्निक अध्ययन करके नहीं निकालार् है। उसने हीगल को द्वन्द्वार्त्मक प्रक्रियार् के आधार्र पर ही इसकी कल्पनार् की है। उसने पूंजीवार्द के नार्श के उद्देश्य से इस सिद्धार्न्त के वैज्ञार्निक नियमों की ओर ध्यार्न नहीं दियार् है। उसने दृष्टार्ंत तो बहुत दिए हैं, लेकिन वैज्ञार्निक प्रमार्णों क इस सिद्धार्न्त में सर्वथार् अभार्व है। स्वयं ऐंजिल्स भी माक्स की अवैज्ञार्निकतार् को स्वीकार करतार् है। उतार्वलेपन के कारण माक्स ने इस सिद्धार्न्त को भ्रमपूर्ण बनार् दियार् है। माक्स स्वयं पदाथ में गतिशीलतार् की बार्त करतार् है और स्वयं ही सार्म्यवार्दी व्यवस्थार् में वर्ग-संघर्ष की समार्प्ति की बार्त करके गतिशीलतार् के सिद्धार्न्त क विरोधी बन जार्तार् है। अत: अन्तर्विरोधों से ग्रस्त होने के कारण यह सिद्धार्न्त भ्रार्ंतिपूर्ण है।

यद्यपि माक्स के इस सिद्धार्न्त की काफी आलोचनार् हुई है। आलोचनार् के कुछ ठोस आधार्र भी हैं। लेकिन इस सिद्धार्न्त की पूर्ण उपेक्षार् करनार् माक्स की महत्वपूर्ण देन की उपेक्षार् करनार् है। जोड ने कहार् है कि इस सिद्धार्न्त ने माक्स को अन्य किसी भी सिद्धार्न्त से अधिक प्रसिद्धि प्रदार्न की है। माक्स ने सर्वप्रथम इतिहार्स के क्रमबद्ध एवं वैज्ञार्निक अध्ययन की परम्परार् की नींव रखी है। चार्हे हम माक्स द्वार्रार् प्रस्तुत की गई इतिहार्स की व्यार्ख्यार् से सहमत न हों, लेकिन यह बार्त तो सत्य है कि इतिहार्स किसी दैवीय इच्छार् की अभिव्यक्ति नहीं है। आज यह स्वीकार कियार् जार्तार् है कि सार्रे इतिहार्स की मुय धार्रार् में एक क्रमबद्धतार् अवश्य है और इसलिए सार्मार्जिक विकास के नियम भी अवश्य हैं, चार्हे ये नियम माक्स के नियमों से अलग हों। माक्स ने लम्बे समय से चली आ रही सार्मार्जिक जीवन के अध्ययन की धर्म- प्रधार्न एवं मध्ययुगीन अध्ययन प्रणार्ली क पूर्ण अन्त कर दियार् है और समार्जशार्स्त्रों को एक नई गति व दिशार् प्रदार्न की है। करयू हण्ट ने कहार् है-’’सार्मजशार्स्त्रों के सभी आधुनिक लेखक माक्स के प्रति ऋणी हैं, यद्यपि वे इसे स्वीकार नहीं करते।’’ इससे स्पष्ट हो जार्तार् है कि माक्स ने आर्थिक कारकों पर जोर देकर सार्मार्जिक विज्ञार्नों के क्षेत्र में एक नयार् कदम रखार् है। इस बार्त से पूर्णतयार्: इन्कार नहीं कियार् जार् सकतार् कि आर्थिक शक्ति रार्जनीतिक शक्ति की नियार्मक नहीं है। आर्थिक तत्व की उपेक्षार् करके इतिहार्स क निष्पक्ष अध्ययन करनार् असम्भव है। अत: माक्स क ऐतिहार्सिक भौतिकवार्द क सिद्धार्न्त उसकी एक महत्वपूर्ण देन है।

वर्ग संघर्ष क सिद्धार्न्त 

माक्स की वर्ग-संघर्ष की धार्रणार् उसके चिन्तन की एक महत्वपूर्ण धार्रणार् है। माक्स ने इतिहार्स की प्रेरक शक्ति भौतिक है। उसक मार्ननार् है कि उत्पार्दन प्रक्रियार् के मार्नव सम्बन्ध इतिहार्स क निर्मार्ण करते हैं। उत्पार्दन प्रक्रियार् धनी और निर्धन (Haves and Have nots) दो वर्गों को जन्म देती है। प्रत्येक वर्ग एक दूसरे से संघर्ष करतार् रहतार् है। यही समार्ज की प्रगति क आधार्र है। इस तरह माक्स क वर्ग-संघर्ष क सिद्धार्न्त जन्म लेतार् है। उसकी यह धार्रणार् इतिहार्स की भौतिकवार्दी व्यार्ख्यार् तथार् अतिरिक्त मूल्य के सिद्धार्न्त पर आधार्रित है। उसने ऐतिहार्सिक भौतिकवार्द की सैद्धार्न्तिक प्रस्थार्पनार्ओं के आधार्र पर सार्म्यवार्दी घोषणार्पत्र (Communist Manifesto) में कहार् है कि-’’आज तक क सार्मार्जिक जीवन क इतिहार्स वर्ग संघर्ष क इतिहार्स है।’’ सेबार्इन ने भी उसकी पुष्टि करते हुए कहार् है कि माक्स वर्ग-संघर्ष को ही सार्मार्जिक परिवर्तन क मार्ध्यम मार्नतार् है।

माक्स ने अपनी वर्ग-संघर्ष की धार्रणार् ‘आंगिस्टन थोरे’ के दर्शन से ली है। इसलिए उसकी यह धार्रणार् मौलिक नहीं है। फिर भी माक्स ने उसे एक व्यवस्थित व प्रार्मार्णिक आधार्र प्रदार्न करके उसे विश्व रार्जनीतिक क प्रमुख तत्व बनार् दियार् है। उसने वर्ग-संघर्ष की धार्रणार् को तत्कालीन इंग्लैण्ड की तत्कालीन सार्मार्जिक-आर्थिक परिस्थितियों पर आधार्रित कियार् है। उस समय इंग्लैण्ड में उत्पार्दन में अत्यधिक वृद्धि हो रही थी। पूंजीपति वर्ग दिन-प्रतिदिन अमीर होतार् जार् रहार् थार् और श्रमिक वर्ग निरन्तर निर्धन हो रहार् थार्। श्रमिक वर्ग में वर्ग-चेतनार् क विकास हो रहार् थार् और वह पूंजीपति वर्ग के शोषण को रोकने के लिए संगठित रूप में संघों क निर्मार्ण कर रहार् थार्। माक्स ने पूंजीपति वर्ग के अत्यार्चार्र व अन्यार्य से दु:खी श्रमिक वर्ग के कष्टों को देखकर एक कल्पनार् के आधार्र पर वर्ग-संघर्ष की धार्रणार् को निर्मार्ण कियार् और कल्पनार् के ही आधार्र पर पूंजीवार्दी समार्ज के अन्त तथार् समार्जवार्द के उदय क स्वप्न देखार् जो शोषण मुक्त समार्ज क प्रतिबिम्ब होगार्।

वर्ग संघर्ष क अर्थ

माक्स ने वर्ग-संघर्ष की धार्रणार् क उल्लेख अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘सार्म्यवार्दी घोषणार्पत्र‘ (Communist Manifesto) में कियार् है। उसने ‘वर्ग’ शब्द क प्रयोग विशिष्ट अर्थों में कियार् है। बुिखार्रिन ने वर्ग को परिभार्षित करते हुए कहार् है-’’सार्मार्जिक वर्ग व्यक्तियों के उस समूह को कहते हैं जो उत्पार्दन की प्रक्रियार् में एक हिस्सार् अदार् करते हैं और उत्पार्दन की प्रक्रियार् में लिप्त दूसरे व्यक्तियों के सार्थ एक ही सम्बन्ध रखते हैं।’’ माक्स के अनुसार्र, ‘‘व्यक्तियों क वह समूह वर्ग है, जो अपने सार्धार्रण हितों की पूर्ति हेतु उत्पार्दन की प्रक्रियार् से जुड़ार् हुआ है।’’ अर्थार्त् जिस समूह के आर्थिक हित एक-से होते हैं, उसको वर्ग कहार् जार्तार् है। माक्स क कहनार् है कि समार्ज में सदैव ही दो वर्ग रहे हैं, जैसे स्वार्मी-दार्स, किसार्न-जमींदार्र, पूंजीपति-श्रमिक। संघर्ष को परिभार्षित करते हुए माक्स ने कहार् है कि संघर्ष क अर्थ केवल लड़ार्ई नहीं है बल्कि इसक व्यार्पक अर्थ है-रोष, असंतोष तथार् आंशिक असहयोग। जब यह कहार् जार्तार् है कि वर्गों में अनार्दिकाल से सदैव संघर्ष होतार् रहार् है तो इसक अभिप्रार्य यह होतार् है कि सार्मार्न्य रूप से असन्तोष औ रोष की भार्वनार् धीरे-धीरे शार्न्तिपूर्ण रीति से सुलगती रहती है और कुछ ही अवसरों पर यह भीषण ज्वार्लार् क रूप ग्रहण कर लेती है।

वर्ग-संघर्ष सिद्धार्न्त की व्यार्ख्यार्

माक्स ने इतिहार्स की भौतिकवार्दी व्यार्ख्यार् करके यह नियम बनार्यार् कि आज तक क संसार्र क इतिहार्स वर्ग-संघर्ष क इतिहार्स है। विश्व इतिहार्स आर्थिक और रार्जनीतिक शक्ति के लिए विरोधी वर्गों में संघर्षों की Üार्ृंखलार् है। प्रत्येक काल और प्रत्येक देश में आर्थिक और रार्जनीति सत्तार् की प्रार्प्ति के लिए किए गए संघर्ष इतिहार्स क अंग बन गए हैं। माक्स ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो’ में लिखार् है-’’प्रार्चीन रोम में कुलीन, सरदार्र, सार्धार्रण मनुष्य तथार् दार्स होते थे। मध्य युग में सार्मन्त, सरदार्र तथार् जार्गीरदार्र, संघ स्वार्मी, कामदार्र, अपरेन्टिस तथार् सेवक होते थे। प्रार्य: इन समस्त वर्गों में इनकी उपश्रेणियार्ं भी होती थी। ये समूह दमन करने वार्ले तथार् दलित निरन्तर एक दूसरे क विरोध करते थे। इनमें कभी खुलकर तथार् कभी छिपकर निरन्तर संघर्ष चलतार् रहतार् थार्। प्रत्येक समय युद्ध के परिणार्मस्वरूप दोनों वर्ग नष्ट हो जार्ते थे।’’ इस तरह समार्ज में युगों से दो वर्गों क अस्तित्व रहार् है और उनमें संघर्ष भी निरन्तर होतार् रहार् है। प्रत्येक वर्ग अपने हितों की पूर्ति के लिए संघर्ष के उपार्य पर ही आश्रित रहार् है। ऐसार् वर्ग-संघर्ष आज भी पार्यार् जार्तार् है। आज यह संघर्ष अमीर-गरीब के बीच में है। आज उत्तर के विकसित देश दक्षिण के अविकसित देशों क शोषण कर रहे हैं और दोनों में विभार्जन की खार्ई निरन्तर चौड़ी हो रही हैं आज अन्तर्रार्ष्ट्रीय मंचों पर उत्तर-दक्षिण मतभेद वर्ग-संघर्ष क ही नमूनार् है।

माक्स ने वर्ग-संघर्ष के सिद्धार्न्त को ऐतिहार्सिक आधार्र पर प्रमार्णित करने के लिए, आदम युग से आज तक मार्नव सभ्यतार् के विकास पर नजर डार्ली है। माक्स कहतार् है कि आदिम युग में मार्नव की आवश्यकतार्एं सीमित थीं और वह कन्द, फल खार्कर अपनार् गुजार्रार् करतार् थार्। उस युग में व्यक्तिगत सम्पत्ति क लोप थार्। प्रत्येक वस्तु पर सार्ंझार् अधिकार थार्। सभी व्यक्ति प्रेम-भार्व से रहते थे। आदिम सार्म्यवार्दी अवस्थार् थी। लेकिन यह व्यवस्थार् अधिक दिन तक नहीं चली। इसक स्थार्न दार्स-समार्ज ने ले लियार्, इस युग में उत्पार्दन के सार्धनों पर शक्तिशार्ली व्यक्तियों क अधिकार हो गयार् और वे स्वार्मी कहलार्ए। कमजोर व्यक्ति दार्स कहलार्ए जार्ने लगे। व्यक्तिगत सम्पत्ति के उदय ने समार्ज में वर्ग-संघर्ष को जन्म दियार्। इस काल में समार्ज में दो वर्गों दार्सों व स्वार्मियों में संघर्ष तीव्र हो गयार्। स्वार्मी दार्सों क शोषण करने लग गए। इस युग में उत्पार्दन क प्रमुख सार्धन कृषि थार्। जब कृषि के सार्थ पशु-पार्लन भी शुरू हुआ तो सार्मन्तवार्दी युग क जन्म हुआ। इस युग में जनसंख्यार् बढ़ने से कृषि योग्य भूमि क भी विस्तार्र हुआ। अब सार्मन्त वर्ग ने सार्री भूमि रार्जार् से प्रार्प्त कर ली और उसके बदले रार्जार् को हर सम्भव सैनिक व आर्थिक मदद देने क वचन दियार्। इस तरह भूमि पर गिने चुने धनी व्यक्तियों क स्वार्मित्व हो गयार् और जनतार् क अधिकांश हिस्सार् शोषित किसार्न वर्ग बन गयार्। जमींदार्रों (सार्मन्तों) ने किसार्नों क जमकर शोषण कियार्। उनकी दशार् दार्सों के समार्न थी। लेकिन छोटे-मोटे उद्योग धन्धों की शुरुआत ने सार्मंतवार्दी व्यवस्थार् क भी अन्त कर दियार्।

इसके बार्द विज्ञार्न के आविष्कारों के परिणार्मस्वरूप उद्योगों के क्षेत्र में तीव्र उन्नति होने लगी और उद्योग धन्धों के विकास से समार्ज में पूंजीपति व श्रमिक दो वर्ग बन गए। जिनक उद्योगों पर पूर्ण नियन्त्रण थार् वे पूंजीपति कहलार्ए और जो कारखार्नों में काम करते थे, श्रमिक कहलार्ए। आज क संघर्ष पूंजीपति वर्ग व श्रमिक वर्ग क संघर्ष है। आज क युग पूंजीवार्द क युग है। आज संघर्ष पहले की तुलनार् में आसार्न हो गयार् है। आज पूंजीवार्दी गुट व श्रमिक गुट एक-दूसरे के सार्मने पूरे जोर से डटे हुए हैं। यह संघर्ष पश्चिमी सभ्यतार् की देन है। माक्स ने इस संघर्ष क गहन विश्लेषण करके निष्कर्ष निकालार् है कि पूंजीपति वर्ग अधिक से अधिक लार्भ कमार्ने के उद्देश्य से श्रमिक वर्ग क शोषण करतार् है। श्रमिकों को मजदूरी कम दी जार्ती है और काम अधिक लियार् जार्तार् है। श्रमिक वर्ग अपने श्रम की पूरी मजदूरी प्रार्प्त करनार् चार्हतार् है। इस तरह दोनों के हितों में टकरार्व होने लग जार्तार् है। इस संघर्ष में श्रमिक वर्ग की स्थिति कमजोर होती है। श्रमिक को अपनार् तथार् अपने परिवार्र क पेट भरने के लिए श्रम को सस्ते दार्मों पर बेचनार् पड़तार् है। वह श्रम को अधिक दिन तक रोक नहीं सकतार् क्योंकि श्रम एक नार्शवार्न वस्तु है। यदि वह श्रम को रोकतार् है तो उसे भूखार् मरनार् पड़तार् है। उसकी इस मजबूरी से पूंजीपति वर्ग भली-भार्ंति जार्नतार् है। इसलिए वह उसे कम मजदूरी देकर उसक शोषण करतार् है। अत: श्रमिक पूंजीपति वर्ग के आगे झुक जार्ते हैं और पूंजीपति वर्ग कम वेतन पर उनसे काम करार्तार् है। उनके श्रम क शोषण करके पूंजीपति वर्ग विलार्सपूर्ण जीवन व्यतीत करतार् है। पूंजीपति वर्ग अनी आर्थिक शक्ति के बल पर रार्जनीतिक सत्तार् पर भी नियन्त्रण कर लेते हैं। धर्म जैसी सार्मार्जिक वस्तु पर भी उनक ही वर्चस्व स्थार्पित हो जार्तार् है। धर्म तथार् रार्जनीतिक सत्तार् क प्रयोग पूंजीपति वर्ग श्रमिक वर्ग क शोषण करने के लिए करतार् है। इस शोषण से मुक्ति पार्ने क एकमार्त्र उपार्य वर्ग-चेतनार् है। जब श्रमिक वर्ग पूंजीपति वर्ग के संगठित अत्यार्चार्रों के खिलार्फ आवार्ज उठार्ने लगतार् है तो क्रार्न्ति होती है। लेकिन उचित उपार्यों के अभार्वों में प्रार्य: श्रमिक वर्ग अपनी रार्जनीतिक शक्ति के बल पर यार् धर्म क भय दिखार्कर इस क्रार्न्ति यार् विद्रोह को दबार् देतार् है। ऐसी क्रार्न्ति कभी-कभार्र ही सफल होती है। जब यह सफल होती है तो समार्ज में महार्न परिवर्तन होते हैं। सार्मार्जिक, आर्थिक तथार् रार्जनीतिक सम्बन्धों की पुर्नस्थार्पनार् होती है। श्रमिक वर्ग क अधिनार्यवार्द स्थार्पित होतार् है और कालार्ंतर में शोषण मुक्त सार्म्यवार्दी समार्ज की रचनार् होती है। 1917 की रूस की तथार् चीन की क्रार्न्ति इसके प्रमुख उदार्हरण हैं।

माक्स क महनार् है कि एक दिन पूंजीपतियों और श्रमिकों के संघर्ष में अन्तिम विजय श्रमिकों की होगी क्योंकि पूंजीवार्द में उसके विनार्श के बीज निहित हैं, माक्स ने पूंजीवार्द के विनार्श के कारणों पर प्रकाश डार्लते हुए कहार् है-

  1. पूंजीवार्द में व्यक्तिगत लार्भ की दृष्टि से उत्पार्दन – पूंजीवार्दी व्यवस्थार् में उत्पार्दन समार्ज के हित और उपभोग को ध्यार्न में न रखकर विशेष रूप से व्यक्तिगत लार्भ के लिए होतार् है जिसके कारण समार्ज की मार्ंग और उत्पार्दित मार्ल (पूर्ति) में सन्तुलन खरार्ब हो जार्तार् है।
  2. पूंजीवार्द में विशार्ल उत्पार्दन तथार् स्वार्धिकार की ओर प्रवृत्ति – पूंजीवार्दी व्यवस्थार् में बड़े पैमार्ने पर उत्पार्दन एवं एकाधिकार की प्रवृत्ति पार्ई जार्ती है। जिसके कारण थोड़े-से व्यक्तियों के हार्थों में पूंजी आ जार्ती है और श्रमिकों की संख्यार् बढ़ती जार्ती है। इस तरह पूंजीपति वर्ग अपने विनार्श के लिए संघर्ष श्रमजीवी वर्ग को शक्ति प्रदार्न करतार् है।
  3. अतिरिक्त मूल्य पर पूंजीपतियों क अधिकार–माक्स क कहनार् है कि पूंजीवार्दी व्यवस्थार् में उत्पार्दन क उद्देश्य व्यक्तिगत लार्भ कमार्नार् होतार् है। इसलिए अतिरिक्त मूल्य को पूंजीपति श्रमिकों को न देकर अपने पार्स रख लेते हैं। जबकि न्यार्य सिद्धार्न्त की दृष्टि से इस पर श्रमिक क हक बनतार् है। यह अतिरिक्त मूल्य वह मूल्य है जो श्रमिक द्वार्रार् उत्पार्दित मार्ल की वार्स्तविक कीमत और उस वस्तु की बार्जार्र कीमत (Market Price) के मूल्य क अन्तर होतार् है। पूंजीपति इस अतिरिक्त मूल्य को अपनी जेब में रख लेतार् है। इससे श्रमिकों क शोषण होतार् है।
  4. पूंजीवार्द आर्थिक संकटों क जन्मदार्तार् है – माक्स कहतार् है कि पूंजीवार्दी उत्पार्दन प्रणार्ली समय-समय पर आर्थिक संकटों को जन्म देती हैं प्रार्य: उत्पार्दन श्रमिक वर्ग की क्रय शक्ति से अधिक हो जार्तार् है। तब लार्भ की कोई आशार् न रहने से पूंजीपति उत्पार्दित मार्ल को नष्ट करके मार्ल क कृत्रिम अभार्व उत्पन्न करते हैं और इस तरह अस्थार्यी संकटों को जन्म देते हैं। पूंजीवार्द की इस प्रवृत्ति के कारण श्रमिक वर्ग एवं सार्मार्न्य जनतार् में घोर असन्तोष पनपतार् है जो पूंजीवार्द द्वार्रार् स्वयं ही अपने विनार्श को बुलार्नार् है। अर्थार्त् यह आर्थिक संकटों क जन्मदार्तार् है।
  5. पूंजीवार्द में व्यक्तिगत तत्व क अन्त – माक्स के अनुसार्र पूंजीवार्दी व्यवस्थार् में श्रमिक के वैयक्तिक चरित्र क लोप होकर उसक मशीनीकरण हो जार्तार् है। पूंजीपति श्रमिकों के व्यक्तित्व विकास के लिए कोई योगदार्न नहीं देते। वे उनको मशीनों क दार्स बनार् देते हैं। उसकी सृजनार्त्मक शक्ति क लोप हो जार्तार् है, उसक जीवन निरन्तर पतन की तरफ जार् रहार् होतार् है। इस पतनार्वस्थार् क अन्त करने के लिए आखिरकार श्रमिक वर्ग में चेतनार् क उदय होने लगतार् है और पूंजीवार्द के विनार्श के बीज दिखार्ई देने लग जार्ते हैं।
  6. पूंजीवार्द श्रमिकों की एकतार् में सहार्यक है – पूंजीवार्दी व्यवस्थार् के दोषपूर्ण होने से श्रमिकों में असंतोष पैदार् होतार् है। इससे वे छुटकारार् पार्ने के लिए एकतार् क प्रयार्स करने लगते हैं। पूंजीवार्दी व्यवस्थार् में जहार्ं अनेक उद्योग एक ही स्थार्न पर एकत्र होते हैं, वहीं उनमें लार्खों काम करने श्रमिक भी आपस में अपने कष्टों के बार्रे में बार्तचीत करने लगते हैं। इससे दु:खों को दूर करने के लिए अर्थार्त् पूंजीपति वर्ग के शोषण से छुटकारार् पार्ने के लिए संगठन बनार्ने की दिशार् में प्रयार्स करने लग जार्ते हैं। इस तरह पूंजीवार्दी विकेन्द्रीकरण सुदृढ़ श्रमिक संगठनों को जन्म देतार् है और पूंजीवार्द क प्रखर आवार्ज में विरोध शुरू हो जार्तार् है।
  7. पूंजीवार्द अन्तर्रार्ष्ट्रीय श्रमिक आन्दोलन क जन्मदार्तार् है – पूंजीवार्द के दोष हर स्थार्न पर लगभग एक जैसे ही होते है। पूंजीवार्द क तीव्र विकास विश्व के अनेक देशों को समीप लार्तार् है। जब पूंजीवार्दी देश अपने उत्पार्दित मार्ल को अपने देश में खपार्ने में असफल रहते हैं तो वे अन्य देशों में मंडियों की खोज करते हैं। इससे श्रमिकों से अन्य देशों के श्रमिकों से सम्पर्क करने क अवसर प्रार्प्त मिलतार् है। इस तरह श्रमिक रार्ष्ट्रीय सीमार्ओं से बार्हर निकलकर अन्तर्रार्ष्ट्रीय मंच पर संगठित होने लग जार्ते हैं और श्रमिक आन्दोलन विश्वव्यार्पी रूप धार्रण कर लेतार् है। इस तरह माक्स क विश्वार्स है कि एक दिन विश्व में पूंजीवार्द के खिलार्फ एक अन्तर्रार्ष्ट्रीय मजदूर क्रार्न्ति होगी और पूंजीवार्द क विनार्श होकर उसके स्थार्न पर सार्म्यवार्दी समार्ज की स्थार्पनार् होगी। यही माक्स क यथाथ स्वप्न है।

इस तरह माक्स ने पूंजीवार्द के आंतरिक दोषों के कारण उसके विनार्श क स्वप्न देखार्। उसक विश्वार्स थार् कि श्रमिक वर्ग के संगठित होने पर सर्वहार्रार् क्रार्न्ति द्वार्रार् पूंजीवार्द की जड़ें उखड़ जार्एंगी और उसके स्थार्न पर श्रमिक वर्ग की तार्नार्शार्ही स्थार्पित हो जार्एगी। धीरे-धीरे पूंजीवार्द के अन्तिम अवशेष भी समार्प्त हो जार्एंगे और एक वर्ग-विहीन समार्ज की स्थार्पनार् होगी। इस समार्ज में प्रत्येक व्यक्ति अपनी योग्यतार्नुसार्र काम करेगार् और समार्ज उसे योग्यतार्नुसार्र काम देगार्, इसमें वर्ग-संघर्ष क अस्तित्व समार्प्त हो जार्एगार्। क्योंकि वर्ग विहीन यार् सार्म्यवार्दी समार्ज की स्थार्पनार् के उपरार्न्त समार्ज में केवल श्रमिक वर्ग ही शेष बचेगार्। पूंजीपति वर्ग क पूरी तरह सफार्यार् हो जार्एगार्। माक्स ने कहार् है-’’सार्म्यवार्दी समार्ज की उच्चतर स्थिति में जबकि व्यक्ति श्रम-विभार्जन की पतनकारी अधीनतार् से मुक्त हो जार्एगार् और जब उसके सार्थ ही बौद्धिक तथार् शार्रीरिक श्रम क विरोध भी समार्प्त हो जार्एगार्, जब श्रम जीवन क सार्धन ही नहीं बल्कि स्वयं जीव की सबसे बड़ी आवश्यकतार् बन जार्एगार्, जब व्यक्ति की समस्त शक्तियों के विकास से उत्पार्दन की शक्ति भी उतनी ही बढ़ सकेगी और सार्मार्जिक सम्पत्ति के समस्त स्रोत प्रचुरतार् से प्रवार्हित होने लगेंगे तभी पूंजीवार्दी औचित्य क सीमित क्षितिज पार्र कियार् जार् सकेगार् और समार्ज अपनी पतार्क पर यह अंकित कर सकेगार् कि प्रत्येक अपनी योग्यतार् के अनुसार्र कार्य करें और प्रत्येक अपनी आवश्यकतार् के अनुसार्र प्रार्प्त करे।’’ यही सार्म्यवार्दी समार्ज की स्थार्पनार् की स्थिति होगी।

वर्ग-संघर्ष सिद्धार्न्त की आलोचनार्एं

  1. वर्ग की अस्पष्ट एवं दोषपूर्ण परिभार्षार् –माक्स द्वार्रार् दी गई वर्ग की परिभार्षार् के अनुसार्र आधुनिक समार्ज में मजदूरों और पूंजीपतियों के दो स्पष्ट वर्ग निश्चित नहीं किए जार् सकते। आजकल उद्योगों में काम करने वार्ले अनेक मजदूर कम्पनियों के शेयर खरीदकर उद्योगों में हिस्सेदार्र बन जार्ते हैं और अतिरिक्त मूल्य के रूप में लार्भ ग्रहण करने वार्ले पूंजीपति बन जार्ते हैं। इसी तरह उद्योगों के प्रबन्धकों को किस श्रेणी में रखार् जार्ए? उन्हें न तो पूंजीपति वर्ग कहार् जार् सकतार् है और न ही मजदूर। सेबार्इन ने कहार् है कि-’’माक्स के सार्मार्जिक वर्ग की धार्रणार् की अस्पष्टतार् उसकी भविष्यवार्णी की कुछ गम्भीर गलतियों के लिए उत्तरदार्यी है।’’ अत: कहार् जार् सकतार् है कि माक्स के ‘वर्ग’ की परिभार्षार् अस्पष्ट व दोषपूर्ण है।
  2. मार्नव इतिहार्स केवल वर्ग-संघर्ष क इतिहार्स नहीं है – माक्स क यह कथन कि आज तक क मार्नव इतिहार्स वर्ग-संघर्ष क इतिहार्स है, थथाथ स्थिति को स्पष्ट नहीं करतार्। इसमें सन्देह नहीं है कि इतिहस युद्धों से भरार् पड़ार् है। लेकिन ये सभी युद्ध वर्ग-संघर्ष की श्रेणी में नहीं रखे जार् सकते। इनमें से अधिकतर युद्धों क उद्देश्य आर्थिक न होकर समार्न स्थिति वार्ले शार्सकों के बीच हुए हैं। प्रार्चीन व मध्ययुगीन के अनेक संघर्ष रार्जार्ओं के मध्य हुए हैं। डॉ0 रार्धार्कृष्ण ने वर्ग-संघर्ष की अवधार्रणार् की समीक्षार् करते हुए कहार् है-’’इतिहार्स केवल वर्ग-संघर्ष क ही लेखार्मार्त्र नहीं है। शब्दों के युद्ध, वर्गों के युद्ध की अपेक्षार् अधिक हिंसक और अधिक सार्मार्न्य रहे हैं। गत महार्युद्धों में रार्ष्ट्रीयतार् की भार्वनार् वर्गीयतार् की भार्वनार् की अपेक्षार् अधिक शक्तिशार्ली थी। इतिहार्स में शार्सक और शार्सित, उमीर और गरीब, सदैव ही अपने देश के शत्रुओं से एकमत होकर लड़े हैं। हम अपने देश के पूंजीवार्दी मार्लिकों की अपेक्षार् विदेश के श्रमिकों से अधिक घृणार् करते हैं। इतिहार्स में धर्म के नार्म पर लड़ार्ईयार्ं हुई हैं-पिछले युद्ध में माक्सवार्दी दो-चार्र अपवार्दों को छोड़कर अपने-अपने पूंजीवार्दी रार्ज्यों की ओर से लड़े थे। भार्रत में हिन्दू-मुसलमार्नों की समस्यार् अथवार् आयरलैण्ड में कैथोलिक और प्रोटेस्टेंटों की समस्यार्, वर्ग संघर्ष की समस्यार् नहीं है। अत: वर्ग-संघर्ष की अपेक्षार् अन्य तत्वों रार्ष्ट्रीयतार्, धर्म व संस्कृति ने भी इतिहार्स क निर्मार्ण कियार् है।
  3. समार्ज में दो वर्ग मार्ननार् भूल है – आलोचकों क कहनार् है कि समार्ज में केवल दो ही वर्ग नहीं होते। पूंजीपति व श्रमिक वर्ग के अतिरिक्त एक मध्यम वर्ग (बुद्धिजीवी) भी होतार् है। यह वर्ग समार्ज के विकास क माग प्रशस्त करतार् है। समार्ज की प्रगति बुद्धिजीवी वर्ग पर ही निर्भर करती है। इसके अन्तर्गत इंजीनियर, वकील, डॉक्टर, अध्यार्पक व तकनीशियन आदि आते हैं। इस वर्ग की संख्यार् लगार्तार्र बढ़ रही है। इस वर्ग क होनार् माक्स के वर्ग-संघर्ष के सिद्धार्न्त क खण्डन करतार् है। अत: माक्स द्वार्रार् समार्ज क दो वर्गों में कियार् गयार् विभार्जन गलत है। समार्ज में दो के स्थार्न पर कई वर्ग हैं।
  4. संघर्ष जीवन क मूल आधार्र नहीं है – माक्स क कहनार् है कि संघर्ष जीवन क आधार्र है। इसी पर जीवन क अस्तित्व निर्भर करतार् है। किन्तु सत्य तो यह है कि संघर्ष की बजार्य प्रेम, त्यार्ग, सहयोग, सहार्नुभूति, अहिंसार् आदि के ऊपर सम्पूर्ण मार्नव समार्ज क अस्तित्व निर्भर करतार् है। आर्थिक क्षेत्र में भी संघर्ष की बजार्य आपसी सहयोग व शार्ंतिपूर्ण वार्तार्वरण में ही उत्पार्दन सम्भव है। 
  5. क्रार्न्ति क नेतृत्व मध्यम वर्ग करतार् है – माक्स क कहनार् गलत है कि श्रमिक वर्ग ही क्रार्न्ति क आधार्र होतार् है और भविष्य में भी सर्वहार्रार् वर्ग ही क्रार्न्ति क बिगुल बजार्एगार्। सत्य तो यह है कि आज तक जितनी भी क्रार्न्तियार्ं हुई हैं, उन सबक नेतृत्व बुद्धिजीवियों ने कियार् थार्, न कि श्रमिकों ने। लेनिन ने स्वयं इस बार्त को स्वीकार करते हुए कहार् है-’’हमने कहार् थार् कि मजदूर लोग अब तक इस योग्य नहीं है कि उनमें समार्जवार्दी चेतनार् उत्पन्न हो सके। उनके अन्दर यह चेतनार् केवल बार्हर से ही लार्ई जार् सकती है। सभी देशों के इतिहार्सों से प्रमार्णित होतार् है कि अपने अनन्य प्रयत्नों से मजदूर वर्ग केवल मजदूर सभार्ई चेतनार् विकसित कर सकतार् है, जिसे समार्जवार्दी मोड़ देने के लिए संगठित ‘बौद्धिक दल’ क अस्तित्व आवश्यक है।’’ रुस और चीन की क्रार्न्तियों को सफल बनार्ने में लेनिन तथार् मार्ओ जैसे बुद्धिजीवियों की भूमिक अधिक महत्वपूर्ण रही है।
  6. रार्ष्ट्रीयतार् की भार्वनार् को कम महत्व देनार् – माक्स ने कहार् है कि समार्ज के सभी वर्गों में वर्गीयतार् की भार्वनार् ही सर्वार्धिक प्रबल होती है। सत्य तो यह है कि रार्ष्ट्रीयतार् की भार्वनार् वर्गीयतार् की भार्वनार् से ऊपर होती है। द्वितीय विश्वयुद्ध में धुरी रार्ष्ट्रों (जार्पार्न, इटली व जर्मनी) की महत्वपूर्ण भूमिक वर्गीयतार् की अपेक्षार् उग्र-रार्ष्ट्रीयतार् की भार्वनार् पर आधार्रित थी। जर्मनी में यहुदियों पर हिटलर द्वार्रार् किए गए अत्यार्चार्र वर्ग-संघर्ष क परिणार्म न होकर हिटलर की जार्तीय-श्रेष्ठतार् की भार्वनार् क परिणार्म थार्। युद्ध के समय एक देश के अन्दर ही पूंजीपति व मजदूर दोनों वर्ग एक जगह संगठित होकर दूसरे देश के पूंजीपतियों व मजदूरों क विरोध करने लगते हैं। इसके पीछे मुख्य कारण रार्ष्ट्रवार्द की भार्वनार् ही कार्य करती है।
  7. आर्थिक व सार्मार्जिक वर्ग क अलग होनार् – आलोचकों क कहनार् है कि सार्मार्जिक और आर्थिक वर्ग एक न होकर अलग-अलग होते हैं। यद्यपि यह भी सम्भव है कि माक्स ने दोनों को एक मार्नकर उनक रार्जनीतिक दृष्टि से सही प्रयोग करने क प्रयार्स कियार् होगार्। किन्तु उसक यह प्रयार्स अनेक त्रुटियों क जन्मदार्तार् बन गयार् है।
  8. माक्स की भविष्यवार्णी गलत सार्बित हुई – माक्स ने भविष्यवार्णी की थी कि एक दिन पूंजीवार्द क अन्त होगार् और उसके स्थार्न पर सर्वहार्रार् वर्ग क अधिनार्यत्व स्थार्पित होगार्। उसकी यह भविष्यवार्णी गलत सार्बित हुई। आज अनेक पूंजीवार्दी देश तेजी से अपनार् विकास कर रहे हैं। वहार्ं पर उनके श्रमिक वर्ग के सार्थ सम्बन्ध अच्छे हैं। आज अनेक पूंजीवार्दी देशों में मजदूरों की दशार् तेजी से सुधर रही हैं वे मजदूरों को उचित वेतन देकर श्रमिक-असंतोष को कम कर रहे हैं। वहार्ं पर निकट भविष्य में किसी संगठित श्रमिक आन्दोलन की संभार्वनार् नजर नहीं आ रही है। रुस जहार्ं पर श्रमिक तार्नार्शार्ही द्वार्रार् सार्म्यवार्द की स्थार्पनार् हुई थी, वह भी टूटकर अधिक उदार्रवार्दी व्यवस्थार् की तरफ अग्रसर हो रहार् है। आज उत्पार्दन प्रणार्ली में पूंजीपति वर्ग और श्रमिक वर्ग के अलार्वार् तीसरार् वर्ग (बुद्धिजीवी) भी तेजी से उभर चुक है। जर्मनी और इटली में पूंजीवार्द क अन्त होने पर सार्म्यवार्द के स्थार्न पर नार्जीवार्द व फार्सीवार्द क विकास हुआ। ये दोनों विचार्रधार्रार्एं सार्म्यवार्द विरोधी थी। इस प्रकार माक्स क यह कथन असत्य सिद्ध हुआ कि वर्ग-संघर्ष के परिणार्मस्वरूप सार्म्यवार्द की स्थार्पनार् होगी।
  9. यह सिद्धार्न्त हार्निकारक है – कैटलिन ने माक्स के वर्ग-संघर्ष के सिद्धार्न्त की आलोचनार् करते हुए कहार् है कि यह सिद्धार्न्त आधुनिक कष्टों, दु:खों, रोगों और फार्सीवार्द क जनक है। उसने स्पष्ट शब्दों में कहार् है कि-’’मैं माक्स पर यह आरोप लगार्तार् हूं कि उसने द्वन्द्वार्त्मक प्रतिक्रियार् के द्वार्रार् फार्सीवार्द और संघर्ष को जन्म दियार् है, जो बीसवीं शतार्ब्दी के कई कष्टों क कारण है।’’ लार्स्की ने भी कहार् है-’’पूंजीवार्द की समार्प्ति से सार्म्यवार्द की अपेक्षार् अरार्जकतार् फैल सकती है जिससे सार्म्यवार्दी आदर्शों से बिल्कुल असम्बन्धित कोई तार्नार्शार्ही जन्म ले सकती है।’’ इस प्रकार हम कह सकते हें कि माक्स क वर्ग-संघर्ष क सिद्धार्न्त अनेक कष्टों को जन्म दे सकतार् है। इसलिए यह हार्निकारक सिद्धार्न्त है।

उपरोक्त आलोचनों के आधार्र पर कहार् जार् सकतार् है कि माक्स क वर्ग-संघर्ष क सिद्धार्न्त सही नहीं है। प्रो0 हंट ने इसे एक कल्पनार् कहार् है। प्लैमनस्ज इसे विरोधार्भार्सी सिद्धार्न्त क नार्म देतार् है। यदि हम माक्स के इस सिद्धार्न्त को स्वीकार कर ले तो समार्ज में अरार्जकतार् फैल जार्एगी और मार्नव-समार्ज संघर्षों क अखार्ड़ार् बन जार्एगार्। दूसरी तरफ एक महत्वपूर्ण बार्त यह भी है कि माक्स की भविष्यवार्णी गलत सार्बित हुई है कि पूंजीपति वर्ग क लोप हो जार्एगार्। यह भी आवश्यक नहीं है कि पूंजीवार्द क अन्त होने पर सार्म्यवार्दी व्यवस्थार् ही स्थार्पित हो। केरयु हण्ट इसे वैज्ञार्निक आधार्र पर मिथ्यार् मार्नते हैं। इस सिद्धार्न्त के आधार्र पर वर्ग-व्यवस्थार् क उचित विश्लेषण करनार् असम्भव है।

परन्तु अनेक कमियों के बार्वजूद यह सिद्धार्न्त इस व्यार्वहार्रिक रार्जनीतिक सत्य को प्रकट करतार् है कि यदि पूंजीवार्दी व्यवस्थार् के अन्तर्गत श्रमिकों क लगार्तार्र अमार्नवीय शोषण एवं क्रुर दमन होतार् रहेगार् तो इस अन्यार्यपूर्ण स्थिति के अन्त के लिए श्रमिक वर्ग द्वार्रार् उग्र वर्ग-संघर्ष के रूप में खूनी-संघर्ष यार् क्रार्न्ति क होनार् अनिवाय है। वस्तुत: 19वीं सदी की उग्र एवं क्रुर पूंजीवार्दी व्यवस्थार् के प्रसंग में माक्स के वर्ग-संघर्ष क विशिष्ट महत्व थार् और उसके इन विचार्रों ने पूंजीवार्द पर निरन्तर दबार्व बनार्ए रखने क कार्य भी कियार्, जिसके परिणार्मस्वरूप पूंजीवार्दियों ने श्रमिक वर्ग के कष्टों की ओर ध्यार्न दियार् और कल्यार्ण की योजनार्एं क्रियार्न्वित की। रुस में 1917 की सर्वहार्रार् क्रार्न्ति की सफलतार् के बार्द विश्व में मजदूरों और किसार्नों के सम्मार्न में वृद्धि हुई। इस प्रकार अनेक दोषों के बार्वजूद यह कहार् जार् सकतार् है कि माक्स के वर्ग-संघर्ष सिद्धार्न्त क अपनार् विशेष महत्व है।

माक्स क अतिरिक्त मूल्य क सिद्धार्न्त

अतिरिक्त मूल्य क सिद्धार्न्त कार्ल माक्स की रार्जनीतिक सिद्धार्न्त को एक महत्वपूर्ण देन है। माक्स ने इस सिद्धार्न्त क विवेचन अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘Das Capital’ में कियार् है। माक्स ने पूंजीपति वर्ग द्वार्रार् श्रमिक वर्ग क शोषण करने की प्रक्रियार् पर इस सिद्धार्न्त में व्यार्पक प्रकाश डार्लार् है। माक्स क यह सिद्धार्न्त ‘मूल्य के श्रम सिद्धार्न्त’ (Labour Theory of Value) पर आधार्रित है। सेबार्इन ने लिखार् है-’’अतिरिक्त मूल्य क सिद्धार्न्त प्रकट रूप में मूल्य के श्रमिक सिद्धार्न्त क ही प्रसार्र थार् जिसे रिकार्डों तथार् संस्थार्पित अर्थशार्स्त्रियों ने बनार्यार् थार्। अगर मूल्य क श्रमिक सिद्धार्न्त नहीं होगार् तो अतिरिक्त मूल्य क सिद्धार्न्त भी नहीं होगार्। अत: अतिरिक्त मूल्य क सिद्धार्न्त श्रम सिद्धार्न्त क ही वंशज है।’’ यह सिद्धार्न्त सबसे पहले पैन्टी ने इंग्लैण्ड में प्रस्तुत कियार् थार्। इसे बार्द में एडमस्थिम तथार् रिकार्डों ने विकसित कियार्। इन दोनों अर्थशार्स्त्रियों ने निष्कर्ष प्रस्तुत कियार् कि श्रम ही मूल्य क स्रोत हैं श्रम के बिनार् मूल्य क कोई महत्व नहीं हो सकतार्। प्रो0 वेपर ने भी माक्स के मूल्य सिद्धार्न्त पर रिकार्डों क प्रभार्व स्वीकार करते हुए लिखार् है-’’माक्स क अतिरिक्त मूल्य क सिद्धार्न्त रिकार्डों क ही व्यार्पक रूप है जिसके अनुसार्र किसी भी वस्तु क मूल्य उसमें निहित श्रम की मार्त्रार् के अनुपार्त में होतार् है, बशर्तें कि यह श्रम-उत्पार्दन की क्षमतार् के वर्तमार्न स्तर के समार्न हो।’’

अतिरिक्त मूल्य के सिद्धार्न्त की व्यार्ख्यार्

माक्स क कहनार् है कि पूंजीपतियों क धन असंख्य वस्तुओं क जमार् भंडार्र है। इन सभी वस्तुओं की अपनी कीमत होती है। श्रम भी एक ऐसी ही वस्तु है। श्रम अन्य सभी वस्तुओं के मूल्य निर्धार्रित करतार् है। किसी वस्तु क मूल्य उसकी उपयोगितार् की मार्त्रार् क अनुमार्न लगार्ने के बार्द ही निर्धार्रित हो जार्तार् है। उपयोगितार् की मार्त्रार् क अनुमार्न किसी अन्य वस्तु से उसके विनिमय मूल्य पर ही आधार्रित होतार् है। इस तरह मूल्य सिद्धार्न्त के बार्रे में जार्नने के लिए किसी वस्तु के उपयोग मूल्य तथार् विनिमय मूल्य की अवधार्रणार् के बार्रे में जार्ननार् आवश्यक हो जार्तार् है। माक्स ने ‘अतिरिक्त मूल्य सिद्धार्न्त’ क प्रतिपार्दन करने के लिए इन दोनों मूल्यों की विस्तृत विवेचनार् की है।

  1. उपयोग-मूल्य (Use – Value)
  2. विनिमय-मूल्य (Exchange Value)

माक्स ने उपयोग मूल्य तथार् विनिमय मूल्य में व्यार्पक आधार्र पर अन्तर कियार् है। उसक कहनार् है कि उपयोग मूल्य किसी वस्तु की मार्नव आवश्यकतार्ओं को सन्तुष्ट करने में ही निहित है। उपयोगितार् क अर्थ है मनुष्य की इच्छार् पूरी करनार्, जो वस्तुएं मनुष्य की इच्छार् पूरी करती है, वे उसके लिए उपयोगी व मूल्यवार्न है। उदार्हरणाथ-रेगिस्तार्न में पार्नी कम और रेत अधिक होतार् है। वहार्ं रेत की बजार्य पार्नी की उपयोगितार् अधिक है, क्योंकि पार्नी मनुष्य की प्यार्स बुझार्ार्तार् है। अपनी उपयोगितार् के कारण वहार्ं पार्नी रेत से अधिक मूल्यवार्न होतार् है। ‘‘विनिमय मूल्य’’ यह अनुपार्त है जिसके आधार्र पर एक वस्तु के बदले दूसरी वस्तु को प्रार्प्त कियार् जार् सकतार् है। उदार्हरण के लिए किसी व्यक्ति के पार्स घी है और किसी दूसरे के पार्स तेल है। यदि एक को घी की अपेक्षार् तेल की आवश्यकतार् है और दूसरे को तेल की बजार्य घी आवश्यकतार् है तो दोनों आपस में वस्तु विनिमय कर सकते हैं। एक व्यक्ति एक किलो घी देकर 4 किलो तेल प्रार्प्त करतार् है तो एक किलो घी क विनिमय मूल्य 4 किलो तेल होगार्।

माक्स ने किसी वस्तु के उपयोग मूल्य की तुलनार् में विनिमय मूल्य को अधिक महत्व दियार् है। यही मूल्य क मार्पदण्ड है। माक्स ने इन दोनों मूल्यों से श्रम को अधिक महत्वपूर्ण मार्नते हुए कहार् है कि श्रम ही वस्तुओं क विनिमय मूल्य निश्चित करतार् है। अर्थार्त् किसी वस्तु क विनिमय मूल्य उस वस्तु के ऊपर लगार्ए गए श्रम की मार्त्रार् के ऊपर निर्भर करतार् है। इसे श्रम सिद्धार्न्त कहार् जार्तार् है। माक्स ने उदार्हरण देकर स्पष्ट कियार् है कि जमीन में दबार् हुआ कोयलार् उपयोगी होने के कारण उपयोग मूल्य तो रखतार् है लेकिन जब तक उसे जमीन से खोदकर बार्हर नहीं निकालार् जार्तार् है, जब तक उससे मशीन नहीं चलार्ई जार् सकती है। अत: इस उद्देश्य से कोयले को जमीन से बार्हर निकालने के लिए जो श्रम कियार् जार्तार् है, वही उसक ‘विनिमय मूल्य’ (Exchange Value) निर्धार्रित करतार् है। इससे स्पष्ट है कि जब तक किसी प्रार्कृतिक पदाथ पर मार्नव श्रम व्यय न हो तो वह पदाथ विनिमय मूल्य से रहित होतार् है। मार्नव श्रम लगने पर ही उसक विनिमय मूल्य पैदार् होतार् है। इस आधार्र पर माक्स कहतार् है कि प्रत्येक वस्तु क वार्स्तविक मूल्य वह श्रम है जो उसे मार्नव उपयोगी बनार्ने के लिए उस पर व्यय कियार् जार्तार् है, क्योंकि वही ‘विनिमय मूल्य’ पैदार् करतार् है।

अतिरिक्त मूल्य (Surplus Value)– इस तरह माक्स श्रम को मूल्य क निर्धार्रक तत्व मार्नतार् है और उसके आधार्र पर ही अपने अतिरिक्त मूल्य के सिद्धार्न्त की व्यार्ख्यार् करतार् है। माक्स कहतार् है कि पूंजीवार्दी व्यवस्थार् में श्रमिक को विनिमय मूल्य के बरार्बर वेतन नहीं मिलतार् है, अपितु उसकी तुलनार् में काफी कम वेतन मिलतार् है। इस तरह सम्पूर्ण विनिमय के अधिकतर भार्ग को पूंजीपति हड़प जार्तार् है। यह पूंजीपति द्वार्रार् हड़पार् जार्ने वार्लार् मूल्य यार् लार्भ ही अतिरिक्त मूल्य कहलार्तार् है। माक्स के अनुसार्र-’’अतिरिक्त मूल्य उन दो मूल्यों में से यदि हम विनिमय मूल्य में से श्रमिक के वेतन को घटार् दें, तो जो रार्शि (मूल्य) बचती है, उसे ही अतिरिक्त मूल्य (Surplus – Value) कहार् जार्तार् है।’’ उसने आगे कहार् है कि, ‘‘यह धन दो मूल्यों क अन्तर है, जिसे मजदूर पैदार् करतार् है और जिसे वह वार्स्तव में पार्तार् है।’’ अर्थार्त् यह वह मूल्य है, जिसे प्रार्प्त कर पूंजीपति मजदूर को कोई मूल्य नहीं चुकातार्। मैकसी ने भी कहार् है कि-’’यह वह मूल्य है, जिसे पूंजीपति श्रमिकों के खून-पसीने की कमार्ई पर ‘पथ कर’ (Toll Tax) के रूप में वसूलतार् है।’’ माक्स के ‘अतिरिक्त मूल्य के सिद्धार्न्त’ को इस उदार्हरण द्वार्रार् समझार्यार् जार् सकतार् है। मार्न लीजिए एक श्रमिक 8 घण्टे काम करके एक दरी बनार्तार् है जिसक विनिमय मूल्य 400 रु0 है। इसमें से श्रमिक को मार्त्र 100 रु0 ही मजदूरी के तौर पर मिलते हैं। इसक अर्थ यह है कि श्रमिक को केवल 2 घण्टे के श्रम के बरार्बर मजदूरी मिली। शेष 6 घण्टे क श्रम (300 रुपए) पूंजीपति ने स्वयं हड़प लियार्। माक्स के इस सिद्धार्न्त के अनुसार्र यह 300 रुपए अतिरिक्त मूल्य है, जिस पर श्रमिक क ही अधिकार होनार् चार्हिए। किन्तु व्यवहार्र में पूजीपति इस मूल्य को अपनी जेब में रख लेतार् है। उसे केवल पेटभर मजदूरी ही देकर उसक भरपूर शोषण करतार् है तार्कि वह काम करने योग्य शरीर क स्वार्मी बन कर रह सके। इसे ‘मजदूरी क लौह नियम’ कहार् जार्तार् है। इसी के आधार्र पर पूंजीपति श्रमिक क वेतन निश्चित करके अतिरिक्त मूल्य पर अपनार् अधिकार बनार्ए रखतार् है। पूंजीपति की हादिक इच्छार् यही होती है कि अतिरिक्त मूल्य में वृद्धि हो जार्ए। इस इच्छार् क परिणार्म, श्रमिकों के शोषण के रूप में निकलतार् है। माक्स क कहनार् है कि श्रमिकों के शोषण को रोकने क एकमार्त्र उपार्य ‘अतिरिक्त मूल्य’ श्रमिकों की जेब में जार्नार् है। क्योंकि किसी वस्तु के उत्पार्दन में श्रम ही सब कुछ होतार् है।

अतिरिक्त मूल्य सिद्धार्न्त के निहिताथ

  1. श्रम ही किसी वस्तु क मूल्य निर्धार्रक है। विनिमय मूल्य श्रम पर ही आधार्रित होतार् है।
  2. समस्त विनिमय मूल्य पर केवल श्रमिक क अधिकार होतार् है, किन्तु व्यवहार्र में उसे वेतन के रूप में थोड़ार् सार् ही भार्ग मिलतार् है।
  3. व्यवहार्र में विनिमय मूल्य पर पूंजीपति क ही अधिकार होतार् है।
  4. अतिरिक्त मूल्य विनिमय मूल्य क वह भार्ग है जो श्रमिक को नहीं दियार् जार्तार् है तथार् जिसे स्वयं पूंजीपति अपने पार्स रख लेतार् है। यह पूंजीपति द्वार्रार् श्रमिक के धन की चोरी है और इस चोरी के कारण ही पूंजीपति को बड़ार् फार्यदार् होतार् है और उसके पार्स पूजी क संचय बढ़तार् है।
  5. पूंजीवार्द श्रमिकों के घोर शोषण पर खड़ार् है, जो एक अन्यार्यपूर्ण अवस्थार् है इसलिए इसके विरुद्ध क्रार्न्ति की जार्नी चार्हिए।

‘अतिरिक्त मूल्य के सिद्धार्न्त’ की आलोचनार्एं

अतिरिक्त मूल्य क सिद्धार्न्त बार्हर से तो अति आकर्षक व सुन्दर दिखार्ई देतार् है। लेकिन वैज्ञार्निक दृष्टि से इसक विश्लेषण करने पर इसमें अनेक कमियार्ं पार्ई जार्ती हैं, इसलिए यह सिद्धार्न्त आलोचनार् क शिकार बन गयार् है। बीयर ने इसकी आलोचनार् करते हुए कहार् है कि माक्स क यह सिद्धार्न्त अर्थ-शार्स्त्रीय सच्चार्ई की अपेक्षार् सार्मार्जिक यार् रार्जनीतिक नार्रे से अधिक महत्व नहीं रखतार् है। माक्स के इस सिद्धार्न्त की आलोचनार् के प्रमुख आधार्र हैं-

  1. पक्षपार्त पूर्ण दृष्टिकोण – माक्स के अनुसार्र श्रम ही किसी वस्तु क मूल्य निर्धार्रित करतार् है। अर्थार्त् श्रम ही एकमार्त्र मूल्य-निर्धार्रक तत्व है। इसलिए माक्स ने उत्पार्दन के अन्य सार्धनों, भूमि, पूंजी, मशीनों आदि की घोर उपेक्षार् की है। उत्पार्दन में इन सार्धनों की भूमिक बहुत अधिक महत्वपूर्ण होती है। इनके अभार्व में उत्पार्दन की कल्पनार् करनार् असम्भव है। माक्स ने श्रम को अधिक महत्व देकर अन्य सार्धनों के सार्थ भेदभार्व करतार् है। इसलिए माक्स क अन्य सार्धनों के प्रति भेदभार्वपूर्ण दृष्टिकोण सार्फ झलकतार् है।
  2. मार्नसिक श्रम की उपेक्षार् – माक्स ने अपने इस सिद्धार्न्त में शार्रीरिक श्रम को अधिक महत्व दियार् है। आलोचकों क कहनार् है कि उत्पार्दन की वृद्धि में तकनीकी ज्ञार्न, प्रबन्ध कुशलतार् तथार् व्यार्वसार्यिक कुशलतार् आदि क भी बहुत बड़ार् योगदार्न होतार् है। मार्नसिक श्रम ही किसी वस्तु के निर्मार्ण व उसके तैयार्र होने पर बेचने के लिए उपयुक्त बार्जार्र की तलार्श करतार् है। मार्नसिक शक्ति ही किसी उद्योग के फार्यदे व धनी के बार्रे में विचार्र कर सकती है। लेकिन माक्स ने मार्नसिक श्रम को महत्व देकर बड़ी भूल की है।
  3. उत्पार्दन पर व्यय क वर्णन नहीं – माक्स ने वस्तुओं के उत्पार्दन में पूंजीपति द्वार्रार् किए गए व्यय क कोई ब्यौरार् इस सिद्धार्न्त में नहीं दियार् है। पूंजीपति को अतिरिक्त मूल्य की रार्शि श्रमिकों के उत्तम जीवन, बेकारी व बोनस, मशीनों की घिसार्वट आदि के सुधार्र पर व्यय करनार् पड़तार् है। अत: माक्स क यह कहनार् गलत है कि पूंजीपति अतिरिक्त मूल्य के अधिकतर हिस्से को हड़प जार्तार् है।
  4. प्रचार्रार्त्मक अधिक, आर्थिक कम – प्रो . केरयु हण्ट क विचार्र है कि-’’माक्स क अतिरिक्त मूल्य क सिद्धार्न्त किसी भी रूप में ‘मूल्य क सिद्धार्न्त नहीं है।’ यह वार्स्तव में ‘‘शोषण क सिद्धार्न्त’’ है, जिसके द्वार्रार् यह दिखार्ने की चेष्टार् की गई है कि सार्धन सम्पन्न वर्ग सदैव ही सार्धनहीन वर्ग के श्रम पर जीवित रहतार् है।’’ मैकस बियर ने भी कहार् है-’’इस विचार्र को अस्वीकार करनार् असम्भव है कि माक्स क सिद्धार्न्त आर्थिक सत्य के स्थार्न पर रार्जनीतिक और सार्मार्जिक नार्रेबार्जी है।’’
  5. अस्पष्ट सिद्धार्न्त – अलेकजैण्डर ग्रे (Alexander Grey) ने कहार् है कि क्यार् कोई भी हमें यह बतार् सकतार् है कि मूल्य से माक्स क वार्स्तव में क्यार् अभिप्रार्य थार्? इसके अलार्वार् माक्स ने जिन पूंजीपतियों व मजदूरों क उल्लेख कियार् है, वे न जार्ने किस लोक से सम्बन्ध रखते हैं। माक्स ने मूल्य, दार्म आदि शब्दों क प्रयोग बड़े मनमार्ने व अनिश्चित ढंग से कियार् है। माक्स के विचार्रों की अस्पष्टतार् इस बार्त से सिद्ध हो जार्ती है-’’मजदूरी दुगने यार् तिगुने कर दीजिए मुनार्फार् स्वयंमेव ही दुगुनार् हो जार्एगार्।’’ बिनार् कुशलतार् व तकनीकी ज्ञार्न के मुनार्फे में वृद्धि होनार् असम्भव है। लेकिन माक्स इतनी बड़ी अस्पष्ट व असंगत बार्त सरलतार् से कह दी। इस तरह माक्स ने आर्थिक शब्दों व आर्थिक प्रक्रियार् की मनमार्नी व्यार्ख्यार् करके इस सिद्धार्न्त को भ्रार्ंतिपूर्ण बनार् दियार् है।
  6. सार्मार्जिक हित न कि आर्थिक हित क सिद्धार्न्त – सेबार्इन ने कहार् है कि-’’माक्स के मूल्य-सिद्धार्न्त क प्रयोजन विशुद्ध रूप से आर्थिक न होकर नैतिक थार्, क्योंकि माक्स के मूल्य क सिद्धार्न्त कीमतों क सिद्धार्न्त नहीं, बल्कि सार्मार्जिक हित एवं ‘मार्नव मूल्य’ क सिद्धार्न्त थार्।’’ बीयर ने भी इसकी पुष्टि करते हुए कहार् है कि यह सिद्धार्न्त सार्मार्जिक यार् रार्जनीतिक नार्रे से अधिक महत्व नहीं रखतार् है। यह सिद्धार्न्त मजदूरों के शोषण क इतनार् अधिक वर्णन करतार् है कि यह आर्थिक हित की बजार्य सार्मार्जिक हित की बार्त करतार् प्रतीत होतार् है।
  7. गलत धार्रणार्ओं पर आधार्रित – माक्स क अतिरिक्त मूल्य क सिद्धार्न्त कई गलत धार्रणार्ओं पर आधार्रित है। उदार्हरण के रूप में-’’माक्स ने कहार् है कि ‘अतिरिक्त मूल्य’ पर श्रमिक क अधिकार होनार् चार्हिए। यदि माक्स की इस बार्त को मार्न लियार् जार्ए तो पूंजीपति उत्पार्दन क्यों करेंगे? कोई भी व्यक्ति लार्भ कमार्ने के उद्देश्य से ही उत्पार्दन करतार् है। यदि सार्रार् लार्भ उसकी जेब में जार्ने की बजार्य किसी वर्ग विशेष के पार्स जार्एगार् तो उसके दिमार्ग में कमी नहीं है कि वह उत्पार्दन जार्री रखेगार्। इस तरह गलत धार्रणार्ओं पर आधार्रित होने के कारण भी यह सिद्धार्न्त आलोचनार् क शिकार हुआ है।
  8. मौलिकतार् क अभार्व – माक्स ने यह सिद्धार्न्त अन्य अर्थशार्स्त्रियों रिकार्डों तथार् एडम स्मिथ के श्रम सिद्धार्न्त पर आधार्रित कियार् है। इसलिए यह सिद्धार्न्त माक्स क मौलिक सिद्धार्न्त न होने के कारण अनेक भ्रार्ंतियों क जनक बन गयार् और आलोचनार् क शिकार हुआ।

इस तरह माक्स क अतिरिक्त मूल्य क सिद्धार्न्त उत्पार्दन के विभिन्न पहलुओं की उपेक्षार् करने के कारण अनेक आलोचनार्ओं क शिकार हुआ है। अनेक आलोचकों ने तो इसके नार्मकरण पर ही आपत्ति जतार्यी है। उन्होंने कहार् है कि इस सिद्धार्न्त क उद्देश्य शोषण दिखार्नार् है, पूंजीपति क चरित्र दिखार्नार् है तथार् समार्जवार्द द्वार्रार् कारीगर क शोषण रोकनार् है, इसलिए इसक नार्म शोषण क सिद्धार्न्त होनार् चार्हिए न कि अतिरिक्त मूल्य क सिद्धार्न्त। लेकिन अनेक दोषों के बार्वजूद भी यह कहनार् पड़ेगार् कि शोषण के एक सिद्धार्न्त के रूप में यह सिद्धार्न्त आज भी उतनार् ही सही है जितनार् कि माक्स के समय में थार् क्योंकि माक्सवार्द के सभी आलोचकों के द्वार्रार् इस बार्त को स्वीकार कियार् गयार् है कि पूंजीवार्दी व्यवस्थार् में श्रमिक को अपनार् उचित अंश प्रार्प्त नहीं होतार्।

पोपर क कहनार् है कि-’’यदि माक्स क यह विश्लेषण दोषपूर्ण है लकिन शोषण क वर्णन करने के लिए यह आज भी काफी सम्मार्नीय है।’’ 

माक्स की भविष्यवार्णियार्ं गलत हो सकती हैं लेकिन उसके द्वार्रार् पूंजीवार्द क तर्कपूर्ण विरोध सही है। सेबार्इन ने माक्स के इस सिद्धार्न्त क महत्व स्वीकार करते हुए कहार् है-’’अतिरिक्त मूल्य क सिद्धार्न्त एक ऐसार् मूल तत्व है जो पूंजीवार्द की हृदय हिलार् देने वार्ली विभीषिकाओं को उद्घार्टित करतार् है। यह सिद्धार्न्त इतनार् तर्कपूर्ण तथार् ठोस है कि इसे चुनौती नहीं दी जार् सकती और इसे स्वीकार कर लेने पर हम सकते हैं कि माक्स क अतिरिक्त मूल्य क सिद्धार्न्त पूंजीवार्द के विरूद्ध श्रमिकों के हितों की रक्षार् क अचूक शस्त्र है। यदि इस सिद्धार्न्त को आधार् भी स्वीकार कर लियार् जार्ए तो श्रमिक वर्ग के लिए प्रगति के नए द्वार्र खुल जार्एंगे और उन पर माक्स क ऋण युगों-युगोंं के लिए अमिट रूप में चढ़ जार्एगार् तथार् सार्मार्जिक विषमतार् क लगभग अन्त हो जार्एगार्।

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