स्वार्मी विवेकानन्द क जीवन परिचय एवं शिक्षार् दर्शन

12 जनवरी, 1863 को स्वार्मी विवेकानन्द क जन्म कलकत्तार् के एक प्रसिद्ध वकील विश्वनार्थ दत्त के घर हुआ। मार्तार् प्रेम से उन्हें वीरेश्वर कहती थी पर नार्मकरण संस्कार के समय उनक नार्म नरेन्द्रनार्थ रखार् गयार्। बचपन से ही नरेन्द्रनार्थ में विलक्षण प्रतिभार् के लक्षण दिखते थे। एक तरफ वे अत्यंत ही चंचल थे तो दूसरी तरफ उनकी स्मरण शक्ति अद्भुत थी। सार्त वर्ष की अल्पार्यु में ही उन्हें कृतिवार्स की बंगलार् रार्मार्यण यार्द हो गयी थी।

नरेन्द्रनार्थ एक मेघार्वी छार्त्र थे। 1879 में प्रथम श्रेणी में प्रवेशिक परीक्षार् उत्तीर्ण कर उन्होंने कलकत्तार् के सबसे अच्छे महार्विद्यार्लय- प्रेसीडेन्सी कॉलेज में प्रवेश लियार्। बार्द में वे एक दूसरे महार्विद्यार्लय में भी पढ़े। विवेकानन्द क अंग्रेजी और बंगलार्- दोनो ही भार्षार्ओं पर अधिकार थार्। धर्मशार्स्त्र, इतिहार्स, विज्ञार्न आदि विषयों में इनकी गहरी रूचि थी। वे विद्यार्थ्री जीवन में अत्यन्त ही क्रियार्शील थे एवं विभिन्न क्रियार्कलार्पों में रूचि लेते थे। परम्परार्गत भार्रतीय व्यार्यार्म एवं कुश्ती से लेकर क्रिकेट जैसे आधुनिक खेल में उनकी रूचि थी। बी0ए0 की परीक्षार् के उपरार्ंत नरेन्द्र के पितार् उनक विवार्ह करार्नार् चार्हते थे पर नरेन्द्र गृहस्थ क जीवन जीनार् नहीं चार्हते थे। पितार् की अकस्मार्त् मृत्यु ने विवार्ह के प्रसंग को रोक दियार्। पर नरेन्द्र के कन्धे पर पूरे परिवार्र क बोझ आ पड़ार्।

नरेन्द्रनार्थ को कोर्इ भी बन्धन यार् मोह बार्ँध नहीं सका। सत्य की खोज में वे ब्रह्मसमार्ज की सभार्ओं में आने-जार्ने लगे। लेकिन उनकी ध् ाम-पिपार्सार् वहार्ँ शार्ंत नहीं हो पाइ। उन्हें सत्य एवं ब्रह्म क सार्क्षार्त्कार स्वार्मी रार्मकृष्ण परमहंस से मिलने के उपरार्ंत ही हुआ। चौबीस वर्ष की अवस्थार् में नरेन्द्रनार्थ ने सन्यार्स ग्रहण कर लियार्- वे अपने योग्य गुरू रार्मकृष्ण परमहंस के योग्यतम शिष्य ‘स्वार्मी विवेकानन्द’ के रूप में ‘जगत प्रसिद्ध’ हुए। विवेकानन्द ने परिब्रार्जक के रूप में कश्मीर से कन्यार्कुमार्री तक समस्त भार्रत क भ्रमण कियार्। इस अनवरत भ्रमण ने जहार्ँ स्वार्मी विवेकानन्द के ज्ञार्न को बढ़ार्यार् वहीं वे भार्रत के दीन-दुखियों की विवशतार् को भी अपनी आँखों से देख सके। स्वार्मी जी जहार्ँ भी गये लोग उनकी विद्वतार्, तेज और संकल्प-शक्ति से प्रभार्वित हुए बिनार् नहीं रहे। स्वार्मी

विवेकानन्द की चरम प्रसिद्धि क क्षण 1893 में आयार् जब वे संयुक्त रार्ज्य अमेरिक के शिकागो नगर में आयोजित सर्वधर्म सम्मेलन में हिन्दू धर्म के प्रतिनिधि के रूप में सम्मिलित हुए। शिकागो धर्म सम्मेलन में सम्मिलित होने में होनी वार्ली कठिनार्इयों के संदर्भ में विवेकानन्द स्वंय कहते हैं- ‘‘आज से चार्र वर्ष पहले मैं अमेरिक जार् रहार् थार्- सार्त समुद्र पार्र बिनार् किसी जार्न पहचार्न के, एक धनहीन, मित्रहीन, अज्ञार्त सन्यार्सी के रूप में।’’ अमेरिक पँहुचने के बार्द की स्थिति के बार्रे में वे लिखते हैं- ‘‘मेरे पार्स रूपये बहुत कम थे और वे शीघ्र समार्प्त हो गए। इधर जार्ड़ार् भी आ गयार् और मेरे पार्स थे सिर्फ गरमी के कपड़े। इस घोर शीतप्रधार्न देश में आखिर क्यार् करूँ, यह कुछ सूझतार् न थार्। भीख मार्ँगने पर जेल में ठूँस दियार् जार्तार्।’’ इन विपरीत परिस्थितियों में भी स्वार्मी विवेकानन्द ने हिम्मत नहीं हार्री। उनके ‘ब्रदरर्स एण्ड सिस्टर्स ऑफ अमेरिका’ के सम्बोधन मार्त्र से सभार् स्थल करतल ध्वनि से गूँज उठार्। इस अभिभार्षण से विवेकानन्द विश्व भर में सर्वश्रेष्ठ धामिक पुरूष के रूप में स्वीकार किए ही गए, हिन्दू धर्म एवं भार्रत की आध्यार्त्मिक परम्परार् की श्रेष्ठतार् भी पूरे विश्व ने स्वीकार कर ली। उन्होंने विश्व के अनेक देशों क भ्रमण कर हिन्दू धर्म एवं संस्कृति की विजय-पतार्क पूरे विश्व में फहराइ।

अपने गुरू स्वार्मी रार्मकृष्ण परमहंस के विचार्रों के प्रसार्र, वेदार्न्त ज्ञार्न के अध्ययन एवं प्रचार्र तथार् दीन-दुखियों की सेवार् के लिए स्वार्मी विवेकानन्द ने 1 मर्इ, 1897 को रार्मकृष्ण मिशन की स्थार्पनार् की। विवेकानन्द जीवन पर्यन्त अपने उद्देश्यों की प्रार्प्ति के लिए कार्यशील रहे। वे एक महार्न ऋषि परम्परार् के प्रतिनिधि थे, जिनक देहार्वसार्न 39 वर्ष की अल्पार्वस्थार् में हो गयार्। भार्रत के आध्यार्त्मिक गगन के चमकते सूरज क भरी दोपहरी में अस्त हो गयार्। पर आज भी स्वार्मी विवेकानन्द के वचन एवं कार्य हमार्रे माग को आलोकित करने में सक्षम है।

स्वार्मी विवेकानन्द क जीवन-दर्शन 

स्वार्मी विवेकानन्द ने वेदार्न्त-दर्शन की व्यार्ख्यार् आधुनिक परिप्रेक्ष्य में की तथार् निरार्शार् एवं कुंठार् के दल-दल में फँसी हुर्इ भार्रतीय जनतार् को जीवन क नयार् पथ दिखार्यार्।

स्वार्मी विवेकानन्द क वेदों और उपनिषदों पर अटूट विश्वार्स थार्। उन्होंने पूरे विश्व में वेदार्न्त दर्शन को सर्वजनीन, सावभौमिक दर्शन के रूप में प्रचार्रित-प्रसार्रित कियार्। स्वार्मी विवेकानन्द के नव्य वेदार्न्त दर्शन में आधुनिक वैज्ञार्निक खोजों तथार् समकालीन विचार्रों को स्थार्न मिलार्। स्वार्मी जी क दृढ़ विश्वार्स थार् कि देश की भैतिक उन्नति एवं सार्मार्न्य जन की समृद्धि उतनार् ही आवश्यक है जितनार् व्यक्ति और समार्ज की आध्यार्त्मिक उन्नति। विवेकानन्द क सम्पूर्ण दर्शन गरीबी के अभिशार्प में डूबी भार्रतीय जनतार् के कल्यार्ण की कामनार् है। वे प्रार्य: कहार् करते थे- ‘‘रोटी क प्रश्न हल किये बिनार् भूखे मनुष्य धामिक नहीं बनार्ये जार् सकते। इसलिए रोटी क प्रश्न हल करने क नयार् माग बतार्नार् सबसे मुख्य और सबसे पहलार् कर्तव्य है।’’

विवेकानन्द शंकरार्चाय की ही तरह सृष्टि क कर्तार् ब्रह्मार् को ही मार्नते थे। वे यह भी स्वीकार करते थे कि यह वस्तु-जगत ब्रह्म की मार्यार् शक्ति के द्वार्रार् निर्मित है, परन्तु ये मार्यार् और जगत को असत्य नहीं मार्नते थे, पर वे मार्यार् एवं जगत के मूल तत्व ब्रह्म को अन्तिम सत्य मार्नते थे। वे शंकरार्चाय की ही तरह मार्नते थे कि आत्मार् ब्रह्म क अंश होती है, इसलिए वह भी अपनें में पूर्ण होती है। शंकर की तरह विवेकानन्द भी मार्नते थे कि मनुष्य जीवन क अन्तिम उद्देश्य मुक्ति है। परन्तु विवेकानन्द द्वार्रार् प्रस्तार्वित मुक्ति अधिक व्यार्पक है। उनक विश्वार्स थार् कि जब तक मनुष्य शार्रीरिक दुर्बलतार्, मार्नसिक दार्सतार्, आर्थिक अभार्व एवं हीनतार् की भार्वनार् से मुक्त नहीं होतार् तब तक उसकी मुक्ति संभव नहीं है।

विवेकानन्द ने ज्ञार्न को दो भार्गों में विभार्जित कियार्- वस्तु जगत क ज्ञार्न और आत्म तत्व क ज्ञार्न। एक प्रगतिशील आदर्शवार्दी की तरह विवेकानन्द ने इन दोनों ही तरह के ज्ञार्नों को सच मार्नार्। और कहार् कि दोनों ही तरह क ज्ञार्न प्रार्प्त करनार् चार्हिए। वस्तु जगत के ज्ञार्न के लिए प्रत्यक्ष विधि और आत्म तत्व के ज्ञार्न के लिए अध्ययन, मनन और सत्संग पर जोर दियार्।

स्वार्मी विवेकानन्द के अनुसार्र मनुष्य के जीवन क अन्तिम उद्देश्य आत्मार्नुभूति है। वस्तुत: वे आत्मार्नुभूति, मुक्ति और र्इश्वर प्रार्प्ति को समार्नार्थ्री मार्नते थे। स्वार्मी जी मार्नते थे कि सभी मनुष्यों में र्इश्वर क निवार्स है अत: मार्नव सेवार् सबसे बड़ार् धर्म है। मनुष्य को मन, वचन और कर्म से शुद्ध होकर अर्थोपाजन करनार् चार्हिए, दीन-हीनों की सेवार् करनी चार्हिए और योग माग द्वार्रार् आत्मार्नुभूति प्रार्प्त करते हुए मुक्ति प्रार्प्त करनी चार्हिए।

धर्म 

विवेकानन्द के अनुसार्र भविष्य के धामिक आदर्शों को सभी धर्मों में जो कुछ भी सुन्दर और महत्वपूर्ण है, उन सबको एक सार्थ लेकर चलनार् पड़ेगार्। र्इश्वर सम्बन्धी सभी सिद्धार्न्त- सगुण, निर्गुण, अनन्त, नैतिक नियम अथवार् आदर्श मार्नव धर्म की परिभार्षार् के अन्तर्गत आनार् चार्हिए। स्वार्मी विवेकानन्द सभी धर्मों की एकतार् में विश्वार्स करते थे। उन्होंने धामिक उदार्रतार्, समार्नतार् और सहयोग पर बल दियार् है। उनक कहनार् थार् कि धर्म के मूल लक्ष्य के विषय में सभी धर्म एकमत हैं। आत्मार् की भार्षार् एक है जबकि रार्ष्ट्रों की भार्षार्एँ विभिन्न हैं, उनकी परम्परार्यें और जीने की शैली भिन्न है। धर्म आत्मार् से सम्बन्धित है लेकिन वह विभिन्न रार्ष्ट्रों, भार्षार्ओं और परम्परार्ओं के मार्ध्यम से प्रकट होतार् है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि संसार्र के सभी धर्मों में मूल आधार्र एकतार् है, यद्यपि उसके स्वरूप भिन्न-भिन्न हैं।

स्वार्मी विवेकानन्द धर्म को भार्रत रार्ष्ट्र क जीवन-केन्द्र यार् प्रधार्न-स्वर मार्नते हैं। वे मार्नते थे कि भार्रतवर्ष में धर्म ही जीवन क केन्द्र है और वही रार्ष्ट्रीय जीवन रूपी संगीत क प्रधार्न स्वर है। यदि कोर्इ रार्ष्ट्र अपनी स्वभार्विक जीवन शक्ति को दूर फेंक देने की चेष्टार् करे तो वह रार्ष्ट्र काल-कवलित हो जार्तार् है। अत: विवेकानन्द भार्रत में धर्म प्रचार्र आवश्यक मार्नते थे। उनक कहनार् थार् कि भार्रतवर्ष में किसी प्रकार क सुधार्र यार् उन्नति की चेष्टार् करने के पहले धर्म प्रचार्र आवश्यक है। वे कहते हैं ‘‘भार्रत को सार्मार्जिक अथवार् रार्जनीतिक विचार्रों से प्लार्वित करने से पहले आवश्यक है कि उसमें आध्यार्त्मिक विचार्रों की बार्ढ़ लार् दी जार्य।’’

सत्य 

विवेकानन्द के अनुसार्र, विश्व में सत्य एक है और मार्नव उसे विभिन्न दृष्टिकोण से देखते हैं।

अपने भार्षण ‘मेरी कार्यविधि’ में स्वार्मीजी कहते है ‘‘हमें शक्ति चार्हिए, इसलिए अपने आप पर विश्वार्स करो। अपने स्नार्युओं को शक्तिशार्ली बनार्ओ। हमें लोहे की पेशियार्ं और फौलार्द के स्नार्यु चार्हिए। हम बहुत रो चुके हैं, अब और रोनार् नहीं, अपने पैरो पर खड़े हो जार्ओ और मार्नव बनो। हमें मार्नव गठन करने वार्लार् धर्म चार्हिए, हमें मनुष्य गठन करने वार्ले सिद्धार्न्त चार्हिए, चार्रो ओर हमें मार्नव गठन करने वार्ली शिक्षार् चार्हिए। सत्य की परीक्षार् यह है : कोर्इ भी वस्तु जो तुम्हें शरीर से, बुद्धि से यार् आध्यार्त्मिकतार् से निर्बल करती है, उसे विष समझ कर त्यार्ग दो, इसमें कोर्इ जीवन नहीं है, यह सत्य नहीं हो सकती। सत्य मार्ने पवित्रतार्, सत्य मार्ने समग्र ज्ञार्न, सत्य द्वार्रार् बल प्रार्प्ति होनी चार्हिए।’’ सत्य की विशेषतार्ओं क उल्लेख करते हुए स्वार्मी विवेकानन्द कहते है- ‘‘सत्य तो बलप्रद है, वह पवित्रतार् स्वरूप है, ज्ञार्न स्वरूप है। सत्य तो वह है जो शक्ति दे, जो हृदय के अंधकार को दूर कर दे, जो हृदय में स्फूर्ति भर दे।’’

अहिंसार् 

विवेकानन्द अहिंसार् को श्रेष्ठ मार्नते है पर हिंसार् को सर्वथार् त्यार्ज्य नहीं। उनके अनुसार्र गृहस्थ को अपने शत्रु के सार्मने दृढ़ होनार् चार्हिए और गुरू और बन्धुजनों के समक्ष नम्र।… यदि वह शत्रु के समक्ष वीरतार् नहीं दिखार्तार् है, तो वह अपने कर्तव्य की अवहेलनार् करतार् है किन्तु अपने बन्धु-बार्न्धव , आत्मीय स्वजन एवं गुरू के निकट उसे गौ के समार्न शार्ंत और निरीह भार्व अवलम्बन करनार् चार्हिए।’’ विवेकानन्द के अनुसार्र अहिंसार् की कसौटी है, र्इष्र्यार् क अभार्व।

त्यार्ग 

स्वार्मी विवेकानन्द के अनुसार्र त्यार्ग क अर्थ है, स्वाथ क सम्पूर्ण अभार्व। यूरोप और अमेरिक में भोग पर्यार्प्त मार्त्रार् में उपलब्ध थी। इसलिए स्वार्मी जी ने वहार्ँ के निवार्सियों को संयम और त्यार्ग की शिक्षार् दी। किन्तु भार्रत में दरिद्रतार् क सार्म्रार्ज्य थार्। यहार्ँ के लोग धनार्भार्व के कारण जीवन के ऊँचे गुणों से विमुक्त हो गए। अत: उन्होंने भार्रतवार्सियों को जो उपदेश दियार् वह केवल धर्म के लिए नही थार्, प्रत्युत उन्होंने यहार्ँ के लोगो में असन्तोष जगार्नार् चार्हार् और उन्हें कर्म की भार्वनार् से आन्दोलित करने की चेष्टार् की। विवेकानन्द कहते है- ‘‘त्यार्ग के बिनार् कोर्इ सिद्धि संभव नहीं है। त्यार्ग मार्नवीय चेतनार् क पवित्रतम, सर्वोत्तम सार्ध्य है।’’

मार्नव सेवार् 

विवेकानन्द ने यह सीख दी कि मार्नव सेवार् ही र्इश्वर सेवार् है। उससे मुँह मोड़नार् धर्म नहीं है। वे कहते थे अगर तुम्हें भगवार्न की सेवार् करनी है तो मार्नव की सेवार् करो। वह भगवार्न ही रोगी मनुष्य, दरिद्र मनुष्य और सब प्रकार के मनुष्यों के रूप में तुम्हार्रे सार्मने खड़ार् है। इसलिए उन्होंने कहार्- ‘‘तुम्हें सिखार्यार् गयार् है कि अतिथि देवो भव, मार्तश् देवो भव, पितश् देवो भव, पर अब मैं तुमसे कहतार् हूँ दरिद्र देवो भव।’’

विवेकानन्द कहते है कि ‘‘विश्व में सन्यार्सी क्यों जन्म लेते हैं? औरों के निमित्त अपनार् जीवन उत्सर्ग करने, जीव के आकाशभेदी क्रन्दन को दूर करने, विधवार् के आँसू पोंछने, पुत्र-वियोग से पीड़ित अबलार्ओं के मन को शार्न्ति देने, सर्व-सार्धार्रण को जीवन-संग्रार्म के लिए तैयार्र करने, शार्स्त्र के उपदेशों को फैलार्कर सबक ऐहिक और परमाथिक मंगल करने और ज्ञार्नार्लोक से सबके अन्दर जो ब्रह्मसिंह सुप्त है, उसे जार्गृत करने।’’

जार्ति व्यवस्थार् के विरोधी 

विवेकानन्द भार्रत में व्यार्प्त सार्मार्जिक बुराइयों के विरूद्ध लगार्तार्र संघर्ष करते रहे। वे चार्ण्डार्ल में र्इश्वर क निवार्स महसूस करते थे। उन्हीं के शब्दों में ‘‘यदि मैं अत्यन्त नीच चार्ण्डार्ल होतार्, तो मुझे और भी आनन्द आतार्, क्योंकि मैं उन महार्पुरूष क शिष्य हूँ जिन्होंने सर्वश्रेष्ठ ब्रार्ह्मण होते हुए भी एक चार्ण्डार्ल के पार्खार्ने की सफाइ लगार्तार्र कर्इ दिनों तक की थी। सबक सेवक बनकर ही एक हिन्दू अपने को उन्नत करने की चेष्टार् करतार् है।

सार्मार्जिक व्यार्धि के प्रतिकार क उपार्य: शिक्षार् 

स्वार्मी विवेकानन्द क मार्ननार् थार् कि सार्मार्जिक व्यार्धियों क प्रतिकार बार्हरी उपार्यों द्वार्रार् नहीं होगार्, इसके लिए भीतरी उपार्यों क अवलम्बन करनार् होगार्, मन पर कार्य करने की चेष्टार् करनी होगी। विवेकानन्द कहते हैं ‘‘समार्ज के दोषों को दूर करने के लिए प्रत्यक्ष रूप से नहीं वरन् शिक्षार्-दार्न द्वार्रार् परोक्ष रूप से उसकी चेष्टार् करनी होगी।’’

देशभक्ति की आवश्यकतार् 

विवेकानन्द एक प्रखर रार्ष्ट्र भक्त थे और वे सभी भार्रतीयों को रार्ष्ट्रभक्ति की भार्वनार् से ओत-प्रोत देखनार् चार्हते थे। वे भार्रतीय नवयुवकों को सम्बोधित करते हुए कहते है ‘‘मेरे भार्वी देशभक्तो, हृदयवार्न बनो। क्यार् तुम हृदय से यह अनुभव करते हो कि देव और ऋषियों की करोड़ों सन्तार्न आज पशुतुल्य हो गयी है? क्यार् तुम हृदय से अनुभव करते हो कि लार्खों आदमी आज भूखों मर रहे हैं? क्यार् तुम अनुभव करते हो कि अज्ञार्न के काले बार्दल ने सार्रे भार्रत को ढ़क लियार् है? यदि ‘हार्ँ’ तो जार्नो कि तुमने देशभक्त होने की पहली सीढ़ी पर पैर रखार् है।’’ इस समस्यार् के निवार्रण हेतु कर्तव्य पथ निश्चित करनार् स्वार्मी विवेकानन्द के अनुसार्र दूसरी सीढ़ी है और उस पथ पर दृढ़तार् से चलनार् देशभक्त की निशार्नी है।

रार्ष्ट्रीयतार् के विकास एवं रार्ष्ट्र को जड़भार्वार्पन्न स्थिति से निकालने क उपार्य बतार्ते हुए विवेकानन्द कहते हैं- ‘‘पहले रार्ष्ट्र को शिक्षित करो, अपनी निजी विधार्यक संस्थार्एँ बनार्ओ, फिर तो नियम आप ही आप आ जार्येंगे। जिस शक्ति के बल से, जिसके अनुमोदन से विधार्न क गठन होगार्, पहले उसकी सृष्टि करो। आज रार्जार् नहीं रहे; जिस नयी शक्ति से, जिस नये दल की सम्मति से नयी व्यवस्थार् गठित होगी, वह लोक शक्ति कहार्ँ है? उसी लोक शक्ति को संगठित करो। अतएव समार्ज-सुधार्र के लिए भी, प्रथम कर्तव्य है- लोगों को शिक्षित करनार्। और जब तक यह कार्य सम्पन्न नहीं होतार्, तब तक प्रतीक्षार् करनी पड़ेगी।’’

इस तरह से स्वार्मी विवेकानन्द भार्रत को एक स्वतंत्र, शक्तिशार्ली प्रजार्तार्ंत्रिक रार्ष्ट्र बनार्ने के लिए जन-सार्मार्न्य की शिक्षार् अनिवाय मार्नते थे।

प्रार्च्य एवं पार्श्चार्त्य संस्कृतियों क समन्वय 

स्वार्मी विवेकानन्द मार्नते थे कि प्रार्च्य एवं पार्श्चार्त्य दोनो ही संस्कृतियों में गुण और दोष हैं। इनकी कमियों क उल्लेख करते हुए वे कहते हैं- ‘‘यहार्ँ की भूमि विधवार्ओं के आँसू से कभी-कभी तर होती हैं, तो पार्श्चार्त्य देश क वार्यु-मण्डल अविवार्हित स्त्रियों की आहों से भरार् रहतार् है। यहार्ँ क जीवन गरीबी की चपेट से जर्जरित है, तो वहार्ँ पर लोग विलार्सितार् के विष से जीवन्मश्त हो रहें है।… बुरार्इयार्ँ सभी जगह हैं।… रोग की जड़ सार्फ कर देनार् ही ठीक-ठार्क उपार्य है।  अत: दोनों ही संस्कृतियों के श्रेष्ठ तत्वों क समन्वय कियार् जार्नार् चार्हिए।

शिक्षार्-दर्शन 

स्वार्मी विवेकानन्द के अनुसार्र शिक्षार् मनुष्य की अन्तर्निहित पूर्णतार् की अभिव्यक्ति है। मार्नव में शक्तियार्ँ जन्म से ही विद्यमार्न रहती है। शिक्षार् उन्हीं शक्तियों यार् गुणों क विकास करती है। पूर्णतार् बार्हर से नहीं आती वरन् मनुष्य के भीतर छिपी रहती है। सभी प्रकार क ज्ञार्न मनुष्य की आत्मार् में निहित रहतार् है। गुरूत्वार्कर्षण क सिद्धार्न्त अपने प्रतिपार्दन के लिए न्यूटन की खोज की प्रतीक्षार् नहीं कर रहार् थार्। वह न्यूटन के मस्तिष्क में पहले से ही विद्यमार्न थार्। जब समय आयार् तो न्यूटन ने केवल उसकी खोज की। विश्व क असीम ज्ञार्न-भंडार्र मार्नव मन में निहित है, बार्हरी संसार्र केवल एक प्रेरक मार्त्र है, जो अपने ही मन क अध्ययन करने के लिए प्रेरित करतार् है। पेड़ से सेव के गिरने से न्यूटन ने कुछ अनुभव कियार् और मन क अध्ययन कियार्। उसने अपने मन में पूर्व से स्थित विचार्रों की कड़ियों को व्यवस्थित कियार् और उसमें एक नयी कड़ी को देखार्, जिसे मनुष्य गुरूत्वार्कर्षण क नियम कहते हैं।

अतएव सभी ज्ञार्न, चार्हे वह संसार्रिक हो अथवार् परमाथिक, मनुष्य के मन में निहित है। यह आवरण से ढ़क रहतार् है, और जब वह आवरण धीरे-ध् ार्ीरे हटतार् है, तो मनुष्य कहतार् है कि ‘‘मुझे ज्ञार्न हो रहार् है।’’ ज्यों-ज्यों आवरण हटने की प्रक्रियार् यार् आविष्कार की प्रक्रियार् बढ़ती जार्ती है त्यों-त्यों मनुष्य के ज्ञार्न में वृद्धि होती जार्ती है। जिस मनुष्य पर यह आवरण पूर्णत: पड़ार् रहतार् है, वह मूढ़ यार् अज्ञार्नी है और जिस मनुष्य पर से यह आवरण बिल्कुल हट जार्तार् है, वह सर्वज्ञार्नी मनुष्य हो जार्तार् है। जिस प्रकार एक चकमक पत्थर के टुकड़े में अग्नि निहित रहती है, उसी प्रकार मनुष्य के मन में ज्ञार्न निहित रहतार् है। उद्दीपक कारण ही वह घर्षण है, जो उठार् ज्ञार्नार्ग्नि को प्रकाशित कर देतार् है।

स्वार्मी विवेकानन्द सर्वहितकारी, सर्वव्यार्पी एवं मार्नव-निर्मार्ण करने वार्ली शिक्षार् पर जोर देते थे। वे मार्नव की स्वतंत्रतार् को मूल बिन्दु मार्नकर रार्जनीति से परे मार्नव निर्मार्ण की योजनार् के सर्मथक थे। शिक्षार् को धर्म से जुड़ार् मार्नकर विवेकानन्द ने दोनों की मार्नव के अन्दर पाइ जार्ने वार्ली प्रवृत्ति को उजार्गर करनार् ध्येय मार्नार्। मार्नव-कल्यार्ण क मूल बीज शिक्षार् को मार्नकर विवेकानन्द ने शिक्षार् को सर्वसुलभ बनार्ने की योजनार् बनाइ। उन्होंने शिक्षार् की एक उदार्र एवं संतुलित प्रार्रूप देश के सार्मने रखार् ‘‘आवश्यकतार् है विदेशी नियंत्रण हटार्कर हमार्रे विविध शार्स्त्रों, विद्यार्ओं क अध्ययन हो और सार्थ ही सार्थ अंग्रेजी भार्षार् और पार्श्चार्त्य विज्ञार्न भी सीखार् जार्ये। हमें उद्योग-धंधो की उन्नति के लिए यार्ंत्रिक शिक्षार् भी प्रार्प्त करनी होगी जिससे देश के युवक नौकरी ढूंढ़ने के बजार्य अपनी जीविक के लिए समुचित धनोपाजन भी कर सके और दुर्दिन के लिए कुछ बचार् भी सके।

शिक्षार् के महत्व पर प्रकाश डार्लते हुए स्वार्मी विवेकानन्द ने ज्ञार्न दार्न को श्रेष्ठ दार्न बतार्यार्। उन्होंने चार्र प्रकार के दार्न बतार्ये: धर्म (आध्यार्त्मिक ज्ञार्न का) दार्न, ज्ञार्न दार्न, प्रार्ण दार्न और अन्न दार्न। इन सब में उन्होंने प्रथम दो दार्नों को श्रेष्ठ दार्न मार्नार्। वे ज्ञार्न-विस्तार्र को भार्रत की सीमार्ओं से बार्हर भी ले जार्नार् चार्हते हैं। भार्रत ने संसार्र को अनेक बार्र आध्यार्त्मिक ज्ञार्न दियार्। स्वार्मी जी ने धर्म प्रचार्र और लौकिक विद्यार् दोनों को ही मार्नव के लिए आवश्यक बतार्यार् पर उनक स्पष्ट मत थार् कि ‘‘यदि लौकिक विद्यार् बिनार् धर्म के ग्रहण करनार् चार्हो, तो मैं तुमसे सार्फ कह देतार् हूँ कि भार्रत में तुम्हार्रार् ऐसार् प्रयार्स व्यर्थ सिद्ध होगार्- वह लोगों के हृदयों में स्थार्न प्रार्प्त नहीं कर सकेगार्।

वे कहते थे भार्रतीयों में आत्मविश्वार्स भरने के लिए उन्हें आत्मतत्व की जार्नकारी देनी चार्हिए। वे कहते हैं- ‘‘अब उनको (वंचितों को) आत्मतत्व सुनने दो, यह जार्न लेने दो कि उनमें से नीच-से-नीच में भी आत्मार् विद्यमार्न है। वह आत्मार्, जो कभी न मरती है, न जन्म लेती है, जिसे न तलवार्र काट सकती है, न आग जलार् सकती है और न हवार् सुखार् सकती है, जो अमर है, अनार्दि और अनन्त है, शुद्ध स्वरूप, सर्वशक्तिमार्न और सर्वव्यार्पी है। इस प्रकार विवेकानन्द ने शिक्षार् के द्वार्रार् आत्मसार्क्षार्त्कार की संभार्वनार् पर अत्यधिक बल दियार्।

उन्नीसवीं शतार्ब्दी में प्रचलित रहस्य यार् तार्ंत्रिक विद्यार् की आलोचनार् करते हुए उन्होंने कहार् इन्होंने मार्नव के विवेक को समार्प्त कर दियार्। वे आदर्श शिक्षार् व्यवस्थार् की कल्पनार् करते हुए कहते है ‘‘हमें ऐसी सर्वार्ंगसम्पन्न शिक्षार् चार्हिए, जो हमें मनुष्य बनार् सके।’’ वे केवल सूचनार्ओं के संग्रह को शिक्षार् नहीं मार्नते थे। उनक कहनार् थार्: ‘‘शिक्षार् उस जार्नकारी के समुच्चय क नार्म नहीं है, जो तुम्हार्रे मस्तिष्क में भर दियार् गयार् है, और वहार्ँ पड़े-पड़े तुम्हार्री सार्री जिन्दगी भर बिनार् पचार्ए सड़ रही है। हमें तो भार्वों यार् विचार्रों को इस प्रकार आत्मसार्त् करनार् चार्हिए, जिससे जीवन निर्मार्ण हो, मनुष्यत्व आवे और चरित्रगठन हो। यदि शिक्षार् और जार्नकारी एक ही वस्तु होती, तो पुस्तकालय सबसे बड़े सन्त और विश्व-कोष ही ऋषि बन जार्ते।’’

शिक्षार् क उद्देश्य 

स्वार्मी विवेकानन्द ने शिक्षार् को व्यक्ति, समार्ज और रार्ष्ट्र के उत्थार्न के लिए आवश्यक मार्नार्। उन्होंने हर समस्यार् क निदार्न शिक्षार् को बतार्यार्। शिक्षार् के उद्देश्यों क विवेचन करते हुए वे लिखते हैं ‘‘जो शिक्षार् प्रणार्ली जन-सार्धार्रण को जीवन-संघर्ष से जूझने की क्षमतार् प्रदार्न करने में सहार्यक नहीं होती, जो मनुष्य के नैतिक बल का, उसकी सेवार्-वश्त्ति का, उसमें सिंह के समार्न सार्हस क विकास नहीं करती, वह भी क्यार् शिक्षार् के नार्म के योग्य है?’’ स्वार्मी विवेकानन्द ने शिक्षार् के महत्वपूर्ण उद्देश्य बतलार्ये-

  1. अन्तर्निहित पूर्णतार् की अभिव्यक्ति: विवेकानन्द ने शिक्षार् क सर्वार्क्तिार्क महत्वपूर्ण उद्देश्य मार्नव में निहित पूर्णतार् क विकास है। वेदार्न्त-दर्शन के अनुसार्र प्रत्येक बार्लक में अनन्त ज्ञार्न, अनन्त बल एवं अनन्त व्यार्पकतार् की शक्तियार्ँ विद्यमार्न हैं, परन्तु उसे इन शक्तियों क पतार् नहीं। शिक्षार् क उद्देश्य इन शक्तियों के बार्रे में छार्त्रों को जार्नकारी देनार् तथार् प्रत्येक विद्यार्थ्री में अन्तर्निहित शक्तियों क उत्तरोत्तर विकास करनार् है।
  2. मार्नव-निर्मार्ण करनार्: स्वार्मी विवेकानन्द ने शिक्षार् प्रमुख उद्देश्य मार्नव क निर्मार्ण करनार् बतार्यार्। वे कहते हैं ‘‘शिक्षार् द्वार्रार् मनुष्य क निर्मार्ण कियार् जार्तार् है। समस्त अध्ययनों क अन्तिम लक्ष्य मनुष्य क विकास करनार् है। जिस अध्ययन द्वार्रार् मनुष्य की संकल्प-शक्ति क प्रवार्ह संयमित होकर प्रभार्वोत्पार्दक बन सके, उसी क नार्म शिक्षार् है।’’ 
  3. शार्रीरिक पूर्णतार्: विवेकानन्द के अनुसार्र मार्नव तभी पूर्णतार् प्रार्प्त कर सकतार् है जब उसक शरीर स्वस्थ हो। शार्रीरिक दुर्बलतार् पूर्णतार् के लक्ष्य प्रार्प्त करने में सबसे बड़ार् बार्धक तत्व है। वे युवकों को सम्बोधित करते हुए कहते है ‘‘सबसे पहले हमार्रे युवकों को सबल बनार्नार् चार्हिए। धर्म तो बार्द की चीज है। तुम गीतार् पढ़ने की बजार्य फुटबार्ल खेलकर स्वर्ग के अधिक नजदीक पहुँच सकते हो। यदि तुम्हार्रार् शरीर स्वस्थ है, अपने पैरों पर दृढ़तार् पूर्वक खड़े हो सकते हो, तो तुम उपनिषदों और आत्मार् की महत्तार् को अधिक अच्छी तरह समझ सकते हो।’’ 
  4. चरित्र क निर्मार्ण: स्वार्मी विवेकानन्द उसी शिक्षार् को शिक्षार् मार्नते थे जो चरित्रवार्न स्त्री-पुरूष को तैयार्र कर सके। उनके अनुसार्र सबल रार्ष्ट्र के निर्मार्ण हेतु नार्गरिक क चरित्रवार्न होनार् आवश्यक है। वे कहते हैं ‘‘आज हमें जिसकी वार्स्तविक आवश्यकतार् है, वह है चरित्रवार्न स्त्री-पुरूष। किसी भी रार्ष्ट्र क विकास और उसकी सुरक्षार् उसके चरित्रवार्न नार्गरिकों पर निर्भर है।’’ अत: विद्याथियों में उच्च चरित्र क निर्मार्ण शिक्षार् क एक महत्वपूर्ण कार्य है।
  5. जीवन-संघर्ष की तैयार्री: शिक्षार् विद्यार्थ्री को भार्वी जीवन के लिए तैयार्र करती है। विवेकानन्द की दृष्टि में जीवन-संघर्ष की तैयार्री के लिए तकनीकी एवं विज्ञार्न की शिक्षार् आवश्यक है। विवेकानन्द कहते हैं ‘‘आज की यह उच्च शिक्षार् रहे यार् बन्द हो जार्ए, इससे क्यार् बनतार्-बिगड़तार् है? यह अधिक अच्छार् होगार्, यदि लोगों को थोड़ी तकनीकी शिक्षार् मिल सके, जिससे वे नौकरी की खोज में इधर-उधर भटकने के बदले किसी काम में लग सकें और जीविकोपाजन कर सकें।’’ 
  6. रार्ष्ट्रीयतार् की भार्वनार् क विकास: विवेकानन्द भार्रत की दुर्दशार् से अत्यन्त ही मर्मार्हत थे। वे एक ऐसी शिक्षार् व्यवस्थार् क विकास करनार् चार्हते थे जो भार्रतीय विद्याथियों में रार्ष्ट्रीयतार् की भार्वनार् क विकास कर सके। वे कहते हैं- ‘‘ऐ वीर! सार्हस क अवलम्बन करो। गर्व से कहो, मैं भार्रतवार्सी हूँ और प्रत्येक भार्रतवार्सी मेरार् भाइ है। तुम चिल्लार्कर कहो कि मूर्ख भार्रतवार्सी, ब्रार्ह्मण भार्रतवार्सी, चार्ण्डार्ल भार्रतवार्सी, सभी मेरे भाइ हैं। भार्रत के दीन-दुखियों के सार्थ एक होकर गर्व से पुकार कर कहो- ‘‘प्रत्येक भार्रतवार्सी मेरार् भाइ है, भार्रतवार्सी मेरे प्रार्ण हैं, भार्रत के देवी-देवतार् मेरे र्इश्वर हैं, भार्रत क समार्ज मेरे बचपन क झूलार्, जवार्नी की फुलवार्री और बुढ़ार्पे की काशी है।’’ 

इस प्रकार शिक्षार् के मार्ध्यम से विवेकानन्द भार्रतीयों के मध्य रार्ष्ट्र के प्रति पूर्ण समर्पण की भार्वनार् क विकास करनार् चार्हते थे।

पार्ठ्यक्रम 

स्वार्मी विवेकानन्द क यह मार्ननार् थार् कि हर रार्ष्ट्र की कुछ विशेष गुणों के कारण अलग पहचार्न होती है। भार्रत रार्ष्ट्र की विशिष्ट पहचार्न उसकी आध्यार्त्मिकतार् है। विवेकानन्द के अनुसार्र धर्म शिक्षार् की आत्मार् है। विवेकानन्द की धर्म की परिभार्षार् अत्यन्त व्यार्पक है। वे धर्म अन्तर्गत सम्प्रदार्य विशेष को न मार्नकर नैतिक जीवन पद्धति को मार्नते हैं। वे पार्श्चार्त्य शिक्षार् को अधर्म के विस्तार्र क कारण मार्नते हैं। हृदय क विकास जहार्ँ मार्नव को आध्यार्त्मिक बनार्तार् है वहीं मार्त्र बौद्धिक विकास उसे स्वार्थ्री बनार्तार् है।

विवेकानन्द शिक्षार् में आध्यार्त्म के सार्थ विज्ञार्न एवं तकनीकी की शिक्षार् आवश्यक मार्नते हैं। स्वार्मी विवेकानन्द क यह स्पष्ट तौर पर मार्ननार् थार् कि भार्रतीय आध्यार्त्म एवं पश्चिमी विज्ञार्न क समन्वय ही मार्नव कल्यार्ण क सर्वार्धिक विश्वसनीय आधार्र बन सकतार् है। स्वार्मी विवेकानन्द क मार्ननार् थार् कि आधुनिक विज्ञार्न एवं तकनीकी तथार् उद्योग की शिक्षार् ने मार्नव के जीवन को आरार्मदार्यक बनार्यार् है। पर अगर इसक विकास बिनार् नैतिक- आध्यार्त्मिक समन्वय के सार्थ हुआ तो यह मार्नव जार्ति के विनार्श क कारण बन सकतार् है। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरार्न स्वार्मी विवेकानन्द की भविष्यवार्णी सच हुर्इ।

विवेकानन्द की शिक्षार् व्यवस्थार् में कलार् को महत्वपूर्ण स्थार्न दियार् गयार् है। वे मार्नते थे कि ‘‘कलार् हमार्रे धर्म क ही एक अंग है।’’ उन्होंने विद्याथियों, शिक्षकों एवं शिक्षार्शार्स्त्रियों क ध्यार्न चित्रार्ंकित पार्त्रों, नयनार्भिरार्म सार्ड़ियों आदि से लेकर कश्“ार्क की झोपड़ियों तथार् अनार्ज भरने के कोठार्रों तक खींचार्। उन्हें जीवन क हर आयार्म कलार्त्मक दिखतार् थार् और वे शिक्षार् को कलार् की सार्धनार् क मार्ध्यम बनार्ने पर जोर देते थे।

स्वार्मी विवेकानन्द भार्षार् की शिक्षार् के संदर्भ में अत्यधिक उदार्र थे। वे संस्कृत भार्षार् की शिक्षार् पर अत्यधिक जोर देते थे क्योंकि यही हमार्रे धर्म और संस्कृति की भार्षार् है। इसके सार्थ ही मार्तृभार्षार् की शिक्षार् आवश्यक मार्नते थे। विज्ञार्न एवं तकनीक की उचित शिक्षार् के लिए वे अंग्रेजी की भी शिक्षार् महत्वपूर्ण मार्नते थे।

जनसार्मार्न्य में शिक्षार् के प्रसार्र हेतु विवेकानन्द की शिक्षार्-व्यवस्थार् में शार्रीरिक शिक्षार्, खेलकूद और व्यार्यार्म को उचित स्थार्न दियार् गयार् है। वे नवयुवकों को गीतार् पढ़ने की बजार्ए फुटबार्ल खेलने क सुझार्व देते थे। उनक मार्ननार् थार् कि अगर शरीर स्वस्थ होगार् तो गीतार् भी बेहतर ढ़ंग से समझ में आयेगी। उन्होंने नवयुवकों को शक्ति क महत्व बतार्ते हुए कहार्- ‘‘शक्ति ही जीवन और कमजोरी मृत्यु है। शक्ति परम सुख है और अजर अमर जीवन है, कमजोरी कभी न हटने वार्लार् बोध और यन्त्रणार् है, कमजोरी ही मृत्यु है।’’

इस प्रकार शिक्षार् के पार्ठ्यक्रम में स्वार्मी विवेकानन्द ने प्रार्च्य धर्म, दर्शन और भार्षार् तथार् पार्श्चार्त्य ज्ञार्न-विज्ञार्न, तकनीक एवं औद्योगिक प्रशिक्षण को स्थार्न दियार्। उन्होंने स्पष्ट रूप से यह महसूस कियार् थार् कि पार्श्चार्त्य जगत के भौतिक ज्ञार्न से हम अपनार् भौतिक विकास कर सकते है और अपने देश के आध्यार्त्मिक ज्ञार्न से पश्चिमी जगत क कल्यार्ण कर सकते है। इस प्रकार से स्पष्ट है कि पार्ठ्यक्रम के सम्बन्ध में स्वार्मी विवेकानन्द क दृष्टिकोण समन्वयवार्दी, आधुनिक और व्यार्पक थार्।

शिक्षण विधि 

स्वार्मी विवेकानन्द के अनुसार्र ज्ञार्न प्रार्प्त करने की सर्वोत्तम विधि एकाग्रतार् है। वे कहार् करते थे कि जितनी अधिक एकाग्रतार् होगी उतनार् ही अधिक ज्ञार्न प्रार्प्त कियार् जार् सकतार् है। उनक कहनार् थार् कि एकाग्रतार् के बल पर जूतार् पॉलिश करने वार्लार् भी बेहतर ढ़ंग से जूतार् पॉलिश कर सकेगार् एवं रसोइयार् भी अधिक अच्छार् भोजन बनार् सकेगार्।

एकाग्रतार् तभी आ सकती है जब मनुष्य में अनार्सक्ति हो। स्वार्मी विवेकानन्द कहते हैं कि तथ्यों क संग्रह शिक्षार् नहीं है। सच्ची शिक्षार् है तन को अनार्सक्ति द्वार्रार् एकाग्र करने की क्षमतार् विकसित करनार्। इससे सभी तरह के तथ्यों क संग्रह कियार् जार् सकतार् है, समस्यार्ओं को समझार् जार् सकतार् है और उनके निरार्करण क माग ढूंढ़ार् जार् सकतार् है।

स्वार्मी विवेकानन्द लौकिक एवं आध्यार्त्मिक दोनों ही प्रकार के ज्ञार्न के लिए योग विधि को अपनार्ने पर बल देते थे। भौतिक ज्ञार्न प्रार्प्त करने के लिए जहार्ँ अल्प योग (अल्पकाल की एकाग्रतार्) पर्यार्प्त है वहीं आध्यार्त्मिक ज्ञार्न प्रार्प्त करने के लिए पूर्ण योग (दीर्घकालीन एकाग्रतार्) आवश्यक है।

स्वार्मी विवेकानन्द शिक्षार् को प्रत्येक बार्लक-बार्लिक क जन्म सिद्ध अधिकार मार्नते थे। खोये हुए सार्ंस्कृतिक एवं भौतिक वैभव को फिर से प्रार्प्त करने के लिए जनसार्धार्रण की शिक्षार् को वे आवश्यक बतार्ते थे। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहार्- ‘‘मेरे विचार्र में जनसार्धार्रण की अवहेलनार् रार्ष्ट्रीय पार्प है और हमार्रे पतन क कारण है। जब तक भार्रत की सार्मार्न्य जनतार् को एक बार्र फिर से शिक्षार्, अच्छार् भोजन और अच्छी सुरक्षार् प्रदार्न नहीं की जार्येगी, तब तक सर्वोत्तम रार्जनीतिक कार्य भी व्यर्थ होंगे।’’ वे शिक्षार् की सुविधार् सभी के लिए समार्न रूप से उपलब्ध करार्नार् चार्हते थे।

स्वार्मी विवेकानन्द के जीवन एवं शिक्षार् सम्बन्धी विचार्र आज की परिस्थितियों में भी उतनी ही उपयोगी है जितनी उनके समय में थी। आज वेदार्न्त और विज्ञार्न के समन्वय की आवश्यकतार् और अधिक है। स्वार्मी विवेकानन्द क दर्शन मार्नव मार्त्र क कल्यार्ण के लिए है। उन्होंने स्वंय कहार् थार्- ‘‘हम मार्नव-निर्मार्ण क धर्म चार्हते हैं। हम मनुष्य क निर्मार्ण करने वार्ले सिद्धार्न्त चार्हते हैं और हम मार्नव निर्मार्ण की सर्वार्गींण शिक्षार् चार्हते हैं।’’

शिक्षक क दार्यित्व 

विवेकानन्द ने कहार् कि शिक्षक क कार्य माग से रूकावटें हटार्नार् है। अर्थार्त् व्यक्ति के अन्तर्गत ब्रह्मत्व की शक्ति पहले से ही विद्यमार्न है, शिक्षार् क कार्य उसे उजार्गर करनार् है।

सर्वजनीन और सर्वसुलभ शिक्षार् प्रसार्र के लिए स्वार्मी जी ने शिक्षार् देने हेतु ऐसे अध्यार्पकों की अपेक्षार् की जो सदार्चार्री हों, त्यार्गी हों और उच्च भार्व से ओत-प्रोत हों। उन्होंने यह स्पष्ट कियार् कि भार्रत में शिक्षार् ‘ज्ञार्नदार्न’ यार् ‘विद्यार्दार्न’ अत्यन्त महत्वपूर्ण मार्नार् गयार् है और यह दार्नी पुरूषों द्वार्रार् होतार् है। अत: ज्ञार्न प्रसार्र क कार्य निस्वाथ त्यार्गी पुरूषों के कन्धों पर ही होनार् चार्हिए। शिक्षकों को निस्वाथ भार्व से शिक्षार् देनी चार्हिए न कि धन, नार्म यार् यश सम्बन्धी स्वाथ की पूर्ति के लिए। शिक्षकों को मार्नव-जार्ति के प्रति विशुद्ध प्रेम से प्रेरित होनार् चार्हिए क्योंकि स्वाथ पूर्ण भार्व, जैसे लार्भ अथवार् यश की इच्छार्, इसके अभीष्ट उद्देश्य को नष्ट कर देगार्।

शिक्षार् के लिए विवेकानन्द गुरूगृह प्रणार्ली के पोषक थे। उनक मत थार् कि विद्यार्लयों क पर्यार्वरण एवं वार्तार्वरण गुरूगृह की ही तरह शुद्ध होनार् चार्हिए, जहार्ँ व्यार्यार्म, खेल-कूद, अध्ययन-अध्यार्पन के सार्थ भजन-कीर्तन और ध्यार्न की भी व्यवस्थार् हो। वे कहते है- ‘‘मेरे विचार्र के अनुसार्र शिक्षार् क अर्थ है गुरूकुल-वार्स। शिक्षक के व्यक्तिगत जीवन के बिनार् कोर्इ शिक्षार् हो ही नहीं सकती। जिनक चरित्र जार्ज्वल्यमार्न अग्नि के समार्न हो, ऐसे व्यक्ति के सहवार्स में शिष्य को बार्ल्यार्वस्थार् के आरम्भ से ही रहनार् चार्हिए, जिससे कि उच्चतम शिक्षार् क सजीव आदर्श शिष्य के सार्मने रहे।’’

विद्यार्थ्री के कर्तव्य 

शिक्षार्थ्री के लिए स्वार्मी जी कठोर नियमों क पार्लन एवं इन्द्रिय निग्रह पर जोर देते थे, जिससे छार्त्र शिक्षक में श्रद्धार् रखकर सत्य को जार्नने क प्रयार्स करे। उन्होंने कहार् ‘‘शिक्षक के प्रति श्रद्धार्, विनम्रतार्, समर्पण तथार् सम्मार्न की भार्वनार् के बिनार् हमार्रे जीवन में कोर्इ विकास नहीं हो सकतार्। उन देशों में जहार्ँ शिक्षक-शिक्षार्थ्री सम्बन्धों में उपेक्षार् बरती गर्इ है, वहार्ँ शिक्षक एक व्यार्ख्यार्तार् मार्त्र रह गयार् है। वहार्ँ शिक्षक अपने लिये पार्ँच डार्लर की आशार् रखने वार्ले और छार्त्र, शिक्षक के व्यार्ख्यार्न को अपने मस्तिष्क में भरने वार्ले रह जार्ते हैं। इतनार् कार्य सम्पन्न होने पर दोनों अपनी-अपनी रार्ह पर चल देते हैं। इससे अधिक उनमें कोर्इ सम्बन्ध नहीं रह गयार् है।’’

विवेकानन्द विद्यार्थ्री-जीवन में ब्रह्मचर्य पार्लन पर जोर देते हैं। उनके अनुसार्र इस काल में विद्यार्थ्री को मन, वचन और कर्म से ब्रह्मचर्य-पार्लन करनार् चार्हिए। इससे संकल्प-शक्ति दृढ़ होती है तथार् आध्यार्त्मिक शक्ति तथार् वार्ग्मितार् क विकास होतार् है।

नार्री शिक्षार् 

स्वार्मी विवेकानन्द स्त्री-पुरूष समार्नतार् के समर्थक थे। इसलिए महिलार्ओं की शिक्षार् भी उनकी शिक्षार् सम्बन्धी योजनार् में महत्वपूर्ण विषय है। उनक मार्ननार् थार् कि देश की उन्नति के लिए महिलार्ओं की शिक्षार् अत्यन्त आवश्यक है। महिलार्ओं की शिक्षार् के लिए उन्होंने तपस्वी, ब्रह्मचार्रिणी तथार् त्यार्गी महिलार्ओं को प्रशिक्षण देनार् आवश्यक मार्नार् तार्कि ऐसी महिलार्यें दूसरी महिलार्ओं को सम्यक शिक्षार् प्रदार्न कर सकें।

महिलार्ओं की समुचित शिक्षार् के लिए विवेकानन्द ने पुरूषों की भार्ँति महिलार्ओं के लिए अलग संघ स्थार्पित करने पर जोर दियार्। उनक विचार्र थार् कि मठों की स्थार्पनार् के मार्ध्यम से वहार्ँ प्रशिक्षित ब्रह्मचार्री स्त्रियार्ँ, सन्यार्सी और सुशिक्षित बन कर नार्री जार्ति को शिक्षार् देने क प्रयार्स करेंगी। शिक्षित स्त्रियार्ँ भले-बुरे क ज्ञार्न प्रार्प्त कर सकेंगी और स्वतंत्र तथार् स्वार्भार्विक रूप से प्रगतिपथ पर अग्रसर हो सकेंगी। पुरूषों की तरह स्त्रियों को भी भार्षार्, गणित, विज्ञार्न, सार्मार्जिक विषयों तथार् लौकिक विषयों की शिक्षार् दी जार्नी चार्हिए, जिससे वे दूसरों तक सम्यक रूप से प्रसार्रित कर सकें।

वे कहते हैं कि ‘‘जिस तरह मार्तार्-पितार् अपने पुत्रों को शिक्षार् देते है उसी तरह उन्हें पुत्रियों को भी शिक्षित करनार् चार्हिए। जबकि हम उन्हें प्रार्रम्भ से ही दूसरे पर निर्भर रहकर परतंत्र रहने की शिक्षार् देते हैं।’’ विवेकानन्द की दृष्टि में मिलनी चार्हिए कि वे दूसरों पर निर्भर रहने की बजार्य स्वयं अपनी समस्यार्ओं क निरार्करण कर सकें। वे लड़कियों की शिक्षार् के केन्द्र में धर्म को रखने क सुझार्व देते हैं। इसके अतिरिक्त इतिहार्स एवं पुरार्ण, गृह-व्यवस्थार्, कलार् एवं शिल्प, बच्चों की उचित देखभार्ल, पार्क कलार् आदि की शिक्षार् देने क सुझार्व देते हैं। वे कन्यार्ओं से ‘सीतार्’ के उज्ज्वल चरित्र से शिक्षार् लेने को कहते हैं।

शिक्षार् क प्रसार्र 

स्वार्मी विवेकानन्द ने रार्ष्ट्र और मार्नव की समस्यार्ओं क निदार्न शिक्षार् को मार्नार्। वे शिक्षार् को समार्ज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचार्नार् चार्हते थे। इसके लिए उन्होंने प्रार्चीन भार्रतीय शिक्षार् पद्धति के प्रभार्वशार्ली मार्ध्यमों के प्रयोग पर बल दियार्।

भ्रमणकारी सन्यार्सियों द्वार्रार् शिक्षार् 

स्वार्मी विवेकानन्द की यह योजनार् श्रमण प्रकृति से मिलती-जुलती है। उन्होंने कहार् कि शिक्षार् के प्रसार्र क कार्य उन हजार्रों सन्यार्सियों के मार्ध्यम से हो सकतार् है जो गार्ँव-गार्ँव धर्मोपदेश करते हुए घूमते रहते हैं। उन्हीं के शब्दों में ‘‘हमार्रे देश में एकनिष्ठ और त्यार्गी सार्धु हैं जो गार्ँव-गार्ँव धर्म की शिक्षार् देते फिरते हैं। यदि उनमें से कुछ लोगों को शैक्षिक विषयों में भी प्रशिक्षित कियार् जार्ये तो गार्ँव-गार्ँव दरवार्जे जार्कर वे न केवल धर्म की ही शिक्षार् देंगे बल्कि ऐहिक शिक्षार् भी दियार् करेंगे।’’ उन्होंने उदार्हरण देते हुए स्पष्ट कियार् कि यदि इनमें से एक दो शार्म को सार्थ में एक मैजिक लैन्टर्न, एक-एक ग्लोब और कुछ नक्शे आदि लेकर गार्ँव में जार्यें तो इनकी सहार्यतार् से वे अनपढ़ों को बहुत कुछ गणित, भूगोल, नक्षत्र-विज्ञार्न, ज्योतिष आदि की शिक्षार् दे सकते हैं। ये सन्यार्सी विभिन्न देशों के बार्रे में कहार्नियार्ँ सुनार्कर निर्धन लोगों को नार्नार् प्रकार क समार्चार्र दे सकते हैं जिनसे उनक ज्ञार्नवध्र्धन हो सके। बार्तचीत के मार्ध्यम से सीधी सूचनार् के कारण ज्यार्दार् प्रभार्वकारी जार्नकारी दी जार् सकती है जो शार्यद पुस्तकों के मार्ध्यम से संभव न हो सके।

विवेकानन्द ने गरीब लड़कों की आर्थिक मजबूरी को ध्यार्न में रखते हुए स्पष्ट कियार् कि गरीब लड़के पार्ठशार्लार् जार्ने की बजार्य अर्थोपाजन हेतु खेतों में मार्तार्-पितार् की सहार्यतार् करने अथवार् किसी अन्य तरीके से धन अर्जित करनार् ज्यार्दार् पसन्द करते हैं, उनके लिए ऐसे सन्यार्सियों क घर-घर जार्कर शिक्षार् देनार् ज्यार्दार् सरार्हनीय कदम होगार्।

स्वार्मी जी शिक्षार् को सर्वसुलभ बनार्ने हेतु नि:शुल्क शिक्षार् की व्यवस्थार् चार्हते थे। स्वार्मी जी मार्नते थे कि शिक्षार् देने क कार्य त्यार्गी और तपस्वी पुरूषों क है। उन्हें लोभ से दूर रहते हुए ऐसे बार्लकों के पार्स पहुँचकर शिक्षार् प्रदार्न करनी चार्हिए जो आर्थिक अभार्व के कारण शिक्षार् ग्रहण करने हेतु अध्यार्पक के पार्स न आ पार्यें। स्वार्मी जी की मार्न्यतार् थी कि अशिक्षित जनसमूह को सार्क्षर बनार्ने की अपेक्षार् जीवनोपयोगी शिक्षार् देनार् अधिक आवश्यक है। इसलिए स्वार्मी जी औपचार्रिक शिक्षार् के बजार्य अनौपचार्रिक शिक्षार् पर अधिक जोर देते थे।

रार्मकृष्ण मिशन 

स्वार्मी विवेकानन्द ने मार्नव जार्ति के उत्थार्न के लिए नवीन सन्यार्सी सम्प्रदार्य क गठन कियार्, जो रार्मकृष्ण मिशन के नार्म से प्रसिद्ध है। विवेकानन्द ने इसक उद्देश्य निश्चित कियार्- ‘‘आत्मनो मोक्षाथ जगत् हितार्य च।’’- ‘अपनी मुक्ति तथार् जगत के कल्यार्ण के लिए।’ रार्मकृष्ण मठ की स्थार्पनार् 1897 में की गर्इ तथार् रार्मकृष्ण मिशन क पंजीकरण 1909 में कियार् गयार्। मठ और मिशन स्वार्मीजी के शिक्षार् सम्बन्धी विचार्रों को सार्कार रूप देने क मार्ध्यम है। मठ क मुख्य कार्यार्लय बेलूर मठ में है। देश में तो मठ और मिशन की अनेक शार्खार्यें हैं ही, विदेशों में भी 130 शार्खार्यें स्थार्पित की गर्इ हैं। रार्मकृष्ण मठ और मिशन क मुख्य उद्देश्य शिक्षार् के मार्ध्यम से समार्ज-सेवार् है। पुनरूजीवित हिन्दू धर्म के लिए विश्व की सार्ंस्कृतिक विजय को इसने अपनार् सार्ध्य मार्नार्।

भार्रत में मठ और मिशन क कार्य है मठ से चरित्रवार्न व्यक्ति निकलकर समार्ज को आध्यार्त्मिक शार्ंति और संसार्रिक वैभव से प्लार्वित करे। मनुष्य की संसार्रिक एवं आध्यार्त्मिक उन्नति के लिए ‘विद्यार्दार्न’ तथार् ‘ज्ञार्नदार्न’, शिल्पकारों एवं श्रमजीवियों को प्रोत्सार्हित करनार् तथार् वेदार्न्त एवं दूसरे धर्मों के भार्वों क प्रसार्र करनार् मिशन क उद्देश्य है।

स्वार्मी विवेकानन्द ने रार्मकृष्ण मिशन की मुहर के लिए सार्ँप द्वार्रार् घेरे हुए कमल दल के बीच में हंस क छोटार् सार् चित्र तैयार्र कियार् थार्। इस चित्र क तरंगपूर्ण जल समूह कर्म का, कमल दल भक्ति क और उदयीमार्न सूरज ज्ञार्न क प्रतीक है। चित्र में जो सार्ँप क घेरार् है, वह योग और जार्ग्रत कुण्डलिनी शक्ति क द्योतक है। चित्र के मध्य में जो हंस की मूर्ति है उसक अर्थ है परमार्त्मार्। अर्थार्त् कर्म, भक्ति, ज्ञार्न और योग के सार्थ सम्मिलित होने से ही परमार्त्मार् क दर्शन होतार् है।

रार्मकृष्ण मिशन क एक महत्वपूर्ण कार्य है जनसेवार्। यह आपदार् की स्थिति में पूरी निष्ठार् से लोगों की सेवार् करतार् है। मठ के शैक्षिक उद्देश्यों पर जोर डार्लते हुए विवेकानन्द ने कहार् ‘‘इस मठ को धीरे-धीरे एक सर्वार्ंग सुन्दर विश्वविद्यार्लय के रूप में परिणत करें। इसमें दर्शनशार्स्त्र तथार् धर्मशार्स्त्र के सार्थ-सार्थ औद्योगिक विषयों की भी शिक्षार् देनी होगी।’’ उनके विचार्र में रार्ष्ट्र की उन्नति उसी अनुपार्त में होगी जिस अनुपार्त में जनतार् के मध्य शिक्षार् क प्रसार्र होगार्। विवेकानन्द के इन सुझार्वों पर मठ एवं मिशन चलने क प्रयार्स कर रहे हैं। इनके द्वार्रार् अनेक विद्यार्लय, महार्विद्यार्लय, शिक्षक प्रशिक्षण संस्थार्न, धामिक विद्यार्लय, औद्योगिक विद्यार्लय, कृषि संस्थार्न, संस्कृत विद्यार्लय एवं महार्विद्यार्लय, पार्लीटेकनीक स्कूल, कम्प्यूटर सेन्टर, अनौपचार्रिक शिक्षार् केन्द्र आदि प्रभार्वशार्ली ढ़ंग से चलार्ये जार् रहे हैं।

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