अनुवार्द एवं भार्षार्विज्ञार्न

अनुवार्द एक भार्षिक कलार् है। सार्मार्न्य अर्थ में, एक भार्षार् में कही गर्इ बार्त को दूसरी भार्षार् में कहनार् ‘अनुवार्द’ है। यहार्ँ कथन यार् अभिव्यक्ति क मार्ध्यम है ‘भार्षार्’। स्पष्ट है कि अनुवार्द क्रियार् पूर्णत: भार्षार् पर आधार्रित है। कदार्चित इसीलिए भोलार्नार्थ तिवार्री जी ने अनुवार्द को ‘भार्षार्न्तर’ कहार् है। एक भार्षिक क्रियार् होने के नार्ते अनुवार्द क भार्षार् से ही नहीं, भार्षार्विज्ञार्न से भी गहरार् सम्बन्ध है, क्योंकि भार्षार्विज्ञार्न में ‘भार्षार्’ क वैज्ञार्निक अध्ययन होतार् है। भार्षार् की संरचनार् में ध्वनि, शब्द, रूप, अर्थ, वार्क्य आदि कर्इ स्तर होते हैं। इनके आधार्र पर भार्षार्विज्ञार्न के अन्तर्गत ध्वनिविज्ञार्न, रूपविज्ञार्न, अर्थविज्ञार्न, वार्क्यविज्ञार्न आदि क विधिवत व वैज्ञार्निक अध्ययन कियार् जार्तार् है। अनुवार्द में भी ध्वनि, शब्द, रूप आदि की दृष्टि से स्रोत-भार्षार् और लक्ष्य-भार्षार् की तुलनार् करनी होती है। इन विविध स्तरों पर दो भार्षार्ओं की प्रकृति, संरचनार्, शैली आदि में जो अन्तर होते हैं, वे समार्न प्रतीत होने वार्ले प्रसंगों में भी अलग-अलग अर्थ भर देते हैं। अनुवार्द में भार्षार्न्तरण के बार्वजूद अर्थ की रक्षार् अपरिहाय होती है। अत: अनुवार्दक को स्रोत-भार्षार् तथार् लक्ष्य-भार्षार् की प्रकृति, संरचनार्, विविध भार्षिक तथार् व्यार्करणिक स्तरों, विभिन्न शैलियों तथार् इन तमार्म पक्षों से सम्बद्ध अर्थ व्यंजनार्ओं क सम्पूर्ण ज्ञार्न होनार् चार्हिए।

भार्षार् क अनुवार्द और अनुवार्द की भार्षार् 

भार्रतवर्ष विभन्न भार्षार्ओं एवं उपभार्षार्ओं रूपी सरितार्ओं क संगम है। यहार्ँ एक ओर संस्कृति की पार्वन गंगार् प्रवार्हित है जिसने अमृत वार्ड़्मय से समस्त क्षेत्रीय भार्षार्ओं को भी अनुप्रार्णित कियार् है, दूसरी ओर हमार्री संस्कृति की अंत:सलिलार् सरस्वती है जो विविधि वेशभूषार्, रीतिरिवार्जों के बार्ह्य भेदों की विद्यमार्नतार् के बार्वजूद समस्त भार्रत को रार्गार्त्मकतार् के एक सू़त्र में बार्ँधे हुए हैं। भार्षार् ही वह जीवन-ज्योति है जो मार्नव को मार्नव से जोड़ती है। यह विचार्रों के आदार्न-प्रदार्न में सहार्यक होने के सार्थ-सार्थ परम्परार्ओं, संस्कृतियों और मार्न्यतार्ओं एवं विश्वार्सों को समझने क सशक्त मार्ध्यम भी है। किसी भी देश की धड़कन उसकी भार्षार् में ही निहित होती है। जहार्ँ भार्षार् विचार्रों की संवार्हिक है, वहीं अनुवार्द विविध भार्षार्ओं एवं विविध संस्कृतियों से सार्क्षार्त्कार करार्ने वार्लार् सार्धन। अनुवार्दक अपने भार्गीरथ प्रयार्स से दो भिन्न एवं अपरिचित संस्कृतियों, परिवेशों एवं भार्षार्ओं की सौन्दर्य चेतनार् को अभिन्न और परिचित बतार् देतार् है।

अनुवार्द उतनार् ही प्रार्चीन है जितनी कि भार्षार्। हमार्रार् भार्रत भार्षार्ओं और उनके बोलने वार्लों की संख्यार् की दृष्टि से यूरोप से बहुत बड़ार् है। और सच तो यह है कि भार्षार्ओं के मार्मले में हम दुनियार् के सिरमौर हैं। दुनियार् की पचार्स बड़ी भार्षार्ओं में से एक तिहाइ भार्रत की भार्षार्एँ हैं। अनार्दि काल से वे मनुष्य जार्ति के पार्रस्परिक आदार्न-प्रदार्न क सशक्त मार्ध्यम रही हैं। भार्षार् और सार्हित्य हमार्री संस्कृति के उद्गार्तार् और संवार्हक रही हैं।

भार्षार् और अनुवार्द क भविष्य परस्पर अन्योन्यार्श्रित है। भार्षार् क भविष्य अनुवार्द क भी भविष्य है । वर्तमार्न भार्षार् के रूप को पहचार्नते हुए भविष्य की कल्पनार् की जार्ती है। आज कर्इ प्रकार के भार्षार्-रूप हैं, जैसे बोलचार्न की भार्षार्, सार्हित्यिक भार्षार्, मार्ध्यम भार्षार्, सम्पर्क भार्षार्, जनसंचार्र मार्ध्यम की भार्षार् इत्यार्दि। बोलचार्ल की भार्षार् में व्यार्करण के ज्ञार्न की आवश्यकतार् नहीं, जबकि सार्हित्यिक भार्षार् में रचनार्धर्मितार् प्रकट होने के कारण व्यार्करण क ज्ञार्न आवश्यक है। मार्ध्यम भार्षार् के द्वार्रार् शिक्षण प्रार्प्त करते हैं। जनसंचार्र की भार्षार् के प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दो अलग प्रकार के मार्ध्यम हैं। इसक मुख्य उद्देश्य जनतार् को सूचनार् देनार्, प्रशिक्षण, प्रबोधन, अभिप्रेरण, प्रोत्सार्हन तथार् मनोरंजन करनार् है। इसी कारण इस मार्ध्यम में भार्षार् को रोचक रूप में प्रस्तुत करने क विशेष प्रयार्स रहतार् है।

यह अलग बार्त है कि बार्ज़ार्रवार्द के चलते आज भार्षार् क व्यार्वसार्यीकरण हो गयार् है। इंटरनेट, कंप्यूटर आदि के कारण दैनन्दिन जीवन की आवश्यकतार्ओं में प्रयोग होने वार्ली भार्षार् पर विस्तार्र देने क प्रयार्स होने लगार् है। भार्षार् में दिनोंदिन परिष्कार हो रहार् है, जिससे शब्दों में निखार्र आतार् जार् रहार् है। पहले ‘Public Latrine’ शब्द लिए ‘संडार्स’ शब्द क प्रयोग कियार् जार्तार् थार्, जो सुनने और बोलने में बड़ार् अरुचिकर लगतार् थार्, परन्तु धीरे-धीरे इसके स्थार्न पर प्रसार्धन, सुलभ शौचार्लय, जनसुविधार्एँ आदि शब्द आए, ये शब्द ज्यार्दार् गरिमार् मंडित हैं।

भार्षार् की सबसे बड़ी शक्ति उसकी ग्रहण क्षमतार् है, जिस भार्षार् में यह गुण नहीं, वह भार्षार् दम तोड़ है। किसी भी भार्षार् से अनुवार्द करते समय अनुवार्द के सरलीकरण क प्रयार्स रहनार् चार्हिए। यदि अनुवार्द को जटिल बनार्ने क प्रयार्स कियार् गयार् तो स्थिति बिगड़ने की संभार्वनार् रहती है। संप्रेषण ग्रार्ह्यतार् जब तक भार्षार् में नहीं होगी, वह अनुवार्द यार् भार्षार् जनसम्पर्क क मार्ध्यम नहीं बन सकती। भार्षार् भार्वार्भिव्यक्ति के सार्थ-सार्थ चिन्तन क भी मार्ध्यम है। हर शब्द की व्यंजनार्, प्रकृति, प्रवृत्ति, संस्कृति, इतिहार्स अलग होतार् है। अत: अनुवार्द करते समय इसे समझनार् होगार्। भार्षार् और शब्द की प्रकृति से भलीभार्ँति परिचित होनार् होगार्।

अनुवार्द और अनुप्रयुक्त भार्षार्विज्ञार्न 

आधुनिक युग को अनुवार्द क युग कहेंगे अतिशयोक्ति न होगी। क्योंकि अनुवार्द-अध्ययन और अनुसंधार्न आधुनिक युग की पुकार है। दूसरे शब्दों में, आधुनिक युग में जीवन के अनेक क्षेत्रों के विकास के सार्थ-सार्थ भार्षार्यी स्तर पर, संप्रेषण-व्यार्पार्र हेतु अनुवार्द एक अहम् आवश्यकतार् के रूप में उभरकर सार्मने आयार् है। वर्तमार्न परिप्रेक्ष्य में जब हम किसी एक भार्षार् में अभिव्यक्त भार्व यार् विचार्रों के लिखित रूप को किसी अन्य भार्षार्-भार्षी समुदार्य के संप्रेषणाथ, दूसरी भार्षार् में यथार्सार्ध्य मूलनिष्ठ किन्तु बोधगम्य रूप में परिवर्तित करते हैं तो यह भार्व यार् विचार्रों के सोद्देश्यपूर्ण भार्षार्न्तर-प्रक्रियार् ‘अनुवार्द’ कहलार्ती है।

आधुनिक भार्षार्विज्ञार्न में भार्षार् के अनुप्रार्योगिक पक्ष पर भी चिन्तन हुआ है। ‘भार्षार् क सैद्धार्न्तिक विश्लेषण और वार्क्य, रूपिम, स्वनिम आदि उसके व्यार्करणिक स्तरों क वैज्ञार्निक अध्ययन भार्षार्विज्ञार्न क सिद्धार्न्त कहलार्तार् है, जबकि सौद्धार्न्तिक भार्षार्विज्ञार्न के नियमों सिद्धार्न्तों, तथ्यों और निष्कषोर्ं क किसी अन्य विषय में अनुप्रयोग करने की प्रक्रियार् ओर क्रियार् कलार्प क विज्ञार्न ही अनुप्रयुक्त भार्षार्विज्ञार्न(Applied Linguistics) है।’ बकौल कृष्णकुमार्र गोस्वार्मी अनुप्रयुक्त भार्षार्विज्ञार्न प्रार्योगिक एवं कार्योन्मुख एक ऐसी वैज्ञार्निक विधार् है, जो मार्नव कार्य-व्यार्पार्र में उठने वार्ली भार्षार्गत समस्यार्ओं क समार्धार्न ढूँढती है। भार्षिक क्षमतार् एवं भार्षिक व्यवहार्र के सन्दर्भ में अनुप्रयुक्त भार्षार्विज्ञार्न क सम्बन्ध प्रत्यक्षत: व्यवहार्र पक्ष से जुड़ार् हुआ है। यदि भार्षार्विज्ञार्न प्रत्येक ‘क्यार्’ क उत्तर देतार् है अनुप्रयुक्त भार्षार्विज्ञार्न प्रत्येक ‘कैसे’ तथार् ‘क्यों’ क उत्तर देतार् है। यह उपभोक्तार् सार्पेक्ष होतार् है, जिसमें भार्षार् के उपभोक्तार्ओं की आवश्यकतार्ओं द्वार्रार् निर्धार्रित लक्ष्य के सन्दर्भ में भार्षार्-सिद्धार्न्तों क अनुप्रयोग होतार् है। वार्स्तव में भार्षार् से हम क्यार्-क्यार् काम ले सकते हैं, अनुप्रयुक्त भार्षार्विज्ञार्न उस दिशार् में काम करतार् है। इसलिए जैसे-जैसे इसकी उपयोगितार् बढ़ती गर्इ, देश एवं काल के अनुसार्र उसे भिन्न-भिन्न विधार्ओं से सम्बद्ध कियार् जार्तार् रहार् है; यथार् भार्षार्-शिक्षण, अनुवार्द, कोशविज्ञार्न, शैलीविज्ञार्न, कंप्यूटर भार्षार्विज्ञार्न, समार्ज भार्षार्विज्ञार्न।

सार्मार्न्यत: अनुवार्द से अभिप्रार्य एक भार्षाइ संरचनार् के प्रतीकों के द्वार्रार् सम्प्रेष्य अर्थ को दूसरी भार्षार् की संरचनार् के प्रतीकों में परिवर्तित करने से लियार् जार्तार् है। डाटेस्ट ने अनुवार्द को अनुप्रयुक्त भार्षार्विज्ञार्न की एक शार्खार् के रूप में परिभार्षित करते हुए लिखार् है कि अनुवार्द, अनुप्रयुक्त भार्षार्विज्ञार्न की वह शार्खार् है जिसमें विशेषत: एक प्रतिमार्नित प्रतीक समूह से दूसरे प्रतिमार्नित प्रतीक समूह में अर्थ को अन्तरित करने की समस्यार् यार् तत् सम्बन्धी तथ्यों पर विचार्र-विमर्श कियार् जार्तार् है :

अनुवार्द को अनुप्रयुक्त भार्षार्विज्ञार्न के अन्तर्गत शार्मिल करने क कारण यह है कि अनुवार्द कर्म में स्रोत-भार्षार् से लक्ष्य-भार्षार् तक पहुँचने में हम जिन प्रक्रियार्ओं से होकर गुजरते हैं उसक वैज्ञार्निक विश्लेषण (scientific analysis) कियार् जार् सकतार् है। भार्षार् विज्ञार्नियों क मार्ननार् है कि अनुवार्द क्रियार् में पहले स्रोत-भार्षार् क विकोडीकरण (Decoding of Source Language) होतार् है जिसक बार्द में लक्ष्य-भार्षार् में पुन: कोडीकरण (Encoding of Target Language) कियार् जार्तार् है। क्रम को देखें –

  1. स्रोत-भार्षार् (Encoding of Source Language ) 
  2. स्रोत-भार्षार् क कोडीकृत संदेश (Encoded message S.L.) 
  3. अन्तरण अर्थार्त् स्रोत-भार्षार् क विकोडीकरण (Decoding of S.L.) 
  4. लक्ष्य-भार्षार् क कोडीकृत संदेश (Encoded message of Target Language) 
  5. लक्ष्य-भार्षार् (Encoding of T.L.)

इसे आरेख से सहज ही समझार् जार् सकतार् है : –

अनुवार्द और अनुप्रयुक्त भार्षार्विज्ञार्न

अनुप्रयुक्त भार्षार्विज्ञार्न के कार्यक्षेत्र क अध्ययन करते हुए उसके तीन सन्दर्भ बतार्ए हैं :

  1. ज्ञार्न-क्षेत्र क सन्दर्भ
  2. विधार्-क्षेत्र क सन्दर्भ 
  3. भार्षार् शिक्षण क सन्दर्भ 

ज्ञार्न-क्षेत्र में भार्षार्विज्ञार्न और उसके सिद्धार्न्तों क अनुप्रयोग ज्ञार्न के अन्य क्षेत्रों को स्पष्ट करने के लिए कियार् जार्तार् है। जैसे मनोभार्षार्विज्ञार्न, समार्जभार्षार्विज्ञार्न, कंप्यूटर भार्षार्विज्ञार्न आदि।

विधार्-क्षेत्र में भार्षार्वैज्ञार्निक सिद्धार्न्तों क अनुप्रयोग विशेष विधार्ओं में कियार् जार्तार् है। शैलीविज्ञार्न, अनुवार्दविज्ञार्न, कोशविज्ञार्न, वार्क्चिकित्सार् विज्ञार्न आदि। 

जहार्ँ तक भार्षार् शिक्षण क प्रश्न है, दूसरी भार्षार्-शिक्षण (Second Language Teaching) अनुप्रयुक्त भार्षार्विज्ञार्न की एक महत्त्वपूर्ण शार्खार् है। भार्षार्विज्ञार्न के क्षेत्र में दूसरी भार्षार्’ पद एक पार्रिभार्षिक शब्द के रूप में प्रयुक्त होतार् है जिसकी एक निश्चित संकल्पनार् है। मार्तृभार्षार् हमार्री प्रथम भार्षार् होती है। दूसरी भार्षार् को सीखने में मार्ध्यम बनती है मार्तृभार्षार्। दूसरी भार्षार् के रूप में जब वह कोर्इ अन्य भार्षार् पढ़तार् है तब उसके सोचने-समझने में मार्तृभार्षार् उसकी व्यार्वहार्रिक भार्षार् रहती है क्योंकि वह व्यक्ति की जीवन पद्धति, आचार्र-विचार्र और व्यवहार्र की भार्षार् होती है। दूसरी भार्षार् शिक्षण में अनुवार्द की प्रक्रियार् को भार्षार् सीखने की प्रक्रियार् के रूप में अपनार्यार् जार्तार् है। अनुवार्द भार्षार्-शिक्षण की परम्परार्गत और सिद्ध पद्धति है। मार्तृभार्षार् अथवार् प्रथम भार्षार् क जो संरचनार्गत ढार्ँचार् व्यक्ति के मस्तिष्क में व्यार्वहार्रिक स्तर पर विद्यमार्न होतार् है, उसक उपयोग इस पद्धति से दूसरी भार्षार् सिखार्ने में कर लियार् जार्त है और व्यक्ति धीरे-धीरे सुविधार्जनक ढंग से दूसरी भार्षार् व्यवहार्र में दक्षतार् अर्जित कर लेतार् है। अनुवार्द-प्रक्रियार् की भार्ँति उसे अपनी भार्षार् (स्रोत-भार्षार्) की शब्दार्वली के पर्यार्य उसे दूसरी भार्षार् में खोजकर यार्द करने होते हैं, इन शब्दों के विभिन्न रूपों से परिचय प्रार्प्त करनार् होतार् है तथार् भार्षार् के संरचनार्गत (व्यार्करण संबंधी) नियमों की जार्नकारी हार्सिल करनी होती है। इन शब्दों क प्रयोग करते हुए वार्क्त-रचनार् करते समय वह नियमों क सतर्कतार्पूर्वक पार्लन करतार् है। ऐसार् करते समय वह अपनी भार्षार् में सोचतार् है, फिर उस बार्त को उस भार्षार् में पढ़तार् है, उस पार्ठ के पर्यार्य अपनी भार्षार् मे तलार्शतार् है और कथ्य को दूसरी भार्षार्(लक्ष्य-भार्षार्) में प्रस्तुत करतार् है। अनुवार्द के मार्ध्यम से दूसरी भार्षार्-शिक्षण दुनियार् भर में बहुत समय से प्रचलित रहार् है। सदियों से लोग इस पद्धति से भार्षार् सीखते रहे हैं।

अनुवार्द और भार्षार्विज्ञार्न क अन्तर्सम्बन्ध 

1. भार्षार्विज्ञार्न एवं अनुप्रयुक्त भार्षार्विज्ञार्न 

भार्षार् क विधिवत एवं वैज्ञार्निक अध्ययन भार्षार्विज्ञार्न सिद्धार्न्त कहलार्तार् है जबकि सैद्धार्न्तिक भार्षार्विज्ञार्न के नियमों, सिद्धार्न्तों, तथ्यों और निष्कर्षों क किसी अन्य विषय में अनुप्रयोग करने की प्रक्रियार् और क्रियार्-कलार्प क विज्ञार्न ही अनुप्रयुक्त भार्षार्विज्ञार्न है। दूसरे शब्दों में कहें तो, अनुप्रयुक्त भार्षार्विज्ञार्न में भार्षार्विज्ञार्न से प्रार्प्त सैद्धार्न्तिक जार्नकारी क विभिन्न क्षेत्रों में अनुप्रयोग करते हैं। अनुप्रयुक्त भार्षार्विज्ञार्नी अपने ज्ञार्न भंडार्र के विवेचनार्त्मक परीक्षण के पश्चार्त् उसक अनुप्रयोग उन क्षेत्रों में करतार् है जहार्ँ मार्नव-भार्षार् एक केन्द्रीय घटक होती है जिससे उन क्षेत्रों की कार्यक्षमतार् क संवर्द्धन कियार् जार् सकतार् है।

अनुप्रयुक्त भार्षार्विज्ञार्न एक ऐसी प्रार्योगिक, कार्योन्मुख वैज्ञार्निक विधार् है जो मार्नव कार्य-व्यार्पार्र में उठने वार्ली भार्षार्गत समस्यार्ओं क समार्धार्न ढूँढ़ती है। भार्षिक क्षमतार् एवं भार्षिक व्यवहार्र के सन्दर्भ में अनुप्रयुक्त भार्षार्विज्ञार्न क सम्बन्ध प्रत्यक्षत: व्यवहार्र पक्ष से जुड़ार् हुआ है। यदि भार्षार्विज्ञार्न प्रत्येक ‘क्यार्’ क उत्तर देतार् है तो अनुप्रयुक्त भार्षार्विज्ञार्न प्रत्येक ‘कैसे’ तथार् ‘क्यों’ क उत्तर देतार् है। चूँकि अनुप्रयुक्त भार्षार्विज्ञार्न क सम्बन्ध विशेष विधार्ओं से है, अत: इसमें भार्षार्वैज्ञार्निक सिद्धार्न्तों क जो अनुप्रयोग कियार् जार्तार् है उसक लक्ष्य संक्रियार्त्मक होतार् है। संक्रियार्त्मक रूप में शैलीविज्ञार्न, अनुवार्दविज्ञार्न, कोशविज्ञार्न, वार्क्चिकित्सार् विज्ञार्न आदि विषयों में भार्षार्वैज्ञार्निक सिद्धार्न्तों क अनुप्रयोग अनिवायत: होतार् है। क्योंकि ये मुख्यत: भार्षार् से सम्बद्ध हैं। इन विधार्ओं को एक निश्चित सैद्धार्न्तिक सन्दर्भ देने में और उसके अध्ययन-विश्लेषण के लिए एक सुनिश्चित वैज्ञार्निक तकनीक विकसित करने में भार्षार्वैज्ञार्निक सिद्धार्न्त एवं प्रणार्ली के अनुप्रयोग क सर्वार्धिक योगदार्न है।

2. अनुवार्द एवं व्यतिरेकी भार्षार्विज्ञार्न 

‘व्यतिरेक’ क अर्थ है ‘असमार्नतार्’ यार् ‘विरोध’। ‘व्यतिरेकी भार्षार्विज्ञार्न’ में दो भार्षार्ओं की तुलनार् करके दोनों की असमार्नतार्ओं क पतार् लगार्यार् जार्तार् है। अनुवार्द के सन्दर्भ में कहें तो व्यतिरेकी विश्लेषण क मुख्य उद्देश्य रूपार्त्मक तुलनार्त्मकतार् और उस तुलार्नार्त्मकतार् के आधार्र पर स्रोत-भार्षार् और लक्ष्य-भार्षार् में विद्यमार्न असमार्नतार्ओं की व्यार्ख्यार् करनार् है। इस प्रकार व्यतिरेकी तकनीक के रूप में अनुवार्द में स्रोत-भार्षार् और लक्ष्य-भार्षार् के बीच व्यार्प्त असमार्नतार्ओं के प्रति भार्षार्यी सजगतार् पैदार् करनार् है।

उदार्हरण के लिए हिन्दी में तीन मध्यम पुरुष : तू, तुम, आप हैं जबकि अंग्रेजी में केवल ‘लवन’। इस प्रकार निम्नलिखित वार्क्यों में अंग्रेजी के ‘small’ शब्द के समार्नार्न्तर हिन्दी में ‘छोटार्’, ‘छोटी’, ‘छोटे’ तीनों क प्रयोग हुआ है।

उदार्हरण :
  SmalI boy : छोटार् लड़का
  SmalI girl : छोटी लड़की
  SmalI boys : छोटे लड़के

एकाध और उदार्हरणों पर विचार्र करें : हिन्दी के ‘गार्नेवार्ली’ शब्द क अंग्रेजी में अनुवार्द सन्दर्भार्नुसार्र ‘singer’ और ‘about to sing’ होगार्। इस प्रकार ‘टोपीवार्लार्’ क अनुवार्द ‘wearing cap’ और ‘cap seller’ होगार्। अत: कहार् जार् सकतार् है कि अनुवार्द क सीधार् सम्बन्ध व्यतिरेकी विश्लेषण से है।

3. अनुवार्द एवं ध्वनिविज्ञार्न 

‘ध्वनि’ भार्षार् की मूलभूत इकार्इ होती है तथार् हर भार्षार् की अपनी अलग ध्वनि व्यवस्थार् होती है। दो भार्षार्ओं के बीच कुछ समार्न, कुछ लगभग समार्न और कुछ भिन्न ध्वनियार्ँ होती हैं। यहार्ँ अंग्रेजी और हिन्दी भार्षार् की समार्न ध्वनियों की तुलनार् करते हैं :

हिन्दी : क ग ज ट न प फ ब म र ल व श स 

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अंग्रेजी : k g j t n p f b m r l v sh s

तुलनार् से स्पष्ट है कि अंग्रेजी में हिन्दी की ‘v’ ध्वनि नहीं है तो ‘अ’ और ‘W’ क सूक्ष्म अन्तर हिन्दी में नहीं है। ऐसे और कर्इ उदार्हरण ढूँढे जार् सकते हैं। जैसार् कि ऊपर कहार् गयार्, भार्षार् की मूलभूत इकार्इ है ‘ध्वनि’ और साथक ध्वनियों से ‘शब्द’ क निर्मार्ण होतार् है। यह शब्द जब वार्क्य में प्रयुक्त होतार् है तब वह ‘रूप’ बन जार्तार् है। अनुवार्द कर्म में हमेशार् दो भार्षार्ओं के बीच स्थित समार्नाथक शब्दों की तलार्श रहती है। मगर यह ज़रूरी नहीं कि एक भार्षार् की सम्पूर्ण अभिव्यक्ति किसी दूसरी भार्षार् में उपलब्ध हो। हर भार्षार् में कुछ ऐसे शब्द होते हैं जिसके समार्नाथक शब्द दूसरी भार्षार् में उपलब्ध नहीं होते, जैसे पार्रिभार्षिक शब्द, मिथ-विशेष से जुड़े शब्द, सार्ंस्कृतिक शब्द आदि। ऐसे में हम मूल शब्द क अनुवार्द न कर उसे लक्ष्य-भार्षार् की लिपि में परिवर्तित कर ज्यों क त्यों ग्रहण कर लेते हैं। इसके लिए हमें लिप्यंतरण यार् Transliteration क सहार्रार् लेनार् पड़तार् है और लिप्यन्तरण में ध्वनिविज्ञार्न क महत्त्वपूर्ण योगदार्न रहतार् है। कुछ शब्दों क लिप्यन्तरण द्रष्टव्य है :

Bureau. ब्यूरो, Voucher. वार्उचर, Macbath. मैकबेथ आदि।

4. अनुवार्द एवं अनुलेखन 

अनुलेखन क अर्थ है स्रोत-भार्षार् के शब्द की वर्तनी पर ध्यार्न न देकर उसके उच्चार्रण को आधार्र मार्न कर लक्ष्य-भार्षार् में उस उच्चार्रण के अनुरूप लिखनार्। अनुलेखन को प्रतिलेखन भी कहार् जार्तार् है। अनुवार्द प्रक्रियार् के दौरार्न अनुद्य सार्मग्री में हमें दो प्रकार के शब्द मिलते हैं : 1- जिनक अनुवार्द कियार् जार्नार् है और 2- जिनक अनुवार्द न कर थोड़े-बहुत रूपार्न्तर के सार्थ प्रार्य: मूल रूप में ही लक्ष्य-भार्षार् में लिख दियार् जार्तार् है। अनुलेखन में स्रोत-भार्षार् के ऐसे शब्दों को लक्ष्य-भार्षार् में लिखने की समस्यार् पर विचार्र कियार् जार्तार् है जिसक सम्बन्ध लिपिविज्ञार्न से है। भोलार्नार्थ तिवार्री इसे स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि अनुवार्द में ऐसी समस्यार् दो रूपों में आती है। यदि अनुवार्दक किसी से कोर्इ बार्त सुनकर उसक अनुवार्द करके लिख रहार् है तो वह स्रोत-भार्षार् की ध्वनि को पहले लक्ष्य-भार्षार् की ध्वनि में परिवर्तित करतार् है और फिर लक्ष्य-भार्षार् की उन ध्वनियों को प्रतिनिधि लिपि-चिह्नों में उन्हें लिखतार् है-

स्रोत-भार्षार् ध्वनि →लक्ष्य-भार्षार् ध्वनि →लक्ष्य-भार्षार् लिपिचिह्न

किन्तु यदि वह किसी लिखित सार्मग्री से अनुवार्द कर रहार् हो तो इस क्रम में वृद्धि हो जार्ती है-

1.स्रोत-भार्षार् लिपि चिह्न→ 2.स्रोत-भार्षार् ध्वनि
3. लक्ष्य-भार्षार् ध्वनि 4.लक्ष्य-भार्षार् लिपिचिह्न

अनुवार्द में स्रोत-भार्षार् लिपि चिह्न से सीधे लक्ष्य-भार्षार् लिपिचिह्न तक पहुँचने की प्रक्रियार् सही नहीं होती। उदार्हरण के लिए यदि लिपि चिह्नों के आधार्र पर ‘Jesperson’ क अनुवार्द ‘जेस्पर्सन’ कर दियार् जार्ए तो गलत होगार् क्योंकि इसक सही अनुवार्द तो ‘येस्पर्सन’ है। ऐसे ही ‘Rousseau’ और ‘Meillet’ क अनुवार्द क्रमार्नुसार्र ‘रूसो’ और ‘मेइये’ होगार्, न कि ‘रार्उस्सेअउ’ तथार् ‘मेइल्लेत’।

5. अनुवार्द एवं रूपविज्ञार्न 

रूपविज्ञार्न के अन्तर्गत भार्षार् की रूप-रचनार् क अध्ययन होतार् है। रूप-रचनार् में व्यार्करणिक नियमों क आकलन एवं निर्धार्रण कियार् जार्तार् है। इसके अध्ययन क क्षेत्र बहुत ही विस्तृत है। चूँकि भार्षार् के रूप-विन्यार्स पर ही मूल क आशय छिपार् रहतार् है, इसीलिए अनुवार्दक को स्रोत-भार्षार् और लक्ष्य-भार्षार्, दोनों की रूप-रचनार्, व्यार्करणिक नियमों आदि से भलीभार्ँति परिचित होनार् चार्हिए। उदार्हरण के लिए अंग्रेजी के दो वार्क्यों क गलत और सही अनुवार्द द्रष्टव्य है :

उदार्हरण-1 
Prima has a pair of scissors.
क- प्रीमार् के पार्स एक जोड़ी कैंची हैं। (-गलत अनुवार्द)
ख- प्रीमार् के पार्स एक कैंची है। (-सही अनुवार्द)

उदार्हरण-2 
Her hair is beautiful.
क- उसक सुन्दर बार्ल है। (-गलत अनुवार्द)
ख- उसके बार्ल सुन्दर हैं । (-सही अनुवार्द)

कहने की ज़रूरत नहीं कि अंग्रेजी में ‘a pair of scissors’, ‘a pair of trousers’ आदि क प्रयोग होतार् है, मगर हिन्दी में उसे ‘एक जोड़ी कैंची’ यार् ‘एक जोड़ी पार्यजार्मार्’ न कहकर सिफऱ् ‘एक कैंची’ यार् ‘एक पार्यजार्मार्’ कहार् जार्तार् है। ऐसे ही अंग्रेजी में ‘hair’ शब्द एकवचन के रूप में प्रयोग होतार् है, जबकि हिन्दी में ‘बार्ल’ बहुवचन में।

6. अनुवार्द एवं शब्दविज्ञार्न 

किसी भार्षार् की साथक ध्वनियों के समुच्चय को शब्द कहते हैं। शब्दविज्ञार्न में शब्दों को परिभार्षित करके विभिन्न आधार्रों पर उनक वर्गीकरण कियार् जार्तार् है। अनुवार्द में शब्दों के मूल अर्थ क स्रोत यार् प्रयोग सन्दर्भ को जार्नने के लिए शब्द क वैज्ञार्निक विश्लेषण और वर्गीकरण करनार् पड़तार् है। उदार्हरण के लिए ‘पार्नी’ शब्द को लीजिए :

पार्नी 

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1  2  3  4  5  6  7  8  9  10  11  12 

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जल वार्रि नीर अम्बु सलिल अंभ तोय उदक घनसार्र तृसार्ह प्रजार्हित सर 

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निश्चय ही इन समार्नार्थ्र्ार्ी शब्दों क प्रयोग भी कुछ हद तक निश्चित ही है और अनुवार्दक को सन्दर्भार्नुसार्र इन शब्दों में से एक ही प्रतिशब्द को ग्रहण करनार् पड़तार् है।
जैसे :
क- गंगार् जल (गंगार् नीर यार् गंगार् पार्नी नहीं)
ख- पीने क पार्नी (पीने क नीर यार् जल नहीं)
ग- नीर ढलनार्’ (जल यार् पार्नी ढलनार् नहीं)
   (’नीर ढलनार् = आँसू बहार्नार्)

7. अनुवार्द एवं अर्थविज्ञार्न 

अर्थविज्ञार्न में भार्षार् के अर्थ पक्ष क अध्ययन कियार् जार्तार् है। चूँकि अनुवार्द में शब्द क नहीं अर्थ क प्रतिस्थार्पन होतार् है, इसीलिए अनुवार्द में अर्थविज्ञार्न की महत्त्वपूर्ण भूमिक होती है। सार्थ ही अनुवार्द कर्म में अनुवार्दक केवल अभिधाथ के सहार्रे आगे नहीं बढ़तार्, बल्कि निहिताथ (लक्षणार् और व्यंजनार्) को भी बरार्बर सार्थ लिए चलतार् है। उदार्हरण के लिए एक पक्षी के सन्दर्भ में ‘वह उल्लू है’ कहनार् सार्धार्रण अर्थ क बोध करार्तार् है, मगर एक व्यक्ति के सन्दर्भ में जब ‘वह उल्लू है’ कहार् जार्तार् है तो व्यंग्याथ क बोध करार्तार् है। फिर जो ‘उल्लू’ हिन्दी में मूर्ख क प्रतीक है, वही ‘Owl’ अंग्रेजी में ‘विद्वार्न’ क प्रतीक है। इतनार् ही नहीं, कुछ शब्दों के कर्इ अर्थ होते हैं। जैसे ‘वार्रि’ शब्द की तीन अर्थ छवियों को देखिए :

वार्रि

↙↓↘

1- जल   2- सरस्वती   3- हार्थी बार्ँधने की जंजीर 

अनुवार्दक को सन्दर्भार्नुसार्र इन अर्थ छार्यार्ओं में से एक अर्थ को ग्रहण करनार् पड़तार् है।

8. अनुवार्द एवं वार्क्यविज्ञार्न 

अनुवार्द में वार्क्यविज्ञार्न की भी महत्त्वपूर्ण भूमिक होती है। वार्क्यविज्ञार्न में भार्षार् विशेष के सन्दर्भ में वार्क्य रचनार् और इसके विभिन्न पक्षों क विश्लेषण कियार् जार्तार् है । अनुवार्द में भी लक्ष्य-भार्षार् की प्रकृति, व्यार्करणिक नियम आदि क ध्यार्न रखनार् पड़तार् है। उदार्हरण के लिए ‘वह भोजन कर रहार् है’ क अंग्रेजी अनुवार्द ‘He is doing meal.’ न होकर ‘भ्म पे जार्ंपदह उमंसण्’ होगार् । यहार्ँ ‘भोजन करनार्’ हिन्दी भार्षार् की प्रकृति के अनुकूल है और ‘taking meal’ अंग्रेजी भार्षार् की प्रकृति के। ऐसे ही ‘घोंघार् धीरे-धीरे चल रहार् है’ क अंग्रेजी अनुवार्द ‘Snail is slowly slowly creeping.’ न होकर ‘Snail is creeping slowly’ होगार्। कहने की ज़रूरत नहीं कि हिन्दी वार्रि भार्षार् की संरचनार् ‘कर्तार् + कर्म + क्रियार् विशेषण + क्रियार्’ नियम पर आधार्रित होती है, जबकि अंग्रेजी भार्षार् की संरचनार् ‘कर्तार् + कर्म + क्रियार् + क्रियार् विशेषण’ नियम पर।

इस प्रकार हम देखते हैं कि अनुवार्द क भार्षार्विज्ञार्न, ख़ार्सकर अनुप्रयुक्त भार्षार्विज्ञार्न एवं व्यतिरेकी भार्षार्विज्ञार्न से बहुत गहरार् सम्बन्ध है। हर अनुवार्दक को भार्षविज्ञार्न के इन नियमों की जार्नकारी होनार् ज़रूरी है, अन्यथार् वह सही और साथक अनुवार्द कर ही नहीं सकतार्। 

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