स्व-अधिगम सार्मग्री क्यार् है ?

स्व-अधिगम सार्ग्रमी दूरस्थ शिक्षार् की मूलार्धार्र है। इसे स्व-अनुदेशनार्त्मक, स्व-अध्ययन सार्मग्री एवं स्व-शिक्षण सार्मग्री के रूप में पुकारार् जार्तार् है। सभी नार्मों के मूल में एक ही तथ्य है अपने आप पढ़ने-सीखने वार्ली सार्मग्री अर्थार्त् ऐसी पार्ठ्यवस्तु सार्मग्री जिसे अध्येतार् स्वतंत्रत रूप से अध्ययन करके अपनी गति अपनी रूचि से सीखतार् है, और स्वयं अपनार् शिक्षण करतार् है। यह विशेष रूप से अभिकल्पित मुद्रित पार्ठ्यवस्तु दूर शिक्षार् में एक लोकप्रिय कार्यनीति है। मुद्रित पार्ठ्यों को स्वशिक्षण सार्मग्री के अभिकल्पन के सिद्धार्न्तों के आधार्र पर विकसित कियार् जार्तार् है। इसक मुख्य उद्देश्य उन विद्याथियों को सहार्यतार् करनार् होतार् है जो अपनी परिस्थितियों में स्वंत्रत रूप से सीखते हैं। दूरस्थ शिक्षार् मार्ध्यम में यह शिक्षण सार्मग्री के रूप में हैं, इसक उत्पार्दन व्यार्पक स्तर पर होतार् है। प्रभार्वी स्व-अधिगम सार्मग्री अध्येतार्ओं में अधिगम के प्रति रूचि जार्गृत करती है, और बनार्ये रखती है। किसी लेख तथार् पुस्तक के विपरीत स्व-अधिगम सार्मग्री क उद्देश्य विवेकपूर्ण प्रस्तुतीकरण नहीं होतार्। इस प्रकार स्व-अधिगम सार्मग्री पहचार्ने गये लक्ष्य वर्गों को ज्ञार्नार्त्मक अभिवृत्तियों और कौशलों के अर्जन के योग्य बनार्ने के प्रयोजन से विशेष रूप से अभिकल्पित की जार्ती है। दूर शिक्षार् के अध्येतार् अधिकत दूर से ही सीखते हैं, वे अपने घर अथवार् कार्यस्थल से अध्यार्पक एवं अपने सहपार्ठियों से बरार्बर अन्योन्यक्रियार् नहीं कर पार्ते है। अत: दूर शिक्षार् में स्व-अधिगम सार्मग्री में अध्यार्पक अप्रत्यक्ष रूप से शिक्षण करतार् है और अध्येतार् के सार्थ अप्रत्यक्ष वातार्लार्प करते हुये अधिगम की परिस्थितियार्ं उत्पन्न करतार् है। दूरस्थ अध्ययन में स्व-अधिगम सार्मग्री को प्रदार्न करने के निम्न उद्देश्यों को हम उल्लेखित कर सकते हैं।

  1. दूर अध्येतार्ओं को पार्ठ्यक्रम विशेष की जिसमें वे नार्मार्ंकित है, उसकी रूपरेखार् बतार्नार् ।
  2. दूर अध्येतार्ओं को आवश्यक पार्ठ्यक्रम के स्वरूप से परिचित करार्ते हुये अस्थिार्गम हेतु रूचि जार्गृत करनार्। 
  3. दूर अध्येतार्ओं को पार्ठ्यवस्तु के आकार से परिचित करार्नार्। 
  4. दूर अध्येतार्ओं की पार्ठ्यक्रम विशेष में आवश्यक पार्ठ्यवस्तु एकत्र करने हेतु मागदर्शन प्रदार्न करनार्। 
  5. पूर्व अध्ययन कर परार्मर्ण कक्षार्ओं में अपनी समस्यार्ओं को समार्धार्न हेतु उठार्ने में दूर अध्येयतार्ओं को अधार्र प्रदार्न करनार्।
  6. अप्रत्यक्ष रूप से शिक्षक एवं शिक्षाथी की अन्त:क्रियार् को प्रत्यक्ष करने क प्रयार्स करनार्।
  7. अध्येतार् को, स्व-अध्ययन हेतु अभिप्रेरित करनार् और ऐसी परिस्थितियार्ं उत्पन्न करनार् जिसमें वह अपनी गति से सीख सके।
  8. दूर-अध्येतार्ओं को अध्ययन केन्द्रों से जोड़नार् अर्थार्त् समस्यार्ओं को सुलझार्ने व परार्मर्श कक्षार्ओं में उपस्थिति क आधार्र स्व-अधिगम सार्मग्री बनती है। 
  9. दूर अध्येतार्ओं को दत्त कार्य एवं प्रोजेक्ट तथार् अन्य व्यार्वहार्रिक क्रियार्कलार्पों हेतु आधार्र प्रदार्न करनार्। 
  10. स्व अध्ययन हेतु आवश्यक दिशार् निर्देश व अभिप्रेरण प्रदार्न करनार्। 
  11. दूर अध्येतार्ओं में पार्ठ्यक्रम विशेष से सम्बंधित अन्तर्दृष्टि एवं अवबोध उत्पन्न करनार्। 

स्व-अधिगम सार्मग्री क स्वरूप 

स्व-अधिगम सार्मग्री को प्रदार्न किये जार्ने हेतु निर्धार्रित उद्देश्यों के विषय में आप विस्तार्र से पढ़ चुके है, अब यह आवश्यक है कि स्व-अधिगम सार्मग्री क स्वरूप एवं प्रकृति की चर्चार् की जार्ये। इसक स्वरूप एवं विशेषतार्यें निम्न है-

  1. स्वत: अधिगम सार्मग्री क आधार्र सम्प्रेषण सिद्धार्न्त-सम्पूर्ण विश्व में दूरस्थ एवं मुक्त शिक्षार् प्रणार्ली एक नवीन सार्मार्जिक, रार्जनैतिक चेतनार् के परिणार्म स्वरूप कियार् गयार् है। यह स्वतंत्र प्रेस एवं सार्मार्जिक दार्यित्व के सिद्धार्न्त प्रयोग द्वार्रार् इन उद्देश्यों को पूर्ण करने वार्ली एक सशक्त प्रणार्ली सिद्ध हो सकती है। अधिगम सार्मग्री में कुशल सम्प्रेषण प्रक्रियार् क प्रयोग करते हुये सूचनार्ओं की प्रार्संगिकतार् उपयुक्त चयन, सम्प्रेषण हेतु उपयुक्त संकेतों क निर्मार्ण एवं उनकी अर्थार्पन क्षमतार् तथार् संग्रार्हक से प्रार्प्त पृष्ठ पोषण को ध्यार्न में रखार् जार्तार् है। 
  2. स्व-अधिगम सार्मग्री के निर्मार्ण क आधार्र अधिगम के सिद्धार्न्त-दूरस्थ शिक्षार् में शिक्षक-शिक्षाथी के मध्य अन्त: क्रियार् मुद्रित पार्ठ्य सार्मग्री एवं इलेक्ट्रार्निक उपकरणों के मार्ध्यम से सम्पन्न होतार् है। इसमे थानार्डार्इक द्वार्रार् प्रतिपार्दित प्रभार्व क नियम, तत्परतार् क नियम एवं अभ्यार्स के नियम सम्मिलित है। अधिगम के व्यवहार्रवार्दी दृष्टिकोण क प्रयोग कर तीन चीजों पर ध्यार्न देने क प्रयार्स कियार् जार्तार् है। 
    1. परिणार्म क ज्ञार्न अथवार् पुष्टि तथार् सकारार्त्मक पुनर्बलन क प्रयोग। 
    2. पुनर्बल प्रदार्न करने में कम से कम विलम्ब। 
    3. जटिल व्यवहार्रों की व्यार्ख्यार् हेतु छोटे-छोटे घटक/उपघटक के रूप में अधिगम विभार्जन। व्यवहार्रवार्दी उपार्गम के पुनर्बलन सिद्धार्न्त पर आधार्रित स्व-अधिगम सार्मग्री के विकास में महत्वपूर्ण योगदार्न दियार् है। स्किनर के अनुसार्र पुनर्बलन अधिगम को आगे बढ़ार्ने में सहार्यक होतार् है। 
  3. वार्स्तविक कक्षार् शिक्षण हेतु परिस्थितियों क निर्मार्ण- सम्पूर्ण स्व-अधिगम सार्मग्री इस रूप में प्रस्तुत की जार्ती है जैसे कि वार्स्तविक कक्षार् शिक्षण में परिस्थितियार्ं उत्पन्न होती हे। वार्स्तविक कक्षार् शिक्षण में अध्यार्पक एवं अध्येतार् के मध्य की सम्पूर्ण प्रतिक्रियार्यें अप्रत्यक्ष रूप से उत्पन्न की जार्ती है। सभी इकाइयार्ं अपने आप में परिपूर्ण होती है। प्रस्तार्वनार् के सार्थ प्रार्रम्भ कर अध्येतार् को सीखने के लिये प्रेरित कर वार्स्तविक विषय वस्तु क प्रार्रम्भ अवधार्रणार् यार् संकल्पनार् से की जार्ती है। विषय को छोटे खण्डो में प्रस्तुत कर बोध प्रश्नों को रखकर प्रार्प्त ज्ञार्न को मार्पार् जार्तार् है, और फिर अध्येतार् को आगे बढ़ने हेतु अभिप्रेरित कियार् जार्तार् है। सम्पूर्ण विषय सार्मग्री में अध्यार्पक अप्रत्यक्ष रूप से अध्येतार् से अन्त:क्रियार् करतार् रहतार् है 

1. रोचक एवं लचीलार् 

स्व-अधिगम सार्मग्री को रोचक एवं अध्येतार् की मनोवैज्ञार्निक आवश्यकतार् के अनुसार्र संग्रहित एवं रचित होती है। स्व-अधिगम सार्मग्री में सभी तथ्यों को व्यवस्थित करके रखते हुये सम्पूर्ण विषय वस्तु को सरलतम तरीके से रखार् जार्तार् है। इस बार्त पर विशेष ध्यार्न रखार् जार्तार् है, कि विषय सार्मग्री को सरल से कठिन की ओर प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की ओर एवं ज्ञार्त से अज्ञार्त की ओर प्रस्तुत कियार् जार्तार् है। अध्येतार् को पार्रिभार्षिक शब्दार्वली, अनुभार्ग शीर्षक एवं उनके उपशीर्षक, रेखार्चित्र, उदार्हरण एवं व्यार्ख्यार् कर विषय वस्तु को ग्रहण करने में सहार्यक होते है।

2. व्यार्वहार्रिकतार् 

स्व-अधिगम सार्मग्री क स्वरूप व्यार्वहार्रिक होतार् है क्योंकि इसमें उसके लिये बोध प्रश्न एवं अभ्यार्स कार्य दिये जार्ते हैं, सम्पूर्ण विषय वस्तु अब तक जुड़ार् रहतार् है। स्व-अधिगम सार्मग्री में नवीन एवं आवश्यक तथ्यों को विषय सार्मग्री में जोड़ार् जार्तार् है, जिससे कि अध्येतार् हेतु वह उपयोगी हो और वह निर्धार्रित स्तर तक अधिगम कर सके।

दूरस्थ शिक्षार् हेतु स्व-अधिगम सार्मग्री विकास के आवश्यक तत्व 

शिक्षार् एक सोद्देश्य प्रक्रियार् है तथार् पार्ठ्यक्रम इन उद्देश्यों की पूर्ति क सबसे महत्वपूर्ण सार्धन है। दूरस्थ शिक्षार् में भी उद्देश्यों की प्रार्प्ति क प्रमुख सार्धन/आधार्र पार्ठ्यक्रम ही होतार् है। दूरस्थ शिक्षार् में पार्ठ्यक्रम क अर्थ अधिक व्यार्पक होतार् है तथार् इसके अन्तर्गत शिक्षण अधिगम के सार्थ-सार्थ अध्ययन के अन्य सभी तत्वों को भी सम्मिलित कियार् जार्तार् है। दूरस्थ शिक्षार् में स्व-अधिगम सार्मग्री क प्रार्रूपण एक जटिल एवं लम्बी प्रक्रियार् हे। अत: पार्ठ्यक्रम विकास ने परम्परार्गत शिक्षार् के सभी प्रमुख बिन्दुओं को समार्हित करने के सार्थ दूरस्थ शिक्षार् की आवश्यकतओं एवं लक्ष्यों को भी ध्यार्न में रखनार् होतार् है। इसी प्रकार दूस्थ शिक्षार् के पार्ठ्यक्रम में अग्रलिखित तत्वों को सम्मिलित कियार् जार्तार् है-

1. अधिगम के उद्देश्य क प्रस्तुतीकरण एवं व्यार्ख्यार् 

पार्ठ्यवस्तु में व्यार्पकतार् के कारण तीनों पक्षों को समार्हित करने क प्रयार्स कियार् जार्तार् है। इसमें अधिगम के उद्देश्यों क प्रस्तुतीकरण करते हुये व्यार्ख्यार् करने क प्रयार्स कियार् जार्तार् है।

2. अध्ययन सार्मग्री के मार्ध्यम से संवार्द 

परम्परार्गत शिक्षार् में वार्स्तविक कक्षार् शिक्षण के दौरार्न अध्यार्पक एवं अध्येतार् के मध्य सक्रिय सम्प्रेषण हो जार्तार् है, जबकि दूरस्थ शिक्षार् में संवार्दशीलतार् भी स्व-अधिगम सार्मग्री के मार्ध्यम से ही स्थार्पित की जार्ती है। इसके लिये पार्ठ्य सार्मग्री में अन्त: क्रियार्त्मकतार् की प्रवृत्ति एवं लय से युक्त होती है। अथात् सार्मग्री प्रस्तुतीकरण में वातार्लार्प शैली क पुट होनार् चार्हिये। पार्ठ्यलेखक को प्रश्नों एवं क्रियार्ओं को समार्विष्ट करनार् होतार् है। इसके अतिरिक्त गृहकार्य पर शिक्षण टिप्पणियार्ं श्रव्य-दृश्य मार्ध्यमों से शिक्षक की आवार्ज एवं प्रदर्शन भी अध्यार्पक-अध्येतार् की अन्त: क्रियार् को सम्भव बनार्ते हैं।

3. व्यक्तिगत जुड़ार्व को महत्व 

सम्पूर्ण स्व-अधिगम सार्मग्री तुम यार् आपके द्वार्रार् अध्येतार् को सम्बोधित किये जार्ते हैं, इससे अध्येतार् अध्यार्पक से जुड़ार्व क अनुभव करतार् है, और इसे वह अपनार् महत्व भी समझार्तार् है। इससे अध्येतार् क व्यक्तिगत विकास होतार् है। प्रत्यक्ष अन्त: क्रियार् हेतु प्रार्वधार्न दूरस्थ शिक्षार् में भी एक निश्चित अवधि अथवार् सुविधार्जनक समय पर आमने-सार्मने की अन्त:क्रियार् हेतु अध्यार्पक एवं अध्येतार् को अवसर दियार् जार्तार् है। विज्ञार्न एवं अन्य प्रयोगार्त्मक विषय इसके अतिरिक्त व्यार्वसार्यिक पार्ठ्यक्रमों में भी सम्पर्क कार्यक्रमों के आयोजन में प्रत्यक्ष सम्पर्क पर अत्यधिक बल दियार् जार्तार् है।

4. अध्ययन कौशलों के विकास पर केन्द्र बिन्दु 

दूरस्थ शिक्षार् में पार्ठ्यक्रम पूर्णतयार् स्व-अध्ययन पर आधार्रित होतार् है, अत: अध्येतार्ओं को इसके लिये तैयार्र करने क कार्य भी अनुदेशनार्त्मक सार्मग्री के मार्ध्यम से करनार् पड़तार् है, और स्व-अध्ययन के विविध कौशलों की उत्पत्ति एवं विकास हेतु आवश्यक संकेत एवं निर्देशन दिये जार्ने की आवश्यकतार् होती है, और पार्ठ्यक्रम प्रार्रूपण में इसक ध्यार्न रखार् जार्तार् है।

5. अध्येतार् की प्रकृति एवं आवश्यकतार् 

दूरस्थ शिक्षार् अध्येतार् उन्मुक्त होती है अत: पार्ठ्यक्रम निर्धार्रण में भी अध्येतार् की प्रकृति एवं आवश्यकतार् को केन्द्र बिन्दु बनार्कर कियार् जार्तार् है, उसकी आयु योग्यतार्, अनुभव एवं आकांक्षार् स्तर में पर्यार्प्त भिन्नतार् हो सकती है। इसके अतिरिक्त दूर अध्येतार् विभिन्न क्षेत्रों व विविध शिक्षण संस्थार्ओं के पूर्व विद्याथी हेार्ते हैं, और उनके अधिगम की आदतों के अतिरिक्त प्रकृति एवं उपलब्धि में भी प्र्यार्प्त अन्तर होतार् है, इस हेतु दूरस्थ शिक्षार् व्यवस्थार् में लगार्तार्र शोध निष्कार्णों क सहार्रार् लियार् जार्तार् है।

6. रार्ष्ट्रीय एवं सार्मार्जिक लक्ष्यों क समार्हित कियार् जार्नार् 

सभी स्तर की शिक्षार् क मुख्य उद्देश्य, व्यक्तिगत एवं सार्मार्जिक विकास होतार् है और शिक्षार् के द्वार्रार् समार्ज व्यक्ति व रार्ष्ट्र की उन्नति की संकल्पनार् को पूरार् करनार् है। ठीक इसी प्रकार से मुक्त एवं दूरस्थ शिक्षार् में भी पार्ठ्यक्रम विकास में इन तथ्यों को समार्हित कियार् जार्तार् है, और इस रूप में तैयार्र कियार् जार्तार् है कि वह समार्जोपयोगी एवं रार्ष्ट्रोपयोगी मार्नव संसार्धन तैयार्र करें।

स्व-अधिगम सार्मग्री की आवश्यकतार् 

दूरस्थ शिक्षार् व्यवस्थार् क मुख्य स्वरूप दूर अध्येतार् क दूर शिक्षार् संस्थार्न से दूरी है। इससे अध्येतार् पार्ठ्यक्रम के स्वरूप से लेकर शिक्षण तक निरार्श्रित रहतार् है। उसे न तो अध्यार्पक क निर्देशन प्रार्प्त होतार् है न ही सहपार्ठियों क मागदर्शन। इसीलिये स्व-अधिगम सार्मग्री इस कमी को ध्यार्न में रखकर ऐसे संकल्पित की जार्ती है, कि वह स्वयं में पूर्ण पर्यार्प्त, शैक्षणिक, स्पष्ट, निर्देशित, आंकलन करने योग्य तथार् सहपार्ठी की भार्ंति होती है। दूर अध्येतार् को सहार्रार् देने के सार्थ अधिगम व अध्ययन हेतु मागदर्शन देती है। इसके सार्थ ही दूर अध्येतार् के अधिगम को सुलभ बनार् देती है, और बार्ह्य सहार्यतार् को कम कर देती है।

स्व-अधिगम सार्मग्री दूर अध्येतार् को पार्ठ्यक्रम विशेष में क्यार् और कितनार् पढ़नार् है, और कहार्ं तक जार्ननार् आवश्यक है यह स्पष्ट करती है। यह दूर अध्येतार्ओं के समक्ष अधिगम की परिस्थितयार्ं उत्पन्न कर देती है, जिसमें विद्याथी सीखने के लिये विवश हो जार्तार् है। इनक स्वरूप इस प्रकार से निर्मित कियार् जार्तार् है कि वह ऐसार् प्रतीत होतार् है कि अध्यार्पक को अप्रत्यक्ष रूप से उपस्थित कर देतार् है, और अध्येतार् को ऐसार् प्रतीत होतार् है जैसे कि अप्रत्यक्ष रूप से कोर्इ उनकी आवश्यकतार्ओं की पूर्ति कर रहार् हो, उन्हें निर्देश दे रहार् है। स्व-अधिगम सार्मग्री में अध्येतार् को अपनी गति से अधिगम की सुविधार् के सार्थ-सार्थ अपने अधिगम के आंकलन की भी सुविधार् दी जार्ती है, इसके अतिरिक्त सम्पूर्ण शिक्षण सार्मग्री अध्यार्पक अध्येतार् की अप्रत्यक्ष वातार्लार्प को प्रकट करती है। स्व-अधिगम सार्मग्री पूर्णतयार् अध्येतार् उन्मुख होती है, इसीलिये यह मनोविज्ञार्न के सिद्धार्न्तों पर अभिकल्पित कियार् जार्तार् है।

1. स्व-अधिगम सार्मग्री क अभिकल्पन 

स्व-अधिगम सार्मग्री की अभिकल्पनार् करने तथार् उसक विकास करने के लिये उसकी मुख्य विशेषतार्ओं क बोध अनिवाय है। इसके अतिरिक्त स्व-अधिगम सार्मग्री के लेखकों एवं अभिकल्पकों की पूर्वार्पे्रक्षार्ओं क ज्ञार्न भी आवश्यक है। आइये हम इन पर नीचे चर्चार् करें।

2. स्व-अधिगम सार्मग्री की मुख्य विशेषतार्यें- 

स्व-अधिगम सार्मग्री के कुछ विशेष अभिलक्षण होते हैं। यद्यपि स्व-अधिगम सार्मग्री की ये विशेषतार्यें, उद्देश्यों, प्रयोजन और प्रस्तुतीकरण की शैली के आधार्र पर थोड़ार् बहुत भिन्न हो सकती है, तथार्पि स्व-अधिगम सार्मग्री की कुछ स्थार्यी विशेषतार्यें हैं। आइये हम नीचे इन विशेषतार्ओं पर विचार्र करें।

स्व-अधिगम सार्मग्री को यद्यपि यह नार्म दियार् जार्तार् है, तथार्पि उनक ध्यार्न केन्द्र अध्यार्पन अथवार् शिक्षण की अपेक्षार् अधिगम पर अधिक होतार् है। ये अलग-अलग शिक्षाथियों की आवश्यकतार्ओं पर आधार्रित है, न कि अध्यार्पक तथार् मुक्त अधिगम संस्थार्ओं की रूचियों पर। ये विद्याथियों को अपने अधिगम पर यथार्संभव अधिक से अर्थिार्क नियंत्रण प्रदार्न करती है। इसीलिये आजकल स्व-अधिगम सार्मग्री को स्व-अधिगम सार्मग्री कहार् जार्तार् है। स्व-अधिगम सार्मग्री के कुछ निश्चित अभिलक्षण हैं। इनमें से महत्वपूर्ण निम्नलिखित है-

3. स्व-व्यार्ख्यार्त्मक- 

स्व-अधिगम सार्मग्री इस अर्थ में स्व-व्यार्ख्यार्त्मक होती है कि विद्याथी अधिगम सार्मग्री के द्वार्रार् अध्ययन कर सकते हैं, और विषयवस्तु को बिनार् किसी प्रकार की अधिक बार्ह्य सहार्यतार्/समर्थन के आसार्नी से समझ सकते हैं। इसलिये, ये सार्मग्री विषयवस्तु, प्रस्तुतीकरण और भार्षार् की दृष्टि से किसी भी अस्पष्टतार् से मुक्त होनी चार्हिये। विषयवस्तु तर्कसंगत रूप से व्यवस्थित होनी चार्हिये, और प्रस्तुतीकरण सरल और प्रभार्वी होनार् चार्हिये। प्रत्येक वस्तु इस प्रकार स्पष्ट होनी चार्हिये कि अध्येतार् को सीखने और ज्ञार्न की वृद्धि करने में सहार्यक हो।

4. स्व-पूर्ण 

स्व-अधिगम सार्मग्री स्वयं में पूर्ण अथवार् स्वयं में पर्यार्प्त होनी चार्हिये। विद्याथी के लिये पार्ठ्यक्रम उद्देश्यों को प्रार्प्त करने के लिये अपेक्षित समस्त आवश्यक विषयवस्तु स्व-अधिगम सार्मग्री में सम्मिलित करनी चार्हिये। विद्याथी को अपने उद्देश्यों को प्रार्प्त करने के लिये अतिरिक्त अध्ययन सार्मग्री की आवश्यकतार् नहीं होनी चार्हिये, क्योंकि अतिरिक्त सार्मग्री प्रार्प्त करने में समस्यार्यें आती हैं। सार्थ ही स्व-अधिगम सार्मग्री अत्यधिक विषयवस्तु अथवार् अधिगम कार्य से अतिभार्रित नहीं होनी चार्हिये कि अध्येतार् उससे डर ही जार्य।

5. स्व-निर्देशित- 

एक प्रभार्वी अध्यार्पक के महत्वपूर्ण प्रकायोर्ंं में से एक विद्याथियों को आवश्यक ज्ञार्न, कौशल तथार् अभिवृत्तियों को स्वयं अर्जन के लिये विद्याथियों को निर्देश दे। इसी प्रकार शिक्षाथियों को स्व-अधिगम प्िरक्रयार् की प्रत्येक अवस्थार् पर आवश्यक मागदर्शन, संकेत और सुझार्व प्रदार्न करके स्व-अधिगम शिक्षार् एक प्रभार्वी अध्यार्पक क कार्य सम्पार्दित करती है। विषयवस्तु को तर्कसंगत अनुक्रम में प्रस्तुत करके, विद्याथियों के स्तर के अनुसार्र अधिगम संकल्पनार्ओं की व्यार्ख्यार् करके उचित स्व-अधिगम कार्यकलार्प प्रदार्न करके और विषयवस्तु को समझने में सरल बनार्ने के लिये चित्रोदार्हरण प्रस्तुत करके अधिगम को दिशार् दी जार्ती है।

6. स्व-अभिप्रेरक 

अभिप्रेरण प्रभार्वी अधिगम की पूर्व आवश्यकतार् है। स्व-अधिगम सार्मग्री मेंं विद्याथियों में रूचि और अभिप्रेरणार् उत्पन्न करने और बनार्ये रखने की क्षमतार् होनी चार्हिये। विषयवस्तु को जिज्ञार्सार्त्मक होनार् चार्हिये, समस्यार्यें उठार्नी चार्हिये और ज्ञार्न क सम्बंध विद्याथियों की परिचित परिस्थितियों से स्थार्पित करनार् चार्हिये तार्कि विद्याथी अभिप्रेरित अनुभव करे और उनक ज्ञार्न दश्ढ़ हो जार्ये। इस प्रकार क अभिप्रेरण और प्रबलीकरण अधिगम की प्रत्येक अवस्थार् पर देनार् चार्हिये।

7. स्व-अधिगम 

स्व-अधिगम सार्मग्री कार्यक्रमबद्ध शिक्षण के सिद्धार्न्तों पर आधार्रित होती है। कार्यक्रम शिक्षण के अभिलक्षण जैसे कि उद्देश्यों क विनिर्देशन, विषयवस्तु को छोटे (परन्तु प्रबंधनीय) चरणों में बार्ंटनार्, अधिगम अनुभवों क अनुक्रमण करनार्, प्रतिपुष्टि प्रदार्न करनार् आदि को स्व-अधिगम सार्मग्री में सम्मिलित कियार् जार्तार् है। इस प्रकार स्व-अम्मिार्गम सार्मग्री की ये विशेषतार्यें विद्याथियों को स्वंतत्र रूप से सिखार्ती है। विद्याथी अपनी स्वयं की अधिगम कार्यनीतियों को बनार् लेते हैं, और अपने आप ही सीखते हैं।

8. स्व-मूल्यार्ंकन 

स्व-अधिगम सार्मग्री विद्याथियों को इष्टतम अधिगम को सुनिश्चित करने के लिये, उचित प्रतिपुष्टि प्रदार्न करते हैं। वे विद्याथियों को यह भी जार्नकारी देते हैं कि क्यार् वे ठीक दिशार् में प्रगति कर रहे हैं अथवार् नहीं। स्व-जॉच अभ्यार्स, मूल पार्ठ में प्रश्न, कार्यकलार्प और अभ्यार्स के दूसरे प्रकार अध्येतार्ओं को उनकी प्रगति के विषय में बहुअपेक्षित प्रतिपुष्टि देते हैं। यहार्ं यह कहने की आवश्यकतार् नहीं है कि प्रगति से सम्बंधित प्रतिपुष्टि विद्याथियों को एक अधिगम बिन्दु से दूसरे अधिगम बिन्दु तक सीखने और आगे बढ़ने के लिये प्रबलित और अभिप्रेरित करतार् है। दूसरे शब्दों में, परिणार्म क ज्ञार्न अध्येतार्ओं को आगे सीखने के लिये सकारार्त्मक प्रबलन प्रदार्न करतार् है। उपर्युक्त विशेषतार्ओं के सार्थ स्व-अधिगम सार्मग्री के विकास के लिये इस बार्त की भी आवश्यकतार् है कि विणिण्ट ज्ञार्न, कौणलो और सक्षमतार्ओं वार्ले लोगों को सम्मिलित कियार् जार्ये। इसक यह तार्त्पर्य है कि दूरस्थ शिक्षकों से यह अपेक्षार् की जार्ती है कि उनमें प्रभार्वी स्व-अधिगम सार्मग्री के विकास के लिये कुछ निश्चित विशेषतार्एं हों।

9. पार्ठ्यक्रम लेखकों अपेक्षार्एॅ 

दूरस्थ अध्येतार्ओं के लिये अधिगम सार्मग्री क विकास करने के काम में लगे हुये अध्यार्पकों में विशिष्ट ज्ञार्न, कौशलों और सक्षमतार्ओं की अपेक्षार् की जार्ती है। दूरस्थ शिक्षार् अध्येतार्ओं के लिये स्व-अधिगम सार्मग्री तैयार्र करने वार्ले पार्ठ्यक्रम लेखकों में निम्नार्ंकित मुख्य पूर्वार्पेक्षार्ये होनी चार्हिये।

10. प्रणार्ली की सुविज्ञतार् 

पार्ठ्यक्रम लेखकों को सम्बंधित दूर शिक्षार् संस्थार् की शिक्षण प्रणार्ली से पूरी तरह परिचित होनार् चार्हिये। उन्हें पद्धति के विद्याथियों की रूपरेखार् और अनुसरण किये जार् रहे मार्ध्यम उपार्गम से भी परिचित होनार् चार्हिये।

11. लक्ष्य वर्ग की सुविज्ञतार् 

दूर शिक्षार् पद्धति में विद्याथी विभिन्न पृष्ठभूमियों, शैक्षिक योग्यतार्ओं, अनुभव, सार्मार्जिक आर्थिक स्तरों और आयु आदि से आते हैं। वे दूर शिक्षार् पार्ठ्यक्रम में विभिन्न भार्षार्त्मक योग्यतार्ओं, सीखने की सार्मथ्र्य, अध्ययन आदतों, पूर्व आवश्यक ज्ञार्न ग्रार्म-शहरों आदि से आकर भार्ग लेते हैं। अधिगम सार्मग्रियों के विकास में लगे पार्ठ्यक्रम लेखकों को दूर शिक्षार् के मार्ध्यम से शिक्षार् लेने वार्ले विद्याथियों के विभिन्न वर्गों की आवश्यकतार्ओं, अपेक्षार्ओं और सीखने की आदतों से परिचित होनार् चार्हिये। अधिगम सार्मग्री विद्याथियों के बौद्धिक स्तर के अनुसार्र तैयार्र करनी चार्हिये। अर्थपूर्ण, प्रभार्वी अधिगम सार्मग्री को विकसित करने के लिये पार्ठयक्रम लेखक को पार्ठ्य विवरण क पूर्ण ज्ञार्न होनार् चार्हिये। इसलिये यह दार्वार् करने के लिये कि दूरस्थ शिक्षण सार्मग्री स्व-पूरित और स्व-अधिगम है तो पार्ठ्यक्रम लेखक को सबसे पहले अधिगम अनुभव/कार्यों की दृष्टि से पार्ठ्य विवरण क पूरी तरह विश्लेषण करनार् चार्हिये। अपने परस्पर संबंधों पर आधार्रित, अधिगम कार्यों को उचित क्रम से व्यवस्थित करनार् चार्हिये। पार्ठ्यक्रम विशेष में विद्याथियों को उद्देश्यों को प्रार्प्त करने में सहार्यतार् देने की दृष्टि से लेखक केार् उसकी विषयवस्तु की व्यार्प्ति क ज्ञार्न होनार् चार्हिये।

12. अधिगम के सिद्धार्न्तों से परिचय 

कक्षार्-आधार्रित अध्येतार्ओं के विपरीत, दूर शिक्षार् अध्येतार् अपने घरों तथार् कार्यस्थलों पर स्वतंत्र रूप से पढ़ते हैं। पार्ठ्यक्रम लेखक के लिये विविध अध्यार्पन कार्यनीतियों के प्रयोग की आवश्यकतार् हेार्ती है, तार्कि विद्याथी अपनी आवश्यकतार्ओं के अनुसार्र अधिगम रणनीति क चयन कर सके। पार्ठ्यक्रम लेखकों में अधिगम और संचार्र के सिद्धार्न्तों क पर्यार्प्त ज्ञार्न ऐसी स्व-शिक्षण सार्मग्री की सर्जनार्त्मक अभिकल्पनार् में उनकी सहार्यतार् करतार् है जो अलग-अलग विद्याथियों के अनुकूल होते हैं। स्व- अधिगम सार्मग्री क आधार्र अधिगम सिद्धार्न्तों और शिक्षण मार्पदण्डों की ठोस नींव पर होनार् चार्हिये तार्कि विद्याथियों में इष्टतम अधिगम सुनिश्चित हो सके। यहार्ं इस बार्त पर जोर दियार् जार् रहार् है कि स्व-अधिगम सार्मग्री के लेखन/विकास के सिद्धार्न्त अध्यार्पन और अधिगम के सिद्धार्न्तों से उत्पन्न किये जार्ते हैं। इसलिये पार्ठ्यक्रम लेखकों को शिक्षण और अधिगम सिद्धार्न्तों की सम्यक जार्नकारी होनी चार्हिये। इसके अतिरिक्त दूर अध्येयतार्ओं के लिये स्व-अधिगम सार्मग्री विकसित करने के कार्य में लगे हुये व्यक्तियों में प्रभार्वी संचार्र के पूर्णज्ञार्न क होनार् भी एक पूर्वार्पेक्षार् है। विषयवस्तु, व्यार्ख्यार्, भार्षार्, प्रस्तुतीकरण आदि की स्पष्टतार् प्रभार्वी संचार्र और विद्याथियों द्वार्रार् अर्थपूर्ण अधिगम क सुनिश्चित करने में बहुत सहार्यक होगी। यह कहने की जरूरत नहीं है कि दूर शिक्षार्, यार् यों कहिये कि किसी प्रकार क अध्यार्पन परस्पर सहमत उद्देश्यों (प्रेषक और प्रार्पक द्वार्रार्) सूचनार्, अनुभव, विचार्रों आदि के आदार्न-प्रदार्न की एक प्रक्रियार् है। अनुभव और विचार्रों क बॉटनार्, सूचनार् और संदेशों के प्रेषक और प्रार्प्तकर्तार् के मध्य प्रभार्वी संचार्र पर निर्भर करतार् है। विशेषकर संचार्र तब प्रभार्वी होतार् है, जब वह उस भार्षार् में होतार् है जिसको प्रार्प्तकर्तार् पूरी तरह से समझतार् है जिससे प्रार्प्तकर्तार् की आवश्यकतार् की पूर्ति होती है।

स्व-अधिगम सार्मग्री के निर्मार्ण की प्रक्रियार् 

स्व-अधिगम सार्मग्री की निर्मार्ण करनार् उसकी रूपरेखार् तैयार्र करने की तरह है जो कुल मिलार्कर दूर शिक्षार् संस्थार् के पार्ठ्यक्रम/कार्यक्रम की अभिकल्पनार् बनार्ती है।

1. अधिगम एवं सम्प्रेषण सिद्धार्न्तों क पार्ठ्यक्रम निर्मार्ण में प्रयोग 

दूर शिक्षक को भी लगभग वे सभी क्रियार्यें (प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप में) सम्पन्न करनी होती है। जिन्हें एक औपचार्रिक एवं परम्परार्गत प्रशिक्षित कक्षार्-शिक्षक करतार् है। किन्तु देार्नों में प्रमुख अन्तर यह है कि परम्परार्गत शिक्षक जिन क्रियार्ओं को पार्ठ्य-वस्तु के मार्ध्यम से प्रत्यक्ष रूप में छार्त्रों के सम्मुख करतार् है, दूर शिक्षक को वहीं क्रियार्यें दूर शिक्षाथी को भेजी जार्नी वार्ली स्वि-अधिगम सार्मग्री के अन्दर अप्रत्यक्ष रूप में करनी होती है। दूसरे शब्दों में दूर शिक्षक को पार्ठयक्रम के प्रार्रूपण एवं निर्मार्ण में ही एक प्रशिक्षित शिक्षक की भूमिक निभार्नी होती है। इसके सार्थ ही दूर शिक्षक को पार्ठ्यक्रम प्रार्रूपण में इसक भी विशेष ध्यार्न रखनार् होतार् है कि पार्ठ्य-सार्मग्री क सफलतार्पूर्वक सम्पे्रषण भी सम्भव हो सके। अधिगम सिद्धार्न्त एवं सम्प्रेषण सिद्धार्न्त दूर शिक्षक को इनक कार्यों को सम्पन्न करने में दिशार् निर्देश प्रदार्न करते हैं। स्वत: अनुदेशनार्त्मक सार्मग्री क प्रार्रूप तैयार्र करने में दूर शिक्षक को क्रियार्यें करनी होती है-

  1. पार्ठ्य सार्मग्री क प्रस्तुतीकरण।
  2. उद्देश्यों की पहचार्न करनार्। 
  3. शिक्षाथियों को अभिप्रेरित करनार्। 
  4. शिक्षाथियों के अनुभवों क अधिकतम उपयोग करनार्।
  5. अधिगम क्रियार्ओं हेतु परिस्थितियार्ं प्रदार्न करनार्।
  6. धार्रण शक्ति में वृद्धि हेतु प्रार्वधार्न करनार्। 
  7. अधिगम-स्थार्नार्न्तरण को प्रोत्सार्हित करनार्। 
  8. पृष्ठपोषण हेतु अवसर प्रदार्न करनार्। 
  9. निर्देशन प्रदार्न करनार्। 

2. पार्ठ्य सार्मग्री क प्रस्तुतीकरण 

स्वत: अधिगम सार्मग्री क प्रस्तुतीकरण पार्ठ्यक्रम के स्वरूप पर निर्भर करतार् है। चूॅूकि दूर शिक्षार् के पार्ठ्यक्रमों हेतु पूर्व निर्धार्रित पार्ठ्य-पुस्तकें नहीं हेार्ती है तथार् पार्ठ्य-सार्मग्री को शिक्षाथी के स्वत: अधिगम को ध्यार्न में रखते हुये प्रस्तुत करनार् होतार् है। अत: सार्मग्री प्रस्तुतीकरण निम्नलिखित विशिष्टतार्ओं से युक्त होनार् चार्हिये- 

3. बौद्धिक स्पष्टतार् 

विषय-वस्तु क सही एवं स्पष्ट ज्ञार्न होन पर ही लेखक उसे ताकिक एवं क्रमबद्ध ढंग से से विश्लेषित एवं प्रस्तुत की गयी सार्मग्री ही स्वत: अधिगम को प्रोत्सार्हित करने में सक्षम होती है। 

4. भार्षार् की सरलतार् 

पार्ठ्य सार्मग्री में जटिल भार्षार् एवं शब्दों को प्रयोग स्वत: अधिगम में बार्धक होतार् है। अत: स्व अधिगम सार्मग्री सरल भार्षार् में प्रस्तुत की जार्नी चार्हिये। इसके लिये सार्मार्न्य शब्दों, छोटे एवं सरल वार्क्यों, विचार्रों एवं सम्प्रत्ययों की स्पष्ट अभिव्यक्ति, व्यक्तिगत सम्बंधों को विकसित करने वार्ली शैली तथार् यथार्सम्भव मनोरंजनार्त्मक प्रसंगों आदि क प्रयोग कियार् जार्नार् चार्हिये। 

5. सम्प्रत्ययों की मूर्ततार् 

शिक्षाथियों के लिये अमूर्त सम्प्रत्ययों को मूर्त वस्तुओं के मार्ध्यम से समझनार् सरल होतार् है। अत: कठिन सम्प्रत्ययों को चित्रों, रेखार्चित्रों, शार्ब्दिक चित्रार्वली, उदार्हरणों आदि के द्वार्रार् स्पष्ट कियार् जार्नार् चार्हिये। 

6. उपयुक्त मार्ध्यम 

यद्यपि शोध निष्कर्षों एवं अनुभवों से यही पतार् चलतार् है कि शिक्षाथी सभी मार्ध्यमों (मुद्रित, श्रव्य एवं दृश्य) से समार्न रूप में सफलतार्पूर्वक सीखते हैं, अथवार् सीख सकते हैं। इसके अतिरिक्त मार्ध्यमों के चयन में लार्गत-दक्षतार् सिद्धार्न्त क अनुपार्लन भी आवश्यक होतार् है। 

7. उद्देश्यों की पहचार्न करनार् 

उद्देश्यों की स्पष्टतार् स्वत: अधिगम को प्रोत्सार्हित करने में बहुत अधिक सहार्यक होती है। अत: स्व अधिगम सार्मग्री के प्रार्रम्भ में ही उस पार्ठ इकार्इ के उद्देश्यों की सूची प्रस्तुत करनी आवश्यकत होती है। यदि ये उद्देश्य अलग-अलग क्षेत्रों (ज्ञार्नार्त्मक, भार्वार्त्मक एवं क्रियार्त्मक) से सम्बंध रखते हो। उन्हें अलग-अलग सूचियों में प्रस्तुत करनार् चार्हिये। अधिकांश विषयों में उद्देश्यों को व्यार्वहार्रिक रूप में लिखने की आवश्यकतार् होती है क्येार्ंकि इससे शिक्षाथी को उन्हें समझने एवं प्रार्प्त करने में सरलतार् होती है। उद्देश्यों को व्यार्वहार्रिक रूप में लिखने हेतु ब्लूम के प्रतिमार्न क अनुसरण दूर शिक्षक के लिये बहुत उपयोगी हो सकतार् है। 

8. शिक्षाथी को अभिप्रेरित करनार् 

शिक्षक की ही भार्ंति अधिगम सार्मग्री को अभिप्रेरित कर सकती है। अभिप्रेरणार् क (स्तर उच्च, सार्मार्न्य, निम्न) सार्मग्री के बार्ह्य एवं आन्तरिक स्वरूप पर निर्भर करतार् है। सार्मग्री के बार्ह्य स्वरूप से तार्त्पर्य उसकी बार्हरी सार्ज-सज्जार् से है जो शिक्षाथी को प्रथम दृष्टि में आकर्षित करते है। उदार्हरणार्थ- अनुदेशनार्त्मक सार्मग्री जिस पुस्तिक के रूप में प्रस्तुत की जार्ती है, उसक आचरण, कागज, छपाइ, चित्र, रंग, आकार तथार् कभी-कभी पैंकिंग तक भी शिक्षाथी को उसके प्रति आकर्षित होने के बार्ध्य करते हैं। अत: ये सब बार्ह्य अभिप्रेरक के रूप में कार्य करते हैं।

स्व अधिगम सार्मग्री क आन्तरिक स्वरूप अर्थार्त् पस्तुत की गयी समिति की गुणवत्तार् ही सही अर्थों में शिक्षाथी को अभिप्रेरित करती है। सार्मग्री के आन्तरिक स्वरूप को गुणवत्तार् युक्त तभी कहार् जार् सकतार् है जब कि वह-’ 

  1. शिक्षाथियों की आवश्यकतार्ओं को पूर्ण करने वार्ली हो।
  2. शिक्षाथियों के अनुभवों के भरपूर प्रयोग से युक्त हो। 
  3. पर्यार्प्त पृष्ठपोषण प्रदार्न करने वार्ली हो। 
  4. स्ूचनार्ओं को व्यक्तिगत सम्बंध विकसित करने वार्ली शैली में प्रस्तुत कियार् गयार् हो। 
  5. मनोरंजनार्त्मक एवं रूचिकर अभ्यार्सों से युक्त हो। 
  6. अध्ययन इकाइयों को उपयुक्त आकार एवं लम्बाइ में प्रस्तुत कियार् गयार् हो। 
  7. आवश्यक सम्पूर्ण पार्ठ्यवस्तु उसमें निहित हो।
  8. दूर अध्येतार् की विशेषतार्ओं को धन में रखकर लिखी गयी हों।
  9. गश्हकार्यों को कठिनाइ स्तर के क्रम में प्रस्तुत कियार् गयार् हो। 

उपर्युक्त गुणों से युक्त स्व अधिगम सार्मग्री सार्मग्री शिक्षाथियों को उच्च स्तरीय अभिप्रेरणार् प्रदार्न कर सकती है। शिक्षाथी के अनुभवों क भरपूर उपयोग करनार् शिक्षाथियेार्ं को अभिप्रेरित करने क एक अच्छार् तरीक उनके अनुभवों क अधिक से अधिक उपयोग करनार् भी है। स्वत: अनुदेशार्नार्त्मक सार्मग्री के निर्मार्ण में भी इस विधि से लार्भ उठार्यार् जार् सकतार् है। यह उपार्गम शिक्षाथियेार्ं को अभिप्रेरणार् प्रदार्न करने के सार्थ-सार्थ पार्ठ लेखकों को इस रूप में भी सहार्यतार् प्रदार्न करतार् है कि पार्ठ को शिक्षाथियों के पूर्व ज्ञार्न से जोड़ते हुये प्रार्रम्भ कियार् जार्ये, तथार् उसके आधार्र पर नवीन ज्ञार्न प्रस्तुत कियार् जार्ये। पार्ठ सार्मग्री की भार्षार् व्यक्तिगत सम्बंध विकसित करने वार्ली शैली में होने पर अधिकांश शिक्षाथी इसे अपने पूर्व अनुभवों के आधार्र पर सरलतार् से ग्रहण कर लेते हैं, जबकि कठिन भार्षार् में वे पार्ठ्य-पुस्तक से विरक्त हो सकते हैं। अत: पार्ठ लेखक को शिक्षाथी के अनुभवों से युक्त भार्षार् क अधिकाधिक प्रयोग करनार् चार्हिये। 

पार्ठ इकार्इ के प्रार्रम्भ में दिये गये अध्ययन सम्बंधी कुछ आवश्यक निर्देश भी शिक्षाथी के लिये बहुत लार्भदार्यक होते हैं। इससे शिक्षाथी प्रस्तुत की गयी नवीन सार्मग्री को अपने पूर्वज्ञार्न से सम्बंधित कर सकने में समर्थ हो जार्तार् है। 

पार्ठ लेखक शिक्षाथियों के अनुभवों को आवश्यकतार्नुसार्र विभिन्न स्रोतों (इतिहार्स, भूगोल, जीवविज्ञार्न, समार्जशार्स्त्र,अर्थशार्स्त्र,वार्णिज्य, दैनिक जीवन की क्रियार्ओ, सार्हित्य, लोक कथार्ओं, जन संचार्र आदि) से चयनित कर सकतार् है। शिक्षक के आसपार्स भी इस तरह के अनेक अनुभव होते हैं। 

9. अधिगम क्रियार्ओं हेतु परिस्थितियार्ं प्रदार्न करनार् 

अधिगम की सबसे अच्छी विधि करके सीखनार् है। अत: स्व अधिगम सार्मग्री के अन्तर्गत भी इस तरह की परिस्थितियार्ं प्रदार्न की जार्नी चार्हिये, जिससे शिक्षाथी को अधिक से अधिक अधिगम क्रियार्ओं को करने क अवसर मिल सके। इसके लिये कुछ प्रमुख अधिगम परिस्थितियार्ं इस प्रकार की हो सकती है। 

अभ्यार्स कार्य – दूरस्थ शिक्षाथी को स्वयं करने के लिये प्रत्यके उप इकार्इ के पश्चार्त् अभ्यार्स कार्य दिये जार्ने चार्हिये। यदि सम्भव हो तो पार्ठ के अन्त में उनके उत्तर यार् उत्तर संकेत अथवार् संक्षिप्त उत्तर भी दिये जार्यें, जिससे शिक्षाथी अपने उत्तरों की पुष्टि कर सके। इससे उसे पृष्ठपोषण मिलतार् रहतार् है। 

गृहकार्य – दूर शिक्षाथी के लिये सबसे महत्वपूर्ण अधिगम क्रियार् गृहकार्य को पूरार् करनार् होतार् है। गश्हकार्य अभ्यार्स कार्य से भिन्न होतार् है। इनमें अपेक्षार्कृत लम्बार् उत्तर लिखनार् होतार् है। अत: गृहकार्य सम्बंधी प्रश्नों को ब्लार्क (इकार्इ समूह) के अन्त में दियार् जार्नार् चार्हिये। गृहकार्य से जहार्ं एक तरफ शिक्षाथी की निश्पत्ति क आंकलन हो पार्तार् है, वहीं दूसरी ओर यह द्विमागी शैक्षणिक संवार्द स्थार्पित करने में भी सहार्यक होतार् है। गृहकार्य हेतु विभिन्न प्रकार के प्रश्नों को दियार् जार् सकतार् है। उदार्हरणाथ- दीर्घ उत्तरीय प्रश्न, वस्तुनिष्ठ प्रश्न, प्रोजेक्ट कार्य, इकार्इ के बार्रे में सकारार्त्मक सुझार्व एवं समार्लोचनार् आदि। 

10. धार्रण शक्ति में वृद्धि करनार् 

शिक्षार् क उद्देश्य मार्त्र नवीन ज्ञार्न को प्रदार्न करनार् ही नहीं बल्कि उसे शिक्षाथी के मस्तिष्क में लम्बे समय तक धार्रण करवार्नार् भी है, जिससे वह उसक अपने जीवन में सदुपयोग भी कर सके। धार्रण शक्ति में वृद्धि क सबसे अच्छार् एवं प्रचलित तरीक सीखी गयी क्रियार्ओं को थोड़े-थोड़े अन्तरार्ल पर दुहरार्ते रहनार् है। स्वअधिगम सार्मग्री के अन्तर्गत भी सार्रार्ंश प्रस्तुतीकरार्, पुनर्बोधार्त्मक प्रश्नों तथार् गृहकार्य प्रश्नों के मार्ध्य से पार्ठ को कर्इ बार्र दुहरार्ने के अवसर प्रदार्न किये जार् सकते हैं। इसके अतिरिक्त अधिक से अधिक उदार्हरणो, उपयुक्त व्यार्ख्यार्ओं एवं टिप्पणियों केार् प्रस्तुत करके भी शिक्षाथी को यह अवबोध बार्र-बार्र करार्यार् जार् सकतार् है। 

11. अधिगम स्थार्नार्न्तरण को प्रोत्सार्हित करनार् 

शिक्षण अधिगम प्रक्रियार् के अन्तर्गत नवीन सम्प्रत्ययों, कौशलों को सीखनार् तथार् नवीन अभिवृत्तियों को विकसित करनार् ही पर्यार्प्त नहीं मार्नार् जार्तार् है। अधिगम की पूर्णतार् तभी होती है, जब शिक्षाथी उसे दूसरी परिस्थितियों में भी स्थार्नार्न्तरित एवं प्रयुक्त कर सके। इस प्रकार क उच्चस्तरीय अधिगम जटिल प्रयोगों एवं समस्यार् समार्धार्न वार्ले अभ्यार्स कार्यों के मार्ध्यम से प्रदार्न कियार् जार् सकतार् है। 

12. पृष्ट पोषण प्रदार्न करनार् – 

शिक्षण अधिगम प्रक्रियार् को प्रभार्वशार्ली बनार्ने के लिये उसमें निरन्तर सुधार्र की आवश्यकतार् होती है। अत: शिक्षक एवं शिक्षाथी के मध्य द्विमागी पृष्टपोषण प्रक्रियार् सम्पार्दित की जार्नी चार्हिये।

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