स्वार्मी दयार्नंद सरस्वती क जीवन परिचय

स्वार्मी दयार्नन्द सरस्वती के बचपन क नार्म मूलशंकर थार्। उनक जन्म सन् 1824 में गुजरार्त प्रार्ंत के काठियार्वार्ड़ सम्भार्ग में मोरवी रार्ज्य (अब जिलार् रार्जकोट) के एक छोटे-से गार्ँव टंकारार् के एक समृद्ध सनार्तनी परिवार्र में हुआ थार्। पितार् क नार्म करसन लार्ल जी तिवार्री थार्। वे शैवमत के कट्टर अनुयार्यी थे। बार्लक मूलशंकर कभी स्कूल नहीं गये। पितार् की देख-रेख में उन्होंने संस्कृत और धर्मशार्स्त्रों क अध्ययन कियार्। पार्ँचवे वर्ष में उन्होंने देवनार्गरी अक्षर पढ़नार् प्रार्रम्भ कियार्। धीरे-धीरे धर्म-शार्स्त्रों एवं सूत्रों के श्लोकों को भी यार्द करार्यार् जार्ने लगार्। आठवें वर्ष में यज्ञोपवीत संस्कार हुआ। गार्यत्री, सन्ध्यार् सिखार्यी गर्इ। यजुर्वेद-संहितार् क अध्ययन करार्यार् गयार्। संस्कृत व्यार्करण सिखार्यार् गयार् तथार् वेद-पार्ठ भी आरम्भ हो गयार्। चौदहवें वर्ष तक वे यजुर्वेद की सम्पूर्ण संहितार् एवं अन्य वेद भी पढ़ चुके थे।

चौदह वर्ष की अवस्थार् में (1837 र्इ0 में) एक ऐसी घटनार् घटी जिसने बार्लक मूलशंकर के मार्नस को ही बदल दियार्। शिवरार्त्रि के त्योहार्र पर उपवार्स क व्रत किए लोग रार्त्रि-जार्गरण कर रहे थे। मूलशंकर भी उनमें से एक थार्। रार्त बीतती गर्इ- अन्य भक्तों के सार्थ उनके पितार् भी सो गए। तभी एक घटनार् घटी। एक छोटी-सी चुहियार् शिव जी की मूर्ति पर चढ़ कर प्रसार्द खार्ने लगी। किशोर मूलशंकर के मन में प्रश्न उठार् क्यार् यही सर्वशक्तिमार्न शंकर है? अगर ये शंकर है तो इन पर चुहियार् कैसे चढ़ सकती है? उसकी आस्थार् डगमगार् गर्इ। उसने निश्चय कियार् कि इस बलहीन, प्रार्णहीन मूर्ति की जगह वह सच्चे शिव क दर्शन करेगार्। कालार्न्तर में यही किशोर उन्नीसवीं सदी के एक प्रखर और जुझार्रू समार्ज-सुधार्रक के रूप में विख्यार्त हुआ। चार्रों ओर फैले पार्खण्ड, दम्भ और अन्धविश्वार्सों पर चोट करतार् हुआ उसने भार्रत को वैज्ञार्निक युग में ले जार्ने की रार्ह दिखार्यार्।

जिस समय मूलशंकर के हृदय में प्रश्नार्कुलतार् उमड़-घुमड़ रही थी भार्रत पर अंग्रेजो क आधिपत्य स्थार्पित हो चुक थार्। विदेशी शार्सकों के सार्थ उनकी सभ्यतार् एवं संस्कृति भी आर्इ थी। वे भार्रतीयों को ‘असभ्य’ मार्नते थे तथार् इन्हें ‘सभ्य’ बनार्ने हेतु उन्होंने दो माग अपनार्ए- एक थार्, र्इसाइ धर्म की श्रेष्ठतार् दिखार्ने के लिए हिन्दू धर्म पर उसकी कुरीतियों क प्रदर्शन करके सीधार् आक्रमण। दूसरे, यहार्ँ की भार्षार् और व्यवहार्र सीख कर धीरे-धीरे अपनी धर्म पुस्तकों क प्रसार्र करनार्।

ऐसी अवस्थार् में जहार्ँ एक ओर भार्रतीयों के ज्ञार्नचक्षु खुले वहीं दूसरी ओर उनके आक्रमण क जवार्ब देने के लिए यहार्ँ के बुद्धिजीवियों ने आत्म-मंथन भी शुरू कियार्। उन लोगों ने अनुभव कियार् कि भार्रत के अतीत में जो कुछ शुभ और सुन्दर थार् उसे भूलकर हम रूढ़ियों, कुरीतियों और पार्खण्डों में फँस गये हैं। छूआछूत, बार्ल-विवार्ह, बहु-विवार्ह, कन्यार्-वध, सती-प्रथार्, ऊँच-नीच, आदि बुराइयार्ँ सार्मार्जिक जीवन क हिस्सार् बन गर्इ हैं। इन दुष्कर्मों से मुक्त हुए बिनार् पश्चिम क उत्तर नहीं दियार् जार् सकतार् थार्।

सबसे पहले बंगार्ल में विचार्र-क्रार्ंति क जन्म हुआ। उसके उपरार्ंत भार्रत के अन्य भार्गों में सुधार्र के प्रयार्स तेज हुए। मूलशंकर के मन में भी जिस दिन सच्चे शिव की तलार्श क संकल्प जार्गार् वह निरन्तर अध्ययन और स्वतंत्र चिन्तन में लीन रहने लगार्। उसने उस किसी भी बार्त को मार्नने से इंकार कर दियार् जो केवल इसलिए मार्नार् जार्तार् है क्योंकि वह परम्परार् से चली आ रही है यार् किसी घर के बड़े क उसे मार्नने क आदेश है। उनक विद्रोही मन देश और समार्ज के लिए रचनार्त्मक कार्य करने हेतु आतुर हो उठतार्।

छोटी बहन एवं धर्मार्त्मार् विद्वार्न चार्चार् की मृत्यु ने मूलशंकर को वैरार्ग्य की दशार् में पहुँचार् दियार्। मार्तार्-पितार् मूलशंकर को विवार्ह के बन्धन में बार्ँध नार् चार्हते थे पर मूलशंकर 1846 र्इ0 में एक दिन संध्यार् के समय घर छोड़कर चले गए- पुन: कभी नहीं लौटने के लिए। अब सम्पूर्ण भार्रत उनक घर थार् और सभी भार्रतीय उनके बन्धु-बार्न्धव। सन् 1946 से 1860 तक के पन्द्रह वर्षों में वह नार्नार् रूप कटु और मधुर अनुभवों से गुजरते हुए आगे और आगे बढ़ते गए। प्रसिद्ध संत और विद्वार्न पूर्णार्नन्द सरस्वती ने मूलशंकर को सन्यार्स की दीक्षार् देकर उनक नार्म दयार्नन्द सरस्वती रखार्। इस बीच दयार्नन्द सरस्वती योग, निघण्टू, निरूक्त, वेद, पूर्व मीमार्ंसार् आदि के प्रकाण्ड विद्वार्न बन चुके थे। स्वार्मी दयार्नन्द सरस्वती क सम्पूर्ण व्यक्तित्व वैज्ञार्निक दृष्टिकोण से परिपूर्ण थार्। नार्ड़ीचक्र से सम्बन्धित उन्होंने कर्इ पुस्तकें हिमार्लय यार्त्रार् के दौरार्न पढ़ी थीं। उन्होंने इस पुस्तकीय ज्ञार्न क वार्स्तविक परीक्षण कियार्। वे आत्मकथार् में लिखते हैं ‘‘एक दिन संयोग से एक शव मुझे नदी में बहते मिलार्। तब समुचित अवसर प्रार्प्त हुआ कि मैं उसकी परीक्षार् करतार् और उन पुस्तकों के संदर्भ में निर्णय करतार्। सो उन पुस्तकों को समीप ही एक ओर रखकर मैं नदी के भीतर गयार् और शव को पकड़ तट पर आयार्। मैंने तीक्ष्ण चार्कू से उसे काटनार् आरम्भ कियार् और हृदय को उसमें से निकाल लियार् और ध्यार्न पूर्वक देख परीक्षार् की। अब पुस्तकोल्लिखित वर्णन की उससे तुलनार् करने लगार्। ऐसे ही शर और ग्रीवार् के अंगो को काटकर सार्मने रखार्। यह पार्कर कि दोनों पुस्तक और शव लेशमार्त्र भी परस्पर नहीं मिलते, मैंने पुस्तकों को फार्ड़कर उनके टुकड़े-टुकड़े कर डार्ले और शव के सार्थ ही पुस्तकों के टुकड़ों को भी नदी में फेंक दियार्। उसी समय से शनै:-शनै: मैं यह परिणार्म निकालतार् गयार् कि वेदों, उपनिषद्, पार्तंजल और सार्ंख्य-शार्स्त्र के अतिरिक्त अन्य पुस्तकें, जो विज्ञार्न और विद्यार् पर लिखी गर्इ हैं, मिथ्यार् और अशुद्ध हैं।’’

1857 से 1860 के बीच दयार्नन्द सरस्वती कहार्ँ रहें इसक कहीं उल्लेख नहीं मिलतार् है। स्पष्टत: वे 1857 की क्रार्ंति से सम्बद्ध रहे थे अत: उनके जीवन क यह काल-खंड आज भी रहस्य बनार् हुआ है। सन् 1860 में वे गुरू विरजार्नन्द के पार्स पहुँचते हैं। उनके निर्देशन में ढ़ाइ वर्ष के अल्पकाल में उन्होंने महार्भार्ष्य, ब्रह्मसूत्र, योगसूत्र, वेद-वेदार्ंग इन सबक अध्ययन कियार्। स्वार्मी दयार्नन्द सरस्वती ने गुरू विरजार्नन्द को वचन दियार् कि वे आर्य ग्रन्थों की महिमार् स्थार्पित करेंगे, अनाष ग्रन्थों क खंडन करेंगे और वैदिक धर्म की पुनपर््रतिष्ठार् में अपने प्रार्ण तक अर्पित कर देंगे।

1867 र्इ0 में हरिद्वार्र में कुम्भ थार्। वहार्ँ स्वार्मी दयार्नन्द सरस्वती ने अपने वस्त्र फार्ड़कर एक पतार्क तैयार्र की और उस पर लिखार् ‘पार्खंड खंडनी’, उसे अपनी कुटियार् पर फहरार्कर अधर्म, अनार्चार्र और धामिक शोषण के खिलार्फ युद्ध की घोषणार् कर दी। उनक यह धर्म युद्ध 1883 में उनके देहार्वसार्न के बार्द ही समार्प्त हुआ। उन्होंने काशी पण्डितों को मूर्तिपूजार् के संदर्भ में हुए शार्स्त्राथ में निरूत्तर कर दियार्। कलकत्ते में महर्षि देवेन्द्रनार्थ ठार्कुर, रार्जनार्रार्यण वसु, डब्लू0 सी0 बनर्जी, भूदेव मुखर्जी, केशवचन्द्र सेन आदि विद्वार्नों ने उनक भव्य स्वार्गत कियार् और उनके विचार्रों से लार्भार्न्वित हुए। केशवचन्द्र सेन के सुझार्व पर दयार्नन्द सरस्वती ने हिन्दी भार्षार् अपनार् ली तथार् कोपीन के स्थार्न पर धोती-कुरतार् धार्रण करने लगे। 1875 में बम्बर्इ में इन्होंने ‘आर्यसमार्ज’ की स्थार्पनार् की। हिन्दी के विकास और रार्ष्ट्र-प्रेम की भार्वनार् जार्गृत करने में इस संस्थार् की भूमिक अत्यन्त महत्वपूर्ण है। उसी वर्ष सत्याथ प्रकाश क प्रकाशन हुआ। विष्णु प्रभार्कर (2006: 51) के शब्दों में ‘‘वह (सत्याथ प्रकाश) आर्यसमार्ज की बाइबिल है और हिन्दी क प्रचार्र और प्रसार्र करने में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से उसक योगदार्न अपूर्व है।’’ महार्रार्ष्ट्र में महार्देव गोविन्द रार्नार्डे, गोपार्ल हरि देशमुख, ज्योतिबार् फुले जैसे सुधार्रक दयार्नन्द के प्रशंसकों में से थे। थियोसोफिकल सोसार्इटी की संस्थार्पिक मैडम ब्लैवेट्स्की ने दयार्नन्द सरस्वती के संदर्भ में कहार्:

‘‘शंकरार्चाय के बार्द में भार्रत में कोर्इ भी व्यक्ति ऐसार् नहीं हुआ जो स्वार्मीजी से बड़ार् संस्कृतज्ञ, उनसे बड़ार् दाशनिक, उनसे बड़ार् तेजस्वी वक्तार् तथार् कुरीतियों पर आक्रमण करने में उनसे अधिक निभ्र्ार्ीक रहार् हो।’’

स्वार्मी दयार्नन्द सरस्वती ने रार्जस्थार्न के देशी रियार्सतों में सुधार्र आन्दोलन चलार् रखार् थार्। अत: अनेक प्रभार्वशार्ली लोग उनके विरोधी हो गये। जोधपुर रार्ज्य के रार्जमहल में वे “ार्ड़यंत्र के शिकार हुए। उन्हें दूध में जहर और पिसार् हुआ काँच दियार् गयार् थार्। 1883 र्इ0 में दीपार्वली के दिन इनक देहार्वसार्न हो गयार्।

स्वार्मी जी चले गये परन्तु भार्रत के सार्ंस्कृतिक और रार्ष्ट्रीय नवजार्गरण में उनक योगदार्न अत्यन्त महत्वपूर्ण है। उनकी मार्न्यतार्ओं और सिद्धार्न्तों ने हीन भार्व से ग्रस्त भार्रतीयों में अपूर्व उत्सार्ह क संचार्र कियार्। अन्धविश्वार्स और कुरीतियों के जार्ल से मुक्त होकर उन्होंने जिस प्रगतिशील माग को अपनार्यार् थार्, जिस वैचार्रिक क्रार्ंति को जन्म दियार् थार् वही माग आज हमें वैज्ञार्निक युग में ले आयार् है।

जीवन-दर्शन 

दयार्नन्द सरस्वती ब्रह्म को निरार्कार, सर्वव्यार्पक, सर्वशक्तिमार्न एवं सर्वज्ञ मार्नते हैं। सार्थ ही वे जीवार्त्मार्ओं एवं पदाथों के स्वतंत्र अस्तित्व को भी स्वीकार करते है। उनके अनुसार्र ब्रह्म यार् र्इश्वर इस ब्रह्मार्ण्ड क कर्तार् है, पदाथ जन्य इसके उपार्दार्न क कारण है और जीवार्त्मार्एँ इसके सार्मार्न्य कारण। अर्थार्त् पदाथ जन्म जगत भी वार्स्तविक है, यर्थार्थ है। दयार्नन्द मूर्तिपूजार् के घोर विरोधी तथार् एकेश्वरवार्द के कट्टर समर्थक थे। वे परमार्त्मार् और जीवार्त्मार् को दो अलग तत्व मार्नते हैं। इनके अनुसार्र परमार्त्मार् सर्वव्यार्पक और आत्मार् सीमित है। परमार्त्मार् ही विश्व क सृजन, पोषण और नियमन करतार् है। जीवार्त्मार् अपने कर्मों क फल भोगतार् है। कर्म-भोग के अंत को ही ये मुक्ति मार्नते हैं। कर्म भोग से मुक्ति के उपरार्ंत आत्मार् पुन: परमार्त्मार् में मिल जार्ती है।

स्वार्मी दयार्नन्द सरस्वती वस्तु जगत और आध्यार्त्मिक जगत दोनों ही तरह के ज्ञार्न को महत्त्व प्रदार्न करते हैं। वे वस्तु जगत के ज्ञार्न को यथाथ ज्ञार्न कहते है और आध्यार्त्मिक जगत के ज्ञार्न को सद्ज्ञार्न कहते हैं। दयार्नन्द सद्ज्ञार्न को सर्वोच्च ज्ञार्न मार्नते हैं, जो वैदिक ग्रंथों में निहित है। पर हर ज्ञार्न को तर्क की कसौटी पर कसनार् दयार्नन्द की विशेषतार् थी।

दयार्नन्द ने ज्ञार्न और कर्म को मुक्ति क सार्धन मार्नार्। दयार्नन्द की आचार्र-संहितार् अत्यन्त ही स्पष्ट थी। उन्होंने अशुद्ध ज्ञार्न एवं अकरणीय कार्य को ‘आठ गप्प’ कहार्। ये हैं:-

  1. मनुष्यकृत पुरार्णार्दि ग्रन्थ 
  2. पार्षार्णार्दि पूजन 
  3. वैष्णवार्दि सम्प्रदार्य 
  4. तन्त्र ग्रन्थों में वर्णित वार्म माग
  5. भार्ँग आदि नशे
  6. पर स्त्री गमन 
  7. चोरी 
  8. कपट, छल एवं अभिमार्न। 

सद्ज्ञार्न एवं करने योग्य कार्य को स्वार्मी दयार्नन्द ने ‘आठ सत्य’ के नार्म से पुकारार्। ये हैं:-

  1. र्इश्वर रचित वेदार्दि 21 शार्स्त्र 
  2. ब्रह्मचर्यव्रत-धार्रण करके गुरूसेवार् और अध्ययन 
  3. वर्णार्श्रम धर्म क पार्लन करते हुए संध्यार्वन्दन करनार् 
  4. पंच महार्यज्ञ करते हुए श्रौत स्मातार्दि द्वार्रार् निश्चित आचार्र क पार्लन करनार् 
  5. शम दम नियम आदि क पार्लन करते हुए वार्नप्रस्थ आश्रम क ग्रहण 
  6. विचार्र, विवेक, वैरार्ग्य, परार्विज्ञार् क अभ्यार्स, सन्यार्स ग्रहण 
  7. ज्ञार्न-विज्ञार्न द्वार्रार् जन्म-मरण शोक-हर्ष, काम, क्रोध आदि सब दोषों क त्यार्ग 8. तम-रज क त्यार्ग, सतोगुण क ग्रहण 

आर्यसमार्ज के नियम 

इन ‘आठ सत्यों’ के ही आधार्र पर ही स्वार्मी दयार्नन्द ने आर्यसमार्ज के नियम एवं उद्देश्य निश्चित किए। ये हैं:-

  1. सब सत्य विद्यार् और जो पदाथ विद्यार् से जार्ने जार्ते हैं उन सबक आदि मूल परमेश्वर है। 
  2. र्इश्वर सच्चिदार्नन्द स्वरूप निरार्कार, सर्वशक्तिमार्न, न्यार्यकारी, दयार्लु, अजन्मार्, अनन्त, निर्विकार, अनार्दि, अनुपम, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्तार् है, उसी की उपार्सनार् करनी चार्हिए। 
  3. वेद सब सत्य विद्यार्ओं की पुस्तक है। वेद क पढ़नार्-पढ़ार्नार् और सुननार्-सुनार्नार् सब आर्यों क परम धर्म है।
  4. सत्य के ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने में सर्वदार् उद्यत रहनार् चार्हिये। 
  5. सब काम धर्मार्नुसार्र अर्थार्त् सत्य और असत्य को विचार्र करके करनार् चार्हिये। 
  6. संसार्र क उपकार करनार् इस समार्ज क मुख्य उद्देश्य है- अर्थार्त् शार्रीरिक, आत्मिक और सार्मार्जिक उन्नति करनार्। 
  7. सबसे प्रीतिपूर्वक धर्मार्नुसार्र यथार्योग्य व्यवहार्र करनार् चार्हिये।
  8. अविद्यार् क नार्श और विद्यार् की वृद्धि करनी चार्हिये। 
  9. प्रत्येक को अपनी उन्नति से सन्तुष्ट न रहनार् चार्हिये, किन्तु सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चार्हिये। 
  10. सब मनुष्यों को सार्मार्जिक सर्वहितकारी नियम क अवश्य पार्लन करनार् चार्हिये। 

तर्क को महत्त्व 

स्वार्मी दयार्नन्द सरस्वती ने धर्म में भी तर्क को महत्व प्रदार्न कियार्। वे कहते हैं ‘‘कुछ लोग नदियों, गंगार् इत्यार्दि की पूजार् करते हैं, कुछ सितार्रों की, कुछ लोग मिट्टी और पत्थर की मूर्तियार्ं पूजते हैं लेकिन बुद्धिमार्न व्यक्ति क परमार्त्मार् उसके हृदय में, उसकी अपनी आत्मार् में वार्स करतार् है। परमार्त्मार् को मार्नव अस्तित्व की गूढ़तम गहरार्इयों में पार्यार् जार् सकतार् है। उन्होंने तर्क के नियम पर बल दियार् और बतार्यार् कि श्रद्धार् के आधार्र पर कुछ भी स्वीकार न करो, बल्कि जार्ंचो, परखो और निष्कर्ष पर पहँुचो।

पुरूष-नार्री समार्नतार् के पक्षधर 

दयार्नन्द सरस्वती ने स्त्री और पुरूष समार्नतार् के नियम की व्यार्ख्यार् की। उन्होंने कहार् ‘‘र्इश्वर के समीप स्त्री-पुरूष दोनों बरार्बर है क्योंकि वह न्यार्यकारी है। उसमें पक्षपार्त क लेश नहीं है। जब पुरूष को पुनर्विवार्ह की आज्ञार् दी जार्ए तो स्त्रियों को दूसरे विवार्ह से क्यों रोक जार्ये।… पुरूष अपनी इच्छार्नुसार्र जितनी चार्हे उतनी स्त्रियार्ँ रख सकतार् है। देश, काल, पार्त्र और शार्स्त्र क कोर्इ बन्धन नहीं रहार्। क्यार् यह अन्यार्य नहीं है? क्यार् यह अधर्म नहीं है?’’

सार्मार्जिक समार्नतार् के समर्थक 

स्वार्मी दयार्नन्द सरस्वती एक महार्न समार्ज सुधार्रक थे। उनमें जेहार्द क जोश थार्, प्रखर बुद्धि थी और जब वह सार्मार्जिक अन्यार्य देखते तो उनके हृदय में आग जल उठती थी। वे बार्र-बार्र कहते थे- ‘‘अगर आप आस्तिक हैं तो सभी आस्तिक भगवार्न के एक परिवार्र के सदस्य हैं। अगर आपक परमार्त्मार् में विश्वार्स है तो प्रत्येक मनुष्य उसी परमार्त्मार् की एक चिनगार्री है। इसलिए आप प्रत्येक मार्नव-प्रार्णी को अवसर दीजिए कि वह अपने को पूर्ण बनार् सके।’’

इस प्रकार दयार्नन्द मार्नव-मार्नव में कोर्इ भेद नहीं मार्नते थे चार्हे वह जार्ति के आधार्र पर हो यार् धर्म के आधार्र पर।

रार्ष्ट्रीयतार् के पोषक 

देश के प्रति उनके मन में अगार्ध ममतार् थी। सत्य की तलार्श में नगर, वन, पर्वत सभी कहीं घूमते-घूमते उन्होंने जनतार् की दुर्दशार् और जड़तार् को देखार् थार्। भार्रत रार्ष्ट्र की दुर्दशार् से स्वार्मी जी अत्यधिक आहत थे। उन्होंने अपनार् सम्पूर्ण जीवन रार्ष्ट्रीयतार् की भार्वनार् को मजबूत करने में लगार् दियार्। वे संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वार्न थे, गुजरार्ती उनकी मार्तृभार्षार् थी पर रार्ष्ट्र की एकतार् को मजबूत करने हेतु उन्होंने हिन्दी भार्षार् के मार्ध्यम से ही अपनार् उपदेश देनार् प्रार्रम्भ कियार् और इसी भार्षार् में अपनी पुस्तकें लिखी। हिन्दी भार्षार् के प्रति ऐसी अटूट निष्ठार् किसी दूसरे भार्रतीय मनीषी यार् नेतार् में मिलनार् कठिन है। स्वार्मी जी पहले व्यक्ति थे जिन्होंने स्वदेशी और स्वरार्ज्य जैसे शब्दों क प्रयोग कियार्। दार्दार्भाइ नरौजी ने स्पष्ट कहार् है कि उन्होंने स्वरार्ज्य शब्द दयार्नन्द सरस्वती के सत्याथ प्रकाश से सीखार् है। दयार्नन्द सरस्वती से श्यार्मजी कृष्ण वर्मार्, लार्लार् लार्जपत रार्य, स्वार्मी श्रद्धार्नन्द, डॉ0 सत्यपार्ल, रार्मप्रसार्द बिस्मिल, भगत सिंह आदि ने प्रेरणार् पाइ और वे भार्रत की स्वतंत्रतार् के लिए प्रार्ण तक उत्सर्ग करने के लिए तैयार्र हो गए।

अतएव एक भगवार्न की पूजार्, जार्ति, रंग और धर्म के भेदभार्व से ऊपर उठकर मनुष्य की सेवार् तथार् स्वदेशी भार्वनार् क विकास – तीन बुनियार्दी सिद्धार्न्त थे जिनकी स्वार्मी दयार्नन्द सरस्वती ने स्थार्पनार् की। न सिर्फ स्थार्पनार् की बल्कि देश-भर में उनक प्रचार्र भी कियार्। आर्यसमार्ज अनेक ऐसी संस्थार्यें चलार्ती हैं जो इन सिद्धार्न्तों को कार्यार्न्वित करती हैं।

समार्ज सुधार्रक के रूप में स्वार्मी दयार्नंद सरस्वती की भूमिका 

जगह-जगह घूते हुए स्वार्मी जी जनतार् से ये ही कहते थे, कि अपनी भलाइ चार्हते हो तो नीच-ऊँच, छोटे-बड़े इत्यार्दि भेद और द्वेष भार्व को त्यार्गकर संगठित हो जार्ओ, वेद की षिक्षार् पर चलो और सदार्चार्री बनकर एक सर्वव्यार्पक सर्वषक्तिमार्न निरार्कार परब्रह्म की उपार्सनार् करो। स्वार्मी जी पौरार्णिक दन्तकथार्ओं को नहीं मार्नते थे। वे केवल वेद और वेद के अनुकूल आर्ष ग्रन्थों को ही प्रमार्ण कोटि में रखते थे।

 स्वार्मी दयार्नन्द ने यह स्वीकार कियार् है कि भार्रतीय पुनरूत्थार्न और आधुनिकीकरण भार्रत की प्रार्चीन वैदिक संस्कृति के आधार्र पर ही संभव है। स्वार्मी दयार्नन्द क भार्रतीय समार्ज पर ज्ञार्न अधिक गहरार् थार्, और उनक भार्रतीय परम्परार् क अध्ययन अधिक पूर्ण मार्नार् जार् सकतार् है। स्वार्मी दयार्नन्द में प्रखर प्रतिभार् और गहरी अन्तदर्ृष्टि थी, सार्थ ही उनमें मार्नवीय संवेदनार् की बहुत व्यार्पक और आन्तरिक क्षमतार् थी। इसलिये घर से बार्हर निकलने के बार्द लगभग चौबीस वर्ष उन्होने देष के स्थार्न-स्थार्न पर योग के घूमने में बितार्ये और सार्रे भार्रतीय जन-समार्ज क बहुत व्यार्पक अनुभव प्रार्प्त किये। अपनी सूक्ष्म संवेदनार् के कारण ही उनको भार्रतीय समार्ज के जीवन क यथाथ ज्ञार्न हो सका। म्ूलषंकर घर से निकले थे संसार्र के बंधनों से मुक्त होकर शुद्धस्वरूप षिव की खोज में और दयार्नन्द को मिलार् दु:खी, संतप्त, हीन भार्व से ग्रस्त, अनेक कुरीतियों, पार्खण्डो, दुरार्चार्रों से पीड़ित, कुंठित, गतिरूद्ध भार्रतीय समार्ज। और फिर वे व्यक्तिगत मोक्ष के माग को भूल कर अपने समार्ज के उद्धार्र में प्रार्ण-पण से लग गये।

एक ओर दयार्न्द जी को तत्कालीन भार्रतीय समार्ज की यथाथ स्थिति क सही ज्ञार्न थार्, तो दूसरी ओर भार्रतीय संस्कृति क उन्होंने मन्थन भी कियार् थार्। स्वार्मी विरजार्नन्द ने आर्ष ग्रन्थों और वैदिक संस्कृति की ओर उनक ध्यार्न आकर्षित करके उनको दिषार्-निर्देष दियार् थार्। अपने परिभ्रमण काल में देष के समार्ज को अवरूद्ध करने वार्लार् वर्ग पौरार्णिको, पुरोहितो, सार्म्प्रदार्यिको तथार् महन्तो थार् है।

उस प्रज्ञार्चक्षु संन्यार्सी ने यह समझ लियार् थार् कि वैदिक काल के काद के ब्रार्ह्मण और पुरोहित वर्गों ने स्वाथवष और शक्ति की प्रतिद्वंदितार् में शुद्ध आर्ष ग्रन्थों की मनमार्नी टीकाएँ और व्यार्ख्यार्एँ की हैं। अनेक समार्नार्न्तर ग्रन्थों की रचनार् की है। इन संहितार्ओं, स्मृतियों, उपनिषद्ो और पुरार्णों में अपने स्वाथ-सिद्धि के नियमों और सिद्धार्न्तों क समार्हार्र कियार्। इतनार् ही नहीं, मनमार्ने ढंग से आर्ष ग्रन्थों में प्रक्षेप भी किये गये।

स्वार्मी दयार्नन्द ने वेदों के प्रार्मार्ण्य पर ही यह घोषित कियार् कि जो हमार्रे विवेक को स्वीकारर्य नहीं, उसके त्यार्ग में हम को एक क्षण क विलम्ब नहीं करनार् चार्हिए। यदि वेदों में ज्ञार्न के बदले अज्ञार्न है, मार्नवीय उच्च मूल्यों के बार्जय घोर हिंसार्वृत्ति, भोगवार्द और यर्थाथ की उपार्सनार् है तो उनको अस्वीकार कर देनार् चार्हिए। (उन्होंने निघण्टु, निरूक्त अष्टार्ध्यार्यी और महार्भार्ष्य जैसे व्यार्करण ग्रन्थों के आश्रय से वेद- मन्त्रों की सुसंगत और व्यवस्थित व्यार्ख्यार् प्रस्तुत की।) इस दृष्टि से गहन अध्ययन करने के बार्द उन्होंने घोषित कियार् कि वेद, वैदिक सार्हित्य और अन्य आर्ष गन्थ ही प्रमार्ण्य हैं, उनमें सत्य-ज्ञार्न सुरक्षित है, इसी में भार्रतीय संस्कृति के उच्चतम मूल्य सुरक्षित हैं और ये मूल्य भार्रतीय समार्ज और व्यक्ति के जीवन के सभी पक्षों को मौलिक सृजनषीलतार् से गतिषील करने में सक्षम रहे हैं।

स्वार्मी दयार्नन्द ने भार्रतीय समार्ज में व्यार्प्त निष्क्रियतार्, अन्धविष्वार्स और स्वाथपरतार् के मूल में मध्ययुग के पुरार्णपंथ को मार्नार् है।

स्वार्मी दयार्नन्द के अनुसार्र वैदिक धर्म परमब्रह्म परमेष्वर की उपार्सनार् क विधार्न है परन्तु पुरार्णपंथियों ने उसके स्थार्न पर अनेकेष्वरवार्द, अवतार्रवार्द, मूर्तिपूजार्, देवी-देवतार्ओं की पूजार् और यहार्ँ तक उपदेवतार्ओं तक की पूजार् प्रचलित करके अपनार् स्वाथ सिद्ध कियार्। वेद समर्थित समार्ज में चार्र वर्णों की व्यार्ख्यार् हैं, और यह व्यवस्थार् कर्म के अधार्र पर थी। इनमें ऊँच-नीच तथार् छुआछुत क अन्तर नहीं थार्। दयार्नन्द जी के अनुसार्र -व्यक्ति अपने विकास में समार्ज की सहार्यतार् पार्तार् हैं, अत: उसे समार्ज को चुकानार् भी चार्हिए। प्रत्येक व्यक्ति पर स्वस्थ वंष परम्परार् चलार्ने, ज्ञार्न की परम्परार् को आगे बढ़ोन, प्रार्णिमार्त्र की सेवार् और सहार्यतार् करने तथार् जीवन को आध्यार्त्म की ओर अग्रसर करने क दार्यित्व है। इन विभिन्न दार्यित्वों को पूरार् किए बिनार् कोर्इ व्यक्ति मुक्त नहीं हो सकतार्।

वैदिक द्वैतवार्द की स्थार्पनार्

स्वार्मी दयार्नन्द ने मध्ययुग के व्यक्तिपरक धर्म, दर्षन सार्धनार् तथार् अध्यार्त्म को पुन: वैदिक समार्जपरक आधार्र पर प्रतिष्ठित कियार्। मध्ययुगीन अद्वैत तथार् अद्वैत आधार्रित दर्षनों को अस्वीकार कर उन्होंने वैदिक द्वैतवार्द की स्थार्पनार् की। एक परम ब्रह्म परमेष्वर सर्वत्र व्यार्प्त शार्ष्वत, अनार्दि, अनन्त सत्य स्वरूप है। वह हम जीवों क परम पितार् है और पार्लन-पोषण-संरक्षण करने वार्लार् है। वस्तुत: इस प्रकार की अवधार्रणार् में व्यक्ति और समार्ज के संबंधों क सुंदर स्वरूप सुरक्षित हैं। इसी कारण दयार्नंद जी ने ज्ञार्न और भक्ति के सूक्ष्म चिंतन और अनुभव के स्तर पर विकसित होने वार्ले आत्मार् और ब्रह्म के अद्वैतपरक भेदार्भेद को महत्व नहीं दियार्, वरन् उसे अस्वीकार कियार् है। उन्होंने स्पष्ट अनुभव कियार् कि जब तक मध्ययुगीन मूल्यों, स्थार्पनार्ओं, मार्न्यतार्ओं, जीवन-पद्धतियों और परम्परार्ओं क खुलार् विरोध नहीं कियार् जार्येगार्, और भार्रतीय समार्ज को इनकी कुंठार्ओं, जड़तार्ओं और स्वाथपरतार्ओं से पूर्णत: मुक्त नहीं कियार् जार्येगार्, तब तक इस समार्ज के पुनर्जीवित होने और फिर से मौलिक सर्जनषीलतार् से गतिषील होने क कोाइ अवसर नहीं है। इसी कारण उन्होंने इन सब पर कड़ार् प्रहार्र कियार् है और इसमें उन्होंने कभी किसी प्रकार क कार्इ समझौतार् नहीं कियार्। वस्तुत: अपनी गहरी अंतदृष्टि से उन्होंने समझ लियार् थार् कि विखण्डित और कुंठित परंपरार् से मुक्त होने क एकमार्त्र उपार्य है उसको तोड़ कर फेंक देनार्।

उनके जैसार् उदार्र मार्नवतार्वार्दी नेतार् दूसरार् नहीं रहार् है। उन्होंने धर्म की सदार् भार्रतीय व्यार्पक परिकल्पनार् सार्ने रखी है। वे धामिक सम्प्रदार्यों को अस्वीकार कर शुद्ध मार्नव मूल्यों पर प्रतिष्ठित धर्म को स्वीकार करने के पक्ष में रहे हैं। इस दृष्टि से वे भार्रतीय संतों के समार्न उदार्र और व्यार्पक दृिष्कोण के रहे हैं। पर संतों क दृष्टिकोण मुख्यत: आध्यार्त्मिक जीवन तक सीमित थार्, जब कि दयार्नन्द के सार्मने भार्रतीय जन-समार्ज के सर्वार्ंगीण विकास क लक्ष्य थार्। इस्लार्म और र्इसाइ धर्म की आलोचनार् उन्होंने प्रार्संगिक रूप में की है क्योंकि वे हिन्दुओं को मत परिवर्तन करने के लिए प्रेरित करते थे। उन्होंने सार्ंर के समार्ने दो महत्वपूर्ण बार्तें रखीं-

  1. मार्नवीय मूल्यों की सृजनषीलतार् से प्रेरित एक ही धर्म हैं। 
  2. यह धर्म संसार्र के सभी धर्मों के मूल में निहित है। 

 उनके लिए आर्य शब्द किसी सार्म्प्रदार्यिक धर्म क पर्यार्य कभी नहीं बनार्, यह उनके द्वार्रार् आर्य समार्ज की स्थार्पनार् से भी सिद्ध है। आर्य समार्ज कभी किसी धर्म क रूप नहीं ले सका, यह उनकी इच्छार् और विष्वार्स क ही परिणार्म थार्। स्वार्मी दयार्नन्द ने समार्ज में स्त्री के स्थार्न पर विशेष ध्यार्न दियार् थार्। वे पुरूष के सार्थ नार्री की समार्नतार् क पूर्ण समर्थन करते थे। भार्रतीय समार्ज की हीन अवस्थार् क एक महत्वपूर्ण कारण उनके अनुसार्र यह भी है कि इस समार्ज में नार्री क सम्मार्नपूर्ण स्थार्न नही रह गयार् है। वे नार्री और पुरूषों के अधिकारों की पूर्ण समार्नतार् स्वीकार करते हैं, स्त्री अषिक्षार्, बार्ल-विवार्ह, विधवार् प्रथार् तथार् वेष्यार् वृत्ति आदि अनेक समस्यार्ओं को दयार्नन्द ने उठार्यार् और उनक उचित समार्धार्न प्रस्तुत कियार् थार्। जिस सार्हस और दृढ़तार् के सार्थ उन्होंने इन समस्यार्ओं क समार्धार्न समार्ज के सार्मने रखार् थार्, उससे उनके व्यक्तित्व की क्रार्ंतिकारितार् लक्षित होती है और उनक द्रष्टार् रूप भी सार्मने आतार् है।

स्वार्मी दयार्नन्द ने लौकिक तथार् आध्यार्त्मिक जीवन के मूल्यों के पार्रस्परिक अंत: संबंध को जितनी स्पष्टतार् के सार्थ प्रतिपार्दित और विवेचित कियार् है,वह अन्यत्र नहीं मिलतार्। स्वार्मी दयार्नन्द ने संसकृति के इसी रूप की परिकल्पनार् की है और उनकी दृष्टि में यही भार्रतीय संस्कृति क सच्चार् स्वरूप है।

स्वार्मी दयार्नन्द आधुनिक युग में ऋषि और द्रष्टार् उनमें जितनी गहरी यथाथ की पकड़ थी, उतनी ही व्यार्पक इतिहार्स और परम्परार् को ग्रहण करने की क्षमतार् भी। इतनार् ही नहीं, उन्होंने अपने समार्ज की प्रक्रियार् को समझार्, उसके भविष्य की संभार्वनार्ओं को पहचार्नार् और फिर उसको एक स्वस्थ, सप्रमार्ण और सृजनषील समार्ज-रचनार् की ओर उन्मुख करने क प्रयत्न कियार्। स्वार्मी दयार्नन्द रार्जार् रार्ममोहन रार्य से लेकर जवार्हरलार्ल नेहरू तक ऐसे भार्रतीय नेतार्ओं से बिल्कुल अलग थे, जो अपनी समस्त सद्भार्वनार्ओं और द्वेश कल्यार्ण की भार्वनार्ओं के बार्वजूद भार्रतीय आधुनिकीकरण क रार्स्तार् हर प्रकार से पष्चिमीकरण से होकर गुजरतार् पार्ते रहे हैं।

स्वार्मी दयार्नन्द सरस्वती क यौगिक दृष्टिकोण 

मौलिक रूप से स्वार्मी दयार्नन्द सरस्वती वेदार्न्त के सार्धक थे। वेदार्न्त सार्धनार् में भी अद्वैतवार्द पर विषेष जोर रहार्। स्वार्मी जी भार्रतीय योग परम्परार्ओं में समकालीन समय के एक विषिश्ट व्यक्तित्व रहे है। इनके जीवन में प्रार्चीन योग सार्धनार् क नवीनतम प्रयोग देखने को मिलते है। ये ध्यार्न योग के सिद्धहस्त तथार् ध्यार्न योग के भी सार्धक थे, किन्तु निरार्कार ध्यार्न इनक विषय रहार्।

स्वार्मी जी बार्ल्यार्वस्थार् से ही निरार्कार उपार्सनार् के प्रति आकर्षित थे। निरार्कार सार्धनार् में आगे बढ़ते हुये अन्तत: इन्होंने आर्यसमार्ज की स्थार्पनार् की। अत: निरार्कार ब्रह्म ही उनके व्यक्तित्व क केन्द्रिय ध्येय रहार् है। इन्होंने ब्रह्मचर्य सार्धनार् क जीवन पर्यन्त पूर्ण रूप से पार्लन कियार्। जिसक प्रभार्व उनके व्यक्तित्व में प्रखरतार्, तेजस्वितार् तथार् अद्भुत शार्रीरिक बल में दृष्टिगोचर होतार् थार्। निरार्कार ब्रह्म की शक्ति के सहार्रे उन्होंने कुछ ऐसे कार्य किये जो सार्मार्न्य जन के लिये चमत्कार प्रतीत होतार् है। स्वार्मी जी हठयोग की कुछ सार्धनार्त्मक क्रियार्ओं के भी अभ्यार्सी थे। शरीर में हठयोग सिद्धि के लक्षण प्रत्यक्ष रूप में अभिव्यक्त होते थे। मुख्यत: स्वार्मी दयार्नन्द सरस्वती सन्यार्स माग के आदर्ष अनुयार्यी थे। सन्यार्स माग में जार्ने की सभी विषिष्ट सार्धनार्एं इन्होने सम्पन्न की थी। जिनके फलस्वरूप संन्यार्स माग के आगार्मी अनुयाइयों के लिये एक उज्जवल पथ प्रषस्त कियार्। एक योगी पुरूष के व्यक्तित्व में जो विषिष्ट लक्ष्य परिलक्षित होते है, स्वार्मी जी क व्यक्तित्व उन सभी विषिष्टतार्ओं से परिपूर्ण थार्।

गुरूकुल एवं दयार्नन्द-एंग्लो-वेदिक (डी0ए0वी0) विद्यार्लय 

स्वार्मी दयार्नन्द सरस्वती के विचार्रों क भार्रतीय शिक्षार् व्यवस्थार् पर व्यार्पक प्रभार्व पड़ार्। दयार्नन्द के समर्थकों ने दो तरह की शिक्षार् संस्थार्यें स्थार्पित की- गुरूकुल और दयार्नन्द एंग्लो वेदिक विद्यार्लय एवं महार्विद्यार्लय।

गुरूकुल व्यवस्थार् दयार्नन्द सरस्वती के मूल विचार्रों पर आधार्रित है। पहलार् गुरूकुल दिल्ली के समीप सिकन्दरार्बार्द में खोलार् गयार्। बार्द में वृन्दार्वन में यमुनार् के किनार्रे इसे स्थार्नार्न्तरित कर दियार् गयार्। यह वृन्दार्वन गुरूकुल के नार्म से प्रसिद्ध हुआ।

सर्वार्धिक प्रसिद्धि हरिद्वार्र के समीप स्थित गुरूकुल कांगड़ी को प्रार्प्त है। इसकी स्थार्पनार् स्वार्मी दयार्नन्द के योग्य शिष्य स्वार्मी श्रद्धार्नन्द ने की थी। यहार्ँ पर भार्रतीय भार्षार् हिन्दी के मार्ध्यम से उच्चतम एवं नवीनतम ज्ञार्न देने की शुरूआत की गर्इ। और इस कार्य में इस विश्वविद्यार्लय ने अभूतपूर्व सफलतार् पाइ। कन्यार्ओं के लिए देहरार्दून, बड़ौदार् और सार्सनी (अलीगढ़) के गुरूकुल बड़े प्रसिद्ध हैं। इन गुरूकुलों में वैदिक ज्ञार्न-विज्ञार्न, संस्कृत भार्षार् और सार्हित्य पर विशेष जोर दियार् जार्तार् है। ये गुरूकुल वैदिक काल की मर्यार्दार्ओं को जीवन्त करते हैं।

आर्यसमार्ज के ही एक दूसरे पक्ष ने लार्ल हंसरार्ज के नेतृत्व में दयार्नन्द एंग्लो ओरिएन्टल विद्यार्लयों क सम्पूर्ण देश में जार्ल बिछार् दियार्। ये दयार्नन्द के विचार्रों को स्वीकार करते हुए अंग्रेजी भार्षार् के मार्ध्यम से प्रार्चीन एवं नवीन दोनों ही तरह क ज्ञार्न देते थे। डी0ए0वी0 संस्थार्यें रार्ष्ट्रभक्ति की शिक्षार् देती थी। अंग्रेजी शार्सन के दौर में गुरूकुलों एवं डी0ए0वी0 संस्थार्ओं को सन्देह की दृष्टि से देखार् जार्तार् थार्। स्वतंत्र भार्रत में भी ये दोनों तरह की संस्थार्यें अपनी-अपनी भूमिक निभार् रही हैं।

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