स्थार्नीय इतिहार्स क्यार् है? –

स्थार्नीय इतिहार्स क्यार् है?

By Bandey

अनुक्रम

स्थार्नीय इतिहार्स अतीत को आमतौर पर ‘ऐतिहार्सिक-लेखन की विशिष्ट धार्रार् जो भौगोलिक रूप में लघु क्षेत्र पर केन्द्रित, अव्यार्वसार्यिक इतिहार्स अतीतकारों द्वार्रार्, अशैक्षिक श्रोतार्ओं के लिए लगार्तार्र लिखार् जार्ने वार्लार् और उन पर केन्द्रित इतिहार्स अतीत मार्नार् जार्तार् है।’ पश्चिमी देशों में, विशेष रूप से ब्रिटेन में, फ्रार्ंस और अमेरिक में, स्थार्नीय इतिहार्स अतीत 18वीं (अठार्रहवीं) और 19वीं (उन्नीसवीं) शतार्ब्दी में स्थार्नीय अभिजार्त्यों द्वार्रार् लिखे गए। उन्नीसवीं शतार्ब्दी में, इस प्रक्रियार् ने जोर पकड़ार् और कई संस्थार्एँ स्थार्नीय इतिहार्स अतीत पर काम करने के लिए बनी। शहरीकरण, औद्योगीकरण और प्रव्रजन (स्थार्नार्ंतरण) के प्रभार्व में स्थार्नीय समुदार्य अस्थिर हो गए और पहचार्न की समस्यार् उभर आई। इसक प्रभार्व यह हुआ कि स्थार्नीय पढ़े-लिखे लोगों ने इस पर ध्यार्न दियार् और उन लोगों में एक अभिलार्षार् उत्पन्न हुई। उन्होंने सोचार् कि क्यों न हम स्थार्नीय और क्षेत्रीय स्तर पर अपने इतिहार्स अतीत को अंकित करें। 1860 ई. से आगे, कई इतिहार्स अतीत समूह उभरकर सार्मने आए जो अपने क्षेत्र के अध्ययन को आगे बढ़ार्ने के लिए रुचि रखने लगे। उनक कार्य अतीत के कई पक्षों को समार्हित करतार् थार्-

अभिलेखीय महत्त्व के अज्ञार्त स्थार्नों में स्थार्नीय चर्चों के इतिहार्स अतीत से लेकर पुरार्नी कुल्हार्ड़ी की खोज तक। वंश परंपरार् क अध्ययन और पार्रिवार्रिक इतिहार्स अतीत जैसे कुछ दूसरे रुचि के क्षेत्र स्थार्नीय इतिहार्स अतीत में थे। अमेरिक में उन्नीसवीं शतार्ब्दी विशेष रूप से स्थार्नीय इतिहार्स अतीत क काल यार् स्थार्नीय अभिजार्त्यों के संरक्षण में जो अपनी सार्मार्जिक स्थिति को बनार्ए रखने यार् उसे बढ़ार्ने में रुचि रखते थे। यह इतिहार्स अतीत विशिष्ट क्षेत्र की स्थार्पनार् को अंकित कियार्। इसमें प्रार्रंभिक रार्जनीतिज्ञों की सूची और जीवन स्थार्नीय प्रमुखों क इतिहार्स अतीत आदि भी अंकित कियार् गयार्। स्थार्नीय इतिहार्स अतीत एक नौसिखिए प्रयार्स के रूप में शुरू हुआ स्थार्नीयतार् और समुदार्यिकतार् को गौरवार्न्वित करने के लिए और अभी भी यह प्रवृत्ति मौजूद है।

‘स्थार्नीय इतिहार्स अतीत’ के नार्म से यह शब्द लगार्तार्र पुरार्तत्ववार्द और शौकियार् इतिहार्स अतीत-लेखन के सार्थ जुड़ार् हुआ है। फिर भी 1930 ई. से, इस क्षेत्र में कुछ व्यवसार्यीकरण आयार् थार्। आगे के दो दशकों में कई पुस्तकें लिखी गई जो स्थार्नीय क्षेत्रों पर केन्द्रित थीं और पेशेवर उपलब्धि के क्षेत्र में किसी भी रार्ष्ट्रीय इतिहार्स अतीत के समकक्ष मार्नी जार्ती थीं।

लिखी गई कुछ पुस्तकों के नार्म:

  • ए. एच. डॉड क ‘इंडस्ट्रीज रिवोल्युशन इन नोर्थ वेल्स (1933)*
  • डब्ल्यू. एच. चलनर क ‘दि सोशल एंड इकोनोमिक डेवेलेपमेंट ऑफ क्रियू (1780– 1923)* (1950)
  • डब्ल्यू. जी. हार्स्किन क ‘क्लार्सिक दि मेकिंग ऑफ दि इंग्लिश लैंडस्केप (1955)’
  • जे. डी. माशल क ‘पुर्नेस एण्ड दी इंडस्ट्रीज रिवोल्युशन (1958)।’

जिन्होंने ब्रिटेन में स्थार्नीय इतिहार्स अतीत को आंदोलित कर दियार्। स्वेडन में जान हर्सेन क ओस्टरलेन (1952) फ्रार्ंस में गी चूलर क कार्य और अमेरिकन मिडवेस्ट पर जोसेफ अमेरों क कार्य ने इस परंपरार् को आगे बढ़ार्यार् और स्थार्नीय इतिहार्स अतीत को पेशार्वर बनार्ने में योगदार्न दियार्।

1947 में ब्रिटेन के लिसेस्टर में स्थार्नीय इतिहार्स अतीत विभार्ग स्थार्पित करके इस परंपरार् को शैक्षिक आकार दियार् गयार्। यहार्ँ शैक्षिक स्थार्नीय इतिहार्स अतीत क अभी भी विकसित दृष्टिकोण प्रभार्वी है जिसे ‘लिसेस्टर स्कूल’ के नार्म से जार्नार् जार्तार् है। एच.पी.आर पिनबर्ग ने 1952 में अपने ‘उद्देश्य कथन’ में इस ‘स्कूल’ के उद्देश्य के बार्रे में कहार् थार्: विभार्ग क प्रार्थमिक उद्देश्य होगार् अपने मस्तिष्क को पोषित करनार् और उनके मस्तिष्क को जो हमार्रे निर्देशन की तरफ देखेंगे, स्थार्नीय इतिहार्स अतीत के ताकिक संकल्पनार् के लिए, ऐसार् प्रदर्शन एक स्तर बनार्एगार् जिसके द्वार्रार् हमार्रार् अपनार् काम और दूसरों क काम भी जार्ँचार् जार् सकेगार्।

फिनबर्ग और हार्स्किन्स, दो महत्त्वपूर्ण इतिहार्स अतीतकारों ने जो इस स्कूल से जुड़े थे, कई अवसरों पर परंपरार्गत स्थार्नीय इतिहार्स अतीत की आलोचनार् की। जॉर्ज और यार्तीनार् शोरन के अनुसार्र:

विचार्रधार्रार् के अनुसार्र, फिनबर्ग और हार्स्किन्स अभिजार्त्यवार्दी और रूढ़िवार्दी सिद्धार्ंत के विरोधी थे जिन्होंने परंपरार् स्थार्नीय इतिहार्स अतीत की आधार्रशिलार् रखी जिसमें उन्होंने सार्मंतवार्दी परिवार्रों के इतिहार्स अतीत पर अधिक ध्यार्न क और सार्मार्न्य व्यक्ति की उपेक्षार् क भी विरोध कियार् थार्। सिद्धार्ंत रूप से, उन्होंने पुरार्तनवार्द, तथ्य संग्रहण पद्धति, अनुदेश और पद्धति की कमी, और दस्तार्वेजी स्रोतों पर अधिक निर्भरतार् क विरोध कियार् जो स्थार्नीय इतिहार्स अतीत को एक विषय के रूप में स्थार्पित करने क काम करेगार्….।

परंपरार्गत स्थार्नीय इतिहार्स अतीत में इस असंगततार् को दूर करने के लिए, फिनबर्ग ने सुझार्यार् कि स्थार्नीय इतिहार्स अतीतकारों क काम होनार् चार्हिए ‘स्थार्नीय मनुष्य की उत्पत्ति, विकास, उत्थार्न और पतन को अपने मस्तिष्क में पुनर्रचित करनार् और अपने पार्ठकों के लिए प्रस्तुत करनार्।’ फिर भी फिनबर्ग और हार्स्किन्स ने यह परिभार्षित नहीं कियार् कि ‘स्थार्नीय समुदार्य’ क क्यार् संघटित करतार् है। ये इसके अस्तित्व को एक प्रमार्ण रूप में लेते हैं और इसके आकार को ‘लघु क्षेत्र से स्थार्नीय क्षेत्र के क्रम में।’ लिसेस्टर में उनके उत्तरार्िध्कारी, सी. फियियन एडम्स ने अपनी पुस्तक रोधकिग इंग्लिश लोकल हिस्ट्री (1987), में एक क्षेत्र को रूपरेखार् के रूप में चित्रित कियार्।

लिसेस्टर स्कूल क मुख्य अभिलक्षण दृढ़निश्चयी आनुभविक अनुसंधार्न और क्षेत्रकार्य पूर्व औद्योगिक काल पर केंद्रित सार्मार्न्य व्यक्ति की श्रेष्ठतार् और समुदार्य की संकल्पनार् के रूप में वर्णित कियार् जार् सकतार् है। एशियार् और अफ्रीक में स्थार्नीय इतिहार्स अतीत की प्रकृति अलग है। यहार्ँ पार्रंपरिक रूप मुख्य रूप से मौखिक परंपरार् से संबंधित है। शार्ही वंश और युद्ध में उनकी उपलिब्ध्यार्ँ इस परंपरार् के मुख्य विषय हैं। इन इतिहार्स अतीतों के कुछ भार्ग लिखित रूप में भी थे किंतु मौखिक रूप प्रस्तुतीकरण की प्रभार्वी पद्धतियार्ँ थीं। भार्रत में, बखार्र (महार्रार्ष्ट्र में) रार्सों (रार्जस्थार्न में) और वंशार्वली (दक्षिण भार्रत में) कुछ ऐसे तरीके थे जिनमें स्थार्नीय पार्रंपरिक इतिहार्स अतीत प्रस्तुत कियार् गयार्। वे वंश इतिहार्स अतीत और इतिवृत है जो शार्ही परिवार्र के इतिहार्स अतीत को कहती है और युद्ध में सैनिकों की उपलिब्ध्यों क बखार्न करती है। अफ्रीक देशों में भी यह परंपरार् मिथ और कथार् के मार्ध्यम से, नार्टकीय अभिनय से, और अधिक औपचार्रिक कथार्ओं के मार्ध्यम से बची रही है।

अक्सेल हर्निट सीवर्स एक संपार्दित पुस्तक के प्लेस इन दि वल्र्ड : न्यू लोकल हिस्टोरियोग्रार्फीज फ्रॉम अफ्रीक एंड सार्उथ एशियार् (2002) की भूमिक में अपनी टिप्पणी देते है-

बहुत सार्रे दक्षिणी एशियार्ई और अफ्रीक समार्जों में कुछ व्यक्ति यार् समूह सार्मार्न्य रूप से ऐतिहार्सिक ज्ञार्न को बढ़ार्ने वार्ले पार्रंपरिक विशेषज्ञ मार्ने जार्ते हैं। इसको कार्यार्न्वित करने के कई औपचार्रिक तरीके हैं। एक जगह किसी गार्ँव में एक वृद्ध व्यक्ति हो सकतार् है, समुदार्य में उसे स्थार्नीय इतिहार्स अतीत पर सबसे अधिक ज्ञार्न वार्लार् व्यक्ति मार्नार् जार् सकतार् है। दूसरे स्थार्नों पर, जैसे मार्ली में विशेष रूप से प्रशिक्षित लोग एक व्यार्वसार्यिक इतिहार्स अतीतकार के रूप में कार्य करते हैं, यार् यहार्ँ तक कि इतिहार्स अतीत को सँजोने वार्ले सरकारी वैध्तार् प्रार्प्त और शार्ही वंश परंपरार् के इतिहार्स अतीतकार, जैसे इेसेखुरे और इहोम्बे शीर्षकधरी नार्ईजेरियार् के बेविन के उबार् रार्जदरबार्र में।

पश्चिमी शिक्षार् पद्धति के आने और उपनिवेशीय प्रभुत्व से, एशियार् और अफ्रीक में नए अभिजार्त्य वर्ग पनपने शुरू हो गए। उनके सोचने की पद्धति पश्चिमी शिक्षार् से प्रभार्वित थी। 19वीं शतार्ब्दी में भार्रत ने विश्वविद्यार्लय पद्धति की स्थार्पनार् और 1940 ई. के दौरार्न अफ्रीक में इसकी स्थार्पनार् से ऐतिहार्सिक ज्ञार्न औपचार्रिक शिक्षार् के क्षेत्र में आयार्। फिर भी बहुत सार्रार् इतिहार्स अतीत-लेखन अभी भी विश्वविद्यार्लय पद्धति के बार्हर लिखार् गयार्। स्थार्नीय इतिहार्स अतीत विशेष रूप से नौसिखियों के लिए और अशैक्षिक इतिहार्स अतीतकारों के लिए आकर्षक क्षेत्र थार् जो अपने समुदार्य और स्थार्नीय क्षेत्र के अतीत के बार्रे में रुचि अनुभव करते थे।बहुत सार्रे यह इतिहार्स अतीतकार उसी समुदार्य और स्थार्नों में जन्मे और पले-बढ़े थे जिस पर वे लिखते थे और इनमें से काफी लोग औपचार्रिक शिक्षार् क्षेत्र के बार्हर अव्यार्वसार्यिक इतिहार्स अतीतकार थे। यह भी सत्य है कि कुछ स्थार्नीय इतिहार्स अतीत विश्वविद्यार्लयों में भी लिखे गए। फिर भी, इसक अधिकांश भार्ग विश्वविद्यार्लय के बार्हर के लोगों द्वार्रार् लिखार् गयार्। हनोर्ट-सिवर्स इन लेखनों को ‘नये स्थार्नीय इतिहार्स अतीत’ की संज्ञार् देते हैं।

पार्रंपरिक स्थार्नीय इतिहार्स अतीत जो मौखिक थार्, की तुलनार् में नए-स्थार्नीय इतिहार्स अतीत लिखे और प्रकाशित किए गए। इसके अतिरिक्त, अतीत क हवार्लार् देकर वृहद् संदर्भ में वे स्थार्नीय पहचार्न के पुनर्निर्मार्ण के प्रयार्स थे-और जो प्रार्रूप में स्थार्नीय उद्देश्य और आवश्यकतार् के अनुसार्र आधुनिक इतिहार्स अतीत-लेखन क उपयोग करते थे। वे स्थार्नीयतार् के बार्रे में ज्ञार्न-प्रदार्न करने के उद्देश्य से और स्थार्नीय जार्गरूकतार् को बढ़ार्ने के उद्देश्य से लिखे गए। वे वृद्ध दुनियार् के समक्ष स्थार्नीयतार् को सम्मार्न दिलार्ने की इच्छार् रखते हैं और इसक नार्म सबको मार्लूम करार्नार् चार्हते हैं।

स्थार्नीय इतिहार्स अतीत अक्सर स्थार्नीय ऐतिहार्सिक समार्ज यार् समूहों की एक स्थार्नीय ऐतिहार्सिक इमार्रत यार् अन्य ऐतिहार्सिक स्थल की रक्षार् के रूप में प्रलेखित है। यह स्थार्नीय इतिहार्स अतीत के कई काम करतार् है शौकियार् यार् स्वतंत्र रूप से विभिन्न संगठनों द्वार्रार् नियोजित पुरार्लेखपार्ल काम इतिहार्स अतीतकारों द्वार्रार् संकलित है। स्थार्नीय इतिहार्स अतीत इसक एक महत्त्वपूर्ण पहलू है और जो विशेष क्षेत्रों से संबंधित स्थार्नीय यार् रार्ष्ट्रीय रिकॉर्ड में संरक्षित दस्तार्वेजों के प्रकाशन सूचीबद्ध है। स्थार्नीय इतिहार्स अतीत अन्य प्रकार से भी दस्तार्वेज की तुलनार् में कम-से-कम एक देश यार् महार्द्वीप की फस्तकें और कलार्कृतियों के सार्थ हो जार्तार् है। कई स्थार्नीय इतिहार्स अतीत मौखिक कहार्नियों यार् कहार्नियों के रूप में दर्ज कर रहे हैं, और तो और अधिक अच्छी तरह से ज्ञार्त मुद्दों की तुलनार् में कमजोर हैं। स्थार्नीय इतिहार्स अतीत की कलार्कृतियार्ँ अक्सर स्थार्नीय इतिहार्स अतीत संग्रहार्लय, जो एक प्रोत्सार्हिक घर यार् अन्य इमार्रत में रखे जार् सकते हैं, इसमें एकत्र कर रहे हैं, व्यक्तिगत ऐतिहार्सिक स्थलों को स्वार्भार्विक स्थार्नीय कर रहे हैं हार्लार्ंकि वे रार्ष्ट्रीय यार् दुनियार् के इतिहार्स अतीत के महत्त्व के रूप में अच्छी तरह से हो सकतार् है।

यपार्ुनार्इटेड किंगडम में स्थार्नीय इतिहार्स अतीत के लिए ब्रिटिश एसोसिएशन को प्रोत्सार्हित करती है और एक अकादमिक अनुशार्सन के रूप में और दोनों व्यक्तियों तथार् समूहों द्वार्रार् एक अवकाश गतिविधि के रूप में स्थार्नीय इतिहार्स अतीत के अध्ययन में मदद करतार् है। ब्रिटेन में स्थार्नीय इतिहार्स अतीत को एक लम्बार् समय लगार्। अठार्रहवीं और उन्नीसवीं सदी में, एक अकादमिक अनुशार्सन के रूप में स्वीकार कियार् है। व्यार्पक रूप से एक पुरार्तार्त्विक पिछड़ार् देश पार्रसंस के लिए उपयुक्त मार्नार् जार्तार् थार्। परियोजनार् लंदन के विश्वविद्यार्लय में ऐतिहार्सिक अनुसंधार्न संस्थार्न द्वार्रार् समन्वित है।

स्थार्नीय इतिहार्स अतीत के लिए विश्वविद्यार्लयों के भीतर एक अकादमिक विषय के रूप में उपेक्षित कियार् जार् रहार् है। अकसर शैक्षणिक स्थार्नीय इतिहार्स अतीतकार इतिहार्स अतीत के एक अधिक सार्मार्न्य विभार्ग के भीतर यार् सतत् शिक्षार् में पार्ए जार्ते हैं। स्थार्नीय इतिहार्स अतीत शार्यद ही कभी ब्रिटिश स्कूलों में एक अलग विषय के रूप में पढ़ार्यार् जार् रहार् है। 1908 में शिक्षार् परिपत्र के एक वाड से आग्रह कियार् थार् कि स्कूलों पर ध्यार्न दें जिसमें वह स्थित हैं। शहर और जिले के इतिहार्स अतीत के लिए भुगतार्न करनार् चार्हिए। 1952 में शिक्षार् मंत्रार्लय को सुझार्व दियार् कि स्कूलों की स्थार्नीय सार्मग्री क उपयोग करने के लिए रार्ष्ट्रीय विषयों क उदार्हरण देकर स्पष्ट करनार् चार्हिए। मौजूदार् रार्ष्ट्रीय पार्ठ्यचर्यार् के भीतर 4 स्तर पर विद्याथियों से स्थार्नीय, रार्ष्ट्रीय तथार् अंतर्रार्ष्ट्रीय इतिहार्स अतीत के ज्ञार्न व समझ दिखार्ने की उम्मीद कर रहे हैं।

संयुक्त रार्ज्य अमेरिक में, स्थार्नीय इतिहार्स अतीत आमतौर पर एक विशेष गार्ँव यार् बस्ती की जगह और लोगों के किसी भी इतिहार्स अतीत पर केंद्रित है। संयुक्त रार्ज्य अमेरिक में स्थार्नीय इतिहार्स अतीत नेटवर्क (ALHN) स्वतंत्र वंश और ऐतिहार्सिक संसार्धनों तक पहुँचने के लिए एक ध्यार्न केन्द्र प्रदार्न करतार् है। संयुक्त रार्ज्य अमेरिक में, 79000 ऐतिहार्सिक स्थलों में ऐतिहार्सिक स्थार्नों के रार्ष्ट्रीय रजिस्टर पर लिस्टिंग के रूप में पहचार्ने जार्ते हैं। स्थार्नीय इतिहार्स अतीत को एक नए रूप में संयुक्त रार्ज्य अमेरिक में विभिन्न शहरी पड़ोस में परियोजनार्ओं यदि यह सदन बार्त कर सकते है। के आंदोलन हैं। इन छोटे पैमार्नों पर स्थार्नीय रूप से उत्पन्न इतिहार्स अतीत की घटनार्ओं से इतिहार्स अतीत में एक ब्यार्ज प्रोत्सार्हित करते हैं और आम जनतार् द्वार्रार् खुले समार्प्त भार्गीदार्री के लिए प्रदार्न, हार्लार्ंकि, वहार्ँ कोई पुनरीक्षण यार् तथ्यार्त्मक सबूत प्रस्तुत नहीं कियार् है कि तीसरे पक्ष की समीक्षार् है, और इस तरह की प्रस्तुतियों में पेशेवर तीसरे पक्ष के इतिहार्स अतीत संगठनों द्वार्रार् निरीक्षण की आवश्यकतार् होती है।

नयार् स्थार्नीय इतिहार्स अतीत पूरी तरह से परंपरार् से कटार् नहीं है। वह स्थार्नीय मौखिक और दूसरे प्रार्थमिक स्रोतो क प्रयोग करते हैं और स्थार्नीय समुदार्यों की निरंतरतार् को बनार्ए रखनार् चार्हते हैं। यह सत्य है कि वह मौखिक परंपरार् के बरअक्स लिखित शब्द की शक्ति बरकरार्र रखते हैं। फिर भी वह पुरार्ने इतिहार्स अतीत के प्रति विरोधार्त्मक भार्व नहीं रखते हैं और संबंधित समुदार्य उन्हें स्थार्नीय गर्व की वस्तु समझते हैं। नए स्थार्नीय इतिहार्स अतीतकार, अपनी ओर से स्वयं के कामों को पुरार्ने इतिहार्स अतीत के प्रति एक खतरार् नहीं मार्नते, अपितु एक उद्देश्य मार्नते हैं जो इस पुरार्ने ऐतिहार्सिक ज्ञार्न को शहरीकरण के खतरे, औपचार्रिक शिक्षार् के खतरे, यार् युद्ध तथार् विस्थार्पन के खतरे से इसकी रक्षार् करतार् है। इतिहार्स अतीत को पूरे विश्व में समुदार्य की ‘रचनार्’ और ‘कल्पनार्’ के काम में एक औज़ार्र के रूप में प्रयोग कियार् गयार् है।

एशियार् और अफ्रीक ने नए स्थार्नीय इतिहार्स अतीत में सार्मार्न्य अतीत के संदर्भ में समुदार्य और स्थार्नीयतार् की पहचार्न को पुनर्रचित करने क काम कियार् है। रार्ष्ट्र की सीमार् के अंतर्गत नए समुदार्य ‘आधुनिक समुदार्य’ बन गए हैं जो, अर्जुन अप्पार्दपार्ुरार्ई के शब्दों में, मिश्रित घटनार्-क्रियार् विज्ञार्न की गुणवत्तार्, सार्मार्जिक तार्त्कालिकतार् के अर्थ में, तकनीकी अंतक्रियार् और संदर्भ के सार्पेक्षतार् के बीच संबंध के संघटन से निर्मित प्रक्रियार् के अंग हैं। बदलतार् वार्तार्वरण, अंतर-क्षेत्रीय स्थार्नार्ंतरण और लंबी दूरी की संप्रेषणीयतार् ने एक ऐसी अवस्थार् निर्मित की है जहार्ँ स्थार्नीय समुदार्य के सदस्य भौतिक यार् भार्वार्त्मक रूप से किसी विशिष्ट स्थार्नीयतार् के सार्थ अधिक समय तक बँधे नहीं हैं। नए स्थार्नीय इतिहार्स अतीत ने इस बदले हुए वार्तार्वरण के लेखन की कोशिश की है और जैसार् कि हर्नीट सीवर्स ने भी कहार् है:

नयार् स्थार्नीय इतिहार्स अतीत समुदार्य के बार्हरी अंतक्रियार् की जटिलतार् को कम करने क प्रयार्स करतार् है। यह स्थार्न विशेष की एक पार्रम्परिक, स्वपूरित और समार्ंगीय छवि प्रस्तुत करतार् है। वह ऐतिहार्सिकतार् पर बल दे सकते हैं और बदलार्व पर भी, वृहद संदर्भ के महत्त्व के भार्ग होकर भी स्थार्नीय गर्व के मार्मले में और आधुनिकतार् के सूचक के रूप में भी। ऐसे इतिहार्स अतीत दो अतिवार्दी दृष्टिकोणों के बीच झूलते हैं। ‘स्थार्नीय’ और वृहद विश्व के बीच तनार्व रहतार् है-अधिक यार् कम सुस्पष्ट रूपों में सार्मार्न्यत: प्रत्येक नए स्थार्नीय इतिहार्स अतीत में। अफ्रीक और एशियार् में नए स्थार्नीय इतिहार्स अतीत स्थार्नीयतार् को कई तरीकों से रचते हैं। जिन तरीकों क हवार्लार् देकर वे स्थार्नीयतार् को प्रस्तुत करते हैं वे इस प्रकार हैं:

  1. सार्मार्न्य पूर्वज
  2. सार्मार्न्य संस्कृति
  3. प्रार्चीन रार्जत्व
  4. नार्तेदार्री संबंध् और धर्मिक
  5. सार्ंस्कृतिक
  6. रार्जनीतिक

एक नैतिक समुदार्य के रूप में जो एक सार्मार्न्य मूल्य-पद्धति में भार्गीदार्र हैं। यह कार्य स्थार्नीय परंपरार् और आधुनिक शैक्षिक इतिहार्स अतीत-लेखन के स्वीकृत मिश्रण से कियार् जार्तार् है। एशियार् और अफ्रीक में नए स्थार्नीय इतिहार्स अतीत क लेखन अधिकतर पश्चिमी शोध-पद्धति और सार्मग्री प्रस्तुतीकरण से प्रभार्वित है। ये इतिहार्स अतीतकाल क्रमबद्ध हैं और इनमें स्रोतों के वृहद् पैमार्ने पर संदर्भ हैं। इसके अतिरिक्त, वे सार्मार्न्यत: एक विकासवार्दी दृष्टिकोण में मार्ने जार्ते हैं। परिकल्पनार्करण धामिक यार् मिथकीय शब्दों में नहीं है अपितु आधुनिक धर्मनिरपेक्ष शब्दों में है। फिर भी, विषय-वस्तु को, वे मुख्य रूप से पार्रंपरिक लिखित और मौखिक स्रोतों से निष्पार्दित करते हैं और उनके स्रोतों क प्रयोग सार्मार्न्यत: अताकिक है।

वे कभी-कभी काल के रेखीय अर्थ को ग्रहण करते हैं पश्चिमी मॉडल के समार्न, लेकिन वे हमेशार् अपनी वर्णित कथार् के मूल में मिथकीय और पार्रंपरिक नार्यकों को शार्मिल करते हैं जिनक जीवन और कार्य किसी भी कालक्रम में सही नहीं बैठ सकतार् और जिसको प्रमार्णित नहीं कियार् जार् सकतार् यद्यपि इन इतिहार्स अतीतों क रूप पश्चिमी संकल्पनार् और पद्धति से मेल खार् सकतार् है। इन इतिहार्स अतीतों के पार्ठक रार्ष्ट्रीय और स्थार्नीय दोनों हैं यार् इससे भी दूर तक पैफले हैं। चूँकि ये लिखे और प्रकाशित किए जार्ते हैं और आधुनिक प्रस्तुतीकरण पद्धति क प्रयोग करते हैं। उनकी पहुँच स्थार्नीयतार् के आगे हैं।

फिर भी, वह स्थार्नीयतार् और इसकी परंपरार् से संबंध् रखते हैं। इसके अतिरिक्त, ये स्थार्नीय इतिहार्स अतीत सार्मार्न्य शैक्षिक पार्ठ नहीं है। वे स्थार्नीय गर्व के निर्धरक के रूप में भी काम करते हैं और सार्मुदार्यिक तथार् स्थार्नीय पहचार्न की भार्वनार् प्रदार्न करते हैं। अफ्रीक और एशियार् में नए स्थार्नीय इतिहार्स अतीत, इसलिए दो स्तरों पर काम करते हैं-स्थार्नीय और स्थार्नीयतार् से परे। उनके लेखक सार्मार्न्य तौर पर आधुनिक शिक्षार् पद्धति को ग्रहण करते हैं जो स्थार्नीय समार्ज से अलग भी हो सकती है।

उसी समय उनक काम स्थार्नीय परंपरार्ओं से निष्पार्दित होतार् है और सीधे तौर पर स्थार्नीय बहस में भार्ग लेतार् है। यहार्ँ तक कि ये इतिहार्स अतीत अतीत को पार्रंपरिक रूप से प्रस्तुत करने को चपार्ुनौती देती हैं, वे स्थार्नीय परंपरार् के आधार्र पर फलते-फूलते हैं और आवश्यक रूप से इन्हें हटार्ते नहीं हैं।

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