सुभार्ष चंद्र बोस क जीवन परिचय

सुभार्षचंद्र बोस क जन्म 23 जनवरी, 1897 ई. को उड़ीसार् में हुआ थार्। इनके पितार्
क नार्म जार्नकी नार्थ बोस थार् और मार्तार् प्रभार्वती थी। इनके पितार् वकील थे। सुभार्षचंद्र
अपने चौदह भार्ई बहनों में छठें पुत्र और नवीं संतार्न थे। इनक परिवार्र एक मध्यमवर्गीय
परिवार्र थार्। इनके मार्तार्-पितार् अनुशार्सन प्रिय थे जिसे सुभार्ष ने भी आत्मसार्त कियार्।

सुभार्ष चन्द्र बोस
सुभार्ष चन्द्र बोस 

लगभग 5 वर्ष की उम्र में सुभार्षचंद्र बोस को स्कूल भेजार् गयार् उस समय वे बहुत
खुश हुए। कटक के ही प्रोस्टेन्ट यूरोपियन मिशनरी स्कूल में सुभार्ष क दार्खिलार् करार् दियार्
गयार्। वे अपने प्रधार्नार्ध्यार्पक बेनी मार्धव दार्स से बहुत प्रभार्वित हुए। स्वार्मी विवेकानंद की
रचनार्ऐं लगभग 15 वर्ष की उम्र में पढ़ने के कारण सुभार्षचंद्र के मन में स्वार्मी विवेकानंद के
विचार्र की अमिट छार्प पड़ गई।

स्कूली शिक्षार् समार्प्त करने के पश्चार्त कलकत्ते के प्रसिद्ध प्रेसीडेन्सी कॉलेज में
उन्होंने दार्खिलार् लियार्। यह सरकारी कॉलेज थार् सार्थ इसक बहुत नार्म भी थार्। इस में सभी
प्रकार के छार्त्र पढ़ते थे। प्रेसीडेन्सी कॉलेज हिन्दू होस्टल के वाषिकोत्सव कार्यक्रम के दौरार्न
अंग्रेज अध्यक्ष मि. ओटेन से विवार्द हो गयार्। खगेन मित्रार् मनोविज्ञार्न के प्रोफेसर थे उन्होंने
इस कार्यक्रम में देशभक्ति गीत गार्ए तो मि. ओटेन ने असभ्य कह कर उनक मजार्क बनार्यार्
जिससे भार्रतीय छार्त्र क्रोधित हो गए और विरोधस्वरूप बार्हर आकर सुभार्षचंद्र बोस के नेतृत्व
में प्रार्चाय को ज्ञार्पन सौंपार् जिसमें इस बार्त की मार्ँग की गई कि ओटन मार्फी मार्ँगें और
हड़तार्ल प्रार्रंभ कर दी गई। किसी सरकारी कॉलेज में छार्त्रों द्वार्रार् हड़तार्ल बहुत बड़ी घटनार्
मार्नी जार् रही थी अंतत: मि. ओटेन को मार्फी मार्ँगनी पड़ी। ओटेन इस अपमार्न को न भूल
सके और महीने भर पश्चार्त् पुन: विवार्द हुआ। इस बार्र किसी छार्त्र ने उन्हें थप्पड़ मार्र दियार्।
घटनार् के समय सुभार्षचंद्र भी वही थे इस कारण तथार् पूर्व में हड़तार्ल भी इन्हीं के नेतृत्व में
हुई थी सो उन्हें ही दोषी मार्नकर कॉलेज से निकाल दियार् गयार्। इसके बार्द उन्हें स्काटिश
कॉलेज कलकत्तार् में दार्खिलार् मिलार् और 1919 में उन्होंने प्रथम श्रेणी में ठण्।ण् की परीक्षार् पार्स
की। सुभार्षचंद्र बोस की गतिविधियों से उनके मार्तार्-पितार् बहुत चिंतित थे और उनके भविष्य
निर्मार्ण हेतु उन्होंने सुभार्ष को इंग्लैण्ड भेजने क विचार्र कियार् तार्कि आई.सी.एस. की परीक्षार्
उत्तीर्ण कर सके।

इंग्लैण्ड गमन व I.C.S में चयन और भार्रत वार्पिसी –

अंतत: 15 सितम्बर, 1919 को सुभार्षचंद्र बोस इंग्लैण्ड रवार्नार् हो गए। उनकी इच्छार्
देशसेवार् करने की थी न कि ब्रिटिश सरकार की नौकरी। परंतु मार्तार्-पितार् की इच्छार् को
शिरोधाय कर उन्होंने इंग्लैण्ड जार्ने क मन बनार् लियार्। इंग्लैण्ड क खुलार् वार्तार्वरण
सुभार्षचंद्र को बहुत रार्स आयार् उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यार्लय में दार्खिलार् लियार् सुभार्षचंद्र का
मन अभी देश सेवार् के लिए ही तड़प रहार् थार्। I.C.S की परीक्षार् में जुटने के सार्थ-सार्थ
भार्रत की दुर्दशार् पर सुभार्ष क मन रोतार्। सुभार्षचंद्र बोस को आई.सी.एस. की परीक्षार् की
तैयार्री हेतु केवल 8 मार्ह क समय मिलार् परंतु अपनी प्रतिभार् के दम पर कम समय में ही उन्हें
चौथार् स्थार्न प्रार्प्त हुआ। सबसे पहले उन्होंने अपने मार्तार्-पितार् को यह सूचनार् दी।

उल्लेखनीय है कि यह फैसलार् स्वयं सुभार्ष क नहीं थार् अत: वे प्रसन्न नहीं थे। पुन: उनके
मन में उथल-पुथल चल रही थी अब किस विकल्प को चुनार् जार्ए। यह फैसलार् अत्यंत
महत्वपूर्ण भी थार्। ब्रिटिश सरकार की नौकरी करें यार् देश सेवार् जिसक स्वप्न बचपन से ही
सुभार्षचंद्र के मन में बसार् थार्। कई तरह से पार्रिवार्रिक, ऐशो आरार्म की जिंदगी आदि का
दबार्व बनार्यार् गयार् परंतु सभी प्रयार्स असफल रहे और अंतत: सुभार्षचंद्र बोस ने I.C.S से
त्यार्गपत्र देकर भार्रत आने क निर्णय कियार्।

1921 में सुभार्षचंद्र बोस ने त्यार्गपत्र देकर भार्रत आने क फैसलार् कियार्। भार्रत आने
से पूर्व उन्होंने देशबंधु चितरंजन दार्स से संपर्क कियार्। इस प्रकार अब भार्रत में आकर
उन्होंने रार्ष्ट्र सेवार् क मन बनार् लियार् और इस तरह भार्रतीय रार्जनीति में आने की उनकी
भूमिक तैयार्र हो गई।

सुभार्षचन्द्र बोस क भार्रतीय रार्जनीति में प्रवेश 

मुंबई आगमन व गार्ँधी जी से भेंट –

सुभार्षचंद्र बोस विदेश में रहते हुए भी स्वदेश की तत्कालीन रार्जनैतिक उथल-पुथल
से अनभिज्ञ न थे। उनक मन-मस्तिष्क हर समय देश की समस्यार्ओं के प्रति जार्गरूक और
उत्सुक बनार् रहतार् थार्। अंतत: I.C.S की परीक्षार् में सफलतार् के पश्चार्त त्यार्गपत्र दे देनार्
देशप्रेम व मार्तृभूमि के प्रति अपने कर्तव्य पार्लन क अद्वितीय उदार्हरण थार्। I.C.S में चयन
के बार्द उन्हें भार्रतीय रार्जनीति में प्रवेश करनार् थार्। इसी दौरार्न वे भार्रत वार्पिस आ गए।
रार्जनीतिक प्रवेश से पूर्व संपूर्ण भार्रतीय रार्जनीति की जार्नकारी अर्जित करनार् आवश्यक थार्
इसके लिए उन्होंने विभिन्न भार्रतीय नेतार्ओं से संपर्क करने क निश्चय कियार्। उस समय
भार्रतीय रार्जनीति के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति थे महार्त्मार् गार्ँधी। अत: उन्होंने सबसे पहले
उन्हीं से मिलनार् उचित समझार्।

16 जुलार्ई, 1921 को सुभार्षचंद्र बोस बंबई पहुँचे। इसी दिन उन्होंने महार्त्मार् गार्ँधी से
मुलार्कात की। वे गार्ँधी जी के विचार्रों से अवगत होनार् चार्हते थे। अपनी पहली मुलार्कात पर
बोस ने कुछ इस तरह विचार्र व्यक्त किए हैं। “मुझे बस दोपहर की अच्छी तरह यार्द है जब
मैं गार्ँधी जी से मिलने मणि भवन गयार्, जहार्ँ वह बंबई आने पर सदैव ठहरते थे। जिस कमरे
में वह बैठे थे उसमें फर्श पर कालीन बिछी हुई थी और गार्ँधी जी दरवार्जे की ओर अपनार्
मुख किये अनेक शिष्यों के सार्थ कमरे के बीच में बैठे हुए थे। कमरे में खार्दी से बने सार्मार्न
थे। मैं जब कमरे में घुसार् तो मुझे इस बार्त से बड़ी ग्लार्नि हुई कि मैं विदेशी वस्त्र पहने हुए
हूँ। इसके लिए मैं स्वयं अपने को क्षमार् नहीं कर सकतार् थार्। गार्ँधी जी ने मुस्कान के सार्थ
मेरार् स्वार्गत कियार् और मुझे बैठने को कहार्। उन्होंने मुझसे बार्त की मैंने उनसे भार्रत में विदेशी
प्रभुत्व समार्प्त करने की योजनार् के बार्रे में पूछार् और कहार् कि इस संबंध में वे कौन सार् रार्स्तार्
अपनार्येंगे। मैंने प्रश्नों की झड़ी लगार् दी पर उन्होंने बड़े धैर्य के सार्थ मेरे प्रत्येक प्रश्न का
उत्तर दियार्।”

महार्त्मार् गार्ंधी ने सुभार्षचंद्र बोस के सभी प्रश्नों क उत्तर दियार् परंतु बोस संतुष्ट न
हो सके। उस समय महार्त्मार् गार्ंधी क असहयोग आंदोलन संपूर्ण वेग पर थार्। असहयोग
आंदोलन से संबंधित प्रश्न भी उन्होंने पूछे किस प्रकार वे एक वर्ष में स्वरार्ज दिलार् देंगे आदि
प्रश्नों के उत्तर उन्होंने चार्हे गार्ंधी जी के जबार्बों से वे संतुष्ट न हो सके। उल्लेखनीय है
कि सुभार्षचंद्र बोस ने भार्रत में और विदेश में रहते हुए क्रार्ंतिकारियों के विचार्रों को पढ़ार्,
क्रार्ंतिकारी आंदोलनों, उनके कार्य कार्य प्रणार्ली, और विचार्रों क अध्ययन कियार्। वैसे भी
सुभार्षचंद्र बोस क झुकाव अहिंसार् की नीति में नहीं थार् अत: स्वार्भार्विक है कि वे अहिंसार् के
पुजार्री के जबार्वों से असंतुष्ट रहे। बोस ने अपनी आत्मकथार् The Indian Struggle में
लिखार् है जिस समय वे गार्ंधी जी से मिले उस समय उनकी आयु 24 वर्ष थी और गार्ंधी जी
52 वर्ष के थे लगभग 28 वर्ष क भार्री अंतर भी थार्। सुभार्षचंद्र क मार्ननार् थार् कि स्वयं
गार्ंधी जी के मन में अपने ही कार्यक्रम की कोई स्पष्ट रूपरेखार् नहीं थी। गार्ंधी जी भी यह
बार्त भार्ंप गए कि बोस उनसे संतुष्ट नहीं है अत: उन्होंने सुभार्षचंद से देशबंधु चितरंजन दार्स
से भेट करने कि सलार्ह दी।

देशबंधु चितरंजन दार्स से भेंट व रार्जनीतिक गुरू बनार्नार् –

उल्लेखनीय है कि सुभार्षचंद्र कॉलेज के विवार्द के समय भी चितरंजन दार्स से मिल
चुके थे। उन्होंने इग्लैण्ड से भी उन्हें पत्र I.C.S से त्यार्गपत्र देने की बार्त से अवगत करार्
कर भार्रत आने पर कार्य करने कि इच्छार् प्रकट की थी। देशबंधु ने सुभार्षचंद्र को यह
आश्वार्सन भी दियार् थार् कि उन्हें भार्रत आने पर काम की कमी नहीं होगी। सुभार्षचंद्र बोस
ने यह समार्चार्र भी सुन रखार् थार् कि देशबंधु ने अपनी चलती वकालत छोड़कर अपनार् सार्रार्
समय व जीवन देश के नार्म कर दियार् है और अपनी सार्री संपत्ति उन्होंने रार्ष्ट्र के नार्म कर
दी। इससे बोस बहुत प्रभार्वित हुए। सुभार्षचंद्र जब देशबंधु चितरंजन से मिलने पहुंचे तो
उनसे भेंट न हो सकी परंतु उनकी पत्नी वार्संती देवी से मिल कर उनके व्यवहार्र से बहुत
प्रभार्वित हुई जिस क वर्णन सुभार्षचंद्र ने कुछ इस तरह से कियार् “यह वह मि. दार्स नहीं
थे, जिनके पार्स मैं परार्मर्श के लिए तब गयार् थार् जब वे कलकत्तार् के बैरिस्टर थे और मैं
रार्जनीतिक कारणों से कॉलेज से बहिष्कृत एक छार्त्र। यह वह मि. दार्स नहीं थे जो दिन भर
में हजार्रों रूपये लुटार्ते और घंटों में हजार्रों रूपये कमार्ते थे। हार्लार्ंकि यह वहीं मि. दार्स थे
जो सदार् ही युवार्ओं के मित्र बने रहे, उनकी आकाक्षार्ंओं और तकलीफों को समझते रहे और
उनके प्रति हमदर्दी से पेश आते रहे। उनके सार्थ वातार् के क्रम में मुझे यह एहसार्स होने लगार्
थार् कि ये एक ऐसे इंसार्न हैं जिन्हें अपनार् मकसद बखूबी मार्लूम थार्, जो अपनार् सर्वस्व अर्पण
कर सकते थे और दूसरों से भी अपनार् सब कुछ मार्ंग सकते थे। जब हमार्री बार्तचीत समार्प्त
हुई तो मेरार् मन तैयार्र हो चुक थार्। मुझे ऐसार् महसूस हुआ कि जैसे मुझे वह आदमी मिल
गयार् जिसे में अपनार् नेतार् मार्न सकतार् हू। मैंने उनक अनुसार्रण करने क पक्क इरार्दार् बनार्
लियार्।”

इस तरह चिरंजन दार्स से मिलने पर सुभार्षचंद्र को अपनार् रार्स्तार् मिल गयार् जिस पर
चल कर उन्हें आजार्दी क रार्स्तार् तय करनार् थार्। अब यह निश्चित हो गयार् थार् कि रार्जनीति
में वे गार्ंधीवार्दी विचार्र धार्रार् के अनुरूप कार्य न करके क्रार्ंतिकारी रार्स्तार् ही अपनार्येंगे। अपने
विचार्रों को कार्यरूप में परिणित करने हेतु भार्रतीय रार्ष्ट्रीय कांग्रेस में प्रवेश हेतु अध्ययन प्रार्रंभ
कियार्।

कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में सुभार्षचन्द्र बोस

कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में हरिपुरुरार् अधिवेशन 1938 ई. और
त्रिपुरुरी अधिवेशन 1939 ई.

सुभार्षचन्द्र बोस के विचार्रों से युवार् वर्ग बहुत प्रभार्वित होतार् जार् रहार् थार्। गैर
समझौतार्वार्दी नेतार् के रूप में वे प्रसिद्ध होते गए। अपने कार्यों को करने के लिए उन्होंने
कांग्रेस अध्यक्ष पद स्वीकार कियार्। इस समय सुभार्षचन्द्र बोस ने अध्यक्ष पद सुशोभित कियार्।
इस समय सुभार्षचंद्र के विचार्र परिपक्व हो चुके थे और कांग्रेस के मंच पर पहुंच चुके थे।
28 जनवरी, 1938 को कांग्रेस के महार्मंत्री जे.बी. कृपलार्नी ने घोषणार् की कि सुभार्षचंद्र
कांग्रेस के 51 वें अधिवेशन के अध्यक्ष निर्वार्चित किए गए हैं। यह अधिवेशन गुजरार्त के
हरिपुरार् में संपन्न हुआ। यह अधिवेशन 1938 में हुआ। सुभार्षचंद्र ने अपने अध्यक्षीय भार्षण में देश के शहीदों को श्रद्धार्ंजलि दी और इस बार्त पर बल दियार् कि कोई भी सार्म्रार्ज्य स्थार्यी
नहीं है। रोमन, तुर्की, आस्ट्रियार्, हंगरी आदि सार्म्रार्ज्य पश्चिम के महार्न सार्म्रार्ज्य थे लेकिन वे
भी नहीं रहे। इसी तरह स्वयं भार्रत में शक्तिशार्ली मौर्य, गुप्त और मुगल सार्म्रार्ज्य धूल में मिल
गए। अत: यह निश्चित है कि ब्रिटिश सार्म्रार्ज्य क अंत भी होगार्।

सुभार्षचंद्र बोस क मार्ननार् थार् कि ब्रिटिश सरकार पर मुसीबत के समय हमलार् करनार्
चार्हिए और ब्रिटिश सरकार के शत्रुओं को अपनार् मित्र मार्ननार् चार्हिए। उन्होंने यह भी कहार्
कि “अगर हम किसी और समय लड़ार्ई प्रार्रंभ करेंगे तो ब्रिटिश सार्म्रार्ज्यवार्द आंदोलन के दमन
के लिए अपनी सार्री सैनिक तार्कत झौंक देगार्। मगर अभी चूंकि वह विभिन्न मोर्चों पर उलझार्
हुआ है, इसलिए वह ऐसार् नहीं कर पार्येगार्। शत्रु जब कमजोर हो, तभी उस पर हमलार् कर
उसे परार्जित करनार् आसार्न होतार् है।” सुभार्षचंद्र के अध्यक्ष बनने से गार्ंधीवार्दी चिंतित थें
दूसरी ओर सुभार्षचंद्र बोस पुन: अध्यक्ष बननार् चार्हते थे सार्थ ही युवार् वर्ग व अन्य नेतार्ओं का
भी मत थार् कि सुभार्ष चंद्र पुन: अध्यक्ष पद पर आसीन हों। सुभार्षचंद्र बोस को परार्जित करने
हेतु दूसरे उम्मीदवार्र को खड़ार् कियार् गयार्।

21 जनवरी, 1939 को अपनी उम्मीदवार्री घोषित करते हुए उन्होंने कहार् कि वे नए
विचार्रों और नई विचार्रधार्रार्ओं क प्रतिनिधित्व करते हैं तथार् उन समस्यार्ओं और कार्यक्रमों का
भी, जिनक आविर्भार्व भार्रत में सार्म्रार्ज्यवार्द-विरोधी संघर्ष के क्रमश: तेज होने से हुआ है।
उल्लेखनीय है कि पट्टार्भिसीतार् रमैयार् क नार्मार्ंकन बगैर उनकी जार्नकारी में हुआ।
पट्टार्भिसीतार् रमैयार् महार्त्मार् गार्ंधी के उम्मीदवार्र थे। सरदार्र वल्लभ भार्ई पटेल और रार्जेन्द्र
प्रसार्द जैसे कई नेतार्ओं ने सुभार्षचंद्र को अपनार् नार्म वार्पिस लेने को भी कहार् परंतु बोस
अपने विचार्र पर दृढ़ रहे। सुभार्षचंद्र बोस 1377 के मुकाबले 1580 मतों से जीत गए। समस्त
गार्ंधी वार्दियों में निरार्शार् छार् गई दूसरी ओर सुभार्षचंद्र बोस के पक्ष मे खुशियार्ं क मार्हौल बन
गयार्। महार्त्मार् गार्ंधी ने डॉ. पट्टार्भिसीतार् रमैयार् की हार्र को अपनी हार्र मार्नार्। इस समय
गार्ंधी जी और बोस के मध्य मतभेद बनार् रहार्। इन सब के बार्द भी सुभार्षचंद्र ने बयार्न दियार्
कि “गुलार्मी और गरीबी ये दोनों आज देश के समक्ष मुख्य समस्यार् के रूप में हैं। अब गुलार्मी
की बेड़ियार्ं टूटेंगीं और उसके स्थार्न पर स्वार्धीनतार् की बुनियार्द क निर्मार्ण होगार्। रार्जनीतिक
स्वरार्ज के सार्थ-सार्थ हमें आर्थिक स्वरार्ज भी चार्हिए।”

गार्ँधीवार्दियों से मतभेद और पंत प्रस्स्तार्व –

सुभार्षचंद्र क विरोध लगार्तार्र बढ़तार् ही जार् रहार् थार्। गार्ँधीवार्दी किसी तरह से बोस
क सहयोग नहीं कर रहे थे जबकि सुभार्षचंद्र चुनार्व तो जनतार् के सहयोग से ही जीते परंतु
उन्हें अपनी नीतियों को कार्य रूप में करने के लिए किसी भी प्रकार क सहयोग नहीं मिल
रहार् थार्। सुभार्षचंद्र ने कांग्रेस के वाषिक अधिवेशन में यह प्रस्तार्व रखार् कि भार्रतीय रार्ष्ट्रीय
कांग्रेस को छ: महीने के भीतर स्वतंत्रतार् की मार्ँग करते हुए सरकार को एक अल्टीमेटम
भेजनार् चार्हिए व संघर्ष हेतु तैयार्री भी प्रार्रंभ करनी चार्हिए। लेकिन गार्ँधीवार्दियों ने इसका
प्रबल विरोध कियार् और इसे अस्वीकार दियार्।

इसी दौरार्न गार्ँधीवार्दियों ने पंत प्रस्तार्व पार्रित कियार्। कांग्रेस के संविधार्न के अनुसार्र
कार्यसमिति के सदस्यों के मनोनयन क अधिकार एकमार्त्र निर्वार्चित अध्यक्ष को ही थार्। मगर
इस अधिवेशन में गोविन्द वल्लभ पंत ने यह प्रस्तार्व पेश कियार् कि कांग्रेस क अध्यक्ष चार्हे
कोई भी हो, कार्यसमिति के मनोनयन से पहले उन्हें गार्ँधी जी की अनुमति लेनी होगी। दूसरे
शब्दों में, चार्हे अध्यक्ष कोई भी हो, कार्यसमिति गार्ँधीवार्दियों के ही कब्जे में होगी।
अंतत: ‘पंत प्रस्तार्व’ पार्रित हो गयार्। अब सुभार्षचंद्र बोस के समक्ष दो ही माग थे यार्
तो वे गार्ँधीवार्दियों की कठपुतली बन कर कार्य करें यार् फिर अपने सिद्धार्ंतों पर दृढ़ रहते हुए
अध्यक्ष पद से इस्तीफार् दे दें।

कांग्रेस अध्यक्ष पद से त्यार्गपत्र और फॉरवर्ड ब्लार्क की स्थार्पनार् 

गार्ंधीवार्दियों क असहयोग, अस्वस्थतार् व त्यार्ग-पत्र –

इस प्रकार दृष्टिगोचर होतार् है कि सुभार्षचंद्र बोस को अपने सिद्धार्ंतों से समझौतार्
करने के लिए बार्ध्य कियार् जार् रहार् थार्, परंतु सुभार्ष जैसे व्यक्तित्व हिमार्लय कि भार्ंति होते
हैं जिन्हें अनैतिक तरीके से झुकायार् नहीं जार् सकतार्। स्वार्भार्विक रूप से सुभार्षचंद्र को दूसरार्
रार्स्तार् अर्थार्त् कठपुतली अध्यक्ष कि अपेक्षार् त्यार्ग-पत्र देनार् अधिक उचित प्रतीत हुआ और
अंतत: उन्होंने इस्तीफार् दे दियार्। सुभार्षचंद्र बोस यदि चार्हते तो अध्यक्ष पद कि लार्लसार् में
देश सेवार् को अनदेखार् कर सकते थे, परंतु रार्ष्ट्र सेवार् से बढ़ कर उनके लिए कुछ नहीं थार्।
सुभार्षचंद्र बोस ने कहार् कि “त्रिपुरी में वार्कई हमार्री हार्र हुई थी। परंतु यह बार्रह
प्रभार्वशार्ली व पुरार्ने नेतार्ओं, सार्त प्रार्ंतीय मंत्रियों, जवार्हर लार्ल नेहरू और महार्त्मार् गार्ंधी के
नार्म प्रभार्व और प्रतिष्ठार् के खिलार्फ बिस्तर पर पड़े एक अकेलार् बीमार्र व्यक्ति क संघर्ष थार्।”
उल्लेखनीय है कि उस समय बोस तीव्र ज्वर से पीड़ित थे। बोस ने बार्र-बार्र गार्ंधी जी से
अनुरोध भी कियार् कि इस संकट में हस्तक्षेप कर इसे समार्प्त करें, परंतु उन्होंने किसी प्रकार
की बार्त नहीं सुनी।

देश सेवार् के लिए फॉरवर्ड ब्लार्क की स्थार्पनार् –

गार्ंधीवार्दियों कि अटकलों से बोस को लगने लगार् कि कांग्रेस से अधिक उम्मीद
करनार् अब ठीक नहीं होगार्। इसलिए कांग्रेस के अंदर सभी वार्मपंथी तार्कतों को एकजुट
करने के मकसद से सुभार्षचंद्र ने कांग्रेस के अंदर एक और प्रगतिशील एवं क्रार्ंतिकारी पाटी
तैयार्र करने के बार्रे में सोचार्। इस तरह ‘फॉरवर्ड ब्लार्क’ की स्थार्पनार् हुई। इस नये संगठन
के निर्मार्ण के पश्चार्त् सुभार्ष ने अंग्रेजों के विरूद्ध एक समझौतार्हीन आंदोलन चलार्ने का
आहवार्न कियार्। फलस्वरूप उन पर अनुशार्सन भंग करने क आरोप लगार्यार् गयार् और उन्हें
छ: वर्षों के लिए निलंबित कर दियार् गयार्। अजीब बार्त तो यह रही कि कांग्रेस में सुभार्ष का
अध्यक्ष पद पर चुनार्व ही इसलिए हुआ थार् कि वे अंग्रेजों के खिलार्फ संघर्ष को नेतृत्व प्रदार्न
कर सकें आज उसी कांग्रेस से उन्हें उसी संघर्ष को तेज करने के ‘अपरार्ध’ में निकालार् जार्
रहार् है।

एक बार्त उल्लेखनीय है कि सुभार्षचंद्र बोस क व्यक्तित्व विपरीत परिस्थितियों में
विचलित नहीं हुआ बल्कि इस संघर्ष ने उन्हें और मजबूत बनार् दियार्। तमार्म किस्म के दबार्व,
द्वन्द और विरोध के बीच एक निडर, निभ्र्ार्ीक और अदम्य व्यक्तित्व के रूप में उनक चरित्र
और व्यक्तित्व खिल उठार्। उन्होंने स्वयं कहार् है, “अध्यक्ष पद क चुनार्व और उसक परिणार्म
यद्यपि दुर्भार्ग्यपूर्ण थार् पर इससे मेरी रार्जनीतिक चेतनार् को तेज होने में काफी मदद मिली।
आगे बढ़ने के लिए आखिरकार यह एक प्रेरणार् स्त्रोत के रूप में ही सिद्ध हुआ।”

इस प्रकार सुभार्षचंद्र बोस के लिए कांग्रेस अध्यक्ष पद कांटों के तार्ज के समार्न रहार्।
गार्ंधीवार्दियों के असहयोग के कारण उन्हें कार्य करने में कई मुश्किलों क सार्मनार् करनार् पड़
रहार् थार्। ऐसी स्थिति में गतिरोध से रार्ष्ट्र क भी अहित ही हो रहार् थार्। और ब्रिटिश सरकार
पुन: हमार्री फूट क लार्भ उठार्ने को तैयार्र थी। अत: सुभार्ष चंद्र बोस ने अध्यक्ष पद से
त्यार्गपत्र देकर कुछ हद तक गतिरोध दूर करने क प्रयत्न कियार्। सुभार्षचंद्र बोस ने समस्त
असहयोगियों की मदद से फॉरवर्ड ब्लार्क की स्थार्पनार् की और देश की आजार्दी के लिए
प्रयार्स करने लगे।

सुभार्षचन्द्र बोस व आई.एन.ए.

सुभार्षचन्द्र बोस द्वार्रार् भार्रत छोड़नार् –

सुभार्षचंद्र बोस क मार्ननार् थार् कि यदि आजार्दी प्रार्प्ति हेतु विदेशी सहार्यतार् की
आवश्यकतार् पड़े तो बिनार् संकोच विदेशी मदद लेनी चार्हिए चार्हे वह मदद ऋण के रूप में
ही क्यों न हो। सुभार्षचंद्र बोस कि गतिविधियों से ब्रिटिश सरकार अत्यंत भयभीत रहती थी
इसी कारण उनकी प्रत्येक गतिविधि पर सरकार कि पैनी दृष्टि रहती थी। कांग्रेस का
अधिवेशन रार्यगढ़ में हुआ। सुभार्षचंद्र ने ‘समझौतार् विरोधी सम्मेलन’ क आयोजन कियार्।
इससे कांग्रेस के नेतार् और असंतुष्ट हो गए। द्वितीय विश्व युद्ध के बार्दल घिर चुके थे।
महार्त्मार् गार्ंधी व्यक्तिगत सत्यार्ग्रह प्रार्रंभ करने पर विचार्र कर रहे थे। दूसरी तरफ सुभार्षचंद्र
बोस ने बंगार्ली जनतार् को हार्लवेल-स्मार्रक को हटार् देने एवं सार्मूहिक आंदोलन प्रार्रंभ करने
के लिए एकजुट कर लियार् थार्। ब्रिटिश सरकार को समझते देर नहीं लगी कि सुभार्षचंद्र
किसी तूफार्न की तैयार्री कर रहे हैं। इस कारण उन्हें जेल में डार्लनार् ही उचित थार्।
सुभार्षचंद्र जेल में रहकर नहीं जीनार् चार्हते थे अत: उन्होंने अनशन प्रार्रंभ कर दियार् और उन्हें
रिहार् कर दियार् गयार्। परंतु उनके घर पर सरकार की कड़ी निगरार्नी थी। लेकिन फिर भी
वे भार्गने में सफल रहे।

सुभार्षचंद्र बोस द्वार्रार् उपवार्स प्रार्रंभ किए जार्ने के कारण उनकी हार्लत खरार्ब होती
जार् रही थी। सरकार को भय थार् कि सुभार्षचंद्र बोस को यदि कुछ हो गयार् तो भार्रतीय
जनतार् को काबू करनार् कठिन हो जार्येगार् और सरकार के लिए यह खतरनार्क सार्बित हो
सकतार् है। अत: 1940 में उन्हें जेल से रिहार् कर दियार् गयार्। वे कलकत्तार् में अपने पूर्वजों
के मकान में ही रहने लगे। सरकार उन पर नजर रखे हुए थी परंतु पठार्न क वेश बनार् कर
वे भार्ग गए। सुभार्षचंद्र को घर से भार्गने में सहार्यतार् उनके भतीजे शिशिर कुमार्र बोस ने की
थी। बोस कि कलकत्ते से बर्लिन तक की यार्त्रार् महत्वपूर्ण थी। इस घटनार् की तुलनार् हम
शिवार्जी द्वार्रार् औरंगजेब की कैद से भार्ग निकलने से कर सकते हैं। दार्ढ़ी बड़ी करके
सुभार्षचंद्र कभी बस तो कभी रेल यार्त्रार् करते हुए पेशार्वर पहुंच गए। दार्ढ़ी ने पुलिस की
आंखों में खूब धूल झोंकी और पठार्न जियार्उद्दीन के वेश में उन्होंने एक काफिले के सार्थ
सीमार् पार्र की और काबुल पहुंच गए। अंत में एक व्यक्ति के पार्सपोर्ट क उपयोग करके
सुभार्षचंद्र जर्मनी पहुंच गए।

सुभार्ष द्वार्रार् INA क नेतृत्व संभार्लनार् –

जून, 1943 में सुभार्षचंद्र टोकियो आ गये। 4 जुलार्ई को श्री रार्सबिहार्री बोस ने
सविधि उन्हें ‘आजार्द हिंद फौज’ क सेनार्पति बनार् दियार्। इसके पश्चार्त् सुभार्ष की अद्भुत
संगठन शक्ति को सार्रे विश्व ने सरार्हार्। वस्तुत: आजार्द हिंद फौज क गठन 1941 में प्रसिद्ध
क्रार्ंतिकारी रार्स बिहार्री बोस ने कियार् थार्। सुभार्षचंद्र बोस ने आजार्द हिंद फौज को संगठित
कर दिल्ली चलो क नार्रार् दियार्। सुभार्ष बिग्रेड, गार्ंधी ब्रिगेड, नेहरू ब्रिगेड और आजार्द
ब्रिगेड- इस प्रकार चार्र ब्रिगेडों में सेनार् क वितरण कियार् गयार् थार्। कैप्टन लक्ष्मी सहगल की
देख-रेख में महिलार्ओं की अलग ‘झार्ंसी रार्नी रेजीमेंट’ क गठन कियार् गयार्। सुभार्षचंद्र बोस
ने ‘दिल्ली चलो’ और ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजार्दी दूंगार्’ क नार्रार् दियार्। सुभार्ष की
अदुभुत नेतृत्व क्षमतार् से INA सुसज्जित हो गई थी।

स्वार्धीनतार् आंदोलन में आई.एन.ए. की भूमिक

आई.एन.ए. की कार्यवार्ही –

सुभार्षचंद्र बोस मे लोगों को संगठित करने की विशेष क्षमतार् थी। इसक परिचय
आई.एन.ए. को संगठित करने में मिलतार् है। आजार्द हिंद सेनार् में अधिकांश वे सैनिक शार्मिल
थे जो ब्रिटिश सेनार् के सदस्य थे और जिन्हें जार्पार्नियों ने परार्जित करके बंदी बनार् लियार् थार्।
ब्रिटिश सेनार् से लड़ने के लिए जार्पार्न सरकार ने इन भार्रतीय सैनिकों को स्वतंत्र करके उन्हें
ब्रिटिश विरोधी संगठन बनार्ने की अनुमति दे दी थी। सैनिक दृष्टि से कुशल न होने के
बार्वजूद सुभार्षचंद्र बोस के प्रभार्वशार्ली व्यक्तित्व, संगठन क्षमतार् एवं ओजस्वी भार्षण से प्रेरित
होकर आजार्द हिंद फौज के सैनिकों ने अंग्रेजों के खिलार्फ बहार्दुरी से लड़ार्ई लड़ी। ये
सैनिक वर्मार् को विजित करते हुए असम तक पहुंच गये। उन्होंने मणिपुर को भी अपने प्रभार्व
में ले लियार्। अण्डमार्न-निकोबार्र द्वीप भी स्वतंत्र किए जार् चुके थे। अण्डमार्न द्वीप क नार्म
‘शहीद द्वीप’ व निकोबार्र द्वीप क नार्म ‘स्वरार्ज द्वीप’ रखार् गयार्। 21 अक्टूबर, 1943 को
सुभार्षचंद्र बोस ने सिंगार्पुर में आजार्द भार्रत की अस्थार्ई सरकार की घोषणार् कर दी। जार्पार्न,
जर्मनी, इटली, चीन आदि विभिन्न सरकारों ने आजार्द हिंद सरकार की स्वतंत्र सत्तार् को
एकमत से स्वीकार कर लियार्। आजार्द हिंद सेनार् के सैनिक स्वयं को हिन्दू-मुस्लिम,
सिख-ईसार्ई नहीं मार्नते थे बल्कि स्वयं को भार्रतीय मार्नकर कार्य कर रहे थे। आजार्द हिंद
सेनार् के पार्स सार्धनों की कमी थी हौसले की नहीं। सुभार्षचंद्र बोस भार्षणों द्वार्रार् धन एकत्र
करते उपहार्र में आई चीजों को नीलार्म करके जो धन प्रार्प्त होतार् उसे आजार्द हिंद सेनार् पर
खर्च करते। वस्तुत: यह पर्यार्प्त नहीं होतार् थार्।

सुभार्षचंद्र बोस सेनार् में उत्सार्ह भर देते थे। आपस में अभिवार्दन के लिए वे एक
दूसरे से ‘जय हिंद’ क प्रयोग करते। जिससे रार्ष्ट्रीय भार्वनार् क प्रचार्र बढ़तार्। सेनार् में नवीन
उत्सार्ह क संचार्र होतार्। सुभार्षचंद्र बोस ने ‘दिल्ली चलो’ ‘तुम मुझे खून दो में तुम्हें आजार्दी
दूंगार्’ ‘जय हिंद’ क नार्रार् दियार्। आजार्द हिंद सेनार् ने सुभार्षचंद्र बोस के अनेक ऐसे गुणों
पर भी प्रकाश डार्लार् है जो अब तक छिपे ही रहते। उनकी संगठन शक्ति क ऐसार् परिचय
पहले कभी नहीं मिलार् थार् उनके द्वार्रार् 18-18 घंटे तक निरंतर काम करने की क्षमतार् क ज्ञार्न
भी सबको न हो पार्यार् थार्। यह बार्त सत्य है कि यदि सुभार्षचंद्र को आजार्द हिंद फौज का
नेतृत्व करने क अवसर प्रार्प्त न होतार् तो उनके व्यक्तित्व के विशिष्ट पहलू से हम अनभिज्ञ
ही रहते।

आई.एन.ए. की हार्र व सुभार्षचन्द्र बोस की मृत्यु 

आजार्द हिंद फौज की वीरतार् को कम नहीं कहार् जार् सकतार् क्योंकि जिन परिस्थितियों
में उसने कार्य कियार् उनक प्रयार्स सरार्हनीय थार्। आजार्द हिंद फौज की प्रार्संगिकतार् और
उसकी कार्यप्रणार्ली तथार् सफलतार्, असफलतार्ओं पर विभिन्न मत प्रकट किये गए हैं।
इतिहार्सकार सुमित सरकार के अनुसार्र ‘केवल सैन्य दृष्टि से तो आजार्द हिंद फौज का
महत्व अधिक नहीं रहार् और यदि वह अधिक प्रभार्वी रही भी होती तो उसक आगमन बहुत
देर से हुआ थार्, क्योंकि 1944 तक धुरी शक्तियार्ं सर्वत्र पीछे हटने लगी थी।’ इतिहार्सकार
तार्रार्चंद्र ने आजार्द हिंद फौज के महत्व पर कई प्रकार से प्रकाश डार्ल है उनके अनुसार्र
-”भार्रत क प्रबल ब्रिटिश सार्म्रार्ज्य के संकुचित दार्यरे से निकल कर अंतरार्ष्ट्रीय रार्जनीति
के विस्तृत क्षेत्र में चलार् गयार्।” आजार्द हिंद फौज के कार्यों को सदैव इतिहार्स में विशिष्ट
स्थार्न प्रार्प्त रहेगार्। जिस प्रकार आजार्द हिंद सेनार् क प्रयार्स रहार् संभवत: वैसार् प्रयार्स दूसरार्
दृष्टिगोचर नहीं होतार् है।

वस्तुत: हमें दृष्टिगोचर होतार् है कि लगार्तार्र विपरीत परिस्थितियों में कार्य करते हुए
भी आजार्द हिंद फौज प्रयार्सरत थी परंतु जार्पार्नी सेनार् के पीछे हटने से आजार्द हिंद फौज
को भी पीछे हटनार् पड़ार् और उनक प्रयार्स असफल हो गयार्। सुभार्ष चंद्र बोस और आजार्द
हिंद फौज के प्रयार्सों को सफलतार्-असफलतार् से जोड़ कर देनार् अनुचित होगार्। सेनार् के
सार्मने कई तरह कि दिक्कतें थीं जिससे निश्चित रूप में उनक कार्य व प्रयार्स प्रभार्वित
हुआ। एक तरफ सार्धनों से सुसज्जित सेनार् थी तो दूसरी ओर सार्धनहीन सैनिक। आजार्द
हिंद सेनार् के पार्स धन, परिवहन, चिकित्सार्, हथयार्रों, बंदूकों, तोपखार्नों आदि की कमी थी।
रसद संबंधी परेशार्नियों से भी दो चार्र होनार् पड़ार्। इतिहार्सकार तार्रार्चंद ने इस बार्त पर
प्रकाश डार्लते हुए कहार् “आजार्द हिंद फौज के पार्स न तो वार्युयार्न थार् न तोपखार्नार् थार्
उसके पार्स मोर्टर अर्थार्त् छोटी बंदूक भी नहीं थी जिनसे बड़े गोले फेंके जार् सकें। इसकी
मशीनगनें मध्यम आकार की थी और उनकी मरम्मत के लिए अतिरिक्त पुर्जे नहीं थे। अत्यंत
आवश्यक संचार्र व्यवस्थार् के सार्धन नहीं थे और चिकित्सार् की सुविधार्यें भी नहीं थे।” अत्यन्त
आवश्यक संचार्र व्यवस्थार् के सार्धन नहीं थे और चिकित्सार् की सुविधार्यें भी नहीं थी। “इस
प्रकार आजार्द हिंद सेनार् के पार्स देश भक्ति और देश पर मर मिटने क हौसलार् थार् परंतु युद्ध
में विजय श्री क वरण करने के लिए केवल इतनार् ही काफी नहीं थार्।”

सुभार्षचंद्र बोस और आजार्द हिंद फौज के संघर्ष को भुलार्यार् नहीं जार् सकतार्। संघर्ष
करने क जो मनोवैज्ञार्निक असर आजार्द हिंद फौज ने छोड़ार् उसक प्रभार्व स्पष्ट रूप से
विपरीत से विपरीत समय में धैर्य रखकर कार्य करनार् अपने लक्ष्य में सफलतार् प्रार्प्ति तक
प्रयार्स करने की प्रेरणार् हमें देतार् है। आजार्द हिंद फौज और सुभार्षचंद्र बोस के प्रयार्सों की
प्रशंसार् उनके आलोचक भी करते हैं। जार्पार्नी सेनार् के पीछे हटने के कारण आजार्द हिंद
सेनार् भी पीछे हटने लगी व उसकी परार्जय हुई। ऐसी स्थिति में सुभार्षचंद्र बोस ने स्थार्न
छोड़ने क निर्णय कियार्।

आजार्द हिंद सेनार् की शौर्य गार्थार् समार्प्ति पर थी कि अचार्नक सबको चौक देने
वार्ली बार्त सार्मने आई। सिंगार्पुर से जार्पार्न जार्ते हुए 18 अगस्त, 1945 को फार्रमोसार् में
विमार्न दुर्घटनार् में उनकी मृत्यु हो गयी। बोस की मृत्यु पर किसी को विश्वार्स नहीं हुआ। यह
सब इतनी तीव्र गति से हुआ कि अकल्पनीय ही थार्। भार्रतीय जनतार् अपने प्यार्रे नेतार् के
विषय में ऐसी खबर सुन कर विसमित थी।

सुभार्षचंद्र बोस की मृत्यु किस प्रकार हुई इस विषय पर जार्नकारी मिली कि बोस को
हवार्ई जहार्ज द्वार्रार् मंचूरियार् के डेरिन नगर ले जार्ने क विचार्र कियार् गयार् क्योंकि अभी भी
वह जार्पार्न के कब्जे में थार्। लेकिन समस्यार् इस बार्त की थी कि यह यार्त्रार् एक छोटे
बमवर्षक यार्न से करनी थी। जो आपत्तिपूर्ण थार्। विमार्न चार्लक ने भी विरोध कियार् पर फिर
भी बोस ने यार्त्रार् प्रार्रंभ कर दी। जार्पार्न के विरूद्ध स्थिति थी। जहार्ज ने पेट्रोल के तीन टैंकों
के सार्थ उड़ार्न भरने क प्रयत्न कियार् और उड़ार्न भरते ही दुर्घटनार्ग्रस्त हो गयार्। इसी
दुर्घटनार् में बोस की मृत्यु हो गयी।

सुभार्षचन्द्र बोस की मृत्यु : एक रहस्य 

सुभार्षचंद्र बोस की मृत्यु एक रहस्य बनी रही है। सुरेश बोस के अनुसार्र 18 अगस्त,
1946 को तार्इवार्न में किसी भी प्रकार की विमार्न दुर्घटनार् नहीं हुई। समय-समय पर अखबार्रों
और पत्र पत्रिकाओं में उनके जीवित होने की खबर छपती रही। उनकी मृत्यु कि जार्ंच हेतु
‘शहनवार्ज समिति’ को भी गठित कियार् गयार्। उत्तर-बंगार्ल में शार्लार्पार्री आश्रम में किसी
सार्धू को देखार् गयार् जो बोस की तरह ही दिखते थे। इस तरह सुभार्षचंद्र बोस के जीवित
होने पर कई सावजनिक सभार्एं आयोजित की गई और कई अंग्रेजी और बंगार्ली पत्र-पत्रिकाओं
में इस संबंध में लेख छपते रहे हैं। वर्तमार्न समय तक बोस की मृत्यु एक अनसुलझार् प्रश्न
बनार् हुआ है, परंतु अब समय इतनार् अधिक निकल चुक है कि सुभार्षचंद्र बोस को जीवित
होनार् असंभव ही है।

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