हठयोग सार्धनार् के ऐतिहार्सिक विकास एवं परम्परार्

हठयोग सार्धनार् के ऐतिहार्सिक विकास 

हठयोग सार्धनार् के ऐतिहार्सिक विकास को हम दो परम्परार्ओं में बार्ँट सकतें है:- (1) परम्परार्नुसार्र विकास (2) ऐतिहार्सिक एवं पुरार्तार्त्विक विकास।

परम्परार्नुसार्र विकास – 

 परम्परार्नुसार्र हठ्योग सार्धनार् के विकास में ऐसी मार्न्यतार् चली आ रही है कि समस्त सार्धनों क मूल योग है, तप, जप, संन्यार्स, उपनिषद् ज्ञार्न आदि मोक्ष हेतु अनेक हैं किन्तु सर्वोत्कृष्ट योग माग ही है और योगमाग में प्रार्थमिक योग हठयोग ही है। इसी योग के प्रभार्व से शिव सर्वसार्मार्थ्र्य, ब्रह्यकर्त्तार्, विष्णु पार्लक हैं। योग के मुख्य उपदेष्टार् भगवार्न शिव नें पावती जी से कहार् कि ब्रह्य जी की कथार् से योगी यार्ज्ञवलक्यस्मृृिति बनी है। विष्णु (भगवार्न श्री कृष्ण जिनके अवतार्र मार्न जार्ते है।) ने गीतार् एवं भार्गवत् के ग्यार्रहवें स्कंध में कहार् है कि इसके मुख्य आचाय आदिनार्थ (शिवजी) हैं। इन्हीं से नार्थ संप्रदार्य शुरू हुआ। ऐसी श्रुति है कि एक समय आदिनार्थ किसी द्वीप में योगेश्वरी, जगत्जननी, भगवती आदिशिक्त्त, मार्ँ पावती को योग सार्धनार् को समझार् रहे थे तभी एक मछली ने यह दिव्य ज्ञार्न एवं दिव्य सार्धनार् से दिव्य मनुष्य देह प्रार्प्त कियार् एवं मत्स्येन्द्रनार्थ के नार्म से जार्ने गये। इन्हीं मत्स्येन्द्रनार्थ नें हठयोग सार्धनार् क प्रचार्र प्रसार्र कियार् इनके अनुयार्यियों में शार्बरनार्थ (जिन्होंने शार्बरतंत्र क प्रादुभार्व कियार्) इसी श्रृंखलार् में आनंदभैरव नार्थ, चौरंगीनार्थ, आदि हुऐ। ऐसी मार्न्यतार् प्रचलित है कि ये योगी इच्छार्अनुसार्र कही भी विचरण कर सकते थे। एक समय भ्रमण के दौरार्न एक चोर को हार्थ पैर कटे हुऐ इन्होंने देखार् इनकी कृपार् दृष्टि से उस चोर के हार्थ-पार्ँव ऊग आये तथार् उसे सत्यज्ञार्न भी हो गयार्। मत्स्येन्द्रनार्थ जी से योग पार्कर चौरंगियार् नार्म योगी सिद्ध विख्यार्त हुआ। मत्सयेन्द्रनार्थ से योग पार्कर मीननार्थ, गोरखनार्थ, विरूपार्क्ष बिलेशय, मंथार्नभैरव, सिद्धवृद्ध, कंथड़ी कोरंटक, सुरार्नंद, सिद्धपार्द, चर्पटी, कानेरी, पूज्यवार्द, नित्यार्नंद, निरंजन, कपार्ली, विंदुनार्थ, काकचंडीश्वर, अल्लार्म, प्रभुदेव, धोडार्चोली, टिंटिणी, भार्नुकी, नार्रदेव, चण्डकापार्लिक तार्रार्नार्थ इत्यार्दि योगसिद्धि पार्कर योगार्चाय हुए हैं।

ऐतिहार्सिक एवं पुरार्तार्त्विक विकास –

ऐतिहार्सिक एवं पुरार्तार्त्विक ज्ञार्न के आधार्र पर हठयोग सार्धनार् क विकास क्रम अनुमार्न लगार्यार् जार् सकतार् है। आप जार्नते है कि विश्व की सर्वार्धिक प्रार्चीन सभ्यतार् सिन्धुघार्टी की सभ्यतार् है। इस काल से शुरू कर हठयोग के विकास को समझने हेतु पुरार्तार्त्विक धरोहरों एवं प्रार्चीन सार्हित्य क आधार्र बनार्यार् गयार् है। इस प्रकार काल क्रमार्नुसार्र हठयोग विज्ञार्न क ऐतिहार्सिक विकास  है –

  1. पूूर्व वैदिक काल:- पुरार्तार्त्विक सार्क्ष्यों से ज्ञार्त होतार् है कि वैदिक काल के पूर्व 3000 सवीं पूर्व में सिन्धु घार्टी नार्मक एक ऐसी सभ्यतार् थी जिसमें मार्तृ शिक्त्त की पूजार् की जार्ती थी। यही से पुुरार्वशेष के रूप में प्रार्प्त पशुुपतिनार्थ की मुद्रार् पद्यमार्सन में अर्धनिमिलित नेत्र जो नार्सिक के अग्रभार्ग पर स्थिर है। हठयोग सार्धनार् के अंग आसन क सार्क्ष्य प्रदार्न करतार् है। इससे हठयोग सार्धनार् की परम्परार् क ऐतिहार्सिक कालार्नुक्रम पूर्व वैदिक काल तक पहँुचतार् है।
  2. वैदिक काल:- हठयोग सार्धनार् क ज्ञार्न वैदिक समय में थार् क्योंकि वैदिक सार्हित्य से ज्ञार्त होतार् है कि प्रार्णार्पनार्दि वार्यु, सत्यधर्म की महत्तार्, ध्यार्न, आचार्रशुद्धि ध्यार्नार्त्मक आसन की स्थिति आदि हठयौगिक क्रियार्-प्रक्रियार्ओं क स्पष्ट उल्लेख प्रार्प्त होतार् है। हठयोग को प्रार्णयोग भी कहते है। शथपथ ब्रार्म्हण, एतय ब्रार्म्हण, कौशीतिकी ब्रार्म्हण, जैमनीय एवं गोपथ ब्रार्म्हण आदि में प्रार्णविद्यार् के बार् में विस्तार्र से वर्णन है। प्रणव विद्यार् क विकसित रूप इस काल में आ चुक थार्।
  3. उपनिषदों को काल:- उपनिषदों के काल में हठ्योग सार्धनार् चरम उत्कर्ष पर थी। इस काल के सार्हित्य में प्रार्णयोग पर असार्धार्रण सार्हित्य प्रार्प्त होतार् है। वृहदार्रण्यकोपनिषद् (1.5.3) एवं छार्ंदोग्य उपनिषद् (1.3.3) में प्रार्ण अपार्न आदि पार्ँच वार्युओं के महत्व क वर्णन कियार् गयार् है। हद्रय तथार् उससे निकलने वार्ली नार्ड़ियो क वर्णन कठोपनिषद (2:3:16) तथार् छार्ंदोग्य उपनिषद (8.6.1) में पार्यार् जार्तार् है। हठ्योग में सबसे आधिक महत्वपूर्ण समझी जार्ने वार्ली सुषुम्नार्नार्ड़ी क अप्रत्यक्ष उल्लेख भी इन दोनों उपनिषदों में तथार् तैतरीय उपनिषद् (6.1) में मिलतार् है। श्वेतार्श्वतर उपनिषद में हठयोग के अभ्यार्सों क क्रमवार्र विवरण प्रार्प्त होतार् है। तथार् उनक शरीर क्रियार्त्मक प्रभार्व क वर्णन भी प्रार्प्त होतार् है। जिसकी परम्परार् परिवर्ती हठयोग सार्हित्य में प्रार्प्त होती है।
  4. महार्काव्य काल:- रार्मार्यण एवं महार्भार्रत काल में हठयोग सार्धनार् क पर्यार्प्त प्रयोग मिलतार् है। इस काल के अतुलनीय ग्रंथ श्रीमद्भगवत गीतार् में भी क जगह हठयोग सार्धनार् के तत्व प्रार्प्त होते है।
  5. सूत्र:- यह काल योग दर्शन की महार्न कृति पार्ंतजल योग सूत्र के संकलन क काल रहार् इसी समय के पहिले भगवार्न बुद्ध एवं भगवार्न महार्वीर क समय रहार्। इस तीनों धार्रार्ओं में हठयोग सार्धनार् के पर्यार्प्त तत्व प्रार्प्त होते है।
  6. स्मृति  काल:- स्मृति काल में हठयोग सार्धनार् क स्वरूप कुछ विशेष अर्थो के प्रादुभार्व के सार्थ हुआ। इस काल से रचित यार्ज्ञवलक्य स्मृति, मनुस्मृति, दक्षस्मृति आदि में पर्यार्प्त हठयोग सार्धनार् के सिद्धार्ंत समार्हित है।
  7. पौरार्णिक काल:- पौरार्णिक काल में हठयोग सार्धनार् पर पर्यार्प्त सार्हित्य उपलब्ध होतार् है। प्रथम सवी सदी के आसपार्स से पौरार्णिक काल की शुरूआत हो जार्ती है। इस काल में 18 पुरार्णों की परम्परार् है सार्थ ही इनके 18 उपपुरार्ण भी है हंलार्कि इनकी संख्यार् सैकड़ों में भी हो सकती है। इन पुरार्णों में हठयोग सार्धनार् के क संदर्भ जगह-जगह पर प्रार्प्त होते है।
  8. मध्य काल:- मध्यकाल में हठयोग सार्धनार् की गहरी परम्परार् रही है। इन परम्परार्ओं को चार्र प्रकारों में पृथक-पृथक अध्ययन की सुविधार् हेतु बार्ँटार् जार् सकतार् है। ये  है- (अ) तन्त्र धार्रार् (ब) नार्थ धार्रार् (स) भक्तिधार्रार् (द) शंकरार्चाय धार्रार्। इस काल में हठयोग सार्धनार् क उद्भव अपने चरमोत्कर्ष पर थार्। तन्त्रों में हिन्दू और बौद्ध दोनों तन्त्रों में हठयोग की सार्धनार्ओं के स्त्रोत भ पड़े है। नार्थों तथार् सिद्धों की सार्धनार् पद्धति तो शुद्ध हठयोग सार्धनार् विधार्न ही है। भिक्त्त काल में भी हठयोग सार्धनार् के तत्व शण्डिल्य सूत्र, नार्रद भक्ति सूत्र इत्यार्दि में प्रार्प्त होते हैं। शंकरार्चाय धार्रार् भी प्रार्ण सार्धनार् द्वार्रार् हठयोग से ओत-प्रोत है।
  9. पूूर्व आधुनिक काल:- इस काल में स्वार्मी शिवार्नंद, स्वार्मी विवेकानंद , स्वार्मी कुवल्यार्नंद आदि योग सार्धकों ने हठयोग के अंगोपर पर्यार्प्त बल दियार् है। एवं हठयोग सार्धनार् पर वैज्ञार्निक प्रयोग भी इस समय में किये गये है। इस काल हठयोग सार्धनार् के क ग्रंथों क प्रणार्यन हुआ।
  10. 21 वीं शतार्ब्दी क प्रार्रम्भ काल:- इस काल में विशेष धामिक सार्मार्जिक आंदोलनो के रूप में योग क जो स्वरूप विकसित हो रहार् है उसमें सर्वार्धिक प्रयोग हठयोग सार्धनार् के अंगों क हो रहार् है। इस काल में हठयोग सार्धनार् के आश्रमों संस्थार्ओं विद्यार्लयों तथार् विश्वविद्यार्लयों के स्तर पर भी हठ्योग सार्धनार् के अभ्यार्स को महत्व दियार् जार् रहार् है। इस सार्धनार् पद्धति पर शोध की संभार्वनार्एं बढ़ी है मेडिकल कॉलेजों में हठयोग के शरीर क्रियार्त्मक प्रभार्व पर अनेक शोध परियोजनार्एँ संचार्लित हो रही है। शसकीय स्तर पर भी इस सार्धनार् पद्धति को समर्थन एवं अनुदार्न प्रार्प्त हो रहार् है।

हठयोग सार्धनार् की परम्परार्

हठयोग सार्धनार् क अन्तिम लक्ष्य महार्बोध समार्धि है। हठयोग सार्धनार् की परम्परार् में हठयोग के आदि उपदेष्टार् योगीश्वर भगवार्न शिव से प्रार्रम्भ होती है। अन्य योगों की परम्परार् की तरह ही योग विज्ञार्न क ऐतिहार्सिक विकास तभी से शुरू हो जार्तार् है जब से मनुष्य क अस्तित्व शुरू होतार् हैं। भार्रतीय संस्कृति में ज्ञार्न के सभी स्त्रोतों क उदगम् श्वर से शुरू होतार् है। जिस प्रकार श्वर अनार्दि और अजन्मार् है, उसी प्रकार हठयोग विज्ञार्न भी सृष्टि के आरम्भ काल से प्रवार्हमार्न है। आदिनार्थ भगवार्न शिव क कथन शिवसंहितार् में प्रार्प्त होतार् है कि-

शिवविधार् महार्विद्यार् गुप्तार् गुप्तार् चार्ग्रे महेश्वरी। 

मदभार्षितमिदं शार्स्त्रं गोवनीय मतो बुधौ:

। हठविधार् परं गोप्यार् योगिनार् सिद्धिमिच्छतार्।।

 (शिवसंहितार् 5/249)

अर्थार्त् यह हमार्री कही हु महार्विधार् को ही शिव विद्यार् कहते है यह विद्यार् सभी प्रकार से गोपनीय है। यह विधार् हठयोग से शुरू होती है ऐसार् आगे भगवार्न शिव क मत इस परम्परार् और इसके महत्व एवं उपयोगितार् को निम्नश्लोक द्वार्रार् स्पष्ट करतार्

त्रैलोकये यार्नि भूतार्नि तार्नि सर्वार्णि देहत:। 

मेरूं संवेष्टय सर्वत्र व्यवहार्र: प्रवर्तते। 

जनार्ति य: सर्वमिदं स योगी मार्त्र संशय:।। 

(शिव संहितार् 2/4)

अर्थार्त जो त्रैलार्कय में चरार्चर वस्तु हैं सो सब इसी शरीर में मेरू के आश्रय हो के सर्वत्र अपने अपने व्यवहार्र को वर्तते हैं, जो मनुष्य यह सब जार्नतार् है सो योगी है। इसमें संशय नहीं हठयोग के अभ्यार्स की महत्ततार् पर भी आदि देव भगवार्न शिव क बड़ार् स्पष्ट उपदेश है।

हठं बिनार् रार्जयोगो रार्जयोगं बिनार् हठ:। 

तस्मार्त् प्रवर्तते योगी हठे सदगुरूमागत:।।

 (5/217)

अर्थार्त् हठयोग के बिनार् रार्जयोग और रार्जयोग के बिनार् हठयोग सिद्व नहीं होतार् इस हेतु से योगी को उचित है कि योगवेत्तार् सद्गुरू द्वार्रार् हठयोग में प्रवृत हो। परिवर्तो समय में भगवार्न शिव द्वार्रार् उपदेशित योग की परम्परार् ने दो स्वरूप ले लिए एक परम्परार् वैदिक परम्परार् और दूसरी तार्ंत्रिक परम्परार् है। योग की तार्ंत्रिक परम्परार् हमार्री आधुनिक जीवन पद्धति के अधिक समीप है फिर भी वैदिक और औपनिषदिक अवधार्रणार् किसी भी दृष्टि से कम प्रार्संगिक नहीं है। वेद ऋषियों-मनीषियों के मौलिक आध्यार्त्मिक, तार्त्विक, नैतिक, सार्मार्जिक एवं व्यार्वहार्रिक विचार्रों के संग्रह हैं। इस परम्परार् नें सृष्टि के प्रत्येक पहलू क अनुभव श्वरीय स्वरूप यार् प्रकृति की एक अभिव्यिक्त्त के रूप में कियार् है। वेद वस्तुत: चेतनार् के सार्क्षार्त्कार है जो चिन्तक विशेषों के कारण भिन्नतार् लिए प्रतीत होते है किन्तु अन्तिम सार्र सभी में एक समार्न ही है। ज्ञार्न और बुद्धि के स्तर पर वैदिक विचार्र धार्रार् यार् तार्ंत्रिक विचार्र धार्रार् जो भी हो किन्तु हठयोग की सैंद्धार्न्तिक पृष्ठभूमि के मूल में उपरोक्त्त सभी धार्रार्यें एक हो जार्ती है ये सिद्धार्ंत है-

  1. शरीर और मन दोनों एक दूस को प्रभार्वित करते है।
  2. प्रार्ण और मन में दोनों परस्परार्श्रित हैं।

इन दोनों हठयोग के सिद्धार्ंतों में मंत्र, लय एवं तार्रक योग की भी सैद्धार्ंतिक आवश्यकतार् की पूर्ति हो जार्ती है। क्योंकि स्थूल शरीर सूक्ष्म शरीर क ही परिणार्म है इस कारण स्थूल शरीर क प्रभार्व सूक्ष्म शरीर पर समार्नरूप से पड़तार् है। अत: स्थूल शरीर के अवलम्बन से सूक्ष्म शरीर पर प्रभार्व डार्लकर चित्त वृत्तिनिरोध करने की जितनी भी शैलियार्ं है उन सबको हठयोग के अन्र्तभूत ही समझार् जार्तार् है।

हठयोग परम्परार् के प्रमुख ऋषि 

हमने योग विज्ञार्न के परिचार्यार्त्मक स्वरूप के अंर्तगत हठ्योग परम्परार् के प्रमुख ऋषियों महर्षि भृगु और महर्षि विश्वमित्र के नार्मों क उल्लेख कियार् थार्। इसी श्रृखलार् में नौ नार्थों एवं चौरार्सी सिद्धों की भी गणनार् होती है। हठयोग के दो प्रमुख भेद है जो निम्नार्नुसार्र है:- (1) माकण्डेय हठयोग और (2) नार्थपंथी हठयोग।

माकण्डेय हठयोग – 

प्रार्चीन नार्लन्दार् विश्वविद्यार्लय बिहार्र रार्ज्य में स्थित थार्। 0 सन् 750 के आसपार्स अन्तिम गुप्त रार्जार् के समय बिहार्र में बौद्ध मतार्वलंबी पार्लवंशीय रार्जार्ओं क प्रभुत्व बढ़ गयार् इनक रार्ज्य कामरूप (असम) तक फैलार् थार्। इन्होंने भगलपुर के पार्स उदन्तपुरी में एक विशार्ल पुस्तकालय स्थार्पित कियार् और उसी के पार्स विक्रमशिलार् नार्मक वौद्ध विश्वविद्यार्लय 800 0 में स्थार्पित कियार् इन्ही दो संस्थार्ओं के प्रभार्व के कारण नार्लन्दार् विश्वविद्यार्लय क पतन हो गयार् थार्। इस विश्वविद्यार्लय में बड़े स्तर पर मंत्रार्यार्न, तंत्रयार्न तथार् वज्रयार्न क अध्ययन होने लगार्। वार्ममागीय तार्ंत्रिक उपार्सनार् जिसे सहजयार्न भी कहते है। यह सहजयार्न के सार्धक लोग 84 सिद्धों के नार्म से विख्यार्त हुऐ। इन 84 सिद्धों में प्रमुख सिद्ध सरहपार्, शबरपार्, लूहिपार्, तिलोपार्, भुसुक, जार्लन्धरपार्, मीनपार्, कव्हपार्, नार्रोपार्, तथार् शन्तिपार् विशेष रूप से प्रसिद्ध सिद्धों में जार्ने जार्ते है। इन सिद्धो में सिद्ध नरोपार् सुप्रसिद्ध दीपंकर श्रीज्ञार्न के गुरू थे। और नरोपार् के गुरू सिद्ध तिलोपार् थे। गोरखनार्थजी के गुरू मत्स्येन्द्रनार्थ के सिद्ध मीनपार् के पुत्र थे। और सिद्ध जार्लन्धरपार् मत्स्येन्द्रनार्थ के गुरू थे।

नार्थपंथी हठयोग- 

नार्थ सम्प्रदार्य क उदय लगभग 1000 0 के आसपार्स हुआ। इस सार्धनार् धार्रार् के नौ नार्थों क वर्णन  है- नौ नार्थ:- 1. गोरक्ष नार्थ 2. ज्वार्लेन्द्रनार्थ 3. कारिणनार्थ 4. गहिनीनार्थ 5. चर्पटनार्थ 6. वणनार्थ 7. नार्गनार्थ 8. भतर्ृनार्थ तथार् 9. गोपीचन्द्रनार्थ।

नार्थ सम्प्रदार्य के सार्धक कनफट योगी भी कहलार्ते है। इनकी विशेषतार् उनके कान में बड़े बड़े सींग के कुण्डल होनार् है। इसक तार्त्पर्य अत्यन्त गूढ़ है। कान छेदने से सार्धार्रणतयार् अन्त्रवृद्वि तथार् अण्डवृद्धि रोग नहीं होते। और कुछ सार्धकों क मत है कि इस प्रक्रियार् से योगसार्धनार् में भी सहार्यतार् मिलती है इन योगियों के गले में काले ऊन क एक बटार् हुआ धार्गार् होतार् है जिसे सेलेलेली कहते है। और इस सेली में सींग की एक छोटी सी सीटी बँधी रहती है जिसे नार्द (श्रृगीनार्द) के प्रतीक अर्थ से लियार् जार्तार् है।यह नार्दार्नुसंधार्न अथवार् प्रणवार्भ्यार्स क धोतक है। इनके हार्थ में नार्रियल क खप्पर होतार् है।

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