सूफी आंदोलन क्यार् है ?
रहस्यवार्दी एवं उदार्रवार्दी विचार्र धार्रार्ओं से प्रभार्वित होकर इस्लार्म धर्म में एक सम्प्रदार्य क उदय हुआ, उसे ही सूफी सम्प्रदार्य कहार् जार्तार् है। सूफी शब्द की उत्पत्ति ‘‘सूफ’’ शब्द से हुर्इ है। सूफ क अर्थ बिनार् रंगार् हुआ ऊन क लार्बार्दार् होतार् है । उसे बैरार्गी यार् संन्यार्सी धार्रण करते थे। दिनकर जी के अनुसार्र ‘‘सूफीवार्द को इस्लार्म क रहस्यवार्दी रूप मार्नार् है। कुछ इतिहार्सकारों ने यह स्वीकार कियार् है कि सूफी धर्म हिन्दू विचार्रधार्रार् विश्वार्सों एवं रिति रिवार्जों से उत्पन्न हुआ है। सूफी धर्म ने शार्ंति एवं अंहिसार् क सिद्धार्ंत र्इसार्इयों हिन्दूओं एवं जैनियों से लियार् है। सूफी धर्म के प्रति हिन्दुओं क विशेष लगार्व है ।

भार्रत मेंं सूफी सम्प्रदार्य क विकास – 

सर्वप्रथम अरब व्यार्पार्री के सार्थ दक्षिण भार्रत में सुफी मत के लोग आये थे । भार्रत में अबुल हसन हूज सूफी मत क वार्स्तविक प्रचार्रक थार् । उसक जन्म गजनी में और शिक्षार् बगदार्द में हुर्इ । एवं उसक निधन लार्हौर में हुआ थार् । सूफी सम्प्रदार्य क उत्तरी भार्रत में 12वीं शतार्ब्दी में मोर्इनुद्दीन चिश्ती ने प्रचार्र कियार् थार् । बार्बार् फखरूद्दीन ने दक्षिण भार्रत में तेरहवीं शतार्ब्दी में सूफी मत क प्रचार्र कियार् थार्। इस्लार्म क प्रचार्र धीरे-धीरे बढ़ने लगार्।

इस्लार्म धर्म की नींव पैगम्बर मुहम्मद ने डार्ली थी । इस्लार्म ने अपने अंदर अनेक धामिक और आध्यार्त्मिक आंदोलन क उदय देखार् थ । यह आंदोलन मुख्य कुरार्न की व्यार्ख्यार् के चार्रों ओर केन्द्रित थे । इस्लार्म के मुख्यतयार् दो सम्प्रदार्यों की विशेष जार्नकारी मिलती है । जो इस प्रकार है 1. शियार् 2. सुन्नी इन सम्प्रदार्यों क धामिक ही नहीं अपितु रार्जनीतिक क्षेत्रों में भी विभार्जन हुआ है। मध्यकालीन भार्रत में उत्तरी भार्रत के शार्सक सुन्नी थे जबकि दक्षिण भार्रत के जैसे – बीजार्पुर, गोल कुण्डार्, अहमदनगर के शार्सक शियार् थे । सुन्नी मुसलमार्न के अनुसार्र इस्लार्मी विधार्न की चार्र विचार्र धार्रार्यें थी । जैसे – कुरार्न, हार्दीस, हनीकी, इनमें से हनीकी विचार्र धार्रार् को तुर्को ने अपनार्यार् वहीं तुर्क भार्रत में आये ।

सूफी सम्प्रदार्य की विचार्रधार्रार् उलेमार्ओं से विपरित थी । सूफी रहस्यवार्दी थे वे पवित्र धामिक लोग थे । सूफी दर्शन उलेमार्ओं से भिन्न थार् । भक्ति सन्तों की भार्ंति सूफीयों ने धर्म को र्इश्वर से प्रेम और मनुष्य की सेवार् मनार् है। सूफियों क गुरू पीर होतार् थार् जिसे ख्वार्जार् यार् शेख कहार् जार्तार् थार् । सूफी सम्प्रदार्य के विकास हेतु वे धामिक सभार् क आयोजन भी करते थे ।

सूफी मत के सिद्धार्ंत – 

सूफी मत के सिद्धार्ंत भक्ति माग के सिद्धार्ंत से मिलते जुलते है । उनकी विशेषतार्यें निम्नार्नुसार्र है-

  1. एकेश्वरवार्दी – सूफी मतार्वलम्बियों क विश्वार्स थार् कि र्इश्वर एक है आरै वे अहदैतवार्द से प्रभार्वित थे उनके अनुसार्र अल्लार्ह और बन्दे में कोर्इ अन्तर नहीं है । बन्दे के मार्ध्यम से ही खुदार् तक पहुंचार् जार् सकतार् है। 
  2. भौतिक जीवन क त्यार्ग – वे भौतिक जीवन क त्यार्ग करके र्इश्वर मे लीन हो जार्ने क उपदेश देते थे । 
  3. शार्न्ति  व अहिंसार् मेंं विश्वार्स – वे शार्न्ति व अहिसार्ं में हमेशार् विश्वार्स रखते थे ।
  4. सहिष्णुतार् – सूफी धर्म के लोग उदार्र होते थे वे सभी धर्म के लोगों को समार्न समझते थे । 
  5. प्रेम – उनके अनुसार्र पे्रम से ही र्इश्वर प्रार्प्त हो सकते हैं। भक्ति में डूबकर ही इसं ार्न परमार्त्मार् को प्रार्प्त करतार् है। 
  6. इस्लार्म क प्रचार्र – वे उपदेश के मार्ध्यम से इस्लार्म क प्रचार्र करनार् चार्हते थे । 
  7. प्रेमिक के रूप मे कल्पनार् – सूफी संत जीव को प्रेमी व र्इश्वर को प्रेमिक के रूप में देखते थे । 
  8. शैतार्न बार्ध – उनके अनुसार्र र्इश्वर की प्रार्प्ती में शैतार्न सबसे बार्धक होते हैं । 
  9. हृदय की शुद्धतार् पर जोर – सूफी संत, दार्न, तीर्थयार्त्रार्, उपवार्स को आवश्यक मार्नते थे। 
  10.  गुरू एव शिष्य क महत्व – पीर (गुरू) मुरीद शिष्य के समार्न होते थे । 
  11. बार्ह्य्य आडम्बर क विरोध – सूफी सतं बार्ह्य आडम्बर क विरोध व पवित्र जीवन पर विश्वार्स करते थे 
  12. सिलसिलो से आबद्ध – सूफी सतं अपने वर्ग व सिलसिलो से सबंध रखते थे ।

      सूफी सम्प्रदार्य के प्रमुख संत  – 

      1. ख्वार्जार् मुइनुद्दीन चिश्ती – भार्रत में चिश्ती सम्प्रदार्य के संस्थार्पक ख्वार्जार् मुइनुद्दीन चिश्ती थे इनक जन्म र्इरार्न के सिस्तार्न प्रदेश में हुआ थार् । बचपन में उन्होंने सन्यार्स ग्रहण कर लियार् वे ख्वार्जार् उस्मार्न हसन के शिष्य बन गये और वे अपने गुरू के निर्देश में 1190 को भार्रत आ गये । वे अद्वैतवार्द एवं एकेश्वरवार्द की शिक्षार् देते हुए मार्नव सेवार् ही र्इैश्वर की सच्ची भक्ति है । हिन्दु के प्रति उदार्र थे । 
      2. निजार्मुदुदीन औलियों – निजार्मुदुदीन औलियार्ं क जन्म बदॉयू में 1236 में हुआ थार् । 20 वर्ष की आयार्ु में वे शेख फरीद के शिष्य बन गये । उन्होंने 1265 में चिश्ती सम्प्रदार्य क प्रचार्र प्रार्रंभ कर दियार् थार् । वे सभी को र्इश्वर प्रेम के लए प्रेरित करते थे । जो लोग उनके यहार्ं पहुंचते थे उन्हें वे संशार्रीक बन्धनों से मुक्ति दिलार्ने में सहार्यतार् करते थे । 
      3. अमीर खुसरो – अमीर खुसरों क जन्म 1253 में एटार् जिले के पटियार्ली नार्मक स्थार्न में हअु ार् थार् । वे एक महार्न सूफी संत थे । वे 12 वर्ष में ही कवितार् कहने लगे थे । उन्होंने अपने प्रयार्स से ‘‘तुगलक नार्मार्’’ की रचनार् की वे महार्न सार्हित्यकार थे । वे संगीत के विशेषज्ञ थे । उन्होंने संगीत के अनेक प्रणार्लियों की रचनार् की वे संगीत के मार्ध्यम से हिन्दू मुसलमार्नों में एकतार् स्थार्पित कियार् ।

      इस प्रकार सूफी मत के भार्रत में अनके सम्पद्रार्य थे । 
      1. चिश्ती सम्प्रदार्य, 2. सुहरार्वार्दियॉं सम्प्रदार्य,
      3. कादरियार् सम्प्रदार्य, 4. नक्शबदियॉं सम्प्रदार्य,
      5. अन्य सम्प्रदार्य (शत्तार्री सम्प्रदार्य) आदि ।

      सूफी मत क प्रभार्व – 

      सूफी मत से भार्रत में हिन्दू मुस्लिम एकतार् स्थार्पित हो गयी । शार्सक एवं शार्सित वर्ग के प्रति जन कल्यार्ण के कार्यों की प्रेरणार् दी गयी । संतों ने मुस्लिम समार्ज को आध्यार्त्मिक एवं नैतिक रूप से संगठित कियार् गयार् ।

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