आदर्शवार्द क्यार् है ?

आदर्शवार्द अंग्रेजी के आइडियलिज्म क शार्ब्दिक अर्थ है। यह दर्शन की एक शार्खार् के लिये प्रयुक्त होतार् है। इस दर्शन में उच्च आदर्शों की बार्त की जार्ती है। इस दर्शन से सम्बंधित दाशनिक विचार्र की चिरन्तन सत्तार् में विश्वार्स करते हैं, अत: मूलत: यह दर्शन ‘‘विचार्रवार्दी दर्शन अथवार् आइडियार्लिज्म’’ है। हिन्दी में उसक शब्दत: अनुवार्द उभर आयार्। यद्यपि ‘‘विचार्रवार्द’’ शब्द क प्रयोग करनार् उपयुक्त होतार् परन्तु शब्द की रूढ़ प्रक§ति को ध्यार्न में रखकर यहार्ं आदर्शवार्द शब्द क प्रयोग कियार् जार् रहार् है।

आदर्शवार्द के अनुसार्र सिर्फ विचार्र ही सत्य है इसके सिवार् सत्य क अर्थ और रूप नहीं। हमार्रार् हर व्यवहार्र मस्तिष्क से ही नियंत्रित होतार् है, इसलिये मस्तिष्क ही वार्स्तविक सत्य है भौतिक शरीर तो इसकी छार्यार् मार्त्र है। मनुष्य वार्स्तव में आत्मार् ही है। शरीर तो केवल इसक कवच मार्त्र ही है, जो नष्ट हो जार्येगार् यार्नि मनुष्य असल में आत्म रूपी सत्य है। पार्श्चार्त दर्शन में ये मनस के रूप में देखार् गयार्। इसी को बुद्धि भी कहार् गयार् विचार्र ही प्रमुख तत्व है। विचार्र मस्तिष्क देतार् है अत: इस प्रकार की विचार्रधार्रार् विचार्रवार्दी यार् प्रत्ययवार्दी भी कहलार्यी और विश्वार्स करने वार्ले आध्यार्तमवार्दी कहलार्ये।

  1. गुड महोदय के अनुसार्र- ‘‘आदर्शवार्द वह विचार्रधार्रार् है, जिसमें यह मार्नार् जार्तार् है, कि पार्रलौकिक सावभौमिक तत्वों, आकारों यार् विचार्रेार्ं में वार्स्विकतार् निहित है और ये ही सत्य ज्ञार्न की वस्तुएं है जबकि ब्रह्म रूप मार्नव के विचार्रों तथार् इन्द्रिय अनुभवों में निहित होते हैं, जो विचार्रों की प्रतिच्छार्यार् के अनुरूप के समार्न होते हैं।’’
  2. रोजन- ‘‘आदर्शवार्दियों क विश्वार्स है कि ब्रह्मार्ण्ड की अपनी बुद्धि एवं इच्छार् और सब भौतिक वस्तुओं को उनके पीछे विद्यमार्न मन द्वार्रार् स्पष्ट कियार् जार् सकतार् है।’’
  3. हान के अनुसार्र- ‘‘आदर्शवार्दियों क सार्र है ब्रह्मार्ण्ड, बुद्धि एवं इच्छार् की अभिव्यक्ति है, विश्व के स्थार्यी तत्व की प्रक§ति -मार्नसिक है और भौतिकतार् की बुद्धि द्वार्रार् व्यार्ख्यार् की जार्ती है।’’
  4. हैण्डरसन- ‘‘आदर्शवार्द मनुष्य के आध्यार्त्मिक पक्ष पर बल देतार् है। इसक कारण यह है कि आध्यार्त्मिक मूल्य मनुष्य और जीवन में सबके महत्वपूर्ण पहलु है।’’ आदर्शवार्दी यह मार्नते हैं कि व्यक्ति और संसार्र- दोनो बुद्धि की अभिव्यक्तियार्ं है। वे कहते हैं कि भौतिक संसार्र की व्यार्ख्यार् मन से ही की जार् सकती है।

आदर्शवार्द की ऐतिहार्सिक पृष्ठभूमि

सृष्टि में दूसरे जीवधार्रियों से हमें पृथक कियार् हमार्रे मस्तिष्क ने, हमार्रे विचार्र-विमर्श, सोचने-समझने, सूझ-बूझ की शक्ति ने कियार्। इसी मस्तिष्क के कारण हममें भार्षार् विचार्र यार् तर्क करने की तार्कत आयी, और विचार्रकों के जिस वर्ग ने मस्तिष्क को महत्व देते हुये विचार्र करने की प्रक्रियार् में अपनार् ज्यार्दार् विश्वार्स दिखार्यार् वह विचार्रवार्दी कहलार्ये और इस विचार्रधार्रार् को आदर्शवार्द कहार् गयार्। आदर्शवार्दी जीवन की एक बहुत पुरार्नी विचार्रधार्रार् कही जार्ती है, जब से मनुष्य ने विचार्र एवं चिन्तन शुरू कियार् तब से वह दर्शन है।

इसके ऐतिहार्सिक विकास पार्श्चार्त्य देशों में सुकरार्त और प्लेटो से मार्नते है। हमार्रे देश में भी उपनिषद् काल से ब्रह्म-चिन्तन पर विचार्र मिलते हैं, जहार्ं आत्मार्, जीव ब्रार्ह्मार्ण्ड पर विचार्र-विमर्श हुए और हम पश्चिमी देशों से पीछे नहीं रहे। अंग्रेजी के शब्द ‘‘आइडियलिस्म’’ आदर्शवार्द क यथाथ द्योतक है, परन्तु विषय-वस्तु के हिसार्ब से ‘‘आइडियलिस्म’’ के स्थार्न पर आइडिस्म अधिक समीप एवं अर्थपूर्ण जार्न पड़तार् है।

पार्श्चार्त्य जगत में ऐतिहार्सिक क्रम में प्लेटो से आदर्शवार्द क आरम्भ मार्नार् जार्तार् है। प्लेटो के अनुसार्र- ‘‘संसार्र भौतिकतार् में नहीं है बल्कि उसकी वार्स्तविकतार् प्रत्ययों एवं विचार्रों से है।’’ मनुष्य क मन प्रत्ययों क निर्मार्ण करतार् है। तर्क के आधार्र पर प्लेटो ने तीन शार्श्वत विचार्र मार्ने है। ये तीन विचार्र हैं- सत्यं, शिवम्, सुन्दरं। इन तीनों विचार्रों के द्वार्रार् ही इन्द्रियगम्य वस्तुओं क निर्मार्ण होतार् है। शिवं क विचार्र ही श्रेण्ठ मार्नार् गयार् है। इसक कारण यह है कि प्लेटो ने व्यैक्तिक मन और सार्थ-सार्थ समार्जिक मन की परिकल्पनार् की है और यह भी मार्नार् कि वैयक्तिक मन सार्मार्जिक मन से अलग नहीं रह सकतार् प्लेटो के विचार्रों क प्रभार्व उसके द्वार्रार् प्रभार्वित धर्म पर दिखार्यी दियार्। हिब्रू परम्परार् में र्इश्वर को तर्कपूर्ण मार्नार् गयार् है। मार्नव तथार् अन्य चेतन प्रार्णियों में क्यार् सम्बंध है इस पर हमार्रे हिन्दू धर्म एवं अन्य सभी धर्मों में काफी विवेचनार् हुयी है तथार् विचार्र-विमर्श हुये है। धर्मों के अनुसार्र सभी प्रार्णी र्इश्वर के अंश कहे गये यह आदर्शवार्दी दृष्टि कोण है, जिसके अनुसार्र सभी जीवित प्रार्णियों में चिद् होतार् है। आगे चलकर रेने डेकार्टे क द्वितत्ववार्द प्रसिद्ध हुआ। डेकार्टे क कहनार् है कि र्इश्वर ने मन तथार् पदाथ देार्नों की रचनार् की है। इन्द्रियज्ञार्न को डेकार्टे ने भ्रार्मक कहार् है।

डेकार्टे के बार्द स्पिनोजार् ने आदर्शवार्द को आगे बढ़ार्यार्। स्पिनोजार् ने अपनार् तत्व सिद्धार्न्त रखार् है। स्पिनोजार् के तत्व शार्श्वत है वह पदाथ नहीं है यह एक तत्व है, जिसे र्इश्वर करहे हैं। स्पिनोजार् के बार्द लार्इबनीज क चिद्विन्ुदवार्द दर्शन प्रसिद्ध हुआ। लार्इबनीज के अनुसार्र चिद्बिन्दुओ से संसार्र निर्मित है यह चिद्विन्दु सार्धार्रण, अविभार्ज्य इकार्इ है। जटिल रूप में यह आत्मार् कहलार्ती है। र्इश्वर भी एक उच्च आत्मार् वर्ग क चिद्विन्दु है। भार्रतीय दर्शन में भी लार्इबनीज के समार्ज विचार्र है। तत्व मीमार्ंसार् के अनुसार्र ठीक लार्इबनीज की तरह यह विचार्र है कि पदाथ चिद् है तथार् सभी वस्तुएं आध्यार्त्मिक परमार्णुओं से एक-दूसरे के अनुकुल बनी हुर्इ है। बर्कले ने भी संसार्र की सत्तार् को लार्इबनीज की तरह मार्नार् है लेकिन दूसरे ढंग से। बकेले ने पदाथ के अस्तित्व को आध्यार्त्मिक आधार्र पर ही मार्नार् है, इसीलिये उसने र्इश्वर को ही वार्स्तविक मार्नार् है।

अत: मन के द्वार्रार् प्रत्यक्ष बनार् लेने पर ही पदाथ क अस्तित्व हो जो विभिन्न संवेदनार्आ, विचार्रों तथार् इन्द्रियार्नुभवों के सहार्रे सिद्ध होतार् है। हमार्रे सार्मने जो सृष्टि है उसके पीछे आत्मार् होती है। यह आत्मार् र्इश्वर है। र्इश्वर ही एक तत्व है जो सभी मार्नसिक एवं भौतिक संसार्र के पीछे रहतार् है। बर्कले क दर्शन आत्मगत आदर्शवार्द कहार् जार्तार् है। मैंनुअल कांट एक दूसरे प्रमुख आदर्शवार्दी मार्ने गये। कांट मार्नते हैं कि प्रतीति वार्ले अनुभवगम्य जगत के पीछे स्थगित वस्तु है। आत्मार् की अमरतार् तथार् स्वतंत्रतार् एवं नैतिक प्रधार्नतार् ने भार्रतीयों क विश्वार्स पहले से ही है। गीतार् दर्शन में कहार् है- ‘‘नैन छिन्दति शार्स्त्रार्णि नैनं दहति पार्वक:, नैनं क्लेदयन्ति आपो नैनं शोशयते मार्रूत:’’। अर्थार्त् पार्प, पुण्य, अच्छाइ-बुराइ आदि नैतिक नियमों की प्रध् ार्ार्नतार् है और इन सबसे उपर र्इश्वर क होनार् भार्रतीयों क प्रार्चीन विश्वार्स है। कान्ट के प्रभार्व से जर्मनी में फिश्टे व हेगले क अविर्भार्व हुआ जिन्होनें आदर्शवार्द के विकास में अपने योगदार्न दिये।

फिश्टे ने जीवन के भौतिक पक्ष पर बहुत बल दियार्। इसने वार्स्तविकतार् को नैतिकतार् से पूर्ण इच्छार्शक्ति मार्नार् तथार् इस प्रतीत्यार्त्मक जगत को मनुष्य की इच्छार् शक्ति को विकसित करने हेतु बतार्यार्, जिससे उसके चरित्र क निर्मार्ण होतार् है। समीम एवं असीम आत्मार् की भार्वनार् भार्रतीय दर्शन में भी पार्यी जार्ती है तथार् जड़ प्रकृति की ओर फिश्टे क अनार्त्मक जगत संकेत करतार् है।

फिश्टे के बार्द हेगेल ने आदर्शवार्दी दर्शन के क्षेत्र में प्रभार्व डार्लार् इनके दर्शन को विश्व चैतन्यवार्द कहार् है, इन्होनें समस्त विश्व की सम्पूर्ण के रूप में देखार् और अनुभव के प्रत्येक प्रकरण की सम्पूर्णतार् से जुड़ार् हुआ बतार्यार्। हेंगेल के अनुसार्र इस प्रकार अनन्त आत्मार् अथार् र्इश्वर क ब्रह्म रूप संसार्र है और संसार्र को समझनार् र्इश्वर क रूप समझने के लिये आवश्यक भी है क्येार्ंकि ज्ञार्न के ब्रह्म एंव आंतरिक दो रूप है। भार्रतीय विचार्रधार्रार् भी र्इश्वर को सर्वभूतेशु एवं सर्वभूत हित: कहार् है।

हेगले के प्रभार्व शेलिंग तथार् शार्पेनहार्वर पर पड़ार्। शेलिंग ने चरम को आत्म एवं अनार्त्म, ज्ञेय एवं अज्ञेय से अलग एक सत्तार् मार्नी है। एक प्रकार से भार्रतीय द्वैतार् द्वैत की भार्वनार् इसमें पार्यी जार्ती है। शार्पेनहार्वर ने अपने चरम को परम इच्छार् में बदल दियार् और कहार् जगत मेरार् विचार्र हैं इस प्रकार इच्छार् को परम श्रेष्ठ बतार्यार्। शार्पेनहार्वर ने जड़ प्रकृति पर दृष्टि जमाइ और उसे अचेतन कहार्। जड़ प्रकृति को चरम नहीं कहार् जार् सकतार् है। इन सब दाशनिकों क प्रभार्व फ्रार्ंस, इटली, रुस, इंग्लैण्ड तथार् अमेरिक के दाशनिकों पर काफी पड़ार् है। फ्रार्ंस में बर्गसन क्रोस तथार् जेन्टार्इल जैसे आदर्शवार्दी हुये। रुस में मार्क्र्स एवं एंजेल हुये और इंग्लैण्ड में कालेरिज ग्रीन, स्अग्ंिल, केयर्ड, बोसैंके और ब्रेडले जैसे आदर्शवार्दी बढ़ें।

भार्रत में वैदिक काल में बहुतत्तवार्दी आदर्शवार्दी थे। इस्लार्मी दर्शन के सार्थ अद्वैतवार्द, द्वैतार्द्वतवार्द, विशिष्ट द्वैतवार्द आदि रुप मिलते है। आज भी इनके पोषक दयार्नन्द, विवेकानन्द, अरविन्द, टैगोर, गार्ंधी, रार्मकृष्ण, रार्धार्कृष्ण तथार् कुछ मुस्लिम विचार्रक जैसे अबुल कलार्म आजार्द, जार्किर हुसैन, सेयदेन जैसे शिक्षार्विद् गिने जार्ते है।

आदर्शवार्द क आधार्र

1. आदर्शवार्द क आधार्र विचार्र- 

आदर्शवार्द क शुद्ध नार्म विचार्रवार्द होनार् चार्हिये क्योंकि इसक मुख्य आधार्र विचार्र है। जगत की वार्स्तविकतार् विचार्रों पर आश्रित है। प्रक§ति एवं भौतिक पदाथ की सत्तार् विचार्रों क कारण है। आदर्शवार्द क आधार्र भौतिक जगत न होकर मार्नसिक यार् आध्यार्त्मिक जगत है। विचार्र अन्तिम एवं सावभौमिक महत्व वार्ले होते हैं। वे सार्र अथवार् भौतिक प्रतिरूप है जो जगत को आकार देते हैं, ये मार्नदण्ड है जिनसे इन्द्रिय अनुभव योग्य वस्तुओं की जॉच होती है।

2. आदर्शवार्द क आधार्र आत्मार्- 

एक दसू रार् आधार्र आन्तरिक जगत है जिसे आत्मार् यार् मन कहते हैं। इसी के कारण विचार्र प्रार्प्त होते और उन विचार्रों को वार्स्तविकतार् मिलती है जगत क आधार्र मनस है। यह यार्ंत्रिक नहीं है, जीवन हम जटिल भौतिक रार्सार्यनिक शक्तियों में ही नहीं घटार् सकते। यह मनस पर आध् ार्ार्रित है। पदाथ को मनस क प्रक§ति क§त बार्ह्य रूप मार्नार् जार्तार् है। आदर्शवार्द क आधार्र तर्क व बुद्धि – आदर्शवार्द क त§तीय आधार्र तर्क एवं बुद्धि कहार् जार् सकतार् है। इस सम्बंध में प्लेटो और सुकरार्त के विचार्र एक प्रकार से मिलते है कि मनुष्य में ही तर्क की शक्ति है और तर्क द्वार्रार् ही विचार्र प्रार्प्त होते हैं।

3. आदर्शवार्द क आधार्र मार्नव – 

आदर्शवार्द क चौथार् आधार्र मार्नव मार्नार् जार् सकतार् है। आत्मार् उच्चार्शय एवं विचार्र, तर्क और बुद्धि से युक्ति हेार्ती है। मार्नव वह प्रार्णधार्री है जिसमें अनुभव करने उनहें धार्रण करने और उन्हें उपयोग में लार्ने की विलक्षण शक्ति होती है। मार्नव सभी प्रार्णियों व पणुओं में सर्वश्रेण्ठ इसी कारण गिनार् जार्तार् है क्योंकि महार्न अनुभव कर्तार् है और उसे गौरव एवं आधार्र दियार् जार्तार् है, और र्इश्वर के अन्य सभी कार्यों पर उसक आधिपत्य होतार् है। मनुष्य में जो आत्मार् होती है वार्स्तव में विभिन्न उच्च शक्तियों उसमें निहित होती है, उसी में तर्क, बुद्धि, मूलय नैतिक धामिक और आध्यार्त्मिक सत्तार्यें होती है।

4. आदर्शवार्द क आधार्र रार्ज्य – 

आदर्शवार्द क पॉचवार् आधार्र हगेले ने रार्ज्य को मार्नार् है। इस सम्बंध में कर्निघम क विचार्र है कि हेगेल के लिये रार्ज्य महार्न आत्मार् क संसार्र में सर्वोच्च प्रकाशन है जिसक समय के द्वार्रार् विकास सबसे बड़ार् आदर्श है। रार्ज्य दैवी विचार्र है इस प§थ्वी पर जिसक अस्तित्व है। इससे यह ज्ञार्त होतार् है कि रार्ज्य की संकल्पनार् आदर्शवार्दी आधार्र के कारण ही है।

आदर्शवार्दी दर्शन के प्रमुख तत्व

1. तत्व मीमार्सार्ं- 

सभी आदर्शवार्ददियों की मार्न्यतार् है कि यह जगत भौतिक नहीं अपितु मार्नसिक यार् आध्यार्त्मिक है। जगत विचार्रों की एक व्यवस्थार्, तर्कनार् क अग्रभार्ग है। प्रक§ति मन की क्रियार् यार् प्रतीति है। भौतिक स§ष्टि क आधार्र मार्नसिक जगत है, जो उसे समझतार् है तथार् मूल्य प्रदार्न करतार् है। मार्नसिक जगत के अभार्व में भौतिक जगत अर्थहीन हो जार्येगार्। आदर्शवार्द के अनुसार्र यह जगत सोद्देश्य है।

2. स्व अथवार् आत्मार्- 

आदर्शवार्दी स्व की प्रक§ति आध्यार्तिमक मार्नतार् है तथार् तत्व मीमार्ंसार् में ‘‘स्व’’ को सर्वोपरि रखतार् है। यदि अनुभव क जगत ब्रह्म स§ष्टि से अधिक महत्वपूर्ण है, तो अनुभवकर्तार् मनुष्य तो और भी अधिक महत्वपूर्ण होनार् चार्हिये। आदर्शवार्द के अनुसार्र ‘‘स्व’’ की प्रक§ति स्वतंत्र है उनमें संकल्प शक्ति है, अत: वह भौतिक स§ष्टि में परिवर्तन लार्ने की क्षमतार् रखतार् है। क्रम विकास की प्रक्रियार् में मनुष्य सर्वश्रेण्ठ इकार्इ है।

3. ज्ञार्न मीमार्ंसार् में आदर्शवार्द- 

आदर्शवार्दी ज्ञार्न एव सत्य की विवचे नार् विवेकपूर्ण विधि से करते हैं। वे ब्रह्मार्ण्ड में उन सार्मार्न्य सिद्धार्न्तों की खोज करने क प्रयार्स करते है, जिनको सावभौमिक सत्य क रूप प्रदार्न कियार् जार् सके। इस द§ष्टि कोण से उनकी धार्रणार् है कि सत्य क अस्तित्व है, परन्तु इसलिये नहीं है कि वह व्यक्ति यार् समार्ज द्वार्रार् निर्मित कियार् गयार् है। सत्य को खोजार् जार् सकतार् है। जब उसकी खोज कर ली जार्येगी तब वह निरपेक्ष सत्य होगार् आदर्शवार्दियों की मार्न्यतार् है कि र्इश्वर यार् निरपेक्ष मन यार् आत्मार् सत्य है।

4. मूल्य आदर्शवार्द- 

शिव क्यार् है? इसके विषय में आदर्शवार्ददियों क कहनार् है कि सद्जीवन को ब्रह्मार्ण्ड से सार्मंजस्य स्थार्पित करके ही व्यतीत कियार् जार् सकतार् है। निरपेक्ष सत्तार् क अनुकरण करके ही शिव यार् अच्छाइ की प्रार्प्ति की जार् सकती है। आदर्शवार्दियों क मत है कि जब मनुष्य क आचरण, सार्वैभौमिक नैतिक नियम के अनुसार्र होतार् है तो वह स्वीकार्य होतार् है सुन्दर क्यार् है? आदर्शवार्दियों के अनुसार्र यह निरपेक्ष सत्तार् सुन्दरम है। इस जगत में जो कुछ भी सुन्दर है, यह केवल उसक अंशमार्त्र है, अर्थार्त् उसकी प्रतिछार्यार् है। जब हम कलार् के किसी कार्य को सौन्दर्यनुभूति करते हैं, तब हम ऐस इसलिये करते हैं, क्येार्ंकि वह निरपेक्ष सत्तार् क सच्चार् प्रतिनिधि है। आदर्शवार्दी संगीत को सर्वोत्तम प्रकार की सौन्दर्यार्त्मक रचनार् मार्नते हैं।

आदर्शवार्द की प्रशार्खार्यें

आदर्शवार्दी दर्शन की अनेक शार्खार्ये-प्रशार्खार्यें है, परन्तु उनमें प्रमुख पॉच है-

  1. प्लेटो क वस्तुनिष्ठ आदर्शवार्द।
  2. बर्कले क व्यक्तिनिष्ठ आदर्शवार्द।
  3. कान्ट क प्रपंचार्त्मक आदर्शवार्द।
  4. हेगले क द्वन्द्ववार्द।
  5. आधुनिक ब्रिटिश अमरीकी आदर्शवार्द।

1. प्लेटार् क वस्तुनिष्ठ आदर्शवार्द-

इस शार्खार् को यथार्थर्वार्दी आदर्शवार्द भी कहार् जार्तार् है। प्लेटो के अनुसार्र विचार्र सनार्तन, सर्वव्यार्पी तथार् सावकालिक होते है। उनक अस्तित्व अपने आप में होतार् है। वे न तो र्इश्वर, न जगत पर आश्रित रहते हैं। इसक पूर्व भी अस्तित्व थार्, तथार् हमार्रे अन्त के पण्चार्त् भी वे रहेंगे। विचार्र इस जगत की वस्तुओं क सार्र है। इन सनार्तन विचार्रेार्ं की अपूर्ण प्रतिक§ति हम अनुभव द्वार्रार् मार्लूम करते है। प्लेटो के अनुसार्र इन पूर्ण विचार्रेार्ं की प्रतीति ऐन्द्रिक ज्ञार्न की अपेक्षार् विवेक ज्ञार्न से होती है। इन्द्रियों द्वार्रार् प्रार्प्त ज्ञार्न अपूर्ण तथार् असंगत होतार् है, जबकि विवेक ज्ञार्न से सिद्धार्न्तों की पकड़ आती है, जो हमेशार् सत्य हेार्ते हैं।

2. बर्कले क व्यक्तिवार्दी आदर्शवार्द- 

जॉन लॉक ने न्यूटन के सिद्धार्न्त को स्वीकार कियार् कि जगत क आधार्र पुदगल है, जिसमें संवेदनीय लम्बाइ, चौड़ाइ, मोटाइ, रंग ध्वनि, दूरी,दबार्व आदि संवेदन अन्तनिर्हित है। बर्कले ने पुदग्ल की सत्तार् को अस्वीकार कियार् तथार् गुणों के द्वैत को भी। उसके अनुसार्र हम केवल गुणों को देखते हैं, गुणी जैसी किसी चीज को नहीं देखते। वस्तु गुणों क वह समूह मार्त्र है, और गुण मनोगत (आत्मगत) है, अत: केवल मनस् यार् आत्मार् क अस्तित्व है, वस्तु क नहीं। इसी आधार्र पर उसने यह निष्कर्ण निकालार् कि न केवल गौण गुण अपितु प्रधार्न गुण भी मार्नसिक है, न कि भौतिक। बर्कले के अनुसार्र स्व क सम्बंध हमार्रार् ज्ञार्न परोक्ष तथार् अनुमार्नित ज्ञार्न है, जिनक इन्द्रियों से अनुभव कियार् जार् सके।

3. कान्ट क प्रपचार्ंत्मक आदर्शवार्द – 

प्लेटो तथार् बकर्ले की भार्ित काटं भी पदाथ को सत्य नहीं मार्नतार्। वह तर्कनार्बुद्धि को हमार्रे सभी अनुभवों क समन्वयकारी केन्द्र मार्नतार् है। उसके अनुसार्र जार्गतिक पदाथ क ज्ञार्न प्रत्यक्ष रूप से न होकर परोक्ष रूप से होतार् है। प्रत्यक्ष ज्ञार्न के लिये कांट दिक और काल देार् तत्वों को प्रमुख मार्नतार् है। इन्ही दो गुणों के फलस्वरूप हम बार्ह्य जगत क ज्ञार्न प्रार्प्त करते हैं। प्रत्यक्ष ज्ञार्न भी विश्रश्खलित होतार् है, उसे समन्वित रूप में ग्रहण करने के लिये कांट तर्कनार् को आवण्यक मार्नतार् है। आत्मीकरण की इस प्रक्रियार् को कांट की अवधार्रणार् नार्म से जार्नार् जार्तार् है, ज्ञेय प्रत्ययों को कांट ने 12 भार्गों में विभक्त कियार् है।

कांट ने मार्नव आत्मार् अथवार् ‘‘स्व’’ को सर्वोपरि मार्नार्। सभी आदर्शवार्दियों के समार्न वह भी स्व को मनस युक्त मार्नतार् है भौतिक नहीं। कांट के अनुसार्र मनस दिक् और काल क सर्जक है, तथार् आवधार्रणार् से उपर्युक्त वर्गीकरण क धार्रक है मनुष्यार्त्मार् सर्वोपरि है।

4. हगेल क द्वन्द्वार्वार्द-

हगेल के अनुसार्र सत्तार् तथार् उससे सम्बधं क हमार्रार् ज्ञार्न समरूप है एवं हमार्रार् ज्ञार्न तर्क बुद्धि परक होतार् है और स्वयं सत्तार् कि इस तर्कबुद्धि परक व्यवस्थार् के कारण मनुष्य क ज्ञार्न सत्तार् को उसी सीमार् तक ग्रहण कर पार्तार् है, जिस सीमार् तक हमार्रे ज्ञार्न तथार् सत्तार् के बीच समरूपतार् हो। हेगल की मार्न्यतार् है कि विश्व निर्बार्ध गति से सक्रिय विकास की ओर बढ़ रहार् है इस क्रम विकास की प्रक्रियार् द्वार्रार् विश्व अपने आप में अन्तर्निहित उद्देश्य की ओर बढ़ रहार् है। इस क्रम विकास क प्रयोजन अपने आप में निहित लक्ष्य तथार् नियति के बार्रे में सचेत होनार् है। हेगल इसी क्रम विकास के विचार्र को आगे बढ़ार्ते हुये कहतार् है कि ‘‘सत्तार्’’ परम-तत्व के मन में विचार्र क विकास है। ब्रह्मार्ण्ड चेतनार् (परमेण्वर) सत्तार् के रूप में तीन स्थितियों में विकसित होती है यथार्, स्थार्पनार्, प्रतिस्थार्पनार् तथार् संस्थार्पनार्। हेगल इसे अधिकाधिक पूर्णतार् की ओर बढ़ने की प्रक्रियार् मार्नतार् है।

5. नैतिकतार् क सिद्धार्न्त – 

इस द्वन्द्वार्त्मक चिन्तन शैली को हगेल नैतिकतार् के क्षेत्र में भी प्रयुक्त करतार् है। समूह की नैतिकतार् जो कि सार्मार्जिक संस्थार्ओं में परिलक्षित होती है, वैयक्तिक नैतिकतार् क सही माग दर्शन कर सकती है।

6. आधुनिक आदर्शवार्द – 

यूरार्पे में आदर्शवार्द क जो आरम्भ जमर्नी में हुआ थार्, वह हेगल के सार्थ समार्प्त हुआ। मार्क्र्स ने हेगल के द्वन्द्वार्वद को अपनार्यार् परन्तु तत्व मीमार्ंसार् में भौतिकवार्द को ग्रहण कियार्। इंग्लैण्ड, स्काटलैण्ड, इटली तथार् संयुक्त रार्ज्य अमेरिक में आदर्शवार्दी विचार्रधार्रार् ने नयार् रूप ग्रहण कियार्। ब्रिटेन में सेम्युअल,, कालरिज, जेम्स, हचिसन, स्टलिंगि, जार्न केअर्ड, बर्नार्ड, बोसार्के बे्रडले नन आदि क नार्म लियार् जार्तार् है।

आदर्शवार्द के प्रमुख सिद्धार्न्त

थार्मस और लैंग ने आदर्शवार्द के सिद्धार्न्त बतार्ये हैं-

  1. वार्स्तविक जगत मार्नसिक एवं आध्यार्त्मिक है। 
  2. सच्ची वार्स्तविकतार् आध्यार्त्मिकतार् है। 
  3. आदर्शवार्द क मनुष्य में विश्वार्स है क्योंकि वह चिन्तन तर्क एवं बुद्धि के विशेष गुणों से परिपूर्ण है। 
  4. जो कुछ मन संसार्र को देतार् है, केवल वही वार्स्तविकतार् है।
  5. ज्ञार्न क सर्वोच्च रूप अन्तद§ष्टि है एवं आत्मार् क ज्ञार्न सर्वोच्च है। 
  6. सत्यं शिवं सुन्दरं के तीनों शार्श्वत मूल्य हैं और जीवन में इनकी प्रार्प्ति करनार् अत्यार्न्तार्वश्यक है। 
  7. इन्द्रियों की सच्ची वार्स्तविकतार् को नहीं जार्नार् जार् सकतार् है। 
  8. प्रक§ति की दिखार्यी देने वार्ली आत्म निर्भरतार् भ्रमपूर्ण है। 
  9. र्इश्वर मन से सम्बंध रखतार् है।
  10. भौतिक और प्रार्क§तिक संसार्र- जिसे विज्ञार्न जार्नतार् है, वार्स्तविकतार् की अपूर्ण अभिव्यक्ति है। 
  11. परम मन में जो कुछ विद्यमार्न है वही सत्य है और आध्यार्त्मिक तत्व है। 
  12. विचार्र, ज्ञार्न, कलार्, नैतिकतार् और धर्म जीवन के महत्वपूर्ण पहलू है। 
  13. हमार्रार् विवेक और मार्नसिक एवं आध्यार्त्मिक द§ष्टि ही सत्य ज्ञार्न प्रार्प्त करने क सच्चार् सार्धन है। 
  14. मनुष्य क विकास उसकी भौतिक एवं आध्यार्त्मिक शक्तियों पर निर्भर करतार् है।

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