स्वार्ध्यार्य चिकित्सार् क अर्थ, प्रक्रियार् एवं महत्व
कुछ लोग स्वार्ध्यार्य क अर्थ पुस्तकों क अध्ययन मार्त्र करनार् समझते हे, किन्तु इस प्रकार के अध्ययन को हम स्वार्ध्यार्य की संज्ञार् नहीं दे सकते। स्वार्ध्यार्य की अवधार्रणार् अत्यन्त व्यार्पक है। कुछ भी पढ़ लेने क नार्म स्वार्ध्यार्य नहीं है, वरन् स्वार्ध्यार्य की सार्मग्री केवल वही ग्रन्थ, पुस्तक क विचार्र हो सकतार् है, जो किसी अध्यार्त्मवेदतार् तपस्वी द्वार्रार् सृजित हो। जैसे कि वेद, उपनिषद, गीतार् अथवार् महार्न तपस्वी एवं योगी स्वार्मी विवेकानन्द, महर्षि अरविन्द, महर्षि रमण इत्यार्दि महार्पुरूषों के विचार्रों को स्वार्ध्यार्य की पार्ठ्य सार्मग्री बनार्यार् जार् सकतार् है। प्रार्य: स्वार्ध्यार्य से तार्त्पर्य Self Study से लियार् जार्तार् है, किन्तु यह Self Study न होकर Study of Self है अर्थार्त् सद्ग्रन्थों के प्रकाश में स्वयं के अध्ययन की प्रक्रियार् है। कहार् भी गयार् है कि – ‘‘स्वार्ध्यार्य सद्ग्रन्थों के प्रकाश में आत्मार्नुसंधार्न की प्रक्रियार् है।’’

इस प्रकार स्वार्ध्यार्य हमार्रे विचार्र तंत्र यार् सोचने विचार्रने के ढंग को सकारार्त्मक बनार्ने की अत्यन्त वैज्ञार्निक प्रक्रियार् है। इसके सतत् अभ्यार्स द्वार्रार् व्यक्ति नकारार्त्मक दृष्टिकोण के स्थार्न पर स्वयं के भीतर विधेयार्त्मक एवं आशार्वार्दी दृष्टिकोण क विकास कर सकतार् है। स्वार्ध्यार्य के सन्दर्भ में एक बार्त जो अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है, वह यह कि स्वार्ध्यार्य की प्रक्रियार् अच्छ्रे विचार्रों के केवल अध्ययन से ही पूरी नहीं हो जार्ती, वरन् जब तक इन विचार्रों को व्यार्वहार्रिक रूप से आचरण में नहीं लियार् जार्तार्, तब तक यह प्रक्रियार् अधूरी ही रहती है और इसके अपेक्षित परिणार्म नहीं आ पार्ते है। पार्ठकों, इस प्रकार आप समझ गये होगें कि स्वार्ध्यार्य सकारार्त्मक विचार्रों के मार्ध्यम से मन को स्वस्थ करने की प्रक्रियार् है।

आपके मन में इस संबध में सहज ही यह जिज्ञार्सार् उत्पन्न हो रही होगी कि एक सार्मार्न्य अध्ययन एवं स्वार्ध्यार्य में क्यार् मौलिक अन्तर होतार् है? तो आइये, आपकी इसी जिज्ञार्सार् के समार्धार्न के लिये अब हम चर्चार् करते है, सार्मार्न्य अध्ययन एवं स्वार्ध्यार्य में अन्तर के बार्रे में।

अध्ययन एवं स्वार्ध्यार्य में अन्तर –

अध्ययन एवं स्वार्ध्यार्य में मूलभूत अन्तर यह है कि अध्ययन केवल हमार्री बुद्धि क विकास करतार् है, इसके मार्ध्यम से हमार्रे भीतर तर्क -वितर्क एवं बौद्धिक विश्लेषण करने की क्षमतार् क विकास होतार् है, तथार् हमें विभिन्न प्रकार की जार्नकारी प्रार्प्त होती है, किन्तु अध्ययन के द्वार्रार् व्यक्ति के अन्दर किसी प्रकार क सकारार्त्मक परिवर्तन हो, यह अनिवाय एवं आवश्यक नहीं है, जबकि स्वार्ध्यार्य के द्वार्रार् व्यक्ति में में सकारार्त्मक परिवर्तन अपेक्षित है, अनिवाय है, अन्यथार् स्वार्ध्यार्य क उद्देश्य पूरार् नहीं होगार्, यह अधूरार् ही रह जार्येगार्।

स्वार्ध्यार्य की प्रक्रियार् में व्यक्ति सद्ग्रन्थों के आलोक में आत्ममूल्यार्ंकन करतार् है, अपनी कमजोरियों एवं गुणों क तटस्थ अवलोकन करतार् है तथार् उसके व्यक्तित्व में जो भी अवार्ंछनीयतार्यें है, बुरी आदतें, बुरे विचार्र यार् व्यार्वहार्रिक गड़बड़ियार्ँ है, उनको सकारार्त्मक विचार्रों के व्यार्वहार्रिक प्रयोग द्वार्रार् दूर करने क यथार्संभव प्रयार्स करतार् है। ‘‘अध्ययन केवल बौद्धिक विकास तक सीमित है, जबकि स्वार्ध्यार्य अपने बोध को संवार्रने की प्रक्रियार् है।’’ (डार्ँ. प्रणव पण्ड्यार् : आध्यार्त्मिक चिकित्सार् एक समग्र उपचार्र पद्धति) बोध क अर्थ है- ज्ञार्न और विशेषज्ञों के अनुसार्र हमें ज्ञार्न दो प्रकार से प्रार्प्त होतार् है। पहलार् ज्ञार्नेन्द्रियों (नेत्र, त्वचार्, कर्ण, नार्सिक जिº्वार्) के मार्ध्यम से होने वार्लार् ज्ञार्न जिसे हम बार्ह्य बोध भी कह सकते है। दूसरे प्रकार क बोध है- बौद्धिक विश्लेषण एवं आन्तरिक अनुभवों के द्वार्रार् होने वार्लार् ज्ञार्न।

बोध के ये दोनों प्रकार एक दूसरे से अत्यन्त गहरे रूप में जुड़े रहते हैं अर्थार्त् एक क प्रभार्व सुनिश्चित रूप से दूसरे पर पड़तार् है। कहने क आशय है कि इन्द्रियों से जो कुछ जार्नकारी हमें मिलती है अर्थार्त हम जो भी देखते है- सुनते है, उसक प्रभार्व हमार्रे विचार्रों एवं भार्वनार्ओं पर सुनिश्चित रूप से पड़तार् है। इसी प्रकार जैसे हमार्रे विचार्र, भार्वनार्यें, आस्थार्यें होती है, उनक प्रभार्व भी हमार्रे इन्द्रियजन्य ज्ञार्न पर पड़तार् है। इस सन्दर्भ में आपने एक कहार्वत भी सुनी होगी कि – ‘‘जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि’’ अर्थार्त जिस व्यक्ति क दृष्टिकोण यार् नजरियार् जैसार् होतार् है उसे प्रत्येक व्यक्ति, वस्तु, घटनार् उसी रूप में दिखाइ देती है। ‘‘

इसी कारण एक ही घटनार् अथवार् वस्तु यार् व्यक्ति अलग – अलग लोगों के लिये अलग – अलग परिणार्म उत्पन्न करती है, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति क सोचने क ढंग हर दूसरे व्यक्ति से अलग होतार् है। जो व्यक्ति नकारार्त्मक दृष्टिकोण वार्लार् है, उसे प्रत्येक चीज में नकारार्त्मकतार् ही दिखार्यी देती है, इसके विपरीत जो जिन्दगी के प्रति सकारार्त्मक रवैयार् अपनार्तार् है, वह विषम परिस्थितयों में में भी प्रकाश की एक किरण खोज लेतार् है। इस प्रकार सब कुछ व्यक्ति की अपनी प्रकृति पर निर्भर करतार् है।

अत: यदि हम अपने जीवन को शार्ंति एवं खुशी के सार्थ जीनार् चार्हते है तो हमें अपने दृष्टिकोण में सकारार्त्मक परिवर्तन लार्नार् ही होगार् और स्वार्ध्यार्य इसी दृष्टिकोण की चिकित्सार् की अत्यन्त वैैज्ञार्निक एवं सटीक विधि है। यह स्वस्थ मन से स्वस्थ जीवन जीने की विधार् है।

इस प्रकार स्पष्ट है कि अध्ययन एवं स्वार्ध्यार्य में मूलभूत अन्तर होने के कारण अध्ययन को स्वार्ध्यार्य कहनार् न्यार्यसंगत नहीं होगार्। प्रिय पार्ठकों, अब अत्यन्त महत्वपूर्ण बार्त जिस पर विचार्र करनार् है, वह यह है कि इस स्वार्ध्यार्य की प्रक्रियार् को जीवन में कैसे अपनार्यार् जार्ये? इसके सोपार्न क्यार् है? तो आइये, अब चर्चार् करते हैं स्वार्ध्यार्य चिकित्सार् की प्रक्रियार् के बार्रे में।

स्वार्ध्यार्य चिकित्सार् की प्रक्रियार्

स्वार्ध्यार्य चिकित्सार् की प्रक्रियार् चार्र चरणों में पूरी होती है – 1. प्रथम चरण – सद्ग्रन्थों यार् सद्विचार्रों क चयन। 2. द्वितीय चरण – आत्ममूल्यार्ंकन 3. तृतीय चरण – अपने दृष्टिकोण को संवार्रने की नीति तय करनार्। 4. चतुर्थ चरण – निर्धार्रित नीति क व्यार्वहार्रिक जीवन में प्रयोग।

1. प्रथम चरण –

सद्ग्रन्थों यार् सद्विचार्रों क चयन – स्वार्ध्यार्य चिकित्सार् क प्रथम चरण है- स्वार्ध्यार्य की सार्मग्री क चयन करनार् अर्थार्त् यह निर्धार्रित करनार् कि स्वार्ध्यार्य के लिये किन सद्ग्रन्थों यार् विचार्रों क चयन कियार् जार्ये। इस सन्दर्भ में यह ध्यार्न देनार् आवश्यक है कि स्वार्ध्यार्य हेतु उन्हीं विचार्रों क चयन कियार् जार्ये जो आध्यार्त्म को जार्नने वार्ले महार्मार्नवों यार् महार्पुरूषों के द्वार्रार् दिये गये हो क्योंकि ऐसे लोगों क जीवन ही हमार्रे लिये आदर्श एवं प्रेरणार्दार्यी होतार् है। इस हेतु हम वेद, उपनिषद, गीतार् इत्यार्दि ग्रन्थों क एवं विभिन्न तपस्वियों जैसे कि महार्त्मार् बुद्ध, आचाय भार्स्कर, महार्वीर स्वार्मी, स्वार्मी विवेकानन्द, महर्षि अरविन्द, महर्षि रमण, स्वार्मी रार्मकृष्ण परमहंस, स्वार्मी दयार्नंद सरस्वती, श्री मार्ँ इत्यार्दि के विचार्रों क चयन कर सकते हैं।

‘‘स्वार्ध्यार्य के पहले क्रम में हम उन ग्रन्थों विचार्रों क चयन करते हैं, जिन्हें स्व की अनुभूति से सम्पन्न महार्मार्नवों ने सृजित कियार् है। ध्यार्न रखें कोर्इ भी पुस्तक यार् विचार्र स्वार्ध्यार्य की सार्मग्री नहीं बन सकतार्। इसके लिये जरूरी है कि यह पुस्तक यार् विचार्र किसी महार्न् तपस्वी आध्यार्त्मवेदत्तार् के द्वार्रार् सृजित हो।’’ (डार्ँ0 प्रणव पण्ड्यार् : आध्यार्त्मिक चिकित्सार् एक समग्र उपचार्र पद्धति)

2 द्वितीय चरण –

आत्म-मूल्यार्ंकन – पार्ठकों, यह स्वार्ध्यार्य क अत्यन्त महत्वपूर्ण चरण है। यही वह अवस्थार् है जिसमें स्वयं क स्वयं से परिचय होतार् है। यह आत्मविश्लेषण की अवस्थार् हैं जिसमें व्यक्ति उन चयनित ग्रन्थों एवं विचार्रों के परिप्रेक्ष्य में आत्म-मूल्यार्ंकन करतार् है। आत्म-मूल्यार्ंकन क अर्थ है- अपने गुणों-कमियों क तटस्थ अवलोकन। अपने व्यक्तित्व में जो अच्छार्इयार्ँ एवं बुरार्इयार्ँ हैं, दोनों को समार्न रूप से देखनार् और बुरार्इयों को पूरी निष्पक्षतार् एवं सार्हस के सार्थ स्वीकार करनार्। इसी चरण में व्यक्ति इस बार्त पर विचार्र करतार् है कि हमार्रार् जीवन कैसार् है? हम किस ढंग से जी रहे हैं और किस ढंग से हमें जीनार् चार्हिये। इसी स्तर पर व्यक्ति अपने विचार्र तंत्र की विकृतियों से परिचय पार्तार् है। इसलिये व्यक्ति को पूरी सजगतार् से अपनी कमियों को पहचार्ननार् चार्हिये और इस बार्त के प्रति सार्वधार्न रहनार् चार्हिये कि कोर्इ भी विकृति दब न जार्ये, छिप न जार्ये।

इस प्रकार स्पष्ट है कि द्वितीय चरण में विचार्र तंत्र की विकृतियों क निदार्न कियार् जार्तार् है। निदार्न से आशय है- समस्यार् को पहचार्ननार् और यह जार्ननार् कि इसके दुष्प्रभार्व कहार्ँ- कहँ पड़ रहे हैं और भविष्य में कहार्ँ – कहार्ँ पड़ सकते हैं?

3. तृतीय चरण –

अपने दृष्टिकोण को संवार्रने की नीति निर्धार्रित करनार् – द्वितीय चरण में विकृतियों के निदार्न के उपरार्न्त तृतीय चरण में उन्हें दूर करने के उपार्य क चयन कियार् जार्तार् है, उसकी पूरी प्रक्रियार् को सुनिश्चित कियार् जार्तार् है कि व्यार्वहार्रिक रूप में इसे किस प्रकार से अपनार्यार् जार्येगार्। इसकी पूरी योजनार् इस चरण में बनार्यी जार्ती है।

‘‘स्वार्ध्यार्य चिकित्सार् क तीसरार् मुख्य बिन्दु यही है। विचार्र, भार्वनार्ओं, विश्वार्स, आस्थार्ओं, मार्न्यतार्ओं, आग्रहों से संबधित अपने दृष्टिकोण को ठीक करने की नीति तय करनार्। इसकी पूरी प्रक्रियार् को सुनिश्चित करनार्। हम कहार्ँ से प्रार्रम्भ करें और किस रीति से आगे बढ़े। इसकी पूरी विधि – विज्ञार्न को इस क्रम में बनार्नार् और तैयार्र करनार् पड़तार् है।’’ (डार्ँ0 प्रणव पण्ड्यार् : आध्यार्त्मिक चिकित्सार् एक समग्र उपचार्र पद्धति)

4. चतुर्थ चरण –

निर्धार्रित नीति क व्यार्वहार्रिक जीवन में प्रयोग – स्वार्ध्यार्य क यह चतुर्थ चरण अत्यन्त चुनौतीपूर्ण होतार् है, यही वह अवस्थार् है जिसमें व्यक्ति को अपनी विकृतियों को दूर करने क व्यार्वहार्रिक प्रयार्स करनार् होतार् है अर्थार्त अपने विकृत विचार्रों को दूर करने के लिये समार्धार्न की जिस नीति क निर्धार्रण कियार् गयार् है, इस चरण में उस नीति के अनुसार्र आचरण करनार् होतार् है। उन सद्विचार्रों को अपने जीवन में व्यार्वहार्रिक रूप से अपनार्नार् होतार् है। सद्विचार्रों के अनुरूप जीवन जीकर दिखार्नार् होतार् है। जिसमें हमार्रे संस्कारों एवं पुरार्नी बुरी आदतों के रूप में अनेक बार्धार्यें सार्मने आती हैं, किन्तु अपने सार्हस एवं जुझार्रूपन के द्वार्रार् हम उन बार्धार्ओं को पार्र कर सकते हैं और एक आदर्श जीवन जी सकते हैं। जब तक स्वार्ध्यार्य की यह योजनार् व्यार्वहार्रिक रूप से क्रियार्न्वित नहीं होती है। तब तक वह मार्त्र अध्ययन ही बनार् रहेगार्। सद्ग्रन्थों में वर्णित आदर्श जीवन क व्यार्वहार्रिक प्रयोग ही इस स्वार्ध्यार्य चिकित्सार् की साथकतार् है, जो इसे उद्देश्य की पूर्णतार् तक पहुँचार्तार् है।

स्वार्ध्यार्य चिकित्सार् क महत्व –

प्रिय पार्ठकों, स्वार्ध्यार्य की उपयोगितार् के विषय में जितनार् वर्णन कियार् जार्ये उतनार् ही कम है, क्योंकि यह एक ऐसी औषधि है, जिसके द्वार्रार् व्यक्तित्व के समग्र विकारों से मुक्ति पार्कर स्वस्थ जीवन जियार् जार् सकतार् है। प्रमुख रूप से स्वार्ध्यार्य चिकित्सार् की महत्तार् क विचेचन कियार् जार् सकतार् है- (1) नकारार्त्मक विचार्रों को दूर करनार् (2) दुर्भार्वनार्ओं से मुक्ति (3) व्यार्वहार्रिक विकृतियों को दूर करनार् (4) समूचे व्यक्तित्व क रूपार्न्तरण (5) स्वस्थ जीवन की प्रार्प्ति

(1) नकारार्त्मक विचार्रों को दूर करनार् – 

पार्ठकों, जैसार् कि अब तक आप समझ चुके होंगे कि स्वार्ध्यार्य क संबध हमार्रे विचार्र तंत्र से है। यह विचार्र परिष्कार से जीवन परिष्कार की प्रक्रियार् है। स्वार्ध्यार्य चिकित्सार् क प्रथम परिणार्म यह होतार् है कि व्यक्ति क चिन्तन सकारार्त्मक होने लगतार् है। वह अब घटनार्ओं को सकारार्त्मक दृष्टिकोण से देखतार् है। स्वार्ध्यार्य के द्वार्रार् उसके चार्रों ओर एक सकारार्त्मक वैचार्रिक वार्तार्वरण बनार् रहतार् है और वह वैचार्रिक प्रदूषण से मुक्त रहतार् है। ‘‘ सोच विचार्र यार् बोध के तंत्र को निरोग करने की साथक प्रक्रियार् स्वार्ध्यार्य से बढ़कर और कुछ नहीं है।’’ (डार्ँ0 प्रणव पण्ड्यार् : आध्यार्त्मिक चिकित्सार् एक समग्र उपचार्र पद्धति)

(2) दुर्भार्वनार्ओं से मुक्ति- 

जैसार् कि हम जार्नते है कि हमार्रे विचार्रों क प्रभार्व हमार्री भार्वनार्ओं पर भी पड़तार् है। जैसे विचार्र हमार्रे अन्दर आते हैं, उसी के अनुरूप भार्व भी उत्पन्न होने लगते हैं। ये दोनों (भार्व एवं विचार्र) एक दूसरे से इतने अधिक प्रभार्वित होते हैं कि हम इनमें से किसी भी एक को दूसरे से तोड़कर नहीं देख सकते। विचार्र हमार्री भार्वनार्ओं को प्रभार्वित करते हैं और भार्वनार्यें भी विचार्रों को अपने रंगों में रंगे बिनार् नहीं रहती। अत: स्वार्ध्यार्य से हमार्रे विचार्रतंत्र के परिष्कृत होने के कारण भार्व भी पवित्र होने लगते हैं, जो हमार्रे आध्यार्त्मिक विकास में अत्यन्त सहार्यक है।

(3) व्यार्वहार्ररिक विकृतियों को दूर करनार्- 

स्वार्ध्यार्य मन की चिकित्सार् के सार्थ – सार्थ व्यवहार्र की चिकित्सार् भी करतार् है क्योंकि विचार्र हमार्रे व्यवहार्र को बहुत गहरे रूप में प्रभार्वित करते हैं और व्यवहार्र क प्रभार्व भी विचार्रों पर पड़तार् है। जब व्यक्ति सद्विचार्रों को अपने जीवन में, आचरण में उतार्रने लगतार् है तो उससे स्वत: उसकी व्यवहार्रगत विकृतियार्ँ एवं परेशार्नियार्ँ दूर होने लगती है और उसक व्यवहार्र एक आदर्श के रूप में दूसरों को भी प्रेरणार् प्रदार्न करतार् है। ‘‘मार्नसिक आरोग्य की ओर ध्यार्न दिये बगैर शरीर को स्वस्थ करने की सोचनार् यार् व्यार्वहार्रिक दोषों को ठीक करनार्, कुछ वैसार् ही है, जैसे – पत्तों को काटकर पेड़ की जड़ों को सींचते रहनार्। जब तक पेड़ की जड़ों को खार्द – पार्नी मिलतार् रहेगार्, तब तक पत्ते अपने आप ही हरे होते रहेंगे। इसी तरह से जब तक सोच – विचार्र के तंत्र में विकृति बनी रहेगी, शार्रीरिक एवं व्यार्वहार्रिक परेषार्नियार्ँ बनी रहेंगी।’’ (डार्ँ0 प्रणव पण्ड्यार् : आध्यार्त्मिक चिकित्सार् एक समग्र उपचार्र पद्धति)

(4) समूचे व्यक्तित्व क रूपार्न्तरण- 

हमार्रे व्यक्तित्व के तीन आयार्म हैं – संवेग, विचार्र एवं व्यवहार्र और ये तीनों आयार्म एक – दूसरे को प्रभार्वित करते हैं। भार्वनार्ओं (संवेग) से हमार्रे विचार्र एवं व्यवहार्र प्रभार्वित होते हैं तो विचार्रों क प्रभार्व भी हमार्रे संवेगों एवं व्यवहार्रों पर पड़तार् है। इसी प्रकार हमार्रे व्यवहार्र क प्रभार्व संवेगों और विचार्रों पर पड़े बिनार् नहीं रहतार्। जिस प्रकार हमार्रे शरीर के विभिन्न संस्थार्न हैं, जैसे – अस्थि तंत्र, पेशीय तंत्र, पार्चन तंत्र, तंत्रिक तंत्र इत्यार्दि और इन सभी के अपने – अपने विशिष्ट कार्य है, फिर भी इनके कार्यो क प्रभार्व परस्पर पड़तार् है और एक भी तंत्र के अंगों के कार्यो में बार्धार् आने पर समूचार् शार्रीरिक संस्थार्न प्रभार्वित होतार् है, उसी प्रकार हमार्रे व्यक्तित्व क कोर्इ भी आयार्म यदि विकृत है तो वह समूचे व्यिक्त्त्व को बुरी तरह प्रभार्वित करतार् है और यदि एक आयार्म सुदृढ़ एवं स्वस्थ है तो समग्र व्यक्तित्व परिष्कृत होने लगतार् है। अत: स्वार्ध्यार्य प्रत्यक्ष रूप से तो हमार्रे विचार्रों को प्रभार्वित करतार् है, किन्तु अप्रत्यक्ष रूप से समग्र व्यक्तित्व (संवेग, विचार्र, व्यवहार्र) के रूपार्न्तरण में ही इसकी अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिक है।

(5) स्वस्थ जीवन की प्रार्प्ति-

स्वार्ध्यार्य स्वस्थ जीवन की प्रार्प्ति की एक अत्यन्त महत्वपूर्ण विधार् है। इसके द्वार्रार् पहले मन की चिकित्सार् होती है। उसके बार्द जीवन की चिकित्सार्/ वैज्ञार्निकों के अनुसार्र रोगी मन समस्त जीवन को रोगी बनार् देतार् है। इसलिये यदि जीवन को स्वस्थ बनार्नार् है तो हमें पहले मन को निरोग बनार्ने क सार्हसिक कार्य करनार् होगार्, जिसे हम स्वार्ध्यार्य चिकित्सार् द्वार्रार् सहज रूप सेकर सकते है।

स्वस्थ जीवन क तार्त्पर्य है – समग्र स्वार्स्थ्य की प्रार्प्ति, जिसमें हमार्रार् शरीर भी स्वस्थ हो, मन भी सकारार्त्मक दृष्टिकोण वार्लार् हो, आत्मार् भी संतुष्ट हो और सार्मार्जिक दृष्टि से भी व्यक्ति क व्यवहार्र एक आदर्श व्यवहार्र हो और प्रेरणार्स्पद आदर्श व्यक्ति के रूप में उसकी छवि बने।

इस प्रकार स्पष्ट है कि स्वार्ध्यार्य चिकित्सार् क महत्व असार्धार्रण है। इसके द्वार्रार् हम एक स्वस्थ एवं सुखी जीवन व्यतीत कर सकते है। स्वार्ध्यार्य की इसी महत्तार् के कारण इसे योग सार्धनार् के अत्यन्त महत्वपूर्ण सार्धन के रूप में भी स्वीकार कियार् गयार् है। महार्न योग वैज्ञार्निक महर्षि पतंजलि ने क्रियार्योग के दूसरे अंग (तप, स्वार्ध्यार्य, र्इश्वर प्रणिधार्न) के रूप में इसक अत्यन्त विस्तृत विवेचन कियार् है और अष्टार्ंग योग में भी नियम के अन्तर्गत चतुर्थ नियम (शौच, संतोष, तप, स्वार्ध्यार्य और र्इष्वर प्रणिधार्न) के रूप में इसकी महत्तार् क वर्णन कियार् है।

‘‘स्वार्ध्यार्य चिकित्सार् की उपयोगितार् असार्धार्रण है। इसके द्वार्रार् पहले मन स्वस्थ होतार् है, फिर जीवन।’’ (डार्ँ0 प्रणव पण्ड्यार् : आध्यार्त्मिक चिकित्सार् एक समग्र उपचार्र पद्धति)

इस प्रकार स्वार्ध्यार्य के द्वार्रार् हम अपने समूचे जीवन क रूपार्न्तरण कर सकते हैं और सार्थ ही इस चिकित्सार् की महत्तार् इस कारण भी अत्यधिक बढ़ जार्ती है कि यह पद्धति अत्यन्त सहज है। इसे कोर्इ भी व्यक्ति अपनार् सकतार् है, इसमें किसी प्रकार क कोर्इ आर्थिक खर्च भी नहीं है और न ही इसके कोर्इ दुष्प्रभार्व है। वार्स्तव में यह स्वार्ध्यार्य चिकित्सार् अपने आप में असार्धार्रण है।

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