स्थार्नीय स्वशार्सन क अर्थ और पंचार्यतें

स्थार्नीय स्वशार्सन लोगों की अपनी स्वयं की शार्सन व्यवस्थार् क नार्म है। अर्थार्त् स्थार्नीय लोगों द्वार्रार् मिलजुलकर स्थार्नीय समस्यार्ओं के निदार्न एवं विकास हेतु बनाइ गर्इ ऐसी व्यवस्थार् जो संविधार्न और रार्ज्य सरकारों द्वार्रार् बनार्ए गये नियमों एवं कानून के अनुरूप हो। दूसरे शब्दों में ‘स्वशार्सन’ गार्ंव के समुचित प्रबन्धन में समुदार्य की भार्गीदार्री है। यदि हम इतिहार्स को पलट कर देखें तो प्रार्चीन काल में भी स्थार्नीय स्वशार्सन विद्यमार्न थार्। सर्वप्रथम कुटुम्ब से कुनबे बने और कुनबों से समूह। ये समूह ही बार्द में ग्रार्म कहलार्ये। इन समूहों की व्यवस्थार् प्रबन्धन के लिये लोगों ने कुछ नियम, कायदे कानून बनार्ये। इन नियमों क पार्लन करनार् प्रत्येक व्यक्ति क धर्म मार्नार् जार्तार् थार्। ये नियम समूह अथवार् गार्ंव में शार्ंति व्यवस्थार् बनार्ये रखने, सहभार्गितार् से कार्य करने व गार्ंव में किसी प्रकार की समस्यार् होने पर उसके समार्धार्न करने, तथार् सार्मार्जिक न्यार्य दिलार्ने में महत्वपूर्ण भूमिक निभार्ते थे। गार्ंव क संम्पूर्ण प्रबन्धन तथार् व्यवस्थार् इन्हीं नियमों के अनुसार्र होती थी। इन्हें समूह के लोग स्वयं बनार्ते थे व उसक क्रियार्न्वयन भी वही लोग करते थे। कहने क तार्त्पर्य है कि स्थार्नीय स्वशार्सन में लोगों के पार्स वे सार्रे अधिकार हों जिससे वे विकास की प्रक्रियार् को अपनी जरूरत और अपनी प्रार्थमिकतार् के आधार्र पर मनचार्ही दिशार् दे सकें। वे स्वयं ही अपने लिये प्रार्थमिकतार् के आधार्र पर योजनार् बनार्यें और स्वयं ही उसक क्रियार्न्वयन भी करें। प्रार्कृतिक संसार्धनों जैसे जल, जंगल और जमीन पर भी उन्हीं क नियन्त्रण हो तार्कि उसके संवर्द्धन और संरक्षण की चिन्तार् भी वे स्वयं ही करें। स्थार्नीय स्वशार्सन को मजबूत करने के पीछे सदैव यही मूलधार्रणार् रही है कि हमार्रे गार्ंव, जो वर्षों से अपनार् शार्सन स्वयं चलार्ते रहे है। जिनकी अपनी एक न्यार्य व्यवस्थार् रही है, वे ही अपने विकास की दिशार् तय करें। आज भी हमार्रे कर्इ गार्ंवों में परम्परार्गत रूप में स्थार्नीय स्वशार्सन की न्यार्य व्यवस्थार् विद्यमार्न है।

स्थार्नीय स्वशार्सन क तार्त्पर्य 

  1. गार्ंव के लोगों की गार्ंव में अपनी शार्सन व्यवस्थार् हो व गार्ंव स्तर पर स्वयं की न्यार्य प्रक्रियार् हो।
  2. ग्रार्मस्तरीय नियोजन, क्रियार्न्वयन व निगरार्नी में गार्ंव के हर महिलार् पुरूष की सक्रिय भार्गीदार्री हो।
  3. किस प्रकार क विकास चार्हिये यार् किस प्रकार के निर्मार्ण कार्य हों यार् गार्ंव के संसार्धनों क प्रबन्धन व संरक्षण कैसे होगार् ये सभी बार्तें गार्ंव वार्ले तय करेगें।
  4. गार्ंव की सब तरह की समस्यार्ओं क समार्धार्न गार्ंव के लोगों की भार्गेदार्री से ही हो। 
  5. ऐसार् शार्सन जहार्ं लोग स्थार्नीय मुद्दों, गतिविधियों में अपनी सक्रिय भार्गीदार्री निभार् सकें।
  6. स्थार्नीय स्तर पर स्वशार्सन को लार्गू करने क मार्ध्यम गार्ंव के लोगों द्वार्रार्, मार्न्यतार् प्रार्प्त लोगों क समूह हो जिन्होने सम्पूर्ण गार्ंव क विकास, व्यवस्थार् व प्रबन्धन करनार् है। ऐसार् समूह जिसक निर्णय सभी को मार्न्य हो। 

संविधार्न में संशोधन व स्थार्नीय स्वशार्सन 

  1.  हमार्रे देष में पंचार्यतों की व्यवस्थार् सदियों से चली आ रही है। पंचार्यतों के कार्य भी लगभग समार्न है। उनके स्वरूप में जरूर परिवर्तन हुआ है। पहले पंचार्यतों क स्वरूप कुछ और थार्। उस समय वह संस्थार् के रूप में कार्य करती थी। और गार्ंव के झगड़े, गार्ंव की व्यवस्थार्यें सुधार्रनार् जैसे फसल सुरक्षार्, पेयजल, सिंचाइ, रार्स्ते, जंगलों क प्रबंधन आदि मुख्य कार्य हुआ करते थे।
  2. लोगों को पंचार्यतों के प्रति बड़ार् विष्वार्स थार्। उनक निर्णय लोग सहज स्वीकार कर लेते थे। और हमार्री पंचार्यतें भी बिनार् पक्षपार्त के कोर्इ निर्णय कियार् करती थी। ऐसार् नहीं कि पंचार्यतें सिर्फ गार्ंव क निर्णय करती थी। बड़े क्षेत्र, पट्टी, तोक के लोगों के मूल्यों से जुड़े संवेदनशील निर्णय भी पंचार्यतें बड़े विश्वार्स के सार्थ करती थी। इससे पतार् लगतार् है कि पंचार्यतों के प्रति लोगों क पहले कितनार् विश्वार्स थार्। वार्स्तव में जिस स्वशार्सन की बार्त हम आज कर रहे हैं, असली स्वशार्सन वही थार्। जब लोग अपनार् शार्सन खुद चलार्ते थे, अपने विकास के बार्रे में खुद सोचते थे, अपनी समस्यार्यें स्वयं हल करते थे एवं अपने निर्णय स्वयं लेते थे।
  3. धीरे-धीरे ये पंचार्यत व्यवस्थार्यें आजार्दी के बार्द समार्प्त होती गर्इ। इसक मुख्य कारण रहार्, सरकार क दूरगार्मी परिणार्म सोचे बिनार् पंचार्यत व्यवस्थार्ओं में अनार्वश्यक हस्तक्षेप। जो छोटे-छोटे विवार्द पहले हमार्रे गार्ंव में हो जार्ते थे अब वह सरकारी कानून व्यवस्थार् से पूरे होते हैं, जिन जंगलों क हम पहले सुरक्षार् भी करते थे और उसक सही प्रबंधन भी करते थे अब उससे दूरियार्ं बनती जार् रही हैं और उसे हम अधिक से अधिक उपभोग करने की दृष्टि से देखते हैं। जो गार्ंव के विकास संबंधी नजरियार् हमार्रार् स्वयं क थार् उसकी जगह सरकारी योजनार्ओं ने ले ली है। और सरकारी योजनार्एं रार्ज्य यार् केन्द्र में बैठकर बनाइ जार्ने लगी और गार्ंवों में उनक क्रियार्न्वयन होने लगार्।
  4. परिणार्म यह हुआ कि लोगों की जरूरत के अनुसार्र नियोजन नहीं हुआ और जिन लोगों की पहुँच थी, उन्होंने ही योजनार्ओं क उपभोग कियार्। लोग योजनार्ओं के उपभोग के लिए हर समय तैयार्र रहने लगे चार्हे वह उसके जरूरत की हो यार् न हो। उसको पार्ने के लिए व्यक्ति खींचार्तार्नी में लगार् रहार्। इससे कमजोर वर्ग धीरे-धीरे और कमजोर होतार् गयार्। और लोग पूरी तरह सरकार की योजनार्ओं और सब्सिडी(छूट) पर निर्भर होने लगे। धीरे-धीरे पंचार्यत की भूमिक गार्ंव के विकास में शून्य हो गर्इ। लोग भी पुरार्नी पंचार्यतों से कटते गये। 
  5. लेकिन 80 के दशक में यह लगने लगार् कि सरकारी योजनार्ओं क लार्भ समार्ज के अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुँच पार् रहार् है। यह भी सोचार् जार्ने लगार् कि योजनार्ओं को लोगों की जरूरत के मुतार्बिक बनार्यार् जार्य। योजनार्ओं के नियोजन और क्रियार्न्वयन में भी लोगों की भार्गीदार्री जरूरी समझी जार्ने लगी। तब ऐसार् महसूस हुआ कि ऐसी व्यवस्थार् कायम करने की आवश्यकतार् है जिसमें लोग खुद अपनी जरूरत के अनुसार्र योजनार्ओं क निर्मार्ण करें और स्वयं उनक क्रियार्न्वयन करें।
  6. इसी सोच के आधार्र पर पंचार्यतों को कानूनी तौर पर नये काम और अधिकार देने की सोची गर्इ तार्कि स्थार्नीय लोग अपनी जरूरतों को पहचार्नें, उसके उपार्य खोजें, उसके आधार्र पर योजनार् बनार्यें, योजनार्ओं को क्रियार्न्वित करें और इस प्रकार अपने गार्ंव क विकास करें। 
  7. इस सोच को समेटते हुए सरकार ने संविधार्न में 73वार्ँ संषोधन कर पंचार्यतों को नये काम और अधिकार दे दिये हैं। इस प्रकार केन्द्र और रार्ज्य सरकार की तरह पंचार्यतें भी स्थार्नीय लोगों की अपनी सरकार की तरह कार्य करने लगी। 

स्थार्नीय स्वशार्सन की आवश्यकतार् 

स्थार्नीय स्वशार्सन में लोगों के हितों की रक्षार् होती है तथार् स्थार्नीय लोगों की सहभार्गितार् से आर्थिक विकास व सार्मार्जिक न्यार्य की योजनार्एं बनार्यी व लार्गू की जार्ती हैं।

  1. ग्रार्मीण विकास हेतु किये जार्ने वार्ले किसी भी कार्य में स्थार्नीय एवं वार्ºय संसार्धनों क लोगों द्वार्रार् बेहतर उपयोग कियार् जार्तार् है। 
  2. स्थार्नीय लोग अपनी समस्यार्ओं एवं प्रार्थमिकतार्ओं से भली-भार्ंति परिचित होते हं।ै तथार् लोग अपनी समस्यार् एवं बार्तों को आसार्नी से रख पार्ते हैं।
  3. स्थार्नीय स्वशार्सन व्यवस्थार् से लोगों की भार्गीदार्री से जिम्मेदार्री क अहसार्स होतार् है और स्थार्नीय स्तर की समस्यार्ओं क निदार्न व विवार्दों क निपटार्रार् लोग स्वयं करते हैं। 
  4. गार्ंव के विकास में महिलार्ओं, निर्बल, कमजोर एवं पिछडे वर्ग की भार्गीदार्री सुनिश्चित होती है तथार् वार्स्तविक लार्भार्थ्र्ार्ी को लार्भ मिलतार् है।

स्थार्नीय स्वशार्सन व पंचार्यतें 

स्थार्भिनीय स्वशार्सन को स्थार्पित करने में पंचार्यतों की अहम भूमिक है। पंचार्यतें हमार्री संवैधार्निक रूप से मार्न्यतार् प्रार्प्त संस्थार्यें हैं और प्रशार्सन से भी उनक सीधार् जुड़ार्व है। भार्रत में प्रार्चीन काल से ही स्थार्नीय स्तर पर शार्सन क संचार्लन पंचार्यत ही करती आयी हैं। स्थार्नीय स्तर पर स्वशार्सन के स्वप्न को सार्कार करने क मार्ध्यम पंचार्यतें ही हैं। चूंकि पंचार्यतें स्थार्नीय लोगों के द्वार्रार् गठित होती हैंं, और इन्हें संवैधार्निक मार्न्यतार् भी प्रार्प्त है, अत: पंचार्यतें स्थार्नीय स्वशार्सन को स्थार्पित करने क एक अचूक तरीक है। ये संवैधार्निक संस्थार्एं ही आर्थिक विकास व सार्मार्जिक न्यार्य की योजनार्एं ग्रार्मसभार् के सार्थ मिलकर बनार्येंगीं व उसे लार्गू करेंगी। गार्ंव के लिये कौन सी योजनार् बननी है, कैसे क्रियार्न्वित करनी है, क्रियार्न्वयन के दौरार्न कौन निगरार्नी करेगार्, ये सभी कार्य पंचार्यतें गार्ंव के लोगों (ग्रार्मसभार् सदस्यों) की सक्रिय भार्गीदार्री से करेंगी। इससे निर्णय स्तर पर आम जनसमुदार्य की भार्गीदार्री सुनिश्चित होगी। 

स्थार्नीय स्वशार्सन तभी मजबूत हो सकतार् है जब पंचार्यतें मजबूत होंगी और पंचार्यतें तभी मजबूत होंगी जब लोग मिलजुलकर इसके कार्यों में अपनी भार्गीदार्री देंगे और अपनी जिम्मेदार्री को समझेंगे। लोगों की सहभार्गितार् सुनिश्चित करने के लिये पंचार्यतों के कार्यों में पार्रदर्शितार् होनार् जरूरी है। पहले भी लोग स्वयं अपने संसार्धनों का, अपने ग्रार्म विकास क प्रबन्धन करते थे। इसमें कोर्इ शक नहीं कि वह प्रबन्धन आज से कहीं बेहतर भी होतार् थार्। हमार्री परम्परार्गत रूप से चली आ रही स्थार्नीय स्वशार्सन की सोच बीते समय के सार्थ कमजोर हुर्इ है। नर्इ पंचार्यत व्यवस्थार् के मार्ध्यम से इस परम्परार् को पुन: जीवित होने क मौक मिलार् है। अत: ग्रार्मीणों को चार्हिये कि पंचार्यत और स्थार्नीय स्वशार्सन की मूल अवधार्रणार् को समझने की चेष्टार् करें तार्कि ये दोनों ही एक दूसरे के पूरक बन सकें। 

गार्ंवों क विकास तभी सम्भव है जब सम्पूर्ण ग्रार्मवार्सियों को विकास की मुख्य धार्रार् से जोड़ार् जार्येगार्। जब तक गार्ंव के सार्मार्जिक तथार् आर्थिक विकास के निर्णयों में गार्ंव के पहले तथार् अन्तिम व्यक्ति की बरार्बर की भार्गीदार्री नहीं होगी तब तक हम ग्रार्म स्वरार्ज की कल्पनार् नहीं कर सकते हैं। जनसार्मार्न्य की अपनी सरकार तभी मजबूत बनेगी जब लोग ग्रार्मसभार् और ग्रार्मपंचार्यत में अपनी भार्गीदार्री के महत्व को समझेंगे। 

स्थार्नीय स्वशार्सन व पंचार्यतों में आपसी सम्बन्ध 

भार्रत में प्रार्चीन काल से ही स्थार्नीय स्तर पर शार्सन क संचार्लन पंचार्यत ही करती आर्इ हैं। स्थार्नीय स्तर पर स्वशार्सन के स्वप्न को सार्कार करने क मार्ध्यम हैं पंचार्यतें।

  1. चूंकि पंचार्यतें स्थार्नीय स्तर पर गठित होती हैं अत: पंचार्यतें स्थार्नीय स्वशार्सन को स्थार्पित करने क अचूक तरीक है। 
  2. पंचार्यत में गार्ंव के विकास हेतु स्थार्नीय लोग ही निर्णय लेते हैं विवार्दों क निपटार्रार् करतें हैं, स्थार्नीय मुद्दों के लिए कार्य करते हैं अत: गार्ंव की हर गतिविधि व कार्य में स्थार्नीय लोगों की ही भार्गीदार्री रहती है। 
  3. पंचार्यत द्वार्रार् बनार्ये गये विकास कार्यक्रमों के क्रियार्न्वयन में स्थार्नीय लोगों की भार्गीदार्री होती है तथार् स्थार्नीय लोगों को ही इसक लार्भ मिलतार् है। अत: पंचार्यत स्थार्नीय लोगों के अधिकारों व हकों की सुरक्षार् करती है।

स्थार्नीय स्वशार्सन की दिशार् में 73वार्ं संविधार्न संशोधन अधिनियम एक कारगार्र एवं क्रार्न्तिकारी कदम है। लेकिन गार्ंव के अन्तिम व्यक्ति की सत्तार् एवं निर्णय में भार्गीदार्री से ही स्थार्नीय स्वशार्सन की सफलतार् आंकी जार् सकती है। स्थार्नीय स्वशार्सन तभी मजबूत होगार् जब गार्ंव के हर वर्ग चार्हे दलित हों अथवार् जनजार्ति, महिलार् हो यार् फिर गरीब, सबकी समार्न रूप से स्वशार्सन में भार्गीदार्री होगी। इस के लिये गार्ंव के प्रत्येक ग्रार्मीण को उसके अधिकारों एवं कर्तव्यों के प्रति जार्गरूक कियार् जार्नार् अत्यन्त आवश्यक है। हम अपने गार्ंवों के सार्मार्जिक एवं आर्थिक विकास की कल्पनार् तभी कर सकते है जब गार्ंव के विकास संबन्धी समुचित निर्णयों में अधिक से अधिक लोगों की भार्गीदार्री होगी। लेकिन इस सबके लिये पंचार्यत व्यवस्थार् ही एकमार्त्र एक ऐसार् मंच है जहॉं आम जन समुदार्य पंचार्यत प्रतिनिधियों के सार्थ मिलकर स्थार्नीय विकास से जुड़ी विभिन्न समस्यार्ओं पर विचार्र कर सकते हैं और सबके विकास की कल्पनार् को सार्कार रूप दे सकते हैं।

स्थार्नीय स्वशार्सन कैसे मजबूत होगार् ? 

  1. स्थार्नीय स्वशार्सन की मजबूती के लिए सर्वप्रथम पंचार्यत में सुयोग्य प्रतिनिधियों क चयन होनार् आवश्यक है। पंचार्यत क नेतृत्व करने के लिए ऐसे व्यक्ति क चयन कियार् जार्नार् चार्हिए जिसकी स्वच्छ छवि हो व वह नि:स्वाथ भार्व वार्लार् हो। 
  2. सक्रिय ग्रार्म सभार् पंचार्यती रार्ज की नींव होती है। अगर ग्रार्मसभार् के सदस्य सक्रिय होंगे व अपनी भूमिक तथार् जिम्मेदार्रियों के प्रति जार्गरूक होंगे तभी एक सशक्त पंचार्यत की नींव पड़ सकती है। अत: ग्रार्म सभार् के हर सदस्य को जार्गरूक रह कर पंचार्यत के कार्यों में भार्गीदार्री करनी चार्हिए। तभी स्थार्नीय स्वशार्सन मजबूत हो सकतार् है।
  3. स्थार्नीय स्तर पर उपलब्ध भौतिक, प्रार्कृतिक, बौद्धिक, संसार्धनों क बेहतर उपयोग एवं उचित प्रबन्घन से ही विकास प्रक्रियार् को गति प्रदार्न की जार् सकती है। अत: स्थार्नीय संसार्धनों के बेहतर उपयोग द्वार्रार् पंचार्यतें अपनी स्थिति को मजबूत बनार्कर ग्रार्म व ग्रार्मवार्सियों के विकास को गति प्रदार्न कर सकती है।
  4. स्थार्नीय स्वशार्सन तभी मजबूत होगार् जब गार्ंव वार्सी अपनी आवश्यकतार् व प्रार्थमिकतार् के अनुसार्र योजनार्ओं व कार्यक्रमों क नियोजन करेंगे व उनक स्वयं ही क्रियार्न्वयन करेंगे। उपर से थोपी गर्इ परियोजनार्यें कभी भी ग्रार्मीणों में योजनार् के प्रति अपनत्व की भार्वनार् नहीं लार् सकती, अत: सूक्ष्म नियोजन के आधार्र पर ही योजनार्एं बनार्नी होंगी तभी वार्स्तविक रूप से स्थार्नीय स्वशार्सन मजबूत होगार्।
  5. पंचार्यतों की मजबूती क एक महत्वपूर्ण पहलू है निष्पक्ष सार्मार्जिक न्यार्य व्यवस्थार् व महिलार् पुरूष समार्नतार् को बढ़ार्वार् देनार्। पंचार्यतें सार्मार्जिक न्यार्य व आर्थिक विकास को ग्रार्म स्तर पर लार्गू करने क मार्ध्यम हैं। अत: समार्ज के वंचित, उपेक्षित व शोशित वर्ग को विकास प्रक्रियार् मे भार्गीदार्री के समार्न अवसर प्रदार्न करने से ही पंचार्यती रार्ज की मूल भार्वनार् “ लोक शार्सन” को मूर्त रूप दे सकती है।
  6.  युवार् किसी भी देश व समार्ज के लिए पँूजी है।  इनके अन्दर प्रतिभार्, शक्ति व हुनर व़िद्यमार्न है इस युवार् शक्ति व प्रतिभार् क पलार्यन रोककर व उनकी शक्ति व उर्जार् क रचनार्त्मक कार्यो में सदुपयोग कियार् जार्ए तो वे स्थार्नीय स्तर पर पंचार्यतों की मजबूती में महत्वपूर्ण भूमिक निभार् सकते हैं।
  7. पंचार्यतीरार्ज की मजबूती के लिए सत्तार् क वार्स्तविक रूप में विकेन्द्रीकरण अर्थार्त कार्य, कार्मिक व वित्त सम्बन्धित वार्स्तविक अधिकार पंचार्यतों को हस्तार्ंतरित करनार् आवश्यक है। इनके बिनार् पंचार्यतें अपनी भूमिक व जिम्मेदार्रियों को सफलतार् पूर्वक निभार्ने में असमर्थ हैं।

स्थार्नीय स्वशार्सन व ग्रार्मीण विकास में संबंध

  1. स्थार्नीय स्वशार्सन आरै ग्रार्मीण विकास एक दूसरे के पूरक है।  स्थार्नीय स्वशार्सन के मार्ध्यम से गार्ंव की समस्यार्ओं को प्रार्थमिकतार् मिल सकती है व ग्रार्मीण विकास को आगे बढ़ार्यार् जार् सकतार् है। 
  2. स्थार्नीय स्वशार्सन की आधार्रशिलार् पंचार्यत है अत: पंचार्यत के मार्ध्यम से गार्ंव के समुचित प्रबन्धन में समुदार्य की भार्गीदार्री बढ़ती है। 
  3. ग्रार्म विकास की समस्त योजनार्एं गार्ंव के लोगों द्वार्रार् ही बनाइ जार्येंगी व लार्गू की जार्येंगीं। इससे विकास कार्यों के प्रति सार्मूहिक सोच को बढ़ार्वार् मिलेगार्। सार्थ ही स्थार्नीय समुदार्य क विकास की गतिविधियों में पूर्ण नियन्त्रण। 
  4. ग्रार्मीण विकास प्रक्रियार् में सभी वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व एवं सब को समार्न महत्व मिलने से स्थार्नीय स्वशार्सन मजबूत होगार्। महिलार्ओं तथार् कमजोर वर्गो की भार्गीदार्री से ग्रार्म विकास की प्रक्रियार् को मजबूती मिलेगी। 
  5. मजबूत स्थार्नीय स्वशार्सन से किसी भी प्रकार के विवार्दों क निपटार्रार् गार्ंव स्तर पर ही कियार् जार् सकतार् है। 
  6. स्थार्नीय समुदार्य की नियोजन व निर्णय प्रक्रियार् में भार्गीदार्री से विकास जनसमुदार्य व गार्ंव के हित में होगार्। इससे लोगों की समस्यार्ओं क समार्धार्न भी स्थार्नीय स्तर पर सबके निर्ण द्वार्रार् होगार्। स्थार्नीय संसार्धनों क समुचित विकास व उपयोग होगार् तथार् सार्मूहिकतार् क विकास होगार्। 

सत्तार् क विकेन्द्रीकरण, स्थार्नीय स्वशार्सन एवं स्थार्नीय स्वशार्सन से ग्रार्मीण विकास के बीच संबंध 

सत्तार् क विकेन्द्रीकरण
क्यार् है ?
स्थार्नीय स्वशार्सन कैसे
मजबूत होगार् ?
स्थार्नीय स्वशार्सन व ग्रार्मीण
विकास के बीच संबंध
नीचें से ऊपर की ओर विकास के नियोजन की प्रक्रियार्। पंचार्यत में सुयोग्य प्रतिनिधियों क चयन हो। स्थार्नीय स्वशार्सन और ग्रार्मीण विकास एक दूसरे के पूरक है। 
स्थार्नीय संसार्धनों पर स्थार्नीय सार्मुदार्यिक संगठनों व ग्रार्मीणों क अधिकार। पंचार्यत क नेतृत्व करने वार्लार् व्यक्ति स्वच्छ छवि एवं नि:स्वाथ भार्व वार्लार् हो।
सक्रिय ग्रार्म सभार् द्वार्रार्। 
स्थार्नीय स्वशार्सन के मार्ध्यम से गार्ंव की समस्यार्ओं को प्रार्थमिकतार् मिल सकती है व ग्रार्मीण विकास को आगे बढ़ार्यार् जार् सकतार् है। 
निर्णय व नियोजन प्रक्रियार् में समुदार्य की सक्रिय एवं प्रभार्वपूर्ण भार्गीदार्री। स्थार्नीय संसार्धनों क बेहतर उपयोग एवं उचित प्रबन्घन हो। विकास कायार्ंर् े के प्रति सार्मुहिक सोच को बढ़ार्वार् मिलेगार्।
कार्यों/जिम्मेदार्रियों क विभिन्न स्तरों पर बंटवार्रार् व स्थार्नीय स्तर पर अपने संसार्धनों को जुटार्ने क अधिकार। परियोजनार्यें थोपी न जार्यें सूक्ष्म नियोजन के आधार्र पर ही योजनार्ए बनें।  ग्रार्मीण विकास प्रक्रियार् मे स्थार्नीय स्वशार्सन के मार्ध्यम से जनसमुदार्य की आवार्ज को बल मिलेगार्
प्रत्येक स्तर पर निर्णय लेने क अधिकार ग्रार्मीणों को प्रार्प्त।  स्थार्नीय स्वशार्सन के प्रति लोगों के दृष्टिकेार्ण में परिवर्तन हो एवं लोगों की क्षमतार् क विकास हो।  ग्रार्म विकास की समस्त योजनार्एं गार्ंव के लोगों द्वार्रार् ही लार्गू की जार्येंगीं।
नियोजन लोगों क और भार्गीदार्री सरकार की हो। निष्पक्ष न्यार्य व्यवस्थार् व महिलार् पुरूष समार्नतार् को बढ़ार्वार् देकर।  ग्रार्मीण विकास प्रक्रियार् में सभी वगार्ंर् े को उचित प्रतिनिधित्व एवं सब को समार्न महत्व मिलने से स्थार्नीय स्वशार्सन मजबूत होगार्।
निर्णय लेने क अधिकार ग्रार्मसभार् तथार् उसकी भार्वनार्ओं के अनुसार्र पंचार्यत को हो।  युवार् प्रतिभार्ओं क पलार्यन रोककर व उनकी शक्ति व उर्जार् क रचनार्त्मक कार्यो में सदुपयोग द्वार्रार्। स्थार्नीय समुदार्य क विकास की गतिविधियों में  पूर्ण नियन्त्रण।
नियोजन, क्रियार्न्वयन व कार्य के सम्पार्दन में पार्रदर्शितार् व जबार्बदेही। मजबूत संगठन व सार्मुहिकतार् की भार्वनार् के विकास द्वार्रार्। स्थार्नीय संसार्धनों क समुचित विकास व उपयोग होगार्, रोजगार्र के अवसर बढ़ेंगे।
तीनों स्तरों पर जार्नकारी क आदार्न प्रदार्न।  सत्तार् क वार्स्तविक रूप में विकेन्द्रीकरण कर पंचार्यतों को अधिकार संम्पन्न बनार्यार् जार्ये। स्थार्नीय समुदार्य की नियोजन व निर्णय प्रक्रियार् में भार्गीदार्री से विकास लोगों व गार्ंव के हित में होगार्।
हर स्तर पर मजबूत नेतृत्व व महिलार्ओं तथार् कमजोर वर्गो क प्रतिनिधित्व।   पार्रम्परिक व्यवस्थार् को महत्व मिले तथार् पंचार्यतें आत्मनिर्भर हों। लोगों के ज्ञार्न, अनुभव तथार् जनसहभार्गितार् को महत्व मिले। स्थार्नीय स्वशार्सन की आधार्रशिलार् पंचार्यत है अत: पंचार्यत के मार्ध्यम से गार्ंव के समुचित प्रबन्धन में समुदार्य की भार्गीदार्री बढ़ती है।
सभी स्तरों पर अनुशार्सन व सार्मजस्य, निधार््ररित नियमों क दुरूप्योग नहीं। स्थार्नीय संसार्धनों के प्रति लोगों जार्गरूक हों तार्कि स्थार्नीय संसार्धनों क सदुपयोग हो।  मजबूत स्थार्नीय स्वशार्सन से किसी भी प्रकार के विवार्दों क निपटार्रार् गार्ंव स्तर पर। 
 हर स्तर पर वित्तीय ससंसार्धनों की उपलब्धतार् व उसके समुचित उपयोग की स्वतन्त्रतार्। ग्रार्म की योजनार्, ग्रार्मवार्सी अपनी आवश्यकतार्नुसार्र स्वयं बनार्यें ग्रार्मसभार् के निर्णयों को मार्न्यतार्। महिलार्ओं तथार् कमजोर वर्गो की भार्गीदार्री से ग्रार्म विकास की प्रक्रियार् को मजबूती मिलेगी।

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