ऋग्वेद क परिचय
ऋग्वैद धामिक स्तोत्रों की एक अत्यंत विशार्ल रार्शि है, जिसमें नार्नार् देवार्तार्ओं की भिन्न-भिन्न ऋषियों ने बड़े ही सुंदर तथार् भवार्भिव्यंजक शब्दों में स्तुतियों एवं अपने अभीष्ट की सिद्धि के निर्मित पाथनार्यें की है। द्वितीय मंडल से लेकर सप्तम मंडल तक एक ही विशिष्ट कुल के ़षियों की प्राथनार्यें संगृहीत हैं। अष्टम मंडल में अधिकतर मंत्र कणव ऋषि सं संबंध हैं, तथार् नवम मंडल में (पवमार्न) सोम के विषय में भिन्न-भिन्न ऋषिकुलों के द्वार्रार् दृष्ट अर्पण मंत्रों क संग्रह है। ऋग्वेदीय देवतार्ओं में तीन देवतार् अपने वैशिष्टय के कारण नितार्न्त प्रसिद्ध है। अग्नि के लिए सबसे अधिक ऋचार्यं कही गर्इ है। इन्द्र विजयप्रदार्तार् होने के कारण सबसे अधिक ओजस्वी तथार् वीर-रसमण्डित मंत्रों के द्वार्रार् संयुक्त है। प्रार्णिमार्त्र की हादिक भार्वनार्ओं क जार्नने वार्लार् और तदनुसार्र प्रार्णियों को दण्ड और पार्रितोषिक देने वार्लार् वरूण कर्मफलदार्तार् परमेश्वर के रूप में चित्रित कियार् गयार् है। इसलिए सर्वोच्च नैतिक भार्वनार्ओं से स्निग्ध तथार् उदार्ततार् से मण्डित ऋचार्यें वरूण के विषय में उपलब्ध होती है। देवियों में उषार् क स्थार्न अग्रगण्य है और सबसे आ गर्इ कवित्वमण्डित प्रतिभार्शली सौन्दर्यभिव्युक्त ऋचार्यें उषार् देवी के विषय में मिलती है। इनके अतिरिक्त जिन देवतार्ओं की संस्तृति में ऋचार्यें दृष्ट हुर्इ उनमें प्रधार्न देवतार् हैं :- सवितार्, पूषार्, मित्र, विष्णू, रूद्र, मरूत्, पर्जन्य आदि। ऋग्वैदीय ऋचार्ओं क प्रयोग यज्ञ के अवसर पर होतार् थार् और सोमरस की आहुति के समय प्रयुक्त मंत्रों क एकत्र संग्रह नवम मंडल में कियार् गयार् मिलती है। इन देवों क विशेष वर्णन संस्कृति-खण्ड में कियार् गयार् है।

दशम मंडल की अर्वार्चीनतार् 

दशम मंडल अन्य मंडलों की अपेक्षार् नूतन तथार् अर्वीचार्न मार्नार् जार्तार् है। इसक प्रधार्न कारण भार्षार् तथार् विषय को लक्ष्य कर वंशमंडल (गोत्रमंडल) से इनकी विभिन्नतार् है:-

भार्षार्गत विभिन्नतार्-ऋग्वेद के प्रार्चीनतम भार्गों में शब्दों में ‘रेफ’ की ही स्थिति है। भार्षार्विदों की मार्न्यतार् है कि संस्कृत भार्षार् ज्यो-ज्यों विकसित होती गर्इ त्यों-त्यों रेफ के स्थार्न लकार क प्रयोग बढ़तार् गयार् है। जल-वार्चक ‘सलिल’ क प्रार्चीन रूप ‘सरिर’ गोत्र मंडलों में प्रयुक्त है, परन्तु दशम मंडल के लकार युक्त शब्द क प्रयोग है। वैयार्करण रूपों के भी स्पष्ट पाथक्य है। प्रार्चीन अंश में पुल्लिग अकारार्न्त शब्दों मं प्रथमार् द्विवनज क प्रत्यय अधिकतर ‘आ’ है (यथार् ‘दार् सुपुर्णार् सयुजार् सखार्यार्’ ऋग्वेद) परंतु दशम मंडल में उसके स्थार्न पर ‘औ’ क भी प्रचलन मिलतार् है- ‘मार् वार्मेती परेती रिषार्म सूर्यार्चन्द्रमसौ घार्तार्’’। प्रार्चीन अंश में क्रियाथक क्रियार् की सूचनार् के लिए तबै, से असे, अध्र्य आदि अनेक प्रत्यय प्रयुक्त होते है। परन्तु दशम मंडल में अधिकतर ‘तुम’ प्रत्यय काही प्रयोग मिलतार् है। ‘कर्तवै’ ‘जीवसे’ ‘अवसे’ आदि प्रार्चीन पदो के स्थार्न पर अधिकतर कर्तुम् जीवितुम् अवितुम् आदि प्रयोगों क प्रार्चाय है। भार्षार्गत विशिष्टतार् ब्रार्म्हण गं्रथों की भार्षार् के सार्मने होने के कारण दशम मंडल इन गं्रथों से कालक्रम में प्रार्चीन नहीं प्रतीत होतार् है।

छन्दोगत विशिष्टय- प्रार्चीन अंशो में उपलब्ध छंदों की अपेक्षार् दशम मंडल के छंदों में पाथक्य हैं । प्रार्चीन काल में वर्णो की संख्यार्य पर ही छन्दो विन्यार्स में विशेष आग्रह थार्, परन्तु अब लघुगुरू के उचित विन्यार्स पर भी सर्वत्र विशेष बल दियार् जार्ने लगार् थार्, जिससे पद्यो के पढ़ने में सुस्वरतार् तथार् लय क आविर्भार्व बड़ी रूचिरतार् के सार्थ होने लगार्। फलत: अब ‘अनुष्टुप’ ने होकर लौलिक संस्कृत के अनुष्टुप ही के समार्न बन गयार्।

छेवगत वैशिष्टय- इस मंडल में उल्लिखित देवों में अनेक नवीन तथार् अनिदिष्टपूर्व तथार् प्रार्चीन देवों के रूप में स्वरूप- परिवर्तन दुष्टिगत होतार् है। वरूण समस्त जगत के नियन्तार्, सर्वज्ञ, सर्वशिक्तमार्न् देव के रूप में पूर्व में निदिष्ट हैं, परन्तु अब उनक शार्सनक्षेत्र समिटि कर केवल जल ही रह जार्तार् है। विश्वनियन्तार् के पद से हट कर वे अब जलदेवतार् के रूप में ही दुष्टिगोचर होते है। मार्नसिक भवनार् तथार् मार्नस वृतियों के प्रतिनिधि रूप से नवीन देव कल्पित किये गये है। ऐसे देवों में श्रद्धार् मन्यु आदि क उल्लेख कियार् जार् सकतार् है। तार्क्ष्र्य की भी स्तुति देवतार् के रूप में यहार्ं उपलब्ध होती है। श्रद्धार् कामार्यनी क बड़ार् बोधक वर्णन एक सूक्त में मिलतार् है।

श्रद्धार्यार्ग्नि: समिध्यते श्रद्धयार् हूयते हवि: । 

श्रद्धार्ं भगस्य मूर्धनि वचसार् वेदयार्मसि।। 

श्रद्धार् से अग्नि क समिन्धन होतार् है, अथात् ज्ञार्नार्ग्नि क प्रज्वलन श्रद्धार् के द्वार्रार् होतार् है। हवि क हवन श्रद्धार् से होतार् है। ऐश्वर्य के ऊध्र्व स्थार्न पर निवार्स करने के लिए हम लोग वचन के द्वार्रार् श्रद्धार् की स्तुति करते है। गार्य की स्तुति में प्रयक्त एक समग्र सूक्त ही वैदिक आर्यो की गोविषयिणी भार्वनार् की बड़े ही सुंदर शब्दों में अभिव्यक्त कर रहार् है। एक पूरे सूक्त में आरण्यार्नी की स्तुति विषय की नवीनतार् के कारण पर्यार्प्त रूपेण आकर्षक है। सूक्त में हम ‘ज्ञार्न’ की एक महनीय देव के रूप में आर्यों में प्रतिष्ठित पार्ते हैं। इसी सूक्त प्रख्यार्त मंत्र में चार्रों संहितार्ओं के द्वार्रार् यज्ञ-कर्म क सम्पार्दन करने वार्ले होतार्, उद्गार्तार् ब्रम्हार् तथार् अध्वर्यु नार्मक चार्र ऋत्विजों क हम स्पष्ट संकेत पार्ते है।

दाशनिक तथ्यों क अविष्कार – इस मंडल में अनेक दाशनिक सूक्तों की उपलब्धि होती है, जो अपनी विचार्रधार्रार् से आर्यों के तार्त्विक चिन्तनों के विकास के सूचक हैं तथार् उतरकालीन प्रतीत होते हैं। ऐसे सूक्तों के नार्सदार्सीय सूक्त तथार् पुरूषसूक्त विशेष उल्लेखनीय हैं। पुरूषसुक्त में सर्वेश्वरवार्द क स्पष्ट प्रतिपार्दन है, जो प्रौढ़ विचार्रधार्रार् क प्रतीत होतार् है। पार्श्चार्त्य विद्वार्न को दृष्टि में धामिक विकास क क्रम इस प्रकार बहुदेववार्द-एकदेववार्द सर्वेश्रवार्द । प्रार्चीनतम काल में अनेक देवों की सतार् में आर्यो क विश्वार्स थार्, जो आगे चलकर एकदेव (प्रजार्पति यार् हिरण्यगर्भ) के रूप में परिणत होकर सर्वेश्वरवार्द पर टिक गयार्। इस विकास की अंतिम दो कोटियार् दशम मंडल में उपलब्ध होती है। फलत: उसक गोत्रमंडल से नूतन होनार् स्वार्भार्विक है।

विषय की नूतनतार्- इस मंडल में भौतिक विषय से संबंध तथार् अध्यार्त्मिक विचार्रधार्रार् से संवलित अनेक सूक्त उपलब्ध होते है। भार्रतीय दृष्टि में श्रद्धार् रखनेवार्ले विद्वार्न के सार्मने तो वेदों के काल निर्णय क प्रश्न ही नहीं उठतार् क्योकि जैसार् हम पहले दिखलार् चुके हैं उनकी दृष्टि में वेद अनार्दि है, नित्य हैं, काल से अनवच्छिन्न हैं। वैदिक ऋषिरार्ज मंत्रों के द्रष्टार्मार्त्र मार्ने गये है, रचयितार् नहीं, परंतु ऐतिहार्सिक पद्धति से वेदों की छार्नबीन करने वार्ले पश्चार्त्य वेदज्ञ तथार् उनके अनुयार्यी भार्रतीय विद्वार्नों की सम्मति में वेदों के आविर्भार्व क प्रश्न एक हल करार्ने योग्य वस्तु है। बहुतों इस विषयार् को सुलझार्ने में वृद्धि लगार्यी है, सूक्ष्म ताकिक बुद्धि तथार् विपुल सार्धनों के पर्यार्प्त प्रमार्णों को इक्ठ्ठार् कियार् है। परन्तु उनके सिद्धार्ंतों में शतार्ब्दियों क ही नहीं बल्कि सहस्त्रार्ब्दियों क अंतर है।

ऋग्वेद क समय 

1. डार्. मैक्समूलर के अनुसार्र 

सबसे पहले प्रोफेसर मैक्समूलर ने 1859 र्इ. में अपने ‘प्रार्चीन संस्कृत सार्हित्य’ नार्मक ग्रंथ में वेदों के कालनिर्णय क प्रथम श्लार्घनीय प्रयार्स कियार्। उनकी मार्न्य सम्मति में वेदों में सर्वप्रार्चीन ऋग्वेद की रचनार् 1200 विक्रमपूर्व में संपन्न हुर्इ। विक्रम में लगभग पार्ंच सौ पहले बुद्ध ने इस धरार्धार्म को अपने जन्म से पवित्र कियार् तथार् मार्नवों के कल्यार्णर्थ एक नवीन धर्म की स्थार्पनार् की।

इसी बु़द्धधर्म के उदय की आधार्रशिलार् पर वैदिककाल के आंरभ क निर्णय सर्वतो-भार्वेन अवलम्बित है। डॉ. मैक्समूलर ने समग्र वैदिकयुग को चार्र विभार्गों में बार्ंटार् है। छन्दकाल, मंत्रकाल, ब्रार्म्हणकाल, तथार् सूत्र काल और प्रत्येक युग की विचार्रधार्रार् के उदय तथार् ग्रंथनिर्मार्ण के लिए उन्होंने 200 वर्षो क काल मार्नार् जार्तार् है। अत:बुद्ध से प्रथम होने के कारण सूत्रकाल क प्रार्रंभ 600 विक्रमपूर्व मार्नार् गयार् है। इस काल में श्रौतसूत्रों (कात्यार्यन, आपस्तम्ब आदि) तथार् गृम्हसूत्रों की निर्मिति प्रधार्नरूपेण अगड़ीकृत की जार्ती है। इससे पूर्व क ब्रार्म्हण काल- जिसमें भिन्न-भिन्न ब्रार्म्हण-गं्रथों की रचनार्, यार्नार्नुष्ठार्न क विपुलीकरण, उपनिषदों के आध्यार्त्मिक सिद्धार्ंतों क विवेचन आदि संपन्न हुआ। इसके विकास के लिये 800 वि.पू.- 600 वि.पू तक दो सौ सार्लों क कल उन्होंने मार्नार् है। इससे पूर्ववर्ती मंत्रयुग के लिए, जिसमें मंत्री क यार्ग-विधार्न की दृष्टि से चार्र विभिन्न संहितार्ओं में संकलन कियार् गयार्, 1000 पूर्व से लेकर 800 वि.पूक समय स्वीकृत कियार् गयार् है। इससे भी पूर्ववर्ती, कल्पनार् तथार् रचनार् की दृष्टि से नितार्न्त श्लार्घनीय युगछंद काल -थार्, जिसमें ऋषियों ने अपनी नव-नवोन्मेषशार्लिनी प्रतिभार् के बल पर अर्थगौरव से भरे हुए मंत्रार्ं की रचनार् की थी। मैक्समूलर की दृष्टि से यही मौलिकतार् क युग थार्, कमनीय कल्पनार्ओं क यही काल थार् जिसके लिए 1200-100 क काल विभार्ग उन्होंने मार्नार् है। ऋग्वेद क यही काल है। अत: बुद्ध के जन्म से पीछे हटते-हटते हम ऋग्वेद की रचनार् आज से लगभग 3200 वर्ष पूर्व की गर्इ थी।

2. लोकमार्न्य तिलक क मत 

लोकमार्न्य की विवेचनार् के अनुसार्र यह समय और भी पूर्ववर्ती होनार् चार्हिए। लोकमार्न्य ने वैदिककाल को चार्र युगों में विभक्त कियार् है:-

  1. अदिति काल (6000-4000 वि.पू.) – इस सुदूर प्रार्चीनकाल में उपार्स्य देवतार्ओं के नार्म, गुण तथार् मुख्य चरित के वर्णन करने वार्ले निविदों (यार्ग संबंधी विधिवार्क्यों) की रचनार् में गद्य और कुछ पद्य की गर्इ तथार् अनुष्ठार्न के अवसर पर उनक प्रयोग कियार् जार्तार् थार्। 
  2. मृगशिरार् -काल (लगभग 4000-2500 वि0 पू0 ) –आर्यसभ्यतार् के इतिहार्स में नितार्न्त महत्त्बशार्ली युग यही थार् जब ऋगवेद के अधिकांश मन्त्रों क निर्मार्ण कियार् गयार् । रचनार् की दृष्टि से यह विशेषत : क्रियार्शील थार् । 
  3. कृत्तिक -काल ( लगभग 2400-1400 वि0 पू0 ) इस काल में त्तैत्तिरीय –तथार् शतपथ आदि अनेक प्रार्चीन ब्रार्ह्मणों क निर्मार्ण सम्पत्र हुआ । ‘ वेदार्ंग ज्योतिष की रचनार् इस युग के अन्तिम भार्ग में की गर्इ क्योंकि इसमें सूर्य और चन्द्रमार् के श्रविष्ठार् के आदि में उत्तर ओर धूम जार्ने क वर्णन मिलतार् है और यह धटनार् गणित के आधार्र पर 1400 वि0 पू0 के आसपार्स अंगीीकृत की गर्इ है। 
  4. अन्तिम -काल ( 1400-500 वि0 पू0 ) एक हजार्र वर्षार् के अन्दर श्रोत्रसुत्र गृह्मसुत्र और दर्शन सूत्रो की रचनार् हुर्इ तथार् बुद्धधर्म क उदय वैदिक धर्म की प्रतिक्रियार् के रूप् में इसके अन्तिम भार्ग में हुआ । 

शिलार्लेख से पुष्टि- 

नवीन अन्वेषणों से इस काल की पुष्टि भी हो रही है । सन् 1107 र्इ0 में डार्क्टर हुगो विन्कलर ने एशियार् मार्इनर ( वर्तमार्न टर्की ) के बोधार्ज -कोर्इ नार्मक स्थार्न में खुदाइ कर एक प्रार्चीन शिलार्लेख की । यह हमार्रे विषय के समर्थन में एक नितार्न्त महत्त्वपूर्ण प्रमार्ण मार्नार् जार्तार् है । पश्रिमी एशियार् के खण्ड में कभी दो प्रार्चीन जार्तियों क निवार्स थार् -एक क नार्म थार् ‘हित्तिति’ और दूसरे क ‘मितार्नि’। र्इटो पर खुदे लेख से पतार् चलतार् है कि इन दोनों जार्तियों के रार्जार्ओं ने अपने पार्रस्परिक कलह के निवार्रण के लिए आपस में सन्धि के सरंक्षक के रूप में दोनो जार्तियों की देवतार्ओं की अथ्यथनार् की गर्इ । सरंक्षक देवो की सूची में अनेक बार्बुलदेशीय तथार् हित्तिति जार्ति के अतिरिक्त मितार्नि जार्ति के देवों में मित्र ;वरूण ; इन्द्र तथार् नार्सत्यौ (अश्विन् ) क नार्म उपलब्ध होतार् हैं। मितार्नि नरेश क नार्म ‘मत्तिउजार्’ थार् और हित्तिति रार्जार् की विलक्षण संज्ञार् थी -’सुब्बि -लुलिउमार्। दोनों में कभी धनधोर युद्ध हुआ थार् ; जिसके विरार्म के अवसर पर मितार्नि नरशे ने अपने शत्रु रार्जार् की पुत्री के विवार्ह कर अपनी नवीन मैत्री के उपर मार्नो मुहर लगार् दी। इसी समय की पूर्वोक्त सन्धि है जिसमें चार्र वैदिक देवतार्ओं के नार्म मिलते है । ये लेख 1400 वि0 पू0 के है। अब प्रश्न है कि मितार्नि के देवतार्ओं में वरूण; इन्द्र आदि देवो क नार्म क्योंकर सम्मिलित कियार् गयार् ? उत्तर में यूरोपीय विद्वार्नों ने विलक्षण कल्पनार्ओं की लड़ी लगार् दी है । इन प्रश्नों क न्यार्य्य उत्तर यही है मितार्नि जार्ति भार्रतीय वैदिक आर्यो की एक शार्ख थी जों भार्रत से पश्रिमी एशियार् में जार्कर बस गर्इ थी यार् वैदिक धर्म को मार्नने वार्ली एक आर्य जार्ति थी। पश्चिमी एशियार् तथार् भार्रत क परस्पर सम्बन्ध उस प्रार्चीन काल में अवश्यमेव ऐतिहार्सिक प्रमार्णों पर सिद्ध कियार् जार् सकतार् है। वरुण मित्र आदि चार्रों देवतार्ओं क जिस प्रकार क्रम से निर्देश कियार् गयार् है उससे इनके ‘वैदिक देवतार्’ होने में तनिक भी सन्देह नहीं है। ‘इन्द्र’ को तो पार्श्चार्त्य विद्वार्न् भी आर्यार्यर्त मं ही उ˜ार्वित, आर्यो क प्रधार्न सहार्यक, देवतार् मार्नते है।

इस शिलार्लेख क समय 1400 विक्रमी पूर्व है। इसक अर्थ यह है कि इस समय से बहुत पहिले आर्यो ने आर्यार्वर्त में अपने वैदिक धर्म तथार् वैदिक देवतार्ओं की कल्पनार् पूर्ण कर रखी थी। आर्यो की कोर्इ शार्खार् पश्चिमी एशियार् में भार्रवतर्ष से आकर बस गर्इ और यहीं पर उसने अपने देवतार् तथार् धर्म क प्रचुर प्रचार्र कियार्। बहुत सम्भव है कि वैदिक देवतार्ओं को मार्न्य तथार् पूज्य मार्नने वार्ली यह मितार्नी जार्ति भी वैदिक आर्यों की ही किसी शार्खार् के अन्तभ्र्ार्ुक्त हो। इस प्रकार आजकल पार्श्चार्त्य विद्वार्न् वेदों क प्रार्चीनतम काल विक्रमपूर्व 2000-2500 तक मार्नने लगे हैं, परन्तु वेदों में उल्लिखित ज्योतिष सम्बन्धी तथ्यों की युक्तियुक्ततार् तथार् उनके आधार्र पर निण्र्ार्ीत कालगणनार् में अब इन विद्वार्नों को भी विश्वार्स होने लगार् है। अत: तिलकजी के ऊपर निर्दिष्ट सिद्वार्न्त को ही हम इस विषय में मार्न्य तथार् प्रमार्णिक मार्नते हैं।

3. भूगर्भसम्बन्धी वैदिक तथ्य के अनुसार्र – 

ऋग्वेद में भूगर्भ-सम्बन्धी अनेक ऐसी घटनार्ओं क वर्णन है जिसके आधार्र पर ऋग्वेद के समय क निरूपण कियार् जार् सकतार् हैं तत्कालीन युग में सिन्धु नदी के किनार्रे आर्यो के यज्ञविधार्न विशेषरूप से होते थे। इस नदी के विषय में ऋग्वेद क कथन है कि नदियों में पवित्र सरस्वती नदी ऊँचे गिरिश्रृष् से निकल कर समुद्र में गिरती है-

एक चेतन् सरस्वती नदीनार्म्, 

शुचिर्यती गिरिभ्य आ समुद्रार्त्। (ऋग्वेद 7/95/2) 

एक दूसरे मन्त्र में (3/33/2) सरस्वती और शुतुद्रि नदियों के गरजते हुए समुद्र में गिरने क उल्लेख मिलतार् है। ऋग्वेद के अनुशीलन से प्रतीत होतार् है कि आजकल जहार्ँ रार्जपूतार्नार् की मरुभूमि है वहार्ँ प्रार्चीनकाल में एक विशार्ल समुद्र थार् और इसी समुद्र में सरस्वती तथार् शुतुद्रि नदियार्ँ हिमार्लय से बहकर गिरती थीं। जार्न पड़तार् है कि रार्जपूतार्नार् समुद्र के गर्भ में कोर्इ भयंकर भूकम्प सम्बन्धी विप्लव हुआ, फलस्वरूप एक विस्तृत भूखण्ड ऊपर निकल आयार् और जो सरस्ती नदी वस्तुत: समुद्र (रार्जपूतार्नार् सार्गर) में ही गिरती थी वह अब मरुभूमि के सैकत रार्शि में विलीन हो गर्इ। तार्ण्ड्य-ब्रार्ह्मण (25/10/6) से स्पष्अ है कि सरस्वती ‘विनशन’ में लुप्त होकर ‘प्लक्ष-प्रस्रवण’ में पुन: आविभ्र्ार्ूत होती थी। इसक तार्त्पर्य यह है कि सरस्वती समुद्र तक पहुँचने के लिए पूरार् प्रयत्न करती थी, परन्तु रार्जपूतनार् के बढ़ते हुए मरुस्थल में उसे अपनी जीवनलीलार् समार्प्त करनी पड़ी।

ऋग्वेद के अनुशीलन से आर्यों के निवार्स-स्थार्न सप्तसिन्धु प्रदेश के चार्रों ओर चार्र समुद्रों के अस्तित्व क पतार् चलतार् है। ऋग्वेद के एक मन्त्र (10/136/5) में सप्तसिन्धु के पूर्व तथार् पष्चिम में दो समुद्रों के वर्तमार्न होने क उल्लेख है। जिनमें समुद्र तो आज भी वर्तमार्न है, परन्तु पूर्वी समुद्र क पतार् नहीं है। ऋग्वेद के दो मन्त्रों में चुत:समुद्रों क नि:सन्दिग््रध निर्देश है। प्रथम मन्त्र में-

रार्य: समुद्रार्§ार्तुरोSसमभ्यं सोम वि§ार्त:। 

आ पवस्व सहस्रिण:।। (ऋव्म् 9/33/6) 

सोम से प्राथनार् है कि धनसम्बन्धी चार्रों समुद्रों (अर्थार्त् चार्रों समुद्रों से युक्त भूखण्ड के आधिपत्य) को चार्रों दिशार्ओं से हमार्रे पार्स लार्वे तथार् सार्थ ही असीम अभिलार्षार्ओं को भी लार्वें। दूसरे मन्त्र (10/47/2) ‘स्वार्युधं स्वार्युधं स्ववसं सुनीथं चुत:समुद्रं धरुण रयीणार्म्’’ में भी स्पष्ट ही ‘चतु:समुद्रं’ क उल्लेख है। इससे स्पष्ट है कि ऋग्वेदीय युग में आर्यप्रदेश के चार्रों ओर समुद्र लहरार् रहे थे। इनमें पूर्वी समुद्र आज के उत्तर प्रदेश तथार् बिहार्र में थार्, दक्षिण समुद्र रार्जपूतार्नार् की मरुभूमि में थार्, पिश्मी समुद्र आज भी वर्तमार्न है, उत्तरी समुद्र की स्थिति उत्तर दिशार् में थी, क्योंकि भूगर्भवेत्तार्ओं के अनुसार्र एशियार् के उत्तर में बल्ख और फार्रस से उत्तर में वर्तमार्न विशार्ल सार्गर की सत्तार् थी, जिसे वे ‘एशियाइ भूमध्य सार्गर’ के नार्म से पुकारते है। यह उत्तर में आर्कटिक महार्सार्गर से सम्बद्ध थार् और आजकल के ‘कृष्ण सार्गर’ (काश्यप सार्गर), अरार्ल सार्गर तथार् वार्ल्कश हृद इसी के अवशिष्ट रूप मार्ने जार्ते हैं।

उन दिनों समस्त गंगार्-प्रदेश, हिमार्लय की पार्द-भूमि तथार् असम क विस्तृत पर्वतीय प्रदेश समुद्र के गर्भ में थे। कालार्न्तर में गंगार् नदी हिमार्लय की गगनचुम्बी पर्वतश्रेणी से निकलकर सार्मार्न्य नदी के रूप में बहती हुर्इ हरद्वार्र के समीप ही ‘पूर्व समुद्र’ में गिरने लगी। यही कारण है कि ऋग्वेद के प्रसिद्ध नदीसूक्त (10/75) में गंगार् क बहुत ही संक्षिप्त परिचय मिलतार् है। उस समय पंजार्ब के दक्षिण तथार् पूर्व में समुद्र थार्, जिसके कारण दक्षिण भार्रत एक पृथक्-खण्ड-सार् दीखतार् थार्। पंजार्ब में उन दिनों शीत क प्रार्बल्य थार्। इसलिये ऋग्वेद में वर्ष क नार्म ‘हिम’ मिलतार् है। भूतत्त्वज्ञों ने सिद्ध कियार् है। कि भूमि और जल के ये विभिन्न भार्ग तथार् पंजार्ब में शीतकाल क प्रार्बल्य प्लोस्टोसिन काल अथवार् पूर्वप्लीस्टोसिन काल की बार्त है। यह काल र्इसार् से पचार्स हजार्र वर्ष से लेकर पचीस हजार्र वर्ष तक निर्धार्रित कियार् गयार् है। भूतत्त्वज्ञों ने यह भी स्वीकार कियार् है कि इस काल के अनन्तर रार्जपूतार्ने के समुद्र माग के ऊपर निकल आने के सार्थ ही हिमार्लय की नदियों के द्वार्रार् आहृत मृित्त्ार्क से गंगार् प्रदेश की समतल भूमि बन गर्इ और पंजार्ब के जलवार्यु मे उष्णतार् आ गर्इ। पंजार्ब के आसपार्स से रार्जपूतार्नार् समद्र तथार् हिमसंहितार्ओं (ग्लेशियर) के तिरोहित होने तथार् वृष्टि के अभार्व के कारणय ही सरस्वती क पुण्य-प्रवार्ह सूक्ष्म रूप धार्रण करतार् हुआ रार्जपूतार्ने की बार्लुका-रार्शि में विलीन हो गयार्।

ऊपर निर्दिष्ट भौगोलिक तथार् भूगर्भ-संबंधी घटनार्ओं के आधार्र पर ऋ़ग्वेद की रचनार् तथार् तत्कालीन सभ्यतार् के अविर्भार्व क समय कम से कम र्इसार् से पच्चीस हजार्र वर्ष पूर्व मार्नार् जार्नार् चार्हिए। पार्श्चार्त्य विद्वार्नों की दृष्टि में ऋग्वेद के ऊपर दिये गये उल्लेख वैज्ञार्निक न होकर भार्वुक ऋषियों की कल्पनार्-मार्त्र से प्रसूत हैं। उन्हें आधार्र मार्न कर वैज्ञार्निक अनुसंधार्न की बार्त उन्हें उचित नहीं प्रतीत होती।

पण्डित दीनार्नार्थ शार्स्त्री चुटेल ने अपने ‘वेदकालनिर्णय’ नार्मक ज्योति स्तत्त्ार्मीमार्ंसक ग्रंथ के आधार्र पर वेदों क काल बहुत ही प्रार्चीन (आज से तीन लार्ख वर्ष पूर्व) सिद्ध करने क प्रयत्न कियार् है। आजकल के वेदकाल के पार्श्चार्त्य मीमार्ंसक विद्वार्न इतने सुदूर प्रार्चीनकाल क स्वप्न भी नहीं देख सकते। उनक कथन है कि वेदों में निर्दिष्ट ज्योतिषशार्स्त्र-विषयक निर्देश केवल कल्पनार्-प्रसूत हैं, उनक कथन गणनार् के आधार्र पर उनक निर्धार्रण नहीं कियार् गयार् है। इस प्रकार वेदों के काल-निर्धार्रण में विद्वार्नों के मन्तव्यों में जमीन-आसमार्न क अंतर है। ऋग्वेद के निर्मार्ण-काल के विषय में ये ही प्रधार्न मत है। इतनार् तो अब निश्चित-प्रार्य है कि वेदों क समय अब उतनार् अर्वार्चीन नहीं है जितनार् पहिले मार्नार् जार्तार् थार्। पश्चिमी विद्वार्न लोग भी अब उनक समय आज से पार्ंच हजार्र वर्ष पूर्व मार्नने लगे है। वेदों के काल के विषय में इतने विभिन्न मत है कि उनक समन्वय कथमपि नहीं कियार् जार् सकतार्। वेद में उपलब्ध ज्योतिषशार्स्त्रीय तथ्यों को कोर्इ काल्पनिक मार्नते हैं, तो कोर्इ गणनार् के आधार्र पर निर्दिष्ट वैज्ञार्निक तथार् सत्य मार्नते है। इसी दृष्टि-भेद के कारण समय के निरूपण में इतनी विमति और विभिन्नतार् है।

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