हिंदी की उपभार्षार्एँ
भार्रत क उत्तर और मध्य देश बहुत समय पहले से हिंदी-क्षेत्र नार्म से जार्नार् जार्तार् है। हिंदी-प्रयोग-क्षेत्र के विस्तृत होने के कारण अध्ययन सुविधार् के लिए उसे विविध वर्गो में विभक्त कियार् गयार् है। जॉर्ज इब्रार्हिम ग्रियर्सन ने हिंदी के मुख्य दो उपवर्ग बनार्ए हैं – (1) पश्चिमी हिंदी, (2) पूर्वी हिंदी। उन्होंने बिहार्री को अलग भार्षार् के रूप में व्यवस्थित कियार् है।

हिंदी भार्षार् के ऐतिहार्सिक और स्त्रोत-आधार्र पर अध्ययन करने से ज्ञार्त होतार् है कि अपभ्रंश की शौरसेनी, अर्धमार्गधी, मार्गधी और खस शार्खार्ओं से हिंदी क विकास विविध क्षेत्र में हुआ है। इसे मुख्यत: पार्ँच उपवर्गो में विभक्त कर सकते हैं – पश्चिमी हिंदी, 2. पूर्वी हिंदी, 3. बिहार्री हिंदी, 4. रार्जस्थार्नी हिंदी, 5. पहार्ड़ी हिंदी।

पश्चिमी हिंदी

इसक विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है। पश्चिमी हिंदी क क्षेत्र उत्तर भार्रत में मध्य भार्रत के कुछ अंश तक फैलार् है। अर्थार्त् उत्तरार्ंचल प्रदेश के हरिद्वार्र, हरियार्णार् से लेकर उत्तर प्रदेश के कानपुर के पश्चिमी भार्ग तक है। आगरार् से लेकर मध्य क्षेत्र ग्वार्लियर और भोपार्ल तक है। क्षेत्र-विस्तार्र के कारण पश्चिमी हिंदी में पर्यार्प्त विविधतार् दिखार्ई देती है। इसमें मुख्यत: पार्ँच बोलियों के रूप मिलते हैं।

कौरवी – 

प्रार्चीनकाल में इस क्षेत्र को कुरू प्रदेश कहते थे। इसी आधार्र पर इसक कौरवी नार्म पड़ार् है। इसे पहले खड़ी-बोली नार्म भी दियार् जार्तार् थार्। अब खड़ी-बोली हिंदी क पर्यार्य रूप है। खड़ी-बोली नार्मकरण के विषय में कुछ विद्वार्नों क मत है कि खड़ार्पन (खरेपन) शुद्धतार् के आधार्र पर है, तो कुछ भार्षार्विदों क कहनार् है कि खड़ी-पार्ई (आ की मार्त्रार् ‘ार्’) के प्रयोग (आनार्, खार्नार्, चलनार्, हँसनार्) आधार्र पर खड़ी-बोली नार्म पड़ार् है।

वर्तमार्न समय में इसक प्रयोग दिल्ली, मेरठ, मुजफ्फर नगर, रार्मपुर, बिजनौर, सहार्रनपुर (उ.प्र.) हरिद्वार्र, देहरार्दून (उत्तरार्ंचल), यमुनार् नगर, करनार्ल, पार्नीपत (हरियार्णार् क यमुनार् तटीय भार्ग) में होतार् है।

कौरवी की विशेषतार्एँ –

  1. क्रियार् रूप अकारार्ंत होतार् है; यथार् – आनार्, खार्नार्, दौड़नार्, हँसनार्, फैलनार् और सींचनार् आदि।
  2. कर्तार् परसर्ग ‘ने’ क प्रयोग स्पष्ट रूप में होतार् है। 
  3. कहीं-कहीं पर ‘न’ के स्थार्न पर ‘ण’ ध्वनि क क प्रयोग मिलतार् है।
  4. इसमें तत्सम और तद्भव शब्दों की बहुलतार् है।
  5. अरबी और फार्रसी के शब्द यत्रार्-तत्रार् मिलते हैं।

वर्तमार्न हिंदी क स्वरूप इसी बोली को आधार्र मार्न कर विकसित हुआ है। हिंदी को रार्जभार्षार्, रार्ष्ट्रभार्षार् और जनभार्षार् क रूप देने में इस बोली की विशेष भूमिक है।

ब्रजभार्षार् – 

ब्रजभार्षार् की उत्पत्ति शौरसेनी अपभ्रंश से हुई है। हिंदी सार्हित्य के मध्यकाल अर्थार्त् भक्ति और रीतिकाल में इस भार्षार् में पर्यार्प्त सहित्य रचार् गयार् है। उस काल में अवधी और ब्रज में ही मुख्यत: रचनार् होती थी। रीतिकाल ब्रजभार्षार् ही रचनार् की आधार्र भार्षार् थी। इसीलिए इसे हिंदी के रूप में स्वीकृति मिली थी। विशेष महत्त्व मिलने के कारण ही ‘ब्रज बोली’ कहनार् अनुकूल नहीं लगतार् वरन् ‘ब्रजभार्षार्’ कहनार् अच्छार् लगतार् है।

इसक केन्द्र स्थल आगरार् और मथुरार् है। वैसे इसक प्रयोग अलीगढ़ और धौलपुर तक होतार् है। हरियार्णार् के गुड़गार्ँव और फरीदार्बार्द के कुछ अंश और मध्य प्रदेश के भरतपुर और ग्वार्लियर के कुछ भार्ग में ब्रज क प्रयोग होतार् है।

इसकी कुछ विशेषतार्एँ उल्लेखनीय हैं –

  1. पद-रचनार् में ओकार और औकार बहुलार् रूप है; जैसे –
  2. खार्यार् झ खार्यौ झ गयार् झ गयो यार् गयौ।
  3. बहुवचन में ‘न’ क प्रयोग होतार् है; यथार् – लोग > लार्गन; बार्त > बार्तन।
  4. ‘उ’ विपर्यय रूप मिलतार् है; जैसे – कुछ झ कछु।
  5. संबंध कारकों के विशेष रूप मिलते हैं –
  6. मेरो, तेरो, हमार्रो, तिहार्रो, आदि।
  7. तद्भव शब्दों की बहुलतार् है।
  8. वर्तमार्न समय में अरबी, फार्रसी के सार्थ अंग्रेजी शब्द भी प्रयुक्त होते हैं। इसके प्रमुख कवि हैं – सूरदार्स, नन्ददार्स, कृष्णदार्स, केशव, बिहार्री, भूषण और रसखार्न आदि। हिंदी भार्षार् और सार्हित्य के विकास में ब्रज की बलवती भूमिक रही है।

हरियार्णवी –

 इसे बार्ँगार्रू यार् हरियार्नी नार्म भी दियार् जार्तार् है। किन्तु जब हरियार्णवी ही सर्वप्रचलित और मार्न्य हो गयार् है। हरियार्णार् प्रदेश क उद्भव और नार्मकरण बोली के आधार्र पर हुआ है। हरियार्णवी हरियार्णार् के सभी जिलों में बोली जार्ती हैं। हरियार्णवी और कौरवी में पर्यार्प्त समार्नतार् है। हरियार्णार् की सीमार् उत्तर प्रदेश, हिमार्चल प्रदेश, पंजार्ब और रार्जस्थार्न से लगी हुई है। इस प्रकार इसके सीमार्वर्ती क्षेत्रों में निकट की बोली क प्रभार्व स्पष्ट दिखार्ई देतार् है। इस प्रभार्व के सार्थ हरियार्णवी विशेष चर्चार् हेतु इसे सार्त उपवर्गो में विभक्त कर सकते हैं।

  1. केन्द्रीय हरियार्णवी – इसक केन्द्र रोहतक है। सार्मार्न्य उदार्हरण देने हेतु प्रार्य: इसी रूप क उल्लेख कियार् जार्तार् है। ‘णकार’ बहुलार् रूप होने के कारण ‘न’ के स्थार्न पर प्रार्य: ‘ण’ क प्रयोग कियार् जार्तार् है। ‘ल’ के स्थार्न पर ‘ळ’ विशेष ध्वनि सुनार्ई देती है; यथार् – बार्लक झ बार्ळक क्रियार् ‘है’ के स्थार्न पर ‘सै’ क प्रयोग होतार् है।
  2. ब्रज हरियार्णवी – फरीदार्बार्द और मथुरार् के मध्य के हरियार्णार् के क्षेत्र में इसक प्रयोग होतार् है। ब्रज क रंग स्पष्ट दिखार्ई देतार् है। इसमें ‘ओ’ ध्वनियों की बहुलतार् है; यथार्- खार्यौ, खार्यो: गयो, गयो; नार्च्यो, नार्च्यौ आदि। ‘ल’ के स्थार्न पर ‘र’ क प्रयोग मिलतार् है – कालार् झ कारार्, बिजली झ बिजुरी आदि। 
  3. मेवार्ती हरियार्णवी – मेव क्षेत्र के आधार्र पर इसक नार्म मेवार्ती पड़ार् है। इसक केन्द्र रेवार्ड़ी है। इसमें झज्जर, गुड़गार्ँव, बार्वल और नूह क क्षेत्र आतार् है। इसमें, हरियार्णवी, ब्रज और रार्जस्थार्नी क प्रभार्व दिखार्ई देतार् है। इसमें ‘ण’ और ‘ल’ ध्वनि की बहुलतार् है।
  4. अहीरवार्टी हरियार्णवी – रेवार्ड़ी और महेन्द्रगढ़ क क्षेत्र अहीरवार्ल है। इसी आधार्र पर इसक नार्मकरण हुआ हैं। नार्रनौल से कोसली तक इसक स्वरूप मिलतार् है। इसमें मेवार्ती, रार्जस्थार्नी (बार्गड़ी) क प्रभार्व दिखार्ई देतार् है। इसमें ओकार बहुल रूप मिलतार् है; यथार्- थार् झथो। 
  5. बार्गड़ी़ हरियार्णवी – इसक क्षेत्र हिसार्र और सिरसार् है। भिवार्नी जिले क पर्यार्प्त क्षेत्र इस बोली के अन्तर्गत आतार् है। इसे केन्द्रीय हरियार्णी और रार्जस्थार्न (बार्गड़ी) क मिश्रित और विकसित रूप मार्न सकते है। बहुवचन रचन में आँ’ प्रत्यय क योग मिलतार् है; यथार्- बार्त झबार्तार्ँ। लोप क बहुल रूप सार्मने आतार् है; जैसे-अहीर झ हीर, अनार्ज ठार्नार् , नार्ज, उठार्नार्।
  6. कौरवी हरियार्णवी – कौरवी क्षेत्र से जुड़ें हरियार्णार् के भार्ग में इस उपबोली क रूप मिलतार् है। यमुनार् नगर, कुरूक्षेत्र, करनार्ल और पार्नीपत के कुछ भार्ग में इसक प्रयोग होतार् हैं। आकारार्ंत शब्दों क बहुल प्रयोग मिलतार् है; यथार्- खार्नार्, धोनार्, सोनार् आदि।
  7. अबदार्लवी हरियार्णवी- अम्बार्लार् इसक मुख्य केन्द्र है। इस उपबोली पर पंजार्बी भार्षार् क स्पष्ट प्रमुख दिखार्ई देतार् है। इसमें महार्प्रार्ण ध्वनि अल्पप्रार्ण हो जार्ती है- हार्थ झ हार्त, सार्थ झसार्त। लोप की बहुलतार् भी दिखार्ई देती है- कृपयार् झकृप्यार्, मिनट झ मिन्ट।

कन्नौजी – 

कन्नौजी नार्मकरण कन्नौज क्षेत्र के नार्म से हुआ हैं। इसक प्रयोग फर्रूखार्बार्द, हरदोई, शार्हजहार्ँपुर, पीलीभीत हैं इटार्वार् और कानपुर के पश्चिमी भार्ग में भी इसक प्रयोग होतार् है। इसक क्षेत्र अवधी और ब्रज के मध्य है। इस पर ब्रज क प्रभार्व विशेष रूप से दिखार्ई देतार् है।

बुंदेली – 

बुंदेलखंड में बोली जार्ने के कारण इसे बुंदेली बोली की संज्ञार् दी गयी हैं इसके प्रयोग क्षेत्र में झार्ंसी, छतरपुर ग्वार्लियर, भोपार्ल, जार्लौन क भार्ग आतार् है। इसमें और ब्रज बोली में पर्यार्प्त समार्नतार् है।

पूर्वी हिंदी

पूर्वी हिंदी क उद्भव अर्धमार्गधी अपभ्रंश से हुआ है। पश्चिमी हिंदी के पूर्व में स्थित होने के कारण इसे पूर्वी हिंदी नार्म दियार् गयार् है। इसक प्रयोग प्रार्चीन कोशल रार्ज्य के उत्तरी-दक्षिणी क्षेत्र में होतार् है। वर्तमार्न समय में इसे उत्तर प्रदेश के कानपुर, लखनऊ, गोंडार्, बहरार्इच, फैजार्बार्द, जौनपुर, सुल्तार्नपुर, प्रतार्पगढ़, मिर्जार्पुर, इलार्हार्बार्द, मध्य प्रदेश के जबलपुर, रीवार्ँ आदि जिलों से संबंधित मार्न सकते हैं। यह इकार, उकार बहुल रूप वार्ली उपभार्षार् है। इसमें तीन बोलियार्ँ हैं – अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी।

अवधी –

‘अबध’ क्षेत्र में प्रयुक्त होने के कारण इसे ‘अवधी’ नार्म से अभिहित कियार् गयार् है। इसक प्रयोग गोंडार्, फैजार्बार्द, सुल्तार्नपुर, रार्यबरेली, बार्रार्बंकी, इलार्हार्बार्द, लखनऊ, जौनपुर आदि जिलों में होतार् है। इसकी कुछ प्रमुख विशेषतार्एँ हैं –

  1. इसमें ‘श’ के स्थार्न पर ‘स’ क प्रयोग होतार् है- शंकर > संकर, शार्म > सार्म आदि।
  2. इसमें ‘व’ ध्वनि प्रार्य: ‘ब’ के रूप में प्रयुक्त होती है; जैसे वन > बन, वार्हन > बार्हन आदि। 3ण् ‘इ’ और ‘उ’ स्वरों क बहुल प्रयोग होतार् है। इ आगम-स्कूल > इस्कूल, स्त्री > इस्त्री उ आगम-सूर्य > सूरज > सूरूजु
  3. ‘ण’ ध्वनि के स्थार्न पर प्रार्य: ‘न’ क प्रयोग होतार् है।
  4. ऋ के स्थार्न पर ‘रि’ क उच्चार्रण प्रयोग होतार् है।

भक्तिकाल में समृठ्ठ सार्हित्य की रचनार् हुई है। तुलसीदार्स कृत ‘रार्मचरित मार्नव’ और जार्यसी कृत ‘पद्मार्वत’ महार्काव्यों की रचनार् अवधी में हुई है। सूफी काव्य-धार्रार् के सभी कवियों ने अवधी भार्षार् को ही अपनार्यार्। समृठ्ठ लोक-सार्हित्य मिलतार् है।

बघेली – 

इस बोली क केन्द्र रीवार्ँ हैं। मध्य प्रदेश के दमोह, जबलपुर, बार्लार्घार्ट में और उत्तर प्रदेश के मिर्जार्पुर में कुछ अंश तक बघेली क प्रयोग होतार् है। इस क्षेत्र पर अवधी क विशेष प्रभार्व दिखार्ई देतार् है। कुछ विद्वार्नों ने बघेली को स्वतंत्रार् बोली न कह कर अवधी क दक्षिणी रूप कहार् है। इसमें अवधी की भार्ंति ‘व’ ध्वनि ‘ब’ के रूप मे प्रयुक्त होती है।

छत्तीसगढ़ –

 ‘छत्तीसगढ़’ क्षेत्र से संबंधित होने के कारण इसे छत्तीसगढ़ी बोली नार्म दियार् गयार् है। वर्तमार्न समय में छत्तीसगढ़ प्रदेश के रार्यपुर, बिलार्सपुर क्षेत्र में इसक प्रयोग होतार् है। इसमें कहीं-कहीं पर ‘स’ ध्वनि ‘छ’ हो जार्ती है।अल्पप्रार्ण ध्वनियों के महार्प्रार्णीकरण की प्रवृत्ति विशेष रूप से मिलती है। समृठ्ठ लोक-सार्हित्य मिलतार् है।

बिहार्री हिंदी

बिहार्र प्रदेश में प्रयुक्त होने के आधार्र पर इसे बिहार्री नार्म दियार् गयार् है। इसक उद्भव मार्गधी अपभ्रंश भार्षार् से हुआ है। ग्रियर्सन ने आधुनिक भार्रतीय आर्यभार्षार्ओं के बर्गीकरण में बिहार्री को हिंदी से अलग वर्ग में व्यवस्थित कियार् है। ये भार्षार्एँ आकार बहुल हैं।
बहुवचन बनार्ने हेतु नि यार् न क प्रयोग होतार् है; यथार्- लोग > लार्गनि, लोगन
सर्वमार्न के विशेष रूप प्रयुक्त होते हैं- तोहनी हमनी आदि।
बिहार्री की अनेक प्रवृत्तियार्ँ पूर्वी हिंदी के समार्न मिलती हैं –
इससे मुख्यत: तीन बोली भार्गो में विभक्त करते है।

भोजपुुरी – 

भोजपुरी निश्चय ही बिहार्री हिंदी क सबसे विस्तृत क्षेत्र में पयुक्त रूप है। भोजपुर बिहार्र क एक चर्चित स्थार्न है। इसी के नार्म पर इसे भोजपुरी कहते हैं। इसक केन्द्र बनार्रस है। भोजपुरी क प्रयोग उत्तर प्रदेश के गार्जीपुर, बलियार्, बनार्रस, आजमगढ़, देवरियार्, गोरखपुर जिलों में पूर्ण यार् आशिंक रूप में और बिहार्र के छपरार्, चम्पार्रन तथार् सार्रन में प्रयोग होतार् है। इस भार्षार् में अवधी की कुछ प्रवृत्तियार्ँ मिलती हैं।

इसमें ‘र’ ध्वनि क प्रार्य: लार्प हो जार्तार् है; यथार्- लरिक झलरक ( लड़का), करयार् झकइयार् (कालार्) ‘ल’ की ध्वनि की प्रबलतार् दिखार्ई देती है; जैसे खार्इल्, चलल, पार्इल आदि। इकार और उकार बहुल रूप में मिलतार् है।

समृठ्ठ लोक-सार्हित्य मिलतार् है।

मैथिली – 

मिथिलार् क्षेत्र की भार्षार् होने के कारण इसे ‘मैथिली’ नार्म दियार् गयार् है। इसक प्रयोग दरभंगार्, सहरसार्, मुजफ्फरनगर, मुंगेर और भार्गलपुर में होतार् है। इसमें शब्द स्वरार्ंत होते है।

इसमें संयुक्त स्वरों (ए, ऐ, ओ, औ) के दीर्घ स्वर के सार्थ हृस्व रूप भी प्रयुक्त होतार् है। इसमें सहार्यक क्रियार्ओं के विशेष रूप मिलते हैं; यथार्- छथि, छल आदि। इ, उ बहुलार् रूप अवधी के ही समार्न हैं।

मैथिली सार्हित्य में तत्सम शब्दार्बली क आकर्षक प्रयोग सार्हित्यकारों के संस्कृत ज्ञार्न क परिचार्यक है। इसमें समृठ्ठ लोक-सार्हित्य और आकर्षक सार्हित्य रचार् गयार् है। मैथिल कोकिल विद्यार्पति मैथिली भार्षार् को अपनार्ने वार्ले सुनार्म धन्य कवि हैं।

मगही – 

‘मार्गधी’ अपभ्रंश से विकसित होने और ‘मगध’ क्षेत्र में प्रयुक्त होने के आधार्र पर इसके नार्म की इसके स्वरूप और भोजपुरी के स्वरूप में बहुत कुछ समार्नतार् है।
इसमें सहार्यक ‘हल्’ से हकी, हथी, हलखिन आदि क रूप प्रयुक्त होते है।
कारक-चिह्नों में सार्मार्न्य के सार्थ अतिरिक्त चिह्न भी प्रयुक्त होते है; यथार्- संप्रदार्न-लार्, लेन, आधकरण-मों। शब्दों में तद्भव यार् बहुल तद्भव रूप मिलते है; यथार्- बच्चे के लिए ‘बुतरू’ क प्रयोग।
उच्चार्रण में अनुनार्सिक बहुल रूप है।

रार्जस्थार्नी हिंदी

रार्जस्थार्नी प्रदेश के नार्म पर विकसित हिंदी को यह नार्म मिलार् है। इसक उदगम शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है। इसके प्रार्रंभिक रूप में डिंगल क प्रबल प्रभार्व रहार् है। इसकी कुछ प्रवृत्तियार्ँ ब्रजभार्षार् के समार्न हैं।

इसमें टवर्गीय ध्वनियों की प्रधार्नतार् होती है; यथार्- ड, ड़, ण, ळ।
महार्प्रार्ण ध्वनियों क अल्पप्रार्णीकरण होने की भी प्रवृत्ति है।
बहुबचन परिवर्तन में मुख्यत: ‘आँ’ क प्रयोग होतार् है।
तद्भव शब्दार्वली क प्रबल रूप मिलतार् है।
रार्जस्थार्नी में एक ओर वीर रस की ओजप्रधार्न रचनार्एँ मिलती हेै, तो श्रंगार्र रार्सो, दूहार् काव्य-ग्रंथो की रचनार् हुई है। इसमें समृठ्ठ सार्हित्य और लोक-सार्हित्य सृजन क्रम चल रहार् है।

रार्जस्थार्नी में चार्र प्रमुख बोलियों के रूप मिलते हैं- मेवार्ती, जयपुरी, मार्रबार्ड़ी और मार्लवी।

मेवार्ती –

मेव जार्ति के नार्म पर इस बोली क नार्म ‘मेवार्ती’ रखार् गयार् है। इसक प्रयोग रार्जस्थार्न के अलवर और भरतपुर के उत्तर-पश्चिम भार्ग में होतार् है। हरियार्णार् के गुड़गार्ँव के कुछ भार्ग में भी इस बोली क रूप देखार् जार् सकतार् है। ब्रज क्षेत्र से लगार् होने के कारण इस पर ब्रज क प्रभार्व होनार् स्वार्भार्विक है। मेवती में समृठ्ठ लोक-सार्हित्य है।

जयपुरी –

इस बोली क केन्द्र जयपुर है, इसलिए इसे जयपुरी नार्म दियार् गयार् है। इसक प्रयोग पूर्वी रार्जस्थार्न, जयपुर, कोटार् और बँूदी में होतार् है। इस बोली पर ब्रज क प्रभार्व दिखार्ई देतार् है। परसर्गो में कर्म-संप्रदार्न-नै, कै; करण-अपार्दार्न-सूं, सौ; अधिकरण-मै, मार्लैं विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इसमें समृठ्ठ लोक-सार्हित्य मिलतार् है।

मार्रबार्ड़ी़ – 

इस बोली को ‘मेबार्ड़’ क्षेत्र के नार्म पर ‘मेबार्ड़ी’ कहार् गयार् है। रार्जस्थार्न के पश्चिमी भार्ग में प्रयुक्त प्रयुक्त होने के कारण इसे पश्चिमी रार्जस्थार्न नार्म भी दियार् जार्तार् है। इसक मुख्य क्षेत्र जोधपुर है। पुरार्नी मार्रवार्ड़ी डिंगल कहते थे। मार्रवार्ड़ी व्यवसार्य की दृष्टि से रार्ष्ट्रीय स्तर पर प्रसिठ्ठ कवि नरपति नार्ल्ह, चन्दबरदार्ई इसी से संबंधित रहे हैं। मीरार्बार्ई की रचनार्ओं में यह रूप देख सकते हैैं।
इसमे ‘स’ ध्वनि ‘श’ हो जार्ती है।
अनुनार्सिक ध्वनि क बहुल प्रयोग।
तद्भव शब्दार्वली क बहुल रूप है।

मार्लवी- 

मार्लवार् क्षेत्र से संबंधित होने के आधार्र पर इसे मार्लवी नार्म मिलतार् है। रार्जस्थार्न के दक्षिण में प्रयुक्त होने से दक्षिण नार्म भी दियार् जार्तार् थार्। इसके प्रयोग क्षेत्र में उज्जैन, इन्दौर और रतलार्म आते हैं।
हिन्दी और उसक विकास
इसमें ‘ड़’ ध्वनि क विशेष प्रयोग होतार् है।
इसमें ‘ण’ ध्वनि नहीं हेै।

विभिन्न ध्वनियों क अनुनार्सिक रूप सार्मने आतार् है। इसमें समृठ्ठ लोक-सार्हित्य मिलतार् है।

पहार्ड़ी़ हिंदी

पहार्ड़ी हिंदी क उद्भव ‘खार्स’ अपभ्रंश से हुआ है। पहार्ड़ी क्षेत्र में यार्तार्यार्त की शिथिलतार् के कारण भार्षार् में विविधतार् क होनार् निश्चित रहार्। अध्ययन सुविधार् के लिए इसे तीन उपवर्ग में विभक्त कियार् जार्तार् है – पश्चिमी पहार्ड़ी, मध्य पहार्ड़ी, पूर्वी पहार्ड़ी।

पश्चिमी पहार्ड़ी़- 

इसक केन्द्र शिमलार् है। इसमें चंबार्ली, कुल्लई, क्योंथली आदि मुख्य बोलियार्ँ आती है। यहार्ँ की बोलियों की संख्यार् तीस से अधिक है। ये मुख्यत: टार्करी यार् टक्करी लिपि में लिखी जार्ती हैं। यहार्ँ हिंदी क मूलरूप हिंदी में ही मिलतार् है।

मध्य पहार्ड़ी़- 

नेपार्ल पूर्वी पहार्ड़ी क केन्द्र है। नेपार्ली, गुरखार्ली, पर्वतियार् और खसपुरार् नार्म भी दिए जार्ते है। इसमें समृठ्ठ लोक-सार्हित्य और संक्षिप्त-सार्हित्य भी मिलतार् है। नेपार्ल के संरक्षण मिलने के आधार्र पर इसक सार्हित्यिक रूप में विकास हो रहार् है। इसकी लिपि नार्गरी है।

दक्खिनी हिंदी

दक्खिनी शब्द दक्षिण क तद्भव शब्द है। आर्यो क आगमन जब सिंध, पंजार्ब प्रार्ंत में हुआ, तो यह भार्ग दार्हिने हार्थ की ओर थार्, उसे दक्षिण कहार् गयार् है। हिंदी सार्हित्य के इतिहार्स पर प्रार्चीनकाल से यदि विचार्र करें, तो भार्रत में प्रचलित विभिन्न लिपियों में हिंदी सार्हित्य मिलतार् है। गुजरार्ज और महार्रार्ष्ट्र में हिंदी क प्रयोग हिंदी भार्षार्-भार्षी क्षेत्र के समार्न ही होतार् रहार् है। मध्य युग में, हिंदी दक्षिण के प्रार्ंतो में आर्कषक रूप में प्रयुक्त होती थी।

अकबर के समय में दक्खिन क्षेत्र में मार्लवार्, बरार्र, खार्नदेश, औरंगार्बार्द, हैदरार्बार्द, मुहम्मदार्बार्द और बीजार्पुर आ गए हैं। इस प्रकार दक्खिन क्षेत्र में प्रयुक्त होने के कारण इसे दक्खिनी हिंदी नार्म दियार् गयार् है।

उद्भव-विकास :
चौदहवीं शतार्ब्दी में दिल्ली क शार्सक मुहम्मद-बिन-तुगलग थार्। उन्होंने दक्षिण की शार्सन व्यवस्थार् को अनुकूल रूप देने के लिए अपनी रार्जधार्नी को दिल्ली से दौलतार्बार्द करने क निर्णय लियार्। मुहम्मद-बिन-तुगलक के जार्ने से पूर्व निजार्मुद्दीन चिश्ती ने 400 सूफी पहले ही दक्षिण भेज दिए थे। तुगलक अपने सार्थ सूफी फकीर भी ले गयार्। वहार्ँ शार्सन व्यवस्थार् अनुकूल होने पर रार्जधार्नी को पुन: दौलतार्बार्द से दिल्ली लार्ने क निर्णय लियार्। उस समय आज की तरह-यार्तार्यार्त सुविधार् न थी। इस प्रकार अनेक सूफी-संत और सिपार्ही वहार्ँ से लौटे ही नहीं। इस निर्णय से तुगलक को ‘पार्गल’ की उपार्धि उवश्य मिली, किन्तु इससे दर्क्षिण में प्रभार्वी प्रचार्र हुआ। दिल्ली से जार्ने वार्लों की भार्षार् खड़ी-बोली, ब्रज, अवधी, पंजार्वी आदि के मिश्रित के रूप में थी। वहार्ँ हिंदी क प्रचार्र होतार् गयार्। अलार्उद्दीन खिलजी, अकबर, जहार्ँगीर, शार्हजहार्ँ और औरंगजेब के समय तक दक्खिनी हिंन्दी विकसित होती गई है। दक्खिनी भार्षार् के स्वरूप के विषय में डॉ. परमार्नंद पार्ंचार्ल क कथन इस प्रकार है – ‘‘दक्खिनी हिंदी  क वह रूप है, जिसक विकास 14 वीं सदी से अठार्रहवीं सदी तक दक्षिण के बहमनी, कुतुबशार्ही और आदिलशार्ही आदि रार्ज्यों के सुलतार्नों के संरक्षण में हुआ थार्। यह मूलत: दिल्ली के आसपार्स की हरियार्णवी एवं खड़ी-बोली ही थी, जिस पर ब्रज, अवधी और पंजार्बी के सार्थ मरार्ठी, सिंधी, गुजरार्ती और दक्षिण की सहवर्ती भार्षार्ओं अर्थार्त तेलगु, कन्नड़ और पूर्तगार्ली आदि क भी प्रभार्व पड़ार् थार् और इसने अरबी, फार्रसी, तुर्की तथार् मलयार्लम आदि भार्षार्ओं के शब्द भी प्रचुर मार्त्रार् में ग्रहण किये थे। इसके लेखक और कवि प्रार्य: इस्लार्म के अनुयार्यी थे। इसे एक प्रकार से सबसे मिश्रित भार्षार् कहार् जार् सकतार् है।’’ डार्. श्रीरार्म शर्मार् के अनुसार्र, बरार्र, हैदरार्बार्द, महार्रार्ष्ट्र और मैसूर में ही दक्खिनी हिंदी भार्षार् क उद्भव विकास हुआ है।
इसमें अव्यय शब्द ‘और’ के स्थार्न पर ‘होर’ क प्रयोग होतार् है।

नकारार्त्मक शब्द ‘नही’ के लिए ‘नक्को’ क प्रयोग होतार् है।

विविध भार्रतीय भार्षार्ओं के तत्सम और तत्सम शब्दों के सार्थ अरबी, फार्रसी शब्दों क प्रभार्वी प्रयोग मिलतार् है। शब्द रूप में पर्यार्प्त विधितार् मिलती है; यथार्- एक झयेक, यकी, यक्की, इक आदि दक्खिनी हिंदी क भार्षार्यी स्वरूप, भक्ति क तीन संत काव्य की भार्षार् से बहुत कुछ मेल खार्तार् है-

‘‘वे अरबी बोल न जार्ने,,
न फार्रसी पछार्ने
यूँ देखत हिंदी बोल
पन मार्नी है नफ्तोल’’
– मीरार्ँजी शम्सुल उश्शार्क्
‘‘ऐब न रार्खे हिंदी बोल,
मार्ने तो चख देख घंडोल।’’
– शेख बुरार्हार्नुददीन जार्नम
‘‘तुलनार्-
‘‘लूंचत मूंडत फिर फोकट तीरथ करे यार् हज।
थार्न देख जे भार्न भई मूरख भज।।’’
– मीरँजी शम्सुल उश्शार्क
‘‘मूड़ मड़ार्इ हरि मिले, तो सब कोउ लेठ मुड़ार्य।
बार्र-बार्र के मूड़ते भेड़ न बैकुंठ जार्य।।’’
– कबीर

दक्खिनी हिंदी में समृठ्ठ सार्हित्य है। इसके कुछ प्रतिनिधि सार्हित्यकार हैं-
उश्शक्, शेख बुरार्हार्नुददीन जार्नम, काजी महमूद बहरी, गुलार्म अली, और मुहम्मद अमीन आदि। निश्चय ही दक्खिनी हिंदी में हिंदी भार्षार् क एक विशेष स्वरूप है और इसमें समृठ्ठ सार्हित्य है। इसलिए हिंदी भार्षार् और हिंदी सार्हित्य के इतिहार्स में दक्खिनी हिंदी क महत्व स्वत: सिठ्ठ है।

पश्चिमी और पूर्वी हिंदी की तुलनार्

हिंदी भार्षार् के विभिन्न छ: भार्गों-पश्चिमी हिंदी, पूर्वी हिंदी, बिहार्री हिंदी, रार्जस्थार्नी हिंदी, पहार्ड़ी हिंदी और दक्खिनी हिंदी में पूर्वी और पश्चिमी हिंदी क विशेष महत्व है। हिंदी भार्षार् के मध्य युग में इन्ही दो वर्गो की अवधी और ब्रज दो बोलियों को हिंदी के रूप में मार्न्यतार् मिली थीं। इसी में काव्य-रचनार् होती रही है। भक्तिकाल में अवधि और ब्रज दोनों भार्षार्ओं को काव्य-सृजन में अपनार्ई जार्ती रही हैं और रीतिकाल में ब्रजभार्षार् प्रयुक्त होती थी। तुलसीदार्स ने ‘रार्मचरित मार्नस’ महार्काव्य की रचनार् अवधी में की है। जार्यसी ने ‘पदमार्वत’ की रचनार् ठेठ अवधि में की है। ‘प्रमार्श्रयी काव्य’ अवधी में ही लिखार् गयार् है। भक्ति काल के समस्त अष्टछार्प कवियों ने ब्रजभार्षार् को अपनार्यार् है, तो रीतिकाल के केशव, घनार्नन्द, बिहार्री आदि कवियों ने ब्रजभार्षार् को ही अपनार्यार् है।

तुलनार्त्मक अध्ययन

  1. पश्चिमी हिंदी की उत्पत्ति शौरसेनी अपभ्रंश से हुई, तो पूर्वी हिंदी क उद्भव अर्थ-मार्गधी से हुआ।
  2. पश्चिमी हिंदी की पार्ँच प्रमुख बोलियार्ँ हैं-कौरवी, हरियार्णवी, ब्रज, कन्नौजी, बुंदेली। पूर्वी हिंदी की तीन प्रमुख बोलियार्ँ है – अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी।
  3. पश्चिमी हिंदी निकटवर्ती भार्षार् पंजार्बी से यत्रार्-तत्रार् प्रभार्वित लगती है और पूर्वी हिंदी में बिहार्री हिंदी से पर्यार्प्त समार्नतार् मिलती है।
  4. पूर्वी हिंदी में ‘इ’ और ‘उ’ क बहुल रूप में प्रयुक्त पश्चिमी हिंदी में ‘ई’ और ‘ऊ’ के प्रयोग की प्रमुखतार् है। 
  5. पश्चिमी हिंदी में संयुक्त स्वरों क स्वतंत्र रूप में उच्चार्रण होतार् है, यथार्- बार्लक झ बार्लक किन्तु पूर्वी हिंदी में पूर्ववत रहती है।
  6. पूर्वी हिंदी में संयुक्त स्वरों क स्वतंत्र रूप में उच्चार्रण होतार् है, यथार्-और झ क अउर ऐनक झ अइनक। पश्चिमी हिंदी में संयुक्त स्वर क बहुल रूप में प्रयोग होतार् है।
  7. पूर्वी हिंदी में ‘ल’ के स्थार्न पर यदार्-कदार् ‘र’ क प्रयोग होतार् है, यथार्-केलार् झ केरार्, फर झ फल आदि। पश्चिमी हिंदी में ‘ल’ क प्रयोग होतार् है।
  8. पूर्वी हिंदी में ‘श’ ध्वनि प्रार्य: ‘स’ के रूप में प्रयुक्त होती है, यथार्-शंकर झ संकर, शेर झ सेर। पश्चिमी हिंदी में प्रार्य: मूल रूप प्रयुक्त होतार् है।
  9. पूर्वी हिंदी में ‘व’ ध्वनि प्रार्य: ‘ब’ के रूप में प्रयुक्त होतार् है; यथार्-वन झ बन, आशर्वार्द झ आसीर्वार्द आदि। पश्चिमी हिंदी में प्रार्य: मूल रूप प्रयुक्त होतार् है।
  10. पूर्वी हिंदी में कारक-चिह्न ‘ने’ क प्रयोग विरल रूप में होतार् है, जबकि पश्चिमी हिंदी क मुख्य चिह्न है। 
  11. पूर्वी हिंदी में उत्तम पुरुष सर्वनार्म में एकवचन के लिए ‘हम’ और बहुवचन के लिए ‘हम’ यार् ‘हम सब’ प्रयुक्त होते हैैं। जबकि पश्चिमी हिंदी में प्रार्य: एकवचन के लिए ‘मैं’ और बहुवचन के लिए ‘हम’ क प्रयोग होतार् है।
  12. पूर्वी हिंदी में क्रियार् के सार्थ यत्रार्-तत्रार् ‘ब’ क प्रयोग होतार् है-चलब, करब आदि तो पश्चिमी हिंदी (ब्रज) में ओकार रूप सार्मने आतार् है – चलनार् झ चलनों, करनार् झ करनो। 
  13. क्रियार् के भविष्यत् काल के रूप निर्धार्रण में ग, गी, गे के प्रयोग पश्चिमी हिंदी में मिलते हैं, किन्तु पूर्वी हिंदी में रूप-विविधतार् है।

इस प्रकार स्पष्ट रूप से कह सकते हैं कि हिंदी की प्रमुख उपभार्षार्ओं-पूर्वी हिंदी और पश्चिमी हिंदी की बोलियार्ँ की शब्द-संपदार् में बहुत कुछ समार्नतार् है, वहीं उनकी ध्वन्यार्त्मक, शब्द-संरचनार्गत और व्यार्करण आधार्र पर पर्यार्प्त भिन्नतार् है। यह भिन्नतार् ही संबंधित बोलियो की अपनी विशेषतार्एँ हैं। हिंदी की इन दोनों उप-भार्षार्ओं और उनकी बोलियों क महत्त्व स्वत: सिद्ध है।

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