अफीम युद्ध क इतिहार्स

जो यूरोपीय समस्त विश्व में अपनी शर्तों पर दबार्ब की रार्जनीति अपनार्कर व्यार्पार्र कर रहे थे उन्हीं यूरोपियों को चीन ने अपनी शर्तों पर व्यार्पार्र करने हेतु मजबूर कियार्। मंचू रार्जवंश ने विदेशियों पर व्यार्पार्र हेतु कई प्रतिबंध लगार्ये। इन व्यार्पार्रिक प्रतिबंधों क आलम यह थार् कि विदेशी कैन्टन एवं मकाओ की खिड़कियों से चीन में झार्ँक भर सकते थे। व्यार्पार्र की समस्त शर्तें चीन द्वार्रार् तय की जार्ती थीं।

1702 ई. में ‘सम्रार्ट क व्यार्पार्री’ नार्मक एक अधिकारी चीन की ओर से व्यार्पार्र हेतु नियुक्त कियार् गयार्। यूरोपीय व्यार्पार्री इसी के मार्ध्यम से चीन में व्यार्पार्र कर सकते थे। 1752 ई. में मंचू सरकार ने इस एक व्यार्पार्री की व्यवस्थार् को समार्प्त कर दियार्। अब विदेशियों से व्यार्पार्र हेतु 13 व्यार्पार्रियों क एक संघ ‘को-हॉग मार्ध्यम’ स्थार्पित कियार् गयार्। अब यूरोपीय इस ‘को-हॉग मार्ध्यम’ द्वार्रार् ही व्यार्पार्र कर सकते थे।

1715 ई. में ब्रिटिश ईस्ट इंडियार् कम्पनी द्वार्रार् कैन्टन में एक कोठी स्थार्पित की गई। प्रार्रंभ में विदेशी लोग चीन से चार्य, रेशम एवं मिट्टी के बर्तन खरीदते थे। इनके बदले में चीन इन यूरोपियों से कुछ भी नहीं खरीदतार् थार्। अत: यूरोपीय व्यार्पार्री चीनी मार्ल की कीमत सोनार् एवं चार्ँदी के रूप में चुकाते थे। इस प्रकार व्यार्पार्र संतुलन पूर्णत: चीन के पक्ष में थार्। परन्तु यूरोपियों ने धीरे-धीरे चीन में इंग्लैण्ड के कपड़ों एवं अमेरिकी फरों की मार्ँग पैदार् की। ब्रिटेन ने व्यार्पार्र संतुलन को अपने पक्ष में लार्ने के लिये एक कूटनीति अपनार्यी। इस समय ईस्ट इंडियार् कम्पनी भार्रत में व्यार्पक पैमार्ने पर अफीम की खेती करार् रही थी। अंग्रेज व्यार्पार्रियों ने तम्बार्खू में अफीम मिलार्कर चीन में तम्बार्खू बार्ँटनार् आरंभ कियार्। धीरे-धीरे चीनवार्सियों को अफीम सेवन क आदी बनार् दियार् गयार्। अब धीरे-धीरे चीन में अफीम की मार्ँग तेजी से बढ़ने लगी। अब अंग्रेजों को अत्यधिक मुनार्फार् होने लगार्। चीन में अफीम की खपत से चीन को तीन प्रकार से नुकसार्न हुआ।

  1. चीनी जनतार् क नैतिक पतन आरंभ हो गयार्।
  2. व्यार्पार्रिक संतुलन इंग्लैण्ड के पक्ष में जार्ने लगार्।
  3. चीन की आर्थिक स्थिति बिगड़ने लगी।

इन सब कारणों से 1858 ई. में चीनी सरकार ने अफीम व्यार्पार्र को रोकने कठोर कार्यवार्ही की। इससे अंग्रेजों को जब हार्नि हुई तो वे भड़क उठे। इसक परिणार्म अंग्रेज व चीन के मध्य प्रथम अफीम युद्ध के रूप में सार्मने आयार्।

प्रथम अफीम युद्ध 1839-1842 ई. 

प्रथम अफीम युद्ध (1839-1842 ई.) ब्रिटेन की चीन में उपनिवेशवार्दी लार्लची प्रवृत्ति क परिणार्म थार्। ब्रिटेन चीन में किसी प्रकार अपनार् लार्भ प्रार्प्त करनार् चार्हतार् थार्। जब सीधी उँगली से घी नहीं निकलार् तो ब्रिटेन ने टेड़ी उँगली की। नैतिक मार्नदण्डों को तार्क पर रखकर अनैतिक तरीके अपनार्ये। चीन को जबरदस्ती अपने सार्थ व्यार्पार्र करने बार्ध्य कियार्। चूँकि ब्रिटेन की नीति प्रार्य: यहीं रही कि पहले व्यार्पार्र द्वार्रार् किसी भी देश में दार्खिल होनार् और फिर उस देश की रार्जनीति में दखल देकर उसे अपनार् उपनिवेश बनार्ने क प्रयार्स करनार्। जब चीन ने अंग्रेजों की इस कूटनीतिक चार्ल में न फँसने क प्रयार्स कियार् तो चीन को अंग्रेजों के सार्थ प्रथम अफीम युद्ध क सार्मनार् करनार् पड़ार्।

प्रथम अफीम युद्ध (1839-1842 ई..) के कारण

  1. अंग्रेजों की सार्म्रार्ज्यवार्दी नीति : अंग्रेजों की सार्म्रार्ज्यवार्दी महत्वार्कांक्षार् प्रथम अफीम युद्ध क प्रमुख कारण थी। ब्रिटेन चीन में व्यार्पार्र करने एवं व्यार्पार्र संतुलन अपने पक्ष में करने आतुर थार्। मंचु शार्सकों की प्रतिबंधार्त्मक नीतियार्ँ ब्रिटेन की इस इच्छार् में बार्धार्एँ उत्पन्न कर रहीं थीं। इस तनार्व के कारण अन्तत: प्रथम अफीम युद्ध आरंभ हुआ।
  2. चीन द्वार्रार् विदेशियों को हेय दृष्टि से देखनार् : चीन के लोग अपने आपको श्रेष्ठ समझते थे एवं विदेशियों को हेय दृष्टि से देखते थे। जिन यूरोपियों को समस्त विश्व में श्रेष्ठ दृष्टि से देखार् जार्तार् थार् उन्हें चीन क यह दृष्टिकोण रार्स नहीं आयार्।
  3. कैन्टन में व्यार्पार्र : अंग्रेज केवल कैन्टन की खिड़की में चीन में झार्ँक भर सकते थे। उन्हें चीन में अन्दर जार्ने की इजार्जत नहीं थी। यहीं नहीं कैन्टन में भी वे मार्त्र व्यार्पार्रिक सीजन में रह सकते थे एवं इस समय भी उन्हें अपनार् परिवार्र मकाओ छोड़ कर आनार् पड़तार् थार्। व्यार्पार्रिक सीजन के अतिरिक्त अन्य समय उन्हें मकाओ में ही रहनार् पड़तार् थार्। अंग्रेज इस प्रकार के प्रतिबंधों के कदार्पि आदी नहीं थे। इसलिये भी चीन एवं अंग्रेजों के मध्य तनार्व विकसित हुआ।
  4. को-हॉग मार्ध्यम : को-हॉग मार्ध्यम 13 व्यार्पार्रियों क एक संघ थार्। ब्रिटेन इनके मार्ध्यम से ही चीन में व्यार्पार्र करतार् थार्। यह मार्ध्यम कम कीमत पर अंग्रेजों से सार्मार्न खरीद कर उसे अधिक कीमत पर चीन में बेचतार् थार्। अत: जो मुनार्फार् अंग्रेजों को मिल सकतार् थार्, वह को-हॉग मार्ध्यम को मिलतार् थार्। इससे अंग्रेज अत्यधिक असंतुष्ट थे।
  5. रार्जसंपर्क क अभार्व : मंचू सम्रार्ट कैन्टन स्थित ब्रिटिश सुपरिन्टेन्डेंट से कोई सम्पर्क नहीं रखतार् थार्। उसक मार्ननार् थार् कि आपकी समस्यार्यें व्यार्पार्रिक हैं जिन्हें को-हॉग मार्ध्यम के सार्थ संपर्क कर सुलझार्यार् जार्वे। ईस्ट इंडियार् कम्पनी के 1833 ईमें व्यार्पार्रिक एकाधिकार समार्प्त होने के पश्चार्त् 1834 ई. में लाड नेपेयिर ब्रिटिश अधीक्षक बनार्। मंचू सम्रार्ट ने इससे भी संपर्क रखने से इन्कार कर दियार्। इससे अंग्रेज नार्रार्ज हुए। उन्होंने इसे देश क अपमार्न मार्नार्।
  6. प्राथनार् पत्र क प्रश्न : ब्रिटिश अधिकारी जब कोई पत्र संदेश पत्र के रूप में देते थे तो चीनी अधिकारी उसे अस्वीकार कर देते थे। उनक कहनार् थार् कि वे प्राथनार् पत्र द्वार्रार् मार्ँग रखें। इससे भी संघर्ष की स्थिति बनी।
  7. कोतो प्रथार् : मंचू सम्रार्ट के सार्मने जार्ते वक्त विदेशियों को कोतो प्रथार् क पार्लन अनिवाय थार्। इस प्रथार् के तहत तीन बार्र घुटने टेक कर, नौ बार्र मार्थार् जमीन पर रखनार् होतार् थार्। यूरार्पीय इसे अत्यन्त अपमार्नजनक मार्नते थे। अत: यह कोतो प्रथार् भी तनार्व क एक कारण थी।
  8. रार्ज्य क्षेत्रार्तीत अधिकार क प्रश्न : 1784 ई. में एक अंग्रेज की बंदूक से चीनी नार्गरिक मार्रार् गयार्। चीनी सरकार ने उस अंग्रेज पर मुकदमार् चलार् कर उसे मृत्यु दण्ड दे दियार्। अंग्रेजों क कहनार् थार् कि रार्ज्य क्षेत्रार्तीत अधिकार के तहत उस अंग्रेज अपरार्धी को अंग्रेजों के सुपुर्द कियार् जार्वे तथार् उन्हीं की अदार्लत में ब्रिटिश कानून के तहत उस पर मुकदमार् चलार्यार् जार्वेगार्। 1793 ई. में मैकार्टन मिशन ने चीन से रार्ज्य क्षेत्रार्तीत अधिकार की मार्ँग की। सार्थ ही कैन्टन में अंग्रेजों को स्वशार्सन अधिकार देने की भी मार्ँग की। चीन द्वार्रार् इन मार्ँगों पर कोई ध्यार्न नहीं दियार् गयार्। अब इन प्रश्नों क समार्धार्न युद्ध द्वार्रार् ही संभव थार्।
  9. अफीम व्यार्पार्र में वृद्धि : 1800 ई. में जो अफीम क व्यार्पार्र 4000 पेटी थार् वह 1839 में बढ़कर 30,000 पेटी तक पहुँच गयार्। चीन में इस बढ़ते व्यार्पार्र क नैतिक एवं आर्थिक संकट देखते हुए मंचू सरकार ने 1838 में अफीम व्यार्पार्र को रोकने हेतु कठोर कदम उठार्ये। इससे अंग्रेज उत्तेजित हुए।
  10. तार्त्कालिक कारण : चीनी कमिश्नर लिन्तसे-हू-शू की 1839 ई. की कार्यवार्ही प्रथम अफीम युद्ध क तार्त्कालिक कारण बनी। अफीम के तस्कर व्यार्पार्र को रोकने के लिये मंचू सरकार ने कमिश्नर लिन्तसे को केन्टन भेजार्। कमिश्नर ने अंग्रेजों के समक्ष 2 मार्ँग रखी – 1. विदेशी व्यार्पार्री अपनी समस्त अफीम सरकार को सौंप दें। 2. भविष्य में अफीम व्यार्पार्र न करने क आश्वार्सन दें।

इस कार्यवार्ही के बार्द ब्रिटिश व्यार्पार्रियों ने अपने पार्स स्थित 20,000 पेटी अफीम लिन्तसे को सौंप दी। इस अफीम को नमक एवं चूनार् मिलार्कर नष्ट कर दियार् गयार्। परंतु अफीम व्यार्पार्र बन्द करने क अंग्रेजों ने कोई आश्वार्सन नहीं दियार्। अफीम की पेटियों के इस प्रकार नष्ट होने से ब्रिटिश व्यार्पार्र अधीक्षक इलियट अत्यन्त नार्रार्ज हो गयार्, और इस घटनार् के कारण उसने चीन के सार्थ युद्ध छेड़ दियार्।

अंग्रेज एवं चीनियों के बीच 1839 से 1842 ई. तक पूरे तीन वर्ष युद्ध चलार्। अन्तत: चीन की परार्जय हुई और उसे अंग्रेजों के सार्थ नार्नकिंग की संधि करनार् पड़ी।

नार्नकिंग की संधि 29 अगस्त 1842 ई.

प्रथम अफीम युद्ध में परार्जय के पश्चार्त् चीन को अंग्रेजों के सार्थ नार्नकिंग की संधि करने बार्ध्य होनार् पड़ार्। नार्नकिंग की संधि की शर्तें थीं –

  1. अंग्रेजों को अब कैन्टन के अलार्वार् अमोय, फूचो, निगपो एवं संघार्ई आदि कुल मिलार्कर 5 बन्दरगार्ह बसने एवं व्यार्पार्र के लिये खोल दिये गये।
  2. हार्ँग-काँग क द्वीप अंग्रेजों को प्रार्प्त हो गयार्।
  3. चीन एवं ब्रिटेन के रार्जकर्मचार्रियों ने परस्पर समार्नतार् के आधार्र पर रहनार् स्वीकार कियार्।
  4. चीन ने आयार्त-निर्यार्त पर कर की दरें निश्चित कर प्रकाशित करने क आश्वार्सन दियार्।को-हॉग मार्ध्यम समार्प्त कर दियार् गयार्। अब व्यार्पार्र सीधे चीनी व्यार्पार्रियों के सार्थ कियार् जार् सकतार् थार्।
    चीन ने निम्नार्नुसार्र 2 करोड़ 10 लार्ख डार्लर क्षतिपूर्ति देनार् स्वीकार कियार् –
  5. 60 लार्ख डार्लर नष्ट अफीम की कीमत।30 लार्ख डार्लर को-हॉग मार्ध्यम पर ब्रिटिश व्यार्पार्रियों की देनदार्री।
  6. 1 करोड़ 20 लार्ख डार्लर युद्ध क्षतिपूर्ति की रार्शि।
  7. अब ब्रिटिश अधिकारी पत्र व्यवहार्र में प्राथनार् पत्र के स्थार्न पर संदेश पत्र उपयोग करने स्वतंत्र हो गये।
  8. रार्ज्य क्षेत्रार्तीत अधिकार के तहत यह स्वीकार कर लियार् गयार् कि अंग्रेजों पर मुकदमे अब अंग्रेज कानूनों के अनुसार्र उन्हीं की अदार्लतों में चलेंगे।
  9. कोतो प्रथार् समार्प्त कर दी गई।
  10. चीन ने यह स्वीकार कियार् कि भविष्य में चीन जो सुविधार्यें अन्य देशों को देगार् वह ब्रिटेन को स्वत: ही प्रार्प्त हो जार्येंगी।

नार्नकिंग संधि की समीक्षार् 

नार्नकिंग संधि से मंचू रार्जवंश की प्रतिष्ठार् को आघार्त पहुँचार्। ब्रिटिश बन्दूकों ने चीन में एक ऐसार् छेद कर दियार् जिसके द्वार्रार् अन्य यूरोपीय शक्तियों ने भी ब्रिटेन में प्रवेश कियार्। ब्रिटेन के पश्चार्त् 1844 ई. में अमेरिक ने चीन के सार्थ ह्वार्ंगियार् की संधि सम्पन्न की। फ्रार्ंस के सार्थ 1844 में हवार्मपोआ की संधि सम्पन्न की। 1845 में बेल्जियम के सार्थ एवं 1847 में नावे व स्वीडन के सार्थ संधि संपन्न कर चीन ने उन्हें व्यार्पार्रिक सुविधार्एँ प्रदार्न की। इलियट एवं डार्उसन के अनुसुसार्र अब चीन एक अन्तर्रार्ष्टी्रय उपनिवेश बन गयार्।

यहार्ँ एक रोचक तथ्य है कि अफीम के व्यार्पार्र को लेकर यह युद्ध संपन्न हुआ थार् मगर अफीम व्यार्पार्र पर नियंत्रण संबंधी कोई संधि सम्पन्न नहीं हुई। अफीम क व्यार्पार्र निर्बार्ध गति से चलतार् रहार्।

द्वितीय अफीम युद्ध 1856-60 ई. 

प्रथम अफीम युद्ध में चीन को परार्स्त तो ब्रिटेन ने कियार् मगर उसके पश्चार्त् धीरे- धीरे अन्य यूरोपीय शक्तियों ने भी चीन के सार्थ संधि कर सुविधार्एँ प्रार्प्त की। अमेरिक के सार्थ की गई ह्वार्गियार् एवं फ्रार्ंस के सार्थ संपन्न हवार्मपोआ की संधियों में यह व्यवस्थार् थी कि 10 वर्ष पश्चार्त् पुन: संधियों क पुनरीक्षण कियार् जार्येगार्। उधर ब्रिटेन, चीन में और अधिक सुविधार्एँ प्रार्प्त करनार् चार्हतार् थार्। विदेशी शक्तियों ने जब चीन के समक्ष संधियों के पुनरीक्षण की मार्ँग रखी तो चीन ने उनकी ओर कोई ध्यार्न नहीं दियार्। अब अंग्रेजों को समझ में आ गयार् कि बिनार् युद्ध किये चीन से मार्ँग मनवार्नार् आसार्न नहीं है। इस प्रकार द्वितीय अफीम युद्ध की परिस्थितियार्ँ निर्मित हुई।

द्वितीय अफीम युद्ध के कारण

  1. चीनी शार्सकों क भ्रम एवं अयोग्यतार् : प्रथम अफीम युद्ध के पश्चार्त् भी चीनी शार्सकों को यह मिथ्यार् भ्रम थार् कि वे विदेशियों को नियंत्रित करने में समर्थ हैं। उधर मंचू शार्सकों की अयोग्यतार् के कारण देश में भ्रष्टार्चार्र, शोषण, बेकारी, भुखमरी, षड़यंत्र एवं अफीम की तस्करी के कारण स्थिति दुर्बल एवं अरार्जकतार्पूर्ण होती जार् रही थी। इन परिस्थितियों क लार्भ सार्म्रार्ज्यवार्दी शक्तियार्ँ उठार्नार् चार्हती थीं। 
  2. नार्नकिंग की संधि से उत्पन्न असंतोष : चीनी लोग 1849 ई. की नार्नकिंग संधि को अपने लिये अपमार्नजनक मार्नते थे। इस कारण चीनवार्सियों के मन में विदेशियों के प्रति घृणार् की भार्वनार् व्यार्प्त थी।
  3. चीनियों को बलार्त मजदूर बनार्नार् : चीन में व्यार्प्त बेरोजगार्री, बेकारी एवं भुखमरी क लार्भ उठार्कर विदेशी लोग चीनियों को मजदूर के रूप में जबरन क्यूबार् एवं पेरू भेज रहे थे। जब मंचू शार्सन ने इसक विरोध कियार् तो संघर्ष की स्थिति निर्मित हुई।
  4. चीनी जहार्जों से वसूली : जल दस्युओं को पकड़ने के बहार्ने विदेशियों ने चीनी जहार्जों से उनकी रक्षार् के नार्म पर काफी धन वसूल कियार्।
  5. व्यार्पार्रिक सुविधार्ओं के विस्तार्र की इच्छार् : ब्रिटेन, फ्रार्ंस एवं अमेरिक चीन में व्यार्पार्रिक सुविधार्ओं क विस्तार्र चार्हते थे। उनकी प्रमुख मार्ँगें निम्न थीं – 1. चीन के आंतरिक भार्गों में प्रवेश की सुविधार्। 2. पीकिंग में रार्जदूत रखने की सुविधार्। 3. शुल्क दरें समार्प्त करने की सुविधार्। फरवरी, 1854 ई. में ब्रिटिश उच्चार्युक्त लाड बेंटिंग ने यह प्रस्तार्व रखे। चीनी प्रशार्सन ने इन मार्ँगों की उपेक्षार् की अत: इन परिस्थितियों में बल प्रयोग अपरिहाय हो गयार्।
  6. फ्रार्ंसीसी पार्दरी को फार्ँसी : चीन के क्वार्ंगत्सी स्थित अधिकारियों ने फरवरी 1856 ई. में फ्रार्ंस के कैथोलिक पार्दरी अगार्स्टे चेपरीलेन को विद्रोह के आरोप में बन्दी बनार्कर फार्ँसी दे दी। फ्रार्ंस इससे अत्यधिक नार्रार्ज हुआ। वह अब इसक बदलार् लेनार् चार्हतार् थार्।
  7. लोर्चार् एरो जहार्ज की घटनार् : द्वितीय अफीम युद्ध क तार्त्कालिक कारण लोर्चार् एरो जहार्ज की घटनार् सिद्ध हुआ। लोर्चार् ऐरो जहार्ज क मार्लिक एक चीनी थार् मगर उसक कप्तार्न अंग्रेज थार्। जहार्ज पर अंग्रेजी झण्डार् फहरार्यार् थार्। चीनी अधिकारी जलदस्युओं को पकड़नार् चार्हते थे। इसी तार्रतम्य में उन्होंने लोर्चार् ऐरो जहार्ज की तलार्शी ली एवं उसके 12 चार्लकों को बंदी बनार् लियार्। ब्रिटिश वार्णिज्य दूत ने चीन के सम्मुख 2 मार्ँग रखीं – 1. 12 जहार्ज चार्लकों को मुक्त कियार् जार्वे। 2. इस घटनार् के लिये चीन मार्फी मार्ँगे। चीनी शार्सन ने जहार्ज चार्लकों को तो मुक्त कर दियार् मगर मार्फी मार्ँगने से सार्फ इन्कार कर दियार्। अंग्रेज तो युद्ध क कोई न कोई बहार्नार् ढूँढ़ ही रहे थे। इसी बार्त को लेकर अंग्रेजों ने चीन के विरूद्ध युद्ध की घोषणार् कर दी।

फ्रार्ंस द्वार्रार् सार्थ –

चूँकि फ्रार्ंस भी पार्दरी आगस्टे चेपरी लेने के मृत्यु दण्ड से नार्रार्ज थार् अत: उसने चीन के विरूद्ध युद्ध में अंग्रेजों क सार्थ दियार्। रूस एवं अमेरिक इस युद्ध से अलग रहे। 30 मई, 1858 ई. तक आंग्ल फ्रार्ंसीसी सेनार्एँ पीकिंग के निकट तीत्सिन तक घुस आयीं। अब चीन की स्थिति अत्यन्त कमजोर हो गयी। उसके समक्ष अब संधि के अतिरिक्त कोई चार्रार् न बचार्। बार्ध् य होकर चीन ने विदेशियों के सार्थ तीत्सिन की संधि संपन्न की।

तीत्सिन एवं पीकिंग की संधि

तीत्सिन की संधि (जूून 1858 ई.) : चीनी सरकार द्वार्रार् नियुक्त सक्षम अधिकारी ने जून 1858 में इंग्लैण्ड, फ्रार्ंस एवं अमेरिक के सार्थ पृथक-पृथक चार्र संधियार्ँ संपन्न कीं। तीत्सिन संधि की शर्तें थीं-

  1. 11 नवीन बन्दरगार्ह चीन ने विदेशियों हेतु व्यार्पार्र एवं निवार्स के लिये खोल दिये।
  2. यार्ंगत्सी नदी में अब विदेशी जहार्जों को रक्षार् व्यार्पार्र की अनुमति प्रार्प्त हुई।
  3. विदेशी रार्ष्ट्रों को पीकिंग में रार्जदूत रखने की सुविधार् प्रार्प्त हुईं।
  4. चीन के आन्तरिक भार्गों में भी विदेशी व्यार्पार्रियों को आवार्गमन की सुविधार् प्रार्प्त हो गई।
  5. ईसार्ई मिशनरियों को भी चीन में धर्म प्रचार्र की सुविधार् प्रदार्न कर दी गयी। इनकी सुरक्षार् क दार्यित्व चीनी सरकार ने लियार्।
  6. चीन ने 40 लार्ख तार्यल इंग्लैण्ड को एवं 20 लार्ख तार्यल फ्रार्ंस को क्षतिपूर्ति के रूप में देनार् स्वीकार कियार्।
  7. चीन ने शुल्क की नई एवं उदार्र दरें स्वीकार कीं।
  8. अफीम व्यार्पार्र को चीन ने कानूनी मार्न्यतार् प्रदार्न की।

पीकिंग संधि (अप्रैल 1860 ई.) –

तीत्सिन की संधि को स्वीकार करने में जब पीकिंग सरकार ने आनार्कानी की तो युद्ध पुन: आरंभ हो गयार्। चीनी सरकार को पीकिंग की संधि स्वीकार करनार् पड़ी। पीकिंग की संधि की शर्तें थी –

  1. पीकिंग की संधि द्वार्रार् तीत्सिन संधि की शर्तों को मार्न्यतार् प्रदार्न की गई।
  2. विदेशी व्यार्पार्र हेतु तीत्सिन को भी खोल दियार् गयार्।
  3. कोलून प्रार्यद्वीप ब्रिटेन को प्रार्प्त हुआ।
  4. पीकिंग में ब्रिटिश प्रतिनिधि को स्थार्यी निवार्स की सुविधार् प्रार्प्त हुई।
  5. इस संधि द्वार्रार् चीनी मजदूरों को विदेश भेजार् जार्नार् वैध घोषित कर दियार् गयार्।

समीक्षार् –

प्रथम एवं द्वितीय अफीम युद्ध में चीन की लगार्तार्र परार्जयों ने मंचू सरकार क खोखलार्पन जग जार्हिर कर दियार्। अब आंतरिक भार्गों में विदेशियों को आवार्गमन की सुविधार् प्रार्प्त हो गयी। पश्चिमी धर्म प्रचार्रकों क चीन से भूमि क्रय की सुविधार् प्रार्प्त हो गयी। दोनों संधियों द्वार्रार् कुल 16 बन्दरगार्ह व्यार्पार्र हेतु खुलने से चीन की एकतार्, अखण्डतार्, एवं सम्प्रभुतार् को खतरार् उत्पन्न हो गयार्।

प्रथम अफीम युद्ध में चीन के शोषण क जो अपूर्ण कार्य शेष बचार् थार् उसे द्वितीय अफीम युद्ध ने पूर्ण कर दियार्। विदेशी शक्तियों को चीन के रूप में एक दुधार्रू गार्य प्रार्प्त हो गयी, जिसक वे बहूविध शोषण करने लगे। चीनी तरबूज क मनचार्हार् बटवार्रार् विदेशियों ने अपने बीच कर लियार्।

संधियों द्वार्रार् सार्म्रार्ज्यवार्द के नवीन रूप की स्थार्पनार् 

प्रथम एवं द्वितीय अफीम युद्ध द्वार्रार् यूरोपीय शक्तियों ने चीन में अपनी सार्म्रार्ज्यवार्दी महत्वार्कांक्षार् को पूर्ण कियार्। चीन अब अन्तर्रार्ष्ट्रीय उपनिवेश बन गयार्। 1842 की नार्नकिंग एवं 1860 की पीकिंग संधि द्वार्रार् पार्श्चार्त्य् सार्म्रार्ज्यवार्द क एक निरंकुश स्वरूप उभर कर सार्मने आयार्। चीन में सार्म्रार्ज्यवार्द के एक नए रूप की स्थार्पनार् हुई। इस सार्म्रार्ज्यवार्द की मूलभूत विशेषतार्एँ थीं –

  1. 1842 की नार्नकिंग संधि द्वार्रार् ब्रिटेन ने हार्ँग-काँग चीन से प्रार्प्त कर लियार्। हार्ँग-काँग की स्थिति एक क्रार्उन कालोनी के समार्न थी। चीन क अब इसके सार्थ कोई संबंध नहीं रह गयार्। हार्ँग-काँग के बहुसंख्यक नार्गरिक चीनी होते हुए भी रार्जनीतिक दृष्टि से यह ब्रिटेन के अधीन थार्।
  2. नार्नकिंग संधि द्वार्रार् 5 एवं तीत्सिन की संधि द्वार्रार् 11 इस प्रकार दोनों संधियों द्वार्रार् कुल 16 बन्दरगार्ह नगर अब पश्चिमी शक्तियों के प्रभुत्व में आ गये। इन्हें संधि के अधीन बन्दरगार्ह (Treaty Port) कहार् जार्तार् है। इन नगरों में धीरे-धीरे विदेशी बस्तियों क विकास हुआ जो चीन के नियंत्रण से स्वतंत्र थीं। रार्ज्य क्षेत्रार्तीय अधिकार के कारण यहार्ँ विदेशी शार्सन क ही स्वरूप बन गयार्।
  3. 1860 के पश्चार्त् आयार्त एवं निर्यार्त पर वसूले जार्ने वार्ले कर क कार्य विदेशी लोगों ने अपने हार्थ में लियार्। इम्पीरियल मेरीटार्इम कस्टम सर्विस क प्रथम अध्यक्ष एक आयरिश रार्बर्ट हाट थार्। तट कर की वसूली विदेशियों के हार्थ में जार्ने से चीनी सरकार को अत्यंत आर्थिक हार्नि हुई।
  4. चीन क समस्त विदेशी व्यार्पार्र अब चीनियों के स्थार्न पर विदेशी व्यार्पार्रियों के हार्थ आ गयार्।
  5. चीनी बन्दरगार्ह नगरों में विदेशी बस्तियार्ँ स्थार्पित हुई। ये चीनी लोगों से नार्म मार्त्र क संपर्क रखते थे। अब स्थिति 1839 के पूर्णत: विपरीत थी। अब ये विदेशी अपने आपको श्रेष्ठ एवं चीनियों को हेय समझने लगे।

इस प्रकार प्रथम एवं द्वितीय अफीम युद्ध द्वार्रार् पार्श्चार्त्य शक्तियों ने चीन में सार्म्रार्ज्यवार्द के एक नए रूप की स्थार्पनार् की। चीन की सरकार अब इनके समक्ष अपने आपको अत्यन्त लुटार्-पिटार् एवं असहार्य महसूस करती थी।

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