आधुनिकीकरण की अवधार्रणार्
आधुनिकीकरण कोर्इ दर्शन यार् आन्दोलन नहीं है जिसमें स्पष्ट मूल्य व्यवस्थार् हो। यह तो परिवर्तन की एक प्रक्रियार् है प्रार्रम्भ में आधुनिकीकरण शब्द क प्रयोग ‘‘अर्थ व्यवस्थार् में परिवर्तन और सार्मार्जिक मूल्यों एवं प्रथार्ओं पर इसके प्रभार्व’’ के संदर्भ में कियार् जार्तार् थार्। इसक वर्णन ऐसी प्रक्रियार् के रूप में कियार् जार्तार् थार् जिसने समार्ज को प्रमुख रूप से कृषि प्रधार्न समार्ज से, प्रमुख रूप से औद्योगिक अर्थ व्यवस्थार् वार्ले समार्ज में परिवर्तित कर दियार् है। अर्थ व्यवस्थार् में इस प्रकार के परिवर्तन के परिणार्मस्वरूप समार्ज में मूल्यों, विश्वार्सों एवं मार्नदण्डों में भी परिवर्तन आने लगार्। आजकल आधुनिकीकरण शब्द को वृहत् अर्थ दियार् जार्तार् है। इसको एक ऐसार् सार्मार्जिक परिवर्तन मार्नार् जार्तार् है जिसमें विज्ञार्न और तकनीकी (technology) के तत्व शार्मिल होते हैं।

इसमें युक्तिपूर्णतार् (rationality) निहित है। एलार्टार्स (Alatas) के अनुसार्र आधुनिकीकरण एक ऐसी प्रक्रियार् है जिसके द्वार्रार् सम्बद्ध समार्ज द्वार्रार् स्वीकृत विस्तृत अर्थों में अधिक अच्छे व सन्तोषजनक जीवन के अंतिम लक्ष्य को प्रार्प्त करने के उद्देश्य से आधुनिक वैज्ञार्निक ज्ञार्न को समार्ज में पहुँचार्यार् जार्तार् है। इस परिभार्षार् में ‘आधुनिक वैज्ञार्निक ज्ञार्न’ में निम्न बार्तें सम्मिलित हैं: (i) प्रस्तार्वित व्यार्ख्यार्ओं (suggested explanations) की प्रार्मार्णिकतार् सिद्ध करने के लिए प्रयोगों की सहार्यतार् लेनार् (ii) उन नियमों की कल्पनार् करनार् जिनको ताकिक व प्रयोगार्त्मक (experimental) आधार्र पर समझार्यार् जार् सकतार् है। जो (व्यार्ख्यार्) कि धामिक मत व दाशनिक व्यार्ख्यार् से भिन्न हो, (iii) तथ्यों की विश्वसनीयतार् को निश्चित करने के लिए निश्चित विधियों क प्रयोग, (iv) अवधार्रणार्ओं एवं चिन्हों क प्रयोग और (v) सत्य के लिए तथ्य की खोज करनार्।

र्इजेन्टार्ड (Eisenstadt) के अनुसार्र आधुनिकीकरण सार्मार्जिक संगठन के संरचनार्त्मक पक्ष और समार्जों के सार्मार्जिक जनसंख्यार्त्मक, दोनों पक्षों की व्यार्ख्यार् करतार् है। कार्ल ड्यूश (Karl Deutsh) ने आधुनिकीकरण के अधिकतर सार्मार्जिक जनसंख्यार्त्मक पक्षों को स्पष्ट करने के लिए, ‘सार्मार्जिक गतिमार्नतार्’ (social mobilization) शब्द क प्रयोग कियार् है। उन्होंने सार्मार्जिक गतिशीलतार् की परिभार्षार् इस प्रकार की है: ‘‘ऐसी प्रक्रियार् जिसमें पुरार्नी सार्मार्जिक, आर्थिक और मनोवैज्ञार्निक प्रतिबद्धतार्ओं के समूह मिटार् दिये जार्ते हैं व तोड़ दिए जार्ते हैं और लोग नवीन प्रकार के सार्मार्जीकरण और व्यवहार्र प्रतिमार्नों के लिए तैयार्र रहते हैं।’’ रस्टोव और वाड (Rustow And Ward) की मार्न्यतार् है कि आधुनिकीकरण में मूल प्रक्रियार् मार्नवीय मार्मलों में आधुनिक विज्ञार्न क प्रयोग है। पाइ (Pye) के अनुसार्र आधुनिकीकरण व्यक्ति व समार्ज के अनुसन्धार्नार्त्मक व आविष्कारशील दृष्टिकोण क विकास है जो तकनीकी तथार् मशीनों के प्रयोग में निहित होतार् है तथार् जो नये प्रकार के सार्मार्जिक संबंधों को प्रेरित करतार् है। टार्यनबी (Toynbee) जैसे विद्वार्नों क मार्ननार् है कि आधुनिकीकरण तथार् पश्चिमीकरण में कोर्इ अन्तर नहीं है। वे लिखते हैं कि मार्न्य ‘आधुनिक’ शब्द कम-मार्न्य शब्द ‘पश्चिमी’ क प्रतिस्थार्पन्न है। विज्ञार्न और जनतंत्र के परिचय के लिए ‘पश्चिमी’ के स्थार्न पर ‘आधुनिक’ शब्द के प्रयोग क उद्देश्य बार्ह्य स्वरूप को बचार्नार् मार्त्र है, क्योंकि यह तथ्य व्यक्तियों के लिए स्वीकार करने योग्य नहीं है कि उनकी अपनी पैतृक जीवन शैली उस वर्तमार्न स्थिति के अनुकूल नहीं है जिसमें वे अपने को पार्ते हैं लेकिन ऐसे विचार्रों को पूर्ण रूपेण अनुचित एवं पक्षपार्तपूर्ण बतार्यार् गयार् है।

‘आधुनिकीकरण’ को ‘औद्योगीकरण’ से भी संभ्रमित (confused) नहीं मार्ननार् है। औद्योगीकरण क सन्दर्भ उन परिवर्तनों से है जो कि उत्पार्दन की विधियों, शक्ति चार्लित (power driven) मशीनों के प्रवेश के फलस्वरूप आर्थिक व सार्मार्जिक संगठनों, तथार् परिणार्मस्वरूप फैक्ट्री व्यवस्थार् के उदय से है। थियोडरसन (Theodorson) के अनुसार्र औद्योगीकरण के निम्न लक्षण हैं: (i) कारीगर यार् शिल्पी के घर यार् दुकान में हस्त उत्पार्दन के स्थार्न पर फैक्ट्री केन्द्रित मशीनी उत्पार्दों की प्रतिस्थार्पनार्, (ii) प्रमार्णिकीकृत वस्तुओं (standardized goods) क बदले जार्ने वार्ले भार्गों (interchangeable parts) से उत्पार्दन (iii) फैक्ट्री मजदूरों के एक वर्ग क उदय जो मजदूरी के लिए कार्य करते हैं और जो न तो उत्पार्दन किए गए मार्ल और न ही उत्पार्दन के सार्धनों के मार्लिक होते हैं (iv) गैर-कृषि धन्धों में लगे लोगों के अनुपार्त में वृद्धि और (v) असंख्य बड़े नगरों क विकास। औद्योगीकरण लोगों को वे भौतिक वस्तुएं उपलब्ध करार्तार् है जो पहले कभी उपलब्ध नहीं थीं। आधुनिकीकरण, दूसरी ओर, एक लम्बी प्रक्रियार् है जिससे मस्तिष्क क वैज्ञार्निक दृष्टिकोण पैदार् होतार् होतार् है।

जेम्स ओ कोनेल (James O’ Connell) ने आधुनिकीकरण की प्रक्रियार् के विश्लेषण में इसको तीन पहलुओं में विभार्जित कियार् है: (i) आविष्कारार्त्मक (inventive) दृष्टिकोण, अर्थार्त् वैज्ञार्निक भार्वनार् जिससे निरन्तर व्यवस्थित तथार् आविष्कारार्त्मक ज्ञार्न प्रार्प्त होतार् हो, जो कि घटनार् के कारण और परिणार्म से संबंधित हो, (ii) नए तरीकों और उपकरणों क आविष्कार, अर्थार्त् उन विभिन्न विधियों की खोज जो अनुसन्धार्न को आसार्न बनार्ये, और उन नर्इ मशीनों क आविष्कार जो जीवन के नये प्रतिमार्न को आवश्यक बनार्ते हों। आधुनिक विज्ञार्न द्वार्रार् प्रस्तुत व्यार्ख्यार् धामिक संस्कारों को अनार्वश्यक बनार्ती है, और (iii) सार्मार्जिक संरचनार्ओं क लचीलार्पन और पहचार्न की निरन्तरतार् अर्थार्त्, व्यक्तिगत और सार्मार्जिक संरचनार्त्मक दोनों स्तरों पर निरन्तर परिवर्तन को स्वीकारने की इच्छार् और सार्थ ही व्यक्तिगत तथार् सार्मार्जिक पहचार्न सुरक्षित रखने की योग्यतार्। उदार्हरणाथ, बहुपत्नी परम्परार्गत समार्ज में वैवार्हिक रीति-रिवार्ज बुजुर्गों के चार्रों ओर केन्द्रित थे, किन्तु मजदूरी प्रथार् के प्रचलन और श्रमिकों की गतिशीलतार् से युवार् पीढ़ी की आर्थिक उपलब्धियों ने पत्नियों के लिए प्रतिस्पर्द्धार् को बार्ध्य कर दियार्। जेम्स ओ कोनेल के अनुसार्र परम्परार्गत समार्ज से आधुनिक समार्ज में जो परिवर्तन होते हैं, वे इस प्रकार हैं:

  1. आर्थिक विकास में वृद्धि होती है और वह आत्मनिर्भर हो जार्तार् है। 
  2. धन्धे अधिक विशिष्ट और कुशल (skilled) हो जार्ते हैं। 
  3. प्रार्रम्भिक धन्धों में लगे लोगों की संख्यार् कम होती जार्ती है, जबकि द्वैतीयक तथार् तृतीयक धन्धों में लगे लोगों की संख्यार् बढ़ती जार्ती है।
  4. पुरार्ने कृषि यन्त्रों तथार् विधियों के स्थार्न पर ट्रेक्टरों और रार्सार्यनिक उर्वरकों क प्रयोग बढ़तार् है। 
  5. वस्तु विनिमय (barter system) की स्थार्न मुद्रार् व्यवस्थार् ले लेती है। 
  6. उन समुदार्यों के बीच जो पहले एक दूसरे से अलग होते थे और स्वतंत्र होते थे, अन्त:निर्भरतार् (inter-dependence) आ जार्ती है। 
  7. नगरीकरण की प्रक्रियार् में वृद्धि होती है। 
  8. प्रदत्त प्रस्थिति अर्जित प्रस्थिति को स्थार्न देती है। 
  9. समार्नतार् धीरे-धीरे संस्तरण क स्थार्न लेती है। 
  10. स्वार्स्थ्य सुधार्र तथार् अच्छी मेडिकल देखभार्ल के कारण जीवन की अवधि लम्बी होती जार्ती है। 
  11. यार्तार्यार्त तथार् संचार्र की नवीन विधियों द्वार्रार् भौगोलिक दूरियार्ँ कम होती जार्ती हैं। 
  12. वंशार्नुगत नेतृत्व क स्थार्न चुनार्व द्वार्रार् नेतृत्व ले लेतार् है।

इस संबंध में ‘परम्परार्’, ‘परम्परार्वार्द’ तथार् ‘परम्परार्गत समार्ज’ शब्दों को समझनार् आवश्यक है। ‘परम्परार्’ शब्द क अर्थ अतीत में चले आ रहे विश्वार्सों एवं प्रथार्ओं से है। ‘परम्परार्वार्द’ मार्नसिक दृष्टिकोण (psychic attitude) है जो प्रार्चीन विश्वार्सों और प्रथार्ओं को अपरिवर्तनीय मार्नकर उसको शोभार्युक्त व गौरवार्न्वित करतार् है। यह परिवर्तन और विकास के विपरीत है।

परम्परार्गत समार्ज गतिहीन होतार् है। उच्च गतिशीलतार् वार्ले समार्ज में जिसे मुक्त समार्ज भी कहार् जार्तार् है, व्यक्ति माग में आने वार्ले अवसरों तथार् अपनी योग्यतार् व संभार्वनार्ओं क लार्भ उठार्ते हुए अपनी प्रस्थिति में परिवर्तन कर सकतार् है। दूसरी ओर, बन्द यार् गतिहीन समार्ज में व्यक्ति जन्म से मृत्यु तक एक ही प्रस्थिति में रहतार् है। आधुनिकतार् से हमार्रार् तार्त्पर्य मुक्त समार्ज की रचनार् से यार् नर्इ संस्थार्ओं की रचनार् की सीमार् से, और उस परिवर्तन को स्वीकारने से है जो संस्थार्ओं, विचार्रों तथार् समार्ज की सार्मार्जिक संरचनार् से सम्बद्ध है। शिल्स (Shils) की मार्न्यतार् है कि परम्परार्गत समार्ज किसी भी अर्थ में पूर्णत: परम्परार्गत नहीं होतार् और आधुनिक समार्ज किसी भी प्रकार परम्परार्ओं से मुक्त नहीं होतार्।

आधुनिकीकरण के प्रमुख लक्षण

कार्ल ड्यूश ने आधुनिकतार् के एक पक्ष (अर्थार्त् सार्मार्जिक जनसंख्यार्त्मक यार् जिसे वह सार्मार्जिक गतिशीलतार् भी कहते हैं) क संदर्भ देते हुए इंगित कियार् है कि इसके कुछ सूचक (indices) इस प्रकार हैं: यंत्रों के मार्ध्यम से आधुनिक जीवन के प्रति अनार्वृत्ति (exposure), शहरीकरण, कृषि धन्धों में परिवर्तन, सार्क्षरतार् तथार् प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि। इजेन्टार्ड के अनुसार्र सार्मार्जिक संगठन (यार् आधुनिकीकरण) के संरचनार्त्मक पक्षों के मुख्य सूचक (indices) हैं: विशिष्ट भूमिकाएं (specialized roles) उन्मुक्त विचरण वार्ली (free floating) होती हैं (अर्थार्त् उनमें प्रवेश व्यक्ति के प्रदत्त लक्षणों से निर्धार्रित नहीं होतार् है), तथार् धन व शक्ति जन्म के आधार्र पर निश्चित नहीं होते (जैसार् कि परम्परार्गत समार्जों में होतार् है)। यह माकेट जैसी संस्थार्ओं से, (आर्थिक जीवन में), मतदार्न से, और रार्जनीतिक जीवन में पाटी कार्यों से सम्बद्ध होते हैं।

मूर (Moore) ने बतार्यार् है कि आधुनिक समार्ज के विशेष आर्थिक, रार्जनैतिक और सार्ंस्कृतिक लक्षण होते हैं। आर्थिक क्षेत्र में आधुनिक समार्ज के लक्षण निम्न हैं: (i) अत्यन्त उच्च स्तरीय तकनीकी क विकास जो ज्ञार्न के व्यवस्थित खोज से होतार् है, जिसक अनुसरण प्रार्थमिक व्यवसार्य (कृषि में) कम और द्वैतीयक (उद्योग, व्यार्पार्र) और तृतीयक (नौकरी) व्यवसार्यों में अधिक होतार् है; (ii) आर्थिक विशिष्टतार्ओं की भूमिकाओं क विकास, (iii) प्रमुख बार्जार्रों, जैसे वस्तुओं क बार्जार्र, श्रम बार्जार्र, तथार् मुद्रार् बार्जार्र के क्षेत्र व जटिलतार् क विकास। रार्जनैतिक क्षेत्र में आधुनिक समार्ज कुछ अर्थों में प्रजार्तार्ंत्रिक यार् कम से कम जनवार्दी (populistic) है। इसके लक्षण हैं: (i) शार्सकों के अपने समार्ज से बार्हर शक्ति के सन्दर्भ में पार्रम्परिक वैधतार् में गिरार्वट, (ii) शार्सकों की उन शार्सितों के प्रति एक प्रकार के वैचार्रिक उत्तरदार्यित्व (ideological accountability) की स्थार्पनार् जो रार्जनैतिक सत्तार् के वार्स्तविक धार्रणहार्री होते हैं, (iii) समार्ज की रार्जनैतिक, प्रशार्सनिक, वैधार्निक एवं केन्द्रीय शक्ति की सीमार्ओं क विकासशील विस्तार्र, (iv) समार्ज में अधिक से अधिक समूहों में संभार्वित शक्ति क निरन्तर फैलार्व और अन्तत: सभी प्रौढ़ नार्गरिकों में तथार् नैतिक व्यवस्थार् में फैलार्व और (v) किसी भी शार्सक व्यक्ति यार् शार्सक समूह के प्रति प्रदत्त रार्जनैतिक प्रतिबद्धतार् में कमी होनार्।

सार्ंस्कृतिक क्षेत्र में आधुनिक समार्ज के लक्षण हैं: (i) प्रमुख सार्ंस्कृतिक और मूल्य व्यवस्थार्ओं के प्रमुख तत्वों जैसे, धर्म दर्शन और विज्ञार्न में बढ़तार् हुआ अन्तर, (ii) धर्म निरपेक्ष शिक्षार् और सार्क्षरतार् क विस्तार्र, (iii) बौद्धिक विषयों पर आधार्रित विशिष्ट भूमिकाओं के विकास के लिए जटिल संस्थार्त्मक व्यवस्थार्, (iv) संचार्र सार्धनों क विकास, (v) नवीन सार्ंस्कृतिक दृष्टिकोण क विकास जिसमें प्रगति व सुधार्र पर बल, योग्यतार्ओं की अभिव्यक्ति और प्रसन्नतार् पर बल, व्यक्तिवार्द क नैतिक मूल्यों के रूप में मार्नने पर बल तथार् व्यक्ति की कुशलतार् और सम्मार्न पर बल दियार् जार्तार् है। विस्तृत रूप में आधुनिकीकरण के प्रमुख लक्षण इस प्रकार हैं:

  1. वैज्ञार्निक भार्वोन्मार्द (temper) 
  2. कारण (reason) और तर्कवार्द 
  3. धर्मनिरपेक्षतार् 
  4. उच्च आकांक्षार्एं तथार् उपलब्धि परकतार् (achievement orientation) 
  5. मूल्यों, मार्नदण्डों और अभिरूचियों में सम्पूर्ण परिवर्तन 
  6. नवीन प्रकार्यार्त्मक संस्थार्ओं की रचनार् 
  7. मार्नव संसार्धनों में निवेश (investment) 
  8. विकास परक अर्थ व्यवस्थार् 
  9. नार्तेदार्री, जार्ति, धर्म यार् भार्षार् परक हितों की अपेक्षार् रार्ष्ट्रीय हित 
  10. मुक्त (open) समार्ज 
  11. गतिशील व्यक्तित्व

आधुनिकीकरण के परिमार्प

आधुनिकीकरण के परिमार्पों के विषय में व्यार्ख्यार् करते हुए रस्टोव और वाड ;Rustov and Ward) ने इनमें परिवर्तन के इन विशेष पक्षों को सम्मिलित कियार् है: (i) अर्थव्यवस्थार् क औद्योगीकरण तथार् उद्योग, कृषि, दुग्ध उद्योग (dairy farming), आदि में वैज्ञार्निक तकनीकी धार्रण करके उन्हें अधिकाधिक उत्पार्दक बनार्नार्; (ii) विचार्रों क धर्म निरपेक्षीकरण; ;पपपद्ध भौगोलिक एवं सार्मार्जिक गतिशीलतार् में उल्लेखनीय वृद्धि; (iv) तकनीकी तथार् वैज्ञार्निक शिक्षार् क प्रसार्र; (v) प्रदत्त प्रस्थिति से अर्जित प्रस्थिति में परिवर्तन; (vi) भौतिक जीवन स्तर में वृद्धि; (vii) अर्थ व्यवस्थार् में निर्जीव शक्ति (inanimate energy) क जैविक (animate) शक्ति से अधिक उपयोग; (viii) प्रार्थमिक उत्पार्दन क्षेत्र की अपेक्षार् द्वैतीयक तथार् तृतीय उत्पार्दन क्षेत्रों में अधिक श्रमिकों क कार्य करनार् (अर्थार्त, कृषि व मत्स्य कार्यों की अपेक्षार् निर्मार्ण और नौकरी आदि व्यवसार्यों में अधिक श्रमिक); (ix) तीव्र शहरीकरण; (x) उच्च स्तरीय सार्क्षरतार्; (xi) प्रति व्यक्ति उच्च रार्ष्ट्रीय उत्पार्दन; (xii) जनसंचार्र क नि:शुल्क विस्तार्र; (viii) जन्म के समय उच्च जीवन अपेक्षार् (expectancy)।

आधुनिकीकरण की कुछ पूर्व आवश्यकतार्एं 

परम्परार्वार्द से आधुनिकीकरण में परिवर्तन होने से पूर्व समार्ज में आधुनिकीकरण की कुछ पूर्व आवश्यकतार्एं मौजूद होनी चार्हिए। ये हैं: (i) उद्देश्य की जार्नकारी तथार् भविष्य पर दृष्टि, (ii) अपनी दुनियार् से परे भी अन्य समार्जों के प्रति जार्गरूकतार् (iii) अति आवश्यकतार् क भार्व, (iv) विविध भूमिकाओं एवं अवसरों की उपलब्धतार्, (v) स्वयं लार्दे गए कार्यों एवं बलिदार्नों के लिए भार्वनार्त्मक तत्परतार्, (vi) प्रतिबद्ध, गतिशील एवं निष्ठार्वार्न नेतृत्व क उदय।

आधुनिकीकरण बड़ार् जटिल है क्योंकि इसमें न केवल अपेक्षार्कृत नए स्थाइ ढार्ँचे की आवश्यकतार् होती है, बल्कि ऐसे ढार्ँचे की भी जो स्वयं को निरन्तर बदलती दशार्ओं एवं समस्यार्ओं के अनुकूल बनार् ले। इसकी सफलतार् समार्ज की आन्तरिक परिवर्तन की सार्मथ्र्य पर निर्भर करती है।

इजेन्टार्ड की मार्न्यतार् है कि आधुनिकीकरण के लिए एक समार्ज के तीन संरचनार्त्मक लक्षण होने चार्हिए: (i) (उच्च स्तरीय) संरचनार्त्मक अन्तर, (ii) (उच्च कोटि की) सार्मार्जिक गतिशीलतार्, और (iii) अपेक्षार्कृत केन्द्रीय तथार् स्वार्यत्ततार् धार्री संस्थार्त्मक संरचनार्।

आधुनिकीकरण के प्रति प्रतिक्रियार्

सभी समार्ज आधुनिकीकरण की एक सी प्रक्रियार् स्वीकार नहीं करते हैं। हर्बर्ट ब्लूमर (Herbert Blumer) के विचार्र को मार्नते हुए पार्ंच तरीके बतार्ये जार् सकते हैं जिनमें एक परम्परार्गत समार्ज आधुनिकीकरण की प्रक्रियार् के प्रति प्रतिक्रियार् व्यक्त कर सकतार् है। ये हैं:

  1. अस्वीकार्य अनुक्रियार् (Rejective Response): एक परम्परार्गत समार्ज आधुनिकीकरण को अस्वीकार कर सकतार् है। यह अनेक प्रकार के विविध स्तरों पर हो सकतार् है। शक्तिशार्ली समूह, भूसार्मन्तशार्ही, सरकारी स्वल्पतन्त्र (oligarchy), मजदूर संघ तथार् धर्मार्न्ध लोग अपने हितों की रक्षार् के लिए आधुनिकीकरण को हतोत्सार्हित कर सकते हैं। सार्मार्जिक पूर्वार्ग्रह (prejudices), परम्परार्गत जीवन के कुछ स्वरूपों, विश्वार्सों व प्रथार्ओं में दृढ़ आस्थार् तथार् विशेष रूचि कुछ लोगों को आधुनिकीकरण की प्रक्रियार् को अस्वीकार करने और परम्परार्त्मक व्यवस्थार् को बनार्ए रखने के लिए बार्ध्य कर सकते हैं।
  2. विकल्पयुक्त अनुक्रियार् (Disjunctive Response): प्रार्चीन और नवीन के बीच सन्धि (conjunction) अनुक्रियार् अथवार् आधुनिकीकरण तथार् परम्परार्त्मकतार् के बीच सह-अस्तित्व (co-existence) तब होतार् है जब आधुनिकीकरण की प्रक्रियार् परम्परार्गत जीवन को प्रभार्वित किये बिनार् ही निस्पृह (detached) विकास के रूप में चलती रहती है। इस प्रकार आधुनिकीकरण तथार् परम्परार्त्मक व्यवस्थार् में कोर्इ संघर्ष नहीं होतार् क्योंकि प्रार्चीन व्यवस्थार् को कोर्इ खतरार् नहीं होतार्। आधुनिकीकरण के लक्षण परम्परार्त्मक जीवन के सार्थ-सार्थ रहते है।
  3. आत्मसार्ती अनुक्रियार् (Assimilative Response): इस अनुक्रियार् में परम्परार्गत व्यवस्थार् द्वार्रार् आधुनिकीकरण की प्रक्रियार् क आत्मसार्तीकरण निहित है जो कि जीवन के स्वरूप और संगठनार्त्मक पक्ष पर कोर्इ प्रभार्व नहीं डार्लतार्। इसक उदार्हरण बैंकिग व्यवस्थार् में बैंक कर्मचार्रियों द्वार्रार् कम्प्यूटर विचार्रधार्रार् को स्वीकार करनार् है, अथवार् गार्ँवों में किसार्नों द्वार्रार् कृत्रिम उर्वरकों और टे्रक्टरों क प्रयोग करनार् है। दोनों ही उदार्हरणों में आधुनिकीकरण की प्रक्रियार् परम्परार्त्मक व्यवस्थार् यार् उसके मूलभूत ढार्ँचे को प्रभार्वित किए बिनार् आती है। 
  4. समर्थ अनुक्रियार् (Supportive Response) इसके अन्तर्गत नवीन व आधुनिक बार्तें स्वीकार की जार्ती हैं क्योंकि उनसे परम्परार्त्मक व्यवस्थार् को बल मिलतार् है। उदार्हरणाथ, पुलिस यार् सेनार् में आधुनिकीकरण की प्रक्रियार् पुलिस की कार्य क्षमतार् तथार् सेनार् की शक्ति में वृद्धि करती है। विविध परम्परार्त्मक समूह और संस्थार्एं परम्परार्गत हितों को जार्री रखने के लिए आधुनिकीकरण द्वार्रार् प्रदत्त अवसरों क प्रयोग करते हैं तथार् परम्परार्गत स्थिति को दृढ़तार् से बनार्ए रखते हैं। आधुनिकीकरण परम्परार्त्मक हितों को आगे बढ़ार्ए रखने के लिए संसार्धन और सुविधार्एं उपलब्ध करार् सकतार् है 
  5. विघटनकारी अनुक्रियार् (Disruptive Response): इस अनुक्रियार् में परम्परार्गत व्यवस्थार् को कर्इ बिन्दुओं पर समार्योजन द्वार्रार् खोखलार् बनार्यार् जार्तार् है जो कि आधुनिकीकरण द्वार्रार् उत्पन्न स्थितियों के कारण कियार् जार्तार् है।

सार्धार्रणतयार् ये पार्ंचों अनुक्रियार्एँ विविध संयोजनों (combinations) द्वार्रार् परम्परार्गत व्यवस्थार् के विविध बिन्दुओं पर होती रहती है। अनुक्रियार्एं वरीयतार्ओं (preferences), रुचियों (interests), तथार् मूल्यों (values) से प्रभार्वित होती रहती हैं।

आधुनिकीकरण के प्रमुख सार्धन

मार्इरन वीनर (Myron Weiner) के अनुसार्र आधुनिकीकरण को सम्भव बनार्ने वार्ले प्रमुख सार्धन (instruments) इस प्रकार हैं:

  1. शिक्षार् (Education): शिक्षार् रार्ष्ट्रीयतार् क भार्व जार्गृत करती है तथार् तकनीकी नवीनतार्ओं के लिए आवश्यक दक्षतार् और अभिरुचियार्ँ पैदार् करती हैं। एडवर्ड शिल्स ने भी आधुनिकीकरण की प्रक्रियार् में शिक्षार् की भूमिक पर बल दियार् है। परन्तु आर्नोल्ड एण्डरसन (Arnold Anderson) की मार्न्यतार् है कि औपचार्रिक (formal) शिक्षार् ही केवल अध्यार्पन कुशलतार् के लिए पर्यार्प्त नहीं है। कभी कभी विश्वविद्यार्लय स्तर की शिक्षार् व्यर्थ हो सकती है, क्योंकि यह डिग्रीधार्रियों की संख्यार् में तो वृद्धि कर देती है, किन्तु आधुनिक दक्षतार् तथार् अभिरुचियों से पूर्ण लोगों की संख्यार् में वृद्धि नहीं करती।
  2. संचार्र (Communication): जनसंचार्र के सार्धनों क विकास (टेलीफोन, टी0वी0, रेडियों तथार् फिल्म आदि) आधुनिक विचार्रों को प्रसार्रित करने क एक महत्वपूर्ण सार्धन है। केवल खतरार् यह है कि यदि इन पर सरकारी नियंत्रण हो तो यह एक ही प्रकार की विचार्रधार्रार् को प्रसार्रित करेंगे। प्रजार्तंत्र में प्रेस अपने विचार्रों की अभिव्यक्ति के लिए स्वतंत्र होतार् है। 
  3. रार्ष्ट्रवार्द पर आधार्रित विचार्रधार्रार् (Ideology Based on Nationalism): बहुल (plural) समार्जों में रार्ष्ट्रवार्दी विचार्रधार्रार्एं सार्मार्जिक दरार्रों (social cleavages) के एकीकरण के लिए अच्छार् सार्धन होती हैं। वे लोगों के व्यवहार्र परिवर्तन हेतु रार्जनैतिक अभिजन की भी सहार्यतार् करती हैं। परन्तु बार्इन्डर (Binder) की मार्न्यतार् है कि अभिजनों की विचार्रधार्रार् आधुनिक हो सकती है, लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि इससे विकास को भी सुविधार् प्रार्प्त हो।
  4. करिश्माइ (चमत्कारी) नेतार् (Charismatic Leadership): एक करिश्माइ (चमत्कारी) नेतार् लोगों को आधुनिक विचार्र, विश्वार्स, रीति-रिवार्ज तथार् व्यवहार्र अपनार्ने के लिए प्रेरित करने में अच्छी स्थिति में होतार् है क्योंकि लोग उसे श्रद्धार् व निष्ठार् से देखते हैं। भय यही रहतार् है कि ऐसार् नेतार् कहीं रार्ष्ट्रीय विकास के स्थार्न पर व्यक्तिगत यश के लिए आधुनिक मूल्यों एवं अभिरूचियों क प्रयोग न करने लगे। 
  5. अवपीड़क सरकारी सत्तार् (Coercive Government Authority): यदि सरकारी सत्तार् कमजोर है तो यह आधुनिकीकरण की प्रक्रियार् के उद्देश्यों को प्रार्प्त करने के लिए बनी नीतियों के क्रियार्न्वयन (implementation) में सफलतार् प्रार्प्त नहीं कर पार्ती है, किन्तु यदि सरकार मजबूत है तो यह लोगों को विकास के उद्देश्य से व्यवहार्र एवं अभिरूचियों को अपनार्ने के लिए बार्ध्य कर सकती है और इसके लिए अवपीड़न (coercion) क सहार्रार् भी ले सकती है। परन्तु मार्इरन वीनर क मत है कि एक तार्नार्शार्ही शार्सन की ढार्ल के नीचे रार्ष्ट्रीयतार् देश को विकास की ओर ले जार्ने के स्थार्न पर देश के बार्हर आत्महत्यार् क विस्तार्र स्वरूप (suicidal expansion) सिद्ध हो सकती है। इस सन्दर्भ में बुश प्रशार्सन (अमेरिक में) के रार्जनैतिक अभिजनों की नीतियों क उद्धरण देनार् गलत नहीं होगार् जो कि उन्होंने र्इरार्क आदि के लिए बनाइ थीं। रूस की श्रेष्ठतार् समार्प्त हो जार्ने के बार्द अमेरिक की सरकारी सत्तार् ने अविकसित एवं विकासशील देशों को आधुनिकीकरण के नार्म पर पीड़ित करने की नीति अपनार्नी प्रार्रम्भ कर दी। मार्इरन वीनर ने समार्ज के आधुनिकीकरण के लिए मूल्यों, अवसरों एवं अभिरूचियों में परिवर्तन की बार्त भी कही है। अनेक अर्थशार्स्त्रियों ने भी इस विचार्र क समर्थन कियार् है। उन्होंने उत्पार्दन की प्रक्रियार् में उन संस्थार्त्मक रूकावटों की ओर संकेत कियार् है जो विनियोजन (investment) की दर में कमी करती हैं। इस प्रकार की संस्थार्त्मक रूकावटों के उदार्हरण हैं: भूस्वार्मित्व (landtenure) व्यवस्थार् जो कि किसार्नों को बढ़ते हुए उत्पार्दन के लार्भ से वंचित करती है, ऐसे कर जो देश के एक भार्ग से दूसरे भार्ग में वस्तुओं की आने जार्ने की गति कम करते हैं तथार् नौकरशार्ही नियम।

भार्रत में पश्चिम क और आधुनिकीकरण क प्रभार्व

अलार्टार्स के अनुसार्र भार्रत पर पश्चिमी प्रभार्व क पार्ँच चरणों में विवेचन कियार् जार् सकतार् है। प्रथम चरण सिकन्दर की विजय के सार्थ प्रतिरोधी सम्पर्क है जो कि बार्द की शतार्ब्दियों से वार्णिज्य व व्यार्पार्र से शक्तिपूर्ण आदार्न प्रदार्न के रूप में सदियों तक चलतार् रहार्। दूसरार् चरण पन्द्रहवीं शतार्ब्दी के अन्त से प्रार्रम्भ हुआ जब वार्स्कोडिगार्मार् कालीकट में अपने जहार्जों के सार्थ 1498 र्इ0पू0 में आयार्। कुछ ही वर्षों में पुर्तगार्लियों ने गोआ पर अधिकार कर लियार्। लेकिन इन पश्चिमी लोगों क प्रभार्व अपेक्षार्कृत कम रहार्। तृतीय चरण प्रार्रम्भ हुआ जब र्इस्ट इण्डियार् कम्पनी ने अठार्रहवीं शतार्ब्दी के प्रार्रम्भ में अपनार् शार्सन प्रार्रम्भ कियार् और बार्द में अठार्रहवीं शतार्ब्दी के मध्य तक ब्रिटिश सार्म्रार्ज्य भार्रत में स्थार्पित हो गयार्। भार्रत में पश्चिमी संस्कृति के विस्तार्र क यह प्रथम कदम थार्। चतुर्थ चरण प्रार्रम्भ हुआ उन्नीसवीं शतार्ब्दी के प्रार्रम्भ तथार् औद्योगिक क्रार्न्ति के आगमन से। अंग्रेजों द्वार्रार् कच्चे मार्ल के रूप में आर्थिक शोषण से प्रार्रम्भ हुआ और तभी से सार्ंस्कृतिक तथार् सार्मार्जिक क्षेत्रों में भी पश्चिमी संस्कृति क वर्चस्व प्रार्रम्भ हुआ। पार्ंचवार्ँ और अंतिम चरण प्रार्रम्भ हुआ 1947 में भार्रत की रार्जनैतिक स्वतंत्रतार् के सार्थ। हमार्री सार्मार्जिक व्यवस्थार् तथार् हमार्री संस्कृति पर प्रभार्व के अर्थ में पश्चिमी संस्कृति की क्यार् छार्प पड़ी है? इसको संक्षेप में इस प्रकार बतार्यार् जार् सकतार् है:

  1. बैंक व्यवस्थार्, लोक प्रशार्सन, सैन्य संगठन, आधुनिक औषधियार्ँ, कानून आदि जैसी पश्चिमी संस्थार्ओं को देश में प्रार्रम्भ कियार् गयार्। 
  2. पश्चिमी शिक्षार् ने उन लोगों के दृष्टिकोण को विस्तृत कियार् जिन्होंने आजार्दी व अधिकारों की बार्त शुरू की। नवीन मूल्यों, धर्म निरपेक्ष व न्यार्य संगत भार्वनार् तथार् व्यक्तिवार्द, समार्नतार् व न्यार्य के विचार्रों के समार्वेश ने बड़े महत्व क स्थार्न ले लियार्। 
  3. वैज्ञार्निक नवीनतार्ओं की स्वीकृति ने जीवन स्तर को ऊंचार् उठार्ने की आकांक्षार्ओं को ऊंचार् उठार्यार् और लोगों के लिए भौतिक कल्यार्ण उपलब्ध करार्यार्। 
  4. कर्इ सुधार्र आन्दोलन हुए। अनेक परम्परार्गत विश्वार्स तथार् व्यर्थ की प्रथार्एं त्यार्ग दी गर्इ, तथार् अनेक नए व्यवहार्र स्वरूप अपनार्ए गए। 
  5. हमार्री तकनीकी, कृषि, व्यवसार्य और उद्योग आधुनिक किए गए जिससे देश क आर्थिक विकास एवं कल्यार्ण हुआ। 
  6. रार्जनैतिक मूल्यों के संस्तरण की पुनर्रचनार् की गर्इ। प्रजार्तंत्र स्वीकार करने के बार्द सभी रियार्सतें भार्रतीय रार्ज्य में सम्मिलित कर ली गर्इ तथार् सार्मन्तों और जमींदार्रों के अधिकार और शक्ति समार्प्त हो गर्इ।
  7. विवार्ह, परिवार्र और जार्ति जैसी संस्थार्ओं में संरचनार्त्मक परिवर्तन आए और सार्मार्जिक तथार् धामिक जीवन में नए संबंध बनने लगे। 
  8. रेलवे, बस यार्त्रार्, डार्क सेवार्, हवाइ एवं समुद्री यार्त्रार्, प्रेस, रेडियों और दूरदर्शन आदि संचार्र मार्ध्यमों के आने से मार्नव जीवन के अनेक क्षेत्रों में प्रभार्व पड़ार् है। 
  9. रार्ष्ट्रीय भार्वनार् में वृद्धि हुर्इ है। 
  10. मध्यम वर्ग के उदय ने समार्ज के प्रमुख मूल्यों में परिवर्तन कर दियार् है।

अलार्टार्स (Alatas) ने पश्चिमी संस्कृति के प्रभार्व को हमार्री संस्कृति और सार्मार्जिक व्यवस्थार् में चार्र प्रकार के परिवर्तनों के आधार्र पर समझार्यार् है: निरस्नार्त्मक (eliminative) परिवर्तन, योगार्त्मक (addictive) परिवर्तन, समर्थन (supportive) परिवर्तन, तथार् संश्लेषार्त्मक (synthetic) परिवर्तन। निरस्नार्त्मक परिवर्तन वे हैं जिनसे सार्ंस्कृतिक विशेषतार्एँ, व्यवहार्र के स्वरूप, मूल्य, विश्वार्स और संस्थार्एं लुप्त हो जार्ती हैं। उदार्हरणाथ, युद्ध में प्रयोग आने वार्ले शस्त्रों में पूर्ण परिवर्तन, सती प्रथार् क उन्मूलन आदि। योगार्त्मक परिवर्तनों में जीवन के विभिन्न पहलुओं से संबंधित नयी सार्ंस्कृतिक विशेषतार्ओं, संस्थार्ओं, व्यवहार्र स्वरूपों तथार् विश्वार्सों को अपनार्नार् सम्मिलित है। हिन्दू समार्ज में विवार्ह-विच्छेद की व्यवस्थार्, पितार् की सम्पत्ति में पुत्री को भार्ग देनार्, पंचार्यतों में चुनार्व प्रथार् आदि इस प्रकार के परिवर्तन के कुछ उदार्हरण हैं। समर्थक परिवर्तन वे हैं जो पश्चिमी सम्पर्क में आने से पूर्व समार्ज में विद्यमार्न विश्वार्स, मूल्यों यार् व्यवहार्र स्वरूपों को अधिक मजबूत करते हैं। इसक एकमार्त्र उदार्हरण है कर्ज व्यवहार्र में हुण्डी क प्रयोग। संश्लेषार्त्मक परिवर्तन वे हैं जो वर्तमार्न में विद्यमार्न तत्वों से नए स्वरूपों की रचनार् करते हैं और सार्थ ही नए स्वरूपों को भी अपनार्ते हैं। इसक उदार्हरण उस परिवार्र की रचनार् है जो आवार्स की दृष्टि से तो एकाकी है परन्तु कार्य (function) की दृष्टि से अब भी सुयंक्त हैं। जो मार्तार्-पितार् तथार् सहोदरों के प्रति सार्मार्जिक दार्यित्वों को पूरार् करतार् है। दहेज प्रथार् की निरन्तरतार् बनार्ए रखनार्, किन्तु दहेज की धन रार्शि लेने देने पर प्रतिबन्ध लगार्यार् जार्नार्। बच्चों क मार्तार्-पितार् के सार्थ जीवन सार्थी के चयन में सहयोग आदि।

पश्चिमी प्रभार्व के कारण परिवर्तन क उपरोक्त विभार्जन केवल विश्लेषण के उद्देश्य से है, लेकिन एक दूसरे से उनको अलग करनार् सम्भव नहीं है। एक ही प्रकार के परिवर्तन के भीतर हम दूसरे प्रकार के परिवर्तनों के तत्व भी देख सकते हैं। उदार्हरणाथ, वस्त्र उद्योग के प्रार्रम्भ करने में समर्थक तत्व देखे जार् सकते हैं क्योंकि यह कपड़े के उत्पार्दन को सुविधार् प्रदार्न करतार् है। परन्तु सार्थ ही क्योंकि इससे हार्थकरघार् (handloom) उद्योग को आघार्त लगार् है, तो यह कहार् जार् सकतार् है कि इसमें हटार्ने योग्य अथवार् निरस्नार्त्मक परिवर्तन के तत्व भी काम करते हैं। खुले कारार्गृहों (wall-less prisons) क आरम्भ भी एक और उदार्हरण है जिसमें तीन विविध प्रकार के परिवर्तन कार्य करते हैं। इसी प्रकार, शिक्षार् व्यवस्थार्, बैकिंग-व्यवस्थार्, विवार्ह व्यवस्थार् आदि में परिवर्तन मिलते हैं।

अब प्रमुख प्रश्न है कि: पश्चिम के सम्पर्क के बार्द भार्रत कहार्ँ पहुंच गयार् है? क्यार् भार्रत ने प्रगति की है? क्यार् इसने लोक कल्यार्ण में योगदार्न कियार् है? कुछ विद्वार्न मार्नते हैं कि भार्रत को द्वितीय महार्युद्ध के पश्चार्त् अनेक समस्यार्ओं क सार्मनार् करनार् पड़ार्, जैसे आर्थिक पिछड़ार्पन, बड़ी संख्यार् में लोगों क गरीबी की रेखार् से नीचे जीवनयार्पन करनार्, बेरोजगार्री, जीवन के सभी क्षेत्रों में धर्म क प्रभुत्व, ग्रार्मीण ऋण, जार्तीय संघर्ष, सार्म्प्रदार्यिक दुर्भार्वनार्, पूँजी की कमी, तकनीकी दक्षतार् वार्ले दक्ष कार्मिकों की कमी, आदि। इन समस्यार्ओं क समार्धार्न भी पश्चिमी प्रभार्व ने दियार् है। लेकिन अन्य विद्वार्नों की मार्न्यतार् है कि पश्चिमी प्रभार्व ने भार्रत को इन समस्यार्ओं के समार्धार्न में कोर्इ सहार्यतार् नहीं की। यदि कुछ समस्यार्ओं क समार्धार्न हुआ है तो कर्इ दूसरी समस्यार्एं खड़ी हुर्इ हैं और भार्रत उन्हें पश्चिम के नमूने पर सुलझार्ने क प्रयत्न नहीं कर रहार् है। भार्रत स्वदेशी ढंग से उन्हें सुलझार्ने क प्रयार्स कर रहार् है। देश की स्वतंत्रतार् के बार्द ही औद्योगिक विकास में वृद्धि, शिक्षार् क विस्तार्र, ग्रार्मीण विकास, जनसंख्यार् पर नियंत्रण आदि पार्यार् गयार् है। इस प्रकार पश्चिमी शार्सन की मुक्ति से और न कि पश्चिमी सम्पर्क से भार्रत में आधुनिकीकरण सम्भव हुआ है।

वार्स्तविकतार् यह है कि जीवन के कुछ क्षेत्रों में पश्चिमी प्रभार्व को स्वीकार करके हम सही हो सकते हैं। आधुनिक मेडिकल सार्इंस, आधुनिक तकनीकी, प्रार्कृतिक प्रकोपों क सार्मनार् करने के आधुनिक उपार्य, देश को बार्हरी खतरों से सुरक्षार् प्रदार्न करने के आधुनिक तरीके, आदि भार्रत के इतिहार्स में पश्चिम के अद्वितीय योगदार्न के रूप में गिने जार्येंगे। लेकिन, भार्रत इनके सार्थ-सार्थ लोगों के उत्थार्न के लिए अपनी परम्परार्गत संस्थार्ओं, प्रथार्ओं और विश्वार्सों क भी प्रयोग कर रहार् है। इस प्रकार पश्चिमी प्रभार्व के बार्द भी तथार् विविध व्यवस्थार्ओं के आधुनिकीकरण के बार्द भी भार्रत, भार्रत ही रहेगार्। भार्रतीय संस्कृति आने वार्ले कर्इ दशकों तक सुरक्षित रहेगी।

भार्रत में आधुनिकीकरण की प्रक्रियार्

पूर्व पृष्ठार्ों में कियार् गयार् विश्लेषण दर्शार्तार् है कि परम्परार् और आधुनिकतार् में एक अटूट क्रम पार्यार् जार्तार् है जिसमें एक ओर परम्परार् और दूसरी ओर आधुनिकीकरण है। निरन्तरतार् की इस रेखार् पर किसी भी समार्ज को किसी भी बिन्दु पर रखार् जार् सकतार् है। अधिकतर समार्ज किसी न किसी प्रकार की संक्रमण की स्थिति में रहते हैं। स्वतंत्रतार् के समय भार्रतीय समार्ज में भी गहरी परम्परार्एं थीं, किन्तु यह आधुनिक भी होनार् चार्हतार् थार्। ऐसे लोग व ऐसे नेतार् थे जो कि परम्परार्गत जीवन शैली ही पसन्द करते थे, लेकिन दूसरी ओर ऐसे लोग भी थे जो भार्रत क आधुनिक उदय देखनार् चार्हते थे जिसमें अतीत क लगार्व न हो। लेकिन कुछ ऐसे भी थे जो परम्परार् एवं आधुनिकतार् के बीच सार्मंजस्य के पक्षधर थे। उनक कहनार् थार् कि परम्परार्गत व्यवस्थार् एक सीमार् तक आधुनिकीकरण को स्वीकार कर सकती है व अपनार् सकती है। इसी प्रकार एक आधुनिकीकृत व्यवस्थार् एक निश्चित सीमार् तक ही परम्परार्त्मक विचार्रों को सहन कर सकती है। इस प्रकार वे सह-अस्तित्व चार्हते थे। लेकिन प्रथम दो विचार्रधार्रार्ओं के प्रतिपार्दकों ने मार्नार् कि सह अस्तित्व बहुत लम्बी अवधि तक नहीं चल सकतार्। एक ऐसार् बिन्दु अवश्य आतार् है जबकि परम्परार् असह्य हो जार्ती है।

हमने अपने समार्ज को विविध स्तरों पर आधुनिक बनार्ने क निश्चय कियार्। सार्मार्जिक स्तर पर हम सार्मार्जिक संबंधों को समार्नतार् तथार् मार्नवीय गौरव के आधार्र पर बनार्नार् चार्हते थे। ऐसे सार्मार्जिक मूल्य चार्हते थे जो सार्मार्जिक गतिशीलतार् को सुनिश्चित करें, जार्ति निर्योग्यतार्ओं को दूर करें स्त्रियों की दशार् में सुधार्र करें, आदि आर्थिक स्तर पर हम तकनीकी विकास तथार् न्यार्य वितरण (distributive justice) चार्हते थे। सार्ंस्कृतिक स्तर पर हम धर्म निरपेक्षतार्, तर्कवार्द और उदार्रवार्द चार्हते थे। रार्जनैतिक स्तर पर हम प्रतिनिधि सरकार, जनतार्ंत्रिक संस्थार्एं, उपलब्धि-परक शक्ति संरचनार् (achievement-oriented power structure), तथार् देश की सरकार में भार्रतीय जन की अधिक आवार्ज व भार्गीदार्री चार्हते थे। समार्ज को आधुनिक बनार्ए जार्ने के लिए जो मार्ध्यम चुने गए (तर्कवार्द और वैज्ञार्निक ज्ञार्न पर आधार्रित) वे थे: नियोजन, शिक्षार्, (जो अज्ञार्नतार् के अंधकार को दूर कर सके), विधार्न, विदेशों से सहार्यतार्, उदार्रवार्द की नीति अपनार्नार् आदि। जहार्ँ तक आधुनिकीकरण की प्रक्रियार् क संबंध है, विस्तृत रूप में कहार् जार् सकतार् है कि गुणार्त्मक दृष्टिकोण से भार्रत में आधुनिकीकरण इन प्रक्रियार्ओं से गुजर रहार् है: आर्थिक सरंचनार्त्मक स्तर पर पुरार्नी पार्रिवार्रिक एवं सार्मुदार्यिक उपकरणीय अर्थव्यवस्थार् (tool economy) के स्थार्न पर यार्ंत्रिक औद्योगिक अर्थ व्यवस्थार् को अपनार्ने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। यह जजमार्नी प्रथार् जैसी परम्परार्गत व्यवस्थार् को तोड़ने के लिए भी उत्तरदार्यी है।

रार्जनैतिक संरचनार्त्मक स्तर पर, शक्ति संरचनार् में परिवर्तन लार्यार् जार् रहार् है। अर्द्ध सार्मन्ती समूह-परक (group-oriented) शक्ति संरचनार् क उन्मूलन कर के और उसके स्थार्न पर जनतार्ंत्रिक शक्ति संरचनार् की स्थार्पनार् कर के जो कि आवश्यक रूप से व्यक्ति-परक (individual-oriented) होती है। सार्ंस्कृतिक स्तर पर मूल्यों के क्षेत्र में परिवर्तन पवित्र मूल्य व्यवस्थार् से धर्म निरपेक्ष मूल्य व्यवस्थार् में परिवर्तन के द्वार्रार् लार्यार् जार् रहार् है। सार्मार्जिक संरचनार्त्मक स्तर पर अर्जित प्रस्थिति भूमिक की अपेक्षार् परम्परार्गत प्रदत्त भूमिक व प्रस्थिति में कमी आर्इ है।

भार्रत में आधुनिकीकरण की एक अनोखी विशेषतार् यह है कि परम्परार्गत संरचनार् में परिवर्तन अपनार् कर परिवर्तन लार्यार् जार् रहार् है, न कि सरंचनार् में विखण्डन के द्वार्रार्। यह सत्य है कि परम्परार्गत समार्ज की अधिकतर विशेषतार्एं आधुनिक समार्ज में उपयुक्त नहीं बैठती, फिर भी आधुनिकतार् जनतार् पर थोपी नहीं जार् सकती। आधुनिकीकरण पेशे के अनुसार्र निर्देशित (professionally directed) होनार् चार्हिए। परम्परार्गत संस्थार्ओं की विशेषतार्ओं को विकास की प्रक्रियार् में उपयुक्त समार्योजन के सार्थ रोके रखार् जार् सकतार् है। कोर्इ भी समार्ज तनार्व मुक्त तभी रह सकतार् है जबकि यह बन्द हो तथार् गतिशील समार्ज न हो। विकासशील समार्ज तनार्व और प्रतिरोधो के भीतर होने के आधार्र पर कार्य करतार् है। तनार्व आधुनिकतार् व परम्परार् के बीच निहित संघर्षों के कारण बनार् रहतार् है। तनार्व अतीत की धरोहर होते हैं जो कि आर्थिक विकास के दबार्व के कारण बने रहते हैं। बहुधार् विकास की प्रक्रियार् में कुछ तनार्व सुलझ जार्ते हैं। स्थार्यित्व और संरक्षण की शक्तियों तथार् परिवर्तन और आधुनिकीकरण की शक्तियों के बीच दोहरार् संबंध होतार् है। विकासशील समार्ज इन समस्यार्ओं क सार्मनार् चतुरतार् से करतार् है। अत: परिवर्तन और आधुनिकीकरण की चुनौतियों क जैसे, क्षेत्रवार्द, प्रार्न्तीयतार्, अशिक्षार्, प्रव्रजन (migration), मुद्रार् स्फीति, पूँजी की कमी, रक्षार् खर्च में कमी के उद्देश्य से पड़ौसी रार्ष्ट्रों से सार्मंजस्य, रार्जनैतिक भ्रष्टार्चार्र, नौकरशार्ही की अकुशलतार्, और अप्रतिबद्धतार् आदि क सार्मनार् धैर्य पूर्वक एवं विधिपूर्वक तरीके से तर्कशील अभिस्वीकरण (adoptive) प्रक्रियार्ओं द्वार्रार् करतार् है। परम्परार्गत समार्ज के टूटने से व्यक्तिगत स्वतंत्रतार् में वृद्धि, सत्तार् क समतलीकरण, व निर्णय लेने में जन समूहों क योगदार्न अधिक होने लगतार् है। आधुनिकीकरण की प्रक्रियार् में सार्मार्जिक, रार्जनैतिक व सार्ंस्कृतिक विकास क नियोजन ही लोगों को आधुनिक विचार्रों एवं मार्नदण्डों में भार्गीदार्री के लिए प्रेरित करतार् और महत्वपूर्ण सार्मार्जिक समूहों-बुद्धिजीवियों, रार्जनैतिक अभिजनों, नौकरशार्ही एवं तकनीकी विशेषज्ञों को नियोजित परिवर्तनों को स्वीकार करने के लिए बार्ध्य करतार् है।

आधुनिकीकरण की समस्यार्एं

  1. आधुनिकीकरण क प्रथम विरोधार्भार्स यह है कि एक आधुनिक समार्ज को तुरन्त हर प्रकार से बदल जार्नार् चार्हिए, लेकिन ऐसे नियमित एवं विकास क समन्वित स्वरूप क अनुमार्नित नियोजन नहीं हो सकतार्। अत: एक प्रकार की सार्मार्जिक हलचल हो ही जार्ती है। उदार्हरणाथ, जन शिक्षार् व्यवस्थार् की मार्ंग है कि दक्ष (trained) व्यक्तियों को उनकी ट्रेनिंग तथार् उनके ज्ञार्न के अनुकूल व्यवसार्यिक भूमिक में लगार् देनार् चार्हिए। लेकिन सभी शिक्षित लोगों को काम दिलार्नार् सदैव सम्भव नहीं होतार् है। इससे शिक्षित लोगों में निरार्शार् एवं असंतोष पैदार् होतार् है। 
  2. दूसरी समस्यार् यह है कि आधुनिकीकरण की अवधि में संरचनार्त्मक परिवर्तन असमार्न होतार् है। उदार्हरणाथ, उद्योग आधुनिक बनार्ए जार् सकते हैं लेकिन परिवार्र व्यवस्थार्, धर्म व्यवस्थार् आदि रूढ़िवार्दी ही बने रहते है। इस प्रकार की निवृत्तियार्ँ व अविच्छिन्नतार्एँ और परिवर्तन के स्वरूप, स्थार्पित सार्मार्जिक और अन्य संरचनार्ओं को प्रभार्वित करते हैं और अन्तरार्ल (lags) गत्यवरोध (bottlenecks) पैदार् करते हैं। इसक दूसरार् उदार्हरण है भार्रत में मतार्धिकार की आयु 21 से कम करके 18 वर्ष कर देनार्। यह आधुनिकतार् में प्रवेश क एक कदम हो सकतार् है, किन्तु इसने एक संकट पैदार् कर दियार् है क्योंकि निर्वार्चक समूह इस अनुमार्न पर निर्भर करतार् है कि उनमें नार्गरिकतार् की परिपक्व भार्वनार् होगी तथार् नीतियों में भार्गीदार्री की योग्यतार् होगी। 
  3. तीसरी समस्यार् है कि सार्मार्जिक व आर्थिक संस्थार्ओं क आधुनिकीकरण परम्परार्गत जीवन शैली के सार्थ संघर्ष पैदार् करतार् है। उदार्हरणाथ, प्रशिक्षित डॉक्टर परम्परार्गत वैद्यों के लिए खतरार् हो जार्ते है। इसी प्रकार मशीनों द्वार्रार् निर्मित वस्तुएं घरेलू श्रमिकों को रोजी रोटी से वंचित कर देती है। इसी तरह बहुत से परम्परार्वार्दी लोग उन लोगों के विरोधी हो जार्ते हैं जो आधुनिकतार् स्वीकार करते हैं। फलत: परम्परार्वार्दी और आधुनिक तरीकों में संघर्ष असंतोष क कारण हो जार्तार् है। 
  4. चौथी समस्यार् यह है कि अक्सर लोग जो भूमिकाएं धार्रण करते हैं, वे आधुनिक तो होती हैं, किन्तु मूल्य परम्परार्त्मक रूप में जार्री रहते हैं। उदार्हरणाथ, मेडिसिन और सर्जरी में ट्रेनिंग लेने के बार्द भी एक डॉक्टर अपने मरीज से यही कहतार् है, ‘‘मैं इलार्ज करतार् हूँ, र्इश्वर ठीक करतार् है।’’ यह दर्शार्तार् है कि उसे अपने पर विश्वार्स नहीं है कि वह बीमार्री क सही निदार्न कर सके बल्कि स्वयं पर आरोप लगार्ने की बजार्य वह उन तरीकों की निन्दार् करतार् है जिनमें उसक जीवन-मूल्यों को विकसित करने के लिए समार्जीकरण कियार् गयार् है। 
  5. पार्ँचवीं समस्यार् यह है कि उन सार्धनों के बीच जो आधुनिक बनार्ती हैं और उन संस्थार्ओं व व्यवस्थार्ओं में जिनको आधुनिक होनार् है सहयोग की कमी है। कर्इ बार्र इससे सार्ंस्कृतिक विलम्बनार् (cultural lag) की स्थिति पैदार् होती है तथार् संस्थार्त्मक संघर्ष होते हैं। 
  6. अंतिम समस्यार् यह है कि आधुनिकीकरण लोगों की आकांक्षार्ओं को बढ़ार्तार् है, लेकिन सार्मार्जिक व्यवस्थार्एं उन्हें आकांक्षार्ओं की पूर्ति के लिए अवसर प्रदार्न करने में असफल रहती हैं। ये कुण्ठार्एँ वंचनार्एं और सार्मार्जिक असंतोष पैदार् करती हैं।

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