हिंसार् क अर्थ, रूप एवं प्रकार

हिंसार् क्यार् है? इस प्रश्न के समार्धार्न में कहार् जार् सकतार् है कि किसी प्रार्णी को प्रार्ण-विहीन करनार्, दूसरे से प्रार्ण विहीन करवार्नार् यार् किसी दूसरे व्यक्ति के द्वार्रार् किसी प्रार्णी को प्रार्ण-विहीन करते हुए देखकर उसक अनुमोदन करनार्, किसी प्रार्णी पर शार्सन करनार्, दार्स बनार्नार्, किसी भी प्रकार की पीड़ार् देनार्, सतार्नार् यार् अशार्ंत करनार् भी हिंसार् है। गार्ँधीजी ने हिंसार् की अवधार्रणार् को और अधिक स्पष्ट करते हुए कहार् है कि ‘कुविचार्र हिंसार् है, उतार्वली हिंसार् है, मिथ्यार् भार्षण हिंसार् है, द्वेष हिंसार् है, किसी क बुरार् चार्हनार् हिंसार् है। जगत् के लिए जो आवश्यक वस्तु है, उस पर कब्जार् रखनार् भी हिंसार् है।’ गार्ँधीजी के अनुसार्र अहम् यार् अहमत्व पर आधार्रित जितनी भी मार्नुषिक क्रियार्एँ है। वे सभी हिंसार् ही है। जैसे-स्वाथ, प्रभुतार् की भार्वनार्, जार्तिगत विद्वेष, असन्तुलित एवं असंयमित भोगवृत्ति, विशुद्ध भौतिकतार् की पूजार्, अपने व्यक्तिगत और वर्गगत स्वाथों क अंधसार्धन, शस्त्र और शक्ति के आधार्र पर अपनी कामनार्ओं की संतृप्ति करनार्, अपने अधिकार को कायम रखने के लिए बल क प्रयोग तथार् अन्य व्यक्तियों के अधिकारों क अपहरण आदि। जैन ग्रंथ आचार्रार्ंग के अनुसार्र किसी प्रार्णी की स्वतंत्रतार् क किसी भी रूप में हनन भी हिंसार् है। इसमें प्रार्णी यार् जीव को मनुष्य, पशु, पक्षी और कीट-पतंगों के अर्थ में ही नहीं, अपितु व्यार्पक अर्थ में लियार् गयार् है, जिसमें उन जीवों क भी समार्वेश हो जार्तार् है, जिन्हें सार्मार्न्य जन जड़ यार् अजीव कहते है। आचार्रार्ंग में सभी प्रार्णियों को छ: वर्गों में रखार् गयार् है। ये वर्ग है।-पृथ्वीकाय जीव, जलकाय जीव, अग्निकाय जीव, वार्युकाय जीव, वनस्पतिकाय जीव और त्रसकाय जीव।

तत्त्वाथसूत्र में उमार्स्वार्ति ने हिंसार् को परिभार्षित करते हुए कहार् है-प्रमार्द से जो प्रार्णघार्त होतार् है, वही हिंसार् है। प्रश्न उत्पन्न होतार् है कि प्रार्ण क्यार् है? इस प्रश्न के उत्तर में भगवती सूत्र में कहार् गयार् है कि जीव आभ्यन्तर श्वार्सोच्छवार्स तथार् बार्ह्य श्वार्सोच्छवार्स लेने के कारण प्रार्ण कहार् जार्तार् है। जिस शक्ति से हम जीव क किसी-न-किसी रूप में जीवन देखते हैं, वह शक्ति प्रार्ण है, जिनके अभार्व में शरीर प्रार्णहीन हो जार्तार् है।

हिंसार् के रूप

हिंसार् के दो रूप है।-भार्व हिंसार् और द्रव्य हिंसार्। मन में कषार्य (क्रोध, मार्न, मार्यार्, लोभ) क जार्ग्रत होनार् भार्व हिंसार् है और मन के भार्व को वचन और क्रियार् क रूप देनार् द्रव्य हिंसार् कहलार्ती है। अर्थार्त् मन, वचन और काय के दुष्प्रयोग से जो प्रार्णहनन यार् दुष्क्रियार् होती है, वही हिंसार् है।

हिंसार् के प्रकार

हिंसार् के दो प्रकार है-1. अर्थ हिंसार्, 2. अनर्थ हिंसार्।

1. अर्थ हिंसार्-

जो व्यक्ति अपने लिए, अपनी जार्ति, परिवार्र, मित्र, घर, देवतार् आदि के लिए त्रस एवं स्थार्वर प्रार्णियों क स्वयं घार्त करतार् है, दूसरों से करवार्तार् है, घार्त करते हुए को अच्छार् समझतार् है, वह अर्थ हिंसार् है।

2. अनर्थ हिंसार्-

जो व्यक्ति किसी प्रार्णी को अपने शरीर की रक्षार् यार् अन्य उपयोगितार् हेतु नहीं मार्रतार् किन्तु बिनार् प्रयोजनवश, कुतूहलवश प्रार्णियों को मार्रतार् है, छेदन-भेदन करतार् है, अंगों को काट डार्लतार् है, उपद्रव करतार् है, चपलतार्वश वनस्पतियों को उखार्ड़तार् है, वह अनर्थ हिंसार् है। कुछ विचार्रकों ने हिंसार् के चार्र प्रकार बतलार्ए है-

  1. संकल्पी हिंसार्-सोच-विचार्र कर पहले से मार्रने क उद्देश्य बनार्कर किसी प्रार्णी के प्रार्ण हनन करनार्। 
  2. आरम्भी हिंसार्-भोजनार्दि तैयार्र करने में जो हिंसार् होती है। 
  3. उद्योगी हिंसार्-खेती-बार्ड़ी, उद्योग-धन्धे आदि करने में जो प्रार्णार्तिपार्त होतार् है। 
  4. विरोधी हिंसार्-समार्ज, रार्ष्ट्र आदि पर हुए शत्रुओं यार् अत्यार्चार्रियों के आक्रमण क विरोध करने में जो हिंसार् होती है।

हिंसार् की उत्पत्ति कषार्यों के कारण होती है। ये कषार्य चार्र होते  है-क्रोध, मार्न, मार्यार्, लोभ। इन्हीं कषार्यों के कारण हिंसार् करने क विचार्र मन में आतार् है, हिंसार् करने के लिए उपक्रम किये जार्ते  है, जो प्रार्णघार्त तक की क्रियार्ओं तक पहुंच सकती है। इस संसार्र में जो भी देहधार्री है, वह किसी-न-किसी रूप में हिंसार् करतार् ही है। यदि वह एक जगह स्थिर ही रहतार् है तो भी वह भोजन स्वरूप अन्न, फल, वनस्पति आदि तो ग्रहण करतार् ही है। अपने शरीर एवं अस्तित्व की सुरक्षार् हेतु मनुष्य को कुछ विशेष प्रकार की हिंसार् तो करनी ही पड़ती है। इन हिंसार्ओं के प्रमुख तीन कारण  है-

  1. व्यक्तिगत स्वाथ के कारण-भोजन आदि ग्रहण करने में हिंसार् होती है, इसमें व्यक्तिगत स्वाथ  है क्योंकि भोजन से अपने शरीर की रक्षार् होती है।
  2. परमाथ के कारण-अन्य की सुरक्षार् एवं शरण आदि हेतु की जार्ने वार्ली हिंसार्। 
  3. किसी प्रार्णी की सुख-शार्ंति के लिए की जार्ने वार्ली हिंसार्। यदि शरीर के किसी अंग में घार्व हो जार्ए तो कभी-कभी इस अंग को काटनार् पड़तार् है। गार्ँधीजी ने अपने आश्रम में एक मरणशील बछड़े को पीड़ार्मुक्त करने हेतु उसे मार्रने की आज्ञार् दी थी।

इन तीनों में से प्रथम दो हिंसार् क होनार् अनिवाय है क्योंकि यदि हिंसार् क ध्यार्न करते हुए कोर्इ व्यक्ति भोजन छोड़ दे यार् सुरक्षार् आदि प्रश्नों को गौण कर दे तो ऐसी हार्लत में जीवन बचार्ए रखनार् कठिन हो जार्एगार्। अत: इन दोनों में हिंसार् क कुछ अंश है। किन्तु तीसरे प्रकार में शुद्ध अहिंसार् है क्योंकि ऐसी हिंसार् में हिंसक क कोर्इ अपनार् स्वाथ नहीं होतार्। यहार्ँ हिंस्य जीव को सुख पहुंचार्ने की दृष्टि से हिंसार् की जार्ती है। हिंसार् करने से प्रार्य: समझार् जार्तार् है कि जो पक्ष दूसरों को पीड़ार् पहुंचार्तार् है, सभी कष्टों से मुक्त होतार् है। किन्तु ऐसार् समझनार् सर्वथार् गलत है। जब व्यक्ति के मन में कषार्य क जार्गरण होतार् है तो उसके मन और तन दोनों में ही विकृति आ जार्ती है। अत: परघार्त करने से पूर्व वह हिंसक व्यक्ति आत्मघार्त ही करतार् है। इस प्रकार हिंसार् किसी के लिए भी श्रेय नहीं है। कषार्यगत हिंसार् न केवल हिंस्य के लिए अहितकारी है, अपितु स्वयं हिंसक के लिए भी अहितकारी है, इसलिए हिंसार् क कोर्इ औचित्य नहीं हो सकतार्।

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