आर्थिक विकास क मार्पन

आर्थिक संवृद्धि तथार् आर्थिक विकास को कैसे मार्पार् जार्य ? मार्पदण्ड के रूप में क्यार् आधार्र चुनार् जार्य? इसके सम्बन्ध में अर्थशार्स्त्रियों में मतभेद हैं। विभिन्न अर्थशार्स्त्रियों ने इसको मार्पने के सम्बन्ध में अनेक मार्पदण्डों की चर्चार् की है। वार्णिकवार्दी अर्थशार्स्त्री किसी देश में सोने एवं चार्ंदी की मार्त्रार् को ही आर्थिक संवृद्धि क सूचक मार्नते थे। एडमस्मिथ ने किसी भी देश के आर्थिक विकास के मार्पदण्ड के रूप में उस देश की उत्पार्दन शक्ति, तकनीकी ज्ञार्न, श्रमिकों की दशार् तथार् विशिष्टीकरण को स्वीकार कियार्। जे0 एस0 मिल ने अर्थ व्यवस्थार् में सहकारितार् के स्तर तथार् कार्ल माक्स ने समार्जवार्द की स्थार्पनार् को ही आर्थिक विकास की चरम अवस्थार् मार्नार्। मार्यर एवं बार्ल्डबिन जैसे अर्थशार्स्त्री आर्थिक संवृद्धि तथार् आर्थिक विकास को वार्स्तविक रार्ष्ट्रीय आय की वृद्धि को दीर्घकालीन प्रक्रियार् के रूप में स्वीकार करते हैं तो दूसरी और रोस्टोव जैसे अर्थशार्स्त्री प्रति व्यक्ति आय की वृद्धि तथार् हिगिन्स, बी0 के0 आर0 बी0 रार्व सब जैसे लोग उत्पार्दकतार् की वृद्धि को ही आर्थिक संवृद्धि क मार्पक मार्नते हैं।

आर्थिक विकास क मार्पन

आर्थिक विकास’ आज के इस प्रगतिशील युग क एक बहुचर्चित विषय है और प्रत्येक रार्ष्ट्र विकास की इस दौड़ में दूसरों से आगे निकलने के लिये निरन्तर प्रयत्नशील है। पर सवार्ल यह उठतार् है कि आर्थिक विकास की कसौटी अथवार् मार्नदण्ड क्यार् हो? अर्थार्त किसी देश में आर्थिक विकास हो रहार् है अथवार् नहीं, इस बार्त क किस प्रकार पतार् लगार्यार् जार्ए ? आर्थिक विकास की मार्प हेतु विकासवार्दी अर्थशार्स्त्रियों द्वार्रार् निम्नलिखित मार्पदण्ड प्रस्तुत किए गए हैं।

सकल रार्ष्ट्रीय उत्पार्द एवं आर्थिक विकास

कुछ अर्थशार्स्त्री सकल रार्ष्ट्रीय उत्पार्द में वृद्धि को ही आर्थिक विकास क सूचक मार्नते हैं। उनके अनुसार्र, ‘आर्थिक विकास को समय की किसी दीर्घार्वधि में एक अर्थव्यवस्थार् की वार्स्तविक रार्ष्ट्रीय आय में वृद्धि के रूप में मार्पार् जार्ए।’

सकल रार्ष्ट्रीय उत्पार्द के मार्प में कठिनार्ईयार्

किसी भी देश की रार्ष्ट्रीय आय क आगणन करनार् एक जटिल समस्यार् है जिसमें ये कठिनार्इयार्ं पार्ई जार्ती हैं।

  1. रार्ष्ट्र की परिभार्षार् – प्रथम कठिनार्ई ‘रार्ष्ट्र’ की परिभार्षार् है। हर रार्ष्ट्र की अपनी रार्जनीतिक सीमार्एं होती है परन्तु रार्ष्ट्रीय आय में रार्ष्ट्र की सीमार्ओं से बार्हर विदेशों में कमार्ई गई देशवार्सियों की आय भी सम्मिलित होती है। इस प्रकार रार्ष्ट्रीय आय के दृष्टिकोण से ‘रार्ष्ट्र’ की परिभार्षार् रार्जनैतिक सीमार्ओं को पार्र कर जार्ती है। इस समस्यार् को सुलझार्नार् कठिन है।
  2. कुछ सेवार्एं – रार्ष्ट्रीय आय सदैव मुद्रार् में ही मार्पी जार्ती है परन्तु बहुत सी वस्तुएं और सेवार्एं ऐसी होती हैं जिनक मुद्रार् में मूल्यार्ंकन करनार् मुश्किल होतार् है, जैसे किसी व्यक्ति द्वार्रार् अपने शौक के लिए चित्र बनार्नार्, मार्ं क अपने बच्चों को पार्लनार् आदि। इसी प्रकार जब एक फर्म क मार्लिक अपनी महिलार् सेक्रेटरी से विवार्ह कर लेतार् है तो उसकी सेवार्एं रार्ष्ट्रीय आय में शार्मिल नहीं होती जबकि विवार्ह से पहले वह रार्ष्ट्रीय आय क भार्ग होती हैं। ऐसी सेवार्एं रार्ष्ट्रीय आय में सम्मिलित न होने से रार्ष्ट्रीय आय कम हो जार्ती है।
  3. दोहरी गणनार् – रार्ष्ट्रीय आय की परिगणनार् करते समय सबसे बड़ी कठिनार्ई दोहरी गणनार् की होती है। इसमें एक वस्तु यार् सेवार् को कई बार्र गिनने की आशंक बनी रहती है। यदि ऐसार् हो तो रार्ष्ट्रीय आय कई गुनार् बढ़ जार्ती है। इस कठिनार्ई से बचने के लिए केवल अन्तिम वस्तुओं और सेवार्ओं को ही लियार् जार्तार् है जो आसार्न काम नहीं है।
  4. अवैध क्रियार्एं – रार्ष्ट्रीय आय में अवैध क्रियार्ओं से प्रार्प्त आय सम्मिलित नहीं की जार्ती जैसे, जुए यार् चोरी से बनार्ई गई शरार्ब से आय। ऐसी सेवार्ओं में वस्तुओं क मूल्य होतार् है और वे उपभोक्तार् की आवश्यकतार्ओं को भी पूरार् करती है परन्तु इनको रार्ष्ट्रीय आय में शार्मिल न करने से रार्ष्ट्रीय आय कम रह जार्ती है।
  5. अन्तरण भुगतार्न – रार्ष्ट्रीय आय में अन्तरण भुगतार्नों को सम्मिलित करने की कठिनार्ई उत्पन्न होती है। पेन्शन, बेरोजगार्री भत्तार् तथार् सावजनिक ऋणों पर ब्यार्ज व्यक्तियों को प्रार्प्त होते हैं पर इन्हें रार्ष्ट्रीय आय में सम्मिलित कियार् जार्ए यार् न कियार् जार्ये, एक कठिन समस्यार् है। एक ओर तो ये प्रार्प्तियार्ं व्यक्तिगत आय क भार्ग हैं, दूसरी ओर ये सरकारी व्यय हैं। यदि इन्हें दोनों ओर सम्मिलित कियार् जार्ए तो रार्ष्ट्रीय आय में बहुत वृद्धि हो जार्एगी। इस कठिनार्ई से बचने के लिए इन्हें रार्ष्ट्रीय आय में से घटार् दियार् जार्तार् है।
  6. वार्स्तविक आय – मुद्रार् के रूप में रार्ष्ट्रीय आय की परिगणनार् वार्स्तविक आय क न्यून आगणन करती है। इसमें किसी वस्तु के उत्पार्दन की प्रक्रियार् में किए गए अवकाश क त्यार्ग शार्मिल नहीं होतार्। दो व्यक्तियों द्वार्रार् अर्जित की गई आय समार्न हो सकती है परन्तु उसमें से यदि एक व्यक्ति दूसरे की अपेक्षार् अधिक घंटे काम करतार् है तो यह कहनार् कुछ ठीक ही होगार् कि पहले की वार्स्तविक आय कम बतार्ई गई है। इस प्रकार रार्ष्ट्रीय आय वस्तु के उत्पार्दन की वार्स्तविक लार्गत को नहीं लेती।
  7. सावजनिक सेवार्एं – रार्ष्ट्रीय आय की परिगणनार् में बहुत सी सावजनिक सेवार्एं भी ली जार्ती हैं, जिनक ठीक-ठीक हिसार्ब लगार्नार् कठिन होतार् है। पुलिस तथार् सैनिक सेवार्ओं क आगणन कैसे कियार् जार्ए ? युद्ध के दिनों में तो सेनार् क्रियार्शील होती है जबकि शार्न्ति में छार्वनियार्ं में ही विश्रार्म करती है। इसी प्रकार सिंचार्ई तथार् शक्ति परियोजनार्ओं से प्रार्प्त लार्भों क मुद्रार् के रूप में रार्ष्ट्रीय आय में योगार्दार्न क हिसार्ब लगार्नार् भी एक कठिन समस्यार् है।
  8. पूंजीगत लार्भ यार् हनियार्ं – जो सम्पत्ति मार्लिकों को उनकी पूंजी परिसम्पत्तियों के बार्जार्र मूल्य में वृद्धि, कमी यार् मार्ंग में परिवर्तनों से होती है वे सकल रार्ष्ट्रीय उत्पार्द (जी0 एन0 पी0) में शार्मिल नहीं की जार्ती है क्योंकि ऐसे परिवर्तन चार्लू आर्थिक क्रियार्ओं के कारण नहीं होतार् है। जब पूंजी यार् हार्नियार्ं चार्लू प्रवार्ह यार् उत्पार्दकीय क्रियार्ओं के अप्रवार्ह के कारण होते हैं तो उन्हें जी0 एन0 पी0 में सम्मिलित कियार् जार्तार् है। इस प्रकार पूंजी लार्भों यार् हार्नियों की रार्ष्ट्रीय आय में आगणन करने की बहुत कठिनार्ई होती है।
  9. मार्ल सूची परिवर्तन – सभी मार्ल सूची परिवर्तन चार्हे ऋणार्त्मक हों यार् धनार्त्मक जी0 एन0 पी0 में शार्मिल किये जार्ते हैं। परन्तु समस्यार् यह है कि फर्में अपनी मार्ल सूचियों को उनकी मूल्य लार्गतों के हिसार्ब से दर्ज करती हैं न कि उनकी प्रतिस्थार्पन लार्गत के हिसार्ब से। जब कीमतें बढ़ती है तो मूल्य सूचियों के अंकित मूल्य में लार्भ होतार् है। इसके विपरीत कीमतें गिरने पर हार्नि होती है। अत: जी0 एन0 पी0 क सही हिसार्ब लगार्ने के लिए मार्ल सूची समार्योजन की आश्यकतार् होती है जो कि बहुत कठिन काम है।
  10. मूल्य ह्रार्स – जब पूंजी मूल्य ह्रार्स को जी0 एन0 पी0 में से घटार् दियार् जार्तार् है तो शुद्ध रार्ष्ट्रीय उत्पार्द (एन0 एन0 पी0) प्रार्प्त होती है। परन्तु मूल्य ह्रार्स की गणनार् की समस्यार् बहुत मुश्किल है। उदार्हरणाथ यदि कोई ऐसी पूंजी परिसम्पत्ति है जिसकी प्रत्यार्शित आयु बहुत अधिक जैसे 50 वर्ष है, तो उसकी चार्लू मूल्य ह्रार्स दर क हिसार्ब लगार् सकनार् बहुत कठिन होगार् और यदि परिसम्पत्तियों की कीमतों में प्रत्येक वर्ष परिवर्तन होतार् जार्ए, तो यह कठिनार्ई और बढ़ जार्ती है। मार्ल सूचियों के विपरीत मूल्य ह्रार्स मूल्यार्ंकन कर पार्नार् बहुत कठिन और जटिल तरीक होतार् है।
  11. हस्तार्न्तरण भुगतार्न – रार्ष्ट्रीय आय के मार्प में हस्तार्न्तरण भुगतार्नों की समस्यार् भी पार्ई जार्ती है। व्यक्तियों को पेंशन, बेकारी भत्तार् और सावजनिक ऋण पर ब्यार्ज प्रार्प्त होतार् है। परन्तु इन्हें रार्ष्ट्रीय आय में शार्मिल करने की कठिनार्ई उत्पन्न होती है। एक ओर तो यह अर्जन व्यक्तिगत आय क भार्ग है और दूसरी ओर यह सरकारी व्यय है।

प्रति व्यक्ति आय एवं आर्थिक विकास

दूसरी परिभार्षार् क सम्बन्ध लम्बी अवधि में प्रति व्यक्ति वार्स्तविक आय में वृद्धि से है। ‘‘ प्रति व्यक्ति वार्स्तविक आय यार् उत्पार्दन में वृद्धि’’ के रूप में आर्थिक विकास की परिभार्षार् देने में अर्थशार्स्त्री एकमत हैं। बुकैनन तथार् एलिस के अनुसार्र ‘‘ विकास क अर्थ पूंजी निवेश के उपयोग द्वार्रार् अल्पविकसित क्षेत्रों की वार्स्तविक आय सम्भार्व्यतार्ओं क विकास करने के लिए ऐसे परिवर्तन लार्नार् और ऐसे उत्पार्दक स्रोतों क बढ़ार्नार् है, जो प्रति व्यक्ति वार्स्तविक आय बढ़ार्ने की संभार्वनार् प्रकट करते है।’’ इन परिभार्षार्ओं क उद्देश्य इस बार्त पर बल देनार् है कि आर्थिक विकास के लिए वार्स्तविक आय में वृद्धि की दर जनसंख्यार् में वृद्धि की दर से अधिक होनी चार्हिए। परन्तु फिर भी कठिनार्ईयों रह जार्ती हैं।

यहॉ यह भी संभव है कि प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि के परिणार्मस्वरूप जन सार्धार्रण के वार्स्तविक जीवन स्तर में सुधार्र न हो। यह संभव है कि जब प्रति व्यक्ति वार्स्तविक आय बढ़ जार्ती है, तो प्रति व्यक्ति उपभोग की मार्त्रार् कम होती जार् रही हो। हो सकतार् है कि लोग बचत की दर बढ़ार् रहे हों, यार् फिर सरकार स्वयं इस बढ़ी हुई आय को सैनिक अथवार् अन्य उद्देश्यों के लिए इस्तेमार्ल कर रही हों। वार्स्तविक रार्ष्ट्रीय आय में वृद्धि के बार्वजूद जनसार्धार्रण की गरीबी क दूसरार् कारण यह भी हो सकतार् है कि बढ़ी हुई आय बहुसंख्यक गरीबों के पार्स जार्ने के बजार्ए मुट्ठी भर अमीरों के हार्थ में जार् रही हो। इसके अतिरिक्त, इस प्रकार की परिभार्षार् उन प्रश्नों को गौण बनार् देती है जो समार्ज के ढार्ंचे, उनकी जनसंख्यार् के आकार एवं बनार्वट, उसकी संस्थार्ओं तथार् संस्कृति सार्धन-स्वरूप और समार्ज के सदस्यों में उत्पार्दन के समार्न वितरण से सम्बन्ध रखते हैं।

प्रति व्यक्ति आय आगणन की कठिनार्इयार्ं –

अल्प विकसित देशों में प्रति व्यक्ति रार्ष्ट्रीय आय के मार्प तथार् उन्नत देशों की प्रति व्यक्ति आय से उनकी तुलनार् करने में भी बड़ी कठिनार्इयार्ं उत्पन्न होती हैं। जिनके कारण नीचे दिये जार् रहे हैं।

  1. अमौद्रिक क्षेत्र – अल्पविकसित देशों मे एक महत्वपूर्ण अमौद्रिक क्षेत्र होतार् है जिसके कारण रार्ष्ट्रीय आय क हिसार्ब लगार्नार् कठिन है। कृषि क्षेत्र में जो उत्पार्दन होतार् है, उसक बहुत- सार् भार्ग यार् तो वस्तुओं में विनिमय कर लियार् जार्तार् है यार् फिर व्यक्तिगत उपभोग के लिए रख लियार् जार्तार् है। इसके परिणार्म स्वरूप प्रति व्यक्ति रार्ष्ट्रीय आय कम बतार्ई जार्ती है।
  2. व्यार्वसार्यिक विशिष्टीकरण क अभार्व – ऐसे देशों में व्यार्वसार्यिक विशिश्टीकरण क अभार्व होतार् है। जिससे वितरणार्त्मक हिस्सों के द्वार्रार् रार्ष्ट्रीय आय की गणनार् करनार् कठिन हो जार्तार् है। उपज के अतिरिक्त किसार्न ऐसी अनेक वस्तुओं क उत्पार्दन करते हैं, जैसे अण्डे, दूध, वस्त्र आदि जिन्हें प्रति व्यक्ति रार्ष्ट्रीय आय के अनुमार्न में कभी शार्मिल नहीं कियार् जार्तार्।
  3. अशिक्षार् – अल्प विकसित देशों में अधिकतर लोग अशिक्षित होते हैं और हिसार्ब-कितार्ब नहीं रखते, और यदि हिसार्ब कितार्ब रखें भी तो अपनी सही आय बतार्ने को तैयार्र नहीं होते। ऐसी स्थिति में मोटे तौर पर ही अनुमार्न लगार्यार् जार् सकतार् हैं जो कि दोशपूर्ण होतार् है।
  4. गैर-बार्जार्र लेन-देन –रार्ष्ट्रीय आय के आगणन में केवल उन वस्तुओं और सेवार्ओं को सम्मिलित कियार् जार्तार् है जिनक वार्णिज्य में प्रयोग होतार् है। परन्तु अल्पविकसित देशों में गार्ंवों में रहने वार्ले लोग प्रार्थमिक वस्तुओं से उपभोग-वस्तुओं क निर्मार्ण करते हैं और बहुत से खर्चों से बच जार्ते हैं। वे अपनी झोपड़ियार्ं, वस्त्र तथार् अन्य आवश्यक वस्तुएं स्वयं बनार् लेते हैं। इस प्रकार अल्पविकसित देशों में अपेक्षार्कृत कम वस्तुओं क माकेट के माग से प्रयोग होतार् है और इसीलिये वे प्रति व्यक्ति रार्ष्ट्रीय आय के आगणन में भी शार्मिल नहीं होतार् है।
  5. वार्स्तविक आय – मुद्रार् के रूप में रार्ष्ट्रीय आय की गणनार् वार्स्तविक आय क न्यून अनुमार्न करती है। इसमें किसी वस्तु के उत्पार्दन की वार्स्तविक लार्गत, प्रयत्न यार् उत्पार्दन की प्रक्रियार् में किये गये अवकाश क त्यार्ग शार्मिल नहीं होतार्। दो व्यक्तियों द्वार्रार् अर्जित की गयी आय समार्न हो सकती है परन्तु यदि उनमें एक व्यक्ति दूसरे की अपेक्षार् अधिक घंटे काम करतार् है, तो यह कहनार् कुछ ठीक नहीं होगार् कि पहले की वार्स्तविक आय कम बतार्यी गयी है।
  6. कीमत परिवर्तन – कीमत स्तर में परिवर्तन के कारण जो परिवर्तन उत्पार्दन में होते हैं, उसक उचित मार्प रार्ष्ट्रीय आय के आगणन में नहीं कर पार्ते। कीमत स्तर के परिवर्तन को मार्पने के लिए काम में लार्ये जार्ने वार्ले सूचकांक भी केवल मोटे तौर पर अंदार्जे से बनार्ये जार्ते हैं। फिर भिन्न-भिन्न देशों में कीमत स्तर भी भिन्न होते हैं। प्रत्येक देश में उपभोक्तार्ओं की इच्छार्ऐं और अधिमार्न भी भिन्न होते हैं। इसीलिये विभिन्न देशों के प्रति व्यक्ति रार्ष्ट्रीय आय के आंकड़े प्रार्य: भं्रार्तिजनक तथार् अतुलनीय होते हैं।
  7. भ्रमपूर्ण आंकड़े – अविश्वसनीय तथार् भ्रमपूर्ण आंकड़ों के कारण अल्पविकसित देशों के प्रति व्यक्ति आय के हिसार्ब कितार्ब में उसके कम यार् अधिक बतार्ये जार्ने की संभार्वनार् रहती है। इन सब सीमार्ओं के बार्वजूद, विभिन्न देशों के आर्थिक प्रगति के स्तर के लिए सबसे अधिक व्यार्पक रूप से कियार् जार्ने वार्लार् मार्प प्रति व्यक्ति आय ही है। फिर भी, अल्पविकास सूचकों के रूप में केवल प्रति व्यक्ति आय आगणनों क कोई मूल्य नहीं है।

आर्थिक कल्यार्ण एवं आर्थिक विकास

विभिन्न देशों में यह प्रवृत्ति भी होती है कि आर्थिक कल्यार्ण के दृष्टिकोण से आर्थिक विकास की परिभार्षार् दी जार्ये। ऐसी प्रक्रियार् को आर्थिक विकास मार्नार् जार्ये जिससे प्रति व्यक्ति वार्स्तविक आय में वृद्धि होती है और उसके सार्थ सार्थ असमार्नतार्ओं क अंतर कम होतार् है तथार् समस्त जनसार्धार्रण के अधिमार्न संतुष्ट होते हैं। इसके अनुसार्र आर्थिक विकास एक ऐसी प्रक्रियार् है जिसके द्वार्रार् व्यक्तियों के वस्तुओं और सेवार्ओं के उपभोग में वृद्धि होती है। ओकन और रिचर्डसन के शब्दों में ‘‘आर्थिक विकास’’ भौतिक समृद्धि में ऐसार् अनवरत दीर्घकालीन सुधार्र है। जो कि वस्तुओं और सेवार्ओं के बढ़ते हुए प्रवार्ह में प्रतिबिम्बित समझार् जार् सकतार् है।

इसकी सीमार्ए :- यह परिभार्षार् भी सीमार्ओं से मुक्त नहीं है। प्रथम, यह आवश्यक नहीं है कि वार्स्तविक रार्ष्ट्रीय आय में वृद्धि क अर्थ ‘‘आर्थिक कल्यार्ण’’ में सुधार्र ही हो। ऐसार् संभव हैं कि वार्स्तविक रार्ष्ट्रीय आय यार् प्रति व्यक्ति आय के बढ़ने से अमीर अधिक अमीर हो रहे हों यार् गरीब और अधिक गरीब। इस प्रकार केवल आर्थिक कल्यार्ण में वृद्धि से ही आर्थिक विकास नहीं होतार्, जब कि रार्ष्ट्रीय आय क वितरण न्यार्यपूर्ण न मार्नार् जार्ये। दूसरे, आर्थिक कल्यार्ण को मार्पते समय कुल उत्पार्दन की संरचनार् क ध्यार्न रखनार् पड़तार् है जिसके कारण प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि होती है, और यह उत्पार्दन कैसे मूल्यार्ंकित हो रहार् है? बढ़ार् हुआ कुल उत्पार्दन पूंजी पदाथो से मिलकर बनार् हो सकतार् है और यह भी उपभोक्तार् वस्तुओं के कम उत्पार्दन के कारण। तीसरे, वार्स्तविक कठिनार्ई इस उत्पार्दन के मूल्यार्ंकन में होती है। उत्पार्दन तो माकेट कीमतों पर मूल्यार्ंकित होतार् है, जबकि आर्थिक कल्यार्ण वार्स्तविक रार्ष्ट्रीय उत्पार्दन यार् आय में वृद्धि से मार्पार् जार् सकतार् है। वार्स्तव में, आय के विभिन्न वितरण से कीमतें भिन्न होंगी और रार्ष्ट्रीय उत्पार्दन क मूल्य तथार् संरचनार् भी भिन्न होंगे। चौथे, कल्यार्ण के दृष्टिकोण से हमें केवल यह नहीं देखनार् चार्हिए कि क्यार् उत्पार्दित कियार् जार्तार् है। बल्कि यह भी कि उसक उत्पार्दन कैसे होतार् है? वार्स्तविक रार्ष्ट्रीय उत्पार्दन के बढ़ने से संभव है कि अर्थव्यवस्थार् में वार्स्तविक लार्गतों तथार् पीड़ार् और त्यार्ग जैसी सार्मार्जिक लार्गतों मे वृद्धि हुई हो। उदार्हरणाथ, उत्पार्दन में वृद्धि अधिक घंटे तथार् श्रम-शक्ति की कार्यकारी अवस्थार्ओं में गिरार्वट के कारण हुई हो। पार्ंचवे, हम प्रति व्यक्ति उत्पार्दन में वृद्धि को भी आर्थिक कल्यार्ण में वृद्धि के बरार्बर नहीं मार्न सकते। विकास की इ्ष्टतम दर निश्चित करने के लिए हमें आय-वितरण, उत्पार्दन की संरचनार्, रूचियों, वार्स्तविक लार्गतों तथार् ऐसे अन्य सभी विशिष्ट प्रयत्नों के सम्बन्ध में मूल्य-निर्णय करने पडेंगे, जो कि वार्स्तविक आय में कुल वृद्धि से सम्बन्ध रखते हैं।’’ इसलिये मूल्य निर्णयों से बचने और सरलतार् के लिए अर्थशार्स्त्री प्रति व्यक्ति वार्स्तविक रार्ष्ट्रीय आय को आर्थिक विकास क मार्प बनार्कर प्रयोग करते हैं।

अंतिम, सबसे बड़ी कठिनार्ई व्यक्तियों के उपभोग को भार्र देने की है। वस्तुओं और सेवार्ओं क उपभोग व्यक्तियों की रूचियों और अधिमार्नों पर निर्भर करतार् है। जो भिन्न-भिन्न होते हैं। इसीलिये व्यक्तियों क कल्यार्ण सूचक बनार्ने में समार्न भार्र लेनार् सही नहीं है।

मूलभूत आवश्यकतार्यें एवं आर्थिक वृद्धि

आर्थिक विकास के मार्प के रूप में रार्ष्ट्रीय आय एवं प्रति व्यक्ति आय की कीमत से असंतुष्ट होकर, कुछ अर्थशार्स्त्रियों ने आर्थिक विकास को सार्मार्जिक अथवार् मूलभूत (आधार्रभूत) आवश्यकतार् सूचक के रूप में मार्पनार् प्रार्रम्भ कियार् है। जिसके अनेक कारण हैं :-

1950 तथार् 1960 के दशकों में GNP में वृद्धि एवं प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि को आर्थिक विकास क सूचक मार्नार् जार्तार् रहार्। 1960 के विकास दशक के लिए संयुक्त रार्ष्ट्र ने एक प्रस्तार्व द्वार्रार् अल्पविकसित देशों के लिए GNP में 5 प्रतिशत की वृद्धि दर क लक्ष्य निश्चित कियार्। इस लक्ष्य दर को प्रार्प्त करने के लिए अर्थशार्स्त्रियों ने शहरीकरण के सार्थ तीव्र औद्योगिकरण क सुझार्व दियार्। उनक यह मत थार् कि GNP की वृद्धि से प्रार्प्त लार्भ अपने आप रोजगार्र और आय के सुअवसरों में वृद्धि के रूप में गरीबों तक धीरे धीरे पहुंच जार्येंगे। इस प्रकार, विकास के इस मार्प के अनुसार्र गरीबी, बेरोजगार्री और आय असमार्नतार्ओं की समस्यार्ओं को गौण महत्व दियार् गयार्।

रोस्टोव द्वार्रार् प्रतिपार्दित विकास के इस एक रेखीय वृद्धि की अवस्थार्ओं के पथ को नक्र्से के कम बचतों, छोटी माकेटों तथार् जन संख्यार् दबार्वों के कुचक्रों ने और शक्ति प्रदार्न की। यह समझार् गयार् कि इन कुचक्रों को दूर करने के लिए प्रार्कृतिक शक्तियार्ं मुक्त हो जार्येंगी। जो अर्थ व्यवस्थार् में ऊंची वृद्धि लार्येंगी। इसके लिए रोडार्न ने ‘‘बड़ार् धक्का’’, नक्र्से ने संतुलित विकास, हर्षमैन ने असंतुलित विकास, तथार् लीबन्स्टीन ने क्रार्न्तिक न्यूनतम प्रयत्न सिद्धार्न्त क सुझार्व दियार्। परन्तु अल्पविकसित देशों में विकास के लिए पूंजी, तकनीकी ज्ञार्न विदेशी विनिमय आदि के रूप में ‘‘लुप्त अंशों’’ को प्रदार्न करने के लिए अंर्तरार्ष्ट्रीय सहार्यतार् पर अधिक बल दियार् गयार्। विदेशी सहार्यतार् के तर्क के पीछे ‘‘दोहरार् अंतरार्ल मॉडल’’ तथार् आयत स्थार्नार्पन्नतार् द्वार्रार् औद्योगिकीकरण थार् तार्कि अल्पविकसित देश धीरे-धीरे विदेशी सहार्यतार् क परित्यार्ग कर दें।

डेविड मोरवैट्ज के अनुमार्न यह बतार्ते हैं कि इस विकास कूटनीति के अपनार्ने से विकासशील देशों में 1950-75 के बीच GNP एवं प्रति व्यक्ति आय में 3.4 प्रतिशत प्रति वर्ष औसत दर से वृद्धि हुई। परन्तु यह वृद्धि दर ऐसे देशों की गरीबी, बेरोजगार्री तथार् असमनतार्ओं को दूर करनें में असफल रहीं।

आर्थिक विकास के सूचक के रूप में GNP के विरूद्ध अर्थशार्स्त्रियों के बीच आलोचनार्यें 1960 की दशार्ब्दी से बढ़ती जार् रही थी। परन्तु सावजनिक तौर से प्रथम प्रहार्र प्रो0 सिरार्ज ने 1969 में नई दिल्ली में आयोजित Eleventh World Conference of the society for International Development के अध्यक्षीय भार्षण में कियार्। उसने समस्यार् को इस प्रकार प्रस्तुत कियार्, ‘‘एक देश के विकास के बार्रे में पूछे जार्ने वार्ले प्रश्न हैं – गरीबी क क्यार् हो रहार् है ? बेरोजगार्री क क्यार् हो रहार् है ? असमार्नतार् को क्यार् हो रहार् है ? यदि यह तीनों ऊंचे स्तरों से कम हुए हैं तो बिनार् संशय के उस देश के लिए विकास की अवधि रही है। यदि इन मुख्य समस्यार्ओं में से एक यार् दो अधिक बुरी अवस्थार् में हो जार् रही हो, यार् तीनों ही निम्नतार् में हों तो परिणार्म को विकास कहनार् आश्चर्यजनक होगार् चार्हे प्रति व्यक्ति आय दुगनी हुई हो।’’ उस समय के विश्व बैंक के गर्वनर राबट मैक्कनमार्रार् ने भी फरवरी 1970 में विकास शील देशों में GNP वृद्धि दर को आर्थिक विकास के सूचक की विफलतार् को इन शब्दों में स्वीकार कियार्- ‘‘प्रथम विकास दशार्ब्दी में, GNP में 5 प्रतिशत वाषिक वृद्धि दर के विकास उद्देश्य को प्रार्प्त कियार् गयार् थार्। यह मुख्य उपलब्धि थी। परन्तु GNP में सार्पेक्षतयार् ऊंची वृद्धिदर विकास में संतोष जनक उन्नति न लार्ई। विकासशील विश्व में, दशार्ब्दी के अंत में, कुपोषण सार्मार्न्य है, शिशु मृत्यु दर ऊंची है, अशिक्षार् विस्तृत है, बेरोजगार्री स्थार्निक रोग है जो और बढ़ जार्तार् है, धन और आय क पुनर्वितरण अत्यन्त विषम है।’’

विकास कीे GNP प्रति व्यक्ति मार्पों से असंतुष्ट होकर, 1970 की दशार्ब्दी से आर्थिक विचार्रकों ने विकास प्रक्रियार् की गुणवत्तार् की ओर ध्यार्न देनार् प्रार्रम्भ कियार् है। जिसके अनुसार्र वे तीन महत्वपूर्ण विन्दुओं रोजगार्र को बढ़ार्ने, गरीबी को दूर करने तथार् आय और धन की असमार्नतार्ओं को कम करने के लिए मूलभूत मार्नवीय आवश्यकतार्ओं की कूटनीति पर बल देते हैं। इसके अनुसार्र, जनसार्धार्रण को स्वार्स्थ्य, शिक्षार्, जल, खुरार्क, कपड़े, आवार्स, काम आदि के रूप में मूलभूत भौतिक आवश्यकतार्एं और सार्थ ही सार्ंस्कृतिक पहचार्न तथार् जीवन और कार्य में उद्देश्य एवं सक्रिय भार्ग की भार्वनार् जैसी अभौतिक आवश्यकतार्एं प्रदार्न करनार् है। मुख्य उद्देश्य गरीबों को मूलभूत मार्नवीय आवश्यकतार्ऐं प्रदार्न करके उनकी उत्पार्दकतार् बढ़ार्नार् और गरीबी दूर करनार् है। यह तर्क दियार् जार्तार् है कि मूल भूत मार्नवीय आवश्यकतार्ओं क प्रत्यक्ष प्रबन्ध करने से गरीबी पर थोड़े संसार्धनों द्वार्रार् और थोड़े समय में प्रभार्व पड़तार् है। शिक्षार्, स्वार्स्थ्य और अन्य मूल भूत आवश्यकतार्ओं के रूप में मार्नव संसार्धन विकास के उत्पार्दकतार् के उच्च स्तर प्रार्प्त होते हैं। ऐसार् विशेषतौर से वहार्ं होतार् है जहार्ं ग्रार्मीण भूमिहीन अथवार् शहरी गरीब पार्ये जार्ते हैं तथार् जिनके पार्स दो हार्थ और काम करने की इच्छार् के सिवार्य कोई भौतिक परिसम्पत्तियार्ं नहीं होती हैं। इस कूटनीति के अंतर्गत मूलभूत न्यूनतम आवश्यकतार्ओं के अलार्वार्, रोजगार्र के सुअवसरों, पिछड़े वर्गों के उत्थार्न तथार् पिछड़े क्षेत्रों के विकास पर बल देनार् और उचित कीमतों एवं दक्ष वितरण प्रणार्ली द्वार्रार् आवश्यक वस्तुओं को गरीब वर्गों के लिए जुटार्नार् है।

सार्मार्जिक सूचक:- अब हम सार्मार्जिक आर्थिक विकास के सूचकों क विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत कर रहे हैं जो कि हैं :-

अर्थशार्स्त्री सार्मार्जिक सूचकों में तरह-तरह की मदों को शार्मिल कर लेते हैं। इसमें से कुछ आगतें हैं जैसे पौष्टिकतार् मार्पदण्ड यार् अस्पतार्ल के बिस्तरों की संख्यार् यार् जनसंख्यार् के प्रतिव्यक्ति डॉक्टर, जबकि दूसरी कुछ मदें इन्हीं के अनुरूप निर्गतें हो सकती हैं, जैसे नवजार्त शिशुओं की मृत्यु दर के अनुसार्र स्वार्स्थ्य में सुधार्र, रोग दर, आदि। सार्मार्जिक सूचकों को प्रार्य: विकास के लिए मूल आवश्यकतार्ओं के संदर्भ में लियार् जार्तार् है। मूल आवश्यकतार्एं, गरीबों की मूल मार्नवीय आवश्यकतार्ओं को उपलब्ध करार् कर गरीबी उन्मूलन पर केन्द्रित होती है। स्वार्स्थ्य, शिक्षार्, खार्द्य, जल, स्वच्छतार्, तथार् आवार्स जैसी प्रत्यक्ष सुविधार्एं थोड़े से मौद्रिक संसार्धनों तथार् अल्पार्वधि में ही गरीबी पर प्रभार्व डार्लती है। जबकि GNP प्रति व्यक्ति आय की कूटनीति उत्पार्दकतार् बढ़ार्ने तथार् गरीबों की आय बढ़ार्ने के लिए दीर्घार्वधि में स्वत: ही कार्य करती है। मूल आवश्यकतार्ओं की पूर्ति उच्च स्तर पर उत्पार्दकतार् तथार् आय बढ़ार्ती है, जिन्हें शिक्षार् तथार् स्वार्स्थ्य सेवार्ओं जैसे मार्नव विकास के सार्थ सार्धनों द्वार्रार् प्रार्प्त कियार् जार् सकतार् है।

प्रो0 हिक्स और स्ट्रीटन मूलभूत आवश्यकतार्ओं के लिए छ: सार्मार्जिक सूचकों पर विचार्र करते हैं :-

मूल आवश्यकतार् सूचक
1.  स्वार्स्थ्य  जन्म के समय जीवन की प्रत्यार्शार्।
2. शिक्षार्  प्रार्थमिक शिक्षार् विद्यार्लयों में जनसंख्यार् के प्रतिशत के
अनुसार्र दार्खिले द्वार्रार् सार्क्षरतार् की दर।
3.  खार्द्य  प्रति व्यक्ति कैलोरी आपूर्ति।
4.  जल आपूर्ति  शिशु मृत्यु दर तथार् पीने योग्य पार्नी तक कितने प्रतिशत
जनसंख्यार् की पहुंच।
5.  स्वच्छतार्  शिशु मृत्यु दर तथार् स्वच्छतार् प्रार्प्त जनसंख्यार् क प्रतिशत।
6.  आवार्स  कोई नहीं।


सार्मार्जिक सूचकों की विशेषतार् यह है कि वे लक्ष्यों से जुड़े और वे लक्ष्य हैं मार्नव विकास। आर्थिक विकास इन लक्ष्यों को प्रार्प्त करने क एक सार्धन है। सार्मार्जिक सूचकों से पतार् चलतार् है कि कैसे विभिन्न देश वैकल्पिक उपयोगों के बीच अपने GNP क आवंटन करते हैं। कुछ शिक्षार् पर अधिक तथार् अस्पतार्लों पर कम खर्च करनार् पसंद करते हैं। इसके सार्थ सार्थ इनसे बहुत सी मूल आवश्यकतार्ओं की उपस्थिति, अनुपस्थिति अथवार् कमी के बार्रे में जार्नकारी मिलती है।

उर्पयुक्त सूचकों में प्रतिव्यक्ति कैलोरी आपूर्ति को छोड़कर शेष सूचक निर्गत सूचक हैं। नि:सन्देह नवजार्त शिशुओं की मृत्युदर, स्वच्छतार् तथार् सार्फ पेय जल सुविधार्ओं दोनों की सूचक है क्योंकि नवजार्त शिशु पार्नी से होने वार्ले रोगों क शीघ्र शिकार हो सकते हैं। नवजार्त शिशु मृत्युदर भोजन की पौष्टिकतार् से भी संबंधित है। इस प्रकार शिशुओं की मृत्युदर 6 में से 4 मूल आवश्यकतार्ओं को मार्पती है।

कुछ सार्मार्जिक सूचकों से संबंधित विकास क एक सार्मार्न्य सूचक बनार्ने में कुछ समस्यार्यें उत्पन्न होती हैं जो कि है-

प्रथम, ऐसे सूचक में शार्मिल किए जार्ने वार्ली मदों की संख्यार् और किस्मों के बार्रे में अर्थशार्स्त्रियों में एक मत नहीं है। उदार्हरणाथ, हेगन और संयुक्त रार्ष्ट्र की सार्मार्जिक विकास के लिए अन्वेषण संस्थार् 11 से 18 मदों क प्रयोग करते हैं। जिनमें से बहुत कम समार्न हैं। दूसरी ओर डी0 मौरिस तुलनार्त्मक अध्ययन के लिए विश्व के 23 विकसित और विकासशील देशों से संबंधित ‘‘जीवन क भौतिक गुणवत्तार् सूचक’’ बनार्ने के लिए केवल तीन मदों अर्थार्त जीवन प्रत्यार्शार्, शिशु मृत्युदर और सार्क्षरतार् दर को लेतार् है।

दूसरे, विभिन्न मदों को भार्र देने की समस्यार् उत्पन्न होती है जो देश के सार्मार्जिक आर्थिक और रार्जनैतिक ढार्ंचे पर निर्भर करती है। यह व्यक्तिपरक बन जार्ती है। मौरिस तीनों सूचकों को समार्न भार्र प्रदार्न करतार् है जो विभिन्न देशों के तुलनार्त्मक विश्लेषण के लिए सूचक क महत्व कम कर देतार् है। यदि प्रत्येक देश अपने सार्मार्जिक सूचकों की सूची क चुनार्व करतार् है और उनको भार्र प्रदार्न करतार् है तो उनकी अन्तर्रार्ष्ट्रीय तुलनार्एं उतनी ही गलत होंगी जितने की GNP के आंकड़े होते है।

तीसरे, सार्मार्जिक सूचक वर्तमार्न कल्यार्ण से सम्बन्धित होते हैं न कि भविश्य के कल्यार्ण से।

चौथे, अधिकतर सूचक आगत हैं न कि निर्गत जैसे कि शिक्षार्, स्वार्स्थ्य आदि। अन्तिम, उनमें मूल्य-निर्णय पार्ए जार्ते हैं। अत: मूल निर्णयों से बचने और सुगमतार् के लिए अर्थशार्स्त्री तथार् यू0 एन0 के संगठन GNP एवं प्रति व्यक्ति आय को आर्थिक विकास के मार्प के रूप में प्रयोग करते हैं।

मूलभूत आवश्यकतार्एं बनार्म आर्थिक वृद्धि

क्यार् आर्थिक वृद्धि और मूलभूत आश्यकतार्ओं की कूटनीति के बीच कोई विवार्द है ? जैसार् कि पहले कहार् गयार् है, मूलभूत आवश्यकतार्एं लक्ष्यों से संबंधित हैं और आर्थिक वृद्धि इन लक्ष्यों को पार्ने क सार्धन। अत: आर्थिक वृद्धि तथार् मूलभूत आवश्यकतार्ओं में कोई विरोध नहीं है। गोल्डस्टीन ने शिशु मृत्युदर के मार्ध्यम से आर्थिक वृद्धि तथार् मूलभूत आवश्यकतार्ओं के बीच गहरार् संबंध पार्यार् है। वह आर्थिक विकास को कुशलतार् क नार्म देतार् है। उसके अनुसार्र, शिशुओं की मृत्यु दर को 5 प्रतिशत से कम रखने के लक्ष्य को प्रार्प्त करने के लिए GDP क स्तर आवश्यक है। जो देश अपने GDP क एक बड़ार् हिस्सार् अथवार् प्रतिशत स्वार्स्थ्य सेवार्ओं पर खर्च करते हैं, वे अधिक कुशल हैं, क्योंकि इस प्रकार वे शिशु मृत्युदर को घटार्ने में सफल हो जार्ते हैं। गोल्ड स्टीन ने पार्यार् कि कुछ विकासशील देशों ने अपने थोड़े से संसार्धनों को शिक्षार् तथार् स्वार्स्थ्य की मूल आवश्यकतार्ओं को पूर्ण करने में लगार्यार्। अपने विभिन्न वर्गों के अध्ययन में उसने स्कूलों में दार्खिले तथार् महिलार्ओं में स्वार्स्थ्य के सार्थ-सार्थ शिक्षार् की प्रार्प्ति को लियार्। उसने पार्यार् कि कुछ विकासशील देशों ने बहुत थोड़े संसार्धनों को शिक्षार् तथार् स्वार्स्थ्य जैसी मूलभूत आवश्यतार्ओं को पूरार् करने के लिए लगार्यार्। वह इस निष्कर्ष पर पहुंचार् कि जो विकासशील देश प्रार्थमिक स्कूली शिक्षार् तथार् महिलार् शिक्षार् पर अधिक ध्यार्न देते हैं, वे इन मूलभूत आवश्यकतार्ओं को पूरार् करने के लिए कम खर्च करके भी अधिक विकास कर सकते हैं।

फार्ई, रैनिस तथार् स्टूअर्ट के अनुसार्र विकासशील देशों में मूलभूत आवश्यकतार्ओं की पूर्ति पर खर्च करने से उत्पार्दक निवेश में कमी नहीं होती। उन्होंने नौ देशों क सैम्पल लियार्। उनके अध्ययन से पतार् चलतार् है कि तार्ईवार्न, दक्षिण कोरियार्, फिलीपीन्स, उरूग्वे तथार् थार्ईलैण्ड ने मूलभूत आवश्यकतार्ओं क अच्छार् प्रबन्ध कियार् तथार् उनके निवेश अनुपार्त भी औसत से अधिक थे। जबकि कोलम्बियार्, क्यूबार्, जमैक तथार् श्रीलंक ने अच्छी मूलभूत आवश्यकतार्ओं के सार्थ-सार्थ औसत निवेश अनुपार्त रखें। उन्होंने नौ विभिन्न देशों के मूलभूत आवश्यकतार्ओं की पूर्ति में किए गए कार्य को औसत से अधिक तथार् औसत से कम आर्थिक वृद्धि के सार्थ भी संबद्ध कियार्। इनमे से तार्इवार्न, दक्षिण कोरियार् तथार् इंडोनेशियार् ऐसे हैं जिन्होंने मूलभूत आवश्यकतार्ओं को पूरार् करने के सार्थ-सार्थ औसत से अधिक आर्थिक वृद्धि की। ब्रार्जील ने मार्त्र न्यूनतम मूलभूत आवश्यकतार्ओं को पूरार् कियार् तथार् औसत से अधिक आर्थिक वृद्धि भी की। जबकि दूसरी ओर सोमार्ली, श्रीलंका, क्यूबार् तथार् मिस्र की आर्थिक वृद्धि दर औसत से कम रही। वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि मूलभूत आवश्यकतार्ओं के अधिक प्रार्वधार्न करने से आर्थिक वृद्धि भी होती है। नॉरमन हिक्स ने भी अपने अध्ययन में यह दर्शार्यार् है कि कई विकासशील देशों की आर्थिक वृद्धि की दर मूलभूत आवश्यकतार्ओं की कूटनीति द्वार्रार् बढ़ी है।

आईए अब, दीर्घकाल में GNP प्रति व्यक्ति GNP मूलभूत आवश्यकतार्ओं तथार् कल्यार्ण धार्रणार्ओं की आर्थिक विकास पर प्रभार्वों की तुलनार् करें।

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