आयुर्वेद में योग
आयुर्वेद और योग दोनों ही अत्यन्त प्रार्चीन विद्यार्यें हैं। दोनों क विकास और प्रयोग समार्न उद्देश्य के लिए एक ही काल में मनुष्य मार्त्र के दु:खों को दूर करने के लिए हुआ। आयुर्वेद क शार्ब्दिक अर्थ जीवन क विज्ञार्न है। इसे एक बहु उद्देश्यीय विज्ञार्न के रूप में विकसित कियार् गयार् है। योग के अनुसार्र पुरुषाथ को ही मनुष्य जीवन क लक्ष्य मार्नार् गयार् है। चरक सूत्र में कहार् गयार् है-

‘‘धर्माथकाममोक्षार्णार्मार्रोग्यं मूलमुत्तमम्’’ (च. सू. 1/15 ) 

अर्थार्त् आयुर्वेद क निर्मार्ण धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के लिए ही कियार् गयार् है। यह कहार् जार् सकतार् है कि योग और आयुर्वेद दोनों मार्नव जीवन के समार्न सिद्धार्न्त पर आधार्रित है।

कुछ विद्वार्नों क मत है आयुर्वेद, योग तथार् व्यार्करणशार्स्त्र ये तीनों विद्यार्एं क्रमश: शरीर, मन एवं वार्णी की शुद्धि के लिए अलग-अलग एक ही आचाय द्वार्रार् विकसित की गयी। आयुर्वेद क प्रमुख आदि ग्रन्थ चरक संहितार्, पार्तंजल योगसूत्र तथार् व्यार्करण महार्भार्ष्य ये तीनों एक ही व्यक्ति यार् सम्प्रदार्य द्वार्रार् लिखे गये हो, ऐसी कुछ लोगों की मार्न्यतार् है।

योगेन चित्तस्य पदेन वार्चार्ं मलं शरीरस्य च वैद्यकेन। 

योSपार्करोत्त प्रवरं मुनिनार्ं पतंजलिं प्रार्ंजलिरार्नतोSस्मि।। योगवातिक सूत्र 

चरकसंहितार्-सूत्रस्थार्न के प्रथम श्लोक की व्यार्ख्यार् करते समय टीकाकारों की निम्नलिखित उक्ति ध्यार्न देने योग्य है-

पार्तंजलमहार्भार्ष्य चरकप्रति संस्कृतै:। 

मनोवार्क्कायदोषार्णार्ं हर्त्रेSहियतये नम:।। च0सू0 1/1 

आयुर्वेद के मूल ग्रन्थों विशेषत: चरकसंहितार् के अध्ययन से प्रतीत होतार् है कि योगविद्यार् क सिद्धार्न्त तथार् सार्रार्ंश आयुर्वेद में पहले से ही उपलब्ध है। चरकसंहितार् के शरीरस्थार्न में नैष्ठिकी चिकित्सार् के प्रसंग में तत्त्वज्ञार्न तथार् तत्त्वार्नुभूति मूलक योग विद्यार् तथार् ‘प्रज्ञार् क सत्यार्बुद्धि के रूप में सुस्पष्ट वर्णन है। इन्हीं विषयों क और क्रमबद्ध विकसित वर्णन पतंजलि के योगसूत्र में मिलतार् है।

इस प्रकार योग और आयुर्वेद की संहितार्एॅ भी शार्रीरिक रोगों के लक्षण एवं उनकी चिकित्सार् के सार्थ-सार्थ व्यक्ति के मार्नसिक तथार् आध्यार्त्मिक भार्वों क भी विवेचन करती है।

योग क लक्षण करते हुए चरक कहते हैं कि आत्मार्, इन्द्रिय, मन तथार् अर्थों के सन्निकर्ष से सुख-दु:ख की उत्पत्ति होती है। जब मन आत्मार् के सार्थ स्थित होकर निश्चल हो जार्तार् है तब सुख-दु:ख क आरम्भ नहीं होतार्। तब आत्मार् वशी कहलार्तार् है। आत्मार् के सार्थ शरीर भी वश में हो जार्तार् है। उस योग सिद्धि योगी क शरीर इस लोक में रहते हुए भी उसके धर्मार्ं से वशीभूत नहीं होतार्। यदि योगी शरीर जन्य वेदनार्ओं को न भोगनार् चार्हे तो नहीं भोगतार्।

आयुर्वेद में योग के प्रकार 

चरक संहितार् में चार्र प्रकार के योग निर्दिष्ट किये गये हैं-

1. सम्यक् योग अथवार् समयोग – 

उचित समय पर मलार्दि वेग की प्रवृत्ति क होनार्, सार्मार्न्य कष्ट की अनुभूति क होनार्, क्रमश: वार्त-पित्त-कफ दोषों क निकलनार् तथार् स्वयं रुक जार्नार् अर्थार्त् दोषों के निरुद्ध होने पर वेगों की समार्प्ति होनार् ये सब वमन के सम्यक् योग के लक्षण होते हैं। दोषों के प्रभार्व भेद से यही सम्यक् योग तीक्ष्ण, मृदु, मध्य तीन प्रकार क समझार् जार्तार् है।

कालेप्रवृत्तिनतिमहति व्यथार्, यथार्क्रम दोषहरणं स्वयं वार्Sवस्थार्नमितियोग लक्षणार्नि भवन्ति। योगेन तु दोषप्रमार्णविशेषेण तीक्ष्णमृदुमध्यविभार्गो ज्ञेय:। च0 सं0सू0 15/13 

2. अयोग- 

किसी कारण विशेष से वमन क होनार् अर्थार्त् वमन न होनार्, केवल वमन करार्ने के लिए जो औषधि दी गयी हो, उसी क निकल जार्नार् अथवार् वमन के वेगों क बीच मे टूट जार्नार् यार् रुक जार्नार् अयोग कहलार्तार् है।

 अप्रवृत्ति: कुतश्चित् केवलस्यार्वार्Sप्यौषधस्य विभ्रंसो विबन्धो वेगार्नार्मयोगलक्षणार्नि भवन्ति। च0 सं0 सू0 1/13 

3. अतियोग- 

इसमें लार्रयुक्त लार्लरक्त की कणिकाओं से युक्त वमन होतार् है अथवार् रक्त भी निकल जार्तार् है तो अतियोग कहलार्तार् है।

योगार्धिक्ये तु फेनिलरक्तचन्द्रिको शगमनमित्यति योगल़क्षणार्नि भवन्ति। च0 सं0 सू0 15/13 

4. हीनयोग यार् मिथ्यार्योग –

दोषयुक्त, सड़ी-गली, अधिक समय तक रखी गयी, जली, सुखी, अधिक आदर््र वस्तु आहार्र आदि क सेवन अथवार् स्नार्न, वस्त्र आदि क ऋतु के विपरीत सेवन करने से रोग यार् व्यार्धि की सम्भार्वनार् रहती है। अब यहार्ँ आयुर्वेद में योग के स्वरूप क वर्णन कियार् जार् रहार् है। चरक संहितार् में अष्टार्ंग योग की भॉति अष्ट स्थार्नों मे विभार्जन कर आयुर्वेद क क्रमिकज्ञार्न अवश्य करार्यार् गयार् है। चतुष्पार्द वैदिक शैली पणिनि कृत अष्टार्ध्यार्यी में भी उपलब्ध होती है, चरकसंहितार् में भी इस शैली की छार्यार् प्रतीत होती है। सूत्र स्थार्न और चिकित्सार् स्थार्न में अधिकतम 30-30 अध्यार्य, इन्द्रिय, काय व सिद्धि स्थार्न में 12-12 तथार् निदार्न, विमार्न एवं शार्रीर स्थार्न में 8-8 अध्यार्यों क समार्वेश कियार् गयार् है। सूत्र स्थार्न में 4-4 अध्यार्यों के सार्त चतुष्क तथार् अन्तिम दो अध्यार्य संग्रहार्ध्यार्य कहे गये हैं। यथार्- 1. औषधचतुष्क. 2. स्वार्स्थ्यचतुष्क. 3. निर्देश चतुष्क. 4. कल्पनार् चतुष्क. 5. रोगचतुष्क. 6 योजनार्चतुष्क. 7. अनुपार्न चतुष्क तथार् 8. अष्टम में संग्रहार्ध्यार्यद्वय क समार्वेश है।

(क) औषध्यस्वस्थनिर्देशकल्पनार्रोगयोजनार्:। 

 चतुष्का: शड् क्रमेणोक्तार्: सप्तमश्चार्न्नपार्निक:।। 

 (ख) द्वौ चार्न्त्यौ संग्रहार्ध्यार्यार्विति त्रिंशकमर्थवत्। 

 श्लोकस्थार्नं समुद्दिष्टम् तन्त्रस्यार्स्य शिर: शुभम्।। च0 सू0 30/39-40 

चरक ने मौलिकसिद्धार्न्त तथार् कायचिकित्सार् क विशिष्ट प्रतिपार्दन कियार् है। संसोधन चिकित्सार् पर भी विशेष बल दियार् है। जिसक वर्णन दो स्वतन्त्र स्थार्नों (कल्प और सिद्धि) में कियार् गयार् है। इन्द्रिय स्थार्न में अरिष्टक्षणों क भी शरीर स्थार्न में प्रमुख रूप से दर्शन क प्रतिपार्दन कियार् गयार् है तथार् शरीर रचनार् गौण विषय हो गयी है। इससे स्पष्ट होतार् है कि चरकसंहितार् आयुर्वेद क मौलिकसिद्धार्न्त और कायचिकित्सार् क प्रमुख उपजीव्य ग्रन्थ है। 

आयुर्वेद की संहितार्एॅ शार्रीरिक रोगों के लक्षण एवं उनकी चिकित्सार् के सार्थ-सार्थ मनो-आध्यार्त्मिक भार्वों क भी विवेचन करती है।

आयुर्वेद में वर्णित सद्वृत्त एवं आचार्ररसार्यन 

यम-नियम निरुपण – सद्वृत्त – 

 मन, वार्णी और शरीर से किसी भी प्रार्णी को किसी प्रकार क दु:ख न देनार् अहिंसार् कहलार्तार् है। हिंसार् तम क द्योतक है, यह अभिघार्त और प्रतिरोध को उत्पन्न करने वार्लार् होतार् है। आयुर्वेद में उसे पार्पकर्म बतार्कर त्यार्गने के लिए कहार् गयार् है। इसे सद्वृत्त के रूप में वर्णित कियार् गयार् है तथार् रसार्यन सेवन से पूर्व भी एवं आचार्ररसार्यन के अन्तर्गत अहिंसार् क वर्णन कियार् गयार् है।

सत्यवार्दिनमक्रोधं निवृत्तं मद्यमैथुनार्त्। 

अहिंसकमनार्यार्सं प्रशार्न्तं प्रियवार्दिनम्।। च0 चि0 1/4/30 

आयुर्वेद में आचार्र रसार्यन में सर्वप्रथम सत्यवार्दिनम् ही कहार् गयार् है अर्थार्त् सर्वदार् सत्य बोलनार् चार्हिए। सद्वृत्त में झूठ न बोलने के लिए कहार् गयार् है।

नार्नृतं ब्रूयार्त् ——। च0 सू0 8/19 

अस्तेय क अर्थ होतार् है- चोरी न करनार्। जब व्यक्ति में चोरी के अभार्व अर्थार्त् चोरी न करने की प्रवृत्ति जार्गृत हो जार्ती है तब उसके सार्मने समस्त रत्न स्वयं प्रकट होने लगते हैं।

अस्तेयप्रतिष्ठार्यार्ं सर्वरत्नोपार्स्थार्नम्। यो0 सू0 2/37 

आचाय वार्ग्भट् ने स्तेय को दशविध पार्पकर्म के अन्तर्गत बतार्यार् है और शरीर, मन एवं वार्णी से त्यार्गने के लिए कहार् गयार् है। जीवन के तीन उपस्तम्भों में ब्रह्मचर्य की गणनार् की गर्इ है। आचार्ररसार्यन में मद्य एवं मैथुन से निवृत्त रहने के लिए बतार्यार् गयार् है। ज्वरचिकित्सार् में आचाय चरक ने कहार् है कि ब्रह्मचर्य के द्वार्रार् ज्वर से छुटकारार् मिलतार् है। “ब्रह्मचर्येण ज्वरार्त् प्रमुच्यते।” (च0 चि0 3)। योगसूत्र में कहार् गयार् है कि ब्रह्मचर्य पर दृढ़ होने पर वीर्य लार्भ एवं अपूर्व शक्ति क प्रार्दुर्भार्व होतार् है। “ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठार्यार्ं वीर्यलार्भ:।” (यो0 सू0 2/38)। जीवन में सदैव स्वस्थ रहने के लिए मनुष्य को मन, वचन तथार् कर्म की पवित्रतार् आवश्यक होती है। अत: प्रत्येक मनुष्य के लिए स्वस्थ वृत्त के पार्लन क उपदेश चरक ने कियार् है। चरक क वचन है कि सौम्य बुद्धि, मधुर वचन, सुखकारक कर्म, निर्मल तथार् पार्परहित बुद्धि, विवेक, तप तथार् यम-नियम प्रार्णार्यार्म आदि योग क सदैव सेवन करने वार्ले मनुष्य को कोर्इ भी शार्रीरिक तथार् मार्नसिक रोग से कष्ट नहीं होतार्।

चिकित्सार् चतुष्पार्द के सन्दर्भ में आचाय चरक ने उत्तम वैद्य के चार्र गुणों में शौच को एक प्रधार्न गुण मार्नार् है। शौच से कायिक, वार्चिक एवं मार्नसिक शुद्धतार् क अभिप्रार्य है। आयुर्वेदशार्स्त्र में भी दो प्रकार के शुद्धि क वर्णन कियार् गयार् है। इन्हें योगी जन बार्ह्य शौच एवं आन्तरिक शौच के नार्म से ग्रहण करते हैं।

आयुर्वेद में बार्ह्य शुद्धि के लिए अंग प्रक्षार्लन, स्नार्न, दन्तधार्वन कवलग्रह, गण्डुष आदि कर्म बतार्ए गए हैं और आभ्यन्तर शुद्धि सार्मार्जिक एवं मार्नसिक स्तर, धी-स्मृति क ज्ञार्न, व्यवहार्र आदि से लेते हैं। चरकसूत्र संहितार् में शरीर में उपस्थित वार्त-पित्त-कफ दोषों को संतुलन बनार्ए रखने तथार् शोधन के लिए पंचकर्म (स्नेहन-स्वेदन-वमन- विरेचन-वस्ति) क विवेचन कियार् गयार् है।

तार्न्युपस्थित दोषार्णार्ं स्नेहस्वेददोपषार्दनै:। 

पंचकर्मार्नि कुर्वीत मार्त्रार् कालौ विचार्रयन्। च0सू0 2/15 

लोल्य को कष्ट उत्पन्न करने वार्लों में श्रेष्ठ कहार् गयार् है। “लोल्यं क्लेशकरार्णार्ं श्रेष्ठम्।” (च0 सू0 25)। यह सन्तोषवृत्ति क विपरीताथक है। उसे धार्रणीय वेगों की गणन में भी गिनार् गयार् है। योगसूत्र में लोल्य के विपरीत भार्व सन्तोष को सर्वोत्तम सुख की संज्ञार् दी गर्इ है। “सन्तोषार्दनुत्तमसुखलार्भ:।” (यो0 सू0 2/43)

आयुर्वेद में आचार्ररसार्यन के अन्तर्गत कहार् गयार् है कि प्रतिदिन जप, शौच, दार्न एवं तपस्यार् करनी चार्हिए तथार् देवतार्, गौ, ब्रार्ह्मण, आचाय एवं गुरु की सेवार् में रत रहनार् चार्हिए।

जपशौचपरं धीरं दार्ननित्यं तपस्विन्। 

देव गो ब्रार्ह्मणार्चायगुरुवृद्धाचने रतम्।। च0 चि0 1/4/31 

सुसार्हित्य एवं आध्यार्त्मिक ग्रन्थों क अध्ययन स्वार्ध्यार्य है। र्इश्वर की शरणार्गति से योग सार्धन में आने वार्ले विघ्नों क नार्श होकर शीघ्र ही समार्धि निष्पन्न हो जार्ती है। “समार्धिसिद्धिरीश्वरप्रणिधार्नार्त्।” (यो0 सू0 2/45)। आयुर्वेद में मार्नस दोष चिकित्सार् के रूप में र्इश्वर क ध्यार्न-पूजार्-पार्ठ बतार्यार् गयार् है। ज्वरार्दि की चिकित्सार् में विष्णुसहस्रनार्म जप आदि बतार्यार् गयार् है।

1. सार्मयिक सद्वृत्त – 

देवतार्, गौ, वृद्ध, ब्रार्ह्मण, गुरु, सिद्धार्चायों को नमस्कार , अग्निहोत्र सेवन, पशस्त एवं अनुभूत औषध सेवन, दोनों समय स्नार्न, नेत्रार्दि इन्द्रियों की प्रतिदिन प्रार्त: सार्यं शुद्धि, केश, नख, दार्ढ़ी आदि क समयार्नुसार्र संमाजन, प्रतिदिन धुले हुए सुगन्धित वस्त्रों को धार्रण करनार्, सुगन्धित पदाथों क अनुलेपन, केशों क प्रसार्धन, सिर, कान, नार्क, पार्द आदि में तैल मर्दन, दीनदु:खी की सहार्यतार्, निश्चिन्त, निडर, बुद्धिमार्न्, लज्जार्शील, चतुर, धर्मपरार्यण, आस्तिक, सर्वप्रार्णियों को बन्धुतुल्य मार्ननार्, क्रुद्ध व्यक्तियों को नम्रतार् से शार्न्त करनार्, भयभीतों को आश्वार्सन देनार्, दीनों क उद्धार्र करनार्, सत्यवार्दी, शार्न्त, दूसरों के कठोर वचनों को सहन करने वार्लार्, क्रोध को नार्श करने वार्लार्, शार्न्ति को गुण समझने वार्लार्, रार्ग-द्वेष के मार्नसिक विकारों क विनार्श करने वार्लार् होनार् चार्हिए।

2. व्यहार्रिक सद्वृत्त –

बुद्धिमार्न् पुरुषों की सम्मति द्वार्रार् निर्धार्रित नियमों क त्यार्ग न करे, नियमों क उल्लंघन न करे, रार्त्रि में यार् अपरिचित स्थार्न में भ्रमण न करे, प्रार्त: एवं सार्यं सन्ध्यार्काल में भोजन, अध्ययन, शयन यार् स्त्री सहवार्स न करे, बार्लक, वृद्ध, रोगी , मूर्ख, क्लेशयुक्त जीवनयार्पन करने वार्लों तथार् नपुंसकों के सार्थ मित्रतार् न करे, मद्यसेवन, जुआ खेलनार्, वेश्यार्गमन आदि की इच्छार् न करे, किसी की गुप्तवातार् की व्यार्ख्यार् न करें, किसी क अपमार्न न करे, अभिमार्न क त्यार्ग करे, कार्यकुशल, उदार्र, असूयार्रहित ब्रार्ह्मणों क सम्मार्न करने वार्लार् होवे, वृद्ध, गुरुजन, गण, रार्जार् आदि क अपमार्न यार् आक्षेप न करे, बन्धुबार्न्धव, मित्र वर्ग, आपत्तिकाल में सहार्यक तथार् गोपनीय रहस्यों को जार्नने वार्ले लोगों को सदार् सम्पर्क में रखें।

 न स्त्रियमवजार्नीत् नार्तिविश्रम्येत् —– नार्रहसित्यवार्यं गच्छेत्। चरकसूत्र 8/22 

आयुर्वेद में वर्णित प्रार्णार्यार्म 

आयुर्वेद में वार्यु को प्रार्ण संज्ञार् प्रदार्न की गर्इ है।प्रार्णवार्युु क शरीर में प्रविष्ट होनार् श्वार्स ओर बार्हर निकलनार् प्रश्वार्स है। इन दोनों क विच्छेद होनार् अर्थार्त् श्वार्स-प्रश्वार्स क्रियार् क बन्द होनार् प्रार्णार्यार्म क सार्मार्न्य लक्षण है। 

तस्मिन् सति श्वार्सप्रश्वार्सयोर्गतिविच्छेद: प्रार्णार्यार्म:। यो0 सू0 2/49 

आयुर्वेद में वार्यु को आयु कहार् गयार् है तथार् वार्यु के द्वार्रार् ही प्रार्णार्यार्म निमेषार्दि क्रियार्एं सम्पन्न होती हैं।

वार्यु: प्रार्णसंज्ञार्प्रदार्नम्, वार्यु: आयु:, वार्यु:, प्रार्णार्पार्नौ, प्रार्णो रक्ष्यश्चतुभ्र्यो हि प्रार्णार्ं जहार्ति। च0 सू0 12/2 

वार्यु प्रार्णार्यार्म क्रियार् क सम्पार्दन करार्तार् है परन्तु योगोक्त प्रार्णार्यार्म इस वार्यु की क्रियार् से भिन्न है, वहार्ँ इस वार्यु की क्रियार् पर नियन्त्रण प्रार्णार्यार्म कहार् गयार् है। आयुर्वेद में वार्यु को यन्त्र-तन्त्र को धार्रण करने वार्ली कही गयी है। प्रार्ण, उदार्न, व्यार्न, समार्न और अपार्न को आत्मार् क रूप कहार् गयार् है तथार् यही शरीर की सभी चेष्टार्ओं को नियन्त्रण एवं प्रणयन करती है। सभी इन्द्रिय को अपने विषयों में प्रवृत्त करने वार्ली भी यही है।

वार्युस्तन्त्रयन्त्रधर: प्रार्णोदार्नसमार्नव्यार्नार्पार्नार्त्मार्, प्रवर्तकश्चेष्टार्नार्मुच्चार्वार्चनार्ं, नियन्तार्, प्रणेतार् च मनस: सर्वेन्द्रियार्णमुद्योजक:। च0 सू0 12/8 

इस प्रकार वार्यु को शरीर एवं शरीरार्वयव को धार्रण करने वार्लार्, चेष्टार्-गति आदि क नियन्त्रण एवं प्रणयन करने वार्लार् कहार् गयार् है और इसी वार्यु की गति पर नियन्त्रण प्रार्णार्यार्म शब्द से जार्नार् जार्तार् है।

आयुर्वेद में वर्णित ध्यार्न एवं समार्धि 

आयुर्वेद में मार्नस दोष की चिकित्सार् के लिए धार्रणार्, ध्यार्न एवं समार्धि को दूसरे रूप में कहार् है। आचाय चरक ने मार्नस रोगों क चिकित्सार्सूत्र बतार्ते समय समार्धि क उल्लेख कियार् है। समार्धि के पहले आचाय ने ज्ञार्न-विज्ञार्न-धैर्य एवं स्मृति क उल्लेख कियार् है।

मार्नसो ज्ञार्नविज्ञार्नधैर्यस्मृतिसमार्धिभि:। च0 सू0 1/58 

दूसरे स्थार्न पर आचाय चरक ने कहार् है कि मार्नस रोग उपस्थित होने पर धर्म-अर्थ एवं काम क ध्यार्न करनार् चार्हिए तथार् आत्मार् आदि क ज्ञार्न अर्थार्त् धार्रणार् करनार् चार्हिए। 

मार्नसं प्रति भैषज्यं त्रिवर्गस्यार्न्ववेक्षणम्। 

तद्विधसेवार् विज्ञार्नमार्त्मार्दीनार्ं च सर्वश:।। च0 सू0 11/47 

दूसरे आचायों ने भी धी-धृति एवं आत्मार् क ज्ञार्न मार्नस दोष की चिकित्सार् के लिए उत्कृष्ट औषधि बतार्यार् है। इस प्रकार आयुर्वेद में धार्रणार्-ध्यार्न क धी-धृति आत्मार् में चित्त को लगार्ने के रूप में इनक ज्ञार्न करने के रूप में कहार् गयार् है तथार् समार्धि को उसी रूप में उसी शब्द से ग्रहण कियार् है।

आयुर्वेद में कर्म निरूपण 

योग क एक महत्त्वपूर्ण एवं अनिवाय अंग कर्म है। महर्षि पतंजलि जी ने योगदर्शन में इसकी पर्यार्प्त चर्चार् की है। योगियों के कर्म अशुक्ल-अकृष्ण अर्थार्त् निष्काम शुभ कर्म होते है और अन्यों के सकाम शुभ, अशुभ एवं मिश्रित तीन प्रकार के होते हैं।

कर्मार्शुक्लार्कृष्णं योगिनार्स्त्रिविधमितरेषार्म्। यो0 सू0 4/7 

चरक शार्स्त्र के अनुसार्र इहलौकिक और पार्रलौकिक दोनों प्रकार के कर्मों के तीन भेद हैं जो इस प्रकार है-

  1. सत्प्रत्यय :- जो कर्म ज्ञार्नपूर्वक चेष्टार् द्वार्रार् कियार् जार्ए वह सत्प्रत्यय कहलार्तार् है, जैसे- हार्थ हिलार्नार्, ऊपर-नीचे करनार् होतार् है। 
  2. असत्प्रत्यय :- जो कर्म बिनार् ज्ञार्नपूर्वक होतार् है, वह असत्प्रत्यय कर्म कहलार्तार् है। जैसे- नेत्र की पलकों को उठार्नार्, गिरार्नार्, शरीर में रोमार्ंच होनार्, हृदय की धड़कन आदि।
  3. अप्रत्यय :- अचेतन पदाथों वृक्षार्दि में ऋतु-अनुसार्र नये पत्तों क निकलनार्, पुष्पोद्गम, फल बीज की प्रार्प्ति, पतझड़ आदि। नोदन, गुुरुत्व और वेग ये तीन अप्रत्यय है। पार्रलौकिक कर्म के तीन भेद हैं- 

बलार्बलविशेषोस्ति तयोरपि च कमर्णो। 

दृष्टं हि त्रिविधं कर्म हीनं मध्यममुत्तमम्।। चरकविमार्न 3/31 

  1. हीनकर्म – अधोगति में ले जार्ने वार्ले अशुभ कर्मों को हीन कर्म कहते हैं। यथार्- असत्यभार्षण, परस्त्री गमन आदि। 
  2. उत्तमकर्म :- उत्तम लोकों में ले जार्ने वार्ले शुभ कर्मों को उत्तम कर्म कहते हैं। यथार्- सत्यभार्षण, परोपकार आदि उत्तम कर्म हैं। 
  3. मध्यमकर्म :- मिश्रित फल वार्ले कर्म को मध्यम कर्म कहते हैं। यथार्- कर्मकाण्ड, अग्निहोत्र, धन लेकर विद्यार्ध्ययन करनार्, स्वार्स्थ्य लार्भ के लिए औषधि निर्मार्ण करनार् मध्यम कर्म है क्योंकि यह कर्म करने से देवतार् संतुष्ट होते हैं। इसलिए उत्तम लोकों की प्रार्प्ति करार्ने के कारण अग्निहोत्र भी सुख देतार् है। 

आयुर्वेद में पंचकर्म वमन, विरेचन, स्वेदन, निरुहण और नस्य हैं। दूसरे प्रकार से तीन कर्म 1.पूर्वकर्म, 2.प्रधार्नकर्म तथार् 3. पश्चार्त् कर्म हैं। चरक संिहतार् में विमार्नस्थार्न में कर्म क स्वरूप इस प्रकार स्पष्ट कियार् है। 

समवार्योSपृथग्भार्वो भूम्यार्दीनार्ं गुणैर्मत:। 

सनित्यो यत्र हि द्रव्यं न तत्रार्भिमतो गुण:।। (चरक संहितार्- विमार्नस्थार्न 8/50) 

भूमि आदि द्रव्यों क अपने गुणों के सार्थ अपृथक् भार्व ही समवार्य है। यह समवार्य नित्य है। क्योंकि जहॉ द्रव्य रहतार् है वहॉ गुण की अनिश्चिततार् नहीं रहती। अर्थार्त् समवार्यिकारण रूप द्रव्य के आश्रित तथार् गुणों से सम्बद्ध क्रियार्, चेष्टार् कर्म कहलार्तार् है। कर्म क लक्षण चरक ने इस प्रकार कियार् है-

द्रव्यों के संयोग और विभार्ग में कर्म ही कारण है, वह कर्म द्रव्य में आश्रित रहतार् है। कर्त्तव्य की क्रियार् को ही कर्म कहार् जार्तार् है। संयोग और विभार्ग के लिए कर्म के सिवार् किसी अन्य सार्धन की अपेक्षार् नहीं रह जार्ती।

संयोगे च विभार्गे च कारणं द्रव्यमार्श्रितम्। 

कर्त्तव्यस्य क्रियार् कर्म कर्म नार्न्यदपेक्षते।। च0 सं0 सू0 1/52 

आयुर्वेद में प्रमार्ण 

चरक शार्स्त्र में चार्र प्रकार के प्रमार्णों क वर्णन मिलतार् है जो इस प्रकार है-
आप्तोदेश, 2.प्रत्यक्ष, 3. अनुमार्न, 4.युक्तिप्रमार्ण।

द्विविधमेव खलु सर्वं सच्चार्सच्च।

तस्य चतुर्विधार् परीक्षार् – आप्तोदेश: प्रत्यक्षमनुमार्नं युक्तिश्चेति। च0 सू0 11/17 

चरक ने पुन: रोग विशेष ज्ञार्न हेतु आप्तोपदेश, प्रत्यक्ष तथार् अनुमार्न क स्मरण कियार् है।

आयुुर्वेद में पुरूष, आत्मतत्व एवं र्इश्वर निरूपण 

1. पुरुष निरूपण- 

पुरुष निरुपण –आयुर्वेद में चतुर्विंशति तत्त्वार्त्मक पुरुष को मार्नव की इकार्इ स्वीकार कियार् गयार् है ओर इसी को चिकित्सार्शार्स्त्र क कर्मक्षेत्र मार्नार् गयार् है। मन, पार्ँच ज्ञार्नेन्द्रियार्ँ, पार्ँच कर्मेन्द्रियार्ँ, पार्ँच इन्द्रियाथ, अव्यक्त महत् तत्त्व, अहंकार और पंचमहार्भूत- ये चौबीस तत्त्व मिलकर पुरुष की सृष्टि करते हैं। इसके अतिरिक्त पुरुष की “ार्ड्धार्त्वार्त्मक (पंचमहार्भूत+अव्यक्त ब्रह्म) तथार् धार्त्वार्त्मक (केवल एक मार्त्र चैतन्य युक्त अर्थार्त् परमार्त्म तत्त्व पुरुष) अवधार्रणार् भी संदर्भ भेद से उपस्थित की जार्ती है।

(क) खार्दयश्चेततनार्शष्ठार् धार्तव: पुरुष: स्मृत:। 

चेतनार्धार्तुरप्येक: स्मृत: पुरुषसंज्ञक:।। 

(ख) पुनश्च धार्तुभेदेन चतुर्विंशतिक: स्मृत:। 

मनो दशेन्द्रियार्न्याथार्: प्रकृतिश्चार्ष्टधार्तुकि। च0 शार्0 1/16-17 

परन्तु आयुर्वेद में सर्वार्त्मनार् मार्न्य पुरुष चतुर्विंशति तत्त्वार्त्मक रार्शिपुरुष ही है।

चतुर्विंशतिको ह्येष रार्शि: पुरुषसंज्ञक:। च0 शार्0 1/35 

सार्ंख्यकारिक में भी पुरुष के इसके स्वरूप क प्रतिपार्दन कियार् गयार् है।

2. आत्मार् 

महर्षि पतंजलि जी के अनुसार्र प्रार्कृतिक पदाथों के सम्मिश्रण तथार् अज्ञार्न, अधर्म, विकारार्दि दोषों से रहित होतार् हुआ भी चित्त की वृत्तियों के अनुसार्र देखने वार्लार् चेतन पदाथ ‘जीवार्त्मार्’ है। “दृष्टार् दृशिमार्त्र: शुद्धोSपि प्रत्ययार्नुपश्य:।” (यो0 सू0 2/20)। आयुर्वेद के प्रकाण्ड मनिषी महिर्र्ष चरक ने आत्मार् को अव्यक्त, क्षेत्रज्ञ, शार्श्वत, विभु तथार् अव्यय बतार्यार् है। यह आत्मतत्त्व निर्विकार है, परन्तु चेतन है, नित्य है, दर्शक, क्षेत्रज्ञ एवं कर्त्तार् है। यही सार्क्षी, चेतन, पुद्गल आदि नार्मों से जार्नार् जार्तार् है।

निर्विकार: परस्त्वार्त्मार् सत्वभूतगुणेन्द्रियै:। 

चैतन्ये कारणं नित्यो दृष्टार् पश्यति ही क्रियार्:।। च0 सू0 1/55 

इस प्रकार जीव में परमतत्त्व आत्मार् क निवार्स है जिसक सार्क्षार्त्कार योग सार्धनार् द्वार्रार् सम्भव है।

आत्मार् के स्वरूप क वर्णन करते हुए श्रीमद्भगवद् गीतार् के दूसरे अध्यार्य में कहार् है कि यह आत्मार् किसी काल में भी न तो जन्मतार् है और न मरतार् ही है तथार् न यह उत्पन्न होकर फिर होने वार्लार् ही है। क्योंकि यह अजन्मार्, नित्य, सनार्तन और पुरार्तन है, शरीर के मार्रे जार्ने पर भी नहीं मार्रार् जार्तार्।

न जार्यते म्रियते वार् कदार्चिन्नार्यं भूत्वार् न भवितार् वार् न भूय:। 

अजो नित्य: शार्श्वतोSयं पुरार्णो न हन्यते हन्यमार्ने शरीरे।। श्रीमद्भगवद् गीतार् 2/20 

यह आत्मार् अच्छेद्य है, यह आत्मार् अदार्ह्य, अक्लेद्य और नि:सन्देह अशोष्य है तथार् यह आत्मार् नित्य सर्वव्यार्पी, अचल, स्थिर रहने वार्लार् और सनार्तन है।

अच्छेद्योSयमदार्ह्योSयमक्ले़द्योSशोष्य एव च।  

नित्य: सर्वगत: स्थार्णुरचलोSयं सनार्तन:। श्रीमद्भगवद् गीतार् 2/24 

3. र्इश्वर निरूपण 

चरकसंहितार् चिकित्सार्शार्स्त्र क एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसमें र्इश्वर शब्द क केवल दो स्थार्नों पर प्रयोग हुआ है, वह भी परमार्त्मार् यार् जगत् नियन्तार् के रूप में र्इश्वर शब्द क प्रयोग न होकर रार्जार्, समर्थ यार् ऐश्वर्यशार्ली के रूप में कियार् गयार् है।

(क) र्इश्वरार्णार्ं वसुमतार्ं वमनं सविरेचनम्। च0 सू0 15/23 

(ख) यार् पुनरीश्वरार्णार्ं वसुमतार्ं वार्सकांशार्त्। च0 सू0 30/29 

चरकसंहितार् के अन्य स्थार्नों में भी ब्रह्म शब्द क प्रयोग जगत् नियन्तार् के रूप में उपलब्ध होतार् है। वहार्ँ भी तुलनार्त्मक दृष्टि से कहार् गयार् है कि जिस प्रकार लोक में ब्रह्मव्यार्प्त है उसी प्रकार शरीर में अन्तरार्त्मार् की विभूति विरार्जमार्न है।

ब्रह्म अन्तरार्त्मार् – च0 शरीर 5/5 

आयुर्वेद केार् अथर्ववेद के उपवेद के रूप में उल्लेख कियार् गयार् है। महर्षि चरक द्वार्रार् प्राथनार्, उपार्सनार्, नमन, भगवत्दर्शन तथार् प्रभुनार्म कीर्तन आदि परमार्त्मार् सम्बन्धी कुछ नियमों के विधार्न क उल्लेख करने में र्इश्वर संबन्धी निष्ठार् क स्वयमेव प्रदर्शन हो जार्तार् है। वेदों में रोगनिवार्रण हेतु र्इश्वर प्राथनार्, यज्ञ तथार् प्रभु चिंन्तन आदि क निर्देश युक्ति संगत है। इसी कारण आयुर्वेद के ग्रन्थों में र्इश्वरार्रार्धनार् को गम्भीरतार् के सार्थ स्वीकार कियार् गयार् है।

चरक ने अव्यक्त के रूप में कर्त्तार्, विश्वकर्त्तार्, ब्रह्मार् आदि शब्द क प्रयोग र्इश्वर वार्ची रूप में प्रयोग कियार् है। उसने निर्विकार परमार्त्मार् क भी वर्णन कियार् है। “निर्विकार: परस्त्वार्त्मार्।” (च0 सू0 1/56) चरक क पुरुष शब्द व्यार्पक अर्थ वार्लार् प्रतीत होतार् है, जिसने कुछ सीमार् तक र्इश्वर को भी इसमें समेट लियार् है। ऐसार् प्रतीत होतार् है कि चरक के समय में र्इश्वर शब्द क प्रयोग परमेश्वर यार् जगत् नियन्तार् अर्थ में प्रयुक्त नहीं होतार् थार्। योगसूत्र में र्इश्वर के स्वरूप क वर्णन करते हुए कहार् है कि अविद्यार्दि पार्ँचों क्लेश, शुभार्शुभमिश्रित विविध कर्म, कर्मों के फल सुख-दु:ख, इनके भोगों के संस्कार-वार्सनार्एँ इन सबके सम्बन्ध से रहित जीवों से भिन्न स्वभार्व वार्लार् चेतन विशेष ‘र्इश्वर’ है।

क्लेशकर्मविपार्काशयैरपरार्मृष्ट: पुरुषविशेष र्इश्वर:। यो0 सू0 1/24 

मोक्ष निरूपण 

आयुर्वेद के प्रमुख आचाय चरक ने मोक्ष के स्वरूप क वर्णन करते हुए लिखार् है कि मन में जब रज और तमोगुण क अभार्व होतार् है तथार् बलवार्न् कर्मों क क्षय हो जार्तार् है तब कर्मजन्य बन्धनों से वियोग हो जार्तार् है। उसे “अपुनर्भव” यार् ‘मोक्ष’ कहते हैं।

मोक्षोरजस्तमोSभार्वार्त् बलवत् कर्मसंक्षयार्त् वियोग: सर्वयोगैरपुनभ्र्ार्ूव:। च0 सं0 शार्0 1/42 

इसी प्रकार एक अन्य स्थार्न में इसक वर्णन करते हुए उन्होंने लिखार् है कि महार्त्मार्पुरुषों की सेवार्, यमनियमों क पार्लन, चार्न्द्रार्यण आदि व्रतों क सेवन, आत्मशुद्धि हेतु उपवार्स, धर्मशार्स्त्रों क अध्ययन, कामक्रोधार्दि क त्यार्ग, दुष्टजनों की उपेक्षार्, पुनर्जन्म यार् इस जन्म में किये गये कर्मों क क्षय, आश्रमों से दूर रहकर कर्मफल हेतु कर्मों क त्यार्ग, आत्मार् और शरीर के संयोग से भयभीत होनार् तथार् बुद्धि को समार्धिस्थ करने क प्रयार्स आदि से मोक्षप्रार्प्ति संभव है।

सतार्मुपार्सनं सम्यगसतार्ं विवर्जनम्। 

व्रतार्चायोपवार्सौचनियमार्श्चपृथग्विधार्:।। 

धार्रणं धर्मशार्स्त्रार्णार्ं विज्ञार्नविजनेरति:। 

विषयेष्वरतिर्मोक्षे व्यवसार्य: परार्धृति:।। च0 सं0 शार्0 1/145-146 

चरक क मत है कि सभी कारण बार्ह्यकार्य दु:खहेतु है, ये आत्मार् से सम्बद्ध कार्य नहीं है, यह कार्य शून्य है और अनित्य है, आत्मार् उदार्सीन है, अत: वे कार्य आत्मार् द्वार्रार् सम्पन्न न होकर प्रकृति के स्वभार्वश स्वत: होते रहते हैं। सत्यबुद्धि की उत्पत्ति तक यह भ्रम बनार् रहतार् है। ‘यह मैं’ ऐसी अहंकार बुद्धि और ‘मेरार्’ यह ममत्वबुद्धि प्रकृति (मार्यार्) क प्रपंच है, जब इसक नार्श नहीं होतार्, तब तक जीवार्त्मार् बन्धन में फॅसार् रहतार् है। तथार् जब आत्मार् सभी तत्त्वों को स्मृति द्वार्रार् जार्न लेतार् अर्थार्त् सार्ंसार्रिक प्रपंचों को उसे यथाथ ज्ञार्न हो जार्तार् है।

स्मृति: सत्सम्बन्धार्द्यैश्च धृत्यन्ते रूप जार्यते।
स्मृत्वार्स्वार्भार्वं भार्वार्नार्ं विस्मरणं दु:खार्त् प्रमुच्यते।। च0 सं0 शार्0 1/147

वही जीवार्त्मार् तत्त्वज्ञार्न द्वार्रार् कर्मबन्धन तथार् क्लेशार्दि से मुक्ति प्रार्प्त कर लेतार् है।

इस प्रकार कहार् जार् सकतार् है कि आयुर्वेद में भी योग तत्त्वों क वणन अवश्य कियार् गयार् है। आयुर्वेद और योग दोनों क एक ही लक्ष्य मनुष्य के वर्तमार्न जीवन को सुखमय बनार्ते हुए उसे मोक्ष की प्रार्प्ति तक ले जार्नार् है।

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