1789 की फ्रार्ंसीसी क्रार्ंति- कारण, विकास एवं प्रभार्व

18वीं शतार्ब्दी के आरंभ में 1715 र्इ. में लुर्इ चतुर्दश की मृत्यु उपरार्ंत उसक पुत्र लुर्इ पंद्रहवें के नार्म से फ्रार्ंस के रार्ज्य सिंहार्सन पर बैठार्। उसके शार्सनकाल में दिन प्रतिदिन देश क पतन होतार् चलार् गयार्। जिसके कारण लुर्इ पंद्रहवें क शार्सनकाल अरार्जकतार्, अव्यवस्थार्, अशार्ंति ओर अभार्वों क युग कहलार्तार् है। उस समय फ्रार्ंस में सर्वत्र बेकारी, व्यार्पार्रिक शिथिलतार्, धन-धार्न्य क अभार्व और दरिद्रतार् क प्रभार्व दृष्टिगोचर होतार् थार्। रार्जार्, रार्जमहल और शार्सन-संबंधी कार्यों को ऋण लेकर चलार्यार् जार् रहार् थार्। रार्जकोश रिक्त पड़ार् थार् और रार्जकीय आय-व्यय से कम हो गर्इ थी। उस काल की फ्रार्ंस की सार्मार्न्य दशार् क वर्णन निम्न प्रकार है-

फ्रार्ंस की रार्जनीतिक दशार्

18वीं शतार्ब्दी में केवल फ्रार्ंस ही नहीं संपूर्ण यूरोप की रार्जनीतिक व्यवस्थार् कुलीनतंत्रार्त्मक थी। रार्ज्य की संपूर्ण शक्ति कुछ थोड़े से उच्चवंशीय कुलीनों के हार्थ में थी। मंत्री, उच्च पदार्धिकारी, सेनार्पति, प्रभार्वशार्ली सैनिक अफसर, न्यार्यार्धीश, प्रार्न्तीय शार्सक सब उच्चवंशीय कुलीनों में से ही नियुक्त किये जार्ते थे। रार्जकीय नियम और कानून बनार्ते समय कुलीनों के हित क सबसे अधिक ध्यार्न रखार् जार्तार् थार्। वे सदैव अपनी ओर अपने अन्य कुलीनवंशीय सार्थियों की स्वाथ पूर्ति में व्यस्त रहते थे। जनसार्धार्रण को देश के शार्सन में कोर्इ भार्ग नहीं लेने दियार् जार्तार् थार्।

1774 र्इ. में लुर्इ पंद्रहवे की मृत्यु हो गर्इ ओर उनक पुत्र लुइर् सोलहवे के नार्म से फ्रार्सं क शार्सक बनार्। वह सार्धार्रण जनतार् क हित चार्हतार् थार्, परंतु आत्म-विशवार्स, दृढ़तार् और स्थिरतार् की कमी के कारण वह इस दिशार् में कुछ नहीं कर सका। वह निरंकुश होते हुए भी सार्मन्तों और पार्दरियों के हार्थ में कठपुतली बनार् हुआ थार्। उस समय फ्रार्ंस में कोर्इ विधार्न नहीं थार् तथार् देश के विभिन्न प्रार्ंतों के शार्सन में अत्यार्धिक अंतर थार्। कुछ प्रार्ंतों को अधिक सुविधार्एं उपलब्ध थीं, जब कि अन्य प्रार्ंतों को अधिक कर देनार् पड़तार् थार् और प्रशार्सनिक कठोरतार् को भी सहन करनार् पड़तार् थार्। शार्सन-प्रबंध भिन्न-भिन्न प्रकार की परम्परार्ओं, नियमों और नीतियों पर आधार्रित थार्। चर्च क रार्ज्य पर विशेश रूप से प्रभार्व स्थार्पित थार्। रार्जार् यद्यपि कैथोलिक मतार्नुयार्यी थार्, परंतु अन्य धर्मार्वलंबियों के सार्थ भी उसक व्यवहार्र सहनशीलतार् से परिपूर्ण थार्। देश की एकमार्त्र विधार्नसभार् स्टेटस जनरल थी, जिसक 1614 र्इ. से कोर्इ अधिवेशन नहीं हुआ थार्। फ्रार्ँसीसी जनतार् नवीन संविधार्न की इच्छुक थी और उसके द्वार्रार् सुख, शार्न्ति और समृद्धि की प्रार्प्ति की अभिलार्शिणी थी। फ्रार्सीसी व्यक्तियों के विचार्र में फ्रार्सं क संविधार्न इस प्रकार क हलवार् थार्, जिसे जब भी इच्छार् हो तैयार्र कियार् जार् सके। रार्जार् ने नेकर नार्म दरबार्री को अपनार् अर्थमंत्री नियुक्त कियार्। उसने आर्थिक सुधार्र के लिए एक योजनार् तैयार्र की जिसे रार्जार् के दरबार्रियों और स्वाथी कुलीनों ने अस्वीकार कर दियार्। लुर्इ सोहलवें ने नेकर को उसके पद से पृथक कर दियार्। उस समय स्टेटस जनरल के तीन सदन थे। प्रथम सदन में कुलीनों के तीन सौ सदस्यों के लिए स्थार्न थार्। दूसरे सदन में पार्दरी वर्ग के 300 प्रतिनिधि बैठते थे। तृतीय सदन सार्धार्रण जनतार् क प्रतिनिधित्व करतार् थार्। इसकी सदस्य संख्यार् यद्यपि प्रथम और द्वितीय सदनों की सम्मिलित सदस्य संख्यार् से अधिक होनी चार्हिए थी, परंतु 300 ही थी। इस सभार् के पार्स कोर्इ वार्स्तविक अधिकार नहीं थार्। वह केवल रार्जार् को प्रशार्सनिक कार्यों में परार्मर्श दे सकती थी। रार्जार् उन परार्मर्शों की स्वीकृत अथवार् अस्वीकृत कर सकतार् थार्। यद्यपि शार्सन की शक्ति केन्द्र में स्थित थी, परंतु रार्जार् की अस्थिरतार् के कारण उसे दृढ़तार् से प्रार्प्त नहीं थी। इस प्रकार लुर्इ सोहलवार्ँ उस काल की स्थिति में शार्सन संचार्लन की योग्यतार् से वंचित थार्। देश में असंतोष, अव्यवस्थार् और अरार्जकतार् क प्रसार्र थार्।

फ्रार्ंस की सार्मार्जिक दशार्

16वीं शतार्ब्दी में फ्रार्ंसीसी समार्ज तीन वर्गों में विभिक्त थार्। प्रथम वर्ग कुलीनों का, दूसरार् वर्ग पार्दरियों क और तीसरार् वर्ग सार्धार्रण जनतार् क थार्। तीनों वर्गों में प्रथम दो वर्ग शक्तिसम्पन्न और विशेशार्धिकार प्रार्प्त प्रभार्वशार्ली वर्ग थे। इन्हें रार्जकीय करों की अदार्यगी नहीं करनी पड़ती थी। तीसरार् वर्ग सार्धार्रण जनतार् क थार्। रार्जकीय करों क संपूर्ण भार्र इसी वर्ग को वहन करनार् पड़तार् थार्। इतिहार्सकारों ने उस काल की स्थिति क वर्णन इस प्रकार कियार् है-कुलीन युद्ध करते हैं, पार्दरी र्इशवर की पूजार् करते हैं और जनतार् करों की अदार्यगी करती है। जो व्यक्ति जितनार् अधिक धनवार्न होतार् थार् उसे उतने ही कम कर सरकार को देने पड़ते थे। इस प्रकार उस समय के समार्ज के वर्गों में अमीर-गरीब, अधिकारों और स्थिति के आधार्र पर बहुत अधिक अंतर थार्।

  1. कुलीन वर्ग – उस काल के यूरोपीय समार्ज में कुलार्नों और सार्मंतों के अधिकार असीम और प्रभार्व बहुत अधिक थे। उन्हें रार्जपरिवार्र के बार्द समार्ज के सबसे ऊँचार् स्थार्न प्रार्प्त थार्। रार्ज्य, सेनार् और चर्च के सभी ऊँचे-ऊँचे पद इन्हीं को प्रार्प्त थे। इन पदों को ऊँची बोली पर नीलार्म कियार् जार्तार् थार्। रार्ज्य की अधिकांश भूमि इन्हीं कुलीनों में विभक्त थी। ये लोग अपनी जमींदार्री में कृशकों से तरह-तरह के कर वसूल करते, नजरार्ने खेते, भेंट करते तथार् बेगार्र लेते थे। कृशकों को सप्तार्ह में कर्इ दिन इनकी भूमि बेगार्र में जोतनी पड़ती थी। कुलीन सार्मंतों के लिए विशार्ल शिकारगार्ह बने थे। शिकारगार्हों में तरह-तरह के जंगली पशु भार्री संख्यार् में रहते थे। जंगली पशु कृशकों के खेतों को हार्नि पहंचु ार्ते रहते थे, परंतु कृशक उन्हें खेतों से भगार् नहीं सकते थे।
  2. पार्दरी वर्ग – कुलीनों की भार्ँति पार्दरियों को भी विशेषार्धिकार मिले हुए थे। इन लोगो में भी दो श्रेणियार्ं थी। प्रथम श्रेणी के पार्दरी कुलीनों और सार्मंतों की संतार्न थे। चर्च से इन्हें लार्खार्ंे रुपये वाशिक की आय थी। ये भी कुलीनों की तरह रार्जसी ठार्ठ-बार्ट से जीवन व्यतीत करते थे। इनक संपूर्ण समय रार्ग-रंग में व्यतीत होतार् थार्। धामिक कार्यों को संपन्न करने में इनकी रुचि नहीं थी। बड़े पार्दरियों में से कुछ ऐसे भी थे जिनक र्इशवर के अस्तित्व में विशवार्स नहीं थार्। इसी कारण से लुर्इ सोलहवंे ने पेिरस के आर्कबिशप की नियुक्ति करते समय कहार् थार् कि हमें कम से कम फ्रार्ँस की रार्जधार्नी में तो र्इशवर में आस्थार् रखने वार्ले पार्दरी को नियुक्त करनार् चार्हिए। सभी प्रकार की धामिक क्रियार्एं दूसरी श्रेणी के पार्दरियों को करनी पड़ती थी। ये छोटे पार्दरी कहलार्ते थे। इन्है। सार्धार्रण वर्ग में से नियुक्त कियार् जार्तार् थार् तथार् 25 पौंड वाशिक वेतन दियार् जार्तार् थार्। कम वेतन के कारण ये लोग भिक्षुओं जैसार् जीवन बितार्त थे। 
  3. सार्धार्रण वर्ग- इस वर्ग में कृशक मजदूर, कारीगर, शिल्पकार और दुकानदार्र आदि सम्मिलित थे। यूरोपीय जनसंख्यार् क 85 प्रतिशत से भी अधिक भार्ग सार्धार्रण वर्ग क थार्। इसमें लगभग 25 लार्ख शिल्पी, दस लार्ख अर्द्धदार्स कृशक और दो करोड़ कृशक थे। उन्हें रहने के लिए मकान, खार्ने के लिए भोजन और तन ढकने के लिए कपड़े तक क अभार्व थार्। इन पर करों क भार्री भार्र लदार् थार्। अत: अपनी जमींदार्रों और चर्च तीनों को अलग-अलग कर देने पड़ते थे। कृशकों की अपनी संपूर्ण आय क 80 प्रतिशत से अधिक करों के रूप में देनार् पड़तार् थार्। अत: अपनी आवश्यकतार्ओं की पूर्ति के लिए उनके पार्स बहतु कम धन बच पार्तार् थार्। अर्द्धदार्स कृषकों को अपनी अनार्ज और मुर्गियार्ँ तक जमींदार्र को देनी पड़ती थीं और सप्तार्ह में लगभग छह दिन तक जमीदार्र के खते ों में काम करनार् पड़तार् थार्। स्वतंत्र कृशकों को इन सबके बदले नार्म कीट रेटं नार्मक कर देनार् पड़तार् थार्। कृशक की मृत्यु हो जार्ने पर उसकी संतार्न को दुगनार् कर देनार् पड़तार् थार्। उन्हें चर्च को भी अपनी उपज क दसवार्ं भार्ग देनार् पड़तार् थार्। अपने खेतों की उपज पर उन्हें सड़कों और पुलों के लिए टार्ले टैक्स तथार् तरह -तरह की चंुि गयार्ँ देनी पड़ती थी। सड़कों की मरम्मत तो उन्हें ही करनी पड़ती थी। सरकारी करों क भार्री बोझ भी उन्है। ही सहन करनार् पड़तार् थार्। नगरों में कारीगरों और श्रमिकों की दशार् अच्छी नहीं थी। व्यार्पार्रिक संस्थार्ओं क उन पर नियंत्रण थार्। वे ही उनके काम के घंटों, छुट्टियों और वते न आदि क निधार ण करती थी। श्रमिकों क जीवन स्तर सबसे नीचार् थार्। सार्धार्रण वर्ग में सबसे श्रेश्ठ जीवन व्यार्पार्रियों क थार्। उनके पार्स धन सम्पित्त के भण्डार्र भरपूर थे। वे रार्जार् तथार् कुलीनों को ऋण देते थे।
  4. मध्यम वर्ग – पढ़े लिखे व्यक्तियो, डॉक्टरों, दार्शर्निकों, वकीलों, लेखकों, कवियों और क्लकों आदि क एक अन्य वर्ग थार् जो मध्यम वर्ग के नार्म से प्रसिद्ध थार्। इनक रहन-सहन ग्रार्मीण कृशकों और बार्हर के शिल्पियों तथार् कारीगरों से बहे तर थार् किन्तु इन्है। समार्ज और शार्सन दोनो में उपयुक्त स्थार्न प्रार्प्त नहीं थार्।

फ्रार्ंस की आर्थिक दशार्

1789 र्इ. फ्रार्ँसीसी रार्ज्यक्रार्ंति से पूर्व फ्रार्ंस की आर्थिक दशार् अव्यवस्थित और अस्त-व्यस्त थी। करों में समार्नतार् नहीं थी। सार्मंतों और जार्गीरदार्रों की संख्यार् कम होते हुए भी देश की चौथाइ भूमि पर उन्हीं क अधिकार थार्। उन्हें रार्जकीय कर नहीं देने पड़ते थे। उन्हीं की तरह पार्दरियों ने भी देश की कुल भूिम के पार्ँचवे भार्ग पर अधिकार जमार् रखार् थार्। उन्हें भी रार्जकीय करों से मुक्त रखार् गयार् थार्। इस पक्रार्र रार्ज्य की आय बहुत कम रह गयी थी, परंतु रार्ज्य क व्यय बहतु बढ़ार् हुआ थार्। आय से बढे़ व्यय की पूर्ति ऋण लेकर की जार्ती थी। देश क वार्णिज्य व्यवसार्य भी उन्नत नहीं थार्। देश के भिन्न-भिन्न स्थार्नों पर चुंगी और टार्ले टैक्स की दरों में बहुत अधिक अंतर थार्। कारीगरों को जितनार् कठोर परिश्रम करनार् पड़तार् थार् उतनार् परिश्रमिक उन्हें नहीं मिलतार् थार्। कठार्रे नियमों के बने होने के कारण ये लोग किसी प्रकार क आंदोलन भी नहीं कर सकते थे। इन्हीं कठिनाइयों के कारण व्यार्पार्रिक मार्ल क उत्पार्दन अधिक नहीं हो पार्तार् थार्, जिससे रार्ष्ट्रीय आय के उद्यार्गे -धंधार्ं े और व्यार्पार्र तथार् व्यवसार्य में वृद्धि नहीं हो रही थी।

रार्जार् की आय और रार्ज्य की आय में कोर्इ अंतर नहीं मार्नार् जार्तार् थार्। रार्जार्, रार्जपरिवार्र के सदस्य, दरबार्री और रार्जार् के मुंह लगे मित्र रार्ज्यकोश में रुपयार् आते ही व्यय कर डार्लते थे। बजट बनार्नार् और आय-व्यय क हिसार्ब रखनार् कोर्इ नहीं जार्नतार् थार् और न इसके लिए किसी प्रकार क प्रयार्स ही कियार् जार्तार् थार्। अत: रार्ज्य की आय-व्यय और आर्थिक स्थिति क किसी को भी ठीक-ठीक ज्ञार्न नहीं थार्। अत: उस काल की सबसे प्रधार्न समस्यार् यह थी कि रार्ज्य की अर्थव्यवस्थार् किन सार्धनों से ठीक की जार्ए ?

उस समय आर्थिक दशार् सुधार्रने के लिए केवल दो उपार्य ही शेश रह गये थे। प्रथम रार्ज्य दरबार्र के भार्री अपव्यय को यथार्संभव कम करनार्। दूसरे कुलीनों और पार्दरियों पर कर लगार्नार्। लुर्इ सोलहवें ने इसके लिए तुर्गों को वित्त मंत्री बनार्यार्। किन्तु तुर्गों की मितव्ययी योजनार् क रार्नी और दरबार्रियों ने भार्री विरोध कियार्, जिसके कारण लुर्इ सोहलवें ने तुर्कों को मंत्रीपद से पृथक करनार् पड़ार्।

1789 की फ्रार्ंसीसी क्रार्न्ति के कारण

फ्रार्ंस की रार्ज्यक्रार्ंति के प्रधार्न कारणों की व्यार्ख्यार् निम्न प्रकार की जार् सकती है- (अ) रार्जनीतिक (ब) सार्मार्जिक (स) बौद्धिक (द) आर्थिक (इ) नवीन करों की अस्वीकृति एवं अकाल (फ) अमेरिकी स्वतंत्रतार् संग्रार्म क प्रभार्व।

(अ) रार्जनीतिक कारण – 

फ्रार्ंस की रार्ज्य क्रार्ंति के रार्जनीतिक कारणों को नीचे दिए शीर्शकों में व्यक्त कियार् जार् सकतार् है-

  1. प्रशार्सनिक अव्यवस्थार्-फ्रार्सं के शार्सन में व्यवस्थार् क नार्म तक नहीं रहार् थार्। यार्ग्े य, अयार्ग्े य क विचार्र नहीं करते हुए रार्ज्य के सभी महत्वपूर्ण पदों को नीलार्म कियार् जार्तार् थार्। पदार्धिकारियों के अधिकारों और शक्ति की काइेर् सीमार् नहीं थी। उन्हें अपने अधिकारों क प्रार्य: ज्ञार्न तक नहीं थार्। प्रत्येक प्रार्ंत में रार्ज्यपार्ल तो होतार् थार्, परंतु बहुत से ऐसे भी प्रार्ंत थे, जिनमें कौसिलें नहीं थी।ं सभी नगरों में नगर सभार् बनी थी, परंतु उनमें से कोर्इ भी दो नगर सभार्ओं के नियम और निर्वार्चन प्रणार्ली समार्न नहीं थीं। भिन्न-भिन्न प्रार्ंतों में विविध प्रकार के कानून प्रचलित थे। एक नगर में जो बार्त नियमार्कूल मार्नी जार्ती थी वहीं बार्त समीप के किसी दूसरे नगर में गैरकानूनी समझी जार्ती थी। देश के लिए एक संविधार्न नहीं थार्। 
  2. प्रशार्सन में कुशलतार् क अभार्व-फ्रार्ंस के शार्सकों में कोर्इ भी शार्सक ऐसार् नहीं हुआ जो शक्तिशार्ली, सुयोग्य और कुशल हो। अत: फ्रार्ंस की जो प्रतिश्ठार् लुर्इ चतुर्दश के शार्सनकाल में भी वह इस काल में केवल स्वप्न बन कर रह गयी। 
  3. शार्सकों की निरंकुशतार्-इस काल में रार्जार् की निरंकुशतार् की कोर्इ सीमार् नहीं रही थी। उसकी इच्छार् ही कानून थी। स्टेट्स जनरल क अधिवेशन पिछले डेढ़ सौ वर्शों से अधिक समय से नहीं बुलार्यार् गयार् थार्। जन सार्धार्रण को किसी प्रकार के- अधिकार प्रार्प्त नहीं थे। सार्धार्रण वर्ग के व्यक्तियों को बिनार् मुकदमार् चलार्ये ही बंदीखार्ने में डार्ल दियार् जार्तार् थार्। रार्जार् के कृपार् पार्त्रों के पार्स छपे हुए आदेश-पत्र रहते थे, जिनमें वे अपने विरोधी क नार्म लिख कर पुलिस चौकी पर दे देते थे। पुलिस उस व्यक्ति को पकड़ कर जेल भेज देती थी। देश भर में न कोर्इ अपने विचार्र स्वतंत्रतार् के सार्थ प्रगट कर सकतार् थार् और न कोर्इ व्यक्ति भार्शण दे सकतार् थार्। अत: जनतार् क्रार्ंति के लिए उत्सुक हो उठी थी। 
  4. अपव्यय- रार्जदरबार्र क व्यय, अपव्यय क रूप धार्रण कर चुक थार्। रार्ज्य की संपूर्ण आय रार्जार्, रार्नी और दरबार्रियों की विलार्सितार् पर व्यय कर दी जार्ती थी। रार्जमहल में रार्जार् की सेवार् के लिए 1600 सेवक और महार्रार्नी की नौकरी में पार्ँच सौ दार्सियार्ँ नियुक्त थीं। रार्जार् की घुड़सार्ल में 18 सौ घोड़े और दो सौ गार्ड़ियार्ँ थीं। रार्जमहल क वाशिक व्यय बार्रह करोड़ रुपये से कम नहीं थार्। रार्जार् और रार्नी अपने कृपार्पार्त्रों को अपार्र धन रार्शि पुरस्कार के रूप में देते रहते थे। इस प्रकार के भार्री अपव्यय ने रार्जकोश खार्ली कर दियार्। 
  5. करों की अधिकतार्- रार्ज्य के संपूर्ण करों क भार्री भार्र सार्धार्रण जनतार् को ही वहन करनार् पड़ रहार् थार्। कुलीनों और पार्दरियों को विशेषार्धिकार प्रार्प्त थे, जिनके कारण उन्हें किसी प्रकार क कर देनार् नहीं पड़तार् थार्। कृशकों को रार्ज्य, जमींदार्रों और चर्च को इतने प्रकार के कर देने पड़ते थे कि उनकी आय क 85 प्रतिशत से भी अधिक भार्ग उन करों के भुगतार्न में व्यय हो जार्तार् थार्। किसार्नों को आय-कर भी देनार् पड़तार् थार्, जो कृशक के घर-बार्र आदि को देखकर लगार्यार् जार्तार् थार्। इन भार्री करों के कारण जनतार् में रार्जार् और रार्ज्य के प्रति असंतोश बढ़तार् जार् रहार् थार्। इस असंतोश ने ही आगे चलकर क्रार्ंति क विस्फोट कर डार्लार्। 
  6. न्यार्यार्लयों के अधिकार- उस काल के फ्रार्ंस में न्यार्यार्लयों की संख्यार् 17 थी। इनमें से प्रत्येक न्यार्यार्लय में एक रजिस्टर कानून लिखने के लिए होतार् थार्। रार्जार् के बनार्ये कानून इस रजिस्टर में लिखे जार्ते थे। इसके बार्द उन कानूनों पर अमल कियार् जार्तार् थार्। फ्रार्सं के उन नयार्यार्लयों के क्षत्रेों में लगभग 400 तरह के कानून प्रचलित थे। इन कानूनों के अनुसार्र जो बार्त एक स्थार्न पर नियमार्नुकूल थी। वही दूसरे क्षेत्र में गैर-कानूनी थी। न्यार्यार्धीश यदि किसी कानून को अनुचित समझतार् थार् तो उसे रजिस्टर में लिखकर उसे रार्जार् की सेवार् में एक प्राथनार्-पत्र भेज देतार् थार् तथार् प्राथनार्-पत्र की प्रतियार्ँ प्रकाशित करार् कर उन्हें जनतार् में वितरित कर देतार् थार्। रार्जार् प्राथनार्-पत्र मिलने पर कानून में कुछ संशोधन कर देतार् थार् यार् फिर कानून को वार्पस मगार् लेतार् थार् यार् न्यार्यार्लयों के अधिकारियों को बुलार्कर उन्हें कानून रजिस्टर में दर्ज करार्ने आदेश देतार् थार्, जिससे यह कानून रजिस्टर में दर्ज करार् लियार् जार्तार् थार्। परंतु न्यार्यार्धीश उस कानून पर अमल नहीं करते थे। इस तरह वह कानून केवल रजिस्टर में ही लिखार् रह जार्तार् थार्। एसेी स्थिति उत्पन्न होने पर विद्वार्नों में कानून की बुराइयों और दोषों के संबंध में बहस होने लगती थी। जनतार् की इस मनोवृत्त ने भी क्रार्ंति क विस्फोट करार्ने में पर्यार्प्त सहयोग प्रदार्न कियार् थार्। 
  7. रार्जार् की अस्थिरतार्- रार्जार् के स्वभार्वकी अस्थिरतार् और डरपोक स्वभार्व के कारण शार्सन में भ्रष्टार्चार्र और अव्यवस्थार् उत्पन्न हो गर्इ थी। इतिहार्सकारों ने लिखार् है कि लुर्इ सोलहवार्ं रार्जमुकुट धार्रण करने वार्ले व्यक्तियों में सबसे निम्न काेिट क थार्। उसमें प्रशार्सनिक कार्यों के प्रति रुचि क पूर्ण रूप से अभार्व थार्। शिकार खेलने, तार्ले बनार्ने और नार्टक खेलने में उसक मन अधिक लगतार् थार्। वह बड़ी सफलतार् के सार्थ दरबार्रियों और रार्नी के बहकावे में आ जार्तार् थार् और अंत:करण से जनतार् की भलार्यी चार्हते हुए भी उपयुक्त सुधार्रों को लार्गू करने में असमर्थ रहतार् थार्। अत: उसकी अस्थिरतार् ने फ्रार्ंस को धीरे-धीरे क्रार्ंति की रक्तपतार् पूर्ण भÍी में झार्ंके दियार्। 
  8. रार्नी क चरित्र- लुर्इ सोलहवे की रार्नी आस्ट्रियार् की रार्जकुमार्री होने के कारण फ्रार्ँस के लिए एक विदेशी महिलार् थी। फ्रार्ँसीसी जनतार् उसे घृणार्पूर्वक ‘‘आस्ट्रियन औरत’’ कहार् करती थी। वह अति सुंदर, सुसंस्कृत, सभ्य और सुदृढ़ विचार्रों की युवती थी। उसके स्वभार्व में एशवर्य और विलार्स की मार्त्रार् अधिक थी। रार्जार् लुर्इ सोलहवे पर उसक बहुत अधिक प्रभार्व थार्। वह अपने हर प्रकार के कार्य करार् लेती थी। रार्ज-काज में अवरोध उत्पन्न करनार् उसक प्रमुख कार्य बन गयार् थार्। देश की आर्थिक स्थिति बिगड़ने पर भी वह अपने कृपार्पार्त्रों को पुरस्कृत करती रहती थी। इसलिए फ्रार्ंसीसी जनतार् उससे घृणार् करती थी।

(ब) सार्मार्जिक कारण

फ्रार्ँस की रार्ज्यक्रार्ंति क दूसरार् प्रधार्न कारण समार्ज में फैली हुर्इ असमार्नतार् थी। फ्रार्ंसीसी समार्ज उस समय दो प्रमुख वर्गों में विभार्जित थार्। प्रथम वर्ग विशेषार्धिकार वार्ले कुलीनो, सार्मंतों और उच्च पार्दरियों से बनार् थार्। इन्हें रार्जार् को किसी प्रकार क कर नहीं देनार् पड़तार् थार्। दूसरार् वर्ग श्रमिकों, कृशको, छोटे-छोटे कर्मचार्रियो, शिल्पियों, व्यार्पार्रियों, दुकानदार्रों और वकील, डॉक्टर, दार्शर्निक, लेखक आदि मध्यम स्थिति के व्यक्तियों से निर्मित थार्। इन सभी व्यक्तियार्ं े को रार्ज्य, चर्च और जमींदार्रों को भार्री कर देने पड़ते थे। इन करों के कारण उनमें हर समय रार्ज्य के प्रति असंतोष रहतार् थार्। यही असंतोश आगे चलकर क्रार्ंति के विस्फोट क बन गयार् थार्।

विशेशार्धिकार प्रार्प्त वर्ग में कुलीन और उच्च पार्दरी सम्मिलित थे। दोनों की सम्मिलित संख्यार् लगभग 2 लार्ख सत्तर हजार्र थी जो फ्रार्ँस की संपूर्ण जनसंख्यार् क एक प्रतिशत से भी कम थार्। इतनार् होते हुए रार्ज्य के सभी उच्च पदों और भूमि के अधिकाश भार्ग पर उन्हीं क अधिकार थार्। सार्ंमतों ने अपनी-अपनी जार्गीरों में आटार् पीसने की चक्की और शरार्ब की भÍियार्ँ लगार् रखी ं थी तथार् तंदूर खार्ले रखे थे। जार्गीर में रहने वार्ले सभी व्यक्तियों को टैक्स देकर भÍियों पर अंगूर की शरार्ब बनवार्नी, चक्की पर आटार् पिसवार्नार् और तंदूर पर रोटी पकवार्नी पड़ती थी। जार्गीरदार्र कृशकों से उनके मार्ल पर चुंगी तथार् पुलों पर रोटी टैक्स वसूल करते थे। उनकी शिकारगार्हों में जंगली जार्नवर और सार्मंतों के पार्लतु पशु रहते थे जो कृशकों के खेतों को उजार्ड़ते रहते थे। बचे ार्रे कृशकों को यह हार्नि चुपचार्प सहन करनी पड़ती थी। सार्धरण वर्ग के व्यक्तियार्ंे को कुलीनों और पार्दरियों के विशेषार्धिकार असहनीय हो गए थे। अत: उनक असंतोश ही धीरे-धीरे क्रार्ंति क विस्फोट करने के लिए चिंगार्री क काम करने लगार्। चर्च में भी असमार्नतार् और पक्षपार्त क बार्ले वार्लार् थार्। चर्च के तीन उच्च पदों पर कुलीनों के छोटे पुत्रों की नियुक्ति की जार्ती थी। वे चर्च के तीस करोड़ रुपये वाशिक की आय और लंबी अवधि में एकत्रित की गइर् सम्पित्त क उपभोग करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र थे। उन्हें भी रार्ज्य को किसी प्रकार के कर नहीं देने पड़ते थे। वे अपनार् अधिकांश समय भोग-विलार्स और रार्जदरबार्र के शड़यत्रों में व्यतीत करते थे। धामिक क्रियार्कलार्प और पूजार्-पार्ठ में उनकी रुचि नहीं थी। छोटे-छोटे पार्दरी सार्धार्रण वर्ग के कृशकों में से नियुक्त किये जार्ते थे। उन्है। चर्च से प्रति व्यक्ति केवल 25 पौंड वाशिक ही मिलतार् थार्। अत: उन्हें भी अपनार् और अपने परिवार्र क जीवन चलार्ने में असहनीय कश्ट सहन करने पड़ते थे। सार्धार्रण वर्ग के समार्न ही छोटे-छोटे पार्दरियों में भी शार्सनतंत्र के प्रति भार्री असंतोश थार्, इसीलिए क्रार्ंति क आरंभ होने पर इन्होंने सार्धार्रण वर्ग को अपनार् पूर्ण सहयोग प्रदार्न कियार् थार्। समार्ज में कृशकों की संख्यार् सबसे अधिक थी। संपूर्ण जनसंख्यार् क 80 प्रतिशत इन्हीं से निर्मित थार्। इनकी कुल संख्यार् 2 करोड़ से भी अधिक थी। करों और टैक्सों क संपण्ूर् ार् भार्र इन्हीं के कंधों पर थार्। रार्ज्य के अतिरिक्त इन्है। चर्च को धर्म कर अपनी उपज के दसवें भार्ग से बीसवें भार्ग तक तथार् जार्गीरदार्रों को तरह-तरह के कर देने पड़ते थे। उसे भंटे , टार्ले टेक्स, नजरार्ने आदि के रूप में सदैव कुछ न कुछ देते रहनार् पड़तार् थार्। इस पक्र ार्र उसकी आय क 85 प्रतिशत से भी अधिक करों के रूप में निकल जार्तार् थार्। शश्े ार् 15 प्रतिशत से भी कम से उन्हें अपनार् और अपने परिवार्र क पार्लन-पार्श्े ार्ण करनार् पड़तार् थार्। इसी कारण उस समय की प्रचलित रार्ज्य-व्यवस्थार् के प्रति असंतोश की गहरी मार्त्रार् सार्धार्रण वर्ग में विद्यमार्न थी और क्रार्ंति आरंभ होने पर इन्हार्ंने उसमें सबसे अधिक भार्ग लियार् थार्।

(स) बौद्धिक कारण

फ्रार्ँस की उस अव्यवस्थार् में फ्रार्ँसीसी दार्शर्निक और विचार्रकों ने रार्जनीतिक ओर सार्मार्जिक त्रुटियों क जनतार् को ज्ञार्न करार्कर उसके हृदय में कुलीनो, सार्मंतों और उच्च पार्दरी वर्ग के विरूद्ध घृणार्, असंतोश और विद्रोह की भार्वनार्ओं को जार्गृत करके तीव्रतार् प्रदार्न की थी। अत: यह कहनार् अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सभी प्रकार के दार्शर्निकों और लेखकों ने फ्रार्ँसीसी क्रार्ंति के विस्फार्टे में अपनार् पूरी तरह सहयोग प्रदार्न कियार्।

मॉन्टेस्क्यू ने रार्जार् के दैवीय अधिकारों की सत्यतार् को चुनौती देकर सिद्ध कर दियार् कि रार्जार् जनतार् द्वार्रार् निर्वार्चित व्यक्ति होने के कारण अपनी इच्छार् को कानून क रूप प्रदार्न नहीं कर सकतार्। अस्तु देश में इंग्लैण्ड के समार्न वैद्य रार्ज सत्तार् की स्थार्पनार् की जार्नी चार्हिए। वार्ल्तेयर ने अपने निदार्त्मक लेखों और भार्षार्ओं द्वार्रार् रार्जार् और चर्च के हठधर्मी तथार् उच्च पार्दरियों की धर्म के प्रति अश्रद्धार् क जनतार् को परिचय करार्यार्।

रूसो ने अपनी पुस्तक ‘‘सार्मार्जिक समझौतार्’’ द्वार्रार् सिद्ध कियार् कि फ्रार्सं के शार्सकों ने अपनी मूर्खतार् और अत्यार्चार्रों द्वार्रार् जनतार् को क्रार्ंति के लिए उत्तेजनार् प्रदार्न की है। उसने मार्नव अधिकारों की व्यार्ख्यार् करते हुए लोकतंत्र प्रणार्ली को शार्सन की सर्वोत्त्ार्म प्रणार्ली प्रगट कियार् तथार् रार्जार् को जनतार् द्वार्रार् निर्वार्चित व्यक्ति सिद्ध करते हुए उसकी स्थिरतार् क आधार्र प्रजार् की सद्भार्वनार् प्रगट कियार्। क्वसे ने ने व्यार्पार्रिक मार्ल पर चंगुी लेनार् अनियमित बतार्ते हुए उसे हटार्ने क परार्मर्श दियार्। इस तरह दार्शर्निको, लेखकों और विचार्रकों ने देश की प्रार्चीन शार्सन व्यवस्थार् के दोषों क जनतार् को ज्ञार्न करार् कर उन्हें उन बुरार्इयार्ंे को दूर करने के लिए क्रार्ँति क आह्वार्न करने की प्रेरणार् प्रदार्न की।

(द) आर्थिक कारण

रार्ज्यक्रार्ंति क एक प्रधार्न कारण फ्रार्ँस की आर्थिक दशार् में दोष उत्पन्न होनार् थार्। लुर्इ 14वें के काल में अनेक युद्ध लड़े गये जिनके कारण देश ऋण के भार्री भार्र में दब गयार्। तत्पश्चार्त उसने तीस करोड़ रुपयार् व्यय करके पेरिस से 12 मील दूर वर्सार्य नार्म क एक रार्जप्रसार्द तैयार्र करार्यार् जो शार्न-शौकत और सुंदरतार् में अनुपम थार्। इसकी शार्न शौकत स्थिर रखने में लगभग 12 करोड़ रुपयार् वाशिक व्यय होतार् रहतार् थार्। लुर्इ पंद्रहवंे के काल में अपव्यय में वृद्धि होने, सप्तवश्र्ार्ीय युद्ध में फ्रार्सं के सम्मिलित होने और शार्सन व्यवस्थार् बिगड़ जार्ने से व्यय की मार्त्रार् आय से अधिक हो गयी और प्रतिवर्ष घार्टार् होने लगार्। इस घार्ट को नये-नये ऋण लेकर पूरार् करनार् पड़ार्।

लुर्इ 16वें के शार्सन के अंतर्गत आर्थिक स्थिति इतनी विकृत हो चुकी थी कि उसमें सुधार्र करनार् उस समय क सबसे प्रधार्न कार्य बन गयार्। आर्थिक दशार् तब सुधर सकती थी, जब विशेशार्धिकार प्रार्प्त वर्ग पर कर लगार्ये जार्यें तथार् अपव्यय को कम कियार् जार्य।े ये दोनो कार्य कुलीनों और उच्च पार्दरियों के स्वाथ के विरूद्ध थे। अत: उन्होंने महार्रार्नी की आड़ लेकर सुधार्रों क उग्रतार् के सार्थ विरोध कियार्। लुर्इ 16 वें ने अपने मंत्रिमंडल में तुर्गों और नेकर को सम्मिलित करके बार्री-बार्री से वित्त मंत्री नियुक्त कियार्। परंतु स्वाथी दरबार्रियों के विरोध के कारण तुर्गों और नेकर के सुधार्रों क काइेर् सुखद परिणार्म नहीं निकल सका। अत: लुर्इ सोलहवे को उन्हें एक-एक करके अर्थ मत्री पद से पृथक करनार् पड़ार्। उस काल में फ्रार्सं पर सार्ठ करोड़ डॉलर क ऋण थार्। अत: फ्रार्ंस के दिवार्लियार् होने में कोर्इ कमी नहीं रह गर्इ थी। लुइर् ने विवश होकर 1787 र्इ. में रार्ज्य के प्रमुख व्यक्तियों की सभार् बुलार्यी। सभार् ने कुलीनों और उच्च पार्दरियों पर लगार्ये जार्ने क प्रस्तार्व सभार् में प्रस्तुत कियार्। कुलीनों ने प्रस्तार्व को टार्लने क प्रयत्न कियार् और कहार् कि इस प्रस्तार्व पर केवल रार्ज्य-परिशद ही निर्णय कर सकती है। अब लुर्इ सोहलवें को रार्ज्य-परिशद क अधिवेशन बुलार्नार् पड़ार्। रार्ज्य परिशद को बुलार्नार् ही क्रार्ंति को आमंत्रित करनार् थार्। परिशद के तृतीय वर्ग के सदस्यों ने परिशद में आते ही क्रार्ंति की बार्रूद में चिंगार्री लगार् दी।

1789 की फ्रार्ंसीसी क्रार्न्ति क विकास

क्रार्ंति क प्रार्रंभ

क्रार्ंति के कारणों से स्पष्ट हो जार्तार् है कि लुर्इ 14वें के शार्सनकाल से ही देश की आर्थिक स्थिति बिगड़ने लगी थी और लुर्इ 16वें के शार्सन के आते-आते आर्थिक संकट ने विकरार्ल रूप धार्रण कर लियार् थार्। रार्जार् तथार् दरबार्रियों के खर्च की कोर्इ सीमार् नहीं थी। देश क खजार्नार् बिल्कुल खार्ली हो गयार् थार्। तब लुर्इ 16वें ने परिस्थितियों से विवश होकर देश की आर्थिक स्थिति को सुधार्रने के लिए तुर्गो नार्मक व्यक्ति को वित्त मत्री के पद पर नियुक्त कियार्।

तुर्गो 1774 से 1776 र्इ. तक फ्रार्ंस क वित्त मंत्री रहार् वह सार्हसी एवं प्रतिभार्षार्ली व्यक्ति थार्। उसे अर्थशार्स्त्र क श्रेष्ठ ज्ञार्न थार्। वह व्यार्पार्र के क्षेत्र में मुक्त व्यार्पार्र की नीति क समर्थक थार्। वित्त मंत्री के पद पर आते ही उसने मितव्ययतार् की नीति पर जोर दियार् तथार् घार्टे की पूर्ति के लिए कर पद्धति में समार्नतार् के सिद्धार्तं को लार्गू करने क प्रस्तार्व दियार्। समय के अनुकूल तुर्गो की नीतियार्ँ रार्ष्ट्र के लिए हितकारी थीं किंतु रार्जदरबार्रियों को उसकी नीतियार्ँ सहन नहीं हुर्इ और उन्होंने रार्जार् को तुर्गो के खिलार्फ भड़काकर वित्त मत्री के पद से हटवार् दियार्। यह रार्जार् के चरित्र की सबसे बड़ी दुर्बलतार् थी। यदि तुर्गो अपने पद पर रहतार् ओर उसकी नीतियों को क्रियार्न्वित कियार् गयार् होतार् तो निश्चित रूप से वह फ्रार्ंस को आर्थिक संकट से उबार्र लेतार् किंतु दुर्भार्ग्यवश ऐसार् हो नहीं सका। तुर्गो के पश्चार्त् 1776 र्इ. में नेकर को फ्रार्ंस क वित्त मंत्री बनार्यार् गयार् जो 1781 तक अपने पद पर बनार् रहार्। नेकर एक सुधार्रवार्दी व्यक्ति तथार् जिनेवार् के प्रतिष्ठित बैंक क संचार्लक थार्। वह भी मितव्ययतार् की नीति क समर्थक थार्। देश के आय-व्यय को संतुलित करने के लिए उसने सरकारी खर्चों में कमी करने के प्रयत्न किये किंतु उसकी नीतियार्ँ भी कुलीन एवं मंत्रीगणों को नार्रार्ज करने वार्ली थीं इसीलिए उन्होनें रार्नी की सहार्यतार् से नेकर को अपदस्थ करने के लिए रार्जार् को तैयार्र कर लियार्। फलस्वरूप नेकर ने अपने पद से त्यार्गपत्र दे दियार्।

नेकर के पतन के सार्थ ही रार्जार् के एेिच्छक सुधार्रों क युग समार्प्त हो गयार्। सुधार्रों की चष्े टार् और चेष्टार् की असफलतार् ने क्रार्ंति को तेजी से लार् दियार्। नेकर के पश्चार्त् फ्लूरी, दआरमार्सार्ं तथार् केलोन फ्रार्ंस के वित्त मंत्री बने। किंतु दरबार्रियों, मंत्रियों तथार् रार्नी के कारण फ्रार्ंस की आर्थिक स्थिति में कोर्इ सुधार्र संभव नहीं हो सक और रार्जकोष खार्ली हो गयार्। ऐसी गंभीर स्थिति में रार्जार् ने उच्चवर्गीय लोगों पर कर लगार्ने क सुझार्व रखार् तथार् इसके लिए उसने उच्चवर्गीय लोगों की सभार् बुलार्ने क प्रस्तार्व रखार् जिसमें उनकी सहमति ली जार् सके।

काउंसिल ऑफ नोबल्स

1786 र्इ. में रार्जार् की आज्ञार् से विशिष्ट व्यक्तियों की सभार् (काउंसिल ऑफ नार्बे ल्स) जिसमें उच्चवर्गीय व्यक्तियों के सार्थ-सार्थ कुछ तृतीय वर्ग के लोग भी थे, क अधिवेशन हुआ। इसमें केलोन ने देश की आर्थिक स्थिति क विवरण प्रस्तुत कियार् तथार् उसके सुधार्र के लिए उच्च वर्ग के लोगो पर भी कर लगार्ने पर बल दियार् किंतु उच्चवर्गीय लोगों ने केलार्ने क परु जोर विरोध कियार् और उसे उसके पद से पदच्युत करवार् दियार्। केलोन के पश्चार्त् ब्रिएन फ्रार्ंस क वित्त मंत्री बनार्यार् गयार् परंतु देश की संकटपूर्ण आर्थिक समस्यार् यथार्वत बनी रही। तत्पश्चार्त् काउंसिल ऑफ नोबल्स की सभार् विसर्जित कर दी गयी। इस सभार् के विसर्जन के पश्चार्त् जनतार् में रार्जार् और उसके मंत्रियों एवं कुलीन वर्ग के विरूद्ध विरोध की भार्वनार् अत्यंत उग्र हो गयी।

रार्जार् और पालियार्मेंट क संघर्ष

अंतत: परिस्थितियों से विवश होकर रार्जार् ने नवीन करों को लगार्ने क निश्चय कियार्। नियमार्नुसार्र उन्हें पेिरस की पालियार्मंटे में भजे ार् गयार्। पालियार्मंटे ने नये करों को दर्ज करने से मनार् कर दियार् और यह घोषणार् की कि नवीन करों को लगार्ने क अधिकार केवल स्टेट्स जर्नल को है। इस प्रकार रार्जार् और पालियार्मंटे के बीच तनार्तनी आरंभ हो गयी अंतत: लुर्इ 16वें ने 8 अगस्त 1788 र्इ. को यह घोषणार् की, कि 5 मर्इ 1789 र्इ. को स्टेट्स जर्नल को अधिवेशन होगार्।

स्टेट्स जर्नल

स्टेट्स जर्नल फ्रार्सं की एक पुरार्नी प्रतिनिधि सभार् थी, जिसमें कुलीन, पुरार्ेि हत और जनसार्धार्रण वर्ग के प्रतिनिधि शार्मिल हुआ करते थे। इस सभार् क जनतंत्रीय सिद्धार्ंत के अनुरूप विकास नहीं हो पार्यार् थार् और 1614 र्इ. के बार्द इसक अधिवेशन होनार् बंद हो गयार् थार्। फलत: लोग इसकी महत्तार् और उपयार्ेिगतार् को भलू बैठे थे। अब 175 वषोर् ं के बार्द अर्थार्त् 1789 र्इ. में पुन: इसकी आवश्यकतार् महसूस की गर्इ।

5 मर्इ 1789 र्इ. को वर्सार्य में स्टेट्स जर्नल क प्रथम अधिवेशन हुआ। इस अधिवेशन में वित्त मत्री ने देश की संकटपूर्ण आर्थिक स्थिति के संबंध में एक विवरण पढ़ार् जिसमें घार्टे को पूरार् करने के लिए सुझार्व दिये गये किंतु सुधार्रों की काइेर् व्यवहार्रिक यार्जे नार् प्रस्तुत नहीं की गयी। सुधार्रों पर काइेर् मतदार्न भी नहीं हुआ। अत: जनसार्धार्रण के प्रतिनिधियों को बड़ी निरार्शार् हुर्इ और उनके मनों में अनेक शंकायें जन्म लेने लगीं।

नेशनल असेम्बली

17 जून 1789 र्इ. को तीसरे सदन के प्रतिनिधियों ने अपने आप को रार्ष्ट्रीय सभार् घोषित करने क एक सार्हसपूर्ण क्रार्ंतिकारी कदम उठार्यार्। इसके अनुसार्र उसने अपने आप को फ्रार्ंस की जनतार् की एकमार्त्र प्रतिनिधि सभार् घोषित कर दियार्। स्टेट्स जर्नल क नार्म बदल दियार् गयार् तथार् उसे नेशनल असेम्बली कहार् जार्ने लगार्। सर्वसार्धार्रण वर्ग के इस निर्णय से दरबार्रियों में गहरार् असंतोष उत्पé हुआ। तथार्पि 19 जून को पार्दरियों ने भी तृतीय सदन से मिल जार्ने क निर्णय लियार्, जिससे सवर्स ार्धार्रण वर्ग की शक्ति बढ़ गयी।

उपरार्क्ते स्थिति के पश्चार्त् लुर्इ 16वें ने कुलीनों के प्रभार्वों में आकर तृतीय सदन के कायोर् ं में हस्तक्षेप करने के उद्देश्य से सदन के सभार् भवन को बंद कर दियार् और वहार्ँ सेनार् तैनार्त कर दी। जून 1789 र्इ. को जब सर्वसार्धार्रण वर्ग के सदस्य सभार्गृह पहुँचे तो वहार्ँ तैनार्त सैनिकों को देखकर वे अत्यतं क्रोधित हो गए ओर उन्होंने सभार् भवन के निकट एक टेनिस कोर्ट में एकत्र होने क निर्णय लियार्। टेनिस कोर्ट में बेली की अध्यक्षतार् में एक ऐतिहार्सिक अधिवेशन हुआ और यह शपथ ली गर्इ कि ‘‘जब तक रार्ष्ट्र क संविधार्न स्थार्पित नहीं हो जार्येगार् तब तक हम कभी अलग नहीं होगे और जहार्ँ भी आवश्यकतार् पड़गेी हम एकत्र होगे ‘‘ इसे टेनिस कोर्ट की शपथ कहते है और यह शपथ फ्रार्सं की क्रार्ंति की एक महार्न घटनार् थी।

23 जून 1789 र्इ. को स्टेट्स जर्नल क शार्ही अधिवेशन प्रार्रंभ हुआ किंतु इसमें भी रार्जार् दरबार्रियों के प्रभार्व में आ गयार् और उसने तृतीय सदन के प्रस्तार्वों को अमार्न्य कर दियार्। रार्जार् के इस कार्य से सर्वसार्धार्रण वर्ग को घार्रे निरार्शार् हुर्इ। अधिवश्े ार्न की समार्प्ति पर रार्जार् तथार् उच्चवर्गीय सदस्यों ने सभार्गृह छोड़ दियार् परंतु तीसरे सदन के सदस्य अपने स्थार्न पर बने रहे। क्योंकि वे अपने अधिकारों तथार् महत्तार् क अंतिम निर्णय कर लेनार् चार्हते थे। इस बीच उनके नेतार् मिरार्बो ने सार्हसिक घोषणार् कर उनक मार्गर्द र्शन कियार्। मिरार्बो ने जार्रे दार्र शब्दों में कहार् ‘‘हम यहार्ँ जनतार् की इच्छार् से उपस्थिति हुए हैं और जब तक बंदूक की गोली से हमको नहीं हटार्यार् जार्येगार् तब तक हम यहार्ँ से नहीं जार्येंगे।’’ मिरार्बो की घोषणार् और क्रियार्न्वयन के पश्चार्त् रार्जार् की स्थिति कठिन हो गयी क्योंकि अधिकांश पार्दरी और मध्यम वर्गीय लोग सर्वसार्धार्रण की सभार् में सम्मिलित हो गए थे। अत: रार्जार् ने 27 जून को तीनों सदनों को एक सार्थ बठै ने की अनुमति दे दी। इस पक्र ार्र नेशनल असेम्बली को वैधार्निक मार्न्यतार् मिल गयी। यह सर्वसार्धार्रण वर्ग की पहली महत्वपूर्ण विजय थी। इसी समय सत्तार् रार्जार् के हार्थों से निकलकर रार्ष्ट्रीय सभार् के हार्थों में चली गयी। इस घटनार् से रार्जार्, रार्नी और अन्य दरबार्री खिé हो गये। दरबार्रियों की प्रेरणार् से रार्जार् ने सैनिक शक्ति के द्वार्रार् नेशनल असेम्बली को डरार्ने धमकाने क प्रयार्स कियार् तथार् 11 जुलाइ 1789 र्इ. को वित्तमंत्री नेकर को पदच्युत कर देश छोड़ देने के आदेश दिये गये। रार्जार् क यह कार्य अत्यंत अनैतिक थार्। इससे जनतार् में उत्तेजनार् क वार्तार्वरण बन गयार् और उग्र क्रार्ंतिकारियों ने हथियार्र एकत्र कर आगे बढ़ने क निर्णय लियार्।

बार्स्तील क पतन (14 जुलाइ 1789 र्इ.)

पेरिस के पूर्व में कुछ दूरी पर 1383 र्इ. में निर्मित 30 मीटर ऊॅची दीवार्र थी। यहॉं के कारार्वार्स में अनेक बंदियों को रखकर उनको बर्बर अमार्नुषिक यार्तनार्एं दी जार्ती थी। इससे यह दुर्ग और उसक बंदीगृह अनियंत्रित रार्जसत्तार् और उसके अत्यार्चार्रों क घृणित पत्र ीक बन गयार् थार्। जनतार् में इस दुर्ग के प्रति आक्रोश और घृणार् थी। इस समय दुर्ग क रक्षक और दुर्गपार्ल गर्वनर द लौने थार्। उसके पार्स दुर्ग में बंदूकों और बार्रूद क भडं ार्र ओर 127 सुरक्षार् सैनिक थे। 14 जुलाइ को शस्त्रों की खार्जे में आयी उत्तेजित भीड़ ने बार्स्तील दुर्ग पर आक्रमण कर दियार्। लगभग दो घंटे के संघर्ष और गोलार्बार्री के बार्द द लोने ने आत्म-समर्पण कर दियार्। क्रोधित भीड़ ने उसके टुकडे़-टुकड़े कर दिये और वहार्ं बंदी अनेक देशभक्तों को मुक्त कर दियार् और अस्त्र शस्त्रों क भडं ार्र लूट लियार्।

बार्स्तील के पतन क प्रभार्व

बार्स्तील क पतन जनतार् की विजय मार्नी गयी। यह घटनार् रार्जतंत्र की परार्जय और स्वतंत्रतार् के नये युग क प्रार्रंभ बन गर्इ । फ्रार्ंस के देशभक्तों ने इस दिन को स्वतंत्रतार् के प्रथम वर्ष क प्रथम दिन मार्नार् है। इसने सर्व सत्तार् संपन्न निरंकुश स्वेच्छार्चार्री शार्सन और जर्जरित सार्मंती व्यवस्थार् के खोखलेपन को स्पष्ट कर दियार्। सार्मंतशार्ही पर आधार्रित सार्मार्जिक व्यवस्थार् की नीवं हिल उठी, अब उसके गिरने की औरपचार्रिकतार् शेष थी और यह औपचार्रिकतार् 4 अगस्त को पूरी हो गयी जब कुलीन वर्ग के विशेष अधिकारों को समार्प्त कर दियार् गयार्।

इस घटनार् से फ्रार्ंस की क्रार्ंति हिंसार् और रक्तपार्त की ओर मुड़ गयी। जब जनतार् की भीड़ जनतार् की महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरी। बार्स्तील के पतन के बार्द सार्रे फ्रार्ंस में क्रार्ंति की लहर फैल गर्इ और पेरिस, क्रार्ंतिकारियों की सभी गतिविधियों क केदं ्र बन गयार्। इसके बार्द कृषकों ने देहार्तों में सार्मंतों के गढ़ों को लूटकर विध्वसं कर दियार्, उनके दस्तार्वजे जलार् दिये, उनकी सम्पत्ति लूट ली और उनकी कृषि भूमि पर बलपूर्वक अधिकार कर लियार्। परिणार्मस्वरूप कुलीन वर्ग के लोग अपने जीवन की सुरक्षार् के लिये फ्रार्ंस से बार्हर पलार्यन कर गये।

लोकतार्ंत्रिक घटनार्ओं की ओर अग्रसर होने से पेरिस के लोगों ने नार्गरिक प्रशार्सन को प्रजार्तंत्रीय रूप दे दियार्। उन्होंने कुछ नेतार्ओं को निर्वार्चित पेरिस की नवीन स्थार्नीय सरकार क प्रमुख बनार्यार् और ओतल द वील में एकत्रित होकर बैली को पेरिस क मेयर चुन लियार्। शीघ्र ही फ्रार्ंस के अन्य प्रार्ंतों में भी एसे ी ही स्थार्नीय सरकार कायम हो गयी। पेिरस को एक विशिष्ट महत्वशार्ली स्वरूप प्रार्प्त हो गयार्। अब वह क्रार्ंतिकारियों की रार्जनीतिक गतिविधियों क कंदे ्र बन गयार् थार्।

रार्ष्ट्रीय रक्षार् दल और रार्ष्ट्रीय ध्वज (15-16 जुलाइ 1789 र्इ.)

फ्रार्सं के क्रार्ंतिकरियों ने क्रार्ंति व्यवस्थार् कायम रखने के लिये जो नार्गरिक सेनार् पहिले थी, उसक नार्म ‘रार्ष्ट्रीय रक्षार्दल’ रख दियार्। इसकी सदस्य संख्यार् 200 से बढ़ार् कर शीघ्र ही 48,000 तक पहुंचार् दी गर्इ और लार्फार्यते को इसक अध्यक्ष बनार्यार् गयार्। पेिरस के समार्न अन्य नगरार्ं े में भी रार्ष्ट्रीय रक्षार् दल और स्थार्नीय शार्सन स्थार्पित किये गये। अब बोर्बो रार्जवंश के श्वेत झंडे के स्थार्न पर लार्ल, सफेद और नीले रंग क तिरंगार् झंडार् रार्ष्ट्रीय ध्वज स्वीकार कर लियार् गयार्।

रार्जार् द्वार्रार् मार्न्यतार् (17 जुलाइ 1789)

रार्जार् लुर्इ सोलहवे ने स्वयं पेिरस में क्रार्ंतिकारियों के कंदे ्र स्थल ‘आते ल द बिल’ में जार्कर क्रार्ंतिकारियों के प्रेरणार्दार्यक भार्षण सुने। रार्जार् ने बले ी और लार्फार्यत की नियुक्तियों को तथार् क्रार्ंतिकारियों के तिरंगे झंडे को मार्न्यतार् प्रदार्न कर दी। इससे फ्रार्सं के अन्य नगरों में क्रार्ंति के फैलने हेतु प्रोत्सार्हन प्रार्प्त हुआ।

1789 की फ्रार्ंसीसी क्रार्न्ति क प्रभार्व

एक ओर कुछ विद्वार्नों ने फ्रार्सीसी क्रार्न्ति को विनार्शकारी, अप्रगतिशील तथार् अरार्जकतार्वार्दी आन्दोलन कहार् है, तो दूसरी ओर विद्वार्नों ने इसे विश्व की महार्नतम घटनार् कहार् है। यह विश्व क्रार्ंति थी, जिसने समूची मार्नव जार्ति के इतिहार्स पर गहरी छार्प छोड़ी।

फ्रार्ंस पर प्रभार्व

यद्यपि क्रार्ंति के प्रार्रंभ के प्रथम दशक में फ्रार्ंस में भीषण अस्त-व्यस्ततार्, अस्थिरतार्, भार्री उथल-पुथल और अमार्नुषिक रक्तपार्त हुआ, पर फिर भी उसक तार्त्कालिक और स्थार्यी प्रभार्व फ्रार्ंस पर पड़ार्। इस प्रभार्व क विश्लेषण अधोलिखित है।

रार्जनीतिक प्रभार्व

  1. निरंकुश शार्सन क अंत और गणतंत्र की स्थार्पनार्- इस क्रार्ंति से फ्रार्ंस में पुरार्नार् निरंकुशतार् और तार्नार्शार्ही क युग समार्प्त हो गयार्। दैवी अधिकारों के सिद्धार्ंत पर आधार्रित रार्जतंत्र समार्प्त हो गयार् और उसके स्थार्न पर संवैधार्निक रार्जतंत्र और बार्द में गणतंत्र स्थार्पित हो गयार्। 
  2. लिखित संविधार्न- क्रार्ंति के बार्द फ्रार्ंस के लिए लिखित संविधार्न बनार्यार् गयार् जिसमें व्यवस्थार्पिका, कार्यपार्लिका, और न्यार्यपार्लिक के अधिकार और कर्तव्य स्पष्ट किये गये और नार्गरिकों को मत देने क अधिकार प्रार्प्त हुआ। यह संविधार्न फ्रार्ंस क ही नहीं, अपितु यूरोप क भी प्रथम लिखित संविधार्न थार्। 
  3. लोकप्रिय सम्प्रभुतार् क सिद्धार्ंत- क्रार्ंति ने रार्ज्य के संबंध में एक नवीन धार्रणार् को जन्म दियार् और रार्जनीति में नवीन सिद्धार्ंत प्रतिपार्दित किये। लोकप्रियतार् जनतार् में निहित होती है। इस क्रार्ंति ने यह प्रमार्णित कर दियार् कि प्रजार् ही वार्स्तव में रार्जनीतिक अधिकारों की स्वार्मी है और सावभैार्म यार् सावजनिक सत्तार् उसके पार्स ही है। 
  4. मार्नव अधिकारों की घोषणार्- क्रार्ंति के दौरार्न मार्नव के मौलिक अधिकारों की घोषणार् की गर्इ। उसमें मनुष्य के बहुमुखी विकास के लिए आवश्यक मूलभूत अधिकारों को स्पष्ट शब्दो में अभिव्यक्त कियार् गयार्। कानून की दृष्टि में सभी नार्गरिकों को समार्नतार् प्रदार्न की गर्इ। इससे जन सार्मार्न्य की आशार्-आकांक्षार् क विस्तार्र हुआ और फ्रार्सं में एक लार्के तंत्रीय समार्ज क निर्मार्ण हुआ। 
  5. प्रशार्सन में सुधार्र- क्रार्ंति के बार्द प्रशार्सन क पुर्नगठन कियार् गयार्। फ्रार्सं को समार्न 83 भार्गार्ं े में विभक्त कर उनको कैन्टनों और कम्यनूों में विभार्जित कियार्। उनमें प्रशार्सन के लिये नार्गरिकों द्वार्रार् निर्वार्चित सभार्एं स्थार्पित की गर्इ। पदों पर सुयोगय और सक्षम अधिकारी नियुक्त किय गए। पक्षपार्तपूर्ण कर व्यवस्थार् तथार् अव्यवस्थित फिजूल खर्चियों के स्थार्न पर समार्न कर-व्यवस्थार् और नियमित बजट प्रणार्ली स्थार्पित की गर्इ। न्यार्य-व्यवस्थार् में भी परिवर्तन कियार् गयार्। न्यार्यार्लयों को कार्यकारिणी और व्यवस्थार्पिक के प्रभार्व और नियंत्रण से मुक्त कर दियार् गयार्। फार्जैदार्री मकुदमों के लिये ‘ज्यूरी प्रथार्’ प्रार्रंभ की गर्इ। वंशार्नुगत और भ्रष्ट न्यार्यार्धीशो के स्थार्न पर नव निर्वार्चित न्यार्यार्धीशो की व्यवस्थार् की गर्इ।
  6. समार्न कानून और कानूनों क संग्रह-कानूनों की विविधतार् समार्प्त कर दी गर्इ। नेपोलियन ने विभिन्न कानूनों को एक करके दीवार्नी, फौजदार्री तथार् अन्य कानूनों क व्यवस्थित संग्रह करवार्यार् जिससे फ्रार्ंस में एक सी कानून व्यवस्थार् स्थार्पित की गर्इ। इस कानून-संग्रह को ‘‘कोड ऑफ नेपोलियन’’ कहते हैं। बार्द में आस्ट्रियार्, इटली, जर्मनी, बेल्जियम, हॉलेण्ड और अमेरिक आदि देशों में भी काडे ऑफ नेपोलियन में आवश्यकतार्नुसार्र आंशिक परिवर्तन करके उसे लार्गू कर दियार् गयार्।

धामिक एवं सार्मार्जिक प्रभार्व

  1. चर्च क पुर्नगठन- क्रार्ंति के उपरार्न्त फ्रार्ंस के केथोलिक चर्च क पुनर्गठन कियार् गयार्। चर्च की भूमि सत्तार् और सम्पत्ति सरकार के अधिकार में कर दी गर्इ और पार्दरियों के लिये नवीन संविधार्न लार्गू कियार् गयार् और उनको सरकारी कर्मचार्रियों के समार्न वेतन दियार् जार्ने लार्ग। इसी नवीन संविधार्न के अंन्तर्गत पोप से संबंध विच्छेद कर दियार् गयार् और अब पोप की सर्वोपरितार् समार्प्त हो गर्इ। इससे कैथोलिकों और उनके विरोधियों में अधिक मत-भेद उभरने लगे। 
  2. सार्मार्जिक समार्नतार् क युग-पुरार्तन सार्मन्तवार्दी व्यवस्थार् क अंत इस क्रार्ंति क महत्वपूर्ण प्रभार्व थार्। कुलीन सार्मन्तों की व्यवस्थार्, उनकी कर प्रणार्ली और उनके विशेष अधिकार समार्प्त कर दिये गये। उनके द्वार्रार् लगार्ये गये कर भी समार्प्त कर दिये गये। सार्मन्त प्रणार्ली और दार्स व्यवस्थार् क अंत कर दियार् गयार्। अंध विश्वार्सों व रूढियों पर आधार्रित पुरार्तन संस्थार्ए नष्ट कर दी गर्इं। सार्मार्जिक समार्नतार् ओर सुव्यवस्थार् स्थार्पित की गर्इ। सभी देशवार्सियों को समार्न नार्गरिक अधिकार प्रदार्न किये गये उन्हें बिनार् किसी भेदभार्व के समार्नतार् व स्वतंत्रतार् दी गर्इ। 
  3. कृषकों की दशार् में सुधार्र- क्रार्ंति से पूर्व कृषकों की दशार् दयनीय थी। सार्मन्त ओर पार्दरी विभिन्न करों द्वार्रार् उनक शोषण करते थे। इससे कृषक निर्धन हो गये थे क्रार्ंति, उनके लिये वरदार्न सिद्ध हुर्इ। कृषकों को निर्दयी सार्मन्तों और जार्गीरदार्रों के अत्यार्चार्रों करों, शोषण और दार्सतार् से छुटकारार् मिलार्। उन्हार्न सार्मन्तो से प्रार्प्त भूिम पर बड़े परिश्रम और लगन से कृषि की और उपज में वृद्धि की। 
  4. शिक्षार् और सार्हित्य में प्रगति- क्रार्ंति के दौरार्न शिक्षार् को केथोलिक चर्च के आधिपत्य और प्रबन्ध से हटार्कर उसे गणतंत्रीय सरकार के अधीन कर दियार्। इस प्रकार शिक्षार् क रार्ष्ट्रीयकरण कियार्। आधुनिक फ्रार्ंस की रार्ष्ट्रीय शिक्षार् पद्धति की नींव क्रार्ंति ने ही रखी। ज्ञार्न वृद्धि के लिए अनेक विद्यार्लय, महार्विद्यार्लय, तकनीकी संस्थार्न, प्रशिक्षण संस्थार्एं और पेरिस क विश्वविद्यार्लय स्थार्पित किये गये। लिखने, भार्षण देने और उदार्रवार्दी प्रगतिशील विचार्रों क प्रार्रंभ हुआ। 
  5. रार्ष्ट्रीय भार्वनार् क विकास– जब विदेशी सेनार्ओं ने रार्जतंत्र की सुरक्षार् के लिए फ्रार्सं पर आक्रमण किए तब विभिन्न वर्गो के लोगों ने सेनार् में भरती होकर अत्यतं वीरतार् ओर सार्हस से विदेशी सेनार्ओं क सार्मनार् कियार् ओर विजय प्रार्प्त की। इस प्रकार देश की सुरक्षार् के लिए फ्रार्ंसीसीयों में रार्ष्ट्रीयतार् की भार्वनार् उत्पन्न हुर्इ। इस रार्ष्ट्रीय भार्वनार् और विजयों से फ्रार्ंस के सैनिक गौरव में अधिक वृद्धि हुर्इ। समस्त यूरोप में सम्मिलित सैन्य शक्ति क सार्मनार् जिस सफलतार् व दृढतार् से फ्रार्ंस कर सका, उसक मूल आधार्र उसकी रार्ष्ट्रीयतार् और एकतार् की भार्वनार् थी।

आर्थिक प्रभार्व

आर्थिक संकटों क निरार्करण करने के लिये ही फ्रार्ंस में क्रार्ंति क प्रार्रंभ हुआ थार्। आर्थिक दुव्र्यवस्थार् सुधार्रने के लिये चर्च की भूमि क रार्ष्ट्रीयकरण कर दियार् गयार्, सार्मन्तों की भूिम को कृषकों में विभक्त कियार् गयार्। मध्यम वर्ग के लोगो ने भी सम्पत्ति और भूमि क्रय कर ली। सार्मन्त प्रथार् के अवसार्न के बार्द करों क भार्र सभी वर्गो के लिये समार्न कर दियार् गयार्। सभी को कर देनार् आवश्यक हो गयार्। अनुचित अन्यार्यपूर्ण करों क अंत कर दियार् गयार्। शार्ही व्ययशीलतार् को समार्प्त कर दियार् गयार्। इस प्रकार प्रशार्सन व्यवस्थार् में बजट प्रणार्ली और बचत के कारण आर्थिक स्थिरतार् आ गर्इ।

नवीन वार्णिज्य नीति

व्यार्पार्र पर लगे प्रतिबंध समार्प्त कर दिये गये, नार्प तोल में दशमलव पद्धति प्रार्रंभ की गर्इ। श्रमिकों व कारीगरों के लिये दोषपूर्ण गिल्ड व्यवस्थार् समार्प्त कर दी गर्इ । पजूंी और सार्ख के लिये बैंक ऑफ फ्रार्ंस की स्थार्पनार् की गर्इ। नेपोलियन के शार्सनकाल में सड़कों, पुलों और बंदरगार्हों क निर्मार्ण कियार् गयार् जिससे व्यार्पार्र और उद्योगों की बहुत प्रगति हुर्इ।

यूरोप पर प्रभार्व

  1. स्वतंत्रतार्, समार्नतार् और बंधुत्व की भार्वनार्- फ्रार्ंस की क्रार्ंति ने यूरोप को ही नहीं अपितु मार्नव समार्ज को भी स्वतंत्रतार्, समार्नतार् और बंधुत्व के शार्श्वत तत्व प्रदार्न किये। ये सदैव जनतार् को स्फूि र्त देने वार्ले रहै। क्रार्ंति से समार्ज में आर्थिक और सार्मार्जिक समार्नतार् की भार्वनार् फैली, धामिक स्वतंत्रतार् और सहनशीलतार् क प्रचार्र बढ़ार् और नार्गरिक स्वतंत्रतार् प्रदार्न की गर्इ। व्यक्तिगत अधिकारों को मार्न्यतार् मिली। फ्रार्सं के क्रार्ंतिकारी अन्य देशों की पीड़ित जनतार् को अपनार् बंधु समझते थे। स्वतंत्रतार्, समार्नतार्, बंधुत्व के सिद्धार्ंत और लोकतंत्र के विचार्र यूरोप के अन्य देशों में शीघ्र ही फैल गये और इन विचार्रों के लिये संसार्र में तब से सघ्ं ाष प्रार्रभ हुआ।
  2. विप्लवों और क्रार्ंतियों क नवीन युग- मनुष्य की व्यक्तिगत स्वतंत्रतार् क सिद्धार्तं सदार् के लिए फ्रार्सं और बार्द में यूरोप के सभी देशों में स्वीकार कर लियार् गयार्। इससे जनतार् को अत्यार्चार्री शार्सन क अंत करने की स्वतंत्रतार् और संघर्ष करने की प्रेरणार् प्रार्प्त हुर्इ। फ्रार्ंस की क्रार्ंति ने लोकतंत्र, समार्नतार्, स्वतंत्रतार् और रार्ष्ट्रीयतार् की प्रेरणार् दी। इन्हीं सिद्धार्ंतों को व्यार्वहार्रिक रूप देने के लिये यूरोप में 1830 र्इ. एवं 1848 र्इ. में क्रार्ंतियार्ं हुर्इं। संभवत: रूस में 1917 र्इ. की क्रार्ंति और कार्लमार्क्र्स के सार्म्यवार्दी समार्ज संगठन के सिद्धार्ंत क प्रचार्र फ्रार्ंस की क्रार्ंति के आदर्शो पर ही हुआ। इन क्रार्ंतियों से यूरोप में निरंकुश स्वेच्छार्चार्री रार्जार्ओ, तार्नार्शार्हों और उनके अत्यार्चार्री शार्सन क अंत हुआ और जनतार् की विजय हुर्इ। 
  3. यूरोप में क्रार्ंति के दूरगार्मी परिणार्म- फ्रार्ंस की क्रार्ंति, एक अंतर्रार्ष्ट्रीय महत्व क तीव्र आंदोलन थार्; जिसके विस्तृत प्रसार्र से फ्रार्ंस क इतिहार्स परिवर्तित हो गयार्। फ्रार्ंस क रार्ष्ट्रनार्यक नेपोलियन यूरोप की निर्णार्यक सत्तार् बन गयार्। नेपोलियन क इतिहार्स यूरोप क इतिहार्स बन गयार्। 
  4. अंतर्रार्ष्ट्रीयतार् क प्रसार्र- क्रार्ंति के बार्द फ्रार्ंस के विरूद्ध हुए युद्धों ने और फ्रार्ंस को परार्स्त कर देने की भार्वनार् ने यूरोप के देशों को परस्पर एक दूसरे के समीप लार् दियार्। नेपोलियन को वार्टरलू में परार्स्त करने के पश्चार्त यूरोप की रार्जशक्तियों ने यूरोप में शार्ंति व्यवस्थार् और सुरक्षार् व्यवस्थार् बनार्ये रखने के लिए पवित्र संघ, और यूरोपीय संयुक्त व्यवस्थार् की स्थार्पनार् की। इन अंतर्रार्ष्ट्रीय संघों ने यूरोप में विभिन्न स्थार्नों में सम्मेलन किये। यद्यपि यूरोप की रार्जनीतिक समस्यार्ओं क निरार्करण ये अंतर्रार्ष्ट्रीय संघ नहीं कर सक किन्तु इनसे यूरोप में अंतर्रार्ष्ट्रीय भार्वनार् और कार्यप्रणार्ली को प्रोत्सार्हन प्रार्प्त हुआ। 20 वीं सदी की रार्ष्ट्रसंघ और संयुक्त रार्ष्ट्रसंघ जैसी अंतर्रार्ष्ट्रीय संस्थार्एं भी इसी अंतर्रार्ष्ट्रीयवार्द क परिणार्म हैं। 
  5. यूरोप में उच्चकोटि क सार्हित्य सृजन- फ्रार्सं की क्रार्ंति के सिद्धार्तों और आदर्शों से प्रेरित होकर 19 वी सदी में यूरोप के देशों के अनेक विद्वार्नों, कवियों लेखक ेंं और सार्हित्यकारों ने स्वतंत्रतार्, समार्नतार्, मार्नव अधिकार, लार्के तंत्र, समार्जवार्द और जनकल्यार्ण आदि को अपनी कृतियों के प्रमुख विषय बनार्ये उदार्हरण के लिये कवि वर्ड्सवर्थ की ‘प्रील्युड’, सार्उथगेट की जॉन ऑफ आर्क, विक्टर ह्यूगो की ‘लार् मिजरेबल’ कवि शैले की ‘मिस्टेक ऑफ अनाकी’ गोटे क ‘फार्स्ट’ आदि रचनार्ओं पर क्रार्ंति के सिद्धार्ंतों और विचार्रों की स्पष्ट छार्प झलकती है।

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