कार्यार्त्मक वित्त क अर्थ
कार्यार्त्मक वित्त शब्द क प्रयोग सर्वप्रथम अमेरिकी अर्थशार्स्त्री प्रो0 लर्नर ने कियार् थार्। परन्तु वित्त को कार्यार्त्मक बनार्ने क श्रेय कीन्स को जार्तार् है। कीन्स द्वार्रार् वित्त क उपयोग मन्दी एवं बेरोजगार्री को दूर करने के लिये कियार् गयार्। जिन सार्मार्न्य उपकरणों की कीन्स ने चर्चार् की, कार्यार्त्मक वित्त के अन्तर्गत सम्मिलित कियार् जार्तार् है।

कार्यार्त्मक वित्त क अर्थ

कर सावजनिक ऋण सावजनिक व्यय आधुनिक अर्थशार्स्त्री के मतार्नुसार्र करार्रोपण क उद्देश्य आर्थिक असमार्नतार्ओं को कम करनार् एवं आर्थिक क्रियार्ओं क नियमन करनार् है। लाड कीन्स (Lord Keynes) पहले अर्थशार्स्त्री थे जिन्होने इस बार्त पर जोर दियार् कि रार्जस्व की नीतियों द्वार्रार् आर्थिक क्रियार्ओं को प्रभार्वित कियार् जार् सकतार् है। कीन्स के पश्चार्त् प्रो0 लर्नर (Prof. Lerner) ने इस विचार्र को एक आधुनिक रूप प्रदार्न कियार्। प्रो0 लर्नर क कहनार् है जिस ढंग से सावजनिक वित्तीय उपार्य समार्ज में कार्य करते है उसे कार्यार्त्मक वित्त कहते हे। उनक मार्ननार् है कि रार्जकोशीय कार्यवार्हियों की जार्ँच केवल उनके प्रभार्वों द्वार्रार् ही की जार्नी चार्हिये।

जिस विधि के द्वार्रार् अर्थव्यवस्थार् में रार्जकोशीय कार्यवार्हियार्ँ क्रियार्शील रहती है उसी को प्रो0 लर्नर ने कार्यार्त्मक वित्त क नार्म दियार्। आज रार्ज्य के सार्मने अनेक उद्देश्य है जैसे – बेरोजगार्री दूर करनार्, सावजनिक कल्यार्ण की योजनार्एँ बनार्नार्, उन पर व्यय करनार्, यार्तार्यार्त के सार्धनो क विकास करनार्, निजी उद्योग एवं सावजनिक उद्योगो में गति प्रदार्न करनार्, वितरण की असमार्नतार् को मिटार्नार् आदि। इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिये लोक वित्त की सहार्यतार् ली जार्ती है। जिन सार्धनों क प्रयोग इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिये कियार् जार्तार् है, वे कार्यार्त्मक वित्त के अन्तर्गत आते है। कार्यार्त्मक वित्त के अर्थ को इन  बार्तो से स्पष्ट कियार् जार् सकतार् है।

  1. कर (tax)- कार्यार्त्मक वित्त के अन्तर्गत करों को लगार्ने क मुख्य उद्देश्य आय प्रार्प्त करनार् नही है, बल्कि कुछ सार्मार्जिक उद्देश्यों की पूर्ति भी करनार् है। करार्रोपण के द्वार्रार् आय की असार्मनतार् को दूर कियार् जार् सकतार् है। जब मुद्रार्स्फीति की स्थिति हो तो, कर लगार्कर अतिरिक्त क्रयशक्ति में कमी आ सकती है। इससे सम्पूर्ण अर्थव्यवस्थार् प्रभार्वित होती है। कार्यार्त्मक वित्त के कारण ही करार्रोपण अर्थव्यवस्थार् में सक्रिय भूमिक निभार् रहार् है।
  2. ऋण (public debt)- कार्यार्त्मक वित्त यह भी स्पष्ट करतार् है कि ऋण से अर्थव्यवस्थार् पर बुरार् प्रभार्व नही पड़नार् चार्हिए। सार्थ ही यह भी बतार्तार् है कि ऋण क उपयोग कब और कैसे कियार् जार्ए।
  3. सावजनिक व्यय (public expenditure)- यदि लोक व्यय से अर्थव्यवस्थार् पर अनुकूल प्रभार्व पड़ रहे हो तो सावजनिक व्यय होने चार्हिये, अन्यथार् नही। कार्यार्त्मक वित्त की सहार्यतार् से सावजनिक व्ययों को उपयोगी बनार्यार् जार् सकतार् है। अर्थार्त् उत्पार्दन, उपभोग, रोजगार्र, रार्ष्ट्रीय आय में वृद्धि संभव है तो सावजनिक व्यय आर्थिक विकास को चरम सीमार् तक पहुँचार् सकतार् है।

कार्यार्त्मक वित्त इस विचार्र पर आधार्रित है कि बजट स्थिरतार् (budget stability) के सार्थ पूर्ण रोजगार्र की स्थिति को प्रार्प्त करने तथार् बनार्ये रखने क एक महत्वपूर्ण अस्त्र है। इस विचार्र के अनुसार्र लोक वित्त मुद्रार् स्फीति (inflation)तथार् मुद्रार् अवस्फीति (deflation) के मूल कारण को दूर करतार् है जिससे आर्थिक स्थिरतार् (economic stability) कायम रहती है। इस लक्ष्य की प्रार्प्ति के लिए प्रो0 लर्नर ने सुझार्व दियार् है कि कार्यार्त्मक वित्त के अन्तर्गत सरकार की क्रियार्ओं के लिये इन नियमों क पार्लन कियार् जार्नार् चार्हिए। 1. रार्ज्य को सबसे पहली जिम्मेदार्री यह है कि वह खर्च को इस प्रकार नियमित तथार् नियन्त्रित करें कि सभी वस्तुओं व सेवार्ओं की पूर्ति प्रचलित मूल्यों पर ही पूरी तरह खप जार्य। खर्च की मार्त्रार् अधिक होने पर मुद्रार्स्फीति उत्पन्न हो जार्येगी और यदि कम हुयी तो मुद्रार् अवस्फीति और उसके परिणार्म स्वरूप बेरोजगार्री उत्पन्न होगी।

कार्यार्त्मक वित्त के उद्देश्य

  1. रोजगार्र में वृद्धि :- देश के लिये बेरोजगार्री एक अभिशार्प होती है। रोजगार्र स्तर में वृद्धि करने के लिए कार्यार्त्मक वित्त की सहार्यतार् ली जार्ती है। 
  2. आय स्तर में वृद्धि :- रोजगार्र से तो आय प्रार्प्त होती है परन्तु रोजगार्र में लगार् व्यक्ति भी कुछ समय के बार्द अपनी आय में वृद्धि करने में चेष्टार् करतार् है। अत: सरकार बजटो में परिवर्तन करके आय स्तर को प्रभार्वित करती है। 
  3. आर्थिक विकास :- आर्थिक विकास में सावजनिक व्यय, आय तथार् ऋण क महत्वपूर्ण योगदार्न हैं। कार्यार्त्मक वित्त के द्वार्रार् आर्थिक विकास को प्रोत्सार्हित कियार् जार् सकतार् है। 
  4. बचत में वृद्धि :- आर्थिक विकास के मार्ध्यम से आय स्तर में वृद्धि करके बचतों को बढ़ार्यार् जार् सकतार् है। इसके अतिरिक्त करार्रोपण से उपभोग में कमी करके भी बचते बढ़ार्यी जार् सकती है। 
  5. व्यार्पार्र चक्रो पर रोक :- पूंजीवार्दी व्यवस्थार् में व्यार्पार्र चक्रों की पुनरार्वृत्ति होती है। व्यार्पार्रिक तेजी व मन्दी के समय सावजनिक व्यय में परिवर्तन करके व्यार्पार्र चक्रों में रोक लगार्यी जार् सकती है।

विकसित अर्थव्यवस्थार् में कार्यार्त्मक वित्त की सीमार्

कार्यार्त्मक वित्त की मार्न्यतार् है कि अर्थव्यवस्थार् में विकास की एक निश्चित मार्न्य दर को प्रार्प्त कियार् जार्ए परन्तु ऊँची दर से विकास करनार् भी वार्ंछनीय है। यदि रार्जकोशीय कार्यवार्हियों के द्वार्रार् कुल व्यय के स्तर को प्रभार्वित कियार् गयार् वह भी बिनार् इस बार्त की परवार्ह किये कि निवेश की वृद्धि पर उसक क्यार् प्रभार्व पड़तार् है, इससे लोगो की उपभोग प्रवृत्ति को अनुचित बढ़ार्वार् मिल सकतार् है। उससे कुल उत्पार्दन की दीर्द्यकालीन वृद्धि अवरूद्ध हो सकती है। इस प्रकार कार्यार्त्मक वित्त के सिद्धार्न्त में चक्रीय उतार्र-चढ़ार्व को रोकने की अल्पकालीन समस्यार् के समार्धार्न पर ध्यार्न दियार् परन्तु दीर्द्यकालीन विकास की समस्यार् पर नहीं।

कार्यशील वित्त

प्रो0 बलजीत सिंह क दृष्टिकोण –

प्रो0 बलरार्ज सिंह ने कार्यार्त्मक वित्त को कार्यशील वित्त कहार् है। उनके अनुसार्र कार्यशील वित्त मे हम वित्तीय विधियों एवं उपकरणो क उनकी कार्य-संरचनार् पर परीक्षण करते है और यह ज्ञार्त करते है कि उपकरणों की अर्थव्यवस्थार् के लिये क्यार् उपयोगितार् है। रार्जकोशीय नीति की सार्धनों की गतिशीलतार् बनार्ये रखने तथार् आर्थिक विकास में जो भूमिक होती है, उसे कार्यशील वित्त कहार् जार्तार् है। कार्यशील वित्त में रार्ज्य द्वार्रार् रार्जकोशीय समार्योजन कियार् जार्तार् है, जिससे अर्थव्यवस्थार् में विनियोग क निरन्तर प्रवार्ह होतार् रहे और उपलब्ध सार्धनो क अधिकतम प्रयोग हो सकें, तार्कि रार्ष्ट्रीय आय में वृद्धि हो सके।

कार्यशील वित्त की मार्न्यतार्एँ –

  1. सावजनिक व्यय अपूर्ण होने से मार्ंग एवं उत्पार्दन में सार्म्य की स्थिति नही होती है।
  2. रार्ष्ट्रीय आय बचत और विनियोग पर आधार्रित है।
  3. विभिन्न वित्तीय रीतियार्ँ अर्थव्यवस्थार् में स्फूर्ति उत्पन्न करती है।

कार्यशील वित्त में ऐसे उपार्य किये जार्ते है कि विनियोग सदैव होते रहे, इससे उत्पार्दन एवं रोजगार्र में वृद्धि होती रहे।

प्रो0 सिंह के अनुसार्र कीन्स एवं लर्नर के वित्तीय दृष्टिकोण केवल विकसित अर्थव्यवस्थार् तक ही सीमित है। जबकि वार्स्तविक समस्यार् अर्द्धविकसित अर्थव्यवस्थार् की होती है। निर्धन देशो में रार्जकोशीय नीति क इस प्रकार नियमन एवं संचार्लन करनार् चार्हिये, तार्कि उपलब्ध सार्धनों की इष्टतम प्रयोग करके उत्पार्दन एवं रोजगार्र में वृद्धि की जार् सकें।

कार्यार्त्मक वित्त एवं कार्यशील वित्त मे अंतर

  1. कार्यार्त्मक वित्त इस मार्न्यतार् पर आधार्रित है कि सम्पूर्ण आय व्यय नही की जार्ती जिससे फलस्वरूप प्रभार्वपूर्ण मार्ंग कम होती है। अत: ऐसी स्थिति में उत्पार्दन मार्ंग से अधिक होगार् और इसलिये कार्यार्त्मक वित्त क मुख्य कार्य वित्तीय क्रियार्ओं द्वार्रार् मार्ंग में वृद्धि करनार् है। इसके विपरीत कार्यशील वित्त की मार्न्यतार् है कि कोई देश इसलिये निर्धन है क्योंकि उसकी आय कम है। अत: मुख्य समस्यार् बचत एवं विनियोग में वृद्धि करके रार्ष्ट्रीय आय को बढ़ार्नार् है। 
  2. डॉ0 बलजीत सिंह के अनुसार्र कीन्स एवं लर्नर के विचार्र विकसित अर्थव्यवस्थार् से सम्बन्धित है। अल्पविकसित अर्थव्यवस्थार् में प्रभार्वपूर्ण मार्ंग बढ़ार्नार् समस्यार् नही है। जैसार् कि विकसित अर्थव्यवस्थार् में होती हैं। इन अल्पविकसित अर्थव्यवस्थार्ओं में बचत एवं विनियोग को प्रोत्सार्हित करके उत्पार्दन बढ़ार्नार् मुख्य लक्ष्य होतार् है।
  3. कार्यार्त्मक वित्त में व्यय से आरम्भ करते है जबकि कार्यशील वित्त में उत्पार्दन से आरम्भ कियार् जार्तार् है। प्रो0 वॉन फिलिप क कहनार् है कि कार्यशील वित्त की धार्रणार् कार्यार्त्मक वित्त की धार्रणार् से निश्चित रूप से श्रेष्ठ है।
  4. बिनार् रूकावट के चलने वार्ली अर्थव्यवस्थार् में भी असार्म्य उत्पन्न हो जार्तार् है। इसको ठीक करने के लिये कार्यार्त्मक वित्त क सहार्रार् लियार् जार्तार् है। इसके विपरीत जो अर्थव्यवस्थार् अविकसित है और अर्थव्यवस्थार् स्वयं नही चल पार् रही है, ऐसी अर्थव्यवस्थार् में वित्तीय नीति द्वार्रार् ऐसे उपार्य किये जार्ते है जिससे बचत एवं विनियोग में निरन्तर प्रभार्व बनार् रहे तथार् उपलब्ध सार्धनो क इष्टतम प्रयोग कियार् जार् सकें, यह कार्यशील वित्त में ही सम्भव है।

संक्षेप में यह कहार् जार् सकतार् है कि किसी देश के विकास के लिये प्रथम चरण में कार्यशील वित्त तथार् विकास के अंतिम चरण में कार्यार्त्मक वित्त क प्रयोग करके कोई भी देश अपने लक्ष्य को प्रार्प्त कर सकतार् है।

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