करार्रोपण क प्रभार्व

करार्रोपण के प्रभार्व एक दिशीय न होकर बहुदिशीय पार्ये जार्ते हैं जो किसी भी अर्थव्यवस्थार् को विभिन्न रूपों में परवर्तित करते हैं तथार् सरकार यार् लोकसत्तार्ओं के उद्देश्यों को पूरार् करने में सहार्यक सिद्ध होते हैं। इसीलिए करार्रोपण के उत्पार्दन, वृद्धि तथार् वितरण आदि पर पड़ने वार्ले प्रभार्व सरकार द्वार्रार् पूर्व लक्ष्यार्नुसार्र तय किये जार्ते हैं। लेकिन अर्थव्यवस्थार् की प्रकृति एवं सरकार की क्रियार्न्वयन नीति भी करार्रोपण के प्रभार्वों को अलग-अलग दिशार्ओं की ओर ले जार्ने में सहार्यक होती है।

करार्रोपण के प्रभार्व

वर्तमार्न में करार्रोपण क महत्व अर्थव्यवस्थार्ओं के लिए और अधिक बढ़ जार्तार् है कि करार्रोपण के द्वार्रार् अर्थव्यवस्थार् को किसी भी दिशार् में प्रभार्वित करने में सहार्यतार् मिलती है। एक निश्चित समयार्वधि में अर्थव्यवस्थार् की रोजगार्र, विकास एवं वृद्धि, सार्मार्जिक न्यार्य, आर्थिक-समार्नतार् आदि की स्थिति के बार्द करार्रोपण के द्वार्रार् इन महत्वपूर्ण आयार्मों में जो परिवर्तन पैदार् होतार् है उसे आप करार्रोपण के प्रभार्वों के रूप में देख सकते हैं। प्रार्य: आपने देखार् होगार् कि आर्थिक व्यवस्थार्ओं में परिवर्तन से न केवल देश की अर्थव्यवस्थार् प्रभार्वित होती है अपितु सार्मार्जिक व रार्जनैतिक व्यवस्थार्ओं में भी बदलार्व देखार् जार् सकतार् है लेकिन प्रस्तुत इकाई में मुख्यरूप से आर्थिक चरों पर पड़ने वार्ले करार्रोपण के प्रभार्वों क ही अध्ययन कियार् गयार् है।

करार्रोपण के प्रभार्वों के सम्बन्ध में प्रो0 लर्नर ने अपने विचार्र निम्न रूप में व्यक्त किये, ‘‘कर सम्बन्धी नीति बनार्ते समय उद्देश्य केवल आर्थिक लार्भ यार् आय प्रार्प्त करनार् नहीं होनार् चार्हिए वरन अर्थव्यवस्थार् में स्थिरतार् बनार्ये रखने तथार् तेजी व मन्दी को रोकनार् चार्हिए। कर प्रणार्ली क उद्देश्य आर्थिक स्थिरतार् को बनार्ये रखनार् होनार् चार्हिए।’’

इस प्रकार यह कहनार् न्यार्य संगत होगार् कि करार्रोपण के प्रभार्वों को किसी विशेष आयार्म के सार्थ नहीं जोड़ार् जार् सकतार् है। करार्रोपण के मार्ध्यम से अर्थव्यवस्थार् के सभी महत्वपूर्ण चरों यार् आयार्मों में परिवर्तन कियार् जार्तार् है जिन्हें सार्मूहिक रूप से करार्रोपण के प्रभार्वों के रूप में रखार् जार् सकतार् है।

करार्रोपण क उत्पार्दन पर प्रभार्व

उत्पार्दन किसी भी अर्थव्यवस्थार् क एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है जिस पर करार्रोपण के प्रभार्व को नजरअंदार्ज नहीं कियार् जार् सकतार् है। करार्रोपण क उत्पार्दन पर पड़ने वार्ले प्रभार्वों की विवेचनार् निम्नवत रूप में की जार् सकती है।

  1. कार्यक्षमतार् एवं इच्छार् पर प्रभार्व : करार्रोपण के द्वार्रार् व्यक्ति की कार्य करने की क्षमतार् एवं कार्य करने की इच्छार् पर अलग-अलग रूप में प्रभार्व पड़तार् है। व्यक्ति की कार्य करने की क्षमतार् करार्रोपण की प्रकृति से सीधे प्रभार्वित होती है। प्रत्यक्ष करों की अपेक्षार् परोक्ष कर निर्धन वर्ग की कार्यक्षमतार् को नकारार्त्मक दिशार् में प्रभार्वित करते हैं। इसके सार्थ बेलोचदार्र तथार् आवश्यक वस्तुओं पर लगार्ये गये करों से व्यक्ति की कार्यक्षमतार् दुष्प्रभार्वित होती है जबकि लोचदार्र यार् विलार्सितार् की वस्तुओं पर लगने वार्ले कर कार्यक्षमतार् पर प्रतिकूल प्रभार्व नहीं डार्ल सकते। वहीं दूसरी ओर व्यक्ति की कार्य करने की इच्छार् भी करार्रोपण द्वार्रार् प्रभार्वित होती है। प्रो0 मिल के अनुसार्र, ‘‘व्यक्ति केवल धनी नहीं होनार् चार्हतार्, बल्कि वह दूसरों की अपेक्षार् अधिक धनी होनार् चार्हतार् है।’’ यदि आनुपार्तिक कर प्रणार्ली को अपनार्यार् जार्तार् है तो कार्य करने की इच्छार् अप्रभार्वित होगी तथार् कर की अन्य प्रणार्लियार्ँ कार्य करने की इच्छार् को अलग-अलग दिशार्ओं में प्रभार्वित करती हैं। करार्रोपण व्यक्ति को मार्नसिक रूप से भी प्रभार्वित करतार् है जिसक उस व्यक्ति की कार्य करने की क्षमतार् से गहरार् सम्बन्ध होतार् है। बेलोचदार्र मार्ंग में करार्रोपण क काम करने की इच्छार् पर अनुकूल प्रभार्व पड़तार् है। आय की मार्ंग लोच इकाई के बरार्बर होने पर व्यक्ति की कार्य करने की इच्छार् अप्रभार्वित रहती है तथार् आय की लोचदार्र मार्ंग की स्थिति में करार्रोपण क व्यक्ति की कार्य करने की इच्छार् प्रतिकूल रूप में प्रभार्वित होती है। जो उत्पार्दन को भी उसी दिशार् में प्रभार्वित करती है।
  2. बचत करने की क्षमतार् एवं इच्छार् पर प्रभार्व : बचत करने की क्षमतार् एवं बचत करने की इच्छार् दोनों ही एक बड़ी सीमार् तक करार्रोपण द्वार्रार् प्रभार्वित होती है। प्रथमत: देखार् गयार् है कि निर्धन वर्ग की अपेक्षार् धनीवर्ग की बचत करने की क्षमतार् अधिक होती है। यदि कर की दरें प्रगतिशील हैं तो बचत करने की क्षमतार् दुष्प्रभार्वित होती हैं। इसके विपरीत बचत करने की क्षमतार् में वृद्धि हो जार्ती है। वहीं निम्न आय वर्ग की बचत क्षमतार् में वृद्धि करने के लिए आवश्यक है उन्हें कर प्रणार्ली में सहार्यतार् प्रदार्न की जार्य। इसके सार्थ वितरणीय असमार्नतार्ओं को कम करने के लिए करार्रोपण क प्रयोग करके समार्ज के सभी वर्गों की बचत करने की क्षमतार् को प्रभार्वित कियार् जार् सकतार् है जिसक उत्पार्दन से गहरार् सम्बन्ध है। द्वितीयत: बचत कने की इच्छार् भी करार्रोपण द्वार्रार् प्रभार्वित की जार्ती है। कर की प्रकृति, आकार तथार् स्वरूप आदि के द्वार्रार् बचत करने की इच्छार् अलग-अलग स्तर पर प्रभार्वित होती है। ब्यार्ज पर कर तथार् लार्भ-आय पर कर की ऊँची दर से बचत करने की इच्छार् प्रतिकूल रूप से प्रभार्वित होती है जिसक उत्पार्दन पर बुरार् प्रभार्व पड़तार् है।
  3. उत्पार्दन के संसार्धनों पर प्रभार्व : करार्रोपण के द्वार्रार् प्रत्यक्ष रूप से प्रभार्वित होने के सार्थ-सार्थ परोक्ष रूप से भी प्रभार्वित होतार् है। करों के आकार तथार् प्रकृति के आधार्र पर उत्पार्दन के सार्धन के ्रयोग तथार् स्थार्नार्न्तरण पर पड़ने वार्ले प्रभार्व के द्वार्रार् उत्पार्दन को प्रभार्वित कियार् जार्तार् है। उत्पार्दन कार्य में प्रयुक्त सार्धनों पर लगने वार्ले करों क भार्र अधिक है तो उसक उत्पार्दन की मार्त्रार् पर प्रतिकूल प्रभार्व पड़ेगार्। इस कर भार्र से बचने के लिए इन सार्धनों क प्रयोग गैर कर वार्ले उत्पार्दन कार्य में लगार्यार् जार्तार् है जो उत्पार्दन पर प्रतिकूल प्रभार्व नहीं पड़ेगार्। इसके सार्थ सार्धनों पर विशिष्ट तथार् मूल्यार्नुसार्र करार्रोपण भी उत्पार्दन को अलग-अलग रूप में प्रभार्वित करतार् है।
  4. उत्पार्दन तकनीकी पर प्रभार्व : करार्रोपण क उत्पार्दन की तकनीकी पर भी गहरार् प्रभार्व पार्यार् गयार् है। करों की ऊँची दरें मुद्रार् स्फीति की स्थिति पैदार् करती हैं जिससे मजदूरी बढ़ने की स्थिति आती है। श्रम संघ तथार् अन्य संस्थार्एँ मजदूरी में वृद्धि के लिए आवश्यक मार्नती हैं। फलस्वरूप श्रम प्रधार्न तकनीकी से पूँजी प्रधार्न तकनीकी को अधिक वरीयतार् प्रदार्न की जार्ती है। यहार्ँ पर यह समझनार् अत्यन्त आवश्यक है कि श्रम की कीमतें किसी भी प्रकार के अधिक मार्त्रार् में करार्रोपण से सीधे रूप से प्रभार्वित होती है। इसके सार्थ उत्पार्दन कर तथार् अन्य प्रकार के करों से लार्गतें कम करने के लिए भी उत्पार्दन की तकनीकी में परिवर्तन करनार् आवश्यक हो जार्तार् है। लेकिन उत्पार्दन की तकनीकी पर करार्रोपण क प्रभार्व करों की प्रकृति तथार् सरकार की नीति दोनों क संयुक्त परिणार्म होतार् है।
  5. उत्पार्दन पर अन्य प्रभार्व : करार्रोपण क एक अन्य उत्पार्दन पर प्रभार्व यह पड़तार् है कि कर अधिक मार्त्रार् में लगार्ने से उत्पार्दन क रूप तथार् डिजार्यन आदि में परिवर्तन आ जार्तार् है। करार्रोपण की मार्त्रार् उत्पार्दन की इकाइयों के आकार, वजन तथार् गुणवत्तार् को भी किसी न किसी दिशार् में प्रभार्वित करतार् है। ऊँचे कर उत्पार्दन की इस दिशार् में प्रतिकूल प्रभार्व ही डार्लते हैं।

करार्रोपण क वृद्धि पर प्रभार्व

प्रस्तुत खण्ड के अन्तर्गत करार्रोपण क वृद्धि पर पड़ने वार्ले प्रभार्वों क अध्ययन कियार् गयार् है जो वृद्धि के आकार एवं स्वरूप को निम्नवत प्रभार्वित करतार् है।

  1. वृद्धि के आकार पर प्रभार्व – करार्रोपण क उत्पार्दन पर पड़ने वार्ले प्रभार्वों क अध्ययन करके आप यह समझ सकेंगे कि वृद्धि के आकार पर अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रभार्व पड़तार् है। करार्रोपण वृद्धि की दर को प्रत्यक्ष रूप से तथार् परोक्ष रूप से भी प्रभार्वित करतार् है। वृद्धि दर को तीव्र बनार्ये रखने के लिए यह आवश्यक होतार् है कि देश में मुद्रार् स्फीति की दर सार्मार्न्य स्तर पर बनी रहे। देश में मन्दी तथार् तेजी की स्थितियार्ँ प्रतिकूल न हों। ऐसी स्थिति में वृद्धि की दर प्रतिकूल रूप से प्रभार्वित होती है। वृद्धि दर को तीव्र तथार् निरन्तर बनार्ये रखने के लिए सरकार को करार्रोपण की नीति क सहार्रार् लेनार् होतार् है। करों की दर अधिक होने पर प्रार्य: वस्तुओं की कीमतें बढ़ती हैं तथार् जनतार् की क्रयशक्ति कम होती है और देश की अर्थव्यवस्थार् विकृत होती है। इसके विपरती मन्दी की स्थिति में करार्रोपण की दर को कम करके जनतार् की क्रय शक्ति को बढ़ार्यार् जार्तार् है तथार् उत्पार्दन की मार्ंग बढ़ती है जिससे वृद्धि दर पर अनुकूल प्रभार्व पड़तार् है। किसी क्षेत्र विशेष में वृद्धि दर को बढ़ार्ने के लिए उत्पार्दकों को करों में रार्हत की व्यवस्थार् की जार्ती है। जिस क्षेत्र में करों की दर अधिक तथार् जटिल होती है उन क्षेत्रों की वृद्धि दरें प्रतिकूल रूप से प्रभार्वित होती हैं।
  2. वृद्धि के स्वरूप पर प्रभार्व – अर्थव्रूवसथार्ओं को अलग-अलग क्षेत्रों के रूप में बार्ंटार् जार्तार् है जैसे प्रार्थमिक क्षेत्र, विनिर्मार्ण क्षेत्र तथार् सेवार् क्षेत्र। सरकार की कोशिश रहती है कि सभी क्षेत्रों क समार्न रूप से विकास हो। इसके लिए यह आवश्यक है कि सभी क्षेत्रों की वृद्धि दरों को बढ़ार्ने क प्रयार्स कियार् जार्य। जिन क्षेत्रों में वृद्धि दर की अधिक आवश्यकतार् होती है उन क्षेत्रों में करार्रोपण की नीति को उदार्र बनार्यार् जार्तार् है तथार् वृद्धि दर के अनुकूल रूप में समार्येार्जित किये जार्ने क प्रयार्स कियार् जार्तार् है। इसके सार्थ वृद्धि के स्वरूप को निरन्तरतार् प्रदार्न करने के लिए भी करार्रोपण क सहार्रार् लियार् जार्तार् है जिससे वृद्धि दर की निरन्तरतार् क लार्भ उत्पार्दक वर्ग को मिल सके। वृद्धि दर में होने वार्ले उच्चार्वचन उत्पार्दन की कीमत तथार् पूर्ति को प्रभार्वित करतार् है जिसक उत्पार्दक वर्ग तथार् उपभोक्तार् वर्ग दोनों पर प्रतिकूल प्रभार्व पड़तार् है जिससे अर्थव्यवस्थार् की वृद्धि दर अवरूद्ध होती है। करार्रोपण की सफल नीति देशों की वृद्धि दर को उच्च स्तर पर ले जार्ने में सहार्यक होती है। इसके सार्थ करार्रोपण से प्रार्प्त रार्जस्व क प्रयोग आवश्यक वृद्धि दर को बढ़ार्ने के लिए भी कियार् जार्तार् है जिससे देश के विकास को बढ़ार्वार् मिलतार् है। इस रार्जस्व क प्रयोग यदि उत्पार्दक कार्यों में नहीं होगार् तो वृद्धि दर प्रतिकूल रूप से प्रभार्वित होगी।

करार्रोपण क वितरण एवं संसार्धनों के आवंटन पर प्रभार्व

करार्रोपण क वितरण पर प्रभार्व

करार्रोपण द्वार्रार् किसी भी देश में वितरण पर प्रभार्वों को देखार् जार् सकतार् है। अर्थव्यवस्थार्ओं की प्रकृति के अनुसार्र कुछ देशों में करार्रोपण क आय के वितरण पर स्वत: प्रभार्व पड़तार् है तो कहीं पर इस वितरण पर प्रभार्व डार्लने के लिए करार्रोपण की नीति तैयार्र की जार्ती है। जिन देशों में आय की वितरणार्त्मक समस्यार् कम पार्यी जार्ती है वहार्ँ पर करार्रोपण के वितरण पर बहुत कम ही प्रभार्व पार्यार् जार्तार् है और इन प्रभार्वों पर ध्यार्न भी नहीं दियार् जार्तार् है। किन्तु अधिकांश देश पिछड़े तथार् विकासशील देशों की श्रेणी में आतेहैं जहार्ँ पर वितरण की समस्यार् को मुख्य समस्यार् के रूप में देखार् जार् रहार् है और आम जनतार् पर इसक दुष्प्रभार्व पड़ार् है। इस समस्यार् को हल करने के लिए सरकाकर को करार्रोपण क सहार्रार् लेनार् होतार् है जिसके प्रभार्व करार्रोपण के आकार, प्रकृति द्वार्रार् निर्धार्रित होते हैं। इसके सार्थ इस वितरण की समस्यार् को कम करने की आवश्यकतार् क स्तर भी करार्रोपण के प्रभार्वों को निश्चित करतार् है।

आपको यहार्ँ पर यह समझनार् अत्यन्त आवश्यक होगार् कि सरकार के सार्मने केवल आय की वितरणार्त्मक समस्यार् को दूर करनार् ही विकास के लिए आवश्यक नहीं है बल्कि इस वितरण को कम करने के दुष्प्रभार्व, बचत की क्षमतार्, इच्छार् तथार् निवेश क स्तर एवं दिशार् आदि अलग-अलग रूपों में भी पार्ये जार्ते हैं। अत: सरकार को इस प्रकारक की रार्जकोशीय नीति क सहार्रार् लेनार् होतार् है कि देश में विरतणीय समस्यार्ओं को भी कम कियार् जार् सके तथार् इसक धनी वर्ग पर बचत तथार् निवेश के संदर्भ में प्रतिकूल प्रभार्व नहीं पड़े। देश में करार्रोपण क ढार्ँचार् वितरण को अलग-अलग रूपों में प्रभार्वित करतार् है। ‘बेस्टेबिल’ ने करार्रोपण तथार् वितरण की समस्यार् पर अपने विचार्र व्यक्त करते हुए लिखार् है, ‘‘करार्रोपण को धन की असमार्नतार्ओं को ठीक करने क एक सार्धन मार्नने की एक बड़ी दृढ़ धार्रणार् है ….. यह तो वित्तीय कलार् की शक्ति के अन्दर ही सम्भव है कि करों की दरों और रूपों को इस प्रकार चुनार् जार्य कि बिनार् किसी वर्ग पर अनुचित दबार्व के आवश्यक धन प्रार्प्त हो जार्य परन्तु यदि धन के वितरण के प्रभार्वों की ओर ध्यार्न देनार् है और इस दिशार् में कुछ विशेष उद्देश्यों की पूर्ति के लिए कोई तरकीब करनी है तो इस कार्य में कठिनार्इयार्ँ अत्यधिक हो जार्ती हैं। यदि उद्देश्य समार्जवार्दी प्रणार्ली स्थार्पित करनार् है तो करार्रोपण में चार्लार्की से व्यवस्थार् करने की अपेक्षार् अधिक प्रत्यक्ष और प्रभार्वशार्ली विधियार्ँ उपस्थित हैं।’’ इसी संदर्भ में प्रो0 पीगू ने लिखार् है कि, ‘‘यदि रार्ष्ट्रीय लार्भार्ंश की मार्त्रार् में कमी न आये तो धन के वितरण में प्रत्येक ऐसार् सुधार्र जिससे लार्भार्ंश में से निर्धनों के पार्स जार्ने वार्ली मार्त्रार् में वृद्धि हो जार्ती हो, सार्मूहिक कल्यार्ण की अभिवृद्धि करेगार्।’’

इस प्रकार स्पष्ट है कि करार्रोपण क आय के वितरण पर अनुकूल तथार् प्रतिकूल दोनों ही दिशार्ओं में प्रभार्व पड़तार् है जो अर्थव्यवस्थार् की स्थिति तथार् आवश्यकतार्ओं द्वार्रार् निर्धार्रित होतार् है।

करों के प्रकारों के सम्बन्ध में आप समझेंगे कि प्रगतिशील कर आय की वितरणीय असमार्नतार्ओं को कम करने में सहार्यक होतार् है जबकि अधोगार्मी यार् प्रतिगार्मी करों क विरण पर प्रतिकूल प्रभार्व पड़तार् है जो एक अर्थव्यवस्थार् के लिए नुकसार्नदार्यक होतार् है। इस प्रकार प्रगतिशील करार्रोपण द्वार्रार् धनी वर्ग से धन क प्रवार्ह निर्धन तथार् गरीब वर्ग की ओर हो जार्तार् है। इसी प्रकार परोक्ष करों की अपेक्षार् प्रत्यक्ष करों क वितरण पर अधिक अनुकूल प्रभार्व पड़तार् है। परोक्ष करों क वितरण पर प्रतिकूल प्रभार्व पड़तार् है कयोंकि अन्तत: करार्रोपण क भार्र निम्न वर्ग तथार् मध्यम वर्ग पर ही पड़तार् है तथार् धनी वर्ग इस प्रभार्व से अलग रह जार्तार् है। इसी प्रकार सबसे अच्छार् कर आय कर है जो वितरण पर सबसे अधिक अनुकूल प्रभार्व डार्लतार् है।

इसी क्रम में सम्पत्ति कर क भी वितरण पर अनुकूल प्रभार्वों को देखार् जार् सकतार् है। धनी तथार् अधिक सम्पत्ति के मार्लिकों से कर की वसूली करके निर्धनों के सार्मार्जिक कल्यार्ण पर व्यय कियार् जार् सकतार् है तथार् निर्धनों की स्थिति में सुधार्र करने क प्रयार्स कियार् जार् सकेगार्। यहार्ँ पर यह बार्त ध्यार्न देने योग्य है कि देश में पूँजी निवेश के लिये धनी वर्ग द्वार्रार् ही बचतें काम आती हैं इसीलिए करार्रोपण से धनी वर्ग की उस रार्शि क ही प्रवार्ह निर्धनों की ओर कियार् जार्नार् चार्हिए जो देश के लिए निवेश यार् पूँजी के लिए सुरक्षित नहीं कियार् जार् सकतार् है।

करार्रोपण क संसार्धनों के आवंटन पर प्रभार्व

उत्पार्दन कार्य में संसार्धनों क आवंटन इस प्रकार से करने की समस्यार् पैदार् होती है कि संसार्धनों क कुशलतम रूप में प्रयोग हो तथार् उत्पार्दन अधिकतम हो सके। इसके सार्थ सार्मार्जिक लार्भ में भी वृद्धि हो सके। देश में उत्पार्दन के स्वरूप, उपयोगितार् तथार् आकार के चलते संसार्धनों के पुन: आवंटन की आवश्यकतार् पार्यी जार्ती है। इसी तथ्य के सार्थ करार्रोपण क सहार्रार् लेकर इस समस्यार् को हल करने क प्रयार्स कियार् जार्तार् है। करकारोपण क संसार्धनों के आवंटन पर पड़ने वार्ले प्रभार्व अनुकूल तथार् प्रतिकूल दोनों ही रूपों में हो सकते हैं जो कर तथार् उत्पार्दन की प्रकृति पर निर्भर करतार् है। समार्ज के लिए हार्निकारक वस्तुओं के उत्पार्दन पर अत्यधिक कर लगार्कर इसकी कीमत बढ़ार्ने से उपभोग में कमी होगी जिससे इसके उत्पार्दन में लगे सार्धनों क स्थार्नार्न्तरण अधिक उपभोग वार्ली वस्तुओं एवं सेवार्ओं के उत्पार्दन की ओर होगार् जिससे रार्ष्ट्रीय आय में वृद्धि होगी तथार् सार्मार्जिक कल्यार्ण भी बढ़ेगार्। इस प्रकार करार्रोपण द्वार्रार् जीवन के लिए घार्तक वस्तुओं के उत्पार्दन से श्रम व पूँजी व अन्य संसार्धनों को हटार्कर उपयोगी वस्तुओं के उत्पार्दन में लगार्यार् जार्तार् है जो करार्रोपण क आवंटन पर अनुकूल प्रभार्व कहार् जार्येगार् जिससे अर्थव्यवस्थार् एवं सरकार दोनों को लार्भ होगार्।

इसके सार्थ यह भी पार्यार् गयार् है कि सकरार्र कर रार्जस्व को अधिक मार्त्रार् में जुटार्ने के लिए आवश्यक वस्तुओं के उत्पार्दन एवं बिक्री कर अधिक कर लगार्ती है जिससे इन वस्तुओं की मार्ंग कम होती है तथार् समार्ज में उपभोग भी घटतार् है यार् निर्धन वर्ग को हार्नि होती है तो ऐसे उद्योगों से संसार्धनों क स्थार्नार्न्तरण नुकसार्नदार्य उद्योगों की ओर होने लगतार् है जो रार्ष्ट्रीय हित के लिए घार्तक ही कहार् जार्येगार्। इसके सार्थ देश में संसार्धनों क आवंटन कुशलतार् के सार्थ नहीं हो पार्तार् है तथार् सार्धरों की आय की घटनार् प्रार्रम्भ हो जार्ती है और करार्रोपण क सहार्रार् पुन: आवंटनार्त्मक कुशलतार् पैदार् करने के लिए कियार् जार्तार् है।

अत्यधिक करार्रोपण द्वार्रार् उत्पार्दन के संसार्धनों क प्रवार्ह अपने देश से विदेशों की ओर भी होने लगतार् है जो देश के लिए नुकसार्नदार्यक सिद्ध होतार् है और देश में पूँजी की कमी पैदार् होती है जो आर्थिक विकास को अवरूद्ध करती है। सरकार विदेशी पूँजी को आकर्षित करने के लिए एक सफल करार्रोपण की नीति क सहार्रार् लेती है तथार् इसक क्रियार्न्वयन बड़ी सार्वधार्नीपूर्वक करती है। कभी-कभी करार्रोपण की ऊँची दर उपभोग को कुछ समय के लिये रोक देती है तथार् उसको भविष्य के लिए सुरक्षित कियार् जार्तार् है। ऐसी स्थिति में संसार्धनों क आवंटन वर्तमार्न समय से भविष्य के उत्पार्दन के लिए कियार् जार्तार् है।

करार्रोपण के प्रभार्व एवं भार्रतीय अर्थव्यवस्थार्

करार्रोपण क उत्पार्दन, वृद्धि पर प्रभार्वों क अध्ययन करने के बार्द आपने करार्रोपण क वितरण एवं संसार्धनों के आवंटन पर प्रभार्वों क भी अध्ययन कियार्। प्रस्तुत बिन्दु के अन्तर्गत आप करार्रोपणके अलग अलग क्षेत्रों में पड़ने वार्ले प्रभार्वों के समग्र रूप से परिचित होंगे तथार् भार्रतीय अर्थव्यवस्थार् के सार्थ इन समग्र प्रभार्वों की प्रार्संगिकतार् से भलीभार्ंति परिचित हो सकेंगे।

इस तथ्य से आप शार्यद परिचित होंगे कि भार्रत में बहुकर प्रणार्ली क प्रचलन है। इसके सार्थ कुछ मदों पर केन्द्र तथार् रार्ज्य सरकारों द्वार्रार् प्रत्यक्ष यार् परोक्ष रूप से करार्रोपण क संयुक्त दबार्व भी पार्यार् जार्तार् है। भार्रतीय कर प्रणार्ली पर रार्जनैतिक प्रभार्वों की भी उपेक्षार् नहीं की जार् सकती है। इसके सार्थ भार्रत में यह तथ्य अत्यन्त परिवर्तनकारी एवं विचार्रणीय है कि विशार्ल भार्रत में रार्जनैतिक एकतार् एवं समरूपतार् क पार्यार् जार्नार् अत्यन्त कठिन है। करों के आरोपण के सम्बन्ध में त्रिस्तरीय व्यवस्थार् रार्जनैतिक रूप में विद्यमार्न है – केन्द्र सरकार की कर प्रणार्ली, रार्ज्य सरकारों की कर प्रणार्ली तथार् स्थार्नीय सरकारों/संस्थार्ओं की कर-प्रणार्ली।

भार्रत में करार्रोपण की प्रार्संगिकतार् को प्रभार्वी बनार्ने के लिए समय-समय पर अनेक कमेटियों तथार् मण्डलों क गठन कियार् गयार् लेकिन भार्रतीय कर प्रणार्ली सम्बन्धी गहन तथार् विस्तृत नीतियों के चलते इन प्रभार्वों को एक दिशीय रूप नहीं दियार् जार् सक है। आपको विदित हो कि भार्रतीय अर्थव्यवस्थार् विकासशील होने के सार्थ-सार्थ मिश्रित अर्थव्यवस्थार् की विशेशतार्यें रहती हैं जो करार्रोपण के प्रभार्वों को बहुदिशीय बनार् देती हैं। भार्रतीय अर्थव्यवस्थार् में कुछ ऐसी चुनौतियार्ँ हैं जो करार्रोपण के प्रभार्वों तथार् सरकार की नीतियों में सार्मन्जस्य स्थार्पित होने में बार्धक बन जार्ती हैं। आइये इन तथ्यों पर गहनतार् से विचार्र करें।

  1. विकास की तीव्र दर एवं आय की वितरणीय असमार्नतार्ओं को दूर करनार्
  2. निजीकरण की प्रक्रियार् एवं सार्मार्जिक कल्यार्ण
  3. आर्थिक स्थिरतार् एवं निजी क्षेत्र में लार्भ की दर
  4. अन्तर्रार्ष्ट्रीय सार्ख एवं गरीबी-बेरोजगार्री की समस्यार्
  5. कर रार्जस्व एवं रार्जनैतिक लार्भ की प्रार्प्ति
  6. विभिन्न रार्ज्यों तथार् केन्द्र के मध्य अच्छे सम्बन्धों की कमी।

ऊपर दिये गये छ: बिन्दुओं पर गहरार्ई से विचार्र दियार् जार्य तो भार्रतीय अर्थव्यवस्थार् वर्तमार्न कर प्रणार्ली तथार् उसके प्रभार्वों के मध्य आपसी तार्लमेल न बनार् पार्ने की स्थिति में है और आये दिन सरकारों के सार्मने कर तथार् मौद्रिक तथार् रार्जकोशीय नीतियों के मध्य सार्मन्जस्य स्थार्पित करने के प्रयार्स किये जार्ते रहते हैं। ऊपर दिये गये तथ्यों के मध्य सार्मंजस्य स्थार्पित करने के लिये ही करार्रोपण प्रणार्ली को एक उपकरण के रूप में अपनार्यार् जार्तार् है। जहार्ँ तक अर्थव्यवस्थार् में तीव्र आर्थिक विकास की दर के लिये पूँजी क संकेन्द्रण तथार् आय की वितरणीय असमार्नतार्ओं को दूर करने के लिये पूंजी क प्रसरण के लिये प्रयार्स किये जार्ते हैं जिसके लिये करार्रोपण के प्रभार्वों के बंटवार्रे की अत्यन्त आवश्यकतार् महसूस की जार्ती है। करार्रोपण के एक दिशीय प्रभार्वों से इस कठिनार्ई को दूर नहीं कियार् जार् सकतार् है।

भार्रतीय अर्थव्यवस्थार् के सार्मने सबसे बड़ी समस्यार् अर्थव्यवस्थार् के स्वरूप को परिवर्तित करने से सम्बन्धित है। तीव्र आर्थिक विकास की गति को आखिरकार कब तक प्रार्प्त कियार् जार्तार् रहेगार्। सार्मार्जिक कल्यार्ण की लार्गत पर आर्थिक विकास की बार्त करके करार्रोपण के प्रभार्वों के औचित्य को न्यार्यसंगत नहीं ठहरार्यार् जार् सकतार्। रार्जनैतिक दृष्टिकोण से करार्रोपण के प्रभार्वों के औचित्य को रार्जनेतार्ओं तथार् उद्योगपतियों के पक्ष में बनार्ये रखनार् करार्रोपण के अलग-अलग प्रभार्वों को धूमिल कियार् जार्तार् है। अर्थव्यवस्थार् पर करार्रोपण के प्रभार्व केवल इसके आकार पर ही निर्भर नहीं करतार् बल्कि करार्रोपण के ढार्ँचे तथार् संरचनार्त्मक व्यवस्थार् की भी महत्वपूर्ण भूमिक पार्यी जार्ती है। एक करोरोपण की मद वस्तुओं एवं सेवार्ओं की मार्ंग की लोच को परिवर्तित करती है वही दूसरी मद क्रेतार्ओं की रूचि तथार् मार्ंग के निर्धार्रकों को परिवर्तित करती है।

आपको ध्यार्न देने की आवश्यकतार् है कि वर्तमार्न में रार्जकोशीय नीति विकास, रोजगार्र तथार् अर्थव्यवस्थार् नियंत्रण के सार्थ रार्जनैतिक नियंत्रण की भी उपकरण बन गयी है। करों में छूट तथार् उदार्रपन की प्रवृत्ति तथार् रार्जकोशीय घार्टे की समस्यार् जैसार् विरोधार्भार्स करार्रोपण के प्रभार्वों को सीमित करतार् है। भार्रत में आर्थिक विषमतार् करार्रोपण के प्रभार्वों के आंकलन के लिए एक महत्वपूर्ण पैमार्नार् बन गयार् है। अर्थव्यवस्थार् में करार्रोपण के प्रभार्वों की मद सम्बन्धी पर्यार्प्त जार्नकारी प्रार्पत किये बिनार् रोजकोशीय नीति के प्रभार्वों की अपेक्षार् करनार् सरल कार्य नहीं है।

भार्रत जैसी अर्थव्यवस्थार् में कई प्रकार की नम्यतार्ओं क अभार्व पार्यार् जार्तार् है। कई क्षेत्रों में एकाधिकारार्त्मक अनियमिततार्यें भी पार्यी जार्ती हैं। ऐसी स्थिति में मंदी तथार् मुद्रार्-स्फीति जैसी परिस्थितियार्ँ एक सार्थ अस्तित्व में पार्यी जार्ती हैं। इसके समार्धार्न के लिए केवल करों में कमी यार् वृद्धि करके काम नहीं चलार्यार् जार् सकतार् है। इसके लिए करार्रोपण प्रणार्ली में समय-समय पर आवश्यकतार्नुसार्र संशोधन की आवश्यकतार् पार्यी जार्ती है। कई बार्र सरकारों के कड़े उपार्यों को भी अपनार्नार् होतार् है। कड़े उपार्यों को यदि प्रार्रम्भ से ही अपनार्यार् जार्य तो शार्यद रार्जकोशीय नीति के प्रभार्वों से सम्बन्धित अनेक प्रकार की समस्यार्ओं क समार्धार्न भी सम्भव हो सकतार् है।

केन्द्र सरकार तथार् केन्द्रीय बैंक की रार्जकोशीय नीति सम्बन्धी उपार्यों पर भले ही अर्थव्यवस्थार् को एक नई दिशार् प्रदार्न की जार् सकती है किन्तु करार्रोपण व्यवस्थार् में रार्ज्य सरकारों के हस्तक्षेप से भी करार्रोपण के प्रभार्वों में विरोधार्भार्स की स्थिति पैदार् हो जार्ती है। केन्द्र तथार् विभिन्न रार्ज्यों में अलग-अलग रार्जनैतिक दलों की सरकारों के अस्तित्व के कारण करार्रोपण के प्रभार्वों में समग्रतार् को नहीं देखार् जार् सकतार्। आपको यहार्ँ ध्यार्न देनार् आवश्यक है कि भार्रत में सभी रार्जनैतिक दलों के आर्थिक व सार्मार्जिक लक्ष्यों में समरूपतार् क पार्यार् जार्नार् आवश्यक नहीं है। जिसके आधार्र पर कर प्रणार्ली एवं करार्रोपार् के प्रभार्व दोनों को अलग-अलग दिशार्ओं में देखार् गयार् है।

करार्रोपण सम्बन्धी नीति निर्धार्रित करते समय सरकार द्वार्रार् यह अपेक्षार् की जार्ती है कि करार्रोपण के बार्द एक विशेष क्षेत्र में यथार्स्थिति बनी रहे तथार् एक दूसरे क्षेत्र में वार्ंछित परिवर्तन परिलक्षित हो। लेकिन भले ही एक क्षेत्र में करार्रोपण के प्रभार्व न हो लेकिन दूसरे क्षेत्र में परिलक्षित करार्रोपण के प्रभार्वों क भी प्रथम क्षेत्र में परोक्ष रूप से प्रभार्वों को देखार् जार्तार् है जिन्हें व्यक्तियों की जिज्ञार्सार्ओं, भार्वनार्ओं तथार् मार्नसिकतार्ओं के आधार्र पर और अधिक फैलार्यार् जार् सकतार् है। इस प्रकार करार्रोपण की प्रणार्ली के द्वार्रार् सरकार द्वार्रार् यह आशार् करनार् अधिक औचित्यपूर्ण नहीं कहार् जार् सकतार् कि करार्रोपण क प्रभार्व केवल वार्ंछित क्षेत्र तक ही सीमित रह पार्येगार्। सरकार को कर प्रणार्ली क प्रयोग एक नीतिशार्स्त्र के रूप में करने की आवश्यकतार् पार्यी जार्ती है।

भार्रत में प्रत्यक्ष तथार् परोक्ष दोनों प्रकार की कर-प्रणार्ली को अपनार्यार् गयार् है। प्रत्यक्ष करों के प्रभार्वों से बचने के लिये परोक्ष करार्रोपण के क्षेत्र में प्रवेश करने के लिये हमेशार् व्यक्तिगत स्तर पर प्रयार्स किये जार्ते रहे हैं। भार्रतीय अर्थव्यवस्थार् अनेक प्रकार की नैतिकतार् सम्बन्धी समस्यार्ओं से भी भरी है जो करार्रोपण के प्रभार्वों को प्रभार्वहीन करन में महतवपूर्ण सिद्ध होती है। सरकार के कड़े नियम व उपार्य करार्रोपण के प्रभार्वों को वार्ंछित दिशार् की ओर ले जार्ने में सहार्यतार् करते हैं।

जहार्ँ तक भार्रतीय अर्थव्यवस्थार् तथार् करार्रोपण के प्रभार्वों के अन्तर्सम्बन्ध के सही दिशार् में क्रियार्शील होने क सवार्ल है, भार्रतीय अर्थव्यवस्थार् में करवंचनार् तथार् कर-चोरी जैसी समस्यार् भी करार्रोपण के प्रभार्वों को उद्देश्यपूर्ण होने से रोकती है। सार्मार्जिक लार्भ वार्ली करार्रोपण प्रणार्ली को नार्गरिक स्वाथ की पूर्ति के लिए प्रयोग करनार् चार्हतार् है। भार्रतीय कर प्रणार्ली क लचीलार्पन इस करवंचनार् तथार् कर की चोरी को प्रेरित करतार् है क्योंकि कर प्रणार्ली में होने वार्ले परिवर्तन व्यक्ति तथार् संस्थार्नों एवं उद्यमों की भार्वी तथार् वर्तमार्न नीतियों को अलग-अलग दिशार्ओं में मोड़ देने लगते हैं तथार् सरकार की करार्रोपण व्यवस्थार् तथार् करार्रोपण के प्रभार्वों को सीमित भी कियार् जार्तार् है।

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