हड़प्पार् सभ्यतार् क उद्भव, विस्तार्र, नगर-योजनार्

हड़प्पार् सभ्यतार् क उद्भव

हड़प्पार् सभ्यतार् के उद्भव सम्बन्धी मतों में भिन्नतार् क कारण है कि इस सभ्यतार् के अवशेष जहार्ँ कहीं भी मिले हैं। अपनी पूर्ण विकसित अवस्थार् में मिले हैं। सुमेरियन से उद्भव क मत – सर जॉन माशल, गाडन चार्इल्ड, सर माटीमी ह्वीलर आदि पुरार्विदों क कहनार् है कि हड़प्पार् सभ्यतार् क उद्भव मेसोपोटार्मियार् की सुमेरियन सभ्यतार् से हुर्इ है। इन विद्वार्नों के अनुसार्र सुमेरियन सभ्यतार् हड़प्पार् सभ्यतार् से प्रार्चीनतर थी। इन विद्वार्नों के अनुसार्र के दोनों सभ्यतार्ओ में कुछ समार्न विशेषतार्यें हैं जो इस प्रकार हैं

  1. दोनों नगरीय (Urban) सभ्यतार्यें हैं। 
  2. दोनों के निवार्सी कांसे तथार् तार्ंबे के सार्थ-सार्थ पार्षार्ण के लघु उपकरणो क प्रयोग करते थे। 
  3. दोनों के भवन कच्ची तथार् पक्की र्इंटों से बनार्ये गये थे। 
  4. दोनों सभ्यतार्ओं के लोग चार्क पर मिट्टी के बर्तन बनार्ते थे। 
  5. दोनों को लिपि क ज्ञार्न थार्। 

उपर्युक्त समार्नतार्ओ के आधार्र पर ह्वीलर से सैन्धव सभ्यतार् को सुमेरियन सभ्यतार् क एक उपनिवेश (Colony) बतार्यार् है किन्तु गहराइ से विचार्र करने पर यह मत तर्कसंगत नहीं प्रतीत होतार्। कारण कि दोनों सभ्यतार्ओ में इन बार्ह्य समार्नतार्ओ ं के होते हुए भी कुछ मौलिक विषमतार्यें भी है जिनकी हम अपेक्षार् नहीं कर सकते। सैन्धव सभ्यतार् की नगर-योजनार् सुमेरियन सभ्यतार् की अपेक्षार् अधिक सुव्यवस्थित है। दोनों के बर्तन, उपकरण, मूर्तियार्ँ, मुहरे आदि आकार-प्रकार में काफी भिन्न है। यह सही है कि दोनों की सभ्यतार्ओ ं में लिपि क प्रचलन थार्। किन्तु दोनो ही लिपियार्ँ परस्पर भिन्न है। जहार्ँ सुमेरियन लिपि में 900 अक्षर हैं, वहार्ँ सैन्धव लिपि मेंं केवल 400 अक्षर मिलते हैं। इन विभिन्नतार्ओं के कारण दोनों सभ्यतार्ओं को सुमेरियन उपनिवेशीकरण क परिणार्म नहीं कह सकते हैं।

वैदिक आर्यों से उद्भव क मत – 

कुछ विद्वार्न वैदिक आर्यों को ही इस सभ्यतार् क निर्मार्तार् मार्नते है। परंतु आर्यों को सैन्धव सभ्यतार् क निर्मार्तार् नहीं मार्नार् जार् सकतार् है। दोनों ही सभ्यतार्ओं की रीति-रिवार्जो, धामिक तथार् आर्थिक परम्परार्ओ  में पर्यार्प्त विभिन्नतार्यें दिखाइ देती हैं। सैंधव तथार् वैदिक सभ्यतार्ओं में मुख्य अन्तर इस प्रकार है-

  1. वैदिक आर्यों की सभ्यतार् ग्रार्मीण एवं कृषि प्रधार्न थी। जबकि सैंधव सभ्यतार् नगरीय तथार् व्यार्पार्र-व्यवसार्य प्रधार्न थी। आर्यो के मकान घार्स-फूल तथार् बार्ंस की सहार्यतार् से बनते थे किन्तु सैन्धव लोग इसके लिये पकी र्इटों क प्रयोग करते थे। 
  2. वैदिक कार्य लिंग पूजार् और मूर्ति पूजार् के विरोधी थे जबकि सैंधव लोग लिंग एवं मूर्ति पूजार् करते थे।
  3. आर्यों क प्रिय पशु अश्व थार् जबकि हड़प्पार् के लोग स्पष्टत: अश्व से परिचित नहीं थे। सिन्धु सभ्यतार् के लोग व्यार्घ्र तथार् हार्थी से भी परिचित थे। इसके विपरित वैदिक आर्यो को इनक ज्ञार्न नहीं थार्। 
  4. आर्यों के धामिक जीवन में गार्यन की महत्तार् थी इसके विपरीत सैंधव लोग वृषभ को पवित्र एवं पूज्य मार्नते थे। 
  5. सैन्धव निवार्सियों के पार्स अपनी एक लिपि थी जबकि आर्य लिपि से परिचित नहीं थे उनकी शिक्षार् प्रणार्ली मौखिक थी। 

द्रविड़ उत्पत्ति क मत – 

सैंधव सभ्यतार् की खुदाइ से भिन्न-भिन्न जार्तियों के अस्थिपंजर प्रार्प्त होते हैं। इनमें प्रोटो-आस्ट्रलार्यड (काकेशियन), मूमध्यसार्गरीय, मंगोलियन तथार् अल्पार्इन इन चार्र जार्तियों के अस्थिपंजर हैं। मोहनजोदड़ों के निवार्सी अधिकांशत: भूमध्य-सार्गरीय थे। अधिकांश विद्वार्नों की धार्रणार् है कि सैंधव सभ्यतार् के निर्मार्तार् द्रविड़ भार्षी लोग थे। सुनीति कुमार्र चटर्जी ने भार्षार् विज्ञार्न के आधार्र पर यह सिद्ध कियार् है कि ऋग्वेद में जिन दार्स-दस्युओ  उल्लेख हुआ है वे द्रविड़ भार्षी थे और उन्हें ही सिन्धु सभ्यतार् के निर्मार्ण क श्रेय दियार् जार्नार् चार्हिए। यह निष्कर्ष अन्यो  की अपेक्षार् अधिक वजनदार्र है तथार्पि इसे पूर्णतयार् निश्चित नहीं कहार् जार् सकतार् है।

तार्म्रपार्षार्णिक संस्कृति से उद्भव क मत – 

स्टुअर्ट पिगट, आल्चिन आदि कुछ पुरार्विदों क विचार्र है कि सैंधव की उत्पत्ति दक्षिणी अफार्गनिस्तार्न, ब्लूचिस्तार्न, सिन्ध तथार् पंजार्ब (पार्किस्तार्न) और उत्तरी रार्जस्थार्न (भार्रत) के क्षेत्रों में इसके पूर्व विकसित होने वार्ली तार्म्रपार्षार्णिक संस्कृतियों से हुर्इ। इन ग्रार्मीण संस्कृतियों के लोग कृषि कर्म तथार् पशुपार्लन करते थे और विविध अलंकरणो  वार्ले मिट्टी के वर्तन तैयार्र करते थे। खुदाइ से पशु तथार् नार्री मूर्तियार्ँ भी मिलती हैं। अनुमार्न कियार् जार् सकतार् है कि ब्लूचिस्तार्न के लोग मार्तृदवे ी की पजू ार् तथार् लिंगोपार्सनार् भी करते रहे होगें। इन संस्कृतियों के पार्त्रों पर प्रार्प्त कुछ चित्रकारियो  जैसे -पीपल की पत्ती, हिरण, त्रिभुज आदि सैंधव पार्त्रो  पर भी प्रार्प्त होती हैं। अत: इस सम्भार्वनार् से इन्कार नहीं कियार् जार् सकतार् है कि सैंधव सभ्यतार् क विकास इसी क्षेत्र की पवूर् वर्ती सभ्यतार्ओं से हुआ है। किन्तु यह निष्कर्ष भी अन्तिम नहीं होगार् क्योंकि इन ग्रार्मीण संस्कृतियों में लिपि तथार् मुहरों क प्रचलन एवं पकी र्इटो के प्रयोग क प्रमार्ण नहीं मिलतार् है।

वार्स्तविकतार् तो यह है कि हमार्रे ज्ञार्न की वर्तमार्न अवस्थार् मेंं सैंधव संस्कृति के निर्मार्तार्ओं और उद्भव क प्रश्न असंदिग्ध रूप से हल नहीं कियार् जार् सकतार्। सभ्ं ार्व है कि इस सभ्यतार् के निर्मार्तार् विभिन्न जार्तियो  के मिश्रण रहे हो जिन्होनं े अपने को एक सार्ंस्कृतिक सत्रू में आबद्ध कर लियार् हो। इस प्रश्न क अन्तिम निर्णय भविष्य की खुदाइयों से ही संभव है।

हड़प्पार् सभ्यतार् क विस्तार्र 

इस संस्कृति क उदय तार्म्रपार्षार्णिक पृष्ठभूमि पर भार्रतीय उपमहार्द्वीप के पश्चिमोत्तर भार्ग में हुआ है। इसक नार्म हड़प्पार् संस्कृति पडाऱ् क्योंि क इसक पतार् सबसे पहले 1921 में पार्किस्तार्न के पश्चिम पंजार्ब प्रार्न्त में अवस्थित हड़प्पार् के आधुनिक स्थल में चलार्। सिन्ध के बहुत से स्थल प्रार्क् हड़प्पीय संस्कृति क कोन्द्रीय क्षेत्र बने। परिणार्मस्वरूप वह संस्कृति परिपक्व होकर सिन्ध और पंजार्ब में नगर सभ्यतार् के रूप में परिणत हुर्इ। इस परिपक्व हड़प्पार् संस्कृति क केन्द्र स्थल पंजार्ब और सिन्ध मे, मुख्यत: सिन्धुघार्टी में पड़तार् है। यहीं से इसक विस्तार्र दक्षिण और पूरब की ओर हुआ। इस प्रकार हड़प्पार् संस्कृति के अन्तर्गत पंजार्ब, सिन्ध और ब्लूचिस्तार्न के भार्ग नहीं, बल्कि गुजरार्त, रार्जस्थार्न, हरियार्णार् और पश्चिमी उत्तर प्रदश्े ार् के सीमार्न्त भार्ग भी थे। इसक फैलार्व उत्तर में जम्मू से लेकर दक्षिण में नर्मदार् के मुहार्ने तक और पश्चिम में ब्लूचिस्तार्न के मकरार्न समुद्र तट से लेकर पूर्व में मेरठ तक थार्। यह समूचार् क्षेत्र एक त्रिभुज के आकार क है। इसक पूरार् क्षेत्रफल लगभग 1299600 वर्ग किलोमीटर है। अत: यह क्षेत्र पार्किस्तार्न से बड़ार् तो है ही, प्रार्चीन मिस्र और मेसोपोटार्मियार् से भी निश्चय ही बड़ार् है।

हड़प्पार् सस्कृति के लगभग 1000 स्थलो  क पतार् लग चुक है। इनमें कुछ हड़प्पार् संस्कृति की आरंभिक अवस्थार् के हैं, कुछ परिपक्व अवस्थार् के और कुछ उत्तर अवस्थार् के हैं किन्तु परिपक्व अवस्थार् वार्ले स्थलों की संख्यार् सीमित है, और उनमें केवल आधे दर्जन को ही नगर की संज्ञार् दी जार् सकती है। इनमें दो सर्वार्धिक महत्व के नगर थे – पजं ार्ब में हड़प्पार् और सिन्ध में मोहनजोदड़ों (अर्थार्त् प्रेतों क टीलार्)। दोनों पार्किस्तार्न में पड़ते हैं। दोनों एक दूसरे से 483 किलोमीटर दूर थे और सिन्धु नदी द्वार्रार् जुड़े हुए थे। तीसरार् नगर चन्हुदड़ों, चौथार् नगर गुजरार्त में खंभार्त की खार्डी के ऊपर स्थित लोथल, पॉचवार्ं नगर उत्तरी रार्जस्थार्न में कालीबंगार् वह छठार् नगर बनार्वली हरियार्णार् के हिसार्र जिले में स्थित थार्। कालीबंगार् और बनार्वली में हड़प्पार् पूर्व और हड़प्पार् कालीन दोनों सार्ंस्कृतिक अवस्थार्यें देखी जार् सकती है। कच्ची र्इटों के चबूतरों, सड़कों ओर मोरियों के अवशेष हड़प्पार् कालीन हैं। इन छहो  स्थलों पर परिपक्व और उन्नत हड़प्पार् सस्कृति के दर्शन होते है। सुतकागंडे ोर और सुरकोतड़ार् के समुद्रतटीय नगरों में भी इस संस्कृति की परिपक्व अवस्थार् दिखार्यी देती है। इन दोनों की विशेषतार् है एक-एक नगर दुर्ग क होनार्। उत्तर हड़प्पार् अवस्थार् गुजरार्त के काठियार्वार्ड़ प्रार्यद्वीप में रंगपुर और रोजड़ी स्थलों पार् पाइ गर्इ है।

हड़प्पार् सभ्यतार् की नगर -योजनार् 

नगर योजनार् को सिन्धु सभ्यतार् की ही प्रमुख विशेषतार् मार्नार् जार्तार् है। हड़प्पार् सभ्यतार् के नगर और कस्बे एक निश्चित योजनार् के अनुसार्र बसार्ये जार्ते थे। हड़प्पार्, मोहनजोदड़ो, कालीबंगार् तथार् सुत्कांगेनडोर के नगर-निवेश में मुख्य बार्तों में प्रार्य: समार्नतार् मिलती है। इन पुरार्स्थलों पर पूर्व और पश्चिम में दो टीले मिले हैं। पूर्व दिशार् में विद्यमार्न टीले पर नगर यार् आवार्स-क्षेत्र (Lower City) के सार्क्ष्य मिले है। पश्चिम के अपेक्षार्कृत ऊँचे किन्तु छोटे टीने पर किले अथवार् दुर्ग (Citadel) थे। हड़प्पार्, मोहनजोदड़ो तथ कालीबंगार् के दुर्ग मजबूत रक्षार् प्रार्चीर से युक्त थे और इनके आकार समलम्ब चतुर्भुज की तहर थे। रक्षार् प्रार्चीर में बुर्ज (Towers) तथार् पुश्ते (Bastions) बने हुये थे। कालीबंगार् क नगर क्षेत्र भी रक्षार्-प्रार्चीर से युक्त थार्, यद्यपि हड़प्पार् तथार् मोहनजोदड़ों के नगर क्षेत्र से अभी तक इस प्रकार के सार्क्ष्य नहीं मिले है।

सिन्धु सभ्यतार् के नगर क्षेत्र में सार्मार्न्य नार्गरिक, व्यपार्री, शिल्पकार कारीगर और श्रमिक रहते थे। दुर्ग के अन्दर मुख्यत: महत्वपूर्ण प्रशार्सनिक और सावजनिक भवन तथार् अन्नार्गार्र स्थित थे। मोहनजोदड़ों मेंं किले के भीतर पुरार्हित-आवार्स, सभार् भवनख् अन्नगार्र और विशार्ल स्नार्नार्गार्र स्थित थे। हड़प्पार् के दुर्ग के बार्हर उत्तर दिशार् में स्थित ‘एफ’ टीले पर अन्नार्गार्र, अनार्ज कूटने के वृत्तार्कार चबूतरे तथार् श्रमिक-आवार्स के प्रमार्ण मिले है। लोथल क दक्षिणी-पूर्वी भार्ग दुर्ग क्षेत्र थार् जिसमें अन्नार्गार्र अथवार् मार्लगोदार्म स्थित थार्। कालीबंगार् के दुर्ग-क्षत्रे के दक्षिणी आधे भार्ग में मिट्टी और कच्ची र्इटों के बने हुए आयार्तार्कार चबतू रे मिले हैं। इनमें से एक चबूतरे पर एक पंि क्त में सार्त ‘अग्निकुण्ड’ मिले हैं। जिनमें पशुओ की हड्डियार्ँ, श्रृंग तथार् रार्ख मिली हैं। इनके धामिक महत्व के विषय में कोर्इ संदेह नहीं है।

रिहार्यशी मकान – 

सिन्धु सभ्यतार् के नगरों में प्रत्येक रिहार्यसी मकान के बीच में एक ऑगन होतार् थार् जिसके तीन यार् चार्रो ओर चार्र पॉच कमरे, एक रसोर्इघर और एक स्नार्न घर बनार् होतार् थार्। अधिकांश घरो में एक कुआँ भी होतार् थार्। सम्पन्न लोगो  के घरों में शौचार्लय भी होते थे। कतिपय बड़े आकार के भवनार्ं े में तीस कमरे तक मिले हैं। मकानो  में मिल सीढ़ियों से इंि गत होतार् है कि दुमंजिले भवन भी बनते थे। घरों के दरवार्जे मुख्य सड़क में न खुलकर पिछवार्ड़े की ओर गली में खुलते थे। सडक़ की ओर खिड़की और रोशनदार्न भी नहीं होते थे। मिट्टी कूटकर , कच्ची र्इटें यार् पकी र्इटें बिछार् की मकानो  के फर्श बनार्ये जार्ते थे। कुछ इमार्रतों की दीवार्लों पर पलस्तर के भी सार्क्ष्य मिले हैं। अनुमार्न कियार् जार्तार् है कि छतें समतल होती थी। छतोंं पर घार्स-फूस बिछार् कर ऊपर से मिट्टी छार्प दी जार्ती थी।

मोहनजोदड़ो तथार् हड़प्पार् में पकी हुर्इ र्इटों क प्रयोग मकानों के निर्मार्ण के लिये कियार् गयार् है। लोथल, रंगपुर तथार् कालीबंगार् में भवनो  के निर्मार्ण के लिए कच्ची र्इटों क ही उपयोग कियार् गयार् है। कालीबंगार् में पकी हुइर््र र्इटों क प्रयोग केवल नार्लियो, कुओं तथार् देहली जो निर्मार्ण के लिये कियार् गयार् है। कर्इ आकार-प्रकार के र्इटों क उपयोग होतार् थार् किन्तु सुप्रचलित आकार 28 x 14 x 7 सेमी (4:2:1) थार्।

सड़कें – 

हड़प्पार् सभ्यतार् की वार्स्तुकलार् में सड़कों क महत्वपूर्ण स्थार्न थार्। सड़कों क निर्मार्ण एक सुनियोजित योजनार् के अनुसार्र कियार् जार्तार् थार्। मुख्य मागो  क जार्ल प्रत्येक नगर को पॉच-छ: खण्डों में  विभार्जित करतार् थार्। सड़कें कच्ची होती थी। सड़कों की स्वच्छतार् एवं सफाइ पर विशेष ध्यार्न दियार् जार्तार् थार्। कूड़ार्-कचरार् फेंकने के लिए सडक़ों के किनार्रे यार् तो गड्ढे बने होते थे अथवार् रखे रहते थे। नार्लियार्ँ – हड़प्पार् सभ्यतार् के नगरों में सड़कोंं तथार् गलियों के जल एवं मल के निकास लिए पक्की हुर्इ र्इटों की बनी हुर्इ नार्लियों की व्यवस्थार् थी। प्रार्य: नार्लियो  को बड़े आकार की पकी हुर्इ र्इटो  से ढक जार्तार् थार्। बडी़ नार्लियों पत्थर की पटियों से ढ़की हुर्इ मिली हैं। बरसार्ती और स्नार्नघरों के पार्नी और घरों के मल-मूत्र के बहने के लिए मल-कूप (Manroges) बने हुए थे। घरों की नार्लियार्ँ सड़क के किनार्रे की बडी़ नार्लियों में गिरती थी। नार्लियो  की संभवत: समय-समय पर सफाइ की जार्ती थी। मोहनजोदड़ों में नार्लियों के किनार्रे मिले रेते के ढेर इसके सार्क्ष्य हैं।

रार्जनीतिक संगठन 

हड़प्पार्, मोहनजोदड़ों तथार् कालीबंगार् आदि पुरार्स्थलो पर पश्चिम में दुर्ग तथार् पूर्व दिशार् में नगर की स्थिति से सिन्धु सभ्यतार् में सुदृढ़ प्रशार्सनतंत्र के अस्तित्व क सकं ेत मिलतार् है। प्रत्यक्ष प्रमार्णों के अभार्व होतु हुए भी यह अनुमार्न करनार् संभवत: उचित है कि हड़प्पार् सभ्यतार् की प्रशार्सनिक व्यवस्थार् में धर्म की महत्वपूर्ण भूमिक रही होगार्ी। अधिकांश विद्वार्नों के अनुसार्र सिन्धु सभ्यतार् क प्रशार्सन हड़प्पार् तथार् मोहनजोदड़ों नार्मक नगरो की दो रार्जधार्नियो से होतार् थार्। सभ्ं ार्व है कि कालीबंगार् तीसरार् महत्वपूर्ण प्रशार्सनिक नगर रहार् हो। ऐसार् संकेत मिलतार् है कि उत्तर अवस्थार् में गुजरार्त के लोथल में अग्नि पूजार् की परम्परार् चली, किन्तु इसके लिए मन्दिरों क उपयोग नहीं होतार् थार्। शार्यद हड़प्पाइ शार्सकों क ध्यार्न विजय की ओर उतनार् नहीं थार् जितनार् वार्णिज्य की ओर, और हड़प्पार् क शार्सन संभवत: वणिक् वर्ग के हार्थ में थार्।

आर्थिक संगठन – 

कृषि, पशुपार्लन के अतिरिक्त शिल्प और व्यार्पार्र हड़प्पार् सभ्यतार् के जीवन के प्रमुख आधार्र थे।

1. कृषि – 

हड़प्पार् सभ्यतार् के लोग बार्ढ उतर जार्ने पर नवम्बर के महीने में बार्ढ़ वार्ले मैदार्न में बीज बो देते थे और अगली बार्ढ़ के आने से पहले अप्रैल महीने में गेहूँ और जौ की अपनी फसल काट लेते थे। कालीबंगार् की प्रार्क् हड़प्पार् अवस्थार् में जो कूॅड (हल रेखार्) देखे गये हैं उनसे पतार् चलतार् है कि हड़प्पार् काल में रार्जस्थार्न में हल जोते जार्ते थे। हड़प्पाइ लोग शार्यद लकड़ी के हलों क प्रयोग करते थे। इस हल को आदमी खींचते थे यार् बैल इस बार्त क पतार् नहीं है। फसल काटने के लिये शार्यद पत्थर के हॅसियार्ं े क प्रयोग होतार् थार्। नार्लों को बॉधों से घेरकर जलार्शय बनार्ने की परिपार्टी ब्लूचिस्तार्न और अफगार्निस्तार्न के कुछ हिस्सो  मेंं रही।

हड़प्पार् सभ्यतार् के लोग गेहँू, जौ, राइ, मटर आदि अनार्ज पैदार् करते थे। वे दो किस्म क गेहूँ और जौ उगार्ते थे। बनार्वली में मिलार् जौ बढ़ियार् किस्म क है। इनके अलार्वार् वे तिल और सरसों भी उगार्ते थे। लगतार् है कि लोथल के लोग 1800 र्इ0प0ू में ही चार्वलार् उपजार्ते थे जिसक अवशेष वहार्ँ पार्यार् गयार् है। सबसे पहले कपार्स पैदार् करने क श्रेय सिन्धु सभ्यतार् के लोगों को है। चूंकि कपार्स क उत्पार्दन सबसे पहले सिन्धु क्षेत्र में ही हुआ, इसीलिए यूनार्न के लोग इसे सिन्डन कहने लगे जो सिन्धु शब्द से उद्भूत हुआ है।

2. पशुपार्लन – 

कृषि पर निर्भर होते हुए भी हड़प्पाइ लोग बहुत-सार्रे पशु पार्लते थे। वे बैल, गार्य, भैंस, बकरी, भेडं और सूअर पार्लते थे। उन्हें कूबड़ वार्लार् सार्ँड विशेष प्रिय थार्। कुत्ते शुरू से पार्लतू जार्नवरों में थे। बिल्ली भी पार्ली जार्ती थार्। कुत्तार् और बिल्ली दोनों के पैरों के निशार्न मिले हैं। वे गधे और ऊँट भी रखते थे और शार्यद इन पर बोझार् ढोते थे। घोड़े के अस्तित्व क सकेंत मोहनजोदड़ों की एक ऊपरी सतह से तथार् लोथल में मिले एक संदिग्ध मूर्तिक (टेरार्कोटार्) से मिलार् है। गुजरार्त के पश्चिम में अवस्थित सुरकोतड़ार् में घोडे़ के अवशेषों के मिलने की रिपोर्ट आर्इ है और वे 2000र्इ0 पू0 के आस-पार्स के बतार्ए गए हैं, परन्तु पहचार्न संदेहग्रस्त है। जो भी हो, इतनार् तो स्पष्ट है कि हड़प्पार् काल में इस पशु के प्रयोग क आम प्रचलन नहीं थार्। हड़प्पाइ लोग हार्थी, गैंडे से भी परिचित थे।

3. व्यार्पार्र – 

सिन्धु सभ्यतार् के लोगों के जीवन में व्यार्पार्र क बड़ार् महत्व थार्। इसकी पुष्टि हड़प्पार् मोहनजोदड़ो ं और लोथल में अनार्ज के बड़े- बड़े कोठार्रों के पार्ए जार्ने से ही नहीं होती, बल्कि एक बड़े भू-भार्ग में ढेर-सार्री सीलों (मुन्मुद्रार्ओं), एक लिपि और मार्नकीकृत मार्प-तोलों के अस्तित्व से भी होती है। हड़प्पाइ लोग सिन्धु-सभ्यतार् क्षेत्र के भीतर पत्थर, धार्तु, शल्क (हड्डी) आदि क व्यार्पार्र करते थे। वे धार्तु के सिक्कों क प्रयोग नहीं करते थे। संभवत: अनार्ज भी नार्वों और बैलगार्ड़ियों पर लार्द कर पड़ोस के इलार्कों में ले जार्ते और उन वस्तुओ के बदले धार्तुओं े ले आते। वे अरब सार्गर के तट पर जहार्जरार्नी (नौचार्लन) करते थे। वे चक्र के उपयोग से परिचित थे, और हड़प्पार् में ठोस पहियों वार्ली गार्ड़ियार्ँ प्रचलित थी। यह भी प्रतीत होतार् है कि हड़प्पाइ लोग किसी न किसी प्रकार के आज के इक्के (रथ) क भी इस्तेमार्ल करते थे। हड़प्पाइ लोगों क निर्मार्ण क वार्णिज्यिक सम्बन्ध रार्जस्थार्न के एक क्षेत्र से थार् और अफगार्निस्तार्न और र्इरार्न से भी। उन्हार्ंने े उत्तरी अफार्गार्निस्तार्न में एक वार्णिज्य उपनिवेश स्थार्पित कियार् थार्। जिसके सहार्रे उनक व्यार्पार्र मध्य एशियार् के सार्थ चलतार् थार्। उनके नगरों क व्यपार्र दजलार्-फरार्त प्रदेश के नगरो  के सार्थ चलतार् थार्। बहुत सी हड़प्पाइ सीलें मेसोपोटार्मियार् की खुदाइ में निकली हैं और प्रतीतार् होतार् है कि हड़प्पाइ लोगों ने मेसोपोटार्मियाइ नार्गरिकों के कर्इ प्रसार्धनों क अनुकरण कियार् है।

हड़प्पाइ लोगों ने लार्जवर्दमणि (Lops Lquli) क सुदूर व्यार्पार्र चलार्यार् थार्। 2350 र्इ0 प0ू के आस-पार्स और उसके आगे के मेसोपोटार्मियाइ अभिलेखो ं में मेलुहार् के सार्थ व्यार्पार्रिक सम्बन्ध क उल्लेख है। मेलुहार् सिन्धु क्षेत्र क प्रार्चीन नार्म है।

हड़प्पाइ नगरों क पतन – 

हड़प्पार् सभ्यतार् जैसे नगरीय सभ्यतार् के पतन के संदर्भ में इतिहार्सकारों ने अनेक कारणो  को उत्तरदार्यी मार्नार् है जो इस प्रकार हैं-

1. आर्योे के आक्रमण 

  1. मोहनजोदड़ों के ऊपरी स्तर पर कर्इ सार्रे कंकालों क अन्वेषण – इस बार्त क सार्क्ष्य है कि आर्यो ं ने स्थार्नीय जनसंख्यार् क व्यार्पक सहं ार्र कर डार्लार् थार्। 
  2. ऋग्वेद के अन्तर्गत वैदिक देवतार् इंद्र क उल्लेख दुर्ग-संहार्रक के रूप में कियार् गयार् है। परंतु यह सिद्ध हो चुक है कि मोहनजोदड़ों के ऊपरी स्तर के कंकाल किसी एक ही काल से सम्बन्ध नहीं रखते, इसीलिए उनसे जन-संहार्र क संकेत नहीं मिलतार्। किन्तु ऋग्वेद में दुर्ग-संहार्रक के रूप में इंद्र के उल्लेख को आवश्यकतार् से अधिक महत्व नहीं देनार् चार्हिए। अधिकांश आधुनिक विद्वार्न इस मार्न्यतार् को स्वीकार नहीं करते कि सिन्धु सभ्यतार् के अंत क कारण आर्यार्ं े के आक्रमण थे। 

2. सार्धनों क अधिक व्यय – 

एक आधुनिक मत यह है कि इस सभ्यतार् ने अपने संसार्धनों क जरूरत से ज्यार्दार् व्यय कर डार्लार् जिससे उसकी जीवन-शक्ति नष्ट हो गर्इ। परंतु इसकी जॉच के लिए विस्तृत अनुसंधार्न की आवश्यकतार् है।

3. विवर्तनिक विक्षोभ – 

एक अन्य आधुनिक मत यह है कि किसी विवर्तनिक विक्षोभ के परिणार्मस्वरूप मोहनजोदड़ों में सिन्धु नदी क पूर्वी बॉध ध्वस्त हो गयार् थार्। इससे सिंधु के बहार्व मेंं रूकावट आ गर्इ और उसके ऊपरी हिस्से में जहार्ँ मोहनजोदड़ोंं स्थित थार्। मिट्टी जमार् हो गर्इ। फलस्वरूप कुछ समय बार्द लोग मोहनजोदड़ों छोड़कर चले गये। इस सिद्धार्न्त की जॉच के लिए विस्तृत अनुसंधार्न की जरूरत है। 

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